Showing posts with label bihar elections. Show all posts
Showing posts with label bihar elections. Show all posts

बिहार चुनाव : वो RJD नेता कौन था जिसने IAS की पत्नी, माँ, भतीजी से लगातार 2 साल तक किया था रेप… , करवाना पड़ा था अबॉर्शन?

                                                             प्रतीकात्मक 

भारतीय जनता पार्टी शासित उत्तर प्रदेश के हाथरस की घटना को जिस तरह योगी विरोधी उछाल रहे हैं, ये ही लोग राष्ट्रीय जनता दल द्वारा बिहार में जंगल राज  पर चुप्पी साधे हुए थे। आरजेडी के राज में आम नागरिक तो दूर की बात है, ब्यूरोक्रेट्स के परिवार की महिलाएं तक सुरक्षित नहीं थीं। आरजेडी के राज में इस तरह के अपराध होना स्वाभाविक था, क्योकि जिस प्रदेश में मुख्यमंत्री अनपढ़ हो, और परिवार नियोजन को तार-तार कर बच्चों की लाइन लगाने में व्यस्त हो, कानून की धज्जियां उड़नी ही हैं। जिसे कवि अखिलेश द्विवेदी अपनी कविता पाठ में वर्णित कर रहे हैं:-

नेताओं के बाद अगर सरकार में किसी की सबसे ज्यादा चलती है तो वो हैं ब्यूरोक्रेट्स। कई बार तो उनकी भूमिका नेताओं से भी बढ़ कर होती है क्योंकि योजनाओं के क्रियान्वयन का जिम्मा उनके पास ही होता है। लेकिन, बिहार में जंगलराज का जो दौर था, उसमें IAS अधिकारी तक सुरक्षित नहीं थे। ऐसे ही एक अधिकारी की पत्नी थीं चम्पा विश्वास। चम्पा विश्वास के साथ रेप एक ऐसी घटना थी, जिसने पूरे बिहार ही नहीं, बल्कि देश को हिला कर रख दिया था।

बिहार में नेताओं पर यौन शोषण के आरोप नए नहीं हैं। हाल ही में सामने आए मुजफ्फरपुर बालिका गृह काण्ड के दौरान भी बड़े नेताओं का नाम सामने आया। राजद ने दो बलात्कारी विधायकों की पत्नियों को टिकट दे रखा है। अभी जब ये सब खुलेआम हो रहा है तो उस दौर की आप सिर्फ कल्पना ही कर सकते हैं, जब लालू यादव के क़रीबी पूरे बिहार में कुछ भी कर सकते थे, कुछ भी। इन्हीं काली घटनाओं में से एक की हम आज चर्चा करने जा रहे हैं।

चम्पा विश्वास के साथ रेप की घटना: बिहार के दामन पर लगा काला दाग

बिहार में जंगलराज के दौर में हत्याएँ और अपहरण इतने आम थे कि ऐसी घटनाओं को लोगों ने खबर मानना भी छोड़ दिया था। सत्ताधारी पार्टी के नेता ही गुंडे थे और उनके द्वारा यौन शोषण और हत्या की वारदातों के बाद भी उन पर कोई कार्रवाई नहीं होती थी। लेकिन, IAS अधिकारी बीबी विश्वास ने जब लालू यादव के करीबी मृत्युंजय यादव पर 2 साल में न सिर्फ उनकी पत्नी का बल्कि उनके कई सम्बन्धियों का भी रेप करने का आरोप लगाया, तो कोहराम मच गया।

अगर इस मामले की पुलिस में शिकायत होती तो या तो फाइलें धूल फाँकती, या फिर उलटा पीड़ितों के खिलाफ ही कार्रवाई हो जाती। लेकिन, मामला लाइमलाइट में तब आया जब पीड़िता ने बिहार के तत्कालीन राज्यपाल सुन्दर सिंह भंडारी को पत्र लिख कर न्याय की गुहार लगाई। 2 साल तक किसी का जबरदस्ती यौन शोषण, यहाँ तक कि उसके नाते-रिश्तेदारी में कई अन्य महिलाओं का रेप – ये एक साधारण घटना नहीं थी।

1982 बैच के IAS अधिकारी बीबी विश्वास तब बिहार के लेबर विभाग में सोशल सिक्योरिटी के डायरेक्टर थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि मृत्युंजय (तब 27 साल के) ने अपने दोस्तों के साथ मिल कर न सिर्फ उनकी पत्नी का, बल्कि उनकी माँ, दो मेड्स और भतीजी तक के साथ रेप किया। उसने इसके लिए धमकी, लालच, जोर-जबरदस्ती और हिंसा – सभी का सहारा लिया। तब चम्पा विश्वास 30 साल की थीं।

