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‘घुसपैठियों को खुश करना बंद करो’: कर्नाटक हाई कोर्ट की दो टूक, अवैध बांग्लादेशियों की पोल खोलने वाले डॉक्टर पर FIR करने पर पुलिस को फटकार

कर्नाटक हाई कोर्ट (फोटो साभार : Bar & Bench
कर्नाटक हाई कोर्ट ने अवैध बांग्लादेशी की पहचान कराने वाले डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता डॉ नागेंद्र के खिलाफ दर्ज 2 आपराधिक मामलों पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने दोनों मामलों की आगे की जाँच पर अंतरिम रोक लगा दी है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने राज्य पुलिस और गृह विभाग के कामकाज पर सवाल उठाए।

कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि घुसपैठियों को रोकने पर ध्यान दिया जाना चाहिए, न कि ऐसे लोगों को संरक्षण देने पर। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को पहली नजर में आपराधिक प्रक्रिया के दुरुपयोग का मामला माना है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 6 अगस्त 2026 को होगी।

डॉक्टर ने दी थी घुसपैठियों की जानकारी

 याचिकाकर्ता डॉ नागेंद्र की ओर से अदालत में बताया गया कि वह पेशे से डॉक्टर और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। वह लंबे समय से बेंगलुरु में रह रहे कथित अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों की पहचान करने में पुलिस की मदद कर रहे थे।

वकील ने बताया कि 22 जुलाई 2026 को डॉ नागेंद्र ने जाँच अधिकारी को बांग्लादेशी घुसपैठियों की मौजूदगी की जानकारी दी थी। यह सूचना विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (FRRO) को भी भेजी गई। लेकिन इसके कुछ ही मिनट बाद घटनाक्रम पूरी तरह बदल गया।

15 मिनट बाद डॉक्टर के खिलाफ दर्ज हो गई FIR

कोर्ट में बताया गया कि FRRO को सूचना भेजे जाने के करीब 15 मिनट बाद ही एक कथित अवैध प्रवासी ने डॉ नागेंद्र के खिलाफ मारपीट की शिकायत दर्ज करा दी। इतना ही नहीं, उसी दिन बाद में डॉ नागेंद्र की ओर से की गई दूसरी शिकायत के बाद भी दूसरे थाने में उनके खिलाफ एक और आपराधिक मामला दर्ज कर लिया गया। उन्हें गिरफ्तार किया गया, न्यायिक हिरासत में भेजा गया और अगले ही दिन जमानत मिल गई।

सुनवाई के दौरान जस्टिस एम नागप्रसन्ना ने पूछा कि यदि कोई व्यक्ति घुसपैठियों की जानकारी देता है तो उसी घुसपैठी की शिकायत के आधार पर उसके खिलाफ मामला कैसे दर्ज किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि शिकायत में खुद बांग्लादेश का पता दर्ज है। ऐसे में पुलिस ने बिना प्रारंभिक जाँच के एफआईआर कैसे दर्ज कर ली। कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए।

‘घुसपैठ रोकिए, दूसरी बातों में समय मत गँवाइए’

सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य के गृह विभाग की कार्यप्रणाली पर भी नाराजगी जताई। कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले अवैध घुसपैठ को नियंत्रित किया जाए। कोर्ट ने कहा कि अगर पुलिस इस तरह अवैध प्रवासियों के पक्ष में काम करेगी तो यह देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन सकता है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्था को किसी भी हालत में बढ़ावा नहीं मिलना चाहिए।

विशेष लोक अभियोजक बीएन जगदीश ने अदालत को बताया कि जिन लोगों को अवैध प्रवासी बताया गया है, उन्हें पहले ही FRRO के सामने पेश किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि फिलहाल उन लोगों को डिटेंशन सेंटर में रखा गया है। अभियोजन पक्ष का कहना था कि शिकायतकर्ता ने डॉ नागेंद्र पर मारपीट का आरोप लगाया है। वहीं कोर्ट ने FRRO को भी मामले में पक्षकार बनाने का निर्देश दिया और उसकी ओर से पूरी स्थिति रिपोर्ट माँगी है।

‘घरों में जगह देने वालों पर भी हो कार्रवाई’

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उन लोगों पर भी चिंता जताई जो बिना वैध दस्तावेज वाले विदेशी नागरिकों को किराए पर मकान देते हैं। कोर्ट ने कहा कि कुछ लोग थोड़े ज्यादा पैसे के लालच में ऐसे लोगों को रहने की जगह दे देते हैं। अगर लालच देश की सुरक्षा पर भारी पड़ने लगे तो यह गंभीर चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि ऐसे मकान मालिकों के खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए।

‘हाथ-पैर काटें तभी लोग करेंगे कानून का पालन’: कर्नाटक हाई कोर्ट, अरब देशों की सख्ती का दिया उदाहरण


