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उत्तराखंड मदरसा बोर्ड का खात्मा ‘एक देश, एक शिक्षा’ का शंखनाद, 6 अल्पसंख्यक समुदायों के लिए 6 प्रमुख अधिकार


मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को पूरी तरह से समाप्त कर दिया है। देवभूमि का यह ऐतिहासिक फैसला मात्र एक प्रशासनिक फेरबदल नहीं, बल्कि तुष्टीकरण की राजनीति पर करारा प्रहार है। मदरसा बोर्ड के स्थान पर 1 जुलाई 2026 से ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) लागू कर दिया गया है। यह कदम देश की मुख्यधारा से कटी हुई शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने की दिशा में एक साहसिक क्रांति की शुरुआत है। दशकों से धार्मिक तुष्टीकरण की छांव में फल-फूल रहे समानांतर शिक्षा तंत्र पर यह अब तक का सबसे बड़ा संवैधानिक प्रहार है। 

उत्तराखंड देश का पहला ऐसा राज्य बन गया है जिसने एक विशेष समुदाय के लिए बने अलग बोर्ड को उखाड़ फेंका है। इस ऐतिहासिक फैसले का प्रभाव देश के अन्य राज्यों में भी धीरे-धीरे होगा, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। इस फैसले ने साफ कर दिया है कि आधुनिक भारत में शिक्षा का आधार मध्यकालीन मजहबी संकीर्णता नहीं, बल्कि सिर्फ और सिर्फ राष्ट्र निर्माण और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान ही हो सकता है।

धामी सरकार की मदरसा बोर्ड को खत्म करने की असली वजह
उत्तराखंड सरकार का यह कदम राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) की उन चिंताओं और रिपोर्टों का सीधा नतीजा है, जिसमें देश भर के मदरसों में बच्चों को बुनियादी और आधुनिक शिक्षा के अधिकारों से वंचित रखने की बात कही गई थी। सरकार का यह मानना है कि मदरसा बोर्ड के तहत बच्चे केवल धार्मिक किताबों और भाषाओं तक सीमित होकर रह जाते थे, जिससे वे डॉक्टर, इंजीनियर, सीए या प्रशासनिक अधिकारी बनने की दौड़ में पिछड़ जाते थे। दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि कई मदरसों में अपारदर्शिता और कथित अवैध गतिविधियों की जानकारियां भी सामने आईं। राज्य में कई ऐसे गैर-मान्यता प्राप्त मदरसे चल रहे थे, जिनकी फंडिंग और पाठ्यक्रम का कोई अता-पता नहीं था। ‘वन नेशन, वन एजुकेशन (एक राष्ट्र, एक शिक्षा) के विजन को धरातल पर उतारने के लिए सरकार ने इस विशेष रियायत को समाप्त करना ही उचित समझा।

राज्य के हजारों मदरसों की मनमानी अब पूरी तरह बंद होगी
इस ऐतिहासिक फैसले के बाद राज्य में पंजीकृत कुल 452 से 456 मदरसों का ढांचा रातों-रात नहीं बदलेगा, लेकिन उनके संचालन के नियम जरूर पूरी तरह बदल जाएंगे। अब कक्षा 8वीं तक के मदरसों को जिला स्तर पर और कक्षा 9वीं से 12वीं तक के मदरसों को ‘उत्तराखंड विद्यालयी शिक्षा बोर्ड’ से संबद्धता लेनी होगी। इसका सीधा मतलब यह है कि अब मदरसों की मनमानी समाप्त होगी। उन्हें राज्य के शिक्षा विभाग द्वारा तय मानकों जैसे, बुनियादी ढांचा, शिक्षकों की योग्यता और प्रशासनिक पारदर्शिता का कड़ाई से पालन करना होगा। जो मदरसे इन मानकों को पूरा नहीं करेंगे, वे बंद कर दिए जाएंगे, जैसा कि पूर्व में भी मानकों का उल्लंघन करने वाले 250 से अधिक मदरसों पर कार्रवाई की जा चुकी है।

विशेष धर्म के शिक्षण संस्थानों का वीआईपी ट्रीटमेंट बंद होगा
मदरसा बोर्ड की जगह ‘उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ (USMEA) के अस्तित्व में आने से सबसे बड़ा बदलाव यह होगा कि अब किसी एक विशेष धर्म के शिक्षण संस्थानों का अलग वीआईपी ट्रीटमेंट बंद हो जाएगा। अब तक केवल मुस्लिम समुदाय के मदरसों के लिए विशेष नियम और सहूलियतें थीं, लेकिन अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक संस्थान एक ही छत के नीचे आएंगे। यह प्राधिकरण एक वैधानिक और संप्रभु निकाय के रूप में काम करेगा, जो किसी भी संस्थान की मान्यता पर अंतिम फैसला लेगा। सबसे क्रांतिकारी बदलाव यह होगा कि अब इन संस्थानों में राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP-2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा (NCF) के तहत एनसीईआरटी (NCERT) का पाठ्यक्रम अनिवार्य रूप से लागू होगा।

इस नए नवेले उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण के मुख्य कार्य और अधिकार 

