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कांग्रेस ने 39 साल पहले शरिया के लिए रौंदा संविधान; राहुल गांधी बताएं- हिंदुस्तान संविधान से चलेगा या शरिया से ?


हिंदुस्तान संविधान से चलेगा या शरिया से? यह एक बड़ा सवाल भारतीय समाज के सामने उठ खड़ा हुआ है। तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को गुजारा भत्ते के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने एतराज जताया है। बोर्ड ने सर्वोच्च अदालत के फैसले पर कहा कि यह ‘शरिया’ (इस्लामी कानून) के खिलाफ है। सर्वोच्च अदालत ने तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को इद्दत की अवधि के बाद गुजारा भत्ता मांगने की अनुमति दी है। लेकिन भारतीय मुसलमान इसे मानने के लिए तैयार नहीं है। वे अपनी सुविधा के अनुसार कभी संविधान तो कभी शरिया मानना चाहते हैं। वे शरिया के अनुसार चार शादियां करना चाहते हैं, वे तलाक के बाद महिलाओं को गुजारा भत्ता नहीं देना चाहते। शरिया में पत्थर मारकर मौत की सजा देना भी शामिल है, लेकिन वे इसकी चर्चा तक नहीं करते। इन दिनों संविधान की किताब हमेशा साथ लेकर चलने वाले कांग्रेस नेता राहुल गांधी को अब अपना पक्ष स्पष्ट करना चाहिए कि भारतीय मुसलमान जो संविधान को नहीं मानना चाहते तो उनसे क्या कहेंगे।

तलाकशुदा मुस्लिम महिला को भी भरण-पोषण पाने का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने एक फैसले में कहा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिला भी अपराध प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 144) के अनुसार पति से भरण-पोषण पाने का अधिकार रखती हैं। इसके लिए वह याचिका दायर कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला मोहम्मद अब्दुल समद नामक मुस्लिम युवक की याचिका को खारिज करते हुए सुनाया। सर्वोच्च अदालत ने यह भी कहा है कि उसका यह निर्णय हर धर्म की महिला पर लागू होगा। इसी को मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड शरीयत के खिलाफ बता रहा है।

AIMPLB ने कहा-सुप्रीम कोर्ट का फैसला शाहबानो केस जैसा
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) की रविवार (14 जुलाई) को हुई कार्यसमिति की बैठक में आठ प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। यह जानकारी बोर्ड के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने दी। बैठक के बाद AIMPLB ने बयान जारी कर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शाहबानो केस जैसा बताया और कहा कि ये फैसला शरीयत कानून में मतभेद पैदा करने वाला है। उन्होंने कहा कि मुस्लिमों को मजहब के मुताबिक ज़िंदगी जीने का अधिकार है। इसके साथ ही AIMPLB ने उत्तराखंड के UCC को धार्मिक आजादी के खिलाफ बताते हुए उसे भी चुनौती देने का ऐलान किया। बोर्ड ने कहा कि यह संविधान द्वारा दिए गए धार्मिक स्वतंत्रता का भी हनन करता है। बोर्ड का कहना कहा कि गुजारा भत्ता वास्तव में मुस्लिम महिलाओं के लिए भीख है। जब पति ने महिला से रिश्ता ही खत्म कर लिया, तो वह उससे गुजारा-भत्ता के रूप में भीख क्यों मांगे।

सुप्रीम कोर्ट का फैसला मुस्लिम महिलाओं के हित में नहींः AIMPLB
AIMPLB के प्रवक्ता डॉ क़ासिम रसूल इलियास ने बताया कि बोर्ड की वर्किंग कमेटी में 5 महिलाओं समेत 51 मेंबर हैं। इसकी मीटिंग में पहला resolution सुप्रीम कोर्ट के जजमेंट पर पास किया गया। इसमें कहा गया है कि निकाह एक पवित्र बंधन होता है लेकिन हम अपने मज़हब के मुताबिक ज़िन्दगी गुज़ारे ये हमारा पर्सनल राइट है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ये आदेश महिलाओं के हित में है लेकिन हमें लगता है कि ये महिलाओं के हित में नहीं है।

पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगाः AIMPLB
इलियास ने बताया कि इस्लाम तलाक को रोकने के लिए हर संभव प्रयास करता है। अगर तलाक के बाद भी पुरुष को गुजारा भत्ता देना है तो वह तलाक क्यों देगा? और अगर रिश्ते में कड़वाहट आ गई है तो इसका खामियाजा किसे भुगतना पड़ेगा? हम कानूनी समिति से सलाह-मशविरा करके इस फैसले को वापस लेने के बारे में विचार विमर्श करेंगे। हम अपनी लीगल कमेटी से कंसल्ट करके इसे रोलबैक कराने पर विचार करेंगे।

उत्तराखंड में यूसीसी को देंगे चुनौती
सैयद कासिम इलियास ने कहा कि उत्तराखंड के यूसीसी कानून को चुनौती दी जाएगी। उन्होंने कहा कि विविधता हमारे देश की पहचान है, जिसे हमारे संविधान ने संरक्षित रखा है। यूसीसी इस विविधता को खत्म करने का प्रयास है। यूसीसी न केवल संविधान के खिलाफ है, बल्कि हमारी धार्मिक स्वतंत्रता के भी खिलाफ है। उत्तराखंड में पारित यूसीसी सभी के लिए परेशानी का कारण बन रही है। हमने उत्तराखंड में यूसीसी को चुनौती देने का फैसला किया है। हमारी कानूनी समिति तैयारी में जुटी है।

शरिया नहीं, मुस्लिम पर्सनल लॉ एक्ट को मानते हैं भारतीय मुसलमान
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय मुसलमान खुद शरिया को नहीं मानते हैं। वे अंग्रेजों द्वारा बनाए मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) अप्लीकेशन एक्ट 1937 को मानते हैं। यह मुसलमानों के बीच विवाह, गोद लेने, विरासत, तलाक और उत्तराधिकार जैसे व्यक्तिगत मामलों को नियंत्रित करने के लिए इस्लामी कानून को मान्यता देता है। मुस्लिमों में निकाह (विवाह) को एक अनुबंध माना जाता है, जो संतानोत्पतत्ति और बच्चों को वैध बनाने के लिए होता है। इसीलिए मुस्लिम शादियों में निकाहनामा (विवाह अनुबंध) की व्यवस्था है। इसमें महर का जिक्र भी होता है। महर वह धनराशि है जो विवाह के समय वर या वर का पिता, कन्या को देता है। एक महर तत्काल होती है, जो महिला को विवाह के वक्त ही मिल जाती है। दूसरी महर निकाह के वक्त तय कर दी जाती है, जो तलाक या पति की मृत्यु के वक्त मिलती है।

शरीयत में तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार नहीं
आमतौर पर शरीयत में तलाक के बाद महिलाओं को इद्दत तक गुजारा-भत्ता पाने और महर (मेहर) के अलावा गुजारा-भत्ता पाने का सामान्य अधिकार नहीं है। इद्दत सामान्यतौर पर तलाक या पति की मृत्यु के बाद तीन माह तक की अवधि होती है। हालांकि, तलाक के वक्त अगर कोई महिला गर्भवती है तो बच्चे के पैदा होने तक का खर्च पति उठाएगा। इसके बाद अगर मां बच्चे को दूध पिलाती है तो केवल बच्चे का खर्च पिता देगा। बाकी तलाकशुदा लड़की के लिए केवल पिता और भाई जिम्मेदार होते हैं।

सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मांग सकती थीं अधिकार
हालांकि, साल 1986 के पहले तक सीआरपीसी की धारा 125 के तहत मुस्लिम महिला भरण-पोषण का अधिकार मांग सकती थी. सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरण-पोषण मांगने का अधिकार सभी धर्मों की महिलाओं के पास था और मोहम्मद अहमद खान बनाम शाह बानो बेगम, 1985 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इसकी पुष्टि भी की थी।

शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला बना नजीर
शाहबानो इंदौर की रहने वाली एक महिला थी। साल 1975 में शाह बानो के पति मोहम्मद अहमद खान ने उसे तलाक दे दिया। शाहबानो और उसके 5 बच्चों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया। उस समय शाहबानो की उम्र 59 साल की थी। शाहबानो ने अदालत से न्याय की मांग की । हालांकि उसके पति मोहम्मद अहमद खान ने दलील दी कि तीन तलाक के बाद इद्दत की मुद्दत तक ही तलाकशुदा महिला की देखरेख की जिम्मेदारी उसके पति की होती है। तलाक के बाद गुजारा भत्ता देने का कोई प्रावधान नहीं है। मामला मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़ा था। लड़ाई सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची। पांच जजों की संविधान पीठ ने 23 अप्रैल 1985 को मुस्लिम पर्सनल लॉ बॉर्ड के आदेश के खिलाफ जाते हुए शाहबानो के पति को आदेश दिया कि वो अपने बच्चों को गुजारा भत्ता दे।

मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेके
सुप्रीम कोर्ट का शाहबानो मामले में फैसला आने के बाद भारतीय मुसलमानों ने विरोध करना शुरू कर दिया। मुस्लिम कट्टरपंथियों के विरोध के आगे राजीव गांधी सरकार ने घुटने टेक दिए थे। मुस्लिम तुष्टिकरण में सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट दिया था। राजीव गांधी की सरकार ने मुस्लिम महिला (तलाक में संरक्षण का अधिकार) कानून 1986 सदन में पेश किया। शाहबानो मामले में राजीव गांधी की सरकार के द्वारा उठाए गए कदम को लेकर देश भर में सरकार के खिलाफ एक माहौल देखने को मिला।

कांग्रेस ने 39 साल पहले शरिया के लिए रौंदा संविधान
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ता का अधिकार दिए जाने के सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बड़ी राहत और मानवीय संवेदनाओं वाला बताते हुए भाजपा ने कांग्रेस को भी आड़े हाथों लिया है। भाजपा सांसद व राष्ट्रीय प्रवक्ता डा. सुधांशु त्रिवेदी ने शाह बानो केस याद दिलाते हुए कहा कि 39 साल पहले राजीव गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने शरिया के लिए संविधान को रौंदा था। उन्होंने कहा कि 1985 में संविधान पर बहुत बड़ा खतरा आया था, जब शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय एक गरीब मुस्लिम महिला को भत्ता देने के लिए आया था। तब उसे शरिया के विरुद्ध मानकर राजीव गांधी के नेतृत्व में चल रही तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को रौंदकर संविधान के ऊपर शरिया को कर दिया था। तब संविधान खतरे में था। यह हमें फिर याद दिलाता है कि जब-जब यह सत्ता में आए, अनेक बार संविधान को खतरे में डाला।

मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019
इसके बाद मोदी सरकार ने साल 2019 में मुस्लिम महिलाओं के हक की रक्षा के लिए मुस्लिम महिला (विवाह अधिकार संरक्षण) अधिनियम-2019 लाया। इसके तहत अगर किसी मुस्लिम महिला को पति ने तलाक कहकर तलाक दे दिया है, तो वह भरण-पोषण भत्ता मांग सकती है। यही नहीं, इस अधिनियम के तहत अगर कोई मुस्लिम पति अपनी पत्नी को मौखिक, लिखित अथवा इलेक्ट्रॉनिक रूप में या किसी भी दूसरे तरीके से तलाक की घोषणा करता है तो वह शून्य और अवैध माना जाएगा। हालांकि, तलाकशुदा मुस्लिम महिला के पास यह अधिकार है कि वह इस अधिनियम को माने या फिर किसी अन्य कानून या परंपरा में उपलब्ध दूसरे विकल्प का चुनाव करे।

पर्सनल लॉ बोर्ड के फैसले की 3 बड़ी बातें
1. SC का फैसला शरिया कानून के खिलाफ
मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को शरियत के खिलाफ बताया है। AIMPLB के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला शरिया कानून से कॉन्फ्लिक्ट करता है। उन्होंने कहा कि मुसलमान शरिया कानून का पाबंद है। वो ऐसा कोई भी काम नहीं कर सकता जो शरिया से कॉन्फ्लिक्ट करता हो. उन्होंने कहा कि संविधान के आर्टिकल 25 में हमें अपने मजहब के अनुसार जिंदगी गुजारने की आजादी दी गई है, ये हमारा मौलिक अधिकार है. वहीं AIMPLB की एग्जीक्यूटिव मेंबर मुनीसा ने भी SC के फैसले को शरीयत के खिलाफ बताया है। उन्होंने कहा है कि यह महिलाओं के हक में नहीं है।