कर्नाटक हाई कोर्ट ने सोमवार (1 जून 2026) को रेप के आरोपित 23 वर्षीय इंजीनियरिंग छात्र को जमानत देने से इनकार कर दिया। इस दौरान कोर्ट ने कहा कि भारत में कानून की धार खत्म हो गई है, इसलिए अब लोग कानून का पालन नहीं कर रहे हैं, ऐसे में अगर हाथ-पैर काटे दिए जाएँ तो लोग खुद कानून का पालन करने लगेंगे।

कर्नाटक हाई कोर्ट ने अरब देशों की सख्त सजाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि लोग वहाँ कानून का पालन करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि सजा क्या मिलेगी। वहीं अब भारत में लोगों को कानून का डर नहीं है।

मामले की सुनवाई कर रहे जस्टिस आर नटराज ने कहा, “कानून की धार इसलिए खत्म हो गई है क्योंकि हम अपराधियों के साथ सख्ती से पेश नहीं आते। इसी वजह से अपराध करना बहुत आसान हो गया है। अगर आप किसी का हाथ या पैर काट देंगे, तो शायद लोग कानून का पालन करना सीख जाएँगे। क्योंकि हमारे पास लोकतंत्र है, हर कोई इसका फायदा उठाता है।”

उन्होंने यह भी कहा कि आज अपराध इस तरह किए जा रहे हैं जैसे यह एक सामान्य बात हो। उन्होंने कुछ पश्चिम एशियाई यानी अरब देशों की दंड देने की व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि वहाँ की सख्त सजा लोगों को कानून का सम्मान करने और अपराध करने से पहले सोचने के लिए मजबूर करती है। 

नमक खाओगे तो पानी भी पीना पड़ेगा: कर्नाटक हाई कोर्ट

आरोपित अप्रैल 2026 की शुरुआत से न्यायिक हिरासत में है। बचाव पक्ष की ओर से पेश वकील ने दलील दी कि उनका आरोपित करीब दो महीने से जेल में है और उस पर लगाए गए आरोप वर्ष 2023 की घटना से जुड़े हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि उसने कोई अपराध नहीं किया है।

हालाँकि सुनवाई के दौरान जस्टिस नटराज ने कहा, “अगर नमक खाओगे तो पानी भी पीना पड़ेगा। उसे चार-पाँच दिन और जेल में रहने दो। उसे जेल की आदत हो जाए। कौन जाने, अगर सजा हुई तो फिर से जेल जाना पड़ सकता है।” हाई कोर्ट ने मामले में राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और अगली सुनवाई 8 जून को निर्धारित की है।

सहपाठी ने लगाया था यौन शोषण का आरोप

अभियोजन के अनुसार, आरोपित और शिकायतकर्ता मणिपाल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के छात्र थे और एक-दूसरे को पहले से जानते थे। कुछ रिपोर्टों के मुताबिक, दोनों के बीच पहले संबंध भी रहे थे, लेकिन बाद में युवती ने आरोपित से दूरी बना ली थी। शिकायत के अनुसार, सितंबर 2023 में आरोपित ने बातचीत करने के बहाने युवती को एक अपार्टमेंट में बुलाया।

आरोप है कि वहाँ उसने युवती का यौन शोषण किया। शिकायतकर्ता ने बाद में राष्ट्रीय महिला आयोग (NSW) से संपर्क किया, जिसके बाद पुलिस में औपचारिक शिकायत दर्ज कराई गई और जाँच शुरू हुई।

सुप्रीम कोर्ट आखिर कब तक हिन्दुओं का मजाक बनाती रहेगी? गैर हिंदू नहीं कर सकते चामुंडेश्वरी मंदिर में अनुष्ठान, फिर भी सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी याचिका: बानू मुश्ताक ही रहेंगी दशहरा कार्यक्रम की मुख्य अतिथि

                                              बानू मुश्ताक, सुप्रीम कोर्ट (फोटो साभार: Bharat 24)
मैसूर दशहरा महोत्सव की मुख्य अतिथि बानू मुश्ताक को बनाने के मामले में हिंदुओं को सुप्रीम कोर्ट से भी न्याय नहीं मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें लेखिका बानू मुश्ताक को मैसूर दशहरा उद्घाटन के लिए मुख्य अतिथि बनाया गया।

जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने हिंदू संगठनों की याचिका खारिज कर दी, जो बानू की मुस्लिम पहचान और कथित हिंदू-विरोधी बयानों के आधार पर विरोध कर रहे थे।

ताजे मामले में 19 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता) ने बानू मुश्ताक को मुख्य अतिथि बनाने से रोकने के लिए दायर अपील को खारिज कर दिया। जस्टिस नाथ ने कहा, “इस देश का प्रीएम्बल क्या है? यह राज्य कार्यक्रम है… राज्य कैसे ए, बी और सी में भेदभाव कर सकता है?”

याचिकाकर्ताओं के वकील पीबी सुरेश ने तर्क दिया कि मंदिर में पूजा सेकुलर नहीं है और मुश्ताक के ‘एंटी-हिंदू’ बयान उन्हें अयोग्य बनाते हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा, “हमने तीन बार डिसमिस्ड कहा है, कितनी बार कहें?”