  1. नियमन और संचालन: यह प्राधिकरण राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के नियमन (Regulation), मान्यत (Recognition) और संचालन की जिम्मेदारी संभालेगा।
  2. अनिवार्य संबद्धता: सभी अल्पसंख्यक स्कूलों और मदरसों को शिक्षा विभाग से संबद्धता दिलाने की निगरानी करना।
  3. तीन वर्षीय मान्यता प्रणाली: मानकों की जांच के बाद केवल 3 साल के लिए ऑनलाइन मान्यता प्रमाण पत्र जारी करना।
  4. धार्मिक शिक्षा के लिए अलग पंजीकरण: यदि कोई संस्थान धार्मिक शिक्षा देना चाहता है, तो उसे अलग से पंजीकरण कराना होगा और तय शुल्क (8वीं तक 5000 रुपये और 12वीं तक 7500 रुपये) देना होगा।
  5. जबरन धार्मिक गतिविधियों पर रोक: प्राधिकरण यह सुनिश्चित करेगा कि किसी भी छात्र या स्टाफ को उसकी मर्जी के बिना धार्मिक प्रथाओं में शामिल होने के लिए मजबूर न किया जाए।
  6. निरीक्षण और ऑडिट: सरकारी और केंद्रीय योजनाओं (जैसे पीएम-पोषण या मिड-डे मील) के क्रियान्वयन की सख्त निगरानी और फंड का ऑडिट करना।
इन समुदायों को प्राधिकरण से क्या बड़ा फायदा मिलेगा?
उत्तराखंड सरकार का यह कदम वास्तव में समावेशी और धर्मनिरपेक्ष है, क्योंकि इसके तहत केंद्र और राज्य सरकार द्वारा अधिसूचित सभी छह अल्पसंख्यक समुदायों को एक समान कानूनी दायरे में लाया गया है। इस प्राधिकरण के अधिकार क्षेत्र में मुस्लिमों के साथ-साथ अब सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों को भी शामिल किया गया है। अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक दर्जे और उससे मिलने वाली सरकारी सुविधाओं का बड़ा हिस्सा केवल एक विशेष समुदाय (मदरसा तंत्र) तक सीमित था। इस नए प्राधिकरण के गठन से सिखों के स्कूल, ईसाइयों के कॉन्वेंट, जैन, बौद्ध और पारसी संस्थानों को भी समान अवसर और कानूनी मान्यता की पारदर्शी व्यवस्था मिलेगी। सबसे बड़ा फायदा छात्रों को होगा।
पांचों अल्पसंख्यक समुदायों ने इस फैसले का किया स्वागत
यह स्वाभाविक है कि किसी भी स्थापित और पारंपरिक व्यवस्था को बदलने पर प्रतिरोध होता है। इस फैसले के बाद कुछ मुस्लिम धार्मिक संगठनों, विशेषकर जमीअत उलेमा-ए-हिंद ने इस नई व्यवस्था पर आपत्तियां दर्ज कराई हैं और इसे मदरसों के अस्तित्व पर संकट बताया है। कुछ विपक्षी नेता और मौलवी इसे मुस्लिम समुदाय को लक्षित करने वाला कदम बता रहे हैं। लेकिन विचारणीय पहलू यह है कि प्राधिकरण के दायरे में आने वाले अन्य पांचों अल्पसंख्यक समुदायों (सिख, ईसाई, जैन, बौद्ध और पारसी) ने इस फैसले का स्वागत किया है। विरोध केवल उन तत्वों द्वारा किया जा रहा है जो शिक्षा के नाम पर धार्मिक एकाधिकार और अपारदर्शिता बनाए रखना चाहते हैं। आम और प्रगतिशील मुस्लिम परिवार, जो अपने बच्चों का आधुनिक भविष्य चाहते हैं, वे इस बदलाव को एक सकारात्मक अवसर के रूप में देख रहे हैं।
उत्तराखंड का यह फैसला अन्य राज्यों के लिए ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होगा
उत्तराखंड का यह साहसिक फैसला देश की राजनीति और शिक्षा नीति में एक बहुत बड़ा ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होने जा रहा है। असम सरकार पहले ही सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने का कानून ला चुकी है। उत्तर प्रदेश में भी मदरसों के सर्वे और एनसीपीसीआर की सिफारिशों के बाद इस दिशा में तेजी से मंथन चल रहा है। उत्तराखंड द्वारा देश का पहला ऐसा वैधानिक मॉडल प्रस्तुत करने के बाद, निश्चित रूप से भारतीय जनता पार्टी शासित अन्य राज्यों पर भी यह दबाव बढ़ेगा कि वे मजहबी शिक्षा बोर्डों को भंग कर एक समान ‘अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण’ का गठन करें। यह कदम देश में ‘समान नागरिक संहिता’ (UCC) की तरह ‘समान शिक्षा संहिता’ की दिशा में बढ़ने वाला पहला और सबसे मजबूत कदम है, जिसने अन्य राज्यों के मदरसा बोर्डों की उल्टी गिनती की पटकथा लिख दी है।
असम ने 1281 मदरसों का नाम बदलकर किया था मिडिल इंग्लिश स्कूल 
उत्तराखंड का यह आक्रामक और क्रांतिकारी फैसला देश की राजनीति में एक ‘ट्रेंडसेटर’ साबित होने जा रहा है। असम सरकार ने भी दिसंबर 2023 में राज्य के 31 जिलों में कम से कम 1281 मदरसों का नाम बदल दिया है और उन्हें सामान्य स्कूलों में बदल दिया था। तब राज्य के शिक्षा मंत्री रनोज पेगु ने अपने एक्स हैंडल पर इसकी जानकारी साझा की थी। उन्होंने लिखा, “माध्यमिक शिक्षा बोर्ड, असम (एसईबीए) के तहत सभी सरकारी और प्रांतीय मदरसों को सामान्य स्कूलों में परिवर्तित करने के परिणामस्वरूप स्कूल शिक्षा विभाग, असम ने आज एक अधिसूचना द्वारा 1281 एमई मदरसों के नाम बदलकर मिडिल इंग्लिश (एमई) स्कूल कर दिया है।” असम सरकार द्वारा सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदलने के बाद, अब उत्तराखंड द्वारा वैधानिक रूप से पूरे मदरसा बोर्ड को ही जमींदोज कर दिया है।
अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को आधुनिक शिक्षा मिलेगी
देश के अन्य भाजपा-शासित राज्यों के लिए भी यह एक मार्गदर्शक सिद्धांत बन गया है। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में भी गैर-मान्यता प्राप्त और संदिग्ध मदरसों के खिलाफ लगातार जांच और कार्रवाई चल रही है। उत्तराखंड के इस फैसले ने देश के सामने यह साबित कर दिया है कि यदि राजनीतिक इच्छाशक्ति मजबूत हो, तो तुष्टीकरण के दशकों पुराने ढांचे को पलक झपकते ही ढहाया जा सकता है। निश्चित रूप से, आने वाले समय में देश के कई अन्य राज्यों में भी एकांगी और मजहबी मदरसा बोर्डों की उल्टी गिनती शुरू होना तय है, और भारत के सभी बच्चे एक समान, आधुनिक तथा राष्ट्रवाद से प्रेरित शिक्षा प्रणाली की ओर तेजी से कदम बढ़ाएंगे। मदरसों और अन्य अल्पसंख्यक स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों को अब कंप्यूटर, विज्ञान, गणित और अंग्रेजी की आधुनिक शिक्षा मिलेगी। वे राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में बैठने के योग्य बनेंगे। उनके प्रमाणपत्रों को देश-विदेश में मान्यता मिलेगी, जिससे वे रोजगार की मुख्यधारा से जुड़ सकेंगे।

उत्तराखंड : मदरसा बोर्ड खत्म, USMEA का हुआ गठन: अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए क्या-क्या बदलेगा

                                डॉ सैयद अली हामिद और पुष्कर सिंह धामी (साभार - एबीपी/इंडियन एक्स्प्रेस)
उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।

अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।

मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?

अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।

राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।

अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव

मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।
इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।

क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?

नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।
सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।
अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।

पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?

नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।
मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।

कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?

सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।
डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।

मान्यता के लिए सख्त नियम लागू

नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।
यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।

विपक्ष की गुलाम मीडिया प्राकृतिक आपदा के पीड़ितों को बरगलाया, 5 लाख रूपए की सहायता राशि को बता रही 5,000 रूपए, क्यों?

                          उत्तरकाशी हादसे का जायजा लेने पहुँची सीएम पुष्कर धामी (फोटो साभार: TOI)
आखिर मीडिया विपक्ष की गुलाम बन क्यों विपक्ष की तर्ज पर जनता को गुमराह कर रही है? आखिर इस गुलाम मीडिया को जहर खोलने या फ़ैलाने से क्या मिल रहा है? इस बेशर्म मीडिया को जख्मों पर मरहम लगाने की बजाए नमक छिड़कते शर्म नहीं आयी? एक तो धराली की जनता प्राकृतिक आपदा से परेशान है, क्यों उनकी परेशानी का मजाक उड़ाया जा रहा है? क्या इस गुलाम मीडिया की आत्मा मर गयी है? नेताओं और उनकी पार्टियों को तो गन्दी सियासत करनी है, ये गुलाम क्यों जख्मों पर नमक छिड़क कर कौन-सी सियासत खेल रहे हैं?        

उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में बादल फटने के बाद जो स्थिति पैदा हुई उससे निपटने के लिए धामी सरकार लगातार प्रयास कर रही है। पीड़ितों को सहायता देने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी जा रही है। खुद मुख्यमंत्री प्रभावित इलाके में जाकर पीड़ितों से मिल रहे हैं, उन्हें मदद का आश्वसन दे रहे हैं। बावजूद इसके मीडिया में एक खबर सामने आई है जिसमें दावा है कि धामी सरकार की ओर से पीड़ितों को मात्र 5000 रुपए दिए गए हैं और वह इससे नाराज होकर प्रदर्शन कर रहे हैं।

इस खबर की सच्चाई क्या है… आइए जानें और ये भी देखें कि जिन स्थानीयों के नाम पर धामी सरकार पर सवाल उठ रहे हैं वो जमीन पर क्या प्रतिक्रिया दे रहे हैं।

हकीकत यह है कि 05 अगस्त 2025 को धराली गाँव में तबाही के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने पीड़ितों के लिए शोक संवेदनाएँ व्यक्त की। यहाँ तक की गृह मंत्री अमित शाह ने भी घटना की जानकारी लेने के लिए सीएम से बात की थी। सीएम ने पीड़ितों के लिए ₹5 लाख की सहायता राशि प्रदान करने की भी घोषणा कर दी।

सीएम ने यह जानकारी 09 अगस्त 2025 को एक्स/ट्विटर एक पोस्ट कर दी। उन्होंने लिखा था कि धराली गाँव में आई आपदा से ग्रसित लोगों को ₹5 लाख की राशि प्रदान की जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि स्थानीय लोगों के मकान, जमीन, खेती और अन्य नुकसान का आकलन शुरू कर दिया गया है, जिसके मुआवजे का वितरण भी हम शीघ्र शुरू करेंगे।

सीएम ने यह जानकारी दी कि 09 अगस्त 2025 को दी और यह भी लिखा कि मुआवजा प्रक्रिय़ा शीघ्र शुरू की जाएगी। लेकिन इस बात को 24 घंटे भी नहीं बीते कि मीडिया में अलग प्रोपेगेंडा चालू हो गया। खबरें फैली कि स्थानीय लोगों को ₹5 हजार की सहायता राशि दी गई, जबकि सीएम ने तो ₹5 लाख का वादा किया था।

इन खबरों को चलाने के लिए शिकार भी घटना से ग्रस्त ग्रामीणों को बनाया गया। खबरें चलाई गई कि ग्रामीण सरकार के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं। जबकि यह दावा एक झटके में झूठा साबित हो गया। जब सीएम धामी को धराली गाँव की ही एक महिला राखी बाँधती नजर आई।

यह वीडियो धराली गाँव में बादल फटने के हादसे के बाद सीएम धामी के दौरे का है। जब एक महिला अपनी साड़ी के पल्लू से कपड़ा फाड़कर सीएम धामी को राखी बाँधती है। वीडियो में दिख रहा है कि कैसे महिला सीएम को आशीर्वाद दे रही हैं। इस वीडियो से साफ है कि प्रदेश की जनता का सीएम धामी के लिए काफी स्नेह है।

परंतु मीडिया धराली गाँव में प्रदर्शन की खबरें चलाकर प्रोपेगेंडा सेट करना चाहती है कि उत्तराखंड सरकार हादसे के बाद भी पीड़ितों के लिए कुछ नहीं कर रही है। जबकि हकीकत इस वीडियो में साफ दिखती है। प्रदेश की जनता सीएम धामी द्वारा किए गए प्रयासों पर संतुष्ट हैं।

इससे साफ है कि उत्तराखंड सरकार प्रदेश पर आए हर संकट के लिए तैयार है। सरकार ने घटनास्थल पर हर नजर बनाई हुई थी, खुद प्रदेश के सीएम पल-पल की जानकारी के लिए स्थानीय प्रशासन और NDRF रेस्क्यु टीम से फोन पर जुड़े रहे। घटनास्थल पर जाकर भी ग्रामीणों से बात की। इसके बावजूद मीडिया ने उत्तराखंड सरकार के खिलाफ प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया।

05 अगस्त 2025 को उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धराली गाँव में बादल फटने से दर्दनाक हादसा हो गया। पहाड़ से तेज बहाव से आए पानी में पूरा गाँव डूब गया। घटना में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि लगभग 50 लोग अब भी लापता है। घटनस्थल पर रेस्क्यु ऑपरेशन जारी है।

उत्तराखंड : कुदरत का बुलडोजर, खुदा की लाठी… ख़ुशी मनाओ: बादल फटने से देवभूमि में तबाही, इस्लामी कट्टरपंथी फैला रहे हिंदू घृणा

                            उत्तराखंड में बादल फटने से आई बाढ़ में बह गया धराली गाँव (साभार: हिंदुस्तान टाइम्स)
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में मंगलवार (5 अगस्त 2025) को बादल फटने से आई भयावह बाढ़ ने कई इलाकों को तहस-नहस कर दिया। गंगोत्री के पास बसे गाँव धराली में तबाही सबसे ज्यादा देखने को मिली। यहाँ लोगों के घर, जीवन और रोजगार सब पानी में बह गए। इस भयानक मंजर का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने हर किसी को दुखी कर दिया। जहाँ देश के ज्यादातर लोगों ने इस आपदा पर दुख और संवेदना जताई, वहीं कुछ इस्लामी कट्टरपंथी सोशल मीडिया यूजर्स ने इस त्रासदी का मजाक उड़ाया। 

अली सोहराब, करिश्मा अजीज जैसे लोग और उनके समर्थकों ने इस दर्दनाक घटना पर खुशी जताई। उन्होंने इसे ‘कुदरत का बुलडोजर’ बताया। धराली में आम लोगों के घर-सम्पत्ति बर्बाद होने और जानें जाने पर असंवेदनशील रवैया दिखाते हुए यह इस्लामी कट्टरपंथी अपनी घृणा का प्रदर्शन करते रहे।

देवभूमि उत्तराखंड में हाल के महीनों में राज्य सरकार ने अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। खासतौर पर उन जगहों पर कार्रवाई हुई जहाँ बिना अनुमति के मजहबी ढाँचे खड़े किए गए थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने बुलडोजर चलाकर सार्वजनिक जमीनें खाली कराईं। कई जगह मजार-मदरसे तोड़े गए।

ये कार्रवाई कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आई। यही लोग इस प्राकृतिक आपदा को ‘अल्लाह का बदला’ बताकर पेश कर रहे हैं। किसी ने ट्वीट किया, “ये आपदा है या बुलडोजर चल रहा है?” एक और ने लिखा, “खुदा की लाठी में आवाज नहीं होती।” ये सब बातें सीधे-सीधे एक मजहबी बहाने से मानव त्रासदी का मजाक उड़ाना है।

इन प्रतिक्रियाओं की जड़ उस मानसिकता में है जहाँ कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। सालों तक चली तुष्टिकरण की राजनीति ने कुछ मुस्लिम वर्गों को ये यकीन दिला दिया कि उनको कोई भी कानून तोड़ने का अधिकार है। लेकिन जब मोदी सरकार और उत्तराखंड की धामी सरकार ने कानून को सब पर बराबर लागू किया, तो यह लोगों को चुभने लगा।

इस्लामी कट्टरपंथी कानूनी कार्रवाई को दमन बताते हैं। यही वजह है कि जब देवभूमि में बाढ़ आई, तो उन्होंने इसे ‘अल्लाह का बदला’ कहकर पेश किया, क्योंकि वहाँ की सरकार ने अवैध निर्माण गिराए थे। उनके हिसाब से यह उन पर हुए दमन का हिसाब हो रहा था।

यह सोच वही है जिसने देश के बँटवारे को जायज बताया, दंगों में तालियाँ बजाईं और आतंकवादियों तक के लिए सहानुभूति जताई। इन लोगों को सिर्फ वही बातें सही लगती हैं जो उनके मजहबी एजेंडे को पूरा करती हैं।

सबसे शर्मनाक बात ये है कि तथाकथित ‘सेकुलर’ या ‘उदारवादी’ आवाजें इस पर खामोश हैं। अगर कोई हिंदू इस तरह मुस्लिम आबादी वाले इलाके की किसी त्रासदी पर खुशी जताता, तो हर चैनल, हर मँच पर हंगामा होता। लेकिन जब हिंदुओं के दुख पर जश्न मनाया जाता है, तो सब चुप हो जाते हैं।

