माँ गंगा के पश्चिमी तट पर स्थित, वाराणसी दुनिया का सबसे पुराना जीवंत शहर और भारत की सांस्कृतिक-आध्यात्मिक राजधानी है। वहीं महादेव की नगरी काशी की पूरी भव्यता काशी विश्वनाथ मंदिर में है, जिसमें शिव, विश्वेश्वर या विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग है। जो अब काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर के रूप में विशाल आकार लेकर 1000 साल पुराने अपने उसी अखंड स्वरुप में है जो 11वीं सदी तक हुआ करती थी। यूँ तो काशी नित्य निरंतर रंग-उमंग से भरी रहती है, वही काशी जहाँ सप्त वार में नौ त्योहार मनाने की परंपरा रही है; आज वो काशी एक नव त्योहार के रंग में रंगी है और हो भी क्यों नहीं काशी पुराधिपती बाबा विश्वनाथ के भव्य दरबार के लोकार्पण की जो तैयारी है।
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— Shri Kashi Vishwanath Temple Trust (@ShriVishwanath) December 12, 2021
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विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग का भारत के आध्यात्मिक इतिहास में बहुत ही अनूठा महत्व है। परंपरा यह है कि भारत के विभिन्न हिस्सों में बिखरे हुए अन्य ज्योतिर्लिंगों के दर्शन से अर्जित गुण काशी विश्वनाथ मंदिर में एकल यात्रा द्वारा शिव भक्तों को प्राप्त होते हैं। ऐसे में अद्भुत, अद्वितीय, अलौकिक और भव्य श्री काशी विश्वनाथ धाम आज 13 दिसंबर, 2021 को अगहन मास की दशमी तिथि को रवियोग में पीएम नरेंद्र मोदी जनता को समर्पित करेंगे। पीएम मोदी आज जब काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन करेंगे तो उस समय 12 ज्योतिर्लिंगों और 51 सिद्धपीठों के पुजारी भी उपस्थित रहेंगे। इसके साथ ही ‘न भूतो न भविष्यति’ की तर्ज पर काशी विश्वनाथ धाम के लोकार्पण समारोह को भव्य रूप देने के लिए सनातन धर्म के सभी संप्रदायों की आज प्रांगण में उपस्थिति होगी।
आज गौरव का दिन है। जिसका स्वागत होना चाहिए। वर्षो से यहाँ आते साधु-संतों, सन्यासियों, साधकों के साथ ही काशी और काशीवासियों के हृदय की आवाज को और उनके मन में दबे उस प्रतिकार को बिना विध्वंश के अपनी सृजनात्मक क्षमता द्वारा बदल देने का जो कार्य काशी के सांसद और देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किया है। उसे मैं महीनों से यहाँ आने-जाने वाले सभी शिव भक्तों की आँखों में पढ़ रहा हूँ। सभी दिव्य और भव्य काशी के इस बदलते स्वरुप को देखकर गदगद हैं। दूसरे शब्दों में कहूँ तो प्रधानमंत्री ने अंजुमन इंतजामिया जामा मस्जिद (ज्ञानवापी मस्जिद) के रूप में बाबा विश्वनाथ परिसर में खींची गई छोटी लकीर को एक कॉरिडोर के रूप में एक बड़ी लकीर खींच कर बेहद छोटा कर दिया है। ज्ञानवापी अर्थात ज्ञान का कुआँ की जो प्राचीन अवधारणा है उस आधारभूत संरचना को धरातल पर लाने का जो संकल्प प्रधानमंत्री ने लिया था वो अब आम जनमानस के सामने दृष्टिगोचर हो रहा है।
काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोरआनंद कानन की जो परिकल्पना रही है वो अब एक बार फिर काशी में आकर ले चुकी है जहाँ एक ओर माँ गंगा की अविरल धारा है तो दूसरी ओर स्वर्ग से उतरी पतित-पावनी गंगा को अपनी जटा में स्थान देने वाले काशी पुराधिपती बाबा विश्वनाथ अब एक सीध में बिना किसी अड़चन के एकाकार हो चुके है। अट्ठारवीं सदी में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर के द्वारा जिस यज्ञ का अनुष्ठान किया गया था, अलौकिक काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के रूप में प्रधामंत्री मोदी ने 352 साल बाद उसे सिद्धि प्रदान की है।
