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‘अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे’: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के वकील अनिल मिश्रा की टिप्पणी पर बवाल, राष्ट्रद्रोह समेत कई धाराओं में FIR; खुद गिरफ्तारी देने पहुँचे SP ऑफिस

डॉ भीमराव अंबेडकर पर विवादित टिप्पणी से बवाल, बसपा और अहीरवार समाज सड़कों पर, एडवोकेट अनिल मिश्रा पर राष्ट्रद्रोह समेत गंभीर धाराओं में FIR दर्ज (साभार: NDTV)
मध्य प्रदेश के ग्वालियर के अशोकनगर में डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी को लेकर विरोध बढ़ गया है। मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और अहिरवार समाज संगठन ने अलग-अलग समय पर कलेक्ट्रेट पहुँचकर अपना विरोध दर्ज कराया और ज्ञापन सौंपे हैं।

दोनों संगठनों ने एडवोकेट अनिल मिश्रा के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर कठोर कार्रवाई की माँग की। बसपा के ज्ञापन में कहा गया कि अनिल मिश्रा ने ‘आचरण ग्वालियर पर लाइव’ नामक सोशल मीडिया कार्यक्रम में डॉ अंबेडकर के बारे में निंदनीय, अमर्यादित और भड़काऊ टिप्पणी की। बसपा ने इसे संविधान प्रेमियों की आस्था पर आघात और राष्ट्र के खिलाफ साजिश बताया।

पार्टी ने कहा कि डॉ अंबेडकर न केवल भारत रत्न और संविधान निर्माता हैं, बल्कि करोड़ों वंचितों के मसीहा भी हैं। इसलिए उनके खिलाफ की गई टिप्पणी संविधान और लोकतंत्र दोनों का अपमान है। बसपा ने माँग की कि अनिल मिश्रा पर राष्ट्रद्रोह और धार्मिक वैमनस्य फैलाने जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।

वहीं, अहिरवार समाज संघ ने भी राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। संगठन ने कहा कि डॉ अंबेडकर ने अपना जीवन समता, न्याय और सामाजिक समरसता के लिए समर्पित किया था  और अनिल मिश्रा की टिप्पणी अपमानजनक होने के साथ-साथ समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास है।

दोनों संगठनों ने प्रशासन से अपील की कि वह संविधान और डॉ अंबेडकर के सम्मान की रक्षा सुनिश्चित करे और ऐसी टिप्पणी करने वालों के खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई करे।

क्या है पूरा मामला?

ग्वालियर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा पर डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी और फोटो शेयर करने का आरोप है। दरअसल रविवार (5 अक्टूबर 2025) की सुबह क्राइम ब्रांच की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टीम को एक व्हाट्सएप ग्रुप में डॉ अंबेडकर से जुड़ी विवादित वीडियो और फोटो मिली।

जाँच में पता चला कि यह पोस्ट अनिल मिश्रा के मोबाइल नंबर से अपलोड की गई थी। वीडियो में अंबेडकर के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था और उनके फोटो में छेड़छाड़ की गई थी। पोस्ट में उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर पर तीखा हमला किया और लिखा, “अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे उनका बनाया संविधान देश के लिए घातक है, इसे जलाना चाहिए।” यह पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो गई।

पहले भी मिश्रा कई बार विवादित बयान दे चुके हैं, लेकिन इस बार मामला संविधान निर्माता पर था, इसलिए मामला गंभीर हो गया। भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो वे सड़कों पर उतरेंगे। BSP और अहिरवार समाज संगठन ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर मिश्रा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

दर्ज हुई FIR और एडवोकेट मिश्रा ने दी सफाई

6 अक्टूबर 2025 की शाम ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने कई शिकायतों के आधार पर मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज की। उन पर IPC की धारा 153A (समुदायों में नफरत फैलाना), 295A (धार्मिक भावनाएँ आहत करना), 505(2) (शांति भंग करने वाले बयान) और IT एक्ट की धारा 66A के तहत केस दर्ज किया गया।

FIR में कहा गया कि मिश्रा की पोस्ट अंबेडकर की छवि खराब करने और समाज में तनाव फैलाने वाली है। पुलिस ने उन्हें नोटिस जारी कर अपना पक्ष बताने को कहा। लेकिन मिश्रा ने खुद ही सामने आकर बयान दिया कि वे बेगुनाह हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कोई गलत बात नहीं कही, मैं सिर्फ इतिहास की सच्चाई बता रहा था।” उन्होंने सवाल उठाया, “हिंदू देवी-देवताओं पर टिप्पणियाँ करने वालों पर पुलिस चुप क्यों है?”

7 अक्टूबर 2025 की सुबह असली ड्रामा शुरू हुआ। अनिल मिश्रा अपने समर्थक वकीलों और ‘रक्षक मोर्चा’ के सदस्यों के साथ ग्वालियर SP ऑफिस पहुँचे। हाथों में तख्तियाँ लेकर नारे लगाए, “मुझे गिरफ्तार करो, मैं खुद आ गया हूँ।” मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैं अंबेडकर के विरोध में रहूँगा, ये विदेशी जातंकवादी नहीं सुधरेंगे।”

SP ऑफिस में हंगामा मच गया। समर्थक नारे लगाने लगे ‘अनिल भाई को छोड़ो, नहीं तो हाईकोर्ट बंद’ लेकिन SP प्रतीक ठाकुर ने साफ कहा कि अभी जाँच चल रही है और गिरफ्तारी का समय नहीं आया। उन्होंने मिश्रा को फिर से नोटिस थमाया और पूछताछ के लिए थाने बुलाया। मिश्रा अपने समर्थकों के साथ नारे लगाते हुए लौटे, “अगर जेल जाना है तो जेल जाएँगे।”

परशुराम सेना ने दी विरोधियों को चुनौती

एक तरफ जहाँ भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी और कई एससी, एसटी, ओबीसी संगठनों ने मिश्रा के बयान का विरोध किया है। वहीं इसी बीच, भिंड जिले की परशुराम सेना ने अनिल मिश्रा के समर्थन में खुलकर मैदान में उतरने की घोषणा की है।

सेना के जिला अध्यक्ष देवेश शर्मा ने कहा, “जो लोग जूते की माला पहनाने जैसी बातें कर रहे हैं, उनमें दम है तो 15 अक्टूबर 2025 को ग्वालियर आकर दिखाएँ।” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि परशुराम सेना वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद रहेगी और किसी भी तरह की बदसलूकी का जवाब दिया जाएगा।

शर्मा ने कहा कि सवर्ण समाज शांत है, लेकिन अगर मर्यादा लांघी गई तो जवाब देना भी जानता है। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है। पुलिस ने सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी है और दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

आखिर कौन महापागल लिख रहा राहुल की स्क्रिप्ट? झूठ के सरगना कांग्रेस नेता राहुल गाँधी एक ही बार में बोल गए सब पर झूठ: गाँधी, गोडसे और संविधान…

महात्मा गाँधी (बाएँ), राहुल गाँधी (बीच में), नाथूराम गोडसे (दाएँ), (फोटो साभार : Bharatdiscovery, Jagran & ndtv)
जिस तरह राहुल गाँधी एक से बढ़कर एक झूठ बोल रहे हैं LoP पद को भी कलंकित कर दिया है। LoP के मुंह से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए कि विपक्ष(सत्तारूढ़ पार्टी) भी उसका खंडन करने को मजबूर हो। लेकिन यहां तो LoP ही इतना झूठ बोल जनता को गुमराह कर रहा है। समझ नहीं आता आखिर राहुल की स्क्रिप्ट कौन महापागल लिख रहा है? आखिर कांग्रेस का बुद्धिजीवी वर्ग कौन-से कोप भवन में छुपा बैठा है? जहाँ तक नाथूराम गोडसे की बात है कि महात्मा गाँधी को क्यों मारा? इस सच्चाई को जानने के लिए गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को ध्यान से पढ़ना होगा। दूसरे, जब गोडसे ने गाँधी को गोली मारी कहते हैं कि गाँधी 40 मिनट तक जीवित थे, जबकि विल्लिंग्टन वर्तमान डॉ राम मनोहर लोहिआ होस्पिटल ज्यादा दूर नहीं था गाँधी को बचाया जा सकता था लेकिन कोई हॉस्पिटल लेकर नहीं गया, क्यों? 