सीजेआई बीआर गवई ने एक दिन पहले ही मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था, लेकिन फैसला याचिकाकर्ताओं के खिलाफ गया। यह फैसला न केवल आस्था को चोट पहुँचाता है, बल्कि यह संकेत देता है कि न्यायपालिका बहुसंख्यक दलीलों को गंभीरता से नहीं ले रही। जस्टिस नाथ और मेहता में से एक भविष्य के सीजेआई हो सकते हैं, जो चिंता बढ़ाता है।

बानू मुश्ताक की उपस्थिति पर क्यों है आपत्ति?

दशहरा हिंदुओं का प्रमुख पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मैसूर का दशहरा उत्सव दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह न केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है, बल्कि एक गहन धार्मिक अनुष्ठान है, जो सदियों से चली आ रही परंपराओं पर आधारित है।

हर वर्ष चामुंडी पहाड़ियों पर देवी चामुंडेश्वरी की पूजा के साथ इसकी शुरुआत होती है, जिसमें मुख्य अतिथि द्वारा दीप प्रज्ज्वलन, फल-फूल अर्पित करना और वैदिक मंत्रों का जाप शामिल होता है। ऐसे में परंपरा के अनुसार, उद्घाटन में शामिल होने वाला व्यक्ति हिंदू आस्था में विश्वास रखने वाला होना चाहिए, क्योंकि यह धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है।

बीजेपी और हिंदू संगठनों का कहना है कि मुस्लिम बानू मुश्ताक को इस धार्मिक अनुष्ठान में शामिल करना हिंदू आस्था का अपमान है। याचिकाकर्ता एच.एस. गौरव ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि मंदिर के भीतर पूजा एक धार्मिक कार्य है, न कि धर्मनिरपेक्ष, और इसे केवल हिंदू ही कर सकते हैं। उनके वकील पी.बी. सुरेश ने यह भी दावा किया कि बानू ने अतीत में हिंदू-विरोधी बयान दिए हैं, जिसके चलते उनकी उपस्थिति आपत्तिजनक है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों को खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट से भी हिंदुओं को नहीं मिला था न्याय

इससे पहले, 15 सितंबर 2025 को कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (चीफ जस्टिस विवु बखरू और जस्टिस सीएम जोशी) ने याचिकाओं को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा कि मुश्ताक एक योग्य महिला हैं, और उनकी भागीदारी संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन नहीं करती। कोर्ट ने कहा, “किसी अन्य धर्म के व्यक्ति की भागीदारी अन्य धर्मों के उत्सवों में संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करती।”

हाई कोर्ट ने जोर दिया कि फैसला एक समिति द्वारा लिया गया, जिसमें विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधि शामिल हैं, और यह कोई धार्मिक संस्था द्वारा नहीं आयोजित है। याचिकाकर्ताओं के वकील एस सुदर्शन ने तर्क दिया कि हिंदू संस्कृति में मूर्ति पूजा महत्वपूर्ण है, और गैर-आस्थावान व्यक्ति को अनुमति देना गलत है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “हम केवल राय पर फैसला नहीं ले सकते।” यह फैसला बहुसंख्यक भावनाओं को नजरअंदाज करता लगता है, जहाँ संविधान की सेकुलर भावना को अल्पसंख्यक पक्ष में इस्तेमाल किया गया।

CJI गवई भी दे चुके हैं हिंदू विरोधी बयान

इस मामले ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के एक पुराने बयान को भी चर्चा में ला दिया। खजुराहो के जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति को ठीक करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा था, “ये पब्लिसिटी का हथकंडा है। जाओ, भगवान विष्णु से कहो कि कुछ करें।”

इस टिप्पणी को हिंदू आस्था का मज़ाक बताकर सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई थी। गवई को बाद में सफाई देनी पड़ी कि उनका इरादा भावनाएँ आहत करना नहीं था।

न्यायपालिका पर उठ रहे सवाल

बानू मुश्ताक प्रकरण ने न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर सवाल उठाए हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि जब शीर्ष अदालतें बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो यह विश्वास की कमी पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में शामिल जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता में से एक के भविष्य में CJI बनने की संभावना है। ऐसे में इस फैसले को हिंदू समुदाय के एक वर्ग ने आस्था के खिलाफ माना है।

अवलोकन करें:-

सुप्रीम कोर्ट की बेंच में CJI गवई एक बौद्ध और दूसरा जज अगस्टीन मसीह, एक ईसाई, फिर हिंदू भगवान विष्ण
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में CJI गवई एक बौद्ध और दूसरा जज अगस्टीन मसीह, एक ईसाई, फिर हिंदू भगवान विष्ण
 

यह विवाद केवल बानू मुश्ताक के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं, और धर्मनिरपेक्षता के बीच संतुलन का सवाल उठाता है। हिंदू समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि उनके त्योहारों को राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश हो रही है।