ये लड़ाई किसी मजहब के खिलाफ नहीं है, ये लड़ाई उस जहरीली सोच के खिलाफ है जो मानवता को बाँटती है और त्रासदी को मजाक का जरिया बनाती है। ऐसे समय में जब पूरे देश को एकजुट होकर पीड़ितों के लिए खड़ा होना चाहिए, तब इस्लामी कट्टरपंथियों ने इसे बदला और अल्लाह का बदला दिखाने का हथियार बनाना चुना है।

जिस ख़ुशी के साथ वे मृत्यु का जश्न मनाते हैं, वह उनके वैचारिक दिवालियापन का आईना है और बाकी देश के लिए एक चेतावनी है। जब किसी की मौत पर कोई हँसे, तो समझ लीजिए कि हम सिर्फ डिजिटल नफरत नहीं देख रहे, ये हमारी आत्मा पर हमला है।

क्योंकि जब इंसानियत मरने लगे और मौत पर ताली बजाई जाए, तब हम सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि उस विचारधारा से जूझ रहे होते हैं जो देश की आत्मा को ही नष्ट करना चाहती है।

ढोंगियों पर सख्त हुई उत्तराखंड सरकार ; ‘ऑपरेशन कालनेमि’ का मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने किया ऐलान: कहा- पहचान छिपा साधु-संत बन ठगने वालों पर होगी कार्रवाई


उत्तराखंड में अब सनातन के नाम पर ठगने वालों के खिलाफ विशेष अभियान चलाया जाएगा। यह अभियान उत्तराखंड की सरकार चलाएगी। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने यह विशेष अभियान चलाने का ऐलान किया है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने एक एक्स (10 जुलाई, 2025) को एक ट्वीट में बताया, ” देवभूमि उत्तराखंड में सनातन धर्म की आड़ में लोगों को ठगने और उनकी भावनाओं से खिलवाड़ करने वाले छद्म भेषधारियों के खिलाफ ऑपरेशन कालनेमि शुरू करने के अधिकारियों को सख्त निर्देश दिए।”

उन्होंने कहा, “प्रदेश में कई ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ असामाजिक तत्व साधु-संतों का भेष धारण कर लोगों, विशेषकर महिलाओं को ठगने का कार्य कर रहे हैं। इससे न सिर्फ लोगों की धार्मिक भावनाएँ आहत हो रही हैं, बल्कि सामाजिक सौहार्द और सनातन परंपरा की छवि को भी नुकसान पहुँच रहा है।”

मुख्यमंत्री धामी ने कहा है कि किसी भी धर्म का व्यक्ति यदि ऐसे कृत्य करता हुआ मिलता है तो उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने कहा कि जिस प्रकार असुर कालनेमि ने साधु का भेष धारण कर भ्रमित करने का प्रयास किया था, उसी तरह आज भी कई कालनेमि सक्रिय हैं।

इन कालनेमियों को मिलने वाली हर सरकारी सुविधा छीनने के साथ-साथ ब्लैकलिस्टेड भी किया जाना चाहिए। सिर्फ जेल में डालना इसका हल नहीं। इतना ही नहीं इस कार्यवाही का विरोध करने वालों चाहे मानवाधिकार हो या कोई पार्टी पर भी कार्यवाही करनी चाहिए।  

उत्तराखंड में इस अभियान के सहारे उन लोगों को तलाशा जाएगा जो साधु-संत या धर्मगुरु बन कर लोगों को ठगते हैं। कई मामलों में ऐसे लोग दूसरे मजहबों से भी होते हैं। अब उत्तराखंड में इनकी पकड़-धकड़ के लिए विशेष अभियान चलेगा।

धामी ने इससे पहले ऑपइंडिया को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि हम वो सब काम कर रहे है जो सनातन के लिए जरूरी हैं। उन्होंने इस दौरान बताया था कि राज्य में अब तक 6500 एकड़ की जमीन अवैध अतिक्रमण से मुक्त करवा चुके हैं। उन्होंने यह भी बताया था कि राज्य के भीतर 500 से अधिक मजारों पर भी एक्शन लिया जाएगा।

ऑपइंडिया को दिए इंटरव्यू में उन्होंने यह भी स्पष्ट किया था कि वह राज्य की डेमोग्राफी नहीं बदलने देंगे। इसी कड़ी में अब उन्होंने ऑपरेशन कालनेमि चालू किया है।

कालनेमि रामायण में वर्णित एक राक्षस था। उसे रावण ने बजरंग बली को मारने का काम सौंपा था। शक्ति बाण से मूर्क्षित लक्ष्मण को बचाने के लिए जिस समय बजरंग बली संजीवनी बूटी लेने द्रोणागिरि पर्वत जा रहे थे, तब हनुमान को रोकने के लिए रावण ने कालनेमि को भेजा था।

जिसके बाद कालनेमि ने एक मायावी साधु का वेश धारण कर बजरंग बली को भ्रमित करने की कोशिश की थी, हालाँकि भगवान हनुमान ने वहीं उसका वध कर दिया था।

केदारनाथ से लौटते वक्त रुद्रप्रयाग में हेलीकॉप्टर क्रैश, 23 महीने के बच्चे समेत 7 की मौत: खराब मौसम के कारण बिगड़े हालात, NDRF और SDRF की टीमें रेस्क्यू में जुटीं

             उत्तराखंड में चारधाम यात्रा के दौरान हेलीकॉप्टर हुआ क्रैश (फोटो साभार: जी न्यूज, नवभारत टाईम्स)
उत्तराखंड में रविवार(15 जून 2025) को केदारनाथ धाम से फाटा आ रहा हेलिकॉप्टर क्रैश हो गया। इस हादसे में सात लोगों की मौत हो गई है। बताया जा रहा है कि रुद्रप्रयाग के गौरीकुंड क्षेत्र में सुबह करीब साढ़े पाँच बजे ये हेलिकॉप्टर क्रैश हुआ। हादसे के वक्त हेलिकॉप्टर में कुल सात यात्री ही थे। सूचना पाते ही NDRF और SDRF की टीम मौके पर पहुँचीं। रेस्क्यू अभियान शुरू हुआ। मुख्यमंत्री धामी ने खुद इसकी जानकारी दी।

जानकारी के अनुसार खराब मौसम की वजह से हेलीकॉप्टर क्रैश हुआ है। हेलीकॉप्टर आर्यन एविएशन का बताया जा रहा है। । हेलिकॉप्टर नोडल अधिकारी राहुल चौबे और जिला आपदा प्रबंधन अधिकारी नंदन सिंह रजवार ने इस घटना की पुष्टि की है।

मृतकों में 23 महीने के बच्चा भी शामिल है। हेलिकॉप्टर गौरी माई खर्क से ऊपर जंगल में गिरा था। जिसके बाद गौरीकुंड के ऊपर घास काट रही नेपाली मूल की महिलाओं ने हेलीकॉप्टर क्रैश होने की सूचना दी। बताया जा रहा है कि हेलिकॉप्टर हादसे में बीकेटीसी के कर्मचारी विक्रम सिंह रावत भी सवार थे।

हेलिकॉप्टर हादसे पर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने शोक व्यक्त किया है। उन्होंने एक्स पर पोस्ट करते हुए लिखा कि “जनपद रुद्रप्रयाग में हेलीकॉप्टर के दुर्घटनाग्रस्त होने का अत्यंत दुःखद समाचार प्राप्त हुआ है। बाबा केदार से सभी यात्रियों के सकुशल होने की कामना करता हूँ”।