यह दुनिया का रिकॉर्ड है कि जब आरोपी को माइक से अपने बयान पढ़ने की इजाजत दी गयी है। इतना ही नहीं कांग्रेस सरकार ने गोडसे के बयानों को सार्वजनिक होने पर बैन लगा दिया था, क्यों? देखिए संलग्न गोडसे पर लिखी श्रृंगला का एक पृष्ठ। समय आ गया है कि गोडसे समर्थकों को गोडसे के बयानों को घर-घर वितरित कर गोडसे विरोधियों को करारा जवाब देना चाहिए।    
बिहार के कटिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महात्मा गाँधी, नाथूराम गोडसे और भारतीय संविधान को लेकर एक के बाद एक कई झूठ बोले, जिसने उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना दिया है। हाथ में संविधान की लाल किताब लेकर, राहुल गाँधी ने दावा किया कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की क्योंकि वह संविधान से नफरत करता था और महात्मा गाँधी ने इसी संविधान के लिए अपना जीवन दिया।

हालाँकि, उनके ये दावे ऐतिहासिक तथ्यों के आगे टिक नहीं पाते। हकीकत यह है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी, तब भारतीय संविधान का मसौदा (ड्राफ्ट) भी सामने नहीं आया था। नाथूराम गोडसे को भी संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दी जा चुकी थी। राहुल गाँधी का यह बयान सच्चाई से कोसों दूर है।

महात्मा गाँधी की हत्या और संविधान का अस्तित्व

राहुल गाँधी ने दावा किया कि गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की, क्योंकि गोडसे संविधान से नफरत करता था और गाँधी जी ने संविधान के लिए अपना पूरा जीवन दिया। यह दावा पूरी तरह से निराधार है।

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। भारतीय संविधान को भारतीय संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अपनाया था और यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था।

इन तारीखों से यह स्पष्ट है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई, तब भारत का संविधान अस्तित्व में नहीं था। संविधान का पहला मसौदा (ड्राफ्ट) भी गाँधी जी की हत्या के एक महीने बाद, यानी 21 फरवरी 1948 को प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार, यह कहना पूरी तरह से बेतुका है कि गोडसे ने उस चीज से नफरत की, जो उस समय मौजूद ही नहीं थी और गाँधी ने ऐसी चीज का बचाव किया, जिसका अस्तित्व उनके जीवनकाल में नहीं था।

गोडसे की फाँसी और संविधान का लागू होना

राहुल गाँधी का दूसरा बड़ा झूठ यह था कि गोडसे की नफरत संविधान से थी, जिसके कारण उसने गाँधी जी को गोली मारी। सच्चाई तो यह है कि गोडसे को संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दे दी गई थी।

दरअसल, 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए फाँसी दी गई थी। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था, यानि गोडसे को फाँसी दिए जाने के दो महीने बाद।

यह तथ्य ही राहुल गाँधी के पूरे कथन को खोखला साबित कर देता है। गोडसे को भारतीय गणराज्य द्वारा संविधान अपनाए जाने से पहले ही सजा मिल चुकी थी। ऐसे में, यह दावा कि उसकी नफरत संविधान से थी, हास्यास्पद है।

महात्मा गाँधी और संविधान सभा में उनकी भूमिका

राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया। यह बात भी ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो महात्मा गाँधी ने खुद को संक्रमण प्रक्रिया से अलग कर लिया था। वह न तो अंतरिम सरकार का हिस्सा थे और न ही संविधान सभा के सदस्य थे। महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि इसका गठन वायसराय ने किया है और यह ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई है।

महात्मा गाँधी इसे एक सार्वभौम (Sovereign) सभा नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखा और इसमें शामिल नहीं हुए। महात्मा गाँधी ने कुछ विशिष्ट प्रस्ताव जरूर दिए थे, जैसे कि ग्राम-आधारित शासन मॉडल, जिसे ग्राम स्वराज के नाम से जाना जाता है। महात्मा गाँधी के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र गाँव की संस्थाओं में निहित होता है, जो आत्मनिर्भर और स्वशासित हों।

संविधान निर्माण का काम मुख्य रूप से डॉ बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति ने किया था। ऐसे में, यह दावा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया, सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।

RSS और बीजेपी पर राहुल गाँधी का आरोप

राहुल गाँधी ने यह भी दावा किया कि RSS और बीजेपी ने संविधान को नहीं बनाया। दरअसल, बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था, जबकि संविधान 1950 में लागू हो गया था। इसलिए, बीजेपी की संविधान बनाने में कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह एक बेतुका दावा है। RSS एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और उसकी संविधान निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।

राहुल गाँधी के ये दावे न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं, बल्कि वे एक बड़ी झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। राहुल गाँधी की ये टिप्पणियाँ, जिसमें वह संविधान की प्रति हाथ में लेकर झूठे दावे कर रहे थे, न केवल देश के इतिहास को गलत तरीके से पेश करती हैं, बल्कि महात्मा गाँधी और संविधान के महत्व को भी कम करती हैं। राहुल गाँधी हमेशा से अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ के पेश करते हैं, जिसका मजाक वो खुद ही बनकर रह जाते हैं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछे 14 सवाल, 5 जजों की संवैधानिक पीठ को देना होगा सबका जवाब : ‘क्या अदालत बताएगी हम कितने समय में लें फैसला’?

                                         सुप्रीम कोर्ट, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू (साभार: HT/TOI)
कालचक्र कब किस तरफ घूम जाए भविष्य के गर्भ में छिपा होता है। कल तक जो सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति और राज्यपालों को बिलों के पास करने की सीमा पर ज्ञान दे रही थी आज उसी कोर्ट पर महामहिम द्वारा 14 सवाल कर नवनिर्वाचित मुख्य न्यायाधीश को सकते में डाल दिया। अपने आपको राष्ट्रपति और राज्यपालों से ऊपर समझने वाली सुप्रीम कोर्ट को संविधान की अभिभावक को सोंच-समझकर जवाब देना होगा। या दूसरे अर्थों में समझा जाए कि अपने मनमाने ढंग से चलने वाली कोर्ट पर सख्ती का सन्देश! 

अब राजनीतिक गलियारों में चर्चा गरमा रही है कि क्या महामहिम निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में कई सालों से लंबित केसों पर प्रश्न कर सकती है? क्या महामहिम देर रात अदालतों के खुलने पर भी कार्यवाही करने की तैयारी में है? क्या महामहिम झूठे मुक़दमे और झूठी गवाही देने वालों पर कार्यवाही करने का आदेश देने का मन बना रही है? आदि आदि अनेकों प्रश्न चर्चा का विषय बने हुए हैं।    

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा है कि क्या कोर्ट राष्ट्रपति और राज्यपाल को ये बता सकता है कि उन्हें कितने समय में विधानसभा से पास हुए बिलों को मंजूरी देनी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से संविधान के अनुच्छेद 200, 201, 361, 143, 142, 145(3) और 131 से जुड़े सवाल पूछे हैं।

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा था कि अगर राष्ट्रपति या राज्यपाल तय समय में बिल को मंजूरी नहीं देते, तो मान लिया जाएगा कि बिल पास हो गया। इसे ‘डीम्ड असेंट’ यानी ‘अपने-आप मंजूरी‘ कहते हैं।

ऐसे में राष्ट्रपति ने पूछा है कि जब राज्यपाल के पास कोई बिल आता है तो उनके पास क्या विकल्प होता है और क्या राज्यपाल मंत्री परिषद की सलाह मानने के लिए बाध्य है?

राष्ट्रपति का मानना है कि कोर्ट का ये फैसला उनके और राज्यपाल के संवैधानिक अधिकारों को कम करता है। इसलिए उन्होंने संविधान के अनुच्छेद 143(1) के तहत सुप्रीम कोर्ट से इस मामले में राय माँगी है। अनुच्छेद 143(1) राष्ट्रपति को ये अधिकार देता है कि वो किसी बड़े कानूनी या सार्वजनिक महत्व के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की राय ले सकते हैं। इसे प्रेसिडेंशियल रेफरेंस भी कहते हैं।

राष्ट्रपति ने सुप्रीम कोर्ट को कुल 14 सवाल भेजे हैं। इन सवालों का जवाब देने के लिए सुप्रीम कोर्ट को कम से कम पाँच जजों की एक संवैधानिक पीठ बनानी होगी। ये सवाल बहुत अहम हैं क्योंकि ये राष्ट्रपति और राज्यपाल के अधिकारों, उनकी भूमिका और कोर्ट की शक्तियों से जुड़े हैं।

राष्ट्रपति ने ये भी कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 200 और 201, जो बिलों को मंजूरी देने की प्रक्रिया बताते हैं, उनमें कोई ऐसा कोई नियम नहीं है जिसमें बिल को मंजूरी देने के लिए कोई समय-सीमा लिखी हो। न ही संविधान में ‘डीम्ड असेंट’ जैसी कोई बात कही गई है।

