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लोकसभा स्पीकर के बराबर हैं CJI, फिर राष्ट्रपति को आदेश दे सकता है सुप्रीम कोर्ट? क्या है आर्टिकल 142? उपराष्ट्रपति ने क्यों बताया ‘न्यूक्लियर मिसाइल’?


केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा बनाए गए वक्फ संशोधन अधिनियम-2025 की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट सुनवाई कर रहा है। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने देश के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को भी समय सीमा देते हुए निर्देश जारी किया था। अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने न्यायपालिका पर फिर से निशाना साधा है और कहा कि वह अपने अधिकार क्षेत्र से आगे बढ़कर विधायिका के मामले में हस्तक्षेप कर रही है।

उपराष्ट्रपति धनखड़ ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर गंभीर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 142 लोकतांत्रिक ताकतों के खिलाफ एक ‘परमाणु मिसाइल’ बन गया है, जो न्यायपालिका के पास 24 घंटे उपलब्ध होता है।। उपराष्ट्रपति का बयान ऐसे समय में आया है, जब संसद के दोनों सदनों द्वारा पारित वक्फ अधिनियम के कुछ प्रावधानों पर सुप्रीम कोर्ट ने आपत्ति जताई और उसे रोकने की बात कही।

उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने कहा, “हाल ही में एक निर्णय के माध्यम से राष्ट्रपति को निर्देश दिया गया है। हम कहाँ जा रहे हैं? देश में क्या हो रहा है? हमने लोकतंत्र के लिए इस दिन की कभी उम्मीद नहीं की थी। हमारे पास ऐसे न्यायाधीश हैं जो कानून बनाएँगे, कार्यकारी कार्य करेंगे, सुपर-संसद के रूप में कार्य करेंगे और उनकी कोई जवाबदेही नहीं होगी, क्योंकि देश का कानून उन पर लागू नहीं होता है।”

उपराष्ट्रपति ने कहा, “हम ऐसी स्थिति नहीं बना सकते, जहाँ आप (सुप्रीम कोर्ट) भारत के राष्ट्रपति को निर्देश दें। वह भी किस आधार पर? संविधान के तहत आपके पास एकमात्र अधिकार अनुच्छेद 145(3) के तहत संविधान की व्याख्या करना है।” उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 145(3) के अनुसार किसी महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर कम-से-कम 5 न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा निर्णय लिया जाना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जब पाँच न्यायाधीशों वाली पीठों का निर्णय निर्धारित किया गया था, तब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या आठ थी। धनखड़ ने बिल के संबंधित मामले को लेकर कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति के खिलाफ निर्णय दो न्यायाधीशों वाली पीठ द्वारा दिया गया था। अब सर्वोच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या बढ़कर 31 हो गई है।

उन्होंने यहाँ तक कहा कि संविधान पीठ में न्यायाधीशों की न्यूनतम संख्या बढ़ाने के लिए अनुच्छेद 145(3) में संशोधन करने की आवश्यकता है। उपराष्ट्रपति ने राज्यसभा के प्रशिक्षुओं के छठे बैच को संबोधित करते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा राष्ट्रपति को बिल पर तीन महीने में निर्णय लेने का निर्देश दिया गया है। यदि वे ऐसा नहीं करते हैं तो संबंधित राज्यपाल द्वारा भेजा गया विधेयक कानून बन जाता है।

न्यायपालिका की वर्तमान हालात पर बात करते हुए उपराष्ट्रपति ने न्यायाधीश यशवंत वर्मा का भी जिक्र किया। ये वही जज हैं, जिनके घर पर इस साल होली के दिन नोटों से भरे बोरों में आग लग गई थी। मामले में भारी विवाद के बाद भी सुप्रीम कोर्ट उन्हें दिल्ली से इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया और मामले की जाँच के लिए आंतरिक कमिटी बना दी गई।

धनखड़ ने कहा, “14 और 15 मार्च की रात को नई दिल्ली में एक न्यायाधीश के निवास पर एक घटना घटी। सात दिनों तक किसी को इसके बारे में पता नहीं चला। हमें खुद से सवाल पूछने होंगे। इसमें हुई देरी को क्या समझा जा सकता है? क्या यह क्षमा योग्य है? क्या इससे कुछ बुनियादी सवाल नहीं उठते? किसी भी सामान्य स्थिति में और सामान्य परिस्थितियाँ कानून के शासन को परिभाषित करती हैं।”

अनुच्छेद 142, जिसे उपराष्ट्रपति ने परमाणु मिसाइल कहा

संविधान के अनुच्छेद 142 में सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और डिक्री को देने का अधिकार और उसे लागू करने आदि से संबंधित से संबंधित है। अनुच्छेद 142 के उपबंध-1 सुप्रीम कोर्ट को ये अधिकार देता है कि उसके पास आए किसी भी मामले में वह न्याय के लिए डिक्री या आदेश पारित कर सकेगा। यह डिक्री या आदेश पूरे भारत में लागू होगा।
इसके उपबंध-2 में कहा गया है कि इस संंबंध में संसद द्वारा बनाए गए किसी कानून के अधीन रहते हुए सुप्रीम कोर्ट पूरे भारत के किसी भी क्षेत्र के किसी व्यक्ति को हाजिर होने, दस्तावेज प्रस्तुत करने, अवमानना की जाँच करने या दंड देने का समस्त अधिकार उसके पास होगा। इस तरह अनुच्छेद 142 में स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट को संसद द्वारा पारित कानून के दायरे में ही काम करना है।
हालाँकि, बात यहीं खत्म नहीं होती। कॉलेजियम के तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट ने इसकी भी काट निकाली है। पिछले कुछ वर्षों में अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग के विभिन्न उदाहरण पेश किए गए। हाल ही में भारत के सुप्रीम कोर्ट के पाँच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं अन्य मामले में निर्णय देकर एक कानूनी ढाँचा विकसित किया।
यह ढाँचा संविधान के अनुच्छेद 142 की व्याख्या और उसके प्रयोग से संबंधित था। इस निर्णय ‘एशियन रीसर्फेसिंग ऑफ रोड एजेंसी प्राइवेट लिमिटेड एवं अन्य बनाम सीबीआई के पिछले निर्णय से बिल्कुल उलट था। सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट बार के फैसले में एशियन रीसर्फेसिंग के निर्णय को पलट दिया था। इसमें अनुच्छेद 142 के तहत नए दिशा-निर्देश जारी करने के अलावा अंतरिम आदेशों से संबंधित पहलुओं को भी शामिल किया।
इसमें विचार किया गया कि अंतरिम आदेश को रद्द करने या संशोधित करने का हाई कोर्ट का अधिकार क्या है और क्या अंतरिम आदेश किसी विशेष समय की समाप्ति पर खुद ही समाप्त हो सकता है। एशियन रिसर्फेसिंग के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने इसी मुद्दे पर विचार किया था। उस दौरान शीर्ष न्यायालय ने माना था कि जब तक अंतरिम आदेश का समय ना बढ़ाया न जाए, वह आदेश की तारीख से 6 महीने बाद स्वतः समाप्त हो जाता है।
इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने उस फैसले को उलट दिया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एशियन रीसर्फेसिंग मामले में निर्धारित समय बीत जाने पर अंतरिम आदेशों की स्वतः समाप्ति की शर्त लागू रहने योग्य नहीं थी और इसलिए इसे खारिज कर दिया। इसके बाद अनुच्छेद 142 में दिए गए अधिकारों के तहत उसने नए दिशा-निर्देश जारी किए।
इसके तहत सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि क्या कोई न्यायालय अंतरिम आदेश पारित करते समय कोई समय सीमा तय कर सकता है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि अनुच्छेद 142 के तहत शक्ति का उपयोग प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को दबाने या वादियों के मूल अधिकारों को दबाने के लिए नहीं किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए मौलिक अधिकारों का उल्लंघन बताया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 के तहत अधिकार क्षेत्र का उपयोग विवेक से और केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए, ताकि विवादों का निष्पक्ष और न्यायपूर्ण समाधान निकाला जा सके। सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया कि अनुच्छेद 142 द्वारा दी गई शक्तियों का उद्देश्यपूर्ण न्याय सुनिश्चित करना है।
सुप्रीम कोर्ट ने एशियन रीसर्फेसिंग में पहले दिए गए निर्णय को खारिज करते हुए कहा कि अनुच्छेद 226(3) के तहत पारित स्थगन आदेश को रद्द करने के लिए अनिवार्य शर्त स्थगन आदेश हटाने के लिए आवेदन दाखिल करना और न्यायालय द्वारा न्यायिक विवेक का प्रयोग करना है। इस आवेदन पर दो सप्ताह के भीतर निर्णय नहीं लिया जाता है तो स्थगन आदेश स्वतः समाप्त नहीं होता है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्थगन आदेश तब तक प्रभावी रहता है, जब तक कि इसके रद्द करने के लिए प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए आवेदन का कारणों के साथ निपटारा नहीं हो जाता। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों को मामलों के निपटान के लिए कठोर समय-सीमा नहीं लगानी चाहिए, जब तक कि कोई असाधारण परिस्थिति न हो।
अपने इस निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने जो नया गाइडलाइन तय किया उसके अनुसार, अनुच्छेद 142 के तहत शक्तियों का प्रयोग न्यायालय द्वारा अपने समक्ष पक्षकारों के लिए पूर्ण न्याय करने के लिए किया जा सकता है, लेकिन ऐसा करने में न्यायालय अन्य अधिकार क्षेत्रों में अन्य वादियों के पक्ष में पारित वैध न्यायिक आदेशों को रद्द नहीं करेगा।

