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उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का खात्मा ‘एक देश, एक शिक्षा’ का शंखनाद, 6 अल्पसंख्यक समुदायों के लिए 6 प्रमुख अधिकार


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। देवभूमि का यह ऐतिहासिक फैसला मात्र एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि तुष्टीकरण की राजनीति पर करारा प्रहार है। मदरसा बोर्ड के स्थान पर 1 जुलाई 2026 से ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) लागू कर दिया गया है। यह कदम देश की मुख्यधारा से कटी हुई शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक साहसिक क्रांति की शुरुआत है। दशकों से धार्मिक तुष्टीकरण की छांव में फल-फूल रहे समानांतर शिक्षा तंत्र पर यह अब तक का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रहार है। 

उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने एक विशेष समुदाय के लिए बने अलग बोर्ड को उखाड़ फेंका है। इस ऐतिहासिक फैसले का प्रभाव देश के अन्य राज्यों में भी धीरे-धीरे होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि आधुनिक भारत में शिक्षा का आधार मध्यकालीन मजहबी संकीर्णता नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र निर्माण और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ही हो सकता है।

धामी सरकार की मदरसा बोर्ड को खत्म करने की असली वजह
उत्तराखंड सरकार का यह कदम राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की उन चिंताओं और रिपोर्टों का सीधा नतीजा है, जिसमें देश भर के मदरसों में बच्चों को बुनियादी और आधुनिक शिक्षा के अधिकारों से वंचित रखने की बात कही गई थी। सरकार का यह मानना है कि मदरसा बोर्ड के तहत बच्चे केवल धार्मिक किताबों और भाषाओं तक सीमित होकर रह जाते थे, जिससे वे डॉक्टर, इंजीनियर, सीए या प्रशासनिक अधिकारी बनने की दौड़ में पिछड़ जाते थे। दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि कई मदरसों में अपारदर्शिता और कथित अवैध गतिविधियों की जानकारियां भी सामने आईं। राज्य में कई ऐसे गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे चल रहे थे, जिनकी फंडिंग और पाठ्यक्रम का कोई अता-पता नहीं था। ‘वन नेशन, वन एजुकेशन (एक राष्ट्र, एक शिक्षा) के विजन को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने इस विशेष रियायत को समाप्त करना ही उचित समझा।

राज्य के हजारों मदरसों की मनमानी अब पूरी तरह बंद होगी
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य में पंजीकृत कुल 452 से 456 मदरसों का ढांचा रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन उनके संचालन के नियम जरूर पूरी तरह बदल जाएंगे। अब कक्षा 8वीं तक के मदरसों को जिला स्तर पर और कक्षा 9वीं से 12वीं तक के मदरसों को ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड’ से संबद्धता लेनी होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब मदरसों की मनमानी समाप्त होगी। उन्हें राज्य के शिक्षा विभाग द्वारा तय मानकों जैसे, बुनियादी ढांचा, शिक्षकों की योग्यता और प्रशासनिक पारदर्शिता का कड़ाई से पालन करना होगा। जो मदरसे इन मानकों को पूरा नहीं करेंगे, वे बंद कर दिए जाएंगे, जैसा कि पूर्व में भी मानकों का उल्लंघन करने वाले 250 से अधिक मदरसों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

विशेष धर्म के शिक्षण संस्थानों का वीआईपी ट्रीटमेंट बंद होगा
मदरसा बोर्ड की जगह ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) के अस्तित्व में आने से सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि अब किसी एक विशेष धर्म के शिक्षण संस्थानों का अलग वीआईपी ट्रीटमेंट बंद हो जाएगा। अब तक केवल मुस्लिम समुदाय के मदरसों के लिए विशेष नियम और सहूलियतें थीं, लेकिन अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक संस्थान एक ही छत के नीचे आएंगे। यह प्राधिकरण एक वैधानिक और संप्रभु निकाय के रूप में काम करेगा, जो किसी भी संस्थान की मान्यता पर अंतिम फैसला लेगा। सबसे क्रांतिकारी बदलाव यह होगा कि अब इन संस्थानों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत एनसीईआरटी (NCERT) का पाठ्यक्रम अनिवार्य रूप से लागू होगा।

इस नए नवेले उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के मुख्य कार्य और अधिकार 