पूरे देश में लागू हो समान नागरिक संहिता (UCC) : कर्नाटक हाई कोर्ट, कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है


कर्नाटक हाई कोर्ट ने 4 अप्रैल 2025 को संसद एवं राज्य विधानसभाओं से समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 तहत समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने से भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य और आकांक्षाएँ सही मायने में साकार होंगी। 

जस्टिस हंचते संजीवकुमार की एकल पीठ ने कहा कि समान नागरिक संहिता को लागू करने से महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित होगा, सभी जातियों और धर्मों में समानता को बढ़ावा मिलेगा तथा भाईचारे के माध्यम से व्यक्तिगत गरिमा कायम रहेगी। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार भारत में सभी महिलाएँ एक नागरिक के तौर पर समान हैं, लेकिन पर्सनल लॉ उनके साथ भेदभाव करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है। हिंदू कानून के तहत बेटी को बेटे के समान जन्मसिद्ध अधिकार और पत्नी को अपने पति के बराबर दर्जा प्राप्त है। हालाँकि, मुस्लिम कानून के तहत ऐसी समानता नहीं दिखाई देती है। इसलिए, कोर्ट ने कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश हंचते संजीवकुमार ने समान नागरिक संहिता कानून को लेकर संविधान सभा का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि संविधान सभा में भी समान नागरिक संहिता विवाद का एक विषय था। जस्टिस संजीवकुमार ने कहा कि संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था।

न्यायालय ने कहा, “संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अपने सबसे शानदार भाषण में समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क दिया है।” कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस संजीवकुमार ने आगे कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, टी कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी जैसे प्रमुख नेताओं ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था।

इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का भी हवाला दिया। इनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985), सरला मुद्गल (श्रीमती) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (1995) और जॉन वल्लमट्टम और अन्य बनाम भारत संघ (2003) प्रमुख हैं। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने का सुझाव दिया था।

दरअसल, कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अब्दुल बशीर खान नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति बँटवारे को लेकर विवाद हो गया। दरअसल, अब्दुल बशीर ने अपनी मृत्यु से पहले कोई वसीयत नहीं लिखी थी। वे अपने पीछे कई अचल संपत्तियाँ छोड़ गए, जिनमें से कुछ पैतृक थीं तथा कुछ उन्होंने स्वयं अर्जित की थीं।

अब्दुल बशीर की मौत के बाद उनकी संपत्ति के बँटवारे को लेकर उनके बच्चों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। बेटी शहनाज़ बेगम की मौत के बाद उनका प्रतिनिधित्व उनके शौहर सिराजुद्दीन मक्की (प्रतिवादी) ने किया। मक्की ने आरोप लगाया कि उन्हें संपत्ति के बँटवारे से बाहर रखा गया और उसमें से उन्हें उचित हिस्सा नहीं दिया गया। इसको लेकर मक्की ने बेंगलुरु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

नवंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने माना कि विचाराधीन तीन संपत्तियाँ संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा हैं और शहनाज़ बेगम उन में पाँचवें हिस्से की हकदार हैं। हालाँकि, ट्रायल कोर्ट ने अन्य संपत्तियों को बँटवारा योग्य नहीं बताया। ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट अब्दुल बशीर के दो बेटों- समीउल्ला खान और नूरुल्ला खान तथा बेटी राहत जान (अपीलकर्ता) ने कर्नाटक हाई कोर्ट में अपील दायर की।

इधर, सिराजुद्दीन मक्की ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आपत्ति दायर की, जिसमें अपने हिस्से को बढ़ाने या पहले के आदेश में संशोधन की माँग की गई। हाई कोर्ट ने दोनों पक्ष की याचिकाओं को स्वीकार किया और अपील एवं आपत्ति याचिका, दोनों पर एक साथ सुनवाई की। तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

मीलॉर्ड क्या आपने भी इस्लामियों को भड़काया?

90 के दशक में रजनी कांत और हेमा मालिनी अभिनीत फिल्म 'अंधा कानून' आयी थी, फिल्म को बैन होने से बचाने के लिए अमिताभ बच्चन को विशेष कलाकार के रूप में इसलिए लिया था, क्योकि अमिताभ की राजीव गाँधी से दोस्ती ही नहीं बल्कि गाँधी परिवार से पारिवारिक सम्बन्ध थे। इसी कारण इमरजेंसी में मारधाड़ की फिल्मे बैन होने के कारण मारधाड़ वाली 'शोले' फिल्म में लिया गया, इसी कारण फिल्म सफल हुई थी। 

खैर, नूपुर शर्मा के विषय में जुलाई 1 को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान नूपुर की तरह मीलॉर्ड फिसल गए, जिससे इस्लामिक कट्टरपंथियों को ऑक्सीजन मिल गयी। ज्ञानवापी मुद्दा दब गया, नूपुर ने किस इस्लामिक किताब के हवाले से बोला, दब गया, क्यों? 

