डॉ सैयद अली हामिद और पुष्कर सिंह धामी (साभार - एबीपी/इंडियन एक्स्प्रेस)
उत्तराखंड की धामी सरकार ने उत्तराखंड मदरसा शिक्षा बोर्ड को समाप्त कर दिया है। अब इसकी जगह सरकार ने उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (Uttarakhand State Minority Education Authority – USMEA) का गठन किया है।अब यह नया शिक्षा प्राधिकरण ही राज्य में चलने वाले सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों के लिए सिलेबस तय करेगा, मान्यता देगा और शिक्षा की दिशा निर्धारित करेगा। यह नई व्यवस्था जुलाई 2026 से पूरी तरह लागू हो जाएगी जिसके बाद मदरसा बोर्ड का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।
सरकार का कहना है कि यह कदम शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, पारदर्शिता बढ़ाने और सभी अल्पसंख्यक समुदायों को समान अवसर देने के लिए उठाया गया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और अल्पसंख्यक मंत्रालय के विशेष सचिव डॉ पराग मधुकर धकाते ने इस फैसले को शिक्षा सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम बताया है।
मदरसा बोर्ड को खत्म करने की जरूरत क्यों पड़ी?
अब तक उत्तराखंड में अल्पसंख्यक शिक्षा की व्यवस्था मुख्य रूप से मुस्लिम समुदाय के मदरसों तक सीमित थी। सरकार का कहना है कि इससे अन्य अल्पसंख्यक समुदायों जैसे सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी को समान शैक्षणिक दर्जा और अवसर नहीं मिल पा रहे थे। इसके अलावा कई मदरसों पर अवैध संचालन, मानकों के उल्लंघन और शैक्षणिक गुणवत्ता की कमी के आरोप भी लगे थे।
राज्य में हाल के वर्षों में सैकड़ों अवैध मदरसों पर कार्रवाई के बाद सरकार इस निर्णय पर पहुँची कि अब एक नई, आधुनिक, समावेशी और जवाबदेह शिक्षा प्रणाली लागू करने की जरूरत है, जिसमें सभी अल्पसंख्यक संस्थानों के लिए एक समान नियम और ढाँचा हो।
अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025: नई शिक्षा नीति की नींव
मदरसा बोर्ड को समाप्त करने और नई व्यवस्था लागू करने के लिए सरकार ने उत्तराखंड अल्पसंख्यक शिक्षा अधिनियम, 2025 लागू किया है। इस कानून के तहत अब राज्य के सभी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान एक ही प्राधिकरण के अधीन होंगे।
इस अधिनियम के अनुसार, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन और पारसी समुदायों द्वारा चलाए जाने वाले संस्थानों को एक समान प्रक्रिया के तहत मान्यता दी जाएगी। सरकार ने यह निर्णय इसलिए लिया ताकि इससे शिक्षा प्रणाली अधिक पारदर्शी, न्यायपूर्ण और आधुनिक बने।
क्या है उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण (USMEA)?
नए गठित उत्तराखंड राज्य अल्पसंख्यक शिक्षा प्राधिकरण का मुख्य उद्देश्य अल्पसंख्यक छात्रों के लिए बेहतर, आधुनिक और रोजगारोन्मुख शिक्षा सुनिश्चित करना है। यह प्राधिकरण अब यह तय करेगा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में कौन-सा पाठ्यक्रम पढ़ाया जाएगा, शिक्षा का स्तर क्या होगा और संस्थानों को किस शर्त पर मान्यता मिलेगी।
सरकार का कहना है कि यह प्राधिकरण संस्थानों के मजहबी मामलों में हस्तक्षेप नहीं करेगा, लेकिन यह सुनिश्चित करेगा कि शिक्षा राज्य शिक्षा बोर्ड के मानकों के अनुरूप हो और छात्रों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ा जा सके।
अब सभी संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड से मान्यता लेनी होगी और एक समान शैक्षणिक प्रणाली का पालन करना होगा। सरकार का दावा है कि इससे शिक्षा व्यवस्था में भेदभाव खत्म होगा और सभी समुदायों को समान अवसर मिलेंगे।
पाठ्यक्रम में क्या बदलाव होगा?
नई प्रणाली के तहत अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थानों को उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के तय मानकों के अनुसार पढ़ाई करानी होगी। विज्ञान, गणित, भाषा, सामाजिक विज्ञान और आधुनिक विषयों पर अधिक जोर दिया जाएगा ताकि छात्र उच्च शिक्षा, प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार के लिए बेहतर रूप से तैयार हो सकें।
मजहबी विषय पढ़ाने की अनुमति रहेगी, लेकिन वे शैक्षणिक गुणवत्ता और तय मानकों के अनुरूप होने चाहिए। सरकार का उद्देश्य है कि छात्रों को मजहबी शिक्षा के साथ-साथ आधुनिक और व्यावहारिक ज्ञान भी मिले।
कौन हैं नए प्राधिकरण के प्रमुख सदस्य?
सरकार ने इस प्राधिकरण में अनुभवी शिक्षाविदों, प्रोफेसरों, समाजसेवियों और प्रशासनिक अधिकारियों को शामिल किया है, ताकि शिक्षा से जुड़े फैसले अकादमिक और बौद्धिक आधार पर लिए जा सकें।
डॉ सुरजीत सिंह गाँधी को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, जो BSM पीजी कॉलेज रुड़की में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर रहे हैं। अन्य सदस्यों में प्रो राकेश जैन, डॉ सैयद अली हमीद, प्रो गुरमीत सिंह, प्रो पेमा तेनजिन, डॉ एल्बा मन्ड्रेले, प्रो रोबिना अमन, समाजसेवी राजेंद्र सिंह बिष्ट और सेवानिवृत्त अधिकारी चंद्रशेखर भट्ट शामिल हैं। इसके अलावा निदेशक कॉलेज शिक्षा, निदेशक SCERT और निदेशक अल्पसंख्यक कल्याण भी पदेन सदस्य होंगे।
मान्यता के लिए सख्त नियम लागू
नई व्यवस्था के तहत अब किसी भी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान को मान्यता पाने के लिए कड़े नियमों का पालन करना होगा। संस्थानों को सोसाइटी, ट्रस्ट या कंपनी एक्ट के तहत पंजीकरण, संस्था के नाम पर भूमि और संपत्ति का रिकॉर्ड, बैंक खाता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करनी होगी।
यदि किसी संस्था पर वित्तीय गड़बड़ी, शैक्षणिक मानकों के उल्लंघन या मजहबी और सामाजिक सद्भाव के खिलाफ गतिविधियों का आरोप पाया गया, तो उसकी मान्यता रद्द भी की जा सकती है। सरकार का कहना है कि इससे फर्जी संस्थानों और अवैध संचालन पर लगाम लगेगी।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि अब यह नया प्राधिकरण तय करेगा कि अल्पसंख्यक बच्चों को कैसी शिक्षा दी जाएगी और यह सुनिश्चित करेगा कि सभी संस्थान उत्तराखंड शिक्षा बोर्ड के मानकों का पालन करें। सरकार का दावा है कि यह कदम अल्पसंख्यक छात्रों को मुख्यधारा से जोड़ने, शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने, और उन्हें बेहतर भविष्य के लिए तैयार करने की दिशा में उठाया गया है।
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