  1. नियमन और संचालन: यह प्राधिकरण राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के नियमन (Regulation), मान्यत (Recognition) और संचालन की जिम्मेदारी संभालेगा।
  2. अनिवार्य संबद्धता: सभी अल्पसंख्यक स्कूलों और मदरसों को शिक्षा विभाग से संबद्धता दिलाने की निगरानी करना।
  3. तीन वर्षीय मान्यता प्रणाली: मानकों की जांच के बाद केवल 3 साल के लिए ऑनलाइन मान्यता प्रमाण पत्र जारी करना।
  4. धार्मिक शिक्षा के लिए अलग पंजीकरण: यदि कोई संस्थान धार्मिक शिक्षा देना चाहता है, तो उसे अलग से पंजीकरण कराना होगा और तय शुल्क (8वीं तक 5000 रुपये और 12वीं तक 7500 रुपये) देना होगा।
  5. जबरन धार्मिक गतिविधियों पर रोक: प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि किसी भी छात्र या स्टाफ को उसकी मर्जी के बिना धार्मिक प्रथाओं में शामिल होने के लिए मजबूर न किया जाए।
  6. निरीक्षण और ऑडिट: सरकारी और केंद्रीय योजनाओं (जैसे पीएम-पोषण या मिड-डे मील) के क्रियान्वयन की सख्त निगरानी और फंड का ऑडिट करना।
इन समुदायों को प्राधिकरण से क्या बड़ा फायदा मिलेगा?
उत्तराखंड सरकार का यह कदम वास्तव में समावेशी और धर्मनिरपेक्ष है, क्योंकि इसके तहत केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों को एक समान कानूनी दायरे में लाया गया है। इस प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में मुस्लिमों के साथ-साथ अब सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को भी शामिल किया गया है। अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक दर्जे और उससे मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का बड़ा हिस्सा केवल एक विशेष समुदाय (मदरसा तंत्र) तक सीमित था। इस नए प्राधिकरण के गठन से सिखों के स्कूल, ईसाइयों के कॉन्वेंट, जैन, बौद्ध और पारसी संस्थानों को भी समान अवसर और कानूनी मान्यता की पारदर्शी व्यवस्था मिलेगी। सबसे बड़ा फायदा छात्रों को होगा।
पांचों अल्पसंख्यक समुदायों ने इस फैसले का किया स्वागत
यह स्वाभाविक है कि किसी भी स्थापित और पारंपरिक व्यवस्था को बदलने पर प्रतिरोध होता है। इस फैसले के बाद कुछ मुस्लिम धार्मिक संगठनों, विशेषकर जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने इस नई व्यवस्था पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं और इसे मदरसों के अस्तित्व पर संकट बताया है। कुछ विपक्षी नेता और मौलवी इसे मुस्लिम समुदाय को लक्षित करने वाला कदम बता रहे हैं। लेकिन विचारणीय पहलू यह है कि प्राधिकरण के दायरे में आने वाले अन्य पांचों अल्पसंख्यक समुदायों (सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी) ने इस फैसले का स्वागत किया है। विरोध केवल उन तत्वों द्वारा किया जा रहा है जो शिक्षा के नाम पर धार्मिक एकाधिकार और अपारदर्शिता बनाए रखना चाहते हैं। आम और प्रगतिशील मुस्लिम परिवार, जो अपने बच्चों का आधुनिक भविष्य चाहते हैं, वे इस बदलाव को एक सकारात्मक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
उत्तराखंड का यह फैसला अन्य राज्यों के लिए ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होगा
उत्तराखंड का यह साहसिक फैसला देश की राजनीति और शिक्षा नीति में एक बहुत बड़ा ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होने जा रहा है। असम सरकार पहले ही सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने का कानून ला चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी मदरसों के सर्वे और एनसीपीसीआर की सिफारिशों के बाद इस दिशा में तेजी से मंथन चल रहा है। उत्तराखंड द्वारा देश का पहला ऐसा वैधानिक मॉडल प्रस्तुत करने के बाद, निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी शासित अन्य राज्यों पर भी यह दबाव बढ़ेगा कि वे मजहबी शिक्षा बोर्डों को भंग कर एक समान ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन करें। यह कदम देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) की तरह ‘समान शिक्षा संहिता’ की दिशा में बढ़ने वाला पहला और सबसे मजबूत कदम है, जिसने अन्य राज्यों के मदरसा बोर्डों की उल्टी गिनती की पटकथा लिख दी है।
असम ने 1281 मदरसों का नाम बदलकर किया था मिडिल इंग्लिश स्कूल 
उत्तराखंड का यह आक्रामक और क्रांतिकारी फैसला देश की राजनीति में एक ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होने जा रहा है। असम सरकार ने भी दिसंबर 2023 में राज्य के 31 जिलों में कम से कम 1281 मदरसों का नाम बदल दिया है और उन्हें सामान्य स्कूलों में बदल दिया था। तब राज्य के शिक्षा मंत्री रनोज पेगु ने अपने एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी साझा की थी। उन्होंने लिखा, “माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, असम (एसईबीए) के तहत सभी सरकारी और प्रांतीय मदरसों को सामान्य स्कूलों में परिवर्तित करने के परिणामस्वरूप स्कूल शिक्षा विभाग, असम ने आज एक अधिसूचना द्वारा 1281 एमई मदरसों के नाम बदलकर मिडिल इंग्लिश (एमई) स्कूल कर दिया है।” असम सरकार द्वारा सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने के बाद, अब उत्तराखंड द्वारा वैधानिक रूप से पूरे मदरसा बोर्ड को ही जमींदोज कर दिया है।
अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिलेगी
देश के अन्य भाजपा-शासित राज्यों के लिए भी यह एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी गैर-मान्यता प्राप्त और संदिग्ध मदरसों के खिलाफ लगातार जांच और कार्रवाई चल रही है। उत्तराखंड के इस फैसले ने देश के सामने यह साबित कर दिया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो तुष्टीकरण के दशकों पुराने ढांचे को पलक झपकते ही ढहाया जा सकता है। निश्चित रूप से, आने वाले समय में देश के कई अन्य राज्यों में भी एकांगी और मजहबी मदरसा बोर्डों की उल्टी गिनती शुरू होना तय है, और भारत के सभी बच्चे एक समान, आधुनिक तथा राष्ट्रवाद से प्रेरित शिक्षा प्रणाली की ओर तेजी से कदम बढ़ाएंगे। मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अब कंप्यूटर, विज्ञान, गणित और अंग्रेजी की आधुनिक शिक्षा मिलेगी। वे राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बैठने के योग्य बनेंगे। उनके प्रमाणपत्रों को देश-विदेश में मान्यता मिलेगी, जिससे वे रोजगार की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे।

उत्तराखंड : ‘जमीन हड़पने के लिए 90 वर्षीय नसरीन को धमकी दे रहे कांग्रेसी’: बीजेपी का प्रियंका और रॉबर्ट वाड्रा पर आरोप, कहा- सायरा वाड्रा कर रहीं कब्जे की कोशिश

                                                   प्रतिकात्मक तस्वीर (साभार- Dall-E)
तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी जो कहते हैं 'Congress is Muslim, Muslim is Congress' लेकिन वही कांग्रेस ही वृद्ध मुस्लिम महिला की जमीन हड़पने में लगी है। यानि मुस्लिम सुरक्षा के नाम ढोंग। ऐसा इसलिए हो रहा परिवार पर लम्बित घोटाले केस। परिवार को लगता है कि केंद्र में अगर बीजेपी सरकार है तो क्या हुआ मनमानी तो हमारी ही चलेगी।   

बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रदीप भंडारी ने कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा पर उत्तराखंड के किच्छा में 90 वर्षीय मुस्लिम महिला की जमीन हड़पने की कोशिश का समर्थन करने का आरोप लगाया है। बीजेपी ने इस विवाद की तुलना ‘गाँधी-वाड्रा परिवार’ के कथित भ्रष्टाचार से करते हुए ‘नेशनल हेराल्ड मामले’ से की है।

एक प्रेस ब्रीफिंग में भंडारी ने बताया कि उधम सिंह नगर के किच्छा में खान फार्म एस्टेट में मौजूद प्रॉपर्टी के असली कागजात स्वर्गीय कुलसुम खान के नाम पर थे। उनकी 90 साल की बहन नसरीन खान अभी उसी जमीन पर बने मकान में रहती हैं।

भंडारी के मुताबिक, प्रियंका की भाभी और रॉबर्ट वाड्रा के परिवार की सदस्य सायरा वाड्रा उस प्रॉपर्टी पर कब्जा करने में लगी हुई हैं, जबकि प्रॉपर्टी के कागजात उनके नाम पर नहीं हैं।

कांग्रेस विधायक ने बुज़ुर्ग महिला को धमकाया- भंडारी

भंडारी ने बताया कि किच्छा से कांग्रेस विधायक तिलक राज बेहर देर रात करीब 100 पार्टी कार्यकर्ताओं के साथ विवादित जमीन पर गए और नसरीन खान को धमकाया। विधायक तिलक राज प्रियंका गाँधी वाड्रा के करीबी माने जाते हैं।

भंडारी ने नसरीन खान का बयान दोहराते हुए कहा कि कांग्रेस के कुछ लोग यहाँ आए हैं। वे मेरे फार्म का कब्जा कर वाड्रा परिवार को सौंपने की कोशिश कर रहे हैं।

उन्होंने आगे कहा कि खान ने सिर्फ सायरा वाड्रा का नाम लेने के बजाय पूरे वाड्रा परिवार का जिक्र किया था। उन्होंने सवाल पूछा कि क्या कांग्रेस विधायक ने प्रियंका वाड्रा या रॉबर्ट वाड्रा के कहने पर महिला को धमकाया था। उन्होंने यह भी कहा कि सायरा और उनके पति सिकंदर आलम ने नसरीन की बहन पर झूठे हलफनामे पर दस्तखत करने का दबाव डाला और एक फर्जी वसीयत बनवाने की कोशिश की।

भंडारी ने कहा कि तरीका यह था कि असली संपत्ति के मालिक को तब तक डराया-धमकाया जाए जब तक वह उसे छोड़कर चली न जाए, जिसके बाद कोई दूसरी पार्टी सिविल विवाद में कब्जे का दावा कर सके।