ये वही अदालत है जो याकूब मेनन के लिए आधी रात में खुल जाती है। क्या किसी अन्य अपराधी को मिली फांसी के लिए आधी रात नहीं, बल्कि 8 बजे के बजे के बाद खुल सकती है। दिल्ली की जहांगीरपुरी में बुलडोजर एक घंटे में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा रोक दिया जाता है। जब निकिता तोमर पर गोली चली... वीडियो पूरे देश की मीडिया ने दिखाया..लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया। 

सीनियर एडवोकेट मंजीत सिंह के माध्यम से नूपुर शर्मा ये अपील करने गई थीं कि पूरे भारत की कई अदालतों में उनके खिलाफ केस दायर किए गए हैं अगर उन केस की प्रकृति एक ही है तो उसे दिल्ली कोर्ट में ही ट्रांसफर कर दिया जाए क्योंकि मेरी जान को खतरा है । 

-सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ ऑर्डर में यही लिखा... प्ली डिस्मिस यानी याचिका खारिज । लेकिन जो ऑब्जरवेशन माननीय सुप्रीम कोर्ट ने दिए हैं वो संविधान में राइट टू इक्वेल प्रोटेक्शन और राइट टू लाइफ के मापदंडों पर सही नहीं ठहरते हैं । 

- नूपुर शर्मा के वकील की तरफ से अदालत को ये कहा गया कि अर्णब गोस्वामी के खिलाफ भी अलग अलग अदालत में मामले थे लेकिन उसको एक जगह किया गया था । इस पर जस्टिस ने जवाब दिया कि वो एक पत्रकार हैं उनकी बात अलग है । हमारा सवाल ये है कि क्या कोई पत्रकार स्पेशल सिटिजन होता है ? क्या किसी पत्रकार को संविधान ने आम इंसान से ज्यादा अधिकार दिए हैं ?

-इसके बाद नूपुर शर्मा के वकील की तरफ से ये तर्क दिया गया कि सत्येंद्र सिंह भसीन एक पत्रकार नहीं बिजनेसमैन थे उनके खिलाफ दर्ज तमाम केसों को भी आपने एक जगह क्लब करवाया था ? इस पर जस्टिस ने कहा कि उनकी अंतरात्मा नूपुर के केस को एक जगह क्लब करने के लिए राजी नहीं हो रही है । हमारा सवाल ये है कि क्या देश जस्टिस साहब की अंतरात्मा से चलेगा ? या फिर संविधान से चलेगा ? क्या माई लॉर्ड जो सोचेंगे वही देश का कानून मान लिया जाएगा ?

- जस्टिस ने एक और बात कही कि उदयपुर में जो हत्या हुई उसके लिए भी नूपुर शर्मा  ही जिम्मेदार हैं ! अब तक क्रिमिनल लॉ के मुताबिक किसी भी क्राइम के लिए थर्ड पर्सन जिम्मेदार नहीं होता है । जिसने अपराध किया उसी को सजा मिलती है । जैसे अगर किसी कार से एक्सिडेंट हुआ तो सजा ड्राइवर को मिलेगा साथ में बैठी सवारी को नहीं । इसे प्रिंसिल ऑफ वायकेरियस रिस्पॉन्सिबिलिटी कहा जाता है । लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने क्या अब इस पुराने क्रिमिनल लॉ को खारिज कर दिया है ? ये उनको अब स्पष्ट करना चाहिए ।

-जज साहब ने किसी भी जिहादी पर कोई टिप्पणी नहीं की । रहमानी के भड़काऊ बयानों के खिलाफ उनकी आवाज नहीं निकली । सड़कों पर सिर तन से जुदा के नारे लगाए गए । कलेक्टर के सामने पुलिस के सामने सिर काटने की धमकियां दी गईं । उस पर भी जज साहब कुछ नहीं बोले । बल्कि उन्होंने न्यूज चैनल के एंकर के खिलाफ बातें कहीं । 

-जज साहब ने कहा कि जब काशी का मामला सबज्यूडिश है तो उस पर टीवी पर डिबेट क्यों करवाई जा रही थी? तो अब सुप्रीम कोर्ट को ये भी साफ कर देना चाहिए कि क्या जो मामला सबज्यूडिस होगा उस पर अब देश में किसी भी बहस पर रोक लगा दी जाएगी ? 

- ये सब बातें न्यूज चैनलों और अखबारों के माध्यम से जानकारी में आई हैं और इनको सुप्रीम कोर्ट का ऑब्जर्वेशन बताया गया है । और ऊपर वर्णित विचार जयपुर डॉयलॉग्स यूट्यूब चैनल के संचालक संजय दीक्षित जी के हैं। 

- स्वयं अलकायदा ने नूपुर शर्मा को धमकियां दी थीं लेकिन उस पर भी सुप्रीम कोर्ट के द्वारा कोई नोटिस नहीं लिया गया और नूपुर शर्मा को जिहादियों की भीड़ के सामने फेंक दिया गया है। 

- एक महिला जिसकी हत्या के लिए दुनिया भर से हत्या के फरमान निकाले जा रहे हैं और जिसका समर्थन के आरोप में एक शख्स की बेरहमी से हत्या कर दी गई । क्या उस महिला के प्रति जज साहब के हृदय में कोई भी सहानुभूति नहीं है ? 