गौरतलब है कि इस बार चारधाम यात्रा के दौरान अलग-अलग धामों पर हेलिकॉप्टर क्रैश जैसी कई घटनाएँ हुई हैं। इतना ही नहीं कई बार हेलिकॉप्टर की इमरजेंसी लैंडिंग भी करानी पड़ी है। कुछ दिनों पहले ही चारधाम यात्रा के दौरान बीच सड़क पर ही हेलिकॉप्टर की इमरजेंसी लैंडिंग कराई गई थी। वहीं एक हेलीकॉप्टर यात्रा की शुरुआत में ही क्रैश हुआ था। इस हादसे में भी कई लोगों की मौत हुई थी।

हरिद्वार का औरंगजेबपुर बना शिवाजी नगर, मियांवाला हुआ रामवाला… उत्तराखंड में 17 जगहों के बदले नाम: बोले CM धामी- भारतीय संस्कृति-विरासत के आधार पर किया बदलाव


उत्तराखंड में 4 जिलों के 17 जगहों के नाम में बदलाव किया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने सोमवार (31 मार्च 2025) को बदले हुए नामों की घोषणा की। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति और विरासत को ध्यान में रखते हुए नाम बदले गए हैं। वहीं, कांग्रेस ने फैसले को बीजेपी द्वारा जनता का असली मुद्दे से ध्यान भटकाने का नाटक करार दिया।

प्रदेश में बदले गए स्थानों की लिस्ट मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने अपने अधिकारिक ‘X’ अकाउंट पर पोस्ट की। सीएम ने लिखा, “हरिद्वार जनपद का औरंगज़ेबपुर अब शिवाजी नगर के नाम से जाना जाएगा…जनभावनाओं के अनुरूप हरिद्वार, देहरादून, नैनीताल और उद्धम सिंह नगर जनपदों में स्थित विभिन्न स्थानों के नाम परिवर्तित किए गए हैं।”

सूची के मुताबिक, हरिद्वार जिले में औरंगजेबपुर का नाम शिवाजी नगर गाजीवाली का नाम आर्यनगर, चांदपुर का नाम ज्योतिबा फुले नगर, मोहम्मदपुर जट का नाम मोहनपुर जट, खानपुर कुर्सली का नाम अंबेडकर नगर, इदरीशपुर का नाम नंदपुर, खानपुर का नाम श्री कृष्णपुर, अकबरपुर फाजलपुर का नाम विजयनगर, आसफनगर का नाम देवनारायण नगर और सलेमपुर राजपूताना का नाम शूरसेन नगर रखा गया है।

देहरादून जिले में वर्तमान स्थान मियांवाला का नाम रामजीवाला, पीरवाला का नाम केसरी नगर, चांदपुर खुर्द का नाम पृथ्वीराज नगर और अब्दुल्लापुर का नाम अब दक्षनगर किया गया है।

नैनीताल जिले में नवाबी रोड अब अटल मार्ग और पनचक्की से आईटीआई मार्ग को गुरु गोवलकर मार्ग नाम से जाना जाएगा। साथ ही उधम सिंह नगर जिले में नगर पंचायत सुल्तानपुर पट्टी का नाम बदलकर अब कौशल्या पूरी हो गया है।

बीजेपी ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है। उत्तराखंड के मीडिया सचिव मनवीर चौहान ने कहा कि विभिन्न स्थानों के नाम बदलने का काम जनभावना और भारतीय संस्कृति एवं विरासत के अनुरूप किया जा रहा है। इससे लोग भारतीय संस्कृति और इसके संरक्षण में योगदान देने वाले महापुरुषों से प्रेरणा ले सकेंगे।

वहीं, कांग्रेस से पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा, “नाम बदलना बीजेपी का एजेंडा बन गया है क्योंकि उनके पास असली काम दिखाने के लिए कुछ नहीं है। पिछले आठ साल विफल रहे हैं। अब जनता उनसे सवाल कर रही है। सवालों से ध्यान भटकाने के लिए वे नाम बदलने का नाटक कर रहे हैं।”

उत्तराखंड : अवैध मदरसों पर धामी सरकार का एक्शन, 110 पर लगा ताला : हरिद्वार के SDM बोले – ‘आदेश मिलते जाएँगे, कार्रवाई करते जाएँगे’

                      उत्तराखंड में अवैध मदरसों के खिलाफ कार्रवाई जारी (फोटो साभार: News18)
उत्तराखंड में इन दिनों अवैध मदरसों के खिलाफ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सख्ती खूब चर्चा में है। गुरुवार (20 मार्च 2025) को ऊधम सिंह नगर में 16 और हरिद्वार में 2 मदरसों को सील कर दिया गया। अब तक राज्य में 110 मदरसों पर ताला लग चुका है। पिछले एक महीने से प्रशासन लगातार ऐसे मदरसों पर कार्रवाई कर रहा है, जो बिना सरकार की अनुमति के चल रहे थे।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ऊधम सिंह नगर के रुद्रपुर में 4, किच्छा में 8, बाजपुर में 3, जसपुर में 1 और हरिद्वार के श्यामपुर क्षेत्र में 2 मदरसे सील हुए। इससे पहले देहरादून और पौड़ी में 92 मदरसों पर भी ऐसी ही कार्रवाई हो चुकी है।

मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने साफ कहा है कि राज्य के मूल स्वरूप के साथ छेड़छाड़ बर्दाश्त नहीं होगी। उनके इस बयान से लोगों में उम्मीद जगी है कि गलत काम करने वालों को सबक मिलेगा। धामी ने कहा, “जो भी धर्म की आड़ में अवैध गतिविधियां चलाएगा, उसके खिलाफ सख्त एक्शन होगा।”

हरिद्वार के गैंडीखाता की गुर्जर बस्ती में दो मदरसे बिना रजिस्ट्रेशन के चल रहे थे, जिन्हें गुरुवार (20 मार्च 2025) को सील कर दिया गया। हरिद्वार के एसडीएम अजयवीर सिंह ने कहा, “हमें सीएम के आदेश मिले हैं। उन मदरसों पर कार्रवाई करने और उन्हें सील करने के आदेश दिए गए हैं जो न तो मदरसा बोर्ड और न ही शिक्षा विभाग से पंजीकृत हैं। आदेश आज ही आए हैं इसलिए जैसे-जैसे हमें पता चलता जाएगा हम सील की कार्रवाई करते जाएँगे।”

प्रशासन अब ये भी जाँच कर रहा है कि इन मदरसों के पीछे कौन लोग हैं और वहाँ बच्चों को क्या सिखाया जा रहा था। हरिद्वार के डीएम कर्मेंद्र सिंह ने बताया कि जिले में 60 से ज्यादा अवैध मदरसे चिन्हित किए गए हैं।

जानकारी के मुताबिक, बीते माह अधिकारियों ने बिना पंजीकरण के चल रहे 200 से ज़्यादा मदरसों की पहचान की, जिनमें उधम सिंह नगर ज़िले में सबसे ज़्यादा 129 मदरसे थे, उसके बाद देहरादून में 57 और नैनीताल में 26 मदरसे थे।

उत्तराखंड में समान नागरिक संहिता लागू, UCC लागू करने वाला भारत का पहला राज्य बना: शादी विवाह से लेकर लिव-इन तक के लिए बदला कानून


उत्तराखंड सरकार ने बुधवार (22 जनवरी 2025) को समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी। यह कानून व्यक्तिगत जीवन से जुड़ी शादियों, तलाक, संपत्ति उत्तराधिकार और विरासत जैसे मामलों में स्पष्टता और समानता लाने का काम करेगा। उत्तराखंड ऐसा करने वाला भारत का पहला राज्य बन गया है।