राष्ट्रपति ने पूछे हैं ये 14 अहम सवाल

  1. जब राज्यपाल के पास बिल आता है, तो उनके पास क्या-क्या विकल्प होते हैं?
  2. क्या बिल पर फैसला लेते वक्त राज्यपाल को मंत्रियों की सलाह माननी ही पड़ती है?
  3. क्या राज्यपाल का फैसला कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है?
  4. क्या संविधान का अनुच्छेद 361 कहता है कि राज्यपाल के फैसले को कोर्ट में नहीं ले जाया जा सकता?
  5. जब संविधान में कोई समय-सीमा नहीं है, तो क्या कोर्ट ये तय कर सकता है कि राज्यपाल को कब तक फैसला लेना है?
  6. क्या राष्ट्रपति का फैसला भी कोर्ट में चुनौती दी जा सकता है?
  7. क्या कोर्ट ये बता सकता है कि राष्ट्रपति को बिल पर कब और कैसे फैसला लेना है?
  8. अगर राज्यपाल कोई बिल राष्ट्रपति को भेजता है, तो क्या राष्ट्रपति को सुप्रीम कोर्ट से राय लेनी पड़ती है?
  9. क्या बिल के कानून बनने से पहले कोर्ट उसमें दखल दे सकता है?
  10. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत राष्ट्रपति या राज्यपाल के फैसले को बदल सकता है?
  11. क्या बिना राज्यपाल की मंजूरी के विधानसभा से पास बिल कानून बन सकता है?
  12. क्या संविधान कहता है कि बड़े कानूनी सवालों को पाँच जजों की बेंच को भेजना जरूरी है?
  13. क्या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत ऐसा आदेश दे सकता है जो संविधान या कानून के खिलाफ हो?
  14. क्या केंद्र और राज्य सरकारों के बीच झगड़े सिर्फ अनुच्छेद 131 के तहत ही सुलझाए जा सकते हैं, या कोर्ट के पास और भी रास्ते हैं?
ये सवाल सिर्फ समय-सीमा तय करने की बात नहीं हैं। ये राष्ट्रपति और राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका, उनके अधिकारों और कोर्ट की शक्तियों के दायरे से जुड़े हैं। अब सुप्रीम कोर्ट को इन सवालों पर गहराई से विचार करना होगा और एक साफ राय देनी होगी। इस फैसले का असर देश की संवैधानिक व्यवस्था और केंद्र-राज्य संबंधों पर भी पड़ सकता है। इसलिए ये मामला बहुत अहम माना जा रहा है।

लोकसभा स्पीकर के बराबर हैं CJI, फिर राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है सुप्रीम कोर्ट? क्या है आर्टिकल 142? उपराष्ट्रपति ने क्यों बताया ‘न्यूक्लियर मिसाइल’?


केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को भी समय सीमा देते हुए निर्देश जारी किया था। अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका पर फिर से निशाना साधा है और कहा कि वह अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर विधायिका के मामले में हस्तक्षेप कर रही है।

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ एक ‘परमाणु मिसाइल’ बन गया है, जो न्यायपालिका के पास 24 घंटे उपलब्ध होता है।। उपराष्ट्रपति का बयान ऐसे समय में आया है, जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित वक्फ अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई और उसे रोकने की बात कही।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “हाल ही में एक निर्णय के माध्यम से राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम कहाँ जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमने लोकतंत्र के लिए इस दिन की कभी उम्मीद नहीं की थी। हमारे पास ऐसे न्यायाधीश हैं जो कानून बनाएँगे, कार्यकारी कार्य करेंगे, सुपर-संसद के रूप में कार्य करेंगे और उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता है।”

उपराष्ट्रपति ने कहा, “हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते, जहाँ आप (सुप्रीम कोर्ट) भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें। वह भी किस आधार पर? संविधान के तहत आपके पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है।” उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 145(3) के अनुसार किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर कम-से-कम 5 न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब पाँच न्यायाधीशों वाली पीठों का निर्णय निर्धारित किया गया था, तब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या आठ थी। धनखड़ ने बिल के संबंधित मामले को लेकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ निर्णय दो न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा दिया गया था। अब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि संविधान पीठ में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 145(3) में संशोधन करने की आवश्यकता है। उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा के प्रशिक्षुओं के छठे बैच को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति को बिल पर तीन महीने में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो संबंधित राज्यपाल द्वारा भेजा गया विधेयक कानून बन जाता है।

न्यायपालिका की वर्तमान हालात पर बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने न्यायाधीश यशवंत वर्मा का भी जिक्र किया। ये वही जज हैं, जिनके घर पर इस साल होली के दिन नोटों से भरे बोरों में आग लग गई थी। मामले में भारी विवाद के बाद भी सुप्रीम कोर्ट उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया और मामले की जाँच के लिए आंतरिक कमिटी बना दी गई।

धनखड़ ने कहा, “14 और 15 मार्च की रात को नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के निवास पर एक घटना घटी। सात दिनों तक किसी को इसके बारे में पता नहीं चला। हमें खुद से सवाल पूछने होंगे। इसमें हुई देरी को क्या समझा जा सकता है? क्या यह क्षमा योग्य है? क्या इससे कुछ बुनियादी सवाल नहीं उठते? किसी भी सामान्य स्थिति में और सामान्य परिस्थितियाँ कानून के शासन को परिभाषित करती हैं।”

अनुच्छेद 142, जिसे उपराष्ट्रपति ने परमाणु मिसाइल कहा

संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और डिक्री को देने का अधिकार और उसे लागू करने आदि से संबंधित से संबंधित है। अनुच्छेद 142 के उपबंध-1 सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार देता है कि उसके पास आए किसी भी मामले में वह न्याय के लिए डिक्री या आदेश पारित कर सकेगा। यह डिक्री या आदेश पूरे भारत में लागू होगा।
इसके उपबंध-2 में कहा गया है कि इस संंबंध में संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन रहते हुए सुप्रीम कोर्ट पूरे भारत के किसी भी क्षेत्र के किसी व्यक्ति को हाजिर होने, दस्तावेज प्रस्तुत करने, अवमानना की जाँच करने या दंड देने का समस्त अधिकार उसके पास होगा। इस तरह अनुच्छेद 142 में स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा पारित कानून के दायरे में ही काम करना है।
हालाँकि, बात यहीं खत्म नहीं होती। कॉलेजियम के तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी भी काट निकाली है। पिछले कुछ वर्षों में अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग के विभिन्न उदाहरण पेश किए गए। हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में निर्णय देकर एक कानूनी ढाँचा विकसित किया।
यह ढाँचा संविधान के अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग से संबंधित था। इस निर्णय ‘एशियन रीसर्फेसिंग ऑफ रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम सीबीआई के पिछले निर्णय से बिल्कुल उलट था। सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट बार के फैसले में एशियन रीसर्फेसिंग के निर्णय को पलट दिया था। इसमें अनुच्छेद 142 के तहत नए दिशा-निर्देश जारी करने के अलावा अंतरिम आदेशों से संबंधित पहलुओं को भी शामिल किया।
इसमें विचार किया गया कि अंतरिम आदेश को रद्द करने या संशोधित करने का हाई कोर्ट का अधिकार क्या है और क्या अंतरिम आदेश किसी विशेष समय की समाप्ति पर खुद ही समाप्त हो सकता है। एशियन रिसर्फेसिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर विचार किया था। उस दौरान शीर्ष न्यायालय ने माना था कि जब तक अंतरिम आदेश का समय ना बढ़ाया न जाए, वह आदेश की तारीख से 6 महीने बाद स्वतः समाप्त हो जाता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस फैसले को उलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एशियन रीसर्फेसिंग मामले में निर्धारित समय बीत जाने पर अंतरिम आदेशों की स्वतः समाप्ति की शर्त लागू रहने योग्य नहीं थी और इसलिए इसे खारिज कर दिया। इसके बाद अनुच्छेद 142 में दिए गए अधिकारों के तहत उसने नए दिशा-निर्देश जारी किए।
इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्या कोई न्यायालय अंतरिम आदेश पारित करते समय कोई समय सीमा तय कर सकता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का उपयोग प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दबाने या वादियों के मूल अधिकारों को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग विवेक से और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, ताकि विवादों का निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाधान निकाला जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि अनुच्छेद 142 द्वारा दी गई शक्तियों का उद्देश्यपूर्ण न्याय सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने एशियन रीसर्फेसिंग में पहले दिए गए निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 226(3) के तहत पारित स्थगन आदेश को रद्द करने के लिए अनिवार्य शर्त स्थगन आदेश हटाने के लिए आवेदन दाखिल करना और न्यायालय द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग करना है। इस आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय नहीं लिया जाता है तो स्थगन आदेश स्वतः समाप्त नहीं होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थगन आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक कि इसके रद्द करने के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आवेदन का कारणों के साथ निपटारा नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को मामलों के निपटान के लिए कठोर समय-सीमा नहीं लगानी चाहिए, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो।
अपने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने जो नया गाइडलाइन तय किया उसके अनुसार, अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग न्यायालय द्वारा अपने समक्ष पक्षकारों के लिए पूर्ण न्याय करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करने में न्यायालय अन्य अधिकार क्षेत्रों में अन्य वादियों के पक्ष में पारित वैध न्यायिक आदेशों को रद्द नहीं करेगा।

राष्ट्रपति को निर्देश देने के लिए उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट पर क्यों भड़के?