नेशनल हेराल्ड मामले से घटना की तुलना की

बीजेपी प्रवक्ता ने कहा कि कांग्रेस विधायक की हरकतें भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 351 के दायरे में आती हैं, जो आपराधिक धमकी से संबंधित है। उन्होंने कहा कि यह व्यवहार गैर-कानूनी था। उन्होंने कहा, “बात सिर्फ कांग्रेस विधायक तक सीमित नहीं है। जिम्मेदारी प्रियंका वाड्रा की है।

भंडारी ने रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े जमीन के मामलों का भी जिक्र किया, जिनमें गुरुग्राम का शिकोहपुर मामला और स्काईलाइट हॉस्पिटैलिटी से जुड़ा बीकानेर-कोलायत जमीन का मामला शामिल है।

उन्होंने नेशनल हेराल्ड मामले से भी तुलना की और गाँधी परिवार पर आजादी की लड़ाई लड़ने वालों से जुड़ी संपत्तियों को निजी संपत्ति में बदलने का आरोप लगाया। गाँधी-वाड्रा परिवार पर गंभीर आरोप लगाते हुए भंडारी ने पूछा कि क्या प्रियंका ने कांग्रेस विधायक को उस प्रॉपर्टी पर जाने के लिए कहा था और मुसलमानों, महिलाओं और गरीबों का समर्थन करने का दावा करने वाली पार्टी एक 90 साल की मुस्लिम महिला को उसकी जमीन के मामले में क्यों निशाना बना रही थी।

उत्तराखंड : बकरीद के दिन कॉन्स्टेबल मोहम्मद अजीम द्वारा मंदिर के गेट पर मांस के टुकड़े फेंकने के आरोप में रुद्रपुर में गिरफ्तार, ड्यूटी से भी सस्पेंड

                  वाल्मीकि मंदिर (बाएँ), कॉन्स्टबेल मोहम्मद अजीम (दाएँ), (फोटो साभार : Bhaskar)
उत्तराखंड के रुद्रपुर में वाल्मीकि मंदिर के गेट पर मांस के टुकड़े फेंकने के आरोपित पुलिस कॉन्स्टेबल मोहम्मद अजीम को गिरफ्तार कर लिया गया है। इस शर्मनाक हरकत के बाद SSP अजय गणपति ने आरोपित कॉन्स्टेबल को तुरंत सस्पेंड भी कर दिया है।

पुलिस ने आरोपित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर उसे कोर्ट में पेश किया है। यह मामला रुद्रपुर के भूत बंगला इलाके का है। आरोप है कि कॉन्स्टेबल अजीम ने कुर्बानी के मांस के टुकड़े मंदिर के मुख्य गेट पर फेंक दिए थे।

शुक्रवार (29 मई 2026) को जब लोगों ने यह देखा, तो पूरे इलाके में तनाव फैल गया। इस घटना से नाराज वाल्मीकि समाज के लोगों ने मौके पर भारी हंगामा किया। स्थानीय लोगों का आरोप है कि विरोध करने पर उनके साथ गाली-गलौज भी की गई।

इसके बाद पीड़ित पक्ष ने कोतवाली पहुँचकर तहरीर दी। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने यह बड़ी कार्रवाई की है।

लिपुलेख-कालापानी पर शेखी बघार अपने ही देश में घिरे बालेन शाह, सुगौली संधि से ब्रिटेन का भी कनेक्शन: जानिए भारत-नेपाल सीमा विवाद के बारे में सब कुछ

       भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दों को लेकर नेपाल PM बालेन शाह ने ब्रिटेन के आगे फैलाया हाथ (साभार: AI)
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर दिया गया बयान नेपाल की राजनीति से लेकर भारत-नेपाल संबंधों तक चर्चा का विषय बन गया है। संसद में सीमा विवाद से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा कि नेपाल केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन (UK) से भी बातचीत कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर भारत ने नेपाल और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसदों ने तर्क दिया कि भारत और नेपाल की खुली सीमा वाले क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि का उपयोग और किसी राज्य द्वारा दूसरे देश की जमीन पर कब्जा करने में बड़ा अंतर है।

दशकों पुरानी खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग खेती, व्यापार और आवागमन के लिए एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। इसलिए इसे अतिक्रमण या कब्जा कहना उचित नहीं है।

इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

हालाँकि बालेन शाह के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा ब्रिटेन के सामने उनका हाथ फैलाकर मदद माँगना था। सवाल उठने लगा कि आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटेन का नाम क्यों आया और नेपाल इस मुद्दे को ब्रिटेन से क्यों जोड़ रहा है। इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर 210 साल पुरानी सुगौली संधि और लिपुलेख-कालापानी विवाद से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटेन का जिक्र क्यों आया?

नेपाल का तर्क है कि सीमा विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। इसलिए नेपाल के कुछ नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड हो सकते हैं जो सीमा विवाद की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट कर सकें।

इसी के तहत बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यंजनकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि यूनाइटेड किंगडम इस विवाद को सुलझाने में कैसे मदद कर सकता है। हालाँकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन ने इस मुद्दे को भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला माना है और किसी तरह की मध्यस्थता में रुचि नहीं दिखाई है।

आलोचकों का कहना है कि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन का नाम लेने से विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा गया।

आखिर क्या है लिपुलेख दर्रा? भारत के पास मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य

लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के करीब स्थित है। भारतीय पक्ष से यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है और तिब्बत के पुरांग (तकलाकोट) क्षेत्र को जोड़ता है।

भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से यह दर्रा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सदियों से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क का रास्ता रहा है। इसके अलावा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। भारत और चीन के बीच होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा के दो प्रमुख मार्गों में से एक लिपुलेख होकर गुजरता है।

हाल ही में भारत और चीन ने 2026 से कैलास मानसरोवर यात्रा फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसी घोषणा के बाद लिपुलेख एक बार फिर चर्चा में आ गया, क्योंकि नेपाल ने इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई और कहा कि विवादित क्षेत्र से जुड़े मामलों पर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।

बालेन शाह सरकार ने दावा किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, इसीलिए वहाँ से गुजरना नेपाल के कानून के खिलाफ है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत और चीन को इस स्थिति से अवगत कराया। बयान में कहा गया कि नेपाल सरकार अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।

नेपाल के इस दावे को लेकर भारत ने कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और एक जैसा रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पारंपरिक मार्ग रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। यह कोई नई बात नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह के एकतरफा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है। भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।”

लिपुलेख विवाद की जड़ क्या है और क्या दावा करता है नेपाल?

भारत और नेपाल के बीच वास्तविक विवाद केवल लिपुलेख दर्रे तक सीमित नहीं है। इसके साथ कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।

इस पूरे विवाद की जड़ काली नदी (महाकाली नदी) के उद्गम स्थल को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच प्राकृतिक सीमा माना गया था। लेकिन समस्या यह है कि दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम को अलग-अलग स्थान मानते हैं।

नेपाल बिना किसी साक्ष्य के दावा करता है कि काली नदी का मूल स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है और कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र में आते हैं।

वहीं भारत ने हमेशा इस दावे का खंडन किया है। भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे स्थित है। भारत के अनुसार, सीमा निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए, जिसके चलते कालापानी, लिपुलेख और आसपास का क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा बनता है।

भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।

सुगौली संधि क्या थी?

