लिपुलेख-कालापानी पर शेखी बघार अपने ही देश में घिरे बालेन शाह, सुगौली संधि से ब्रिटेन का भी कनेक्शन: जानिए भारत-नेपाल सीमा विवाद के बारे में सब कुछ

       भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दों को लेकर नेपाल PM बालेन शाह ने ब्रिटेन के आगे फैलाया हाथ (साभार: AI)
नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन शाह का भारत के साथ सीमा विवाद के मुद्दे पर दिया गया बयान नेपाल की राजनीति से लेकर भारत-नेपाल संबंधों तक चर्चा का विषय बन गया है। संसद में सीमा विवाद से जुड़े सवाल का जवाब देते हुए बालेन शाह ने कहा कि नेपाल केवल भारत और चीन से ही नहीं, बल्कि ब्रिटेन (UK) से भी बातचीत कर रहा है।

उन्होंने यह भी कहा कि कई जगहों पर भारत ने नेपाल और नेपाल ने भी भारतीय भूमि पर कब्जा किया हुआ है। पीएम बालेन शाह के इस बयान पर उनके ही सांसदों ने तर्क दिया कि भारत और नेपाल की खुली सीमा वाले क्षेत्रों में दोनों देशों के नागरिकों द्वारा भूमि का उपयोग और किसी राज्य द्वारा दूसरे देश की जमीन पर कब्जा करने में बड़ा अंतर है।

दशकों पुरानी खुली सीमा व्यवस्था के कारण सीमा के दोनों ओर रहने वाले लोग खेती, व्यापार और आवागमन के लिए एक-दूसरे की जमीन का उपयोग करते रहे हैं। इसलिए इसे अतिक्रमण या कब्जा कहना उचित नहीं है।

इसके बाद नेपाल के विदेश मंत्रालय की ओर कहा गया कि प्रधानमंत्री बालेन ‘क्रॉस-बॉर्डर होल्डिंग’ यानी सीमा पार जमीन पर स्वामित्व शब्द का इस्तेमाल करना चाहते थे, लेकिन उनकी ओर से गलती से ‘क्रॉस-बॉर्डर ऑक्युपेशन’ यानी सीमा पार कब्जा शब्द इस्तेमाल हो गया।

हालाँकि बालेन शाह के बयान का सबसे चर्चित हिस्सा ब्रिटेन के सामने उनका हाथ फैलाकर मदद माँगना था। सवाल उठने लगा कि आखिर भारत-नेपाल सीमा विवाद में ब्रिटेन का नाम क्यों आया और नेपाल इस मुद्दे को ब्रिटेन से क्यों जोड़ रहा है। इस सवाल का जवाब सीधे तौर पर 210 साल पुरानी सुगौली संधि और लिपुलेख-कालापानी विवाद से जुड़ा हुआ है।

ब्रिटेन का जिक्र क्यों आया?

नेपाल का तर्क है कि सीमा विवाद की शुरुआत ब्रिटिश शासन काल में हुई थी। सुगौली संधि नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई थी। इसलिए नेपाल के कुछ नीति-निर्माताओं और विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन के अभिलेखागार में ऐसे दस्तावेज, नक्शे और रिकॉर्ड हो सकते हैं जो सीमा विवाद की ऐतिहासिक स्थिति को स्पष्ट कर सकें।

इसी के तहत बालेन शाह के मुख्य सलाहकार कुमार ब्यंजनकर ने ब्रिटिश राजदूत रॉब फेन के साथ इस बात पर चर्चा की थी कि यूनाइटेड किंगडम इस विवाद को सुलझाने में कैसे मदद कर सकता है। हालाँकि उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ब्रिटेन ने इस मुद्दे को भारत और नेपाल के बीच का द्विपक्षीय मामला माना है और किसी तरह की मध्यस्थता में रुचि नहीं दिखाई है।

आलोचकों का कहना है कि भारत लगातार यह रुख रखता आया है कि सीमा विवादों का समाधान द्विपक्षीय बातचीत से होना चाहिए और किसी तीसरे पक्ष की भूमिका स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ब्रिटेन का नाम लेने से विवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप देने की कोशिश के रूप में देखा गया।

