बानू मुश्ताक ने मैसूर दशहरा महोत्सव का किया उद्घाटन (फोटो साभार: X/@publictvnews)
वह मुस्लिम है। पर मस्जिद में नमाज नहीं पढ़ सकती। क्योंकि वह मुस्लिम होने के साथ-साथ औरत भी है। कुछेक मस्जिदों में उसे नमाज पढ़ने का हक मिला भी है तो शर्तों के साथ। मसलन, पर्दे में रहना, सुगंध न लगाना, अलग कमरा… वगैरह वगैरह। लेकिन एक गैर हिंदू (मुस्लिम महिला) आपके मंदिर में प्रवेश कर नवरात्र के आपके आगमिक अनुष्ठानों का प्रारंभ कर सकती है। क्योंकि कांग्रेस और इस देश की अदालतें ऐसा चाहती हैं। क्योंकि इस देश का हिंदू सुषुप्त है।
सोमवार (22 सितंबर 2025) को कलश स्थापना के साथ हिंदुओं की आस्था के महत्वपूर्ण पर्व नवरात्रि का प्रारंभ हुआ। लेकिन इसी दिन कांग्रेस शासित कर्नाटक से एक ऐसा वीडियो आया है जो हिंदुओं की आस्था पर सीधा प्रहार है। बानू मुश्ताक ने चामुंडेश्वरी मंदिर में प्रवेश कर मैसूर के विश्व प्रसिद्ध दशहरा महोत्सव का प्रारंभ किया है।
कहाँ है हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं? क्यों नहीं हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं ने हिन्दुओं को एकजुट कर माता की आरती करने का विरोध किया? कांग्रेस जेल में ही तो भेजती कृष्ण ने भी जेल में जन्म लेकर अपनी लीला खेलनी शुरू कर दी थी। अगर बानू मुश्ताक इस्लाम छोड़ एक्स-मुस्लिम बन गयी है बात दूसरी है क्योकि एक्स-मुस्लिम मंदिरों में जाकर पूजा अर्चना आदि करते हैं।
ವಿಶ್ವ ವಿಖ್ಯಾತ ಮೈಸೂರು ದಸರಾ 2025ಕ್ಕೆ ಚಾಮುಂಡೇಶ್ವರಿ ದೇವಿಯ ಅಗ್ರ ಪೂಜೆಯ ಮೂಲಕ ಚಾಲನೆ ನೀಡಿದ ಬಾನು ಮುಷ್ತಾಖ್ ಅವರು.
— Voice of Mysuru (@voiceofmysuru) September 22, 2025
Banu Mushtaq inaugurates the World Famous Mysuru Dasara 2025 through performing the Agra Pooja to Goddess Chamundeshwari@BanuMushtaq #ಎಲ್ಲರದಸರಾ#ಮಾಸೂರುದಸರಾ#MysoreDasara2025 pic.twitter.com/32pDgu0n2J
ऐसा नहीं है कि लेखिका बानू मुश्ताक की हिंदुत्व में आस्था है। उनकी देवी पूजा में आस्था है। जैसा कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने इस घटना को लेकर टिप्पणी करते हुए कहा भी है, “कन्नड़ भाषा को देवी के रूप में पूजने पर स्वयं के मुस्लिम होने के नाते मजहबी ऐतराज जताने वाली लेखिका मुश्ताक बानो को कर्नाटक सरकार ने मैसूर दशहरा समारोह का अतिथि बना कर आमंत्रित किया है।”
बानू मुश्ताक इतने अव्वल दर्जे की सेकुलर हैं कि इस्लाम में औरतों की स्थिति पर वह केवल चुप्पी ही नहीं ओढ़ती हैं, बल्कि वह प्रयास करती हैं कि औरतों के साथ भेदभाव का ठीकरा भी सनातन की कथित परंपराओं पर फोड़ा जा सके। ऐसे में सीधा सवाल यह है कि जिसकी सनातन में कोई आस्था नहीं है, उसे माँ चामुंडेश्वरी के अनुष्ठान में शामिल क्यों किया गया? वैदिक मंत्रोच्चार के बीच माँ की पवित्र मूर्ति पर पुष्प अर्पित करने की अनुमति कैसे दी गई?