राष्ट्रपति को निर्देश देने के लिए उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट पर क्यों भड़के?

हमने अपने पिछले आर्टिकल में बताया था कि क्या सुप्रीम कोर्ट भारत के सर्वोच्च पद राष्ट्रपति को निर्देश सकते हैं या नहीं। इस आर्टिकल में हमने कई कानून पहलुओं पर विचार किया था। कई लोगों के मन में सवाल उठता होगा कि भारत में पदों की वरीयता क्रम क्या है। इससे भी साफ हो जाएगा कि सुप्रीम कोर्ट राष्ट्रपति को निर्देश दे सकता है या नहीं।
अगर वरीयता क्रम की बात की जाए तो राष्ट्रपति को देश का सर्वोच्च पद है। राष्ट्रपति को भारत का पहला नागरिक कहा जाता है। इतना ही नहीं, राष्ट्रपति और संसद को मिलाकर ही भारत बनता है और वह संघ के प्रशासन का प्रमुख होता है। इसी प्रशासन का एक अंग न्यायपालिका भी है। इस तरह देश का सर्वोच्च राष्ट्रपति का होता है।
भारत में राष्ट्रपति और राज्यपाल ही ऐसे दो पद हैं, जिनके खिलाफ अदालती कार्रवाई नहीं की जा सकती है। भारत के संविधान ने अनुच्छेद 361 के तहत इसका प्रावधान किया है। यह अनुच्छेद राष्ट्रपति और राज्यपालों के खिलाफ अदालती कार्यवाही से सुरक्षा प्रदान करता है। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट ना ही इन दोनों को किसी मामले में नोटिस जारी कर सकता है और ना ही निर्देश दे सकता है।
राष्ट्रपति के बाद देश में दूसरा सर्वोच्च पद उपराष्ट्रपति का होता है। इसके बाद तीसरे नंबर पर प्रधानमंत्री आते हैं। देश का चौथा सर्वोच्च पद राज्यपाल का होता है, जो उनके कार्य वाले राज्यों में होता है। इसके बाद वरीयता क्रम में पाँचवें स्थान पर पूर्व राष्ट्रपति आते हैं। इसके बाद भारत के उपप्रधानमंत्री का पद वरीयता क्रम में 5A स्थान पर आता है।
                                    भारत में अधिकारियों का वरीयता क्रम (साभार: www.mha.gov.in)
केंद्रीय गृह मंत्रालय के अनुसार, भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) और लोकसभा स्पीकर का पद एक समान होता है। दोनों वरीयता क्रम में छठे नंबर पर आते हैं। इसके बाद सातवें नंबर पर केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और राज्यों के मुख्यमंत्री अपने राज्यों में होते हैं। योजना आयोग के उपाध्यक्ष, पूर्व प्रधानमंत्री, राज्यसभा और लोकसभा में विपक्ष के नेता भी सातवें क्रम पर ही आते हैं।
भारत रत्न से सम्मानित व्यक्ति का क्रम 7A होता है। आठवें क्रम में राजदूत, भारत द्वारा मान्यता प्राप्त राष्ट्रमंडल देशों के आयुक्त, अपने राज्य के बाहर मुख्यमंत्री एवं राज्यपाल होते हैं। नौंवें क्रम पर सुप्रीम कोर्ट के आते हैं। इसके बाद 9A पर संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष, मुख्य चुनाव आयुक्त और भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) आते हैं।
वरीयता क्रम मेें 10वें स्थान पर राज्यसभा के उपसभापति, राज्यों के उपमुख्यमंत्री, लोकसभा के उपसभापति, योजना आयोग (वर्तमान में नीति आयोग) के सदस्य और केंद्र सरकार के राज्यमंत्री आते हैं। वहीं, 11वें स्थान पर भारत के अटॉर्नी जनरल, कैबिनेट सचिव और अपने-अपने केंद्रशासित प्रदेशों के भीतर लेफ्टिनेंट गवर्नर (उपराज्यपाल) तक शामिल हैं। वरीयता क्रम में 12वें स्थान पर पूर्ण जनरल या समकक्ष रैंक के पद पर कार्यरत चीफ ऑफ स्टाफ।

बस कहने को है ‘कानून की नजर में सब बराबर’, अगर जस्टिस यशवंत वर्मा की जगह आपके घर में लगी आग में जले मिलते नोटों के बंडल तो क्या होता? केस CBI, ED या Income Tax को क्यों नहीं सौंपा ?