लिपुलेख विवाद को समझने के लिए सुगौली संधि को समझना बेहद जरूरी है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में गोरखा साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। इस विस्तार के कारण नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हुआ।
1814 से 1816 के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध लड़ा गया। युद्ध में नेपाल को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए और 4 मार्च 1816 से यह प्रभावी हो गई। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्रों पर दावा छोड़ दिया।
साथ ही यह तय किया गया कि काली नदी दोनों पक्षों के बीच सीमा का काम करेगी। नेपाल आज भी अपने दावों के समर्थन में इसी संधि और ब्रिटिश काल के कई पुराने नक्शों का हवाला देता है। नेपाल का तर्क है कि यदि मूल संधि और शुरुआती नक्शों को आधार बनाया जाए तो कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके हिस्से में आते हैं।

2020 में क्यों बढ़ा था विवाद और क्या है भारत का पक्ष?

लिपुलेख विवाद 2020 में भी सुर्खियों में आया था। भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था। इस सड़क का उद्देश्य कैलास मानसरोवर यात्रियों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच आसान बनाना था। नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया और कहा कि सड़क विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है।
इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया। बाद में नेपाल ने इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दे दी। भारत ने नेपाल की इस कार्रवाई को एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए।

भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक सीमाएँ विरासत में प्राप्त कीं और उसी आधार पर इन क्षेत्रों का प्रबंधन किया जाता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया।

भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मौजूदगी मजबूत की। भारत का यह भी तर्क है कि कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग दशकों से किया जाता रहा है और यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध बेहद गहरे हैं। यही कारण है कि सीमा से जुड़े अधिकांश मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए किया जाता रहा है, लेकिन नेपाल ने एक बार फिर बिना सबूतों के दावा तो ठोका ही साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के बजाय तीसरे देश को भी बेवजह शामिल करने की कोशिश की।(साभार) 

असम विधानसभा में UCC विधेयक, बहुविवाह पर रोक, लिव-इन रिलेशनशिप का रजिस्ट्रेशन अनिवार्य


असम की हिमंता बिस्वा सरमा सरकार ने राज्य की राजनीति और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े एक बड़े मुद्दे पर ऐतिहासिक कदम उठाते हुए विधानसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) विधेयक पेश कर दिया है।

सोमवार (25 मई 2026) को विधानसभा में पेश किए गए ‘यूनिफॉर्म सिविल कोड, असम 2026’ बिल के जरिए सरकार विवाह, तलाक, उत्तराधिकार, बहुविवाह और लिव-इन रिलेशनशिप जैसे मामलों को एक समान कानूनी ढाँचे में लाना चाहती है।

हालाँकि राज्य की जनजातीय आबादी और पारंपरिक धार्मिक रीति-रिवाजों को इस कानून से बाहर रखा गया है। अगर यह विधेयक पारित हो जाता है, तो असम उत्तराखंड और गुजरात के बाद UCC लागू करने वाला देश का तीसरा राज्य बन जाएगा।

सरकार का दावा है कि यह कानून महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को मजबूत करेगा। खास बात यह है कि बिल में पहली बार लिव-इन रिलेशनशिप को कानूनी रूप से परिभाषित करते हुए उसका रजिस्ट्रेशन अनिवार्य बनाने का प्रस्ताव रखा गया है।

साथ ही बहुविवाह पर पूरी तरह रोक लगाने और सभी विवाह तथा तलाक का पंजीकरण जरूरी करने की बात कही गई है।

क्या है यूनिफॉर्म सिविल कोड और क्यों है इसकी चर्चा?

यूनिफॉर्म सिविल कोड का मतलब ऐसा कानून है जो सभी नागरिकों पर समान रूप से लागू हो, चाहे उनका धर्म कोई भी हो। अभी भारत में विवाह, तलाक, गोद लेना, उत्तराधिकार और पारिवारिक मामलों में अलग-अलग धार्मिक समुदायों के अलग-अलग व्यक्तिगत कानून लागू होते हैं। उदाहरण के लिए हिंदू मैरिज एक्ट, मुस्लिम पर्सनल लॉ, क्रिश्चियन मैरिज एक्ट आदि।

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में अनुच्छेद 44 के तहत राज्य को नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में काम करने की बात कही गई है। हालाँकि स्वतंत्रता के बाद से अब तक केंद्र स्तर पर पूरे देश में UCC लागू नहीं हो सका। असम विधानसभा चुनाव 2026 से पहले BJP ने अपने घोषणा पत्र में UCC लागू करने का वादा किया था।

असम UCC बिल में क्या-क्या बड़े प्रावधान हैं?

असम सरकार द्वारा पेश किए गए विधेयक में कई अहम बदलाव प्रस्तावित किए गए हैं। इनमें सबसे बड़ा प्रावधान बहुविवाह पर प्रतिबंध है। यानी अब किसी भी समुदाय में एक से अधिक शादी की अनुमति नहीं होगी। सरकार इसे महिलाओं के अधिकारों की दिशा में बड़ा कदम बता रही है।

विधेयक में पुरुषों के लिए विवाह की न्यूनतम आयु 21 वर्ष और महिलाओं के लिए 18 वर्ष तय की गई है। यह प्रावधान मौजूदा कानूनी व्यवस्था के अनुरूप है, लेकिन अब इसे सभी समुदायों पर समान रूप से लागू करने की कोशिश की जा रही है। बिल के अनुसार, सभी विवाहों और तलाक का पंजीकरण अनिवार्य होगा।

यानी केवल धार्मिक रीति-रिवाजों से शादी करने के अलावा उसका कानूनी रजिस्ट्रेशन भी जरूरी होगा। सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं और बच्चों के अधिकारों को कानूनी सुरक्षा मिलेगी और विवादों की स्थिति में प्रमाण उपलब्ध रहेगा। विधेयक उत्तराधिकार यानी संपत्ति के बंटवारे के लिए भी समान नियम लागू करने की बात करता है।

सरकार का दावा है कि इससे संपत्ति के हस्तांतरण में पारदर्शिता आएगी और महिलाओं को परिवार की संपत्ति में अधिक सुरक्षा मिलेगी। सबसे चर्चित प्रावधान लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर है। पहली बार किसी कानून में लिव-इन संबंधों के लिए अलग कानूनी ढाँचा तैयार किया गया है।

इसके तहत शादी किए बिना साथ रहने वाले जोड़ों को अपने संबंध का रजिस्ट्रेशन कराना होगा। सरकार का कहना है कि इससे ऐसे संबंधों में रहने वाली महिलाओं और उनसे जन्म लेने वाले बच्चों को कानूनी पहचान और सुरक्षा मिलेगी।

लिव-इन रिलेशनशिप पर कानून क्यों बना रही है सरकार?