-  ये वही अदालत है जो याकूब मेनन के लिए आधी रात में खुल जाती है। दिल्ली की जहांगीरपुरी में बुलडोजर एक घंटे में सुप्रीम कोर्ट के द्वारा रोक दिया जाता है। जब निकिता तोमर पर गोली चली... वीडियो पूरे देश की मीडिया ने दिखाया..लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया । 

-क्या पूरा देश ही कश्मीर बनने की तरफ अग्रसर नहीं हो रहा है ? 

सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों ने नुपूर शर्मा को निश्चित तौर पर ईशनिंदा करने वाला घोषित कर दिया है। ये वही न्यायालय है जिन्होंने कभी गर्व से कहा था कि असहमति ही लोकतंत्र का सुरक्षा कवच है। आज उसी कोर्ट के जजों ने नुपूर शर्मा और उनके कथन को कन्हैया लाल की हत्या का जिम्मेदार बता दिया। साथ ही कुछ हद तक वैसे इस्लामवादियों की तरह अपनी टिप्पणी दी जो खुद के कृत्यों के लिए महिला को ही जिम्मेदार बताते हैं। कोर्ट के जस्टिस ने भी देश में हो रही हिंसा के लिए नुपूर शर्मा की ‘फिसली जुबान’ को दोषी बताया है। 

आदरणीय न्यायधीशों ने सुनवाई में कहा कि नुपूर को राष्ट्र से माफी माँगनी चाहिए। इतना ही नहीं, नुपूर की ओर से जब कोर्ट में कहा गया कि वो अपने ऊपर हुई शिकायत मामले की जाँच में सहयोग कर रही हैं तब सर्वोच्च न्यायलय के न्यायधीशों द्वारा उनके ऊपर ‘रेड कार्पेट’ वाला तंज भी कसा गया।

मीलॉर्ड ने नुपूर को लेकर ये तक कहा, “कई बार सत्ता (ताकत) का सुरूर दिमाग में चढ़ जाता है। लोग सोचते हैं कि उनके पास बैक अप है और वो कुछ भी बोल सकते हैं।” मीलॉर्ड द्वारा लगातार की गई ऐसी हर टिप्पणी ने आज उस मिथ को तोड़ा, जो ये बताता था कि न्यायव्यवस्था ऐसी महिला की मदद के लिए है जिसे मौत की धमकियाँ और रेप की धमकियाँ मिल रही हों, वो भी सिर्फ टेलीविजन डिबेट शो में अपना मत रखने के कारण।

रिपोर्ट बताती हैं कि नुपूर शर्मा ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा इसलिए खटखटाया ताकि उनके विरुद्ध हुई सारी एफआईआर दिल्ली में ट्रांस्फर हों और यही पर जाँच आगे बढ़े। अपनी याचिका में उन्होंने साफ भी किया कि ये सब इसलिए है क्योंकि उन्हें लगातार मौत की धमकियाँ आ रही हैं। हालाँकि कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनने की बजाय देश में हो रही हिंसा और हत्या की घटनाओं का ठीकरा उन्हीं पर फोड़ दिया और उन कट्टरपंथियों का नाम तक नहीं आया जिन्होंने वाकई नुपूर शर्मा के समर्थन में पोस्ट करने पर कन्हैया लाल का गला रेता। कोर्ट ने नुपूर को आरोपित बताते हुए उनकी याचिका में की गई माँग भी खारिज कर दी।

सुप्रीम कोर्ट निश्चित ही अपनी टिप्पणियों से कह रहा था कि ये नुपूर शर्मा का कसूर है जो इस्लामवादी गुस्से में आ गए, उन्होंने सड़कों पर दंगा कर दिया, हत्या की धमकियाँ दे दीं, बलात्कार करने को कह दिया और एक हिंदू का सिर काट दिया…। शायद न्यायधीशों को कहना था कि ये सब नुपूर की ही गलती थी। उन्हें महिला होने के नाते अपनी जगह का एहसास होना चाहिए था। उन्हें पता होना चाहिए था कि महिला होने के नाते उन्हें अपना मुँह बंद रखना था… पर अब वो जब अपना मत रख चुकी हैं तो जरूरी है कि उन्हें लटका दिया जाए, एक डायन की तरह, जिसके ऊपर भीड़ पत्थर फेंकते हुए तेज-तेज चिल्लाती है।