2. महिलाओं के लिए मुसीबत साबित होगा फैसला
AIMPLB का कहना है कि सर्वोच्च अदालत के इस फैसले से मुस्लिम महिलाओं को कोई फायदा नहीं होगा बल्कि ये फैसला उनके लिए एक नई मुसीबत पैदा कर देगा। बोर्ड का कहना है कि अगर किसी शख्स को तलाक के बावजूद आजीवन पत्नी का खर्चा उठाना पड़ेगा तो फिर वो तलाक क्यों देगा? बोर्ड के प्रवक्ता ने दावा किया है कि इससे मुस्लिम महिलाओं को आजीवन मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा. उनका पति उन्हें तलाक न देकर आजीवन परेशान करता रहेगा।

3. फैसले के खिलाफ लड़ेंगे कानूनी लड़ाई
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बैठक में तय किया गया है कि गुजारा भत्ता देने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ेंगे। बैठक में वर्किंग कमेटी ने बोर्ड को अथॉरिटी दी है कि लीगल कमेटी से बात कर इस फैसले को रोलबैक करने की दिशा में काम किया जाए. बोर्ड के प्रवक्ता ने कहा है कि हमने ये महसूस किया है कि देश में हिंदुओं के लिए हिंदू कोड बिल है और मुसलमानों के लिए शरिया लॉ है। कोर्ट का ये फैसला शरियत से कॉन्फ्लिक्ट करता है लिहाजा हम पूरी कोशिश करेंगे कि इस फैसले को रोलबैक किया जाए।

इस्लाम की भेंट चढ़ गया 33% भारत, 75% वाले गाँव में चाहिए शरिया

डेमोग्राफी में बदलाव के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं, ये हिन्दुओं को अब समझ में आ रहा है। ऐसा नहीं है कि इतिहास में इसका खामियाजा हमें नहीं भुगतना पड़ा, बल्कि उस इतिहास को हम भूल चुके हैं। पाकिस्तान के रूप में हमारा 8 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र और बांग्लादेश के रूप में डेढ़ लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र हमसे छिन गया। अफगानिस्तान, जो पहले भारतवर्ष का हिस्सा हुआ करता था, आज उस साढ़े 6 लाख वर्ग किलोमीटर में शरिया चलता है।

यानी, कुल मिला कर ये 16 लाख वर्ग किलोमीटर का क्षेत्र हमारे हाथों से इस्लाम को फिसल गया। ये कोई छोटा क्षेत्र नहीं है, बल्कि भारत के वर्तमान क्षेत्रफल का लगभग आधा है। अर्थात, आधा भारत हमने खो दिया। वहाँ आज हिन्दू बेहाल हैं। पाकिस्तान में उनकी बहू-बेटियों का अपहरण कर जबरन धर्मांतरण और निकाह करा दिया जाता है, अफगानिस्तान में गुरु ग्रन्थ साहिब सिर पर लाद कर भारत लाना पड़ता है और बांग्लादेश में एक झूठी अफवाह के कारण देश भर में दुर्गा पूजा पंडालों पर हमले होते हैं।

ये होता है जनसांख्यिकी में बदलाव का असर। 1930 के दशक के कराची की तस्वीर देखिए। महाशिवरात्रि के मेले में भीड़ दिखेगी। आम हिन्दू वहाँ आते थे, समृद्ध हिन्दुओं की गाड़ियाँ पार्क हुई दिखेंगी। आज कराची में इस तरह के नज़ारे के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता। क्यों? क्योंकि ये मुस्लिम बहुल इलाका है। नेपाल, भूटान, तिब्बत या म्यांमार भी प्राचीन भारत से अलग हुए, लेकिन वहाँ हिन्दुओं पर अत्याचार नहीं होते। कारण कि वहाँ मुस्लिम बहुसंख्यक नहीं हैं।