हमने अपने पिछले आर्टिकल में बताया था कि क्या सुप्रीम कोर्ट भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को निर्देश सकते हैं या नहीं। इस आर्टिकल में हमने कई कानून पहलुओं पर विचार किया था। कई लोगों के मन में सवाल उठता होगा कि भारत में पदों की वरीयता क्रम क्या है। इससे भी साफ हो जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को निर्देश दे सकता है या नहीं।
अगर वरीयता क्रम की बात की जाए तो राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च पद है। राष्ट्रपति को भारत का पहला नागरिक कहा जाता है। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति और संसद को मिलाकर ही भारत बनता है और वह संघ के प्रशासन का प्रमुख होता है। इसी प्रशासन का एक अंग न्यायपालिका भी है। इस तरह देश का सर्वोच्च राष्ट्रपति का होता है।
भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल ही ऐसे दो पद हैं, जिनके खिलाफ अदालती कार्रवाई नहीं की जा सकती है। भारत के संविधान ने अनुच्छेद 361 के तहत इसका प्रावधान किया है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति और राज्यपालों के खिलाफ अदालती कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ना ही इन दोनों को किसी मामले में नोटिस जारी कर सकता है और ना ही निर्देश दे सकता है।
राष्ट्रपति के बाद देश में दूसरा सर्वोच्च पद उपराष्ट्रपति का होता है। इसके बाद तीसरे नंबर पर प्रधानमंत्री आते हैं। देश का चौथा सर्वोच्च पद राज्यपाल का होता है, जो उनके कार्य वाले राज्यों में होता है। इसके बाद वरीयता क्रम में पाँचवें स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति आते हैं। इसके बाद भारत के उपप्रधानमंत्री का पद वरीयता क्रम में 5A स्थान पर आता है।
                                    भारत में अधिकारियों का वरीयता क्रम (साभार: www.mha.gov.in)
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और लोकसभा स्पीकर का पद एक समान होता है। दोनों वरीयता क्रम में छठे नंबर पर आते हैं। इसके बाद सातवें नंबर पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में होते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री, राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी सातवें क्रम पर ही आते हैं।
भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति का क्रम 7A होता है। आठवें क्रम में राजदूत, भारत द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रमंडल देशों के आयुक्त, अपने राज्य के बाहर मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल होते हैं। नौंवें क्रम पर सुप्रीम कोर्ट के आते हैं। इसके बाद 9A पर संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, मुख्य चुनाव आयुक्त और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) आते हैं।
वरीयता क्रम मेें 10वें स्थान पर राज्यसभा के उपसभापति, राज्यों के उपमुख्यमंत्री, लोकसभा के उपसभापति, योजना आयोग (वर्तमान में नीति आयोग) के सदस्य और केंद्र सरकार के राज्यमंत्री आते हैं। वहीं, 11वें स्थान पर भारत के अटॉर्नी जनरल, कैबिनेट सचिव और अपने-अपने केंद्रशासित प्रदेशों के भीतर लेफ्टिनेंट गवर्नर (उपराज्यपाल) तक शामिल हैं। वरीयता क्रम में 12वें स्थान पर पूर्ण जनरल या समकक्ष रैंक के पद पर कार्यरत चीफ ऑफ स्टाफ।

पूरे देश में लागू हो समान नागरिक संहिता (UCC) : कर्नाटक हाई कोर्ट, कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है


कर्नाटक हाई कोर्ट ने 4 अप्रैल 2025 को संसद एवं राज्य विधानसभाओं से समान नागरिक संहिता (UCC) लागू करने के लिए हरसंभव प्रयास करने का आग्रह किया। अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 तहत समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने से भारत के संविधान की प्रस्तावना में निहित उद्देश्य और आकांक्षाएँ सही मायने में साकार होंगी। 

जस्टिस हंचते संजीवकुमार की एकल पीठ ने कहा कि समान नागरिक संहिता को लागू करने से महिलाओं के लिए न्याय सुनिश्चित होगा, सभी जातियों और धर्मों में समानता को बढ़ावा मिलेगा तथा भाईचारे के माध्यम से व्यक्तिगत गरिमा कायम रहेगी। न्यायालय ने कहा कि संविधान के अनुसार भारत में सभी महिलाएँ एक नागरिक के तौर पर समान हैं, लेकिन पर्सनल लॉ उनके साथ भेदभाव करते हैं।

कोर्ट ने कहा कि धर्म के आधार पर बने पर्सनल लॉ के कारण महिलाओं के भेदभाव होता है। हिंदू कानून के तहत बेटी को बेटे के समान जन्मसिद्ध अधिकार और पत्नी को अपने पति के बराबर दर्जा प्राप्त है। हालाँकि, मुस्लिम कानून के तहत ऐसी समानता नहीं दिखाई देती है। इसलिए, कोर्ट ने कानून के समक्ष समानता सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया।

कर्नाटक हाई कोर्ट के न्यायाधीश हंचते संजीवकुमार ने समान नागरिक संहिता कानून को लेकर संविधान सभा का तर्क दिया। उन्होंने कहा कि संविधान सभा में भी समान नागरिक संहिता विवाद का एक विषय था। जस्टिस संजीवकुमार ने कहा कि संविधान सभा के कुछ सदस्यों ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया और कुछ सदस्यों ने इसका विरोध किया था।

न्यायालय ने कहा, “संविधान की प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. बीआर अंबेडकर ने अपने सबसे शानदार भाषण में समान नागरिक संहिता के पक्ष में तर्क दिया है।” कर्नाटक हाई कोर्ट के जस्टिस संजीवकुमार ने आगे कहा कि सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ राजेंद्र प्रसाद, टी कृष्णमाचारी और मौलाना हसरत मोहानी जैसे प्रमुख नेताओं ने समान नागरिक संहिता का समर्थन किया था।

इसके अलावा, कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कई निर्णयों का भी हवाला दिया। इनमें मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम और अन्य (1985), सरला मुद्गल (श्रीमती) और अन्य बनाम भारत संघ और अन्य (1995) और जॉन वल्लमट्टम और अन्य बनाम भारत संघ (2003) प्रमुख हैं। इन फैसलों में सुप्रीम कोर्ट ने संसद को समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने का सुझाव दिया था।

दरअसल, कर्नाटक हाई कोर्ट ने यह टिप्पणी एक मामले की सुनवाई के दौरान की। अब्दुल बशीर खान नामक व्यक्ति की मृत्यु के बाद उनके कानूनी उत्तराधिकारियों के बीच संपत्ति बँटवारे को लेकर विवाद हो गया। दरअसल, अब्दुल बशीर ने अपनी मृत्यु से पहले कोई वसीयत नहीं लिखी थी। वे अपने पीछे कई अचल संपत्तियाँ छोड़ गए, जिनमें से कुछ पैतृक थीं तथा कुछ उन्होंने स्वयं अर्जित की थीं।

अब्दुल बशीर की मौत के बाद उनकी संपत्ति के बँटवारे को लेकर उनके बच्चों के बीच मतभेद उत्पन्न हो गए। बेटी शहनाज़ बेगम की मौत के बाद उनका प्रतिनिधित्व उनके शौहर सिराजुद्दीन मक्की (प्रतिवादी) ने किया। मक्की ने आरोप लगाया कि उन्हें संपत्ति के बँटवारे से बाहर रखा गया और उसमें से उन्हें उचित हिस्सा नहीं दिया गया। इसको लेकर मक्की ने बेंगलुरु सिविल कोर्ट में मुकदमा दायर किया।

नवंबर 2019 में ट्रायल कोर्ट ने माना कि विचाराधीन तीन संपत्तियाँ संयुक्त परिवार की संपत्ति का हिस्सा हैं और शहनाज़ बेगम उन में पाँचवें हिस्से की हकदार हैं। हालाँकि, ट्रायल कोर्ट ने अन्य संपत्तियों को बँटवारा योग्य नहीं बताया। ट्रायल कोर्ट के फैसले से असंतुष्ट अब्दुल बशीर के दो बेटों- समीउल्ला खान और नूरुल्ला खान तथा बेटी राहत जान (अपीलकर्ता) ने कर्नाटक हाई कोर्ट में अपील दायर की।