चम्पा विश्वास को 1 बार एबॉर्शन भी कराना पड़ा। अंत में उन्होंने अपना ‘Sterlization’ ही करवा लिया था। कई बार बलात्कार किए जाने के कारण बार-बार गर्भवती होने से बचने के लिए उन्हें ये क़दम उठाने पड़े थे। तब उन्होंने ये भी अंदेशा जताया था कि उनकी भतीजी कल्याणी और दो मेड सर्वेन्ट्स, जो गायब हो गई थीं, उनकी हत्या भी की गई हो सकती है। राज्यपाल ने मामले का संज्ञान लेते हुए गृह मंत्रालय को इस मामले को देखने की सिफारिश की थी।

साथ ही उन्होंने बिहार के तत्कालीन डीजीपी नियाज अहमद को भी इसकी जाँच करने के आदेश दिए। राजद के विधायक रहे मृत्युंजय यादव ने तब लालू यादव पर किताब भी लिखी थी। अगस्त 8, 1998 को भाजपा नेता सुशील कुमार मोदी ने पटना में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर के कहा था कि यहाँ तक कि प्रभावशाली और सम्मानित परिवारों की महिलाएँ भी अब सुरक्षित नहीं हैं और असहाय हैं क्योंकि राजद के गुंडों को लगता है कि वो कुछ भी कर के बच कर निकल जाएँगे।

बीबी विस्वास इतने बड़े अधिकारी होने के बावजूद अपने परिवार को इससे नहीं बचा पाए, ये राजद के गुंडों के प्रभाव के बारे में बताता है। बाद में वो अपने पूरे परिवार के साथ दिल्ली शिफ्ट हो गए थे। चम्पा ने अपने पति के जीवन को खतरा बताते हुए कहा था कि उन्हें काफी बाद में इस मामले के बारे में पता चला। मृत्युंजय की माँ हेमलता यादव भी विधायक रह चुकी थीं और वो ‘बिहार सोशल वेलफेयर एडवाइजरी बोर्ड’ की अध्यक्ष थीं।

तब उन्होंने इन आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि ये उनके और उनकी माँ के खिलाफ साजिश है। साथ ही उन्होंने बीबी विश्वास पर अपनी ड्यूटी ठीक से न निभाने और दफ्तर से गायब रहने तक के आरोप भी लगाए। मोहम्मद नमतुल्लाह तब विधानसभा में राजद के चीफ व्हिप थे। उन्होंने कहा था कि वो हेमलता के परिवार को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं और वो ‘लड़का’ ऐसा नहीं कर सकता।

ये उसी का एक वर्जन था, जब अपने बेटे अखिलेश यादव की सरकार रहते मुलायम सिंह यादव ने बलात्कारियों को लेकर ‘लड़के हैं, गलती हो जाती है‘ वाला बयान दिया था। ये सब तब हो रहा था, जब मृत्युंजय का इतिहास भी ठीक नहीं था। इस घटना से 3 साल पहले भी एक राजनेता की बेटी का यौन शोषण करने के आरोप में उसे गिरफ्तार किया गया था। हेमलता उस वक़्त 8 सालों से लालू यादव की करीबी थीं।

क्या-क्या लगे थे आरोप?

बीबी विश्वास का परिवार पटना के बेली रोड में स्थित सरकारी क्वार्टर में रहता था। चम्पा ने अपनी शिकायत में कहा था कि उनके बगल के क्वार्टर में रहने वाले अधिकारी और उनकी पत्नी उन्हें बुला कर अपने फ्लैट में लेकर गए, जहाँ मृत्युंजय और हेमलता पहले से ही बैठे हुए थे। वहाँ उन लोगों ने चम्पा को मृत्युंजय के साथ अकेले कमरे में बंद कर दिया, जहाँ उसने उनका रेप किया। आरोप है कि इसके बाद हेमलता ने उन्हें धमकाया कि इस घटना के बारे में किसी को भी पता चला तो उनके परिवार के सदस्यों की हत्या कर दी जाएगी और उनके आपत्तिजनक फोटोग्राफ्स सार्वजनिक कर दिए जाएँगे।

एक दिन अचानक से मृत्युंजय फिर अपनी माँ और कुछ लोगों के साथ कैमरा लेकर आ धमका, जहाँ उसने चम्पा के साथ शादी की जिद की। उसकी माँ ने कहा कि मृत्युंजय स्मार्ट है और बड़े परिवार से है, इसीलिए चम्पा को उससे शादी कर लेनी चाहिए। उन लोगों ने चम्पा के पति को बूढ़ा बताते हुए कहा कि हेमलता को मंत्री पद मिलने के बाद उन्हें भी कहीं का अध्यक्ष बना दिया जाएगा। वहाँ उनके साथ फिर बलात्कार किया गया।