बाबा विश्वनाथ जो काशी के सर्वमान्य राजा है और राजराजेश्वर के रूप में यहाँ विराजमान है। उनके मंदिर परिसर की जो स्वर्णमयी आभा होनी चाहिए उसे मूर्तरूप देने का काम प्रधानमंत्री की दूरदर्शिता और सनातन धर्म और हिन्दुओं के प्रति अहोभाव को दर्शाता है। जिनके द्वारा कोरोना जैसी महामारी के बीच भी मात्र 33 माह में एक असंभव सा दिखने वाला कार्य संभव हुआ है। आज मंदिर परिसर में पहुँचने वाला हर शिव भक्त हर काशीवाशी अभिभूत है। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा की बाबा विश्वनाथ दरबार का जो स्वरूप उन्होंने जीवनपर्यंत देखा वो इस अद्भुत स्वरूप में कैसे परिलक्षित हुआ। मंदिर के मुख्य अर्चक महंत श्रीकांत मिश्र भी इस बात को स्वीकार करते हुए कहते हैं, “आज मंदिर का जो दिव्य और भव्य परिसर सबके सामने है वो बाबा काशी विश्वनाथ की इच्छा और प्रधानमंत्री मोदी के सार्थक और दृढ़ इच्छशक्ति के कारण ही संभव हुआ हैं।”
इससे पहले कि आगे इतिहास की बात करूँ आपकी जानकारी के लिए बता देता हूँ कि काशी विश्वनाथ धाम में 27 मंदिरों की एक खास मणिमाला भी तैयार की गई है। यह वे मंदिर हैं, जिनमें कुछ मंदिर तो काशी विश्वनाथ के साथ ही स्थापित किए गए थे और बाकी समय-समय पर काशीपुराधिपति के विग्रहों के रूप में यहाँ बसाए गए थे। जलासेन घाट से गंगा स्नान के बाद जल लेकर चलने वाले शिव भक्त इस मणिमाला को साक्षी मानकर ही गर्भगृह तक जाएँगे और यहाँ से दर्शन के बाद इन विग्रहों की परिक्रमा का जो प्राचीन विधान था वह पुनः स्थापित हुआ है। परियोजना के दूसरे चरण में 97 विग्रह व प्रतिमाओं की स्थापना और तीसरे चरण में 145 शिवलिंगों को भी स्थापित किया जाएगा।
पिछले एक महीने में कई बार इस मंदिर परिसर में गया और तब भी गया था जब इस परियोजना के लिए ड्रोन सर्वे के बाद 300 से ज़्यादा भवन खरीदे गए और उनके अंदर कैद किए गए काशी खंड के अनेक मंदिरों को मुक्त कराया गया। एक हजार साल से काशी विश्वनाथ मंदिर ध्वंस का जो दंश भोग रहा था, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर ने उससे मुक्ति दिलाई है। आज जो कॉरिडोर हमारे सामने है ग्यारहवीं शताब्दी तक इस मंदिर परिसर की शक्ल कमोबेश ऐसी ही थी, जैसी आज आकार दी गई है।
काशी विश्वनाथ सिर्फ़ एक मंदिर नहीं बल्कि मंदिरों का संकुल था। मंदिर परिसर के चारों तरफ़ कॉरिडोर की शक्ल में कई कक्ष थे, जहाँ संस्कृत, ज्योतिष, तंत्र और आध्यात्म की शिक्षा दी जाती थी। गुरुकुल परंपरा के तहत विद्यार्थी यहीं अपने गुरु के सानिध्य में बैठकर वेद, पुराण, धर्म और दर्शन का ज्ञान अर्जित करते थे। कहा जाता है कि 1669 में औरंगजेब ने जब इस मंदिर संकुल को तोड़ने का आदेश दिया था तो उसकी एक वजह यह भी थी कि उसका सनातन धर्म के प्रति आकर्षित होता भाई दारा शिकोह यहाँ संस्कृत पढ़ता था।
वरिष्ठ पत्रकार हेमंत शर्मा इसका जिक्र करते हुए बताते है, “दारा शिकोह ने औरंगजेब और इस्लाम से बग़ावत की थी। इसलिए औरंगजेब ने 18 अप्रैल 1669 को मंदिर तोड़ने का फ़रमान जारी किया। फ़ारसी में लिखे इस फ़रमान में दर्ज था कि “वहाँ मूर्ख पंडित, रद्दी किताबों से दुष्ट विद्या पढ़ाते हैं।”
सोचिए हिन्दू धर्म और शास्त्रों के प्रति कैसी घृणा थी उन मुग़लों में जिन्होंने भारत की मूल संस्कृति, यहाँ की आध्यात्मिकता को मिटाने का दुस्साहस किया और हम सैकड़ों सालों से, यहाँ तक कि आजाद होने के बाद भी वर्षों तक उस विध्वंश का दंश झेलते रहे।
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