चामुंडी पहाड़ियों पर स्थित इस मंदिर में विराजमान माँ चामुंडेश्वरी, मैसूर राजघराने की अधिष्ठात्री देवी हैं। भले कर्नाटक की कांग्रेस सरकार मैसूर के दशहरा महोत्सव को ‘राजकीय यानी सरकारी’ कार्यक्रम बताए। भले हिंदुओं की याचिका खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट भी इसे ‘सरकारी कार्यक्रम’ कह दे। पर सच्चाई यह है कि यह सदियों से चला आ रहा एक आगमिक अनुष्ठान है।
हमारे मंदिर, हमारे अनुष्ठान, हमारी परम्पराएँ किसी व्यक्ति या सरकार की बपौती नहीं हैं। सरकारी कार्यक्रम बताकर हमारी आस्थाओं से खिलवाड़ नहीं किया जा सकता है। इनकी व्याख्या कोई अपनी सहूलियत के हिसाब से नहीं कर सकता। बावजूद एक विधर्मी महिला ने हमारे मंदिर में प्रवेश किया, हमारे अनुष्ठान की पवित्रता और गरिमा को भंग किया।
क्या इसकी दोषी केवल कांग्रेस है? यकीनन नहीं। अतीत में ऐसे सैकड़ों उदाहरण भरे पड़े हैं जब हिंदुओं की आस्थाओं पर प्रहार कर कांग्रेस ने मुस्लिम तुष्टिकरण किया है। फिर क्या इसकी दोषी कर्नाटक की वह जनता नहीं, जिसने कांग्रेस को अपनी आस्था पर प्रहार का यह मौका प्रदान किया है?
क्या हम इस मामले में अदालतों के भरोसे रहे सकते हैं? यकीनन नहीं। बानू मुश्ताक को आमंत्रित करने के कर्नाटक सरकार के फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई। उसने याचिका खारिज कर दी। फिर हिंदू सुप्रीम कोर्ट गए। परिणाम नहीं बदला। वैसे भी जिस देश का मुख्य न्यायाधीश एक याचिका को खारिज करते हुए यह टिप्पणी करे कि ‘अपने भगवान से कहो कि वे भी अपने लिए कुछ करें’, उस देश की न्यायपालिका से उम्मीद करना अपने कर्तव्यों से भागने जैसा है।
अवलोकन करें:-
इस क्षण के लिए दोषी माँ चामुंडेश्वरी मंदिर के वे पुजारी भी हैं, जिन्होंने बानू मुश्ताक के हाथों में पूजा की थाली थमाई। पवित्र मूर्ति पर चढ़ाने के लिए उन्हें पुष्प भेंट किया। उन्हें आरती दी। दोषी मैसूर के वे हिंदू भी हैं जिन्होंने इस क्षण को आने से रोकने के लिए विरोध के अपने लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल नहीं किया। इस क्षण के लिए हर एक हिंदू दोषी है। क्यों नहीं पुजारी और मौजूद हिन्दुओं ने इसका विरोध किया? क्या हर धार्मिक अनुष्ठान के लिए हिन्दू अदालतों पर निर्भर रहेगा? हिन्दुओं को मालूम होना चाहिए कि जब तक सुप्रीम कोर्ट में मुस्लिम तुष्टिकरण की जनक कांग्रेस समर्पित जजों और कपिल सिबल, अभिषेक मनु सिंघवी और प्रशांत भूषण जैसे हिन्दू विरोधी वकीलों के भरमार रहेगी कोर्ट से न्याय नहीं मिलेगा। क्या हिन्दू इतना नपुंसक हो गया है कि सच्चाई के एकजुट होकर विरोध कर सकते? इस पाप का पाश्ताचाप उन्हें ही करना होगा। कांग्रेस या न्यायापालिका को कोस कर हम अपने कर्तव्यों से भाग नहीं सकते।
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