                  जस्टिस यशवंत वर्मा और उनके घर लगी आग में जली नकदी (साभार: इंडिया टुडे/आजतक)
दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के घर होली के दिन आग लगने की घटना के दौरान भारी मात्रा में अघोषित नकदी मिलने के बारे में पता चला था। इसको लेकर हर तरफ सवाल उठने लगे। आखिरकार भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) संजीव खन्ना ने इस मामले में आंतरिक जाँच के लिए एक समिति गठित की है। अगर यही घटना एक सामान्य आदमी के साथ हुई होता तो क्या होता।

सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना सिंह कहती हैं, “अगर आम आदमी के घर से इतनी नकदी बरामद होती तो पुलिस, आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय या सीबीआई (CBI) जैसी एजेंसियाँ तुरंत कार्रवाई करतीं। आरोपित को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू हो जाती। मनी लॉन्ड्रिंग (PMLA, 2002), आयकर अधिनियम 1961 और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम जैसे कानून की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज होता।”

वो आगे बताती हैं, “अवैध आय घोषित कर भारी जुर्माना लगाया जाता और उसकी संपत्तियों को ज़ब्त करने की प्रक्रिया शुरू हो जाती। तुरंत गिरफ्तार कर अदालत में पेश किया जाता। आरोपित को न्यायिक हिरासत में भेज दिया जाता और ज़मानत मिलना मुश्किल हो जाता। सामान्य आदमी से बरामद नकदी को सरकारी खजाने में जमा कर दिया जाता और आरोपित के बैंक खाते फ्रीज़ कर दिए जाते।”

क्या होता, अगर जस्टिस वर्मा की जगह आम आदमी होता?

अगर जस्टिस वर्मा की जगह कोई सामान्य आदमी होता तो तब क्या होता? ये एक अहम सवाल है। अगर जस्टिस वर्मा की जगह कोई सामान्य आदमी होता तो दमकल कर्मी आग बुझाने की कार्रवाई के बाद कैश मिलने की जानकारी अपने अधिकारी को देते। इसके साथ ही वे दिल्ली पुलिस को सूचित करते। दमकल कर्मी इस घटना के बारे में अपनी डायरी में इसकी डिटेल में जानकारी देते।
वहीं, दिल्ली पुलिस के अधिकारी मौके पर पहुँचकर जाँच करते और इसकी जानकारी आयकर विभाग को देते। आयकर विभाग जिस व्यक्ति के आवास में नोट मिले या नोट जले, उससे पूछताछ करता। अगर वह व्यक्ति उस नकदी के बारे में एक-एक जानकारी देता कि किस तरह यह नकदी उससे जुड़ा है और उसने इस धन को कैसे कमाया और किस लिए रखा था।
अगर आयकर विभाग उसकी दी गई जानकारी से संतुष्ट हो जाता और उसे लगता है कि यह नकदी गलत तरीके से नहीं कमाई गई है और उसका उद्देश्य गलत नहीं था तो मामला बंद हो जाता। अगर आयकर अधिकारी उसके जवाब से संतुष्ट नहीं होते तो आय से अधिक संपत्ति जमा करने का उस पर मुकदमा दर्ज करते। साथ ही इसकी जानकारी प्रवर्तन निदेशालय (ED) को देते।
प्रवर्तन निदेशालय के अधिकारी मामले की जाँच करते और उन्हें लगता है कि मामला मनी लॉन्ड्रिंग का है तो इसमें FIR दर्ज करके उस व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाता। इसके बाद वह ट्रायल के दौरान जेल में बंद रहता और आरोपित व्यक्ति जमानत के लिए अदालत की बार-बार चक्कर लगाता। इस तरह यह मामला आम और खास के लिए अलग हो जाता।

जस्टिस वर्मा के साथ क्या हो रही है कानूनी प्रक्रिया?

दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।
यह समिति CJI को अपनी रिपोर्ट में बताएगी जस्टिस आरोपों में दम है या नहीं। साथ ही ‘न्यायिक कदाचार’ के कारण निष्कासन कार्यवाही की आवश्यकता है या नहीं। कदाचार गंभीर होगा तो CJI जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने या सेवानिवृत्त होने की सलाह देंगे। वे इससे इनकार करेंगे तो CJI राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को सूचित कर जस्टिस वर्मा को हटाने की कार्यवाही की सिफारिश कर सकते हैं।
इसके बाद संसद में जस्टिस पर महाभियोग की प्रक्रिया शुरू होगी। इसके लिए लोकसभा के कम-से-कम 100 सदस्य स्पीकर को या फिर राज्यसभा के कम-से-कम 50 सदस्य सभापति को हस्ताक्षरित नोटिस देंगे। अध्यक्ष या सभापति सांसदों और न्यायविदों से सलाह-मशविरा करेंगे। अगर स्पीकर या सभापति नोटिस को स्वीकार कर लेते हैं तो जस्टिस वर्मा के खिलाफ शिकायत की जाँच के लिए 3 सदस्यीय समिति गठित करेंगे।
समिति में सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश, हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस और एक प्रतिष्ठित न्यायविद शामिल होंगे। यह समिति आरोप तय करेगी और उसके आधार पर जाँच की जाएगी। आरोपों की एक प्रति न्यायाधीश को भेजी जाएगी। वह जज अपने बचाव में लिखित जवाब देंगे। जाँच पूरी करने के बाद समिति अपनी रिपोर्ट अध्यक्ष या सभापति को देगी। उस रिपोर्ट को संसद के संबंधित सदन में रखा जाएगा।
रिपोर्ट में दुर्व्यवहार या अक्षमता पाई जाती है तो जज को हटाने का प्रस्ताव शुरू किया जाएगा। इसके लिए उस सदन की कुल संख्या का बहुमत या उस सदन में उपस्थित और वोट करने वाले सदस्यों का कम-से-कम दो-तिहाई बहुमत होना चाहिए। प्रस्ताव के पक्ष में मतों की संख्या प्रत्येक सदन की कुल सदस्यता के 50% से अधिक होनी चाहिए। यदि प्रस्ताव स्वीकृत हो जाता है तो इसे दूसरे सदन में भेजा जाएगा।
दोनों सदनों में प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने के बाद इसे राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा। इसके बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायाधीश को हटाने का आदेश जारी करते हैं। इस तरह जज को हटाने का काम पूरा हो जाएगा। अभी तक के इतिहास में किसी जज पर महाभियोग से नहीं हटाया जा सका है, जबकि दो लोगों पर महाभियोग की कार्रवाई शुरू हुई है। इस तरह जज को सजा देने का काम पूरा हो जाएगा।

