बानू मुश्ताक, सुप्रीम कोर्ट (फोटो साभार: Bharat 24)
मैसूर दशहरा महोत्सव की मुख्य अतिथि बानू मुश्ताक को बनाने के मामले में हिंदुओं को सुप्रीम कोर्ट से भी न्याय नहीं मिला है। सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (19 सितंबर 2025) को कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के उस फैसले को बरकरार रखा, जिसमें लेखिका बानू मुश्ताक को मैसूर दशहरा उद्घाटन के लिए मुख्य अतिथि बनाया गया।
जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने हिंदू संगठनों की याचिका खारिज कर दी, जो बानू की मुस्लिम पहचान और कथित हिंदू-विरोधी बयानों के आधार पर विरोध कर रहे थे।
ताजे मामले में 19 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की बेंच (जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता) ने बानू मुश्ताक को मुख्य अतिथि बनाने से रोकने के लिए दायर अपील को खारिज कर दिया। जस्टिस नाथ ने कहा, “इस देश का प्रीएम्बल क्या है? यह राज्य कार्यक्रम है… राज्य कैसे ए, बी और सी में भेदभाव कर सकता है?”
याचिकाकर्ताओं के वकील पीबी सुरेश ने तर्क दिया कि मंदिर में पूजा सेकुलर नहीं है और मुश्ताक के ‘एंटी-हिंदू’ बयान उन्हें अयोग्य बनाते हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा, “हमने तीन बार डिसमिस्ड कहा है, कितनी बार कहें?”
सीजेआई बीआर गवई ने एक दिन पहले ही मामले को तत्काल सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया था, लेकिन फैसला याचिकाकर्ताओं के खिलाफ गया। यह फैसला न केवल आस्था को चोट पहुँचाता है, बल्कि यह संकेत देता है कि न्यायपालिका बहुसंख्यक दलीलों को गंभीरता से नहीं ले रही। जस्टिस नाथ और मेहता में से एक भविष्य के सीजेआई हो सकते हैं, जो चिंता बढ़ाता है।
बानू मुश्ताक की उपस्थिति पर क्यों है आपत्ति?
दशहरा हिंदुओं का प्रमुख पर्व है, जो बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है। मैसूर का दशहरा उत्सव दुनिया भर में प्रसिद्ध है। यह न केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम है, बल्कि एक गहन धार्मिक अनुष्ठान है, जो सदियों से चली आ रही परंपराओं पर आधारित है।
हर वर्ष चामुंडी पहाड़ियों पर देवी चामुंडेश्वरी की पूजा के साथ इसकी शुरुआत होती है, जिसमें मुख्य अतिथि द्वारा दीप प्रज्ज्वलन, फल-फूल अर्पित करना और वैदिक मंत्रों का जाप शामिल होता है। ऐसे में परंपरा के अनुसार, उद्घाटन में शामिल होने वाला व्यक्ति हिंदू आस्था में विश्वास रखने वाला होना चाहिए, क्योंकि यह धार्मिक अनुष्ठान का हिस्सा है।
बीजेपी और हिंदू संगठनों का कहना है कि मुस्लिम बानू मुश्ताक को इस धार्मिक अनुष्ठान में शामिल करना हिंदू आस्था का अपमान है। याचिकाकर्ता एच.एस. गौरव ने सुप्रीम कोर्ट में तर्क दिया कि मंदिर के भीतर पूजा एक धार्मिक कार्य है, न कि धर्मनिरपेक्ष, और इसे केवल हिंदू ही कर सकते हैं। उनके वकील पी.बी. सुरेश ने यह भी दावा किया कि बानू ने अतीत में हिंदू-विरोधी बयान दिए हैं, जिसके चलते उनकी उपस्थिति आपत्तिजनक है। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने दलीलों को खारिज कर दिया।
हाई कोर्ट से भी हिंदुओं को नहीं मिला था न्याय
इससे पहले, 15 सितंबर 2025 को कर्नाटक हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच (चीफ जस्टिस विवु बखरू और जस्टिस सीएम जोशी) ने याचिकाओं को खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट ने कहा कि मुश्ताक एक योग्य महिला हैं, और उनकी भागीदारी संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन नहीं करती। कोर्ट ने कहा, “किसी अन्य धर्म के व्यक्ति की भागीदारी अन्य धर्मों के उत्सवों में संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं करती।”
हाई कोर्ट ने जोर दिया कि फैसला एक समिति द्वारा लिया गया, जिसमें विभिन्न पार्टियों के प्रतिनिधि शामिल हैं, और यह कोई धार्मिक संस्था द्वारा नहीं आयोजित है। याचिकाकर्ताओं के वकील एस सुदर्शन ने तर्क दिया कि हिंदू संस्कृति में मूर्ति पूजा महत्वपूर्ण है, और गैर-आस्थावान व्यक्ति को अनुमति देना गलत है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “हम केवल राय पर फैसला नहीं ले सकते।” यह फैसला बहुसंख्यक भावनाओं को नजरअंदाज करता लगता है, जहाँ संविधान की सेकुलर भावना को अल्पसंख्यक पक्ष में इस्तेमाल किया गया।
CJI गवई भी दे चुके हैं हिंदू विरोधी बयान
इस मामले ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बी.आर. गवई के एक पुराने बयान को भी चर्चा में ला दिया। खजुराहो के जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की टूटी मूर्ति को ठीक करने की याचिका पर सुनवाई के दौरान CJI गवई ने कहा था, “ये पब्लिसिटी का हथकंडा है। जाओ, भगवान विष्णु से कहो कि कुछ करें।”
इस टिप्पणी को हिंदू आस्था का मज़ाक बताकर सोशल मीडिया पर तीखी आलोचना हुई थी। गवई को बाद में सफाई देनी पड़ी कि उनका इरादा भावनाएँ आहत करना नहीं था।
न्यायपालिका पर उठ रहे सवाल
बानू मुश्ताक प्रकरण ने न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवेदनशीलता पर सवाल उठाए हैं। हिंदू संगठनों का कहना है कि जब शीर्ष अदालतें बहुसंख्यक समुदाय की भावनाओं को नज़रअंदाज़ करती हैं, तो यह विश्वास की कमी पैदा करता है। सुप्रीम कोर्ट की बेंच में शामिल जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता में से एक के भविष्य में CJI बनने की संभावना है। ऐसे में इस फैसले को हिंदू समुदाय के एक वर्ग ने आस्था के खिलाफ माना है।
अवलोकन करें:-
यह विवाद केवल बानू मुश्ताक के चयन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह धार्मिक स्वतंत्रता, परंपराओं, और धर्मनिरपेक्षता के बीच संतुलन का सवाल उठाता है। हिंदू समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि उनके त्योहारों को राजनीतिक मंच बनाने की कोशिश हो रही है।
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