असम UCC बिल का सबसे नया और बहस वाला हिस्सा लिव-इन रिलेशनशिप का कानूनी नियमन है। सरकार का तर्क है कि समाज में ऐसे संबंधों की संख्या बढ़ रही है, लेकिन इनके लिए स्पष्ट कानूनी सुरक्षा नहीं होने के कारण कई बार महिलाएँ और बच्चे असुरक्षित रह जाते हैं।

यदि कोई व्यक्ति लंबे समय तक किसी साथी के साथ रहकर बाद में उसे छोड़ देता है, तो मौजूदा व्यवस्था में पीड़ित पक्ष के लिए कानूनी लड़ाई जटिल हो जाती है। सरकार का कहना है कि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से ऐसे संबंधों का रिकॉर्ड रहेगा और जरूरत पड़ने पर महिला अपने अधिकारों की रक्षा कर सकेगी।

बिल में यह भी कहा गया है कि लिव-इन रिलेशनशिप से जन्म लेने वाले बच्चों को वैध संतान माना जाएगा। इससे उत्तराधिकार और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने की कोशिश होगी। हालाँकि अभी तक विधेयक के विस्तृत नियम सार्वजनिक नहीं किए गए हैं।

इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि रजिस्ट्रेशन कितने दिनों के भीतर कराना होगा, रजिस्ट्रेशन न कराने पर क्या सजा होगी, किन दस्तावेजों की जरूरत पड़ेगी और सत्यापन की प्रक्रिया क्या होगी। इन बिंदुओं पर विधानसभा में चर्चा और अंतिम अधिसूचना के बाद स्थिति साफ हो सकती है।

विधेयक यह भी स्पष्ट करता है कि यदि किसी लिव-इन रिलेशनशिप में कोई साथी पहले से विवाहित है या नाबालिग है, तो ऐसे संबंध का पंजीकरण नहीं किया जाएगा।

किन लोगों को UCC से रखा गया है बाहर?

असम की सामाजिक और सांस्कृतिक विविधता को देखते हुए सरकार ने इस बिल में कुछ महत्वपूर्ण छूट भी दी है। विधेयक के अनुसार राज्य की अनुसूचित जनजातियों यानी शेड्युल्ड ट्राइब्स (Scheduled Tribes) पर यह कानून लागू नहीं होगा। इसमें पहाड़ी और मैदानी दोनों क्षेत्रों की जनजातियाँ शामिल हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, असम की लगभग 12.45 प्रतिशत आबादी जनजातीय समुदायों से आती है। सरकार का कहना है कि इन समुदायों की पारंपरिक सामाजिक संरचना और रीति-रिवाजों की रक्षा के लिए उन्हें UCC से बाहर रखा गया है।

इसके अलावा बिल में कहा गया है कि धार्मिक और पारंपरिक रस्मों के अनुसार विवाह करने की स्वतंत्रता बनी रहेगी। यानी लोग अपने धर्म और समुदाय की परंपराओं के अनुसार शादी कर सकेंगे, लेकिन उसका कानूनी पंजीकरण जरूरी होगा।

BJP ने अपने चुनावी वादे में भी स्पष्ट किया था कि छठी अनुसूची वाले क्षेत्रों और जनजातीय समुदायों को UCC से छूट दी जाएगी। इससे सरकार जनजातीय संगठनों की आशंकाओं को कम करना चाहती है।

उत्तराखंड और गुजरात के UCC से कितना अलग है असम मॉडल?

उत्तराखंड देश का पहला राज्य था जिसने 2024 में UCC कानून पारित किया और जनवरी 2025 से उसे लागू भी कर दिया। उत्तराखंड UCC में भी लिव-इन रिलेशनशिप के रजिस्ट्रेशन को अनिवार्य बनाया गया था। वहाँ किसी जोड़े को साथ रहने के एक महीने के भीतर अपना संबंध पंजीकृत कराना होता है।

यदि ऐसा नहीं किया जाता, तो तीन महीने तक की जेल, 10 हजार रुपए तक जुर्माना या दोनों सजा का प्रावधान रखा गया है। उत्तराखंड कानून में रजिस्ट्रार को यह अधिकार भी दिया गया कि यदि कोई साथी 21 वर्ष से कम उम्र का है, तो उसके माता-पिता को जानकारी दी जाए। इसके अलावा संबंध समाप्त होने की सूचना पुलिस को देने का प्रावधान भी था।

इनमें से कुछ प्रावधानों को लेकर निजता के अधिकार पर सवाल उठे थे। बाद में उत्तराखंड सरकार ने हाई कोर्ट में हलफनामा देकर कुछ नियमों में बदलाव की जानकारी दी। उदाहरण के लिए आधार कार्ड और सामुदायिक प्रमाणपत्र की अनिवार्यता हटाई गई तथा गर्भावस्था की सूचना देने वाला नियम भी समाप्त किया गया।

गुजरात ने मार्च 2026 में अपना UCC बिल पारित किया। वहाँ भी लिव-इन रिलेशनशिप को ‘विवाह जैसी प्रकृति वाला संबंध’ बताया गया और लगभग उत्तराखंड जैसे प्रावधान रखे गए।

असम का मॉडल कई मामलों में उत्तराखंड और गुजरात से प्रेरित माना जा रहा है, लेकिन इसमें जनजातीय समुदायों को स्पष्ट छूट देकर स्थानीय सामाजिक संरचना को ध्यान में रखने की कोशिश की गई है।

असम में UCC लागू होने से क्या बदल सकता है?

यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो असम में पारिवारिक और व्यक्तिगत कानूनों की व्यवस्था में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। विवाह, तलाक और उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में एक समान कानूनी ढाँचा बनने से प्रशासनिक प्रक्रियाएँ अधिक स्पष्ट हो सकती हैं।
सरकार का मानना है कि इससे महिलाओं को संपत्ति और वैवाहिक अधिकारों के मामलों में अधिक कानूनी सुरक्षा मिलेगी। बहुविवाह पर रोक लगने से एकल विवाह व्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा और महिलाओं के अधिकारों को मजबूती मिलेगी।
लिव-इन रिलेशनशिप के पंजीकरण से ऐसे संबंधों में रहने वाले लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों, को कानूनी पहचान मिल सकती है। इससे भविष्य में उत्तराधिकार, भरण-पोषण और सामाजिक पहचान से जुड़े विवादों को कम करने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा विवाह और तलाक के अनिवार्य रजिस्ट्रेशन से सरकारी रिकॉर्ड अधिक व्यवस्थित होंगे और कानूनी मामलों में प्रमाण जुटाना आसान हो सकता है। असम सरकार इसे सामाजिक सुधार और कानूनी समानता की दिशा में बड़ा कदम मान रही है।
अब विधानसभा में इस विधेयक पर विस्तृत चर्चा और मतदान होना है। यदि बिल पारित होता है, तो असम देश के उन चुनिंदा राज्यों में शामिल हो जाएगा जहाँ समान नागरिक संहिता को जमीन पर लागू करने की दिशा में ठोस कदम उठाए गए हैं।

उत्तराखंड : मदरसा बोर्ड खत्म, USMEA का हुआ गठन: अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्या-क्या बदलेगा

                                डॉ सैयद अली हामिद और पुष्कर सिंह धामी (साभार - एबीपी/इंडियन एक्स्प्रेस)
उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।

अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।

राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।

अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव

मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।
इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।

क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?

नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।
सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।
अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।

पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?

नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।
मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।

कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?

सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।
डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।

मान्यता के लिए सख्त नियम लागू

नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।
यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।

बिहार नए गृह मंत्री की अग्नि परीक्षा : नेपाल की तरह बिहार में थी दंगे भड़काने की साजिश रचने वाली कब होगी गिरफ्तार? करिश्मा अजीज ने किए कई भड़काऊ पोस्ट: 2 राज्यों में दर्ज हुई शिकायत

     नेपाल की फेक वीडियो दिखाकर करिश्मा एजाज बिहार में दंगा फैलाने की साजिश रच रही (साभार :                                                                                                             X_@lkoabhishek & Moneycontrol)
मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा अजीज नाम की युवती आजकल पुलिस के लिए पहेली बनी हुई है, जिसने बिहार और उत्तराखंड दो अलग-अलग राज्यों को निशाना बनाया है। करिश्मा अजीज पर इन दोनों राज्यों में आईटी एक्ट और कई गंभीर आरोपों के तहत FIR दर्ज है। इसके बावजूद, करिश्मा अजीज का डिजिटल ऑपरेशन लगातार जारी है, जहाँ उसके सोशल मीडिया अकाउंट से लगातार भ्रामक और विवादित कंटेंट पोस्ट किए जा रहे हैं।

यह पहला मौका है कि गृह मंत्रालय नीतीश कुमार से लेकर बीजेपी के सम्राट चौधरी के हाथ सौंपने के पीछे बहुत बड़ी राजनीति है। कई हादसों में नीतीश कोई कार्यवाही करने में असहाय नज़र आते थे जिस कारण बिहार में माफिया और बाहुबली राज करते रहे, जिसका चुनावों में सामना करना पड़ा। अगर मोदी-योगी-अमित ने मेहनत नहीं की होती बिहार हाथ से निकल जाता। बिहार के गृह मंत्री सम्राट चौधरी के लिए करिश्मा अज़ीज़ को गिरफ्तार करना शायद किसी अग्नि परीक्षा से कम नहीं। देखना यह है कि ऐसी उपद्रवी महिला को कब गिरफ्तार करते हैं?  

हैरत की बात यह है कि उसका एक्स अकाउंट केवल आठ महीने पुराना है, जिसे मई 2025 में एक्स प्लेटफॉर्म द्वारा वेरीफाई भी कर दिया गया था। वर्तमान में, उसके इस अकाउंट के 19.3 हजार से अधिक फॉलोवर्स हैं और उसके प्रत्येक वीडियो पर 50 हजार से ज्यादा व्यूज मिलते हैं। उसका ऑपरेशन एक अकाउंट तक सीमित नहीं है, बल्कि वह करिश्मा अजीज के नाम से जुड़े 7 से 8 अतिरिक्त बैकअप अकाउंट्स का पूरा नेटवर्क चला रही है।

साजिश का इतिहास: बिहार से पहले उत्तराखंड को बनाया निशाना

जाँच में सामने आया है कि करिश्मा अजीज की यह भड़काऊ गतिविधि केवल बिहार तक सीमित नहीं थी। उसने सबसे पहले उत्तराखंड को टारगेट किया था। उत्तराखंड के उत्तरकाशी में धराली आपदा के बाद जब शोक का माहौल था, तब करिश्मा अजीज सहित कुछ अकाउंट्स ने जवानों की मौत और आम नागरिकों की त्रासदी पर अभद्र और सांप्रदायिक तनाव भड़काने वाली टिप्पणियाँ की थीं।

देहरादून के हिंदू संगठनों की शिकायत पर करिश्मा अजीज सहित तीन लोगों के खिलाफ उत्तराखंड में पहली FIR दर्ज की गई थी। इसके बाद, बिहार विधानसभा चुनाव (2025) समाप्त होने पर उसने बिहार को निशाना बनाया। मुजफ्फरपुर साइबर थाने को इनपुट मिला कि करिश्मा अजीज ने 16 नवंबर की शाम को अपने एक्स हैंडल पर 32 सेकेंड का एक वीडियो शेयर किया, जिसमें दावा किया गया कि बिहार चुनाव की मतगणना के बाद युवा सड़क पर हिंसक प्रदर्शन कर रहे हैं।

साइबर थाने के एएसआई दयाल नारायण सिंह ने तुरंत इसकी जाँच की, तो पता चला कि यह वीडियो नेपाल में हुए GenZ जैसे हिंसक प्रदर्शनों का फुटेज था, जिसे बिहार का बताकर जानबूझकर नफरत और हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। इसके बाद मुजफ्फरपुर में उसके खिलाफ दूसरी FIR दर्ज की गई। मुजफ्फरपुर की FIR कॉपी ऑपइंडिया के पास है।

कानून की गिरफ्त से दूर, मेटा से माँगी गई जानकारी

मुजफ्फरपुर की रहने वाली करिश्मा एजाज का X आईडी @KarishmaAziz_ है। इस पर वह लगातार भ्रामक वीडियो और विवादित कंटेंट पोस्ट कर रही है, लेकिन वह अभी भी कानून की पहुँच से बाहर है। पुलिस जाँच में यह पता चला है कि वह अपनी लोकेशन छिपाने के लिए वीपीएन और प्रॉक्सी सर्वर का इस्तेमाल कर रही है।

इसके अलावा, वह अलग-अलग अकाउंट्स में अलग-अलग मोबाइल नंबर और ईमेल आईडी का उपयोग कर रही है, जिससे लोकेशन बार-बार बदल रही है और उसे ट्रेस करने में मुश्किलें आ रही हैं। साइबर DSP हिमांशु कुमार ने पुष्टि की है कि युवती के ID से जुड़ी पूरी जानकारी पाने के लिए मेटा और एक्स को मेल भेजा गया है।

पुलिस फिलहाल एक्स से पूरा डाटा मिलने का इंतजार कर रही है, जिसके बाद ही उसके खिलाफ आगे की बड़ी कार्रवाई की जाएगी। पुलिस का कहना है कि करिश्मा अजीज का यह कृत्य स्पष्ट रूप से बिहार में भी नेपाल जैसा हिंसक विरोध प्रदर्शन का माहौल तैयार करने या उसे उकसाने का प्रयास है, जो जन-शांति भंग करने और समाज में वैमनस्य उत्पन्न करने वाला गंभीर अपराध है।

झूठ फैला रहा वामपंथी प्रोपेगेंडाबाज बेशर्म वकील प्रशांत भूषण, मोदी की रैली में शामिल होने पर छात्रों को 50 नंबर मिलने की बात

प्रॉपगैंडिस्ट प्रशांत भूषण 
आखिर नीचता की भी हद होती है। नरेंद्र मोदी के विरोध में कितना नीचे गिरेगा विपक्ष? आतंकवादियों की पैरवी के लिए खड़ा होने वाले वकील प्रशांत भूषण ने उत्तराखंड में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नवम्बर 9 को हो रही रैली में शामिल होने वाले छात्रों को 50 अंक मिलने की झूठी फैलाकर क्या हासिल करना चाहता है? कहने को वकील है लेकिन लगता है अक्ल नहीं।    

सोशल मीडिया पर अक्सर फर्जी खबरें फैलाने वाले वकील और सामाजिक कार्यकर्ता प्रशांत भूषण ने सोशल मीडिया पर एक और दावा किया है। शनिवार(नवम्बर 8) को एक्स पर एक पोस्ट में, वामपंथी प्रोपेगेंडा फैलाने वाले प्रशांत किशोर ने कहा कि देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रैली में शामिल होने वाले छात्रों को 50 अंक देगा।

