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आखिर कौन महापागल लिख रहा राहुल की स्क्रिप्ट? झूठ के सरगना कांग्रेस नेता राहुल गाँधी एक ही बार में बोल गए सब पर झूठ: गाँधी, गोडसे और संविधान…

महात्मा गाँधी (बाएँ), राहुल गाँधी (बीच में), नाथूराम गोडसे (दाएँ), (फोटो साभार : Bharatdiscovery, Jagran & ndtv)
जिस तरह राहुल गाँधी एक से बढ़कर एक झूठ बोल रहे हैं LoP पद को भी कलंकित कर दिया है। LoP के मुंह से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए कि विपक्ष(सत्तारूढ़ पार्टी) भी उसका खंडन करने को मजबूर हो। लेकिन यहां तो LoP ही इतना झूठ बोल जनता को गुमराह कर रहा है। समझ नहीं आता आखिर राहुल की स्क्रिप्ट कौन महापागल लिख रहा है? आखिर कांग्रेस का बुद्धिजीवी वर्ग कौन-से कोप भवन में छुपा बैठा है? जहाँ तक नाथूराम गोडसे की बात है कि महात्मा गाँधी को क्यों मारा? इस सच्चाई को जानने के लिए गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को ध्यान से पढ़ना होगा। दूसरे, जब गोडसे ने गाँधी को गोली मारी कहते हैं कि गाँधी 40 मिनट तक जीवित थे, जबकि विल्लिंग्टन वर्तमान डॉ राम मनोहर लोहिआ होस्पिटल ज्यादा दूर नहीं था गाँधी को बचाया जा सकता था लेकिन कोई हॉस्पिटल लेकर नहीं गया, क्यों? 

यह दुनिया का रिकॉर्ड है कि जब आरोपी को माइक से अपने बयान पढ़ने की इजाजत दी गयी है। इतना ही नहीं कांग्रेस सरकार ने गोडसे के बयानों को सार्वजनिक होने पर बैन लगा दिया था, क्यों? देखिए संलग्न गोडसे पर लिखी श्रृंगला का एक पृष्ठ। समय आ गया है कि गोडसे समर्थकों को गोडसे के बयानों को घर-घर वितरित कर गोडसे विरोधियों को करारा जवाब देना चाहिए।    
बिहार के कटिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महात्मा गाँधी, नाथूराम गोडसे और भारतीय संविधान को लेकर एक के बाद एक कई झूठ बोले, जिसने उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना दिया है। हाथ में संविधान की लाल किताब लेकर, राहुल गाँधी ने दावा किया कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की क्योंकि वह संविधान से नफरत करता था और महात्मा गाँधी ने इसी संविधान के लिए अपना जीवन दिया।

हालाँकि, उनके ये दावे ऐतिहासिक तथ्यों के आगे टिक नहीं पाते। हकीकत यह है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी, तब भारतीय संविधान का मसौदा (ड्राफ्ट) भी सामने नहीं आया था। नाथूराम गोडसे को भी संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दी जा चुकी थी। राहुल गाँधी का यह बयान सच्चाई से कोसों दूर है।

महात्मा गाँधी की हत्या और संविधान का अस्तित्व

राहुल गाँधी ने दावा किया कि गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की, क्योंकि गोडसे संविधान से नफरत करता था और गाँधी जी ने संविधान के लिए अपना पूरा जीवन दिया। यह दावा पूरी तरह से निराधार है।

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। भारतीय संविधान को भारतीय संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अपनाया था और यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था।

इन तारीखों से यह स्पष्ट है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई, तब भारत का संविधान अस्तित्व में नहीं था। संविधान का पहला मसौदा (ड्राफ्ट) भी गाँधी जी की हत्या के एक महीने बाद, यानी 21 फरवरी 1948 को प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार, यह कहना पूरी तरह से बेतुका है कि गोडसे ने उस चीज से नफरत की, जो उस समय मौजूद ही नहीं थी और गाँधी ने ऐसी चीज का बचाव किया, जिसका अस्तित्व उनके जीवनकाल में नहीं था।

गोडसे की फाँसी और संविधान का लागू होना

राहुल गाँधी का दूसरा बड़ा झूठ यह था कि गोडसे की नफरत संविधान से थी, जिसके कारण उसने गाँधी जी को गोली मारी। सच्चाई तो यह है कि गोडसे को संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दे दी गई थी।

दरअसल, 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए फाँसी दी गई थी। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था, यानि गोडसे को फाँसी दिए जाने के दो महीने बाद।

यह तथ्य ही राहुल गाँधी के पूरे कथन को खोखला साबित कर देता है। गोडसे को भारतीय गणराज्य द्वारा संविधान अपनाए जाने से पहले ही सजा मिल चुकी थी। ऐसे में, यह दावा कि उसकी नफरत संविधान से थी, हास्यास्पद है।