आखिर क्या है लिपुलेख दर्रा? भारत के पास मौजूद हैं ऐतिहासिक साक्ष्य

लिपुलेख दर्रा हिमालय की ऊँची पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित एक महत्वपूर्ण दर्रा है। यह भारत, नेपाल और चीन (तिब्बत) के त्रि-जंक्शन क्षेत्र के करीब स्थित है। भारतीय पक्ष से यह उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में पड़ता है और तिब्बत के पुरांग (तकलाकोट) क्षेत्र को जोड़ता है।

भौगोलिक और सामरिक दृष्टि से यह दर्रा बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। सदियों से यह भारत और तिब्बत के बीच व्यापारिक संपर्क का रास्ता रहा है। इसके अलावा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए भी यह एक प्रमुख मार्ग है। भारत और चीन के बीच होने वाली कैलास मानसरोवर यात्रा के दो प्रमुख मार्गों में से एक लिपुलेख होकर गुजरता है।

हाल ही में भारत और चीन ने 2026 से कैलास मानसरोवर यात्रा फिर शुरू करने का फैसला किया है। इसी घोषणा के बाद लिपुलेख एक बार फिर चर्चा में आ गया, क्योंकि नेपाल ने इस मार्ग के उपयोग पर आपत्ति जताई और कहा कि विवादित क्षेत्र से जुड़े मामलों पर उससे कोई परामर्श नहीं किया गया।

बालेन शाह सरकार ने दावा किया कि लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा का क्षेत्र उसका अभिन्न हिस्सा है, इसीलिए वहाँ से गुजरना नेपाल के कानून के खिलाफ है।

नेपाल के विदेश मंत्रालय ने बयान जारी कर भारत और चीन को इस स्थिति से अवगत कराया। बयान में कहा गया कि नेपाल सरकार अपने इस रुख पर पूरी तरह से कायम है कि महाकाली नदी के पूर्व में स्थित लिपुलेख, लिम्पियाधुरा और कालापानी 1816 की सुगौली संधि के आधार पर उसके अविभाज्य क्षेत्र हैं।

नेपाल के इस दावे को लेकर भारत ने कड़ा रुख अपनाया और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “इस मामले में भारत का रुख हमेशा स्पष्ट और एक जैसा रहा है। लिपुलेख दर्रा 1954 से कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए पारंपरिक मार्ग रहा है और इस रास्ते से यात्रा दशकों से जारी है। यह कोई नई बात नहीं है।”

उन्होंने यह भी कहा, “जहाँ तक क्षेत्रीय दावों का सवाल है, भारत लगातार यह कहता रहा है कि ऐसे दावे न तो उचित हैं और न ही ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों पर आधारित हैं। इस तरह के एकतरफा दावों का विस्तार स्वीकार्य नहीं है। भारत नेपाल के साथ द्विपक्षीय संबंधों से जुड़े सभी मुद्दों पर रचनात्मक बातचीत के लिए तैयार है।”

लिपुलेख विवाद की जड़ क्या है और क्या दावा करता है नेपाल?

भारत और नेपाल के बीच वास्तविक विवाद केवल लिपुलेख दर्रे तक सीमित नहीं है। इसके साथ कालापानी और लिम्पियाधुरा क्षेत्र भी जुड़े हुए हैं। कुल मिलाकर लगभग 372 वर्ग किलोमीटर का इलाका दोनों देशों के बीच विवाद का विषय बना हुआ है।

इस पूरे विवाद की जड़ काली नदी (महाकाली नदी) के उद्गम स्थल को लेकर है। 1816 की सुगौली संधि के अनुसार, काली नदी को नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच प्राकृतिक सीमा माना गया था। लेकिन समस्या यह है कि दोनों देश काली नदी के वास्तविक उद्गम को अलग-अलग स्थान मानते हैं।

नेपाल बिना किसी साक्ष्य के दावा करता है कि काली नदी का मूल स्रोत लिम्पियाधुरा क्षेत्र में है और कालापानी, लिपुलेख और लिम्पियाधुरा नेपाल के क्षेत्र में आते हैं।

वहीं भारत ने हमेशा इस दावे का खंडन किया है। भारत का कहना है कि नदी का वास्तविक स्रोत नेपाल द्वारा बताए गए स्थान से नीचे स्थित है। भारत के अनुसार, सीमा निर्धारण उसी आधार पर होना चाहिए, जिसके चलते कालापानी, लिपुलेख और आसपास का क्षेत्र उत्तराखंड का हिस्सा बनता है।

भारत का यह भी कहना है कि नेपाल के दावे ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित नहीं हैं और वह बातचीत के माध्यम से समाधान चाहता है, जबकि इस क्षेत्र पर नियंत्रण भारत के पास बना हुआ है। रणनीतिक दृष्टि से लिपुलेख दर्रा बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह भारत और चीन को जोड़ने वाला मार्ग है, जो दोनों देशों की संवेदनशील हिमालयी सीमा के पास स्थित है।

सुगौली संधि क्या थी?