प्रशांत भूषण ने विश्वविद्यालय के नाम पर ये फर्जी नोटिस पोस्ट किया है। इसमें कहा गया था कि सभी बी.टेक सीएसई और स्पेशलाइजेशन (द्वितीय वर्ष) और बीसीए (द्वितीय वर्ष) के छात्रों को एफआरआई में होने वाले आगामी कार्यक्रम में शामिल होना होगा। रविवार (9 नवंबर 2025) को ये कार्यक्रम है, जिसमें भारत के प्रधानमंत्री के साथ एक संवाद होगा। इसमें कहा गया था, “इस कार्यक्रम में उपस्थिति भारतीय ज्ञान परंपरा पाठ्यक्रम के अंतर्गत मानी जाएगी और प्रत्येक प्रतिभागी को 50 इंटरनल नंबर दिए जाएँगे।”

नोटिस में आगे कहा गया है, “अतः, भारतीय ज्ञान प्रणाली पाठ्यक्रम वाले सभी कार्यक्रमों के लिए इस कार्यक्रम में भाग लेना अनिवार्य है।”

हालाँकि यह ‘नोटिस’ बीसीए विभागाध्यक्ष रोहित गोयल और बी.टेक सीएसई कार्यक्रम समन्वयक गोविंद सिंह पंवार के नाम पर जारी किया गया था, लेकिन इसमें किसी के हस्ताक्षर नहीं थे।

सोशल मीडिया पर ‘नोटिस’ आने के बाद, देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा कि यह नोटिस फर्जी है। फेसबुक पर एक पोस्ट में, निजी विश्वविद्यालय ने कहा, “हमारे संज्ञान में आया है कि 09 नवंबर 2025 को एफआरआई के आगामी दौरे के अंकों के संबंध में डीबीयूयू के नाम से एक फर्जी नोटिस प्रसारित किया गया है। हम स्पष्ट करना चाहते हैं कि यह नोटिस पूरी तरह से झूठा है और विश्वविद्यालय द्वारा जारी या अनुमोदित नहीं है। इस पर कोई आधिकारिक हस्ताक्षर, संदर्भ संख्या या प्राधिकरण नहीं है।”

विश्वविद्यालय ने एक आधिकारिक अधिसूचना भी जारी की, जिसमें कहा गया, “विश्वविद्यालय प्राधिकारियों के संज्ञान में आया है कि हाल ही में देवभूमि उत्तराखंड विश्वविद्यालय के नाम से अज्ञात तरीके से एक फर्जी नोटिस प्रसारित किया गया है। सभी संबंधित छात्रों को सूचित किया जाता है कि यह नोटिस पूरी तरह से फर्जी है और विश्वविद्यालय द्वारा जारी नहीं किया गया है। इस पर किसी भी सक्षम प्राधिकारी का आधिकारिक लेटरहेड, संदर्भ संख्या या हस्ताक्षर नहीं हैं, और इसे विश्वविद्यालय के किसी भी अधिकृत माध्यम से अनुमोदित या जारी नहीं किया गया है। विश्वविद्यालय घोषणा करता है कि यह नोटिस फर्जी है।”

पिछले नोटिस के विपरीत, इस नोटिस पर रजिस्ट्रार के हस्ताक्षर और मुहर लगी है। बाद में पीआईबी फैक्ट चेक ने भी X पर पोस्ट किया कि प्रशांत भूषण द्वारा पोस्ट किया गया नोटिस फर्जी है।

गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी रविवार को उत्तराखंड के रजत जयंती समारोह में शामिल होने के लिए देहरादून में हैं। इस कार्यक्रम में वह 8,260 करोड़ रुपये से अधिक की विभिन्न विकास परियोजनाओं का उद्घाटन और शिलान्यास भी किया जाएगा।

‘नेपाल जैसे लगा दो धामी के घर को आग’: UKSSSC पेपर लीक की आड़ में Gen-Z वाली आग से देवभूमि सुलगाने की साजिश, कौन बना रहा है व्हॉट्सएप ग्रुप्स से हिंसक माहौल?

UKSSSC पेपर लीक प्रदर्शन में नेपाल वाले हाल की साजिश, नेताओं को जिंदा जलाने की दे डाली धमकी ( फोटो साभार: Dainik Jagran/ TrueMediaHouse)

उत्तराखंड के देहरादून में UKSSSC पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन किया जा रहा है। इस प्रदर्शन में बेरोजगार युवा प्रदेश की धामी सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले हुए है। जहाँ कट्टरता की वही सीमापार हुई जैसे साल 2020 के दौरान दिल्ली दंगो में हुई थी। देहरादून में चल रहे प्रदर्शन में भी वही ‘आजादी’ के नारे लगाए गए। इसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

 पेपर लीक पर सड़कों पर उतरने वाले है तो बेरोजगार युवा और इन युवाओं की माँग मामले में CBI जाँच कराए जाने की है। जबकि धामी सरकार पहले ही पेपर लीक मामले में SIT गठन के आदेश दे चुकी है। इससे साफ है कि प्रदर्शन अब सिर्फ पेपर लीक मामले में जाँच की माँग तक सीमित नहीं है बल्कि हिंदुओं के विरोध और उत्तराखंड में नेपाल और बांग्लादेश जैसी स्थित बनाने की साजिश है।

नेपाल-बांग्लादेश-श्रीलंका जैसी हिंसा फैलाने की साजिश के सबूत

उत्तराखंड में UKSSSC पेपर लीक के खिलाफ प्रदर्शन से नेपाल और बांग्लादेश जैसे हालात बनाने के सबूत भी ऑपइंडिया को मिले हैं। प्रदर्शन से संबंधित कुछ कुछ व्हाट्सऐप ग्रुप के चैट्स के स्क्रीनशॉट्स मिले हैं। इन चैट्स में युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काया जा रहा है, ये बिल्कुल वैसा ही है जैसा हाल ही में नेपाल में हुआ और पिछले साल बांग्लादेश और तीन साल पहले श्रीलंका में हुआ।

नीचे दिखाया गया स्क्रीनशॉट ‘प्रदेश युवा संगठन उत्तराखंड क्रांति दल’ नाम से व्हाट्सऐप ग्रुप का है। जो युवाओं को नेपाल के प्रदर्शन का उदाहरण देते हुए भड़का रहा है। इस व्हाट्सऐप ग्रुप पर चैट्स में लिखा गया, “धामी के घर पर आग लगा दो जैसा नेपाल में हुआ।”

                                        व्हाट्सऐप पर युवाओं को भड़काने वाले ग्रुप का स्क्रीनशॉट

इस व्हाट्सऐप ग्रुप के एडमिन युवाओं से संदेश भेजते हैं, जिसमें लिखा है, “भाई लोगों सभी मिलकर मारते हैं धामी को, नेपाल वाला इतिहास दोहराया जाए।”

                                       व्हाट्सऐप पर युवाओं को भड़काने वाले ग्रुप का स्क्रीनशॉट

इससे साफ है कि शिक्षा और बेरोजगारी के खिलाफ देहरादून में चल रहा प्रदर्शन आम युवाओं का नहीं है। बल्कि यह वही सोची-समझी साजिश के तहत नेपाल के Gen Z की तरह ही युवाओं को सरकार के खिलाफ भड़काने की साजिश है। लेह में भी यूँ ही प्रदर्शन के बीच हिंसा फैल गई। इससे ये बड़ा सवाल खड़ा हो रहा है कि उत्तराखंड में व्हाट्सऐप ग्रुप पर Gen Z को भड़काने वाले आखिर कौन हैं?