शिकायत में बताया गया था कि दिसंबर 1995 में एक बार फिर मृत्युंजय पहुँचा, जहाँ उसने चम्पा विश्वास की माँ को किचेन में देखा। इसके बाद उसने उनका जबरन आलिंगन किया और किस किया। घबराई माँ ने चम्पा से परिवार सहित वो फ़्लैट खाली करने को कहा। इसी तरह उसने चम्पा विश्वास की भतीजी कल्याणी के साथ भी रेप किया। साथ ही वो घर की मेड से कह कर बीबी विश्वास को ड्रग्स दे दिया करता था, ताकि वो बेहोश हो जाएँ।

‘नेशनल ह्यूमन राइट्स कमीशन’ को भेजे गए पत्र में चम्पा ने आरोप लगाया था कि बिहार के एक बहुत बड़े नेता (जंगलराज के मसीहा) ने भी उनके साथ बलात्कार किया। उनका आरोप था कि पुलिस ने भी उनके बयान को हूबहू कोर्ट में पेश नहीं किया और उसमें बदलाव कर दिया। दिल्ली में शिफ्ट होने के बाद परिवार के भीतर ऐसा डर बैठा हुआ था कि उन्होंने 20 बार अपना घर बदला। मृत्युंजय के दोस्तों ने भी चम्पा के साथ बलात्कार किया था।

हालाँकि, 2010 में बिहार के पटना हाईकोर्ट ने हेमलता यादव और मृत्युंजय को चम्पा विश्वास रेप कांड से जुड़े मामले में बरी करते हुए ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया। आरोपित का कहना था कि राजद और भाजपा की लड़ाई में उसे बकरा बनाया गया। उसका कहना था कि सुशील मोदी ने इसे मुद्दा बना दिया, जिससे उसकी ज़िंदगी बर्बाद हो गई, वरना वो दिल्ली के हिन्दू कॉलेज में पढ़ता था और सिविल सर्विसेज की तैयारी कर रहा था। उसने कहा था कि उसके अधिकतर दोस्त अब सिविल सर्विसेज में हैं।

लेकिन, मृत्युंजय यादव ने सितम्बर 2005 में एक ऐसा बयान दिया था, जिसकी चर्चा आवश्यक है। उसने कहा था कि राजद के बड़े नेताओं को बचाने के लिए उसे फँसाया गया। उसने ये भी आरोप लगाया था कि जिस जज ने उसे और उसकी माँ को सजा सुनाई, उसे प्रमोट किया गया। अपनी जान को ख़तरा बताते हुए उसने पूरी जाँच प्रक्रिया को ही भ्रष्ट बता दिया था। उसने आरोप लगाया था कि राजनैतिक लाभ के लिए उसका इस्तेमाल हुआ।

बिहार चुनाव : राहुल का भाषण लीक

बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर चुनावी सरगर्मी तेज हो गई। चुनाव प्रचार को लेकर स्टार प्रचारकों की लिस्ट भी बन गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी बिहार में 6 रैलियां कर सकते हैं। कांग्रेस नेता राहुल की किस चरण में कितनी रैलियां होंगी यह तरीख तय होने के बाद पता चलेगा, लेकिन हम आपको अभी बता दे रहे हैं कि बिहार चुनाव में राहुल गांधी क्या-क्या झूठ बोलने वाले हैं। बिहार चुनाव से पहले राहुल गांधी का भाषण लीक हो गया है। यानि राहुल अपने सलाहकारों द्वारा दिए दिशा-निर्देश और उनके भ्रमित भाषणों पर बोल अपनी और कांग्रेस को जरुरत से ज्यादा नुकसान पहुंचा रहे हैं। इसी आधार पर राहुल के अध्यक्ष बनने पर हो रही चर्चाओं पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कटाक्ष करते कहा था कि "जितनी जल्दी हो राहुल बाबा को अध्यक्ष बनाइए।" राहुल बिहार चुनाव में इन तीन मुद्दे को उठाकर मतदाताओं को बरगलाने की कोशिश करेंगे। 

राहुल का पहला झूठ
प्रधानमंत्री मोदी ने अपने लिए 8000 करोड़ का वीवीआईपी बोइंग 777 प्लेन खरीदा है। करदाताओं के आठ हजार करोड़ रुपये से आरामदायक और आलीशान एयर इंडिया का जहाज खरीदा गया है। जबकि सच्चाई यह है कि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और अन्य वीवीआईपी के लिए अमरीकी राष्ट्रपति के विशेष विमान एयरफोर्स वन की तर्ज पर मिसाइल हमले से बचने जैसे सिक्यॉरिटी फीचर्स से सुसज्जित दो एयर इंडिया वन (बोइंग 777) विमान तैयार करवाए गए हैं। एक अनुमान है कि इन दोनों विमानों की कीमत करीब 8000 करोड़ रुपये है। इस तरह से एक विमान की कीमत करीब 4000 करोड़ रुपए है। प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति किसी भी पार्टी से चुनकर बनेंगे, इसका इस्तेमाल करेंगे।