जस्टिस वर्मा के खिलाफ FIR दर्ज करने की माँग सुप्रीम कोर्ट में खारिज

दरअसल सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (28 मार्च) को दिल्ली हाई कोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ सरकारी परिसर में अवैध नकदी मिलने के मामले में FIR दर्ज करने की माँग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। जस्टिस अभय ओका और जस्टिस उज्ज्वल भुयान की पीठ ने कहा कि याचिका समय से पहले दायर की गई थी। पीठ ने कहा कि CJI के निर्देश पर मामले की इन-हाउस जाँच जारी है।
पीठ ने कहा, “इन-हाउस जाँच पूरी होने के बाद कई विकल्प खुले हैं। सीजेआई एफ़आईआर दर्ज करने का निर्देश दे सकते हैं या रिपोर्ट की जाँच करने के बाद मामले को संसद को भेज सकते हैं। आज इस याचिका पर विचार करने का समय नहीं है। इन-हाउस रिपोर्ट के बाद सभी विकल्प खुले हैं। याचिका समय से पहले है।”
याचिकाकर्ता नेदुम्पारा ने अपनी याचिका में कहा था कि केरल हाई कोर्ट के तत्कालीन जज के खिलाफ POCSO मामले का आरोप था, लेकिन पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज नहीं की। उन्होंने कहा कि जाँच करना कोर्ट का काम नहीं है। इसे पुलिस पर छोड़ देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इन-हाउस कमिटी वैधानिक प्राधिकरण नहीं है। यह विशेष एजेंसियों द्वारा की जाने वाली जाँच का विकल्प नहीं हो सकती है।
नेदुम्पारा ने कहा कि जस्टिस यशवंत वर्मा मामले में आम आदमी कई सवाल पूछ रहा है। लोग सवाल कर रहे हैं कि 14 मार्च को जब नकदी बरामद हुई, उस दिन से आज तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की गई? जब्ती का कोई पंचनामा क्यों नहीं बनाया गया? एक सप्ताह तक इस घोटाले को क्यों छिपाया गया? आपराधिक कानून क्यों नहीं बनाया गया?
दरअसल, इसी सुप्रीम कोर्ट ने आज से 34 साल पहले 1991 में एक फैसला सुनाया था। उसमें कहा गया था कि जज भी जनता के सेवक हैं। इसलिए अगर वे अपने कार्यकाल के दौरान सुप्रीम कोर्ट या हाई कोर्ट या कोई भी कोर्ट के जज के खिलाफ भी भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया जा सकता है। हालाँकि,उस वक्त सुप्रीम कोर्ट ने कुछ शर्ते रखी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर CJI को लगता है कि आरोपों में दम नहीं है तो मुकदमा दर्ज नहीं किया जा सकता है। इसके साथ ही यह भी कहा था कि जब तक सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की अनुमति ना हो, तब तक संबंधित जज के खिलाफ CrPC की धारा 154 के तहत मुकदमा नहीं दर्ज किया जा सकता। इस धारा के तहत पुलिस बिना वारंट के किसी को गिरफ्तार कर सकती है।
इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट के अधिवक्ता संभ्रांत कृष्ण का कहना है, “जस्टिस वर्मा के सरकारी निवास से भारी मात्रा में कैश पाए जाने की बात बहुत गंभीर विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने जाँच के लिए तत्परता से एक समिति का गठन कर दिया है। अगर जाँच में जस्टिस वर्मा की किसी भी रूप में कोई भूमिका सामने आती है तो फिर उन पर आम नागरिक की तरह कानूनी प्रक्रिया की जा सकती है।”
इस तरह की समस्याओं के पीछे की मूल वजहों की ओर इशारा करते हुए एडवोकेट संभ्रांत कृष्ण आगे कहते हैं, “यह पूरा प्रकरण एक बड़ी समस्या, कॉलेजियम के द्वारा जजों की नियुक्ति, की ओर हम सबका ध्यान पुनः आकर्षित करता है। जब तब इसमें सुधार और पारदर्शिता नहीं होगी तब तक अयोग्य व्यक्ति भी न्याय की कुर्सी पर विराजते रहेंगे।”
रीना सिंह कहती हैं, “जस्टिस वर्मा जैसे प्रभावशाली पद पर बैठे व्यक्ति के खिलाफ तुरंत गिरफ्तारी नहीं होती है। उन्हें राजनीतिक-सामाजिक संपर्कों का लाभ मिलता है। उनकी जमानत भी जल्दी हो सकती है, जबकि आम आदमी को लंबी कानूनी लड़ाई लड़नी पड़ती। मीडिया कवरेज में भी आम आदमी के मामले को कठोरता से दिखाया जाता, जबकि प्रभावशाली व्यक्तियों को बचाने के प्रयास होते।”
हालाँकि, रीना सिंह और संभ्रांत कृष्ण जैसे अन्य अधिवक्ता भी ये मानते हैं कि कानून के सामने सब बराबर हैं, लेकिन कॉलेजियम एक बड़ी समस्या है। न्यायिक प्रक्रिया में समानता लाने के लिए सभी के खिलाफ निष्पक्ष जाँच, पारदर्शिता और भ्रष्टाचार के मामलों की त्वरित सुनवाई के साथ-साथ कठोर दंड का प्रावधान होना आवश्यक है, ताकि कोई भी कानून से ऊपर न हो।

जस्टिस वर्मा के घर नकदी मिलने में की एक-एक जानकारी

होली के दिन 14 मार्च 2025 मार्च की रात करीब 11.30 बजे जस्टिस वर्मा के घर में आग ली। जिस समय यह घटना हुई, उस समय जस्टिस वर्मा अपनी पत्नी के साथ मध्य प्रदेश में थे। दिल्ली स्थित उनके आधिकारिक आवास में उनकी वृद्ध माँ और बेटी थी। आग की सूचना घर वालों ने जस्टिस वर्मा को दी। इसके बाद जस्टिस वर्मा ने निजी सचिव ने दिल्ली फायर ब्रिगेड को इसकी सूचना दी।
सूचना मिलते ही दमकल की दो गाड़ियाँ मौके पर भेजी गईं और 15 मिनट में आग पर काबू पा लिया गया। उस दौरान स्टोर रूम में बोरों में भरकर रखे भारी मात्रा में नोट जल चुके थे। नोटों के बारे में दमकल कर्मियों ने अपने वरिष्ठ अधिकारियों को बताया। आग बुझने के बाद जस्टिस वर्मा के निजी सचिव ने मौके पर पहुँचे पाँच पुलिसकर्मियों को वहाँ से चले जाने के लिए कहा।
जब इस मामले के जाँच अधिकारी अगली सुबह जस्टिस वर्मा के आवास पर आए तो उन्हें वापस भेज दिया गया और बाद में आने के लिए कहा गया। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में सूत्रों के हवाले से कहा गया है कि दिल्ली पुलिस ने घटना की रात को पंचनामा नहीं बनाया था। इसको लेकर वहाँ तैनात अधिकारियों से सवाल तलब किए जाएँगे। दरअसल, पंचनामा बनाने के लिए पाँच स्वतंत्र व्यक्तियों की आवश्यकता होती है, जो घटनास्थल के गवाह हों और मुकदमे के दौरान वे कोर्ट में अपना बयान दे सकें।
तुगलक रोड थाने में एक दैनिक डायरी दर्ज की गई, लेकिन उसमें वित्तीय बरामदगी का जिक्र नहीं किया गया। घटना के 8 घंटे बाद इसकी जानकारी दिल्ली के पुलिस कमिश्नर संजय अरोड़ा को मिली। दरअसल, नई दिल्ली जिला के एडिशनल डीसीपी ने 15 मार्च 2025 को सुबह 8 बजे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुबह की डायरी सौंपी थी। उस डायरी में पिछले 24 घंटों में इलाके में हुई घटनाओं का सारांश था।
इस डायरी में जस्टिस वर्मा के आवास में लगी आग का भी जिक्र था। इसके बाद दिल्ली के पुलिस कमिश्नर को घटना की जानकारी दी गई और नोटों में लगी आग का वीडियो भी उन्हें दिखाया गया। इसके बाद पुलिस कमिश्नर इसकी जानकारी केंद्रीय गृह मंत्रालय में अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी। अंत में उन्होंने 15 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस देवेंद्र उपाध्याय को घटना की जानकारी दी।
इस घटना के 7 दिन बाद 21 मार्च को यह मामला मीडिया में आया। इसको लेकर हंगामा मच गया। दिल्ली के फायर चीफ अतुल गर्ग के हवाले से PTI में खबर चली कि दमकल कर्मियों ने जस्टिस वर्मा के घर में कहीं नकदी नहीं देखी। जब विवाद हुआ तो अतुल गर्ग ने कहा कि उन्होंने PTI को इस तरह का कभी बयान नहीं दिया कि जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर कोई नकदी नहीं मिली थी।
विवाद बढ़ गया तो CJI खन्ना ने 5 जजों वाली सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की बैठक बुलाई गई। आनन-फानन में कॉलेजियम ने घटना को चिंतानक बताते हुए जस्टिस वर्मा को वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट स्थानांतरित कर दिया। इसको लेकर भी सवाल उठे। इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने उनके स्थानांतरण का विरोध किया और कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ‘कूड़ेदान’ नहीं है।
जब विरोध बढ़ा तो सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जस्टिस वर्मा के स्थानांतरण का मामला इससे अलग है। इसके साथ ही CJI ने दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय से इस मामले की फैक्ट फाइंडिंग रिपोर्ट माँगी। CJI को सौंपी रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय कहा कि घटना के अगले दिन 15 मार्च की शाम करीब 4:50 बजे दिल्ली पुलिस कमिश्नर ने आग के बारे में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस को सूचित किया।
रिपोर्ट तैयार करने के लिए मुख्य न्यायाधीश उपाध्याय ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार के साथ घटनास्थल का दौरा किया और वहाँ जस्टिस वर्मा से भी मुलाकात की। जस्टिस वर्मा ने अपने स्पष्टीकरण में कहा कि उस कमरे में नौकर, माली और कभी-कभी सीपीडब्ल्यूडी कर्मी रहते थे। जब मुख्य न्यायाधीश ने जले नोटों की तस्वीरें दिखाईं तो न्यायमूर्ति वर्मा ने अपने खिलाफ किसी साजिश की आशंका व्यक्त की।
तमाम घटनाओं को लेकर चीफ जस्टिस उपाध्याय ने 25 पन्नों की अपनी रिपोर्ट CJI को भेज दी। इस रिपोर्ट में जस्टिस उपाध्याय ने कहा कि मामले की गहन जाँच की जरूरत है। इसके बाद CJI ने जस्टिस डीके उपाध्याय को आदेश दिया कि वे जस्टिस यशवंत वर्मा को कोई भी न्यायिक कार्य ना सौंपे। साथ ही जस्टिस वर्मा से ये कहने के लिए भी कहा कि वे मोबाइल के कॉल रिकॉर्ड एवं अन्य डेटा डिलीट ना करें।
दिल्ली हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट और जस्टिस वर्मा के जवाब की जाँच करने के बाद भारत के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने मामले की आंतरिक जाँच के लिए तीन सदस्यीय समिति गठित की है। समिति में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस शील नागू, हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस जीएस संधावालिया और कर्नाटक हाई कोर्ट की जस्टिस अनु शिवरामन शामिल हैं।