सरकार की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि यह कानून राज्य के सभी निवासियों पर लागू होगा, चाहे वे राज्य के अंदर रह रहे हों या बाहर। हालाँकि, संविधान के अनुच्छेद 342 और 366 (25) के तहत अधिसूचित अनुसूचित जनजातियों और संरक्षित प्राधिकृत व्यक्तियों तथा समुदायों को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है।

समान नागरिक संहिता अधिनियम- 2024, व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा और सामाजिक सामंजस्य को बढ़ावा देने के उद्देश्य से लागू किया गया है। इसके तहत शादी सिर्फ उन्हीं व्यक्तियों के बीच हो सकती है जिनमें से किसी का भी जीवनसाथी जीवित न हो, दोनों मानसिक रूप से सक्षम हों, पुरुष की उम्र 21 वर्ष और महिला की उम्र 18 वर्ष पूरी हो चुकी हो और वे प्रतिबंधित संबंधों की श्रेणी में न आते हों।

                            उत्तराखंड यूसीसी (फोटो साभार: Canva/OPIndia Hindi Team)

शादी किसी भी धार्मिक रीति-रिवाज या कानूनी प्रक्रिया के तहत की जा सकती है, लेकिन इसे लागू होने के 60 दिनों के भीतर रजिस्टर कराना अनिवार्य है। जिनकी शादी 26 मार्च, 2010 से लागू होने की तिथि तक हुई है, उन्हें 6 महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन कराना होगा। हालाँकि, पहले से रजिस्टर्ड शादियों को दोबारा रजिस्टर करने की जरूरत नहीं है, लेकिन पहले किए गए रजिस्ट्रेशन का सत्यापन जरूरी है।

जो शादियाँ 26 मार्च, 2010 से पहले या राज्य से बाहर हुई हैं और जहाँ दोनों पक्ष तब से साथ रह रहे हैं और सभी कानूनी योग्यता पूरी करते हैं, वे भी (हालाँकि यह अनिवार्य नहीं है) इस अधिनियम के लागू होने के 6 महीने के भीतर रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं।

अधिनियम के तहत शादी का रजिस्ट्रेशन ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरीके से किया जा सकता है। आवेदन करने के बाद उप-पंजीयक को 15 दिनों के भीतर निर्णय लेना होगा। अगर तय समय सीमा में निर्णय नहीं होता है, तो आवेदन अपने आप रजिस्ट्रार के पास चला जाएगा।

रजिस्ट्रेशन आवेदन को खारिज किए जाने पर अपील की पारदर्शी प्रक्रिया भी उपलब्ध है। झूठी जानकारी देने पर जुर्माने का प्रावधान किया गया है, लेकिन रजिस्ट्रेशन न होने पर शादी को अवैध नहीं माना जाएगा।

उत्तराखंड सरकार इस अधिनियम को लागू करने के लिए रजिस्ट्रार जनरल, पंजीकरण और उप-पंजीयक की नियुक्ति करेगी। यह अधिकारी संबंधित रिकॉर्ड्स का रखरखाव और निगरानी सुनिश्चित करेंगे।

हल्द्वानी दंगे में कांग्रेस ने ही खोल दी मणिपुर दंगे की सच्चाई : ‘हमको कमजोर समझ गलती कर रहे, हमारी ताकत का अंदाजा तुम नहीं लगा सकते’–नेता से लेकर वकील और मुल्ले सबने भड़काई हल्दवानी में हिंसा

पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने मणिपुर जैसे हालात की धमकी दी थी (चित्र साभार: ANI & ABP)
उत्तराखंड के हल्द्वानी में कट्टरपंथी मुस्लिमों ने जम कर हिंसा की है। इस हिंसा में 300 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए हैं। यह हिंसा कट्टरपंथी मुस्लिमों ने इसलिए की क्योंकि यहाँ प्रशासन अतिक्रमण हटाना चाहता था। हालाँकि, उत्तराखंड में दंगा भड़काने की धमकियाँ पहले से दी जा रही थीं, इससे संबंधित ट्वीट और बयान अब वायरल हो रहे हैं।

गौरतलब है कि उत्तराखंड में हाल ही में UCC लागू किया गया है। इसी को लेकर मुस्लिमों के सड़कों पर उतरने की धमकी बड़े मौलानाओं से लेकर मुस्लिम सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर तक दे रहे थे। इसमें कांग्रेस के बड़े नेता भी शामिल थे। ऐसी ही कई धमकियाँ अब वायरल हो रही हैं। UCC का विरोध करने वालों में से कोई बताए कि कानून विश्व के कौन से देश में लागू नहीं है। भारत में कट्टरपंथियों द्वारा देश के किसी भी कानून का विरोध करने के कारण कोई मुस्लिम देश भारतीय मुसलमानों को वह इज्जत नहीं देता, जिसके वह अधिकारी हैं। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी द्वारा मुस्लिम देश का दौरा करने पर जो कट्टरपंथियों ने बबाल मचाया, उस पर सऊदी अरब ने किस तरह अपमानित किया किसी से छिपा नहीं। सऊदी अरब ने कहा था कि 'मुसलमान बन गए हो तो इसका मतलब नहीं कि हर मामले में दखल दो।'  

अवलोकन करें:-

‘मुस्लिम बन गए इसका मतलब ये नहीं हमारे मामले में बोलो’ : स्मृति ईरानी के मदीना जाने पर गाली बक रह

देखिए कैसे भारत का इस्लामीकरण करने का प्रयास होता रहा:

 

एक पोस्ट में एक कट्टरपंथी मुस्लिम इन्फ्लुएन्सर शादाब चौहान, जो कि खुद को पीस पार्टी का राष्ट्रीय प्रवक्ता बताता है, उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को धमकी देता दिखा था। उसने मुस्लिमों की ताकत को कम ना आँकने की धमकी दी थी।

शादाब चौहान ने हल्द्वानी दंगे (8 फरवरी, 2024) से दो दिन पहले सीधी धमकी देते हुए लिखा था, “कान खोल करके सुन लो पुष्कर सिंह धामी, किसी की औकात नहीं है जो भारत के मुसलमानों को अल्लाह के हुकुम और हमारे नबी के तरीके पर चलने से रोक सके। अगर तुम हमको कमजोर समझ रहे हो तो गलती कर रहे हो, हमारी ताकत का अंदाज़ा तुम नहीं लगा सकते। हम हर संवैधानिक संघर्ष के लिए तैयार हैं। हमारी ताकत संविधान का अनुच्छेद 25 है, जिसके सामने तुम्हारी कोई हैसियत नहीं है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री और कांग्रेस, तुम्हारी भी जिम्मेदारी है कि इसके लिए संवैधानिक संघर्ष करो।”

 उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे कांग्रेस नेता हरीश रावत ने भी ऐसे हालातों की चेतावनी दी थी। उन्होंने UCC पर कहा था कि इससे राज्य में अशांति हो सकती है। राज्य के हालत मणिपुर में तब्दील हो सकते हैं। उन्होंने UCC के बाद होने वाली हिंसा का उदाहरण कूकी-मैतेई समुदाय से जोड़कर दिया था। उनका यह बयान भी अब वायरल हो रहा है।

उत्तराखंड में UCC के आते ही मुस्लिम मौलानाओं ने धमकियाँ देना चालू कर दी थीं। देहरादून के शहर काजी हम्मद अहमद कासमी ने सड़क पर उतरने का ऐलान किया था। उन्होंने कहा था कि देश के बुद्धिमान लोग यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत नहीं मानते हैं। वहीं मुस्लिम युवाओं ने भी इस कानून को ना मानने की बात कही थी।