दूसरा झूठ
बिहार चुनाव में राहुल गांधी चीन का मुद्दा जरूर उठाएंगे। राहुल गांधी हर रैली में इस बात का जिक्र करेंगे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते हैं कि हिंदुस्तान की जमीन किसी ने नहीं ली, लेकिन चीन ने हमारी 1000 वर्ग किलोमीटर जमीन हड़प ली है। जबकि राहुल गांधी को मालूम है कि चीन ने भारत के हजारों वर्गकिलोमीटर जमीन पर तब कब्जा किया था जब उसके नाना जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। क्या राहुल यह भूल गए कि 1962 के युद्ध में इसी चीन के हाथों भारत की शर्मनाक पराजय हुई थी और हिन्दी-चीनी भाई-भाई के माओत्से तुंग और नेहरू के नारे के बीच चीन ने हमला कर हजारों वर्गमील भारतीय क्षेत्र पर कब्जा कर लिया था।

तीसरा झूठ
इसके साथ ही राहुल अपनी रैली में किसानों से जुड़ा मुद्दा उठाएंगे। राहुल रैली को संबोधित करते हुए कहेंगे कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कहते है कि किसान अपना माल कहीं भी बेच सकता है। जब सड़क नहीं होगी तो कहां जाएगा, कैसे जाएगा किसान? सड़क बनी मंडी टैक्स से और मंडी टैक्स आपने खत्म कर दिया, मतलब सड़कों को आपने खत्म कर दिया। जबकि सच्चाई यह है कि आजादी के 60 साल बाद भी देश के किसान आत्महत्या करने को मजबूर थे और प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों के कारण उनकी आमदनी में काफी वृद्धि हुई है। इसके साथ ही सड़क बनाने से मंडी टैक्स को कोई लेना देना नहीं है।

राहुल गांधी पहले भी कई बार झूठ का सहारा ले चुके हैं:-

जीएसटी पर देश से बोला झूठ
यूपीए के दस वर्षों के शासन में कांग्रेस पार्टी जीएसटी को लेकर तमाम राज्यों के बीच आम राय नहीं बना पाई थी, क्योंकि उसका जीएसटी को लेकर कोई साफ रुख नहीं था। 2014 में जब प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार बनी तो उसने नए सिरे से जीएसटी को लेकर कवायद शुरू की और सभी राज्य सरकारों के बीच इसे लेकर सहमति बनाई। हालांकि राहुल गांधी ने कहा कि उन्होंने सहमति नहीं दी थी, लेकिन हकीकत ये है कि कांग्रेस की सभी राज्य सरकारों ने जीएसटी का समर्थन किया और संसद के दोनों ही सदनों में कांग्रेस ने जीएसटी पास करवाने के लिए पक्ष में वोटिंग भी की थी।

नोटबंदी पर देश से बोला झूठ
राहुल गांधी ने कहा कि संघ परिवार के एक विचारक ने प्रधानमंत्री मोदी को नोटबंदी का विचार दिया था। राहुल गांधी का यह बयान सरासर झूठा है। सच्चाई यह है कि देश को भ्रष्टाचार से मुक्त करने और कालाधन पर लगाम लगाने के लिए मोदी सरकार ने काफी गहन विचार-विमर्श के बाद नोटबंदी का ऐलान किया था। रिजर्व बैंक के पूर्व डिप्टी गवर्नर आर गांधी भी कह चुके हैं कि नोटबंदी का पहला विचार फरवरी 2016 में आया था और सरकार ने विमुद्रीकरण के बारे में रिजर्व बैंक की राय मांगी थी। आरबीआई के तत्कालीन गवर्नर रघुराम राजन ने पहले तो सरकार को मौखिक रूप से इस पर राय दी। बाद में एक विस्तृत नोट बनाकर सरकार को भेजा गया जिसमें स्पष्ट तौर पर बताया गया कि नोटबंदी की खामियां और खूबियां क्या-क्या हैं। इसके बाद पूरी तैयारी के साथ 8 नवंबर, 2016 को नोटबंदी का ऐलान किया गया था।

रायबरेली पर देश से बोला झूठ
राहुल गांधी कहते रहे हैं कि मोदी सरकार आने के बाद से रायबरेली के साथ भेदभाव किया जाता रहा है, लेकिन सच्चाई यह है कि यूपीए के जमाने में राजीव गांधी के नाम पर रायबरेली में जो पेट्रोलियम यूनिवर्सिटी स्थापित की गई थी उसे पांच वर्षों के दौरान यूपीए सरकार ने महज 1 करोड़ रुपये दिए थे। जबकि मोदी सरकार ने पहले दो वर्षों में इस यूनीवर्सिटी के लिए 360 रुपये देकर इसे एक संस्थान के रूप में विकसित किया। इतना ही नहीं रायबरेली में स्थित इंडियन टेलीकॉम इंडस्ट्रीज नाम का संस्थान बंद होने के कगार पर था और वहां अफसरों को वेतन तक नहीं मिल पा रहा था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार ने इस संस्थान को 500 करोड़ आवंटित कर जीवनदान दिया और 1100 करोड़ रुपये का आर्डर भी दिलाया।