9 मुस्लिम, 90 लाख रूपए का फ्रॉड, अग्रिम जमानत पर सवाल… उत्तर प्रदेश पुलिस ने गाजियाबाद कोर्ट में क्यों भाँजी लाठियाँ, क्यों हड़ताल पर वकील?

                        गाजियाबाद कोर्ट में पुलिस लाठीचार्ज के विरोध में अलीगढ़ में वकीलों का प्रदर्शन
उत्तर प्रदेश के वकील 4 नवंबर 2024 को हड़ताल पर हैं। दिल्ली बार एसोसिएशन भी इसका समर्थन कर रहा है। यह पूरा विवाद 29 अक्टूबर को गाजियाबाद जिला कोर्ट में हुए लाठीचार्ज से पैदा हुआ है। कथित तौर पर जालसाजी के एक मामले में मुस्लिम आरोपितों की अग्रिम जमानत को लेकर जज अनिल कुमार और वकीलों के बीच बहस हुई। फिर पुलिस की एंट्री हुई। अब यह मामला लाठीचार्ज की SIT जाँच को लेकर हाई कोर्ट में याचिका से हड़ताल तक पहुँच चुकी है।

सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) ने भी पुलिस लाठीचार्ज की निंदा करते हुए कहा है कि जिला जज अनिल कुमार के आदेश पर वकीलों पर लाठीचार्ज किया गया। SCBA ने एक प्रस्ताव पारित कर जिला जज अनिल कुमार के आचरण की जाँच इलाहाबाद हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस की अध्यक्षता में कराने की माँग की है। गाजियाबाद बार एसोसिएशन लाठीचार्ज की SIT जाँच की माँग कर रहा है। इसको लेकर एडवोकेट जवाहिर यादव ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दाखिल की है। याचिका घटनास्थल के CCTV फुटेज सुरक्षित रखने और FIR में नामजद वकीलों के खिलाफ कार्रवाई पर रोक लगाने की अपील की गई है।

गाजियाबाद जिला कोर्ट में वकीलों पर लाठीचार्ज

29 अक्टूबर को दोपहर के समय जिला जज अनिल कुमार की अदालत में कई वकीलों का जमावड़ा हो गया था। कुछ ही देर में कोर्ट परिसर में शोर-शराबा मच गया। तभी अचानक कैम्पस में पुलिस की एंट्री हुई। घटना के वायरल वीडियो में से कुछ में पुलिसकर्मी वकीलों पर बल प्रयोग करते दिख रहे हैं। वकीलों को भी कुर्सियाँ उठा कर फेंकते देखा जा सकता है।

वकीलों के मुताबिक लाठीचार्ज के लिए जिला जज जिम्मेदार

इलाहाबाद हाई कोर्ट में याचिका दायर करने वाले एडवोकेट जवाहिर यादव का दावा है कि एक मामले में जमानत को लेकर घटना की कुछ वकील जिला जज अनिल कुमार की अदालत में बहस कर रहे थे। इसी दौरान किसी बात पर वकीलों और जज में गर्मागर्म बहस हो गई। आरोप है कि जज अनिल कुमार ने अपना आपा खो दिया और डायस पर खड़े हो कर वकीलों को गंदी-गंदी गालियाँ देने लगे।
एडवोकेट जवाहिर यादव के अनुसार थोड़ी देर बाद जज अनिल कुमार के आदेश पर पुलिस कोर्ट रूम में घुसी और वकीलों को पीटना शुरू कर दिया। जज पर आरोप है कि वे पुलिस को बार-बार वकीलों को गोली मारने के लिए उकसा रहे थे। घटना के बाद में कोर्ट कैम्पस में CRPF की टुकड़ी तैनात कर दी गई। इसके पीछे भी वकील जज अनिल कुमार को ही बता रहे हैं।

पुलिस की FIR में क्या?