इधर, सिराजुद्दीन मक्की ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ आपत्ति दायर की, जिसमें अपने हिस्से को बढ़ाने या पहले के आदेश में संशोधन की माँग की गई। हाई कोर्ट ने दोनों पक्ष की याचिकाओं को स्वीकार किया और अपील एवं आपत्ति याचिका, दोनों पर एक साथ सुनवाई की। तमाम दलीलों को सुनने के बाद हाई कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा।

अमेरिकी Democrats भारत की कांग्रेस की प्रतिरूप (Replica) है ; जो दुष्प्रचार मोदी के लिए कांग्रेस ने किया, Democrats वही प्रचार डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध कर रहे है; कांग्रेस और Democrats के लिए script लिखने वाले एक ही हैं George Soros और Jinping

सुभाष चन्द्र 

ऐसा ही प्रतीत हो रहा है कि अमेरिकी Democrats कांग्रेस पार्टी के पदचिन्हों पर चल रही है जैसे उसकी ही replica हो। कांग्रेस भारत के विरोध में खड़ी है, अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने का भाजपा और मोदी पर आरोप लगाती है, हर समय मुसलमानों का साथ देती है। वैसे ही Democrats राजनीतिक दृष्टि से भारत का विरोध ही करते हैं और मुसलमानों को लेकर भाजपा सरकार के खिलाफ अनाप शनाप आरोप लगाते हैं। कांग्रेस और अमेरिका पाकिस्तान पर फ़िदा रहते हैं। कांग्रेस की तरह Democrats की निगाहें भी मुस्लिम वोटर पर हैं जबकि भारतीय समुदाय के Democrats को समर्थन में 19% की कमी आई है।

लेखक 
चर्चित YouTuber 
भारत के चुनाव में विपक्ष ने नेरेटिव चलाया था कि मोदी सत्ता में वापस आया तो संविधान बदल देगा; dictator बन जाएगा (ऐसा आरोप पहले से लगाते रहे हैं कि मोदी तानाशाह है); और सभी विपक्षी नेताओं को जेल में डाल देगा।
भारत में तो कांग्रेस और मोदी विरोधियों द्वारा नरेंद्र मोदी के विरुद्ध चले दुष्प्रचार से यह तो साबित हो गया जनता शिक्षित होते हुए किसी अशिक्षित और मंद बुद्धि से कम नहीं। अब देखना है कि अमेरिका का शिक्षित भी अशिक्षित और मंद बुद्धि होने का सबूत देगा। भारत में तो काफी हद तक George Soros और Jinping को धूल चाटनी पड़ी है, अब अमेरिका में चल रहे इन दोनों के दुष्प्रचार का वहां की जनता कितनी शिकार होती है। अपने देश के स्वाभिमान की रक्षा के लिए अमेरिका की जनता को डोनाल्ड ट्रम्प को जिताकर George Soros और Jinping को धूल चटानी होगी, वरना अमेरिका का अस्तित्व कब खतरे में पड़ जाए, कहना मुश्किल है। 

उधर अमेरिका में Democrat कमला हैरिस ऐसा ही नेरेटिव डोनाल्ड ट्रंप के विरुद्ध गढ़ रही है कि “अगर ट्रंप राष्ट्रपति बना तो संविधान ख़त्म करा देगा (abolish); ट्रंप Dictator बन जाएगा और हम सभी जेल भेज दिए जाएंगे; Oppressed classes (भारत में दलित)  के अधिकार छीन लिए जाएंगे। यह हमारे जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चुनाव है और हमें किसी भी हाल में ट्रंप को आने से रोकना है”।

लगता है कांग्रेस और Democrats के लिए script लिखने वाले एक ही हैं George Soros और Jinping क्योंकि इन दोनों ने पिछले चुनाव में ट्रंप को हटाने में बहुत योगदान दिया था और भारत में तो मोदी को हटाने के लिए हर चुनाव में पैसा पानी की तरह बहाते हैं।

लेकिन Democrats को यह समझना होगा कि अभी अमेरिका में इतने मुस्लिम नहीं हैं कि चुनाव का रुख पलट दें जैसे भारत में 100 लोकसभा सीटों पर मुसलमान असर डालते हैं। और वैसे भी Democrats अपनी हार दीवारों पर लिखी देख रहे है। ट्रंप की जीत की संभावना 63% हैं और बिडेन की 37% थी लेकिन बिडेन के चुनाव से हटने के बाद भी कोई ऐसा नहीं है जो जीत की संभावना को ट्रंप के बराबर ले जा सके।

कांग्रेस ने 39 साल पहले शरिया के लिए रौंदा संविधान; राहुल गांधी बताएं- हिंदुस्तान संविधान से चलेगा या शरिया से ?


हिंदुस्तान संविधान से चलेगा या शरिया से? यह एक बड़ा सवाल भारतीय समाज के सामने उठ खड़ा हुआ है। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ते के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एतराज जताया है। बोर्ड ने सर्वोच्च अदालत के फैसले पर कहा कि यह ‘शरिया’ (इस्लामी कानून) के खिलाफ है। सर्वोच्च अदालत ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को इद्दत की अवधि के बाद गुजारा भत्ता मांगने की अनुमति दी है। लेकिन भारतीय मुसलमान इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। वे अपनी सुविधा के अनुसार कभी संविधान तो कभी शरिया मानना चाहते हैं। वे शरिया के अनुसार चार शादियां करना चाहते हैं, वे तलाक के बाद महिलाओं को गुजारा भत्ता नहीं देना चाहते। शरिया में पत्थर मारकर मौत की सजा देना भी शामिल है, लेकिन वे इसकी चर्चा तक नहीं करते। इन दिनों संविधान की किताब हमेशा साथ लेकर चलने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अब अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए कि भारतीय मुसलमान जो संविधान को नहीं मानना चाहते तो उनसे क्या कहेंगे।

तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भी भरण-पोषण पाने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक फैसले में कहा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अनुसार पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार रखती हैं। इसके लिए वह याचिका दायर कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला मोहम्मद अब्दुल समद नामक मुस्लिम युवक की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि उसका यह निर्णय हर धर्म की महिला पर लागू होगा। इसी को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरीयत के खिलाफ बता रहा है।

AIMPLB ने कहा-सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाहबानो केस जैसा
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की रविवार (14 जुलाई) को हुई कार्यसमिति की बैठक में आठ प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। यह जानकारी बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने दी। बैठक के बाद AIMPLB ने बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शाहबानो केस जैसा बताया और कहा कि ये फैसला शरीयत कानून में मतभेद पैदा करने वाला है। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को मजहब के मुताबिक ज़िंदगी जीने का अधिकार है। इसके साथ ही AIMPLB ने उत्तराखंड के UCC को धार्मिक आजादी के खिलाफ बताते हुए उसे भी चुनौती देने का ऐलान किया। बोर्ड ने कहा कि यह संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता का भी हनन करता है। बोर्ड का कहना कहा कि गुजारा भत्ता वास्तव में मुस्लिम महिलाओं के लिए भीख है। जब पति ने महिला से रिश्ता ही खत्म कर लिया, तो वह उससे गुजारा-भत्ता के रूप में भीख क्यों मांगे।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम महिलाओं के हित में नहींः AIMPLB
AIMPLB के प्रवक्ता डॉ क़ासिम रसूल इलियास ने बताया कि बोर्ड की वर्किंग कमेटी में 5 महिलाओं समेत 51 मेंबर हैं। इसकी मीटिंग में पहला resolution सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट पर पास किया गया। इसमें कहा गया है कि निकाह एक पवित्र बंधन होता है लेकिन हम अपने मज़हब के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारे ये हमारा पर्सनल राइट है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये आदेश महिलाओं के हित में है लेकिन हमें लगता है कि ये महिलाओं के हित में नहीं है।

पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगाः AIMPLB
इलियास ने बताया कि इस्लाम तलाक को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करता है। अगर तलाक के बाद भी पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगा? और अगर रिश्ते में कड़वाहट आ गई है तो इसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा? हम कानूनी समिति से सलाह-मशविरा करके इस फैसले को वापस लेने के बारे में विचार विमर्श करेंगे। हम अपनी लीगल कमेटी से कंसल्ट करके इसे रोलबैक कराने पर विचार करेंगे।

उत्तराखंड में यूसीसी को देंगे चुनौती
सैयद कासिम इलियास ने कहा कि उत्तराखंड के यूसीसी कानून को चुनौती दी जाएगी। उन्होंने कहा कि विविधता हमारे देश की पहचान है, जिसे हमारे संविधान ने संरक्षित रखा है। यूसीसी इस विविधता को खत्म करने का प्रयास है। यूसीसी न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि हमारी धार्मिक स्वतंत्रता के भी खिलाफ है। उत्तराखंड में पारित यूसीसी सभी के लिए परेशानी का कारण बन रही है। हमने उत्तराखंड में यूसीसी को चुनौती देने का फैसला किया है। हमारी कानूनी समिति तैयारी में जुटी है।