महंगाई पर देश से बोला झूठ
राहुल ने पिछले वर्ष गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान ट्विटर पर लिखा “जुमलों की बेवफाई मार गई, नोटबंदी की लुटाई मार गई, GST सारी कमाई मार गई बाकी कुछ बचा तो – महंगाई मार गई… बढ़ते दामों से जीना दुश्वार, बस अमीरों की होगी भाजपा सरकार?” राहुल गांधी ने इस सवाल के साथ एक इन्फोग्राफिक्स भी पोस्ट किया है। इसमें उन्होंने गैस सिलिंडर, प्याज, दाल, टमाटर, दूध और डीजल के दामों का हवाला देकर 2014 और 2017 के दामों की तुलना में सभी चीजों के दामों में वास्तविक दामों से सौ प्रतिशत अधिक की बढ़ोतरी दिखा दी। जैसे ही राहुल गांधी ने ये ट्वीट किया, लोगों ने इस चालाकी को पकड़ लिया और फिर शुरू हो गई राहुल की खिंचाई।

महिला साक्षरता के आंकड़े पर बोला झूठ
राहुल गांधी ने गुजरात विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान पिछले वर्ष 3 दिसंबर को “22 सालों का हिसाब, गुजरात मांगे जवाब” अभियान के तहत प्रधानमंत्री मोदी से महिला सुरक्षा, पोषण और महिला साक्षरता से जुड़ा सवाल पूछा था, लेकिन इस सवाल के साथ राहुल ने जो इन्फोग्राफिक्स पोस्ट किया था उसमें गुजरात की महिला साक्षरता के उल्टे आंकड़े दिखाए थे। इन आंकड़ों में दिखाया गया था कि 2001 से 2011 के बीच गुजरात में महिला साक्षरता दर में 70.73 से गिरकर 57.8 फीसदी हो गई है।

राहुल गांधी ने जो आंकड़े दिखाए थे वे सरासर गलत थे। गुजरात में महिला साक्षरता की सच्चाई इसके उलट है। सही आंकड़ों के मुताबिक गुजरात में 2001 से 2011 के बीच महिला साक्षरता में 12.9 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। यह वृद्धि 1991 से 2001 के बीच हुई 8.9 फीसदी बढ़ोतरी से काफी ज्यादा है। इतना ही नहीं इस दौरान राष्ट्रीय स्तर पर हुई साक्षरता वृद्धि से भी ये काफी ज्यादा है।

लोकसभा सदस्यों की संख्या पर बोला झूठ
वर्ष 2017 के सितंबर में राहुल गांधी जब अमेरिका की एक यूनिवर्सिटी में छात्रों को संबोधित कर रहे थे, तो उन्होंने लोकसभा में कुल सदस्यों की संख्या ही 546 बता डाली। जबकि सच्चाई यह है कि लोकसभा में कुल सदस्यों की संख्या 545 है, इनमें से 543 को जनता चुनती है और दो सदस्य (ऐंग्लो-इंडियन) मनोनित किए जाते हैं। आप ही बताइए जो शख्स इतने वर्षों से लोकसभा का सदस्य है, उसे लोकसभा के सदस्यों की संख्या तक नहीं पता है।

इंदिरा कैंटीन को बताया अम्मा कैंटीन
कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरु में इंदिरा कैंटीन योजना की लॉन्चिंग में भी राहुल गांधी के ज्ञान पर सवाल उठ गए। पहली बार में उन्होंने योजना का नाम ही गलत बता दिया। जबकि यह योजना उनकी दादी यानी इंदिरा गांधी के नाम पर शुरू हो रही थी, लेकिन राहुल गांधी ने उसे तमिलनाडु में जयललिता के नाम पर चलने वाली अम्मा कैंटीन बता दिया। हालांकि, बाद में उन्हें भूल का अंदाजा हुआ और उन्होंने गलती सुधारने की कोशिश की। लेकिन जिस व्यक्ति में सामान्य ज्ञान का इतना अभाव है उससे क्या उम्मीद की जा सकती है?