लिपुलेख विवाद को समझने के लिए सुगौली संधि को समझना बेहद जरूरी है। 18वीं और 19वीं शताब्दी में गोरखा साम्राज्य तेजी से विस्तार कर रहा था। नेपाल ने कुमाऊं, गढ़वाल और तराई के कई क्षेत्रों तक अपना प्रभाव बढ़ा लिया था। इस विस्तार के कारण नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच संघर्ष शुरू हुआ।
1814 से 1816 के बीच एंग्लो-नेपाल युद्ध लड़ा गया। युद्ध में नेपाल को नुकसान उठाना पड़ा और अंततः उसे ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के साथ समझौता करना पड़ा। 2 दिसंबर 1815 को सुगौली संधि पर हस्ताक्षर हुए और 4 मार्च 1816 से यह प्रभावी हो गई। इस संधि के तहत नेपाल ने अपने कई क्षेत्रों पर दावा छोड़ दिया।
साथ ही यह तय किया गया कि काली नदी दोनों पक्षों के बीच सीमा का काम करेगी। नेपाल आज भी अपने दावों के समर्थन में इसी संधि और ब्रिटिश काल के कई पुराने नक्शों का हवाला देता है। नेपाल का तर्क है कि यदि मूल संधि और शुरुआती नक्शों को आधार बनाया जाए तो कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख उसके हिस्से में आते हैं।

2020 में क्यों बढ़ा था विवाद और क्या है भारत का पक्ष?

लिपुलेख विवाद 2020 में भी सुर्खियों में आया था। भारत ने उत्तराखंड के धारचूला से लिपुलेख दर्रे तक जाने वाली सड़क का उद्घाटन किया था। इस सड़क का उद्देश्य कैलास मानसरोवर यात्रियों और सीमावर्ती इलाकों तक पहुँच आसान बनाना था। नेपाल ने इस पर कड़ा विरोध जताया और कहा कि सड़क विवादित क्षेत्र से होकर गुजरती है।
इसके जवाब में नेपाल ने नया राजनीतिक नक्शा जारी किया, जिसमें कालापानी, लिम्पियाधुरा और लिपुलेख को अपने क्षेत्र का हिस्सा दिखाया गया। बाद में नेपाल ने इस नक्शे को संवैधानिक मान्यता भी दे दी। भारत ने नेपाल की इस कार्रवाई को एकतरफा कदम बताते हुए खारिज कर दिया और कहा कि सीमा विवाद का समाधान बातचीत के जरिए होना चाहिए।

भारत का कहना है कि कालापानी और लिपुलेख क्षेत्र लंबे समय से उसके प्रशासनिक नियंत्रण में रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद भारत ने ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक सीमाएँ विरासत में प्राप्त कीं और उसी आधार पर इन क्षेत्रों का प्रबंधन किया जाता रहा है। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद इस क्षेत्र का सामरिक महत्व और बढ़ गया।

भारत ने यहाँ अपनी सुरक्षा और प्रशासनिक मौजूदगी मजबूत की। भारत का यह भी तर्क है कि कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए लिपुलेख मार्ग का उपयोग दशकों से किया जाता रहा है और यह क्षेत्र हमेशा से भारतीय प्रशासन के अधीन रहा है। भारत और नेपाल के बीच करीब 1,751 किलोमीटर लंबी खुली सीमा है।

दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक और पारिवारिक संबंध बेहद गहरे हैं। यही कारण है कि सीमा से जुड़े अधिकांश मुद्दों का समाधान बातचीत के जरिए किया जाता रहा है, लेकिन नेपाल ने एक बार फिर बिना सबूतों के दावा तो ठोका ही साथ ही द्विपक्षीय वार्ता के बजाय तीसरे देश को भी बेवजह शामिल करने की कोशिश की।(साभार) 

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