शरिया नहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट को मानते हैं भारतीय मुसलमान
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय मुसलमान खुद शरिया को नहीं मानते हैं। वे अंग्रेजों द्वारा बनाए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अप्लीकेशन एक्ट 1937 को मानते हैं। यह मुसलमानों के बीच विवाह, गोद लेने, विरासत, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने के लिए इस्लामी कानून को मान्यता देता है। मुस्लिमों में निकाह (विवाह) को एक अनुबंध माना जाता है, जो संतानोत्पतत्ति और बच्चों को वैध बनाने के लिए होता है। इसीलिए मुस्लिम शादियों में निकाहनामा (विवाह अनुबंध) की व्यवस्था है। इसमें महर का जिक्र भी होता है। महर वह धनराशि है जो विवाह के समय वर या वर का पिता, कन्या को देता है। एक महर तत्काल होती है, जो महिला को विवाह के वक्त ही मिल जाती है। दूसरी महर निकाह के वक्त तय कर दी जाती है, जो तलाक या पति की मृत्यु के वक्त मिलती है।

शरीयत में तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार नहीं
आमतौर पर शरीयत में तलाक के बाद महिलाओं को इद्दत तक गुजारा-भत्ता पाने और महर (मेहर) के अलावा गुजारा-भत्ता पाने का सामान्य अधिकार नहीं है। इद्दत सामान्यतौर पर तलाक या पति की मृत्यु के बाद तीन माह तक की अवधि होती है। हालांकि, तलाक के वक्त अगर कोई महिला गर्भवती है तो बच्चे के पैदा होने तक का खर्च पति उठाएगा। इसके बाद अगर मां बच्चे को दूध पिलाती है तो केवल बच्चे का खर्च पिता देगा। बाकी तलाकशुदा लड़की के लिए केवल पिता और भाई जिम्मेदार होते हैं।

सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मांग सकती थीं अधिकार
हालांकि, साल 1986 के पहले तक सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मुस्लिम महिला भरण-पोषण का अधिकार मांग सकती थी. सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने का अधिकार सभी धर्मों की महिलाओं के पास था और मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, 1985 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इसकी पुष्टि भी की थी।

शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना नजीर
शाहबानो इंदौर की रहने वाली एक महिला थी। साल 1975 में शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान ने उसे तलाक दे दिया। शाहबानो और उसके 5 बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। उस समय शाहबानो की उम्र 59 साल की थी। शाहबानो ने अदालत से न्याय की मांग की । हालांकि उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने दलील दी कि तीन तलाक के बाद इद्दत की मुद्दत तक ही तलाकशुदा महिला की देखरेख की जिम्मेदारी उसके पति की होती है। तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का कोई प्रावधान नहीं है। मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा था। लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। पांच जजों की संविधान पीठ ने 23 अप्रैल 1985 को मुस्लिम पर्सनल लॉ बॉर्ड के आदेश के खिलाफ जाते हुए शाहबानो के पति को आदेश दिया कि वो अपने बच्चों को गुजारा भत्ता दे।

मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेके
सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो मामले में फैसला आने के बाद भारतीय मुसलमानों ने विरोध करना शुरू कर दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेक दिए थे। मुस्लिम तुष्टिकरण में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 सदन में पेश किया। शाहबानो मामले में राजीव गांधी की सरकार के द्वारा उठाए गए कदम को लेकर देश भर में सरकार के खिलाफ एक माहौल देखने को मिला।

कांग्रेस ने 39 साल पहले शरिया के लिए रौंदा संविधान
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता का अधिकार दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बड़ी राहत और मानवीय संवेदनाओं वाला बताते हुए भाजपा ने कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया है। भाजपा सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. सुधांशु त्रिवेदी ने शाह बानो केस याद दिलाते हुए कहा कि 39 साल पहले राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने शरिया के लिए संविधान को रौंदा था। उन्होंने कहा कि 1985 में संविधान पर बहुत बड़ा खतरा आया था, जब शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक गरीब मुस्लिम महिला को भत्ता देने के लिए आया था। तब उसे शरिया के विरुद्ध मानकर राजीव गांधी के नेतृत्व में चल रही तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को रौंदकर संविधान के ऊपर शरिया को कर दिया था। तब संविधान खतरे में था। यह हमें फिर याद दिलाता है कि जब-जब यह सत्ता में आए, अनेक बार संविधान को खतरे में डाला।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019
इसके बाद मोदी सरकार ने साल 2019 में मुस्लिम महिलाओं के हक की रक्षा के लिए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019 लाया। इसके तहत अगर किसी मुस्लिम महिला को पति ने तलाक कहकर तलाक दे दिया है, तो वह भरण-पोषण भत्ता मांग सकती है। यही नहीं, इस अधिनियम के तहत अगर कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप में या किसी भी दूसरे तरीके से तलाक की घोषणा करता है तो वह शून्य और अवैध माना जाएगा। हालांकि, तलाकशुदा मुस्लिम महिला के पास यह अधिकार है कि वह इस अधिनियम को माने या फिर किसी अन्य कानून या परंपरा में उपलब्ध दूसरे विकल्प का चुनाव करे।

पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले की 3 बड़ी बातें
1. SC का फैसला शरिया कानून के खिलाफ
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरियत के खिलाफ बताया है। AIMPLB के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला शरिया कानून से कॉन्फ्लिक्ट करता है। उन्होंने कहा कि मुसलमान शरिया कानून का पाबंद है। वो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकता जो शरिया से कॉन्फ्लिक्ट करता हो. उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 25 में हमें अपने मजहब के अनुसार जिंदगी गुजारने की आजादी दी गई है, ये हमारा मौलिक अधिकार है. वहीं AIMPLB की एग्जीक्यूटिव मेंबर मुनीसा ने भी SC के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा है कि यह महिलाओं के हक में नहीं है।

2. महिलाओं के लिए मुसीबत साबित होगा फैसला
AIMPLB का कहना है कि सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं को कोई फायदा नहीं होगा बल्कि ये फैसला उनके लिए एक नई मुसीबत पैदा कर देगा। बोर्ड का कहना है कि अगर किसी शख्स को तलाक के बावजूद आजीवन पत्नी का खर्चा उठाना पड़ेगा तो फिर वो तलाक क्यों देगा? बोर्ड के प्रवक्ता ने दावा किया है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को आजीवन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. उनका पति उन्हें तलाक न देकर आजीवन परेशान करता रहेगा।

3. फैसले के खिलाफ लड़ेंगे कानूनी लड़ाई
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में तय किया गया है कि गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। बैठक में वर्किंग कमेटी ने बोर्ड को अथॉरिटी दी है कि लीगल कमेटी से बात कर इस फैसले को रोलबैक करने की दिशा में काम किया जाए. बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा है कि हमने ये महसूस किया है कि देश में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल है और मुसलमानों के लिए शरिया लॉ है। कोर्ट का ये फैसला शरियत से कॉन्फ्लिक्ट करता है लिहाजा हम पूरी कोशिश करेंगे कि इस फैसले को रोलबैक किया जाए।

जवाब दो क्या संविधान या सेकुलरिज्म नाम छुपाकर व्यापार करने की इजाजत देता है? खुद के लिए चाहिए ‘हलाल’ सिस्टम, कांवड़ रूट पर ‘पहचान’ सिस्टम से भी परेशानी; देश में संविधान और सेकुलरिज्म के नाम कितना बड़ा ढोंग रचा जा रहा है

उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में पुलिस ने कांवड़ यात्रा रूट पर खाने-पीने की सभी दुकानों पर मालिकों का नाम लिखने का आदेश जारी किया। 22 जुलाई से शुरू होने वाली कांवड़ यात्रा से पहले मुजफ्फरनगर जिले के सभी दुकानदारों, ढाबों, फल विक्रेताओं और चाय की दुकानों ने प्रशासन के निर्देशानुसार अपने प्रतिष्ठानों या वेंडिंग ठेलों पर मालिकों या कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करना शुरू कर दिया है। प्रशासन का कहना है कि इस निर्देश का उद्देश्य धार्मिक यात्रा के दौरान भ्रम से बचना और पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। लेकिन प्रशासन के इस कदम से तुष्टिकरण के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकने वाले कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन सहित लेफ्ट लिबरल गैंग को मिर्ची लग गई। यहां तक कि इस पहल को विवाद बनाने में जावेद अख्तर जैसे बुद्धिजीवी भी कूद पड़े हैं। जावेद अख्तर ने इसकी तुलना जर्मनी के नाजी शासन से कर डाली और कहा कि नाजी शासन में दुकानों पर निशान लगते थे। इनका दोगलापन देखिए कि खुद के लिए ‘हलाल’ सिस्टम चाहिए, लेकिन कांवड़ रूट पर ‘पहचान’ सिस्टम से भी परेशानी हो रही है।