महाभारत काल पर झूठ


जिस व्यक्ति को जनेऊ पहनने की तमीज ही न हो कि जनेऊ कोट के ऊपर नहीं पहना जाता, उसे क्या मालूम महाभारत को कितना समय हो गया और यह किस युग में हुई थी। इसीलिए राहुल को पप्पू कहा जाता है। हिन्दू नाम रखने से कोई हिन्दू नहीं बन जाता। दादा फ़िरोज़ जहांगीर मुसलमान, दादी इंदिरा गाँधी मुसलमान, इंदिरा का इस्लामिक नाम है मैमुना बेगम। माँ सोनिया गाँधी ईसाई।  

राहुल गांधी की हरकतें बतातीं हैं कि वे झूठे प्रचार के जरिए और निराधार खबरें फैला कर सत्ता के शीर्ष पर पहुंचने को आतुर हैं। इसी क्रम में वे कई बार खुद के ‘अज्ञानी’ होने का भी सबूत दे देते हैं। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के इस ट्वीट को देखिए-

दरअसल अपने ट्वीट में महाभारत काल का उदाहरण दे रहे हैं और इसे 1000 साल पहले की घटना बता रहे हैं। साफ है कि इस ट्वीट से एक बात साबित हो जाती है कि राहुल गांधी न सिर्फ झूठ फैलाते हैं बल्कि वे अज्ञानी भी हैं। कौरव-पांडव की बात करने वाले राहुल को ये भी नहीं पता है कि महाभारत काल पांच हजार वर्ष से अभी अधिक पुराना है। इस ट्वीट से ये भी पता लग जाता है कि लोग उन्हें गंभीरता से क्यों नहीं लेते हैं?

बिहार चुनाव : वो 40+ सीटें, जहाँ ओवैसी कर सकते हैं खेल

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जैसाकि पिछले लेख में बिहार में होने वाले चुनावों में असदउद्दीन ओवैसी दलित-मुस्लिम कार्ड खेलने की रणनीति बना चुके हैं, अब चुनाव घोषित होने पर उसे अमली जामा पहनाने मैदान में उतर रहे हैं। हिन्दू इतना मूर्ख है कि वो हिन्दू विरोधियों द्वारा हिन्दुओं को विभाजित करने के जाति चक्रव्यू में फंसा कर अपना खेल खेल रहे हैं, कोई यादव, कोई भूमिहर, दलित, आदिवासी, ब्राह्मण, कायस्थ, अनुसूचित जनजाति, पूर्वी, उत्तराखंडी, बंगाली और बिहारी आदि में फंसे रहते हैं, हमारी इन जातियों को विभाजित कर सियासत कर रहे हैं। जबकि हिन्दुओं को यह नहीं मालूम कि मुसलमानों में हिन्दुओं से अधिक जातियां हैं। इनमें इतनी कट्टरपंथी है कि एक दूसरे की मस्जिद में नमाज़ और एक दूसरे के कब्रिस्तान में मुर्दा तक दफ़न नहीं कर सकते 
लेकिन इस्लाम के नाम पर सब एक रहते हैं
। चुनावों में एकजुट होकर वोट देते हैं, जबकि हिन्दू अपनी जाति को महत्व देता है, यही कारण है कि सियासतखोर हिन्दुओं की इस कमजोरी का फायदा उठाकर इन्हें विभाजित करने का खेल खेलते रहते हैं। और इस विभाजित गंदे खेल में मुस्लिम पार्टियां ही नहीं सारी पार्टियां जिम्मेदार हैं। इस खतरनाक खेल को समाप्त करने के लिए समस्त हिन्दुओं को एकजुट होना पड़ेगा, जो एक असंभव काम है।     

राजनीति की प्रयोगशाला कहलाने वाले बिहार में चुनावों का दौर फिर से शुरू हो चुका है। ऐसे में चुनावी अटकलें लगेंगी, आंकलन होंगे, जातियों के आधार पर वोट बैंक के बनने और बिगड़ने की भी बातें होंगी। जो एक बात नहीं होगी, वो होगी मुहम्मडेन राजनीति की चर्चा!

ऐसा इसलिए है क्योंकि आमतौर पर मुसलमानों को एक संगठित वोट बैंक मानकर ही आंकलन किए जाते हैं। बदलते चुनावी परिदृश्य ने एक बार फिर से इस सिस्टम को चुनौती दे दी थी। अफ़सोस कि अभी भी तथाकथित चुनावी विश्लेषक इस एम-फैक्टर पर ध्यान नहीं देते।

जब पिछले लोकसभा चुनावों में असदउद्दीन ओवैसी की हैदराबाद के हिंसक, मजहबी कट्टरपंथी रजाकारों से जन्मी एआईएमआईएम ने बिहार चुनावों में पैर जमाने शुरू किए थे, तभी से इस बदलाव की आहट सुनाई देने लगी थी।