उत्तराखंड में मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा UCC लाने के विरोध में था। कई कट्टरपंथी इसके खिलाफ बड़े प्रदर्शन और सड़कों को जाम करने की धमकी दे रहे थे। इसके दो दिनों के भीतर ही हल्द्वानी से हिंसा की खबर आ गई।

उत्तराखंड : 3 महीने में 330+ मजार ध्वस्त; समान नागरिक संहिता पर जून तक पूरा हो जाएगा कमिटी का काम : पुष्कर सिंह धामी, मुख्यमंत्री

समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए उत्तराखंड की सरकार ने सुप्रीम कोर्ट की सेवानिवृत न्यायाधीश रंजना देसाई की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया। इस कमिटी का काम जून 2023 के अंत तक पूरा हो जाएगा। यह जानकारी मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने दी है। इस बीच राज्य में मुख्यमंत्री धामी के निर्देश पर वन विभाग अवैध मजारों पर बुलडोजर चला रहा है। बीते 3 महीनों में 330 से अधिक ऐसे मजार ध्वस्त किए गए हैं।

उत्तराखंड में ‘मजहबी अतिक्रमण’ पर खुफिया रिपोर्ट के बाद अवैध मजारों को हटाने की कार्रवाई में तेजी आई है। इसके लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) ने भी अभियान छेड़ रखा है। अवैध मजार हटाने की कार्रवाई सोमवार (15 मई 2023) को भी जारी रही। इस कार्रवाई में जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व प्रशासन जंगल के अंदर बनी 9 अवैध मजारों पर बुलडोजर चलाया। 
किसी भी टाइगर रिजर्व में मानवी गतिविधियाँ पूरी तरह से प्रतिबंधित होती हैं। हालाँकि पर्यटकों को घूमने की अनुमति होती है। लेकिन इसमें भी एक निश्चित दायरा तय किया जाता है। फिर भी जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व में मजार बन गए और वहाँ बिना किसी रोक-टोक के आवाजाही हो रही थी। मामला उजागर होने के बाद वन विभाग सक्रियता दिखाते हुए अवैध मजारों को तोड़ते हुए जमीन अतिक्रमण मुक्त कराने की कोशिश में जुटा हुआ है।
इस मामले में जिम कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर धीरज पांडे ने न्यूज18 से हुई बातचीत में कहा है कि सरकार के निर्देशों के अनुसार उन्होंने अवैध अतिक्रमण के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। मजारों का मालिकाना हक साबित करने के लिए एक सप्ताह पहले नोटिस जारी किया गया था। लेकिन कोई भी सामने नहीं आया। इसके बाद, इन अवैध कब्जों को हटा दिया गया। पिछले तीन महीनों में 330 से अधिक मजारों को हटाया गया है। इससे वन विभाग की 91 हेक्टेयर जमीन अतिक्रमण मुक्त हुई। अतिक्रमण हटाने को लेकर की गई इस कार्रवाई पर सीएम धामी ने कहा है, “देवभूमि में अतिक्रमण हटाने का प्रयास जारी रहेगा। उत्तराखंड में किसी भी तरह के लैंड जिहाद की अनुमति नहीं दी जाएगी।”

UCC पर कमिटी का 90 फीसदी काम पूरा

देश में समान नागरिक संहिता को लेकर उठ रही माँगों के बीच उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि राज्य सरकार इसके लिए तैयारियाँ कर रही है। उधमसिंह नगर जिले के काशीपुर में मीडिया से बात करते हुए सीएम ने कहा, “समान नागरिक संहिता का ड्राफ्ट तैयार करने के लिए हमने एक कमिटी बनाई थी। इस कमिटी का लगभग 90 प्रतिशत काम पूरा हो चुका है। कमिटी 30 जून तक काम पूरा लेगी। इसके बाद हम समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। हमें उम्मीद है कि देश के सभी राज्य समान नागरिक संहिता को लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेंगे।”
अप्रैल 2022 में केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि CAA, अनुच्छेद 370, राम मंदिर और तीन तलाक के बाद अब समान नागरिक संहिता की बारी है। उन्होंने कहा था कि उत्तराखंड की तर्ज पर ही भाजपा शासित अन्य राज्यों में भी समान नागिरक संहिता लागू किया जाएगा।

लाशों पर रोटी सेंकने वालों ‘पूरे इलाके में इकट्ठा हो चुके हैं हथियार…’ : हल्द्वानी के हिंदू ने बताए मुस्लिम अतिक्रमणकारियों के इरादे

                                     हल्द्वानी में मुस्लिमों की भीड़ (फाइल फोटो, साभार: जागरण)
उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की जमीन पर हजारों लोगों ने अवैध कब्जा किया हुआ है। इसमें से कई अवैध घुसपैठिए भी बताए जाते हैं। फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अवैध बस्ती को सात दिन के अंदर हटाने के हाई कोर्ट के आदेश पर रोक लगा दी है। हल्द्वानी में जो कुछ भी हो रहा है ऑपइंडिया वह सब आप तक ग्राउंड जीरो से पहुँचाने में जुटा हुआ है।

इसी कड़ी में, ग्राउंड रिपोर्टिंग के दौरान, हमने स्थानीय लोगों से बातचीत की। इस बातचीत में कई ऐसे पहलू सामने आए हैं जो हैरान करने वाले हैं। हमने एक व्यक्ति से पूछा कि क्या आपको रेलवे लाइन वाली घटना का पता है, वहाँ से लोग हटाए जा रहे हैं? इस पर उस व्यक्ति ने कहा, “हाँ, मैं उधर ही रहता हूँ, रेलवे बाजार में।”

हमने उससे आगे पूछा, जो लोग वहाँ पर भीड़-भाड़ में दिखाई दे रहे थे और हंगामा कर रहे थे वे लोग लोकल थे या बाहरी? इस पर उसने कहा, “लोग यहाँ के भी हैं और बाहरी लोग भी आ जाते हैं। हालाँकि, मैं अपना अंदाजा बता रहा हूँ कि जब 10 तारीख से जब से ये काम शुरू होगा (अवैध बस्ती हटाने का काम) तो बिना कर्फ्यू के ये लोग काबू में नहीं आएँगे।”

हम जिस स्थानीय व्यक्ति से बात कर रहे थे वह बिना कुछ पूछे ही लगातार हल्द्वानी के हालात बताता जा रहा था, उसने आगे कहा, “कल मैं मुस्लिम भाई की एक दुकान पर बैठा था। दुकान में मैनें बच्चों से बात करते हुए कहा कि आपके बाप-दादाओं ने जमीन पर कब्जा किया और इतने सालों तक लगातार रहे। समझ लो किराए पर गुजारा कर लिया। लेकिन वहाँ बैठे लोगों ने कहा ऐसा है चाहे जान चली जाए लेकिन ऐसा नहीं होने देंगे।”

उसने कहा, “मैंने उन लोगों से पूछा कि ऐसा करने से आपको मिलेगा क्या? मान लिया कि आपका ये जा रहा है लेकिन रोजी-रोटी तो बची हुई है। उससे आप सब कुछ खरीद सकते हैं। हालाँकि, प्रशासन सतर्क है। लेकिन, राजनेता जो भी हैं, मतीन सिद्दकी हो या कोई भी नेता, कार्यकर्ता या मुस्लिम सब लाशों पर रोटी सेंकने वाले हैं।”