अफगानिस्तान में शरिया लागू है। यहाँ तक कि सिनेमा और गीत-संगीत पर भी प्रतिबंध है। भगवान बुद्ध की प्रतिमा को बम से उड़ा दिया गया। गुरुद्वारों पर हमले होते हैं। बांग्लादेश में क़ुरान के अपमान की झूठी अफवाह से कैसे देश भर के मंदिरों पर हमले और आगजनी हुई, हमने देखा। तीनों देशों में अल्पसंख्यकों, खासकर हिन्दुओं की जनसंख्या पिछले कुछ दशकों में कई गुना कम हो गई। जो बचे-खुचे हैं, डर कर रहते हैं। डर कर रहना पड़ता है।

लेकिन, ये तो इस्लामी कट्टरवाद की बस 33% सफलता है। बाकी की सफलता उन्हें तब प्राप्त होगी, जब उनका ‘गजवा-ए-हिंदुस्तान’ का सपना पूरा होगा। पूरे भारत पर इस्लाम का राज। इसकी एक साजिश हमें तभी देखने को मिली थी, जब देश के बँटवारे के समय बांग्लादेश (तब पूर्वी पाकिस्तान) से लेकर पाकिस्तान तक एक ‘मुस्लिम पट्टी’ की माँग की गई थी। अर्थात, भारत के बीचोंबीच मुस्लिम जनसंख्या बढ़ा कर देश को और खंडित करना।

ये साजिश अभी भी चल रही है। बांग्लादेश से पाकिस्तान तक एक ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाए जाने के आरोप लगते रहे हैं, यानी रास्ते में आने वाले सभी जिलों को मुस्लिम बहुसंख्यक बना दो। इससे न सिर्फ भारत के टुकड़े होंगे, बल्कि हिन्दू भी डर कर रहेंगे। पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और हरियाणा जैसे राज्यों पर इसका सबसे ज्यादा असर पड़ रहा है। पूर्व विधान पार्षद हरेंद्र प्रताप के इस मुस्लिम गलियारे के बारे में बताते हुए जानकारी दी थी कि कैसे इससे पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ने की साजिश चल रही है।

उन्होंने आँकड़े गिनाए थे कि मुस्लिम बहुल इलाकों मुजफ्फरनगर (50.14%), मुरादाबाद (46.77%), बरेली (50.13%), सीतापुर (129.66%), हरदोई (40.14%), बहराइच (49.17%) और गोंडा (42.20%) से ‘मुस्लिम पट्टी’ बनाने की साजिश है। कैराना से हिन्दुओं के पलायन और पश्चिम बंगाल में रोहिंग्या मुस्लिमों के बढ़ते प्रभाव को उन्होंने इससे जोड़ कर देखा था। चिकेन्स नेक काटने की साजिश की तो शाहीन बाग़ में शरजील इमाम जैसों ने ही पोल खोल दी।

झारखंड की एक हालिया घटना को ही देख लीजिए। गढ़वा के एक विद्यालय में प्रधानाध्यापक पर इसीलिए इस्लामी नियम-कानून लागू करने का दबाव है, क्योंकि वहाँ मुस्लिम 75% हो गए हैं। ये अलग बात है कि देश के 8 राज्यों में अल्पसंख्यक होने के बावजूद हिन्दुओं को इसका फायदा नहीं मिलता और सुप्रीम कोर्ट भी इससे जुड़ी याचिका रद्द कर चुका है। मुस्लिम कहीं 100% हो जाएँ, फिर भी उन्हें सरकारी स्तर पर अल्पसंख्यकों वाली सारी सुविधाएँ मिलती रहेंगी।

गढ़वा में समुदाय के दबाव के चलते स्कूल की प्रार्थना बदल गई है। पहले यहाँ ‘दया का दान विद्या का…’ प्रार्थना करवाई जाती थी। हालाँकि अब ‘तू ही राम है तू ही रहीम’ प्रार्थना स्कूल में होने लगी है। इसके साथ स्कूल में बच्चों को हाथ जोड़ कर प्रार्थना करने से भी मना कर दिया गया है। गाँव का मुखिया शरीफ अंसारी है। मुस्लिमों के हंगामे के कारण प्रिंसिपल को सलाह दी गई कि उनके कहे अनुसार चलाएँ। क्या आज तक हिन्दुओं ने किसी स्कूल में घुस कर हंगामा किया है कि वहाँ यज्ञ-हवन करवाएँ जाएँ।