बंगाल और नेपाल की सीमाओं से सटे, बिहार के किशनगंज जिले की ख़ास बात यह है कि ये बिहार का इकलौता मुहम्मडेन बहुल (करीब 68 प्रतिशत) इलाका है। लोक सभा सीट के लिहाज से देखें तो यहाँ से कभी जनसंघ या भाजपा नहीं जीती है। 1952 से ही यहाँ तथाकथित “सेक्युलर” पार्टियों के उम्मीदवार जीतते रहे हैं। इस सीट से 8 बार कॉन्ग्रेस, 3 बार समाजवादी, एक बार जनता दल और 3 बार राजद के अलावा केवल एक बार एक निर्दलीय ने जीत दर्ज की थी।

पिछले उप-चुनावों में जब यहाँ से कॉन्ग्रेस के विधायक मोहम्मद जावेद के लोकसभा जाने की वजह से कॉन्ग्रेस ने जावेद की अम्मा सईदा बानू को उतारा तो उसे लग रहा था कि वही जीतेगी। इस बार उनका मुकाबला असदउद्दीन ओवैसी के उतारे कमरुल होदा से भी था। जब देश का ध्यान महाराष्ट्र और हरियाणा के चुनावों पर था, तभी यहाँ से करीब 70000 वोट के साथ एआईएमआईएम के उम्मीदवार ने फतह पाई। कॉन्ग्रेस को केवल 25000 के लगभग वोट मिले थे।

अगर केवल आबादी के लिहाज से देखें तो ओवैसी की सांप्रदायिक पार्टी के लिए यहाँ उपजाऊ जमीन है। किशनगंज (करीब 68%), कटिहार (करीब 45%), अररिया (करीब 43%) और पुर्णिया (करीब 39%) में कम से कम 20 सीटें ऐसी हैं, जहाँ से ओवैसी की पार्टी के उम्मीदवार जीत सकते हैं।

ओवैसी की पार्टी अगर छोटी पार्टियों से गठबंधन करे और अपना दलित-मुस्लिम कार्ड हमेशा की तरह खेले तो उसके उम्मीदवार इन क्षेत्रों में कम से कम 40 सीटों पर स्थापित क्षेत्रीय/राष्ट्रीय पार्टियों को कड़ी टक्कर देंगे। भाजपा के गिरिराज सिंह जैसे नेताओं के बयानों पर खेल कर उसे और भी फायदा हो सकता है।

                                                       हिंदू-मुस्लिम आबादी और रफ्तार
अगर हम इसके साथ जोड़कर आबादियों के बढ़ने का तुलनात्मक अध्ययन करें तो एक चीज़ बहुत स्पष्ट हो जाती है। हिन्दुओं की आबादी बढ़ने की (दशक में) रफ़्तार जहाँ 2001 में 19.92% और 2011 में 16.76% थी, वहीं मुस्लिम आबादी के बढ़ने की रफ़्तार 2001 में 29.52% और 2011 में 24.6% रही।

आबादी के बढ़ने के क्रम में इस बदलाव से युवा वोटरों की संख्या में जो बदलाव हुए होंगे, संभवतः चुनावी विश्लेषक जमातों ने इसका कोई अंदाजा नहीं लगाया। ऐसा भी हो सकता है कि सेकुलरिज्म का झंडा उठाने के लिए इस तथ्य को दबा दिया गया हो। पक्का कहा नहीं जा सकता।

अंततः इन बदलावों का असर सामाजिक संरचना पर पड़ा, और फिर साथ ही साथ इसका असर स्थानीय राजनीति में भी नजर आने लगा। जो स्थानीय मुद्दे थे, वो धीरे-धीरे बदलने लगे। प्रतिनिधित्व का सवाल भी बदलने लगा।

बदलाव की शुरुआत देखें तो इसके लिए थोड़ा पीछे के भागलपुर दंगों (1989) का दौर देखना होगा। इन दंगों के वक्त बिहार में कॉन्ग्रेस की सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की सरकार थी और भागलपुर से भी कॉन्ग्रेस जीतती थी। इन दंगों के बाद पच्चीस साल तक कॉन्ग्रेस यहाँ से जीत नहीं पाई। आज की तारीख में भी स्थिति बहुत बदली नहीं है। करीब एक पीढ़ी गुजर जाने के बाद भी लोगों को वो दंगे याद हैं।

दंगों के गुजर जाने के काफी वक्त बाद 2006 में नीतीश कुमार की सरकार ने भागलपुर दंगों की जाँच के लिए जस्टिस एनएन सिंह इन्क्वायरी कमीशन का गठन किया। करीब दस साल बाद जब इस कमीशन ने अपनी रिपोर्ट दी तो दंगों में नाकाम होने का पूरा दोष सत्येन्द्र नारायण सिन्हा की कॉन्ग्रेसी सरकार और स्थानीय प्रशासन की विफलता पर डाला गया। जाहिर है इससे आम लोगों में कोई संतोष की लहर तो नहीं ही दौड़ी।