पुलिस द्वारा दर्ज करवाई गई FIR में वकीलों को हिंसा का जिम्मेदार बताया गया है।सब इंस्पेक्टर संजय कुमार ने कवि नगर थाने में केस दर्ज करवाया है। अपनी तहरीर में उन्होंने बताया है कि 29 अक्टूबर को वे साथी सिपाहियों के साथ कचहरी में ड्यूटी पर थे। तभी एक अदालत में करीब 50 वकीलों के इकट्ठा हो कर हंगामा करने की सूचना मिली।
संजय कुमार की शिकायत के अनुसार हंगामे के दौरान वकील कुर्सियाँ फेंकते हुए गंदी-गंदी गालियाँ दे रहे थे। उन्होंने अन्य पुलिसकर्मियों के साथ हंगामा कर रहे वकीलों को अदालत से बाहर निकाला। इसके बाद नीचे आकर वकीलों ने पुलिस बल पर पत्थरबाजी शुरू कर दी। कचहरी में बनी पुलिस चौकी में आग लगा दी। वकीलों की भीड़ ने चौकी के आसपास लगे CCTV कैमरे भी तोड़ दिए।
सब इंस्पेक्टर संजय कुमार ने बताया है कि वकीलों की पत्थरबाजी में कोर्ट परिसर के लगे कई शीशे टूट गए। दारोगा राजेश कुमार के सिर पर चोटें आईं हैं। इस हंगामे से कचहरी में भगदड़ मच गई। हालत संभालने के लिए कोर्ट कैम्पस में CRPF के साथ PAC की टुकड़ी तैनात करनी पड़ी।
संजय कुमार की तहरीर पर लगभग 50 अज्ञात वकीलों के खिलाफ केस दर्ज किया गया है। उन पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 191 (2), 191 (3), 121 (1) और 121 (2), 131, 352, 324 (4), 326 (G), 61 (2), 3 (5) और 118 (1) के साथ आपराधिक कानून 1932 की धारा 7 व सार्वजनिक सम्पत्ति नुकसान निवारण अधिनियम के सेक्शन 3/4 के तहत केस दर्ज हुआ है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है।
गाजियाबाद पुलिस के एडिशनल कमिश्नर दिनेश कुमार ने बताया है कि जिला जज के चैंबर की तरफ बढ़ रही हमलावर वकीलों की भीड़ को पुलिस ने जैसे-तैसे काबू किया था। उन्होंने बताया कि जब पुलिस जिला जज को सुरक्षित करने में जुटी थी तभी वकीलों ने नीचे उतर कर आगजनी की है। बकौल एडिशनल सीपी सबूत और तथ्य जुटाए जा रहे हैं जिनके आधार पर कार्रवाई की जाएगी।

न्यायिक कर्मचारी की FIR में भी वकील ही हिंसा के जिम्मेदार

पुलिस के अलावा एक दूसरी FIR न्याय विभाग के कर्मचारी संजीव गुप्ता ने दर्ज करवाई है। गाजियाबाद कचहरी में नाजिर के पद पर तैनात संजीव गुप्ता की तहरीर में बताया गया है कि 29 अक्टूबर को एडवोकेट नाहर सिंह यादव, उनके बेटे अभिषेक यादव तथा उनके रिश्तेदार दिनेश यादव ने कोर्ट परिसर में साजिशन हंगामा किया। हंगामे में 40 से 50 अन्य अराजक लोग भी शामिल थे।
संजीव की शिकायत के अनुसार अराजक भीड़ ने कोर्ट रूम में घुस कर न्यायिक कार्य में बाधा डाली। खिड़कियों और शीशों को तोड़ दिया। फर्नीचरों को उठा कर फेंक दिया। सर्वर मशीन को तहस-नहस कर दिया।

जिस मामले में जमानत से शुरू हुआ विवाद, उसमें मुस्लिम आरोपित, हिंदू वकील पीड़ित

जिस मामले में जमानत को लेकर वकीलों और जज के बीच बहस की बात कही जा रही है वह एक जालसाजी से जुड़ा केस है। इस जालसाजी के शिकार वकील जितेंद्र सिंह हैं। उनकी शिकायत पर इस मामले में गुलरेज आलम, रिजवान अली, हसमुद्दीन, मोहम्मद फहीम, नसरुद्दीन, फातिमा परवीन, जफरुद्दीन, ख़ुर्शीदन और हाजी आरिफ अली नामजद हैं।
इन सभी पर जमीन के सौदे के नाम पर जितेंद्र सिंह से 90 लाख रुपए की धोखाधड़ी का आरोप है। अदालत के आदेश पर यह FIR 2 अक्टूबर 2024 को दर्ज हुई थी। आरोपितों पर IPC की धारा 420, 406, 467, 468, 471 और 120 बी लगाई गई है। ऑपइंडिया के पास इस FIR की कॉपी भी मौजूद है।
ऑपइंडिया से बात करते हुए वकील जितेंद्र सिंह ने बताया कि नियमों के विरुद्ध जाते हुए जिला जज अनिल कुमार ने आरोपितों को अग्रिम जमानत दी थी। वकील इस केस पर सुनवाई की माँग कर रहे थे। लेकिन अनिल कुमार इसके लिए तैयार नहीं थे। उनके यह भी दावा है कि यही जज पूर्व में 18 लाख की एक अन्य धोखाधड़ी केस में अग्रिम जमानत याचिका ख़ारिज कर चुके हैं।

कोलेजियम ने गलत लोगों को बना दिया जज, हिमाचल प्रदेश HC में हो गई नियुक्ति

      हिमाचल प्रदेश HC में दो जजों की नियुक्ति पर विवाद हो गया है (चित्र साभार: The Statesman & News18)
हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट में दो जजों की कोलेजियम द्वारा नियुक्ति पर विवाद खड़ा हो गया है। कोलेजियम द्वारा नियुक्त किए गए इन जजों के खिलाफ मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया है। हाई कोर्ट के इस फैसले के लिए खिलाफ प्रदेश के ही दो जिला जजों ने मोर्चा खोल दिया है।

जब से जजों की नियुक्ति के लिए कोलेजियम बना है, तभी से यह विवादों में रहा है। जिस तरह कुछ पारिवारिक सियासत पार्टियां बनी हुई है, वही हालत लगभग जुडिशरी की है, दोनों में कोई खास फर्क नहीं। शायद यही कारण है कि निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक में करोड़ों केस लंबित पड़े हैं। यही वजह है कि आतंकवादियों के लिए आधी रात को कोर्ट लग जाती है, क्यों? क्या किसी बेकसूर आम नागरिक के साथ हुई नाइंसाफी पर आधी रात को कोर्ट खुलेगी। जवाब सीधा सा मिलेगा, नहीं। ऐसे अनेकों अपवाद न्याय प्रणाली में मिल जाएंगे। यही कारण है कि झूठे, दूसरी पार्टी को ब्लैकमेल करने के इरादे से हज़ारों केस अदालतों में पड़े हैं, क्यों? उसका कारण है झूठा केस फाइल करने वाले को दण्डित करने का शायद कोई कानून नहीं। 

टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार, हिमाचल प्रदेश के सोलन और बिलासपुर के जिला जज चिराग भानु सिंह और अरविन्द मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट से खुद को हाई कोर्ट का जज ना बनाए जाने की शिकायत की है। उन्होंने कहा है कि वह राज्य के सबसे वरिष्ठ जिला जज थे लेकिन उनकी जगह हाई कोर्ट के कोलेजियम ने दूसरे जूनियर लोगों को भर्ती कर लिया।

इन दोनों जजों ने आरोप लगाया है कि इस नियुक्ति के दौरान नियमों का पालन नहीं हुआ और सुप्रीम कोर्ट के दिशानिर्देशों तक को नजरअंदाज कर दिया गया। इन दोनों जजों ने कहा कि उनका नाम चीफ जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ वाले सुप्रीम कोर्ट के कोलेजियम की तरफ से हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट को दिया गया था।