प्रदर्शन में नेपाल की तरह नेताओं को जिंदा जलाने की धमकी

ऐसा ही एक वीडियो भी सामने आया है, जिसमें प्रदर्शन में शामिल युवती हिंदुओं का विरोध के साथ ही भारत में नेपाल जैसे हालात बनने की चेतावनी भी देती है। उसने साफ शब्दों में सीएम पुष्कर धामी के मरने की भी धमकी दे डाली और कहा कि उन्हें बचाने खराब मौसम के चलते हेलीकॉप्टर भी नहीं आएँगे।

इस वीडिया में मीडिया से बातचीत में युवती कहती है, “जिस दिन युवाओं ने नेपाल जैसी हालत कर दी और मौसम खराब रहा तो इन्हें लेने तो हेलीकॉप्टर लेने भी नहीं आएँगे। जैसे बांग्लादेश और नेपाल में हेलीकॉप्टर ने नेताओं को उठाया था। हम दुआ करेंगे कि मौसम इतना खराब रहे कि जिंदा जलाया जाए। युवा जाग चुका है।”

हिंदू धर्म का अपमान करते हुए युवती ने कहा, “सरकार सिर्फ हिंदू धर्म का आगे बढ़ाती है। जैसे बलिदानी सैनिक तिरंगे में लिपटता है वैसे ही इन नेताओं को भगवा में लिपटकर भेजो तब औकात पता चलेगी। युवाओं को जगना होगा, गाँव में भगवा घुसने ही नहीं दिया जाए।”

उत्तराखंड में नकल जिहाद बर्दाश्त नहीं: CM पुष्कर धामी

पेपर लीक मामले ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने भी सख्त रुख अपनाया है। सीएम ने कहा कि उत्तराखंड में नकल जिहाद की कोशिश को कभी कामयाब नहीं होने दिया जाएगा। मुख्यमंत्री ने कहा कि परीक्षा में गड़बड़ी करने वाले दोषियों को किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा।

मुख्यमंत्री धामी ने कहा, कोचिंग और नकल माफिया एक होकर राज्य में नकल जिहाद छेड़ने और अराजकता फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। सीएम ने कहा कि जब तक उनकी सरकार सभी नकल माफियाओं को मिट्टी में नहीं मिला देती, तब तक चैन से नहीं बैठेगी।

पेपर लीक करने वाला खालिद हरिद्वार से गिरफ्तार

UKSSSC पेपर लीक का साजिशकर्ता खालिद मलिक को उत्तराखंड पुलिस ने हरिद्वार से गिरफ्तार कर लिया है। पुलिस खालिद मलिक को देहरादून लाने की तैयारी कर रही है। जाँच के दौरान पता चला कि आदर्श बाल सदन इंटर कॉलेज बहादरपुर जट परीक्षा केंद्र से पेपर लीक हुआ था।

अवलोकन करें:-

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केंद्र में कुल 18 कमरे थे, लेकिन 3 कमरों में जैमर (रेडियो फ्रीक्वेंसी पर सिग्नल भेजने वाला टूल) नहीं थे और खालिद मलिक उसी 3 कमरों में से किसी एक में बैठकर परीक्षा दे रहा था। खालिद ने एक डिवाइस का इस्तेमाल करते हुए प्रश्न पत्र अपनी बहन साबिया को भेजा, जिसने इसे प्रोफेसर सुमन चौहान तक पहुँचाया। खालिद की दूसरी बहन हीना और प्रोफेसर सुमन चौहान पुलिस हिरासत में हैं।

ना भौंकते हैं कुत्ते, ना गरजते हैं बादल, ना ही कड़कती है बिजली: जानिए बद्रीनाथ धाम की शांति का रहस्य, भगवान विष्णु के लिए यहाँ प्रकृति भी रहती है मौन

सनातन धर्म के अनेक ऐसे धार्मिक स्थल हैं जहाँ शिवालय पर कोई पक्षी तक नहीं बैठता। इतना ही नहीं पुरी में भगवान जगन्नाथ जी महाराज के मन्दिर के ऊपर से कोई जहाज भी नहीं उड़ता। दूसरे, मन्दिर का झंडा भी वायु की विपरीत दिशा में उड़ता है।    
उत्तराखंड के चमोली जिले में अलकनंदा नदी के किनारे स्थित बद्रीनाथ धाम भारत के सबसे पवित्र और प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह धाम चारधाम यात्रा और हिमालयी छोटे चारधाम का भी हिस्सा है। यह स्थान भगवान विष्णु को समर्पित है, जो यहाँ ध्यान मुद्रा में विराजमान हैं। इसका सम्मान यहाँ के जीव-जंतु भी रखते हैं। यहीं वजह है कि यहाँ कभी कुत्तों को भी भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने यहाँ बदरी वृक्ष के नीचे कठोर तपस्या की थी। इसी कारण इस स्थान का नाम बद्रीनाथ पड़ा। बद्रीनाथ मंदिर की वास्तुकला नागर शैली में बनी हुई है और यह समुद्र तल से लगभग 3,000 मीटर की ऊँचाई पर स्थित है।

मंदिर के गर्भगृह में भगवान विष्णु की शालिग्राम शिला से बनी काले पत्थर की मूर्ति स्थापित है, जो पद्मासन में और चार भुजाओं के साथ दिखाई देती है।

बद्रीनाथ की अनोखी विशेषताएँ

बद्रीनाथ धाम से जुड़ी कुछ ऐसी अद्भुत और रहस्यमयी बातें हैं, जो इसे और भी खास बनाती हैं। पहली ये कि यहाँ कभी कुत्ते भौंकते नहीं हैं। दूसरी ये कि बिजली चमकती है लेकिन कभी कड़कती नहीं और तीसरी ये कि बादल बरसते हैं लेकिन कभी गरजते नहीं।

इन घटनाओं के पीछे कई मान्यताएँ हैं। माना जाता है कि भगवान विष्णु यहाँ ध्यान मुद्रा में हैं और प्रकृति भी उनके ध्यान में बाधा नहीं डालती। न बिजली की कड़क, न बादलों की गर्जना, न ही कुत्तों का भौंकना। सब कुछ शांत है, ताकि भगवान की तपस्या में कोई विघ्न न आए।

मोटिवेशनल स्पीकर और भागवताचार्य देशमुख वशिष्ठ महाराज भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह बातें बिल्कुल सच हैं। बद्रीनाथ में कोई भी कुत्ता भौंकते हुए नहीं देखा गया है।

पौराणिक मान्यताएँ

एक मान्यता के अनुसार, भगवान विष्णु ने कुत्तों को श्राप दिया था कि वे इस पवित्र स्थान पर कभी नहीं भौंकेंगे। वहीं दूसरी मान्यता यह कहती है कि यहाँ के कुत्ते भगवान के सेवक हैं और उन्हें शांति से रहने का आदेश मिला हुआ है।

इसलिए बद्रीनाथ धाम न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि प्राकृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी एक अद्वितीय स्थान है। यहाँ आने वाले श्रद्धालुओं से भी यही अपेक्षा की जाती है कि वे प्रकृति और वातावरण का पूरा सम्मान करें और इस शांति का हिस्सा बनें। स्पष्ट रूप से कहें तो बद्रीनाथ धाम वास्तव में एक ऐसा स्थान है, जहाँ हर जीव और प्रकृति भी भगवान की तपस्या में सहभागी है।