असली नाम बताने से किसी को क्या तकलीफ हो रही है? इस कदम का विरोध करने वाला दिखाए कि 'संविधान नाम छुपाकर व्यापार करने की इजाजत देता है।' संविधान को वास्तविकता में लाओ। सिर्फ कांवर रास्ते में ढाबे और खाने के होटलों पर असली नाम लिखने से जो छल, कपट और धोखा टीवी पर चौकाने वाले समाचारों सामने आ रहे हैं,  उसे देख लगता है कि देश में संविधान और सेकुलरिज्म के नाम कितना बड़ा ढोंग रचा जा रहा है। छद्दम सेक्युलरिस्टों की चीख-पुकार जायज है, क्योकि उनकी दोगलापन जगजाहिर हो गया है। अगर यही सिस्टम पूरे देश में लागू हो गया, निश्चितरूप से तूफान खड़ा हो जाएगा।  

हिंदू हलाल खाना बंद कर दे तो सेक्यूलरिज्म खतरे में !
दिलचस्प बात यह है कि हिंदू अगर हलाल सर्टिफिकेट का खाने को मना कर दे तो सेक्यूलरिज्म ख़तरे में हो जाता है। हिंदू अगर थूका हुआ खाने को मना कर दे तो भी सेक्यूलरिज्म ख़तरे में आ जाता है। यह समझ से परे है कि अपनी पहचान बताने में क्या हर्ज है ? क्या विपक्ष और लेफ्ट लिबरल कुतर्क की राजनीति नहीं कर रहे हैं? जब एक समुदाय के लोग कहते हैं कि हमें खाने पीने की चीजों पर हलाल मार्का चाहिए ताकि हमें पता चले कि हम जो खा रहे हैं क्या खा रहे हैं किसके यहां का खा रहे हैं। लेकिन जब यही बात दूसरे समुदाय के लोग करते हैं तब उनके पेट में मरोड़ उठने लगती है, यह दोगलापन है।

प्रशासन का निर्देश- पहचान के साथ करें दुकानदारी
एसएसपी अभिषेक सिंह ने कहा कि कांवड़ यात्रा की तैयारियां शुरू हो गई हैं। जिले में कांवड़ियों की ओर से लिए जाने वाले मार्गों की कुल लंबाई करीब 240 किलोमीटर है। इन मार्गों पर स्थित सभी भोजनालयों पर मालिकों या कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित होना चाहिए। एसएसपी ने कहा कि होटल हों, ढाबे हों या ठेले हों, जहां से कांवड़िए खाद्य सामग्री खरीदते हैं, उनके लिए आदेश जारी किया गया। दुकानदारों को निर्देश दिया गया है कि वे अपनी पहचान के साथ दुकानदारी करें यानी सभी दुकानदारों को अपनी दुकान पर नाम का बोर्ड लगाने को कहा गया है। मुजफ्फरनगर में कांवड़ यात्रा के रास्ते पर पड़ने वाले बहुत से मुस्लिम दुकानदारों ने बोर्ड लगाने शुरू कर दिए हैं।

यूपी के साथ उत्तराखंड सरकार का फैसला- नाम का बोर्ड लगाना होगा
उत्तर प्रदेश के साथ-साथ उत्तराखंड की धामी सरकार ने भी फैसला किया है कि कांवड़ के रास्ते में पड़ने वाले दुकानदारों को अपना असली नाम का बोर्ड लगाना होगा। प्रशासन का निर्देश आते ही विपक्षी दलों और लेफ्ट लिबरल गैंग को मिर्ची लग गई है। मुजफ्फरनगर के दुकानदार प्रशासन का आदेश मान कर बोर्ड लगाना शुरू कर चुके हैं लेकिन इस फैसले पर सियासत शुरू हो गई है। अदसदुद्दीन ओवैसी से लेकर महुआ मोईत्रा तक ने योगी सरकार को घेरा है। AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी से लेकर अखिलेश यादव, पवन खेड़ा, जावेद अख्तर और तृणमूल कांग्रेस की सांसद महुआ मोईत्रा ने तक ने फैसले पर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

शिकायतों के बाद प्रशासन ने उठाया यह कदम
पिछले वर्ष कावड़ यात्रा के समय मुजफ्फरनगर के बघरा में स्तिथ आश्रम के संचालक स्वामी यशवीर महाराज ने राष्ट्रीय राजमार्ग 58 पर स्थित होटल ढाबो के मुस्लिम समाज के लोगों द्वारा हिंदू देवी देवताओं के नाम पर आधारित नाम रखने का आरोप लगाते हुए कार्रवाई की मांग की थी। इस बार भी स्वामी यशवीर महाराज ने प्रशासनिक अधिकारियों से बात कर मुस्लिम होटल संचलको के नाम मोटे अक्षरों में अंकित करने की मांग की थी। हाल ही में मुजफ्फरनगर के विधायक और यूपी के मंत्री कपिल देव अग्रवाल ने एक जिला स्तरीय बैठक में कहा कि मुसलमानों को किसी भी विवाद से बचने के लिए हिंदू देवी-देवताओं के नाम पर अपनी दुकानों का नाम नहीं रखना चाहिए। जिला प्रशासन ने मंत्री की चिंता पर ध्यान दिया और पुलिस को कुछ शिकायतें भी मिली थीं। इसी को मद्देनजर रखते हुए निर्देश जारी किए।

दुकानदार स्वेच्छा से निर्देश का पालन कर रहेः SSP
मुजफ्फरनगर के एसएसपी अभिषेक सिंह का कहना है कि मुजफ्फरनगर में कांवड़ यात्रा का मार्ग 240 किलोमीटर है। इस मार्ग पर खान-पान के जितने ठेले और होटल हैं, इन जगहों से अपने लिए खाने-पीने की चीजें खरीदते हैं। इन दुकानदारों से कहा गया है कि वे अपने प्रोपराइटर और वहां काम करने वालों के नाम बाहर प्रदर्शित करें ताकि कावंड़ियों में किसी तरह की भ्रम की स्थिति उत्पन्न न हो। हमारी कोशिश है कि कांवड़ यात्रा के दौरान कहीं आरोप-प्रत्यारोप और कानून-व्यवस्था बिगड़ने की स्थिति न बने। मार्ग पर सभी दुकानदार स्वेच्छा से इस निर्देश का पालन कर रहे हैं।

फैसला वापस लेने का सवाल ही नहींः DIG सहारनपुर
सहारनपुर के DIG ने कहा कि योगी सरकार ठेलों-दुकानों पर नाम लिखवाने से पीछे नहीं हटेगी, बल्कि सवाल ही नहीं है। कांवड़ मार्ग पर बहुत शिकायतें आई हैं, यहां अनियमित रेट वसूले जाते हैं और मांस आदि की बिक्री की जाती थी। अब ऐसा नहीं करने दिया जाएगा।

वैष्णो ढाबा, खाटू श्याम ढाबा, गणपित ढाबा- सबके मालिक मुसलमान
सहारनपुर में जनता वैष्णो ढाबा, आगरा-मथुरा रोड पर खाटू श्याम ढाबा, बरेली में चौधरी स्वीट्स, हरिद्वार रोड पर न्यू गणपति टूरिस्ट ढाबा नंबर-1, मुजफ्फरनगर में ओम शिव वैष्णो ये सभी दुकान पहचान बदलकर खोले गए हैं। इनके मालिक मुसलमान हैं। बिहार में उजियार आलम ने अपना नाम अर्जुन सिंह बताकर दुकान खोली और हिंदू लड़कियों को काम पर रखने लगा। उसका मकसद लड़कियों को लव जिहाद में फंसाकर धर्मांतरण करना था। इस काम के लिए उसे जरूर कहीं से पैसे मिलते होंगे, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

असदुद्दीन ओवैसी ने अफ्रीका और जर्मनी से की तुलना
AIMIM सुप्रीमो असदुद्दीन ओवैसी ने इस फैसले की तुलना दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद और जर्मनी में यहूदिया के बहिष्कार से की। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा है, ‘उत्तर प्रदेश पुलिस के आदेश के अनुसार अब हर खाने वाली दुकान या ठेले के मालिक को अपना नाम बोर्ड पर लगाना होगा ताकि कोई कांवड़िया गलती से मुसलमान की दुकान से कुछ न खरीद ले। इसे दक्षिण अफ्रीका में अपारथाइड कहा जाता था और हिटलर की जर्मनी में इसका नाम ‘Juden Boycott’ था।