ये इस तरह की अकेली घटना नहीं है। राजस्थान के उदयपुर में टेलर कन्हैया लाल तेली का सिर कलम किए जाने का मामला हो या महाराष्ट्र के अमरावती में केमिस्ट उमेश कोल्हे की गर्दन में खंजर घोंप कर उनकी हत्या की घटना, इस्लामी कट्टरपंथ का प्रयास यही है कि हिन्दू डर कर रहें। कश्मीर में दशकों से आम नागरिक निशाना बनाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में एक छोटी सी घटना पर निकली मुस्लिम भीड़ रेलवे की अरबों की संपत्ति का झटकों में नुकसान कर देती है।

खासकर जहाँ भाजपा की सरकार नहीं है, वहाँ ऐसी घटनाएँ और ज्यादा होती हैं। अव्वल तो ये कि इन्हें तुरंत अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिल जाता है। 50 से अधिक इस्लामी मुल्क हैं दुनिया में, ऊपर से कई देशों में वो बहुसंख्यक हैं और कइयों में प्रभावशाली स्थिति में हैं। फिर भी वो पीड़ित बन कर ही रहते हैं। मीडिया आतंकवाद और कट्टरपंथ के विरोध को ‘इस्लामोफोबिया’ कहता है। किसी हिन्दू का सिर जिहादी काट लें, फिर भी ‘TIME’ जैसे मैगजीन एक तरह से ये पूछते हैं कि ये हिन्दू बिना शोर मचाए क्यों नहीं मर रहे?

जहाँ मुस्लिमों की जनसंख्या ज्यादा नहीं है, वहाँ भी कई गली-मोहल्लों में ये एक साथ रहते हैं। ये इलाके फिर ‘संवेदनशील’ कहे जाते हैं। वहाँ मस्जिद होता है। सड़क सरकार की होती है, लेकिन वहाँ से हिन्दू त्योहारों के जुलूस नहीं गुजर सकते। डीजे बजाने पर पत्थरबाजी होती है। लेकिन, ये सड़क पर नमाज पढ़ सकते हैं। सार्वजनिक स्थान पर शांतिपूर्ण हनुमान चालीसा पाठ को ‘गुंडई’ बता दिया जाता है। यानी, इनकी मंशा है कि ये जहाँ भी रहें, मर्जी इनकी ही चले। शरिया का पालन मुस्लिम ही नहीं, सभी गैर-मुस्लिम भी करें।

उत्तराखंड में भी डेमोग्राफी बदलने की बात सामने आई है। पर्यटन और हिन्दू तीर्थाटन आधारित इस राज्य के उद्योग-धंधों में बाहरी मुस्लिमों का वर्चस्व हो गया है। पश्चिम बंगाल में तो लगभग एक तिहाई जनसंख्या मुस्लिमों की होने जा रही है। तभी भाजपा कार्यकर्ताओं के नरसंहार पर मुस्लिमों की बदौलत सत्ता में आई मुख्यमंत्री ममता बनर्जी चुप रहती हैं। हैदराबाद की सभी विधानसभा और लोकसभा सीटें असदुद्दीन ओवैसी को जाती हैं। बिहार के सीमांचल में मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते हैं। ये होता है डेमोग्राफी में बदलाव का असर।

हम कश्मीर को कैसे भूल सकते हैं। लाखों की संख्या में जहाँ पंडित हुआ करते थे और डल झील के किनारे मंत्र जपते पंडित जिस राज्य की पहचान थे, वहाँ से उन्हें अपनी घर-संपत्ति छोड़ कर भागना पड़ा और अपने ही देश में शरणार्थी बन कर जीना पड़ रहा है। नरसंहार हुआ, बलात्कार हुआ, पलायन हुआ – बदल गई डेमोग्राफी। इसकी कोई गारंटी नहीं कि ये प्रक्रिया भारत के अन्य हिस्सों में नहीं दोहराई जाएगी। गुजरात में एक जैन कॉलोनी का इस्लामीकरण कर दिया गया, जहाँ अहिंसक जैन को कटते हुए पशुओं की चीखें सुननी पड़ती है, बहता खून देखना पड़ता है। यही तो है डेमोग्राफी चेन्ज की प्रक्रिया।