दोनों जजों ने सुप्रीम कोर्ट से कहा कि नाम की संस्तुति CJI चंद्रचूड़ के कोलेजियम के बाद देश के कानून मंत्रालय ने भी की थी। कानून मंत्रालय ने एक पत्र लिख कर हिमाचल प्रदेश के हाई कोर्ट कोलेजियम को मल्होत्रा और सिंह के नामों पर विचार करने के लिए कहा था।

दोनों जजों ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाते हुए कहा है कि उनका नाम एक बार जुलाई 2023 और फिर जनवरी 2024 सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाया गया था। लेकिन इस सबके बावजूद हिमाचल हाई कोर्ट ने उनको प्रमोशन नहीं दिया। दोनों जजों ने आरोप लगाया कि उनके नाम को नजरअंदाज कर दिया गया।

मल्होत्रा और सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में दी गई याचिका में कहा है कि हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने उनकी जगह पर उनसे दो जूनियर लोगों को नियुक्त कर दिया जो कि अयोग्य हैं और उनके नामों को हटा दिया जबकि उनका ट्रैक रिकॉर्ड शानदार रहा है। दोनों जजों ने मेरिट की अनदेखी का आरोप हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट पर लगाया है।

दोनों जजों ने हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट द्वारा की गई नियुक्तियों पर रोक लगाने की माँग की है और कहा है कि सुप्रीम कोर्ट उनकी इस समस्या का समाधान निकाले। अब इस मामले पर CJI डी वाई चंद्रचूड़ के दखल के कयास लगाए जा रहे हैं।

जो ज्ञान दूसरों को, उस पर खुद अमल करें सुप्रीम कोर्ट के माननीय : साल में 133 छुट्टियाँ, 38% जजों के ‘कनेक्शन’… लेकिन संपत्ति का ब्यौरा दिए सिर्फ 4 जज

                                                              प्रतीकात्मक 
अक्सर नेता-अधिकारी या कोई भी देश की सर्वोच्च न्यायालय का नाम लेते समय ‘माननीय’ या ‘Honourable’ ज़रूर लगाते हैं। जजों के नाम से पहले ‘न्यायमूर्ति’ लगाया जाता है। इतना ‘माननीय’ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के नाम के भी आगे नहीं लगाया जाता। जबकि कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका संविधान के 3 स्तंभ हैं। बस उनके कार्य बाँटे हुए हैं। लेकिन, जब कार्यपालिका और विधायिका से रोज हजार सवाल पूछे जाते हैं कि भला न्यायपालिका से कोई महीने में एक सवाल भी ना पूछे?

अभिनेता-निर्माता-निर्देशक मनोज कुमार की फिल्म 'उपकार' में 'मलंग बाबा'(प्राण) का एक संवाद है "राशन पर भाषण है. लेकिन भाषण पर कोई राशन नहीं", यदि इस डायलाग की गहराई में जाया जाए, शायद भारतीय अदालतों पर सटीक बैठती है। दूसरे, बुजुर्गों की कहावत है कि 'भगवान दुश्मन को भी पुलिस और अदालत से बचाए', जहाँ हर कदम पैसा मांगता है, क्योकि इन दोनों की स्थापना ही भ्रष्टाचार पर ही हुई है, इसका प्रमाण सर्वविदित है, जिसे कोई झुठला नहीं सकता। 

‘सिर्फ और सिर्फ’ नूपुर शर्मा जिम्मेदार? ये कैसा लॉजिक है?

नूपुर शर्मा पर कई राज्यों में हुए FIR के बाद वो राहत के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुँची थीं। एक महिला न्याय माँगने गई थीं नियम के तहत, क्योंकि भारत का कानून ही कहता है कि किसी को एक ही अपराध के लिए एक से अधिक सज़ाएँ नहीं सुनाई जा सकतीं। बदले में सुप्रीम कोर्ट ने कह दिया कि आज देश में जो भी हो रहा है, उसके लिए सिर्फ और सिर्फ नूपुर शर्मा जिम्मेदार हैं। जबकि उस बहस में बार-बार हिन्दू देवी-देवताओं पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले और मजाक बनाने वाले तस्लीम रहमानी को लेकर इन जजों ने चूँ तक न किया।
सबसे बड़ी बात कि ये बातें जजमेंट का हिस्सा नहीं थीं। अगर हम यही लॉजिक लगाते हैं तो क्या वाराणसी में ज्ञानवापी मस्जिद में सर्वे की अनुमति देने वाले जज रवि दिवाकर को धमकी दिए जाने के लिए भी कोर्ट ही ‘सिर्फ और सिर्फ’ जिम्मेदार हुआ, क्योंकि उसने कानून और संविधान के हिसाब से फैसला सुनाया? कर्नाटक में हिजाब मामले में फैसला देने वाले उच्च न्यायालय के जजों को धमकी के लिए भी अदालत को जिम्मेदार माना जाएगा इस लॉजिक से?
ऐसे में तो आप हत्यारों और अपराधियों को राहत दे रहे हैं। कश्मीर में कत्लेआम मचा रहे आतंकी कहते हैं कि भारत सरकार कश्मीरियों पर जुल्म कर रही है, इसीलिए वो इसे ‘आज़ाद’ कराना चाहते हैं। फिर क्या इन निर्मम हत्याओं के लिए ‘सिर्फ और सिर्फ’ भारत सरकार और यहाँ की जनता को जिम्मेदार मान लेना चाहिए? ‘माननीय’ को समझना चाहिए कि किसी एक चैंबर में बैठ किसी के कुछ सोचने से उस हिसाब से दुनिया नहीं चलती।
हमारा कहना यह है कि जिन मुद्दों पर सुप्रीम कोर्ट दूसरों को डाँटता है और ज्ञान देता है, उन्हीं मुद्दों पर वो खुद अपनी ही कही बातों का पालन क्यों नहीं करता? नूपुर शर्मा के मामले में हम नहीं कह रहे हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने गलती की है, ये तो 117 पूर्व न्यायाधीश, सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारी एवं रिटायर्ड ब्यूरोक्रेट्स ने भी कहा है कि दोनों जजों (सूर्यकान्त और जेबी पारदीवाला) ने ‘लक्ष्मण रेखा’ लाँघी है और एक नागरिक को न्याय से वंचित किया है, ये न्यायपालिका के इतिहास में एक ‘धब्बे’ की तरह है।
क्या आपने कभी सुना है कि प्रधानमंत्री की किसी ने आलोचना की हो और उसे PMO में तलब कर लिया गया हो? सुप्रीम कोर्ट की आलोचना को ‘न्यायपालिका की अवमानना’ बता कर लोगों को तलब किया जाता रहा है और उन पर मुक़दमे भी चले हैं। वो अलग बात है कि प्रशांत भूषण जैसों के लिए इसकी कीमत एक रुपए लगाई जाती है। क्या जज आलोचना से परे हैं? फिर सांसदों-विधायकों की आलोचना क्यों? डीएम-एसपी की क्यों? फ्री स्पीच की सबसे ज्यादा वकालत तो अदालत ही करती है, तो फिर वो खुद को इस दायरे में क्यों नहीं रखती?