कमाल की बात है कि इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी अपनी हिंसा के लिए यही सब तो कहा। उन्होंने कहा कि गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा सिर तन से जुदा। उन्होंने ये भी कहा कि अगर कोर्ट मौत का दंड नहीं दे पाई तो वह देंगे। उन्होंने बताया कि वो शांतिप्रिय समुदाय के लोग हैं। वह आराम से रहना चाहते हैं। बस अगर किसी ने उनकी इच्छा के विरुद्ध काम किया तो वो इस्लाम को बचाने के लिए खून खच्चर पर भी उतर जाएँगे। जैसा कि इस्लामवादियों के लिए ये सब करना आसान है क्योंकि उनके लिए देश के कानून का कोई मतलब नहीं है। वे केवल अपने मजहबी कानून के प्रति सम्मान रखते हैं जो उन्हें इजाजत देता है कि काफिरों का गला काटें।

सुप्रीम कोर्ट का काम है देश के संविधान से चलना जबकि उनकी टिप्पणी इस्लामवादियों को ये हिम्मत देगी कि वो अपनी हिंसा को वाजिब दिखा सकें। उनकी टिप्णपी यही दिखाती है कि अगर कोई इस्लाम के बारे में कुछ भी कहे तो इस तरह कट्टरपंथियों का सड़कों पर आना सही है और भावना आहत के नाम पर किसी का गला काटना भी।

जब से सुप्रीम कोर्ट के जजों ने नुपूर शर्मा की फिसली जुबान को कन्हैया लाल की हत्या का दोषी बताया है, उसके बाद से यही लग रहा है कि इन न्यायधीशों को अपने भीतर झाँककर देखने की जरूरत है। हैरानी होगी अगर ये जज उन इस्लामी हिंसा के लिए न्यायधीशों को जिम्मेदार ठहराएँ जिनके फैसले सुन कट्टरपंथी सड़कों पर आ गए।

मार्च 2022 में कर्नाटक हाईकोर्ट ने हिजाब पर फैसला दिया था। इसके बाद इस्लामी कट्टरपंथियों ने कर्नाटक कोर्ट के जजों को धमकी देने शुरू कर दी। जाँच में जो कट्टरपंथी पकड़े गए। उनमें एक कोवई रहमतुल्ला और दूसरा जमाल मोहम्मद उस्मानी था।

बिजनेस स्टैंडर्ड की रिपोर्ट में कहा गया कि कोवई रहमतुल्लाह ने कर्नाटक जजों के विरुद्ध हिंसा को भड़काया था। उसने झारखंड के उस जज की मौत का उदाहरण दिया था जो मॉर्निंग वॉक के दौरान मारे गए। इसके बाद उसने ये भी कहा था कि वो जानता है कि कर्नाटक के चीफ जस्टिस कहाँ सुबह की सैर करने जाते हैं।

बस इसी आधार पर आरोपित गिरफ्तार हुए थे। 

अब यही तर्क यदि नुपूर शर्मा मामले में लगाया जाए तो क्या सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीशों को टिप्पणी से पहले खुद से पूछना नहीं चाहिए कि क्या वह अपने हाईकोर्ट के जजों से भी कहेंगे कि उनकी फिसली जुबान के कारण इस्लामी भड़के और जज की हत्या का षड्यंत्र रचा।

नैतिकता के आधार पर लिया गया फैसला जो एक लिए सही है वो सबके लिए सही ही होगा, लेकिन यहाँ पूछना होगा कि क्या एक आम नागरिक के लिए नीति अलग हैं और मीलॉर्ड के लिए अलग? 

क्या सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक हाईकोर्ट के जज से माफी माँगने को कहेगा क्योंकि उनके फैसले के बाद इस्लामियों ने हत्या को करने मन बनाया। क्या सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट के उन जजों से माफी माँगने को कहेगा जिनके फैसले के बाद इस्लामी सड़कों पर आ गए। अगर इन सबके लिए नुपूर शर्मा के लिए जजों को जिम्मेदार बताया जाना चाहिए तो फिर उन्हें वाई कैटेगरी की सुरक्षा क्यों मिली। और अगर उन्हें सुरक्षा मिल गई तो नुपूर शर्मा को क्यों उनके बयान के बाद ये सब कहा जा रहा है।

क्या अगर इस्लामी कल को भीड़ में जुटकर राम मंदिर पर हमला करें तो क्या सुप्रीम कोर्ट इसके लिए खुद को जिम्मेदार ठहराएगा, क्योंकि आदेश तो उन्हीं का था। फिर भी इस्लामी लगातार धमकाते हैं कि वो अयोध्या मंदिर को गिराकर बाबरी खड़ा करेंगे। क्या अगर कन्हैया लाल की हत्या की जिम्मेदार नुपूर हैं तो फिर सुप्रीम कोर्ट तैयार है क्या ऐसे समय में देश से माफी माँगने के लिए? क्या तब कहा जाएगा कि ताकत का नशा दिमाग में चढ़ता है तो लोगों को लगता है कि उनके पास बैकअप हैं और कुछ भी बोला जा सकता है।

अवलोकन करें:-

सेकुलर मीडिया ने नुपूर शर्मा-टेलर-कस्टमर की आड़ में मजहबी आतंक के खतरों को छिपाया
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सेकुलर मीडिया ने नुपूर शर्मा-टेलर-कस्टमर की आड़ में मजहबी आतंक के खतरों को छिपाया