महुआ मोईत्रा ने संविधान विरोधी बताया
टीएमसी की सांसद महुआ मोईत्रा ने मुजफ्फरनगर प्रशासन के इस फैसले के संविधान विरोधी बताते हुए लिखा, ‘आगे क्या? क्या मुसलमान अपनी पहचान के लिए अपनी आस्तीन पर स्टार ऑफ डेविड का निशान पहनेंगे? अगली बार जब कांवड़ियों या उनके परिवारों को डॉक्टर या खून की आवश्यकता हो तो उनके इलाज के लिए दूसरी कांवड़ ढूंढ लें। यह पूरी तरह से अवैध और संविधान विरोधी है।’

यह सरकार प्रायोजित कट्टरताः पवन खेड़ा
कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने इसे ‘सरकार प्रायोजित कट्टरता’ करार दिया। खेड़ा ने एक पोस्ट में कहा, “सिर्फ राजनीतिक दलों को ही नहीं सभी सही सोच वाले लोगों और मीडिया को इस राज्य प्रायोजित कट्टरता के खिलाफ उठ खड़े होना चाहिए। हम BJP को देश को अंधकार युग में वापस धकेलने की अनुमति नहीं दे सकते।”

दुकानों पर नाम लिखने के आदेश पर भड़के अखिलेश यादव
अखिलेश यादव ने अपने सोशल मीडिया अकाउंट पर लिखा ‘… और जिसका नाम गुड्डू, मुन्ना, छोटू या फत्ते है, उसके नाम से क्या पता चलेगा? माननीय न्यायालय स्वत: संज्ञान ले और ऐसे प्रशासन के पीछे के शासन तक की मंशा की जाँच करवाकर, उचित दंडात्मक कार्रवाई करे. ऐसे आदेश सामाजिक अपराध हैं, जो सौहार्द के शांतिपूर्ण वातावरण को बिगाड़ना चाहते हैं।’

जावेद अख्तर ने कहा- नाजी शासन में दुकानों पर निशान लगते थे
कवि, गीतकार बुद्धिजीवी जावेद अख्तर को भी यह बात हजम नहीं हो पाई जावेद अख्तर ने इसकी तुलना जर्मनी के नाजी शासन से कर डाली और कहा कि नाजी शासन में दुकानों पर निशान लगते थे। जावेद अख्तर ने सोशल मीडिया पर लिखा, ‘मुजफ्फरनगर यूपी पुलिस ने निर्देश दिया है कि निकट भविष्य में किसी विशेष धार्मिक जुलूस के मार्ग पर सभी दुकानों, रेस्टोरेंट और यहां तक ​​कि वाहनों पर मालिक का नाम प्रमुखता से और स्पष्ट रूप से दर्शाया जाना चाहिए। क्यों? नाजी जर्मनी में वे केवल विशेष दुकानों और घरों पर ही निशान बनाते थे।’

मोहम्मद जुबैर ने बताया- यह खतरनाक है!
लेफ्ट लिबरल गैंग से मोहम्मद जुबैर ने सोशल मीडिया पर लिखा- यह ख़तरनाक है। उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर में, एसपी अभिषेक सिंह ने कांवर यात्रा के मार्ग पर पड़ने वाले होटलों, ढाबों और छोटे विक्रेताओं को आदेश दिया कि वे मालिकों के धर्म की पहचान करने के उद्देश्य से उनकी दुकानों के सामने उनके नाम प्रदर्शित करें।

राजदीप सरदेसाई का सबका साथ सबका विकास पर तंज 
पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने सोशल मीडिया पर लिखा- तो अब, यूपी में कांवर यात्रा मार्ग पर खाद्य विक्रेताओं,फेरीवालों को पुलिस ने अपने ठेले,दुकानों,रेस्तरां पर अपना नाम लिखने के सख्त निर्देश दिए हैं। वास्तव में, यह एक संकेत है कि मुस्लिम मालिक वाली दुकानों से कोई भोजन नहीं खरीदा जाएगा! दक्षिण अफ्रीका में, ऐसी प्रथाओं को एक बार ‘रंगभेद’ परिभाषित किया गया था। सबका साथ, सबका विकास किसी का?

थूक जिहाद वालों की हो सकेगी पहचान 
आखिर इन पर लोग कैसे विश्वास करे। आजकल सोशल मीडिया अलग-अलग शहरों के अनेक वीडियो वायरल हो रहे होते हैं जहां इस समुदाय के लोग थूक जिहाद कर रहे होते हैं। फलों में थूक लगाकर पैक करते हैं। सैलून में थूक मिलाकर फेस मसाज करते हैं। गंदी नालियों में सब्जियों को धोते हैं। समोसे में गाय मांस मिलाकर बेचते हैं। ऐसे अनेक उदाहरण वीडियो प्रमाण के साथ हैं। ऐसे में हिंदुओं को यह जानने का अधिकार है कि जिस दुकान से वे अपने व्रत के लिए फल खरीद रहे हैं वह दुकान कौन चला रहा है।

दुबई में भी हिंदू पहचान छिपाकर नहीं खोलते दुकान
सोशल मीडिया पर एक यूजर मो. आसिफ खान ने लिखा- मुस्लिम बहुल देशों में लाखों हिंदू रह रहे हैं। वे अपनी रोजी-रोटी कमा रहे हैं और अपने देश को धन भेज रहे हैं। अगर उन देशों में मुसलमान ऐसी हरकतें करने लगें तो क्या होगा? इसका जवाब देते हुए कश्मीरी हिंदू नामक यूजर ने कहा- ये है दुबई में रेस्टोरेंट “इंड्या बाय विनीत”। हिंदू आप लोगों की तरह अपनी पहचान नहीं छिपाते। दुबई के इस रेस्टोरेंट में गणेश जी मूर्ति भी लगी हुई है। अब जिसको खाना है आकर खाए जिसको नहीं खाना वो न आए। कम से कम वो पहचान तो नहीं छिपा रहे। लेकिन भारत में तो पहचान छिपाकर गलत हरकतें की जा रही हैं।

हिंदुओं पर थोपा गया है हलाल सर्टिफिकेट
भारत में खाने पीने के सामान का प्रमाणन करने वाला FSSAI हलाल सर्टिफिकेट नहीं देता है। भारत में हलाल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, हलाल सर्टिफिकेशन सर्विसेज इंडिया प्राइवेट लिमिटेड, जमीयत उलमा-ए-महाराष्ट्र (जमीयत उलमा-ए-हिंद की एक राज्य इकाई) और जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट जैसे कुछ संगठन कोई उत्पाद हलाल है नहीं, इसका प्रमाण पत्र जारी करते हैं। हलाल मुस्लिमों के खाने-पीने के सामान और विशेष कर मांस से सम्बन्धित है। यानी जो हलाल उत्पाद हैं, उन्हें मुस्लिम खा सकते हैं। मांस का हलाल होना इस बात का प्रमाणन है कि वह उसी तरीके से काटा गया है, जैसा इस्लामी किताबों में बताया गया है। हलाल सर्टिफिकेट यूं तो मुसलमानों के लिए होती है लेकिन इसे हिंदुओं पर भी थोपा जाता है। किसी कंपनी का सामान अगर हिंदू खरीदते हैं और उस पर हलाल सर्टिफेकेट है तो इसका मतलब है कि यह हिंदुओं पर थोपा गया है। क्योंकि हिंदुओं को हलाल से कोई मतलब नहीं है। यानी 18 प्रतिशत मुसलमानों के लिए जो हलाल सर्टिफिकेट लगाया गया है वह 80 प्रतिशत हिंदुओं पर भी थोप दिया गया।

बेवजह हलाल सर्टिफिकेट के लिए पैसे भरते हैं हिंदू
जमीयत उलेमा-ए-हिंद हलाल ट्रस्ट हलाल इकोसिस्टम में आने वाली एक कम्पनी से 60,000 रुपये रजिस्ट्रेशन और फिर 1500 रुपये प्रति उत्पाद हलाल प्रमाणन के लिए लेती है। इसके ऊपर से GST भी लगता है। अगर कोई कंपनी 10 उत्पाद बनाती है और उसको हलाल प्रमाणन की आवश्यकता है तो उसे 75,000 रुपये + GST देना होगा। यह धनराशि सिर्फ तीन साल के लिए है, इसके बाद दोबारा फीस देनी होती है। कंपनियां इस सर्टिफिकेट को लेने के लिए जो खर्च करती हैं वह पैसे भी उत्पाद की लागत पर जोड़ देती हैं। इस तरह 80 प्रतिशत हिंदू जब भी हलाल सर्टिफिकेट वाले उत्पाद खरीदते हैं तो वे इसके लिए भी पैसा चुकाते हैं।