कॉलेजियम सिस्टम कब हटेगा? परिवारवाद के अलावा प्रतिभाओं की अनदेखी के भी आरोप

क्या आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में जजों की नियुक्ति कैसे होती है? ‘कॉलेजियम सिस्टम’ से। इसी सिस्टम के तहत जजों की नियुक्ति और स्थानांतरण किया जाता है। अव्वल तो ये कि ये सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों से ही आया है, न संसद और न ही संविधान ने ऐसा कोई प्रावधान बनाया। 1981 में ‘First Judges Case (गुप्ता केस)’ में कहा गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की राय जजों की नियुक्ति-ट्रांसफर में सर्वोपरि नहीं है।
1993 में सुप्रीम कोर्ट ‘कॉलेजियम सिस्टम’ लेकर आया। इसमें CJI के साथ-साथ कमिटी में 2 वरिष्ठतम जजों को डाला गया। 1998 में समिति की संख्या 5 कर दी गई, जिसमें CJI के साथ-साथ सुप्रीम कोर्ट के 4 सबसे वरिष्ठ जज होते हैं। इसी तरह सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट्स में कॉलेजियम के तहत ऐसी ही समितियाँ हैं। रिटायर हो रहा CJI खुद अपने उत्तराधिकारी की अनुशंसा करता है। हालाँकि, 70 के दशक में हुए कुछ विवादों के बाद वरिष्ठता के आधार पर ही ये पद दिया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के जजों की नियुक्ति के मामले में कॉलेजियम पहले केंद्रीय कानून मंत्री को अपनी अनुशंसा भेजता है, जहाँ से इसे प्रधानमंत्री को भेजा जाता है और फिर केंद्र सरकार की सलाह पर राष्ट्रपति इस पर मुहर लगाते हैं। इस सिस्टम की आलोचना होती है क्योंकि इसमें कोई पारदर्शिता नहीं है, नेपोटिज्म का बोलबाला है और कई प्रतिभावान जूनियर जज-वकील पीछे रह जाते हैं। जब 2014 में ‘नेशनल जुडिशल अपॉइंटमेंट्स कमिशन’ आया तो अगले साल कोर्ट ने इसे किनारे रख दिया और कहा कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर फर्क पड़ेगा।
फिलहाल, नेपोटिज्म की स्थिति ये है कि सुप्रीम कोर्ट के 38% जजों के परिवार का न्यायपालिका ये सरकार में पहले से कनेक्शन है। 32 में से 12 जज ऐसे हैं। क्या कॉलेजियम सिस्टम से प्रतिभाओं को अनदेखा नहीं किया जा रहा? भारत की हर एक संस्था जनता की सेवा के लिए है। ऐसे में जनता को ही नहीं पता नियुक्तियाँ-प्रोमोशंस कैसे हो रहे। ब्यूरोक्रेसी के लिए परीक्षा होती है, विधायिका को सीधे जनता चुनती है, लेकिन न्यायपालिका में जज, जज को चुनते हैं और किसी को कुछ खबर तक नहीं होती कि पैमाना क्या है, चरणबद्ध प्रक्रिया क्या है?
ये वही सुप्रीम कोर्ट है, जिसने चुनावी प्रक्रिया की शुचिता को बनाए रखने और देश की लोकतांत्रिक संरचना की सत्यनिष्ठा को अक्षुण्ण रखने की बातें कर के चुनाव लड़ने वाले नेताओं और उनके पति-पत्नी को भी अपनी संपत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करने का आदेश दिया था। 4 जुलाई, 2022 के डिक्लेरेशन की बात करें तो 32 में से मात्र 4 सुप्रीम कोर्ट जजों ने अपनी संपत्ति का ब्यौरा वेबसाइट पर डाला है। माननीय, दूसरों से इतनी उम्मीदें रख कर फैसले देते हैं और खुद उसका पालन क्यों नहीं करते?

जज साहब, दूसरों को टास्क देते हैं तो जरा अपने पेंडिंग केसेज पर भी नजर डाल लीजिए

अदालत दूसरों के लिए समयसीमा तय करती है। फलाँ तारीख़ तक ये चीज हो जानी चाहिए, चिलाँ तारीख़ तक ये फैसला लागू हो जाना चाहिए – इस तरह के आदेश आते हैं। लेकिन, समयसीमा जजों के लिए क्यों नहीं तय की जाती? कोरोना काल में भी सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई कि मृतकों के मृत्यु प्रमाण-पत्र बनाने में देर क्यों हो रही है? 2015 में जस्टिस जोसफ कुरियन के ताजमहल दौरे के बाद अचानक से सुप्रीम कोर्ट की नजर वहाँ की सड़क पर पड़ गई और यूपी सरकार को सड़क निर्माण के लिए फटकारा गया।
क्या आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट में कितने मामले लंबित हैं? 70,852 केस। जी हाँ, 32 जज मिल कर ये केस कितने दिन में निपटा पाएँगे, आप खुद समझ लीजिए। भारतीय न्यायपालिका व्यवस्था में सुप्रीम कोर्ट और उसके अंतर्गत आने वाली अदालतों में 4.7 करोड़ से भी अधिक मामले पेंडिंग पड़े हुए हैं। ये वही सुप्रीम कोर्ट है, जो 2022 में 83 दिन छुट्टियों पर रहा। 50 दिन रविवार के भी जोड़ दीजिए तो ये 133 दिन हो जाता है, साल के 36% दिन इन्होंने छुट्टियाँ ही मनाई।
अमेरिका में ऐसा नहीं होता। वहाँ की सुप्रीम कोर्ट एक साल में मुश्किल से 10 दिन छुट्टियों पर रहता है। जस्टिस जेबी पारदीवाला ने हाल ही में संसद को सोशल मीडिया पर नकेल कसने की सलाह दे डाली। शायद उन्हें जजों की आलोचना बर्दाश्त नहीं हुई। अब लाखों लोग अपनी राय रखेंगे तो सबको ये जेल में भेजने का रिस्क भी नहीं ले सकते। सुप्रीम कोर्ट सहमति-असहमति और लोकतंत्र में फ्री स्पीच पर ज्ञान देता है तो खुद को जनता की आलोचना से परे क्यों मानता है?
आलोचना तो होगी, क्योंकि इस देश में जितने भी अधिकारी-नेता-जज हैं, जनता से ऊपर नहीं है। लोकतंत्र में जनता सर्वोपरि है। अगर देश को लोकतंत्र के हिसाब से चलना है तो कॉलेजियम सिस्टम की जगह प्रतिभा की जाँच के बाद जजों की नियुक्ति होनी चाहिए, ‘Contempt Of Court’ जैसे नियम पूर्णरूपेण हटने चाहिए और लंबित मामलों के निपटारे के लिए समयसीमा तय होनी चाहिए। वरना आपकी आलोचना होती रहेगी, आप किस-किस को जेल में बंद करेंगे?
जब सुप्रीम कोर्ट के CJI या कोई जज ये कहता है कि वो सिर्फ और सिर्फ संविधान के प्रति उत्तरदायी है, तो सवाल उठता है कि गलती करने पर संविधान ने कब किसे टोका है? संविधान एक पुस्तक है, कोई जीवित वस्तु तो नहीं। 10 लाख की जनसंख्या पर जहाँ मात्र 20 जज हों और 21% नय्यापलिका के पद खाली हों, वहाँ संविधान को इसका जवाब क्यों नहीं देते जज साहब? 1.82 लाख मामले 30 साल या उससे अधिक से चल रहे हैं और 2.44 लाख मुक़दमे बलात्कार और बाल यौन शोषण के हैं, इन्हें न्याय कब मिलेगा? 76% कैदियों को जेल में बिना सज़ा सुनाए रखा गया है, सुनवाई के दौरान ही।