महात्मा गाँधी और संविधान सभा में उनकी भूमिका

राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया। यह बात भी ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो महात्मा गाँधी ने खुद को संक्रमण प्रक्रिया से अलग कर लिया था। वह न तो अंतरिम सरकार का हिस्सा थे और न ही संविधान सभा के सदस्य थे। महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि इसका गठन वायसराय ने किया है और यह ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई है।

महात्मा गाँधी इसे एक सार्वभौम (Sovereign) सभा नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखा और इसमें शामिल नहीं हुए। महात्मा गाँधी ने कुछ विशिष्ट प्रस्ताव जरूर दिए थे, जैसे कि ग्राम-आधारित शासन मॉडल, जिसे ग्राम स्वराज के नाम से जाना जाता है। महात्मा गाँधी के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र गाँव की संस्थाओं में निहित होता है, जो आत्मनिर्भर और स्वशासित हों।

संविधान निर्माण का काम मुख्य रूप से डॉ बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति ने किया था। ऐसे में, यह दावा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया, सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।

RSS और बीजेपी पर राहुल गाँधी का आरोप

राहुल गाँधी ने यह भी दावा किया कि RSS और बीजेपी ने संविधान को नहीं बनाया। दरअसल, बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था, जबकि संविधान 1950 में लागू हो गया था। इसलिए, बीजेपी की संविधान बनाने में कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह एक बेतुका दावा है। RSS एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और उसकी संविधान निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।

राहुल गाँधी के ये दावे न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं, बल्कि वे एक बड़ी झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। राहुल गाँधी की ये टिप्पणियाँ, जिसमें वह संविधान की प्रति हाथ में लेकर झूठे दावे कर रहे थे, न केवल देश के इतिहास को गलत तरीके से पेश करती हैं, बल्कि महात्मा गाँधी और संविधान के महत्व को भी कम करती हैं। राहुल गाँधी हमेशा से अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ के पेश करते हैं, जिसका मजाक वो खुद ही बनकर रह जाते हैं।

अब नहीं चलेगा महात्मा गाँधी का ‘आइडिया’, इसे छोड़ना होगा, ‘ग्राम स्वराज’ को बताया अप्रासंगिक : केरल हाई कोर्ट के जस्टिस मुहम्मद मुश्ताक

     जस्टिस मुश्ताक (बाएँ) ने गांधीजी के हिन्द स्वराज को अब अप्रासंगिक (साभार: Live Law & The new learn)
केरल हाई कोर्ट के एक जज ने कहा है कि महात्मा गाँधी का दिया हुआ गाँव का आइडिया अब प्रासंगिक नहीं रहा है। उन्होंने कहा है कि इसे खत्म किए जाने की जरूरत है। उन्होंने व्यवस्था के केंद्रीकरण की भी वकालत की है। यह टिप्पणियाँ उन्होंने केरल सरकार के बनाए कानून को लेकर याचिकाओं की सुनवाई करते हुए की हैं।

केरल हाई कोर्ट के जस्टिस ए मुहम्मद मुश्ताक ने सोमवार(17 फरवरी 2025) को कह़ा, “मेरा निजी विचार है कि गाँधी जी ने जिस तरह के गाँव की कल्पना की थी, जिसे अब संवैधानिक रूप दे दिया गया है। उसे खत्म कर देना चाहिए क्योंकि शासन में अब ज्यादा कठिनाइयाँ हैं।”

जस्टिस मुश्ताक ने कहा, “उस समय, केवल छोटी-छोटी चीजें किए जाने की जरूरत थी। लेकिन स्थानीय अधिकारियों के लिए चुनौती अब बहुत बड़ी है। शहरों की प्लानिंग एक बड़ी चुनौती है… कचरे का प्रबन्धन एक और बड़ी चुनौती है। इसे स्थानीय स्तर पर नहीं किया जा सकता। हमारे पास वह कानून है लेकिन इन सब मामलों के लिए एक केंद्रीकृत प्राधिकरण होना चाहिए।”

जस्टिस मुश्ताक ने कहा कि छोटी छोटी ग्राम पंचायतें सब काम करने में सक्षम नहीं हैं, ऐसे में केंद्रीकृत व्यवस्थाओं की जरूरत है। उन्होंने कहा कि अब चुनौतियों को देखते हुए एक संस्था बननी चाहिए, जो पूरे जिले का प्रबन्धन करें। उन्होंने कहा कि अत्यधिक विकेंद्रीकरण से अब नुकसान हो रहा है।

जस्टिस मुश्ताक ने कहा, “उस समय गांधीजी ने ग्राम स्वराज के माध्यम से छोटे-छोटे मुद्दों को सुलझाने की परिकल्पना की थी। अब यह बदल चुका है, हमें इन चीजों को बदलने की जरूरत है। प्रशासन एक बड़ी चुनौती बन चुका है और देश के बाकी हिस्सों में भी सुधारों की जरूरत है।”