न्याय पालिका को अपने प्रचुर ज्ञान में से ये निश्चित करना होगा कि वो इस्लामी मौलवी बनना चाहते हैं या फिर प्राकृतिक रूप से न्याय करना चाहते। आज नुपूर शर्मा की याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट की कही टिप्पणियों से सम्मानपूर्वक यही निष्कर्ष निकलता है कि इस्लामी भेड़ियों के सामने नुपूर शर्मा को कटु बातें बोलना न्यायालय की शोभा के खिलाफ था।

नोट: यह लेख ऑपइंडिया की एडिटर-इन-चीफ नुपूर शर्मा के लेख पर आधारित है। 

हिजाब इस्लाम का हिस्सा नहीं, स्कूल यूनिफॉर्म पहनने से नहीं कर सकते इनकार: कर्नाटक हाई कोर्ट का फैसला

कर्नाटक के पीयू कॉलेज से शुरू हुए हिजाब विवाद मामले पर आज हाई कोर्ट ने सुनवाई करते हुए उन तमाम याचिकाओं को खारिज कर दिया जो शैक्षिणक संस्थानों में हिजाब पहनने की माँग को लेकर दायर की गई थीं। कोर्ट ने अपना फैसला लेते हुए कहा कि हिजाब इस्लाम में कोई अनिवार्य चीज नहीं है। इसलिए सरकार के 5 फरवरी वाले आदेश को अमान्य करने का कोई मामला नहीं बनता है।

हिजाब पर जारी विवाद को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुना दिया है। हाईकोर्ट ने शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर प्रतिबंध को चुनौती देने वाली याचिकाओं को खारिज कर दिया है। हाईकोर्ट ने साफ कहा है कि हिजाब पहनना इस्लाम में अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसके साथ ही हिजाब पर पाबंदी बरकरार रखते हुए मुख्य न्यायाधीश रितु राज अवस्थी, न्यायमूर्ति कृष्ण एस दीक्षित और न्यायमूर्ति खाजी जयबुन्नेसा मोहियुद्दीन की तीन-सदस्यीय खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि छात्र स्कूल में यूनिफॉर्म पहनने से इनकार नहीं कर सकते।

हाईकोर्ट ने उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें छात्राओं ने शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने की अनुमति देने की मांग की थी। हाईकोर्ट ने कहा कि हिजाब पहनना अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं है। इसके पहले सुनवाई के दौरान कर्नाटक सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई थी कि हिजाब एक आवश्यक धार्मिक प्रथा नहीं है और धार्मिक निर्देशों को शैक्षणिक संस्थानों के बाहर रखा जाना चाहिए। राज्य के महाधिवक्ता प्रभुलिंग नावडगी ने कहा था कि हमारा यह रुख है कि हिजाब एक आवश्यक धार्मिक परंपरा नहीं है। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि हमें अपने धार्मिक निर्देशों को शैक्षणिक संस्थानों के बाहर रख देना चाहिए।

कर्नाटक के उडुपी में स्कूल-कॉलेज में ड्रेस कोड का उल्लंघन कर हिजाब पहनने पर कुछ लड़कियों को कक्षा में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी गयी थी। बाद में कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीपीआई) की शह पर छात्राओं ने क्लास में हिजाब पहनकर आना शुरू कर दिया। इसके विरोध में हिंदू छात्रों ने केसरिया गमछा रखना शुरू कर दिया था। पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव के वक्त यह मामला कई राज्यों में फैल गया। लड़कियों ने स्कूल में हिजाब पहनकर आने के लिए कर्नाटक हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी।

अब इस मामले पर अपना फैसला सुनाते हुए हाईकोर्ट ने साफ कहा कि छात्र स्कूल-कॉलेज में यूनिफॉर्म पहनने से मना नहीं कर सकते। साथ ही शैक्षणिक संस्थान को यूनिफॉर्म तय करने का अधिकार है। हाईकोर्ट ने कहा है कि हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। अब हाईकोर्ट का फैसला आने के बाद सोशल मीडिया पर इसी की चर्चा हो रही है।

क्या था पूरा मामला

याद दिला दें कि पीयू कॉलेज का यह मामला सबसे पहले 2 जनवरी 2022 को सामने आया था, जब 6 मुस्लिम छात्राएँ क्लासरूम के भीतर हिजाब पहनने पर अड़ गई थीं। कॉलेज के प्रिंसिपल रूद्र गौड़ा ने कहा था कि छात्राएँ कॉलेज परिसर में हिजाब पहन सकती हैं, लेकिन क्लासरूम में इसकी इजाजत नहीं है। प्रिंसिपल के मुताबिक, कक्षा में एकरूपता बनाए रखने के लिए ऐसा किया गया है। इसके बाद कर्नाटक सरकार ने भी इस संबंध में 5 फरवरी को आदेश दिए थे। सरकार के आदेश में छात्र-छात्राओं को ड्रेस कोड का पालन करने की बात कही गई थी।