पिछले चुनावों में बिहार की विधानसभा में कुल 23 मुहम्मडेन विधायक चुनकर पहुँचे थे। अगर आबादी के हिस्से के लिहाज से देखें तो ऐसे ही ये गिनती कम है। ऊपर से बिहार के करीब 56% मुहम्मडेन मतदाता ओबीसी समुदाय के हैं और जीतने वालों में एक बड़ी गिनती (9) शेख, और कुल्हैया (5) की थी।

अवलोकन करें:-

बिहार : ओवैसी की मुस्लिम-यादव चाल को RJD ने कहा – ‘वोट कटवा’
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
बिहार : ओवैसी की मुस्लिम-यादव चाल को RJD ने कहा – ‘वोट कटवा’
जैसे-जैसे बिहा

जाहिर है ऐसे हाल में बिहार का मुहम्मडेन, प्रतिनिधित्व के लिए बाहर की तरफ देखना भी शुरू कर सकता है। ओवैसी का बिहार आना राजनीति की प्रयोगशाला के लिए एक नया प्रयोग होगा।

बिहार : ओवैसी की मुस्लिम-यादव चाल को RJD ने कहा – ‘वोट कटवा’

जैसे-जैसे बिहार चुनाव निकट आ रहे रहे हैं, सरगर्मी भी तेज हो गयी है। एआईएमआईएम के मुखिया असदुद्दीन ओवैसी ने सितम्बर 19 को पटना में प्रेस वार्ता करते हुए बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर एक अहम ऐलान किया। उन्होंने बताया कि एआईएमआईएम और पूर्व केन्द्रीय मंत्री देवेन्द्र यादव की पार्टी समाजवादी जनता दल गठबंधन बना कर बिहार विधानसभा चुनाव लड़ेंगे।

इस गठबंधन का नाम यूडीएसए (यूनाइटेड डेमोक्रेटिक सेक्युलर अलायन्स) तय किया गया है। आगामी 24 सितंबर तक सीटों के चयन पर निर्णय लिया जाएगा। 

ओवैसी ने राष्ट्रीय जनता दल (राजद) द्वारा ‘वोट कटवा’ कहे जाने के सवाल पर भी अपना पक्ष रखा। ओवैसी ने कहा:

“जितने लोग हमें वोट कटवा कहते हैं, वह 2019 के लोकसभा चुनावों में अपना हश्र याद कर सकते हैं। चुनावों में उन तथाकथित ठेकेदारों का क्या हुआ था, यह बात हम सभी जानते हैं। ऐसा नहीं हो सकता कि मुस्लिम मत किसी एक ही राजनीतिक दल का एकाधिकार हो। मुझे तो यह बात समझ नहीं आती है कि कोई नेता मुस्लिम मतों पर किस अधिकार से दावा करता है। असल मायनों में अगर कोई भाजपा की जीत के लिए ज़िम्मेदार है, तो वह राजद है।” 

ओवैसी पर पूर्व से ही 'वोट कटवा' का आरोप लगता रहा है। फिर ओवैसी ने कहा कि लोग उन पर ऐसा आरोप लगाते हैं कि वो एक धर्म की राजनीति करते हैं जबकि यह सरासर गलत है। इसके बाद ओवैसी से अलकायदा के 9 संदिग्ध सदस्यों की गिरफ्तार पर सवाल किया गया। इस सवाल का जवाब देते हुए ओवैसी ने कहा यह कार्रवाई जाँच एजेंसी एनआईए ने की है, बहुत जल्द पूरी बात सामने आएगी कि वह कौन लोग हैं।

 राजद द्वारा अहमियत नहीं दिए जाने पर ओवैसी ने कहा, “हम तो ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार हैं लेकिन बिहार की आम जनता यह बखूबी समझती है कि कौन किसे भाव दे रहा है। इस चुनाव में भी नतीजे आने पर सब कुछ साफ़ हो जाएगा।” 

इसके बाद समाजवादी जनता दल के अध्यक्ष देवेन्द्र यादव ने भी प्रेस वार्ता में कई बातें कहीं। उन्होंने कहा कि बिहार में विपक्ष पूरी तरह निष्क्रिय है, वह अपनी ज़िम्मेदारी सही से नहीं निभा रहा है। मज़दूरों को पलायन करना पड़ता है, राज्य में बेरोज़गारी चरम पर है, लोग रोज़गार के लिए दूसरे राज्यों की तरफ जाते हैं।

देवेन्द्र यादव के अनुसार बीते कई सालों से बिहार की फैक्ट्रियाँ और मिलें बंद पड़ी हैं, उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है। पिछले 3 दशकों में जितने भी राजनीतिक दल सत्ता में आए, सभी ने बिहार का हाल बेहाल ही किया है। बिहार में बहुत कुछ सुधारने की ज़रूरत है और यह तभी संभव होगा जब जनता चाहेगी।