हमारे किसी भी सवाल का इंतजार किए बिना उसने कहा, “सब एक से बढ़कर एक दमदार हैं, समा वाले हों या ये लोग हों सबके पास हथियार हैं। हमारे हिंदू के पास एक चाकू नहीं होगा। इन सब के यहाँ इतना हथियार निकलेगा जिसकी हद नहीं। लाइन नंबर 17 से लेकर पूरे इलाके में इतना हथियार इकट्ठा हो चुका है, जिसकी कोई हद नहीं।”

हमसे बात करते हुए वह थोड़ा रुका। हम उससे कुछ पूछने वाले थे। लेकिन, तभी वह फिर बोल पड़ा। उसने कहा, एक छोटा बच्चा भी बड़ा हो चुका है। इसलिए, अगर प्रशासन इसमें लापरवाही कर गया तो खतरा भी हो सकता है।”

हमने उससे आगे पूछा, आप यहाँ कब से हैं? उसने कहा, मैं यहाँ 80 के दशक से रह रहा हूँ। हमारा अगला सवाल था कि क्या पहले यहाँ इतने ही मुस्लिम थे। उसने कहा, “नहीं-नहीं, भाईसाहब ये मुसलमान तो टोटल बाहर के हैं। ये लोग रामपुर, नजीमाबाद, बिजनौर के हैं। मेरे सामने ये लोग मजदूरी करते थे। अब इन्होंने उजाला नगर से लेकर न जाने कहाँ-कहाँ 3-3 मकान बना डाले। इनकी पूरी फैमिली, पूरे रिश्तेदार यहाँ शिफ्ट हो गए।”

हमारी बातचीत सुन रहे एक अन्य व्यक्ति ने कहा, “इतने मुसलमान यहाँ पहले थोड़ी थे। पहले हिंदू ही ज्यादा थे। मेरी पैदाइश इंदिरा नगर की ही है।” हमने आगे पूछा, “इंदिरा नगर अवैध कॉलोनी है या नहीं” तब, जवाब मिला, “नहीं, ये सब वही अवैध बस्ती है।” हमने पूछा कि क्या इंदिरा नगर, इंदिरा गाँधी के नाम पर बसाया गया, तो उसने जवाब दिया, हाँ, हो सकता है, उन्हीं के नाम पर हो।”

उत्तर प्रदेश में भाजपा को 226-246 सीटें, 56% की पसंद हैं मुख्यमंत्री योगी: ओपिनियन पोल में खुलासा – उत्तराखंड में लौटेंगे मुख्यमंत्री धामी

वैसे किसी सर्वे पर आसानी से विश्वास नहीं किया जा सकता, लेकिन अब जितने भी सर्वे आ रहे हैं, सभी पंजाब को छोड़ बाकी 4 राज्यों में भाजपा की सरकार दिखा रहे हैं। सबसे आश्चर्यजनक उत्तर प्रदेश में भाजपा की वापसी हो रही है। यदि सर्वे सच सिद्ध होते हैं, उत्तर प्रदेश में 35 वर्षों का रिकॉर्ड टूटेगा, क्योकि उसके बाद उत्तर प्रदेश में भाजपा, सपा और बसपा की बारी-बारी से सरकारें बनती रही, यानि अगले चुनाव में सत्तारूढ़ पार्टी की वापसी नहीं हुई। जनता को योगी की "एक हाथ में माला, दूसरे हाथ में भाला" वाली बात रास आ रही है। अपराधीकरण पर असर तो दिख रहा है, लेकिन प्रदेश के अपराधी मुक्त होने में समय लगेगा। 
‘जन की बात’ के ओपिनियन पोल में उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भाजपा की सरकार बनती दिख रही है। योगी आदित्यनाथ और पुष्कर सिंह धामी बतौर मुख्यमंत्री सत्ता में वापस लौटेंगे। वहीं पंजाब में ‘आम आदमी पार्टी (AAP)’ की सरकार बनने की संभावना जताई गई है। वहाँ AAP ने फ़िलहाल अपने मुख्यमंत्री चेहरे का ऐलान नहीं किया है। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में लगभग सभी ओपिनियन पोल्स में भाजपा को ही बहुमत मिलती दिखाई दे रही है।

उत्तर प्रदेश में 22 दिसंबर, 2021 से 10 जनवरी, 2022 तक 20,000 लोगों के सैम्पल साइज में ये ओपिनियन पोल किया गया, जिसमें सामने आया कि भाजपा को जहाँ 226-246 सीटें मिल सकती हैं। वहीं अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी को 144-160 सीटें मिलते हुए दिखाया गया है। मायावती की बहुजन समाज पार्टी इस ओपिनियन पोल के हिसाब से जहाँ 8-12 पर सिमट जाएगी, कांग्रेस का खाता खुल जाए यही बहुत है। अन्य के खाते में एक सीट जाती दिख रही है।

वहीं वोट प्रतिशत के मामले में भी भाजपा 39-40% के साथ सबसे आगे है। इसके बाद सपा को 34.5-36%, बसपा को 13.13.5% और कांग्रेस को 4-6% वोट मिल सकते हैं। वहीं मुख्यमंत्री के चेहरे के लिए 56% लोगों की पसंद योगी आदित्यनाथ हैं। अखिलेश यादव 32% के साथ दूसरे स्थान पर हैं। मायावती को मात्र 9% लोगों ने मुख्यमंत्री के रूप में अपनी पसंद बताया है। 2% ने प्रियंका गाँधी के नाम पर भी हामी भरी। 85% का कहना है कि पीएम मोदी भाजपा के लिए वोट खींचने में कामयाब रहेंगे।

वहीं उत्तर प्रदेश के 45% मतदाता मानते हैं कि बठिंडा में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सुरक्षा चूक के मामले में मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी की सरकार दोषी है, जबकि 25% ने इसके लिए खालिस्तानी तत्वों और 20% ने पंजाब पुलिस को दोषी ठहराया है। 70% का कहना है कि इससे मतदाताओं पर असर पड़ेगा। 45% ने कहा कि वो योगी सरकार से ब्राह्मण खुश हैं। SC समुदाय के लिए आरक्षित 86 में से 50 सीटों पर भाजपा का दबदबा दिख रहा है।

उत्तराखंड की बात करें तो 5000 के सैम्पल साइज में 21 दिसंबर, 2021 से 9 जनवरी, 2022 तक किए गए सर्वे में जहाँ भाजपा 34-38 सीटें पाकर सरकार बनाती हुई दिख रही है, कांग्रेस  24-33 सीटों पर रुक जाएगी। AAP को 2-6 सीटें मिल सकती हैं। वोट प्रतिशत के मामले में तीनों पार्टियाँ क्रमशः 38%, 36% और 13% रह सकती हैं। 40% ने वर्तमान सरकार को अच्छा बताया है। 40% लोगों के लिए पलायन मुद्दा है जबकि 25% के लिए विकास।

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पंजाब की बात करें तो 21 दिसंबर, 2021 से 11 जनवरी, 2022 तक 10,000 के सैम्पल साइज में कराए गए ‘जन की बात’ के ओपिनियन पोल में AAP 58-65 पाती दिख रही है, जबकि कांग्रेस 32-42 पर ही रुक जाएगी। ‘शिरोमणि अकाली दल (SAD)’ को 15-18 सीटें मिलने का अनुमान लगाया गया है। भाजपा के लिए यहाँ राह मुश्किल है और अधिकतम 2 सीटें मिलने की बात कही गई है। वोट प्रतिशत के मामले में AAP 38-39%, कांग्रेस 34.5-35% और SAD 19-20% पाती दिख रही है। 70% ने कृषि कानूनों को मुद्दा बताया।