उन्होंने कहा कि यह जरूरी नहीं है कि 1950 में जैसी चीजों की कल्पना की गई थी, उसे 2025 में भी वैसे ही किया जाए। जस्टिस मुश्ताक ने कहा कि इस पंचायती व्यवस्था के चलते राजस्व का संग्रह भी प्रभावित हो रहा है। यह सारी टिप्पणियाँ उन्होंने केरल सरकार की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए की।

केरल की सरकार ने नगर निकायों और पंचायतों को लेकर दो कानून बनाए थे, जिन्हें केरल हाई कोर्ट की एक बेंच ने 2024 में असंवैधानिक बता दिया था। इसके अलावा कोर्ट ने नगर निकायों के विस्तारीकरण को भी रद्द कर दिया था। इसके खिलाफ ही राज्य सरकार दोबारा हाई कोर्ट पहुँची थी।

केरल : नाथूराम गोडसे के लिए किया कमेन्ट तो प्रोफ़ेसर पर हो गई FIR, सच्चाई से घबराते तुष्टिकरण करने वाले

                                                                                                                               साभार: NIT-C
केरल के कोझिकोड में एक महिला प्रोफ़ेसर पर नाथूराम गोडसे के समर्थन में कमेन्ट करने पर FIR हो गई है। केरल के कोझिकोड की पुलिस ने उनके विरुद्ध दंगा भड़काने की धारा के अंतर्गत मामला दर्ज कर लिया है। उनके खिलाफ केरल के वामपंथी छात्र संगठन ने FIR दर्ज करवाई है।
यह कार्यवाही इस बात को शत-प्रतिशत सिद्ध कर रही है कि छद्दम धर्म-निरपेक्षों और तुष्टिकरण करने वालों ने कितनी भ्रांतियां फैलाई हुई थी/हैं कि सच्चाई सुनने को तैयार नहीं। गोडसे विरोधियों को मालूम होना चाहिए कि जस्टिस खोसला ने गोडसे को उनके 150 बयान पढ़ने के लिए माइक और लाउड स्पीकर की इजाजत दी थी, जो आज तक विश्व रिकॉर्ड हैं। सेवानिर्वित होने के बाद एक पाक्षिक को सम्पादित करते शीर्षक "गोडसे ने गाँधी को मारा क्यों?" शृंखला प्रकाशित की थी।(सामने देखिए पृष्ठ) अवलोकन कीजिए नीचे दिए लिंक।  
दूसरे, अगर गोडसे ने गाँधी को मार अपराध किया है, फिर क्यों तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को सार्वजनिक होने पर क्यों प्रतिबन्ध लगाया था? गोडसे विरोधियों को यह भी मालूम होना चाहिए कि परिवार ने आज तक गोडसे की अस्थियों को सुरक्षित रखा हुआ है। गोडसे ने कहा था कि "अखंड भारत होने पर सिंधु नदी में विसर्जन किया जाए।" 
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जिन महिला प्रोफ़ेसर के विरुद्ध FIR दर्ज की गई है, वह नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIT) कालीकट में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं। उनका नाम शैजा अन्दावन है। वह NIT में मैकेनिकल इंजीयनियरिंग विभाग में पढ़ाती हैं। उन्होंने 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या की बरसी पर एक पोस्ट पर कमेन्ट किया था। पोस्ट में नाथूराम गोडसे को भारत में अनेकों लोगों का नायक बताया गया था। इसमें उन्होंने नाथूराम गोडसे का समर्थन किया था।

उन्होंने एक पोस्ट पर कमेन्ट किया, “भारत को बचाने के लिए गोडसे पर गर्व है।” यह पोस्ट गोडसे के समर्थन में किया गया था। उनके इस कमेन्ट का स्क्रीनशॉट वायरल हो गया। हालाँकि, उन्होंने यह कमेन्ट बाद में हटा दिया। यह पोस्ट एक हिंदूवादी वकील कृष्णा राज की पोस्ट पर किया गया था। जब प्रोफ़ेसर अन्दावन से इस सम्बन्ध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि वह यूनिवर्सिटी में विवाद नहीं पैदा करना चाहती, इसलिए उन्होंने कमेन्ट हटा दिया।

कमेंट डिलीट करने के बावजूद उनके खिलाफ वामपंथी छात्र संगठनों ने दो FIR दर्ज करवा दी। उनके खिलाफ राजद्रोह की धाराओं में मामला दर्ज करवाया गया है। वामपंथी छात्र संगठनों का प्रोफ़ेसर पर आरोप है कि उन्होंने इस कमेन्ट के जरिए द्वेष फैलाने का प्रयास किया। इन संगठनों ने उन्हें NIT से निष्कासित करने की माँग की है। केरल के कोझिकोड से कॉन्ग्रेस सांसद एमके राघवन ने NIT के डायरेक्टर को पत्र लिखकर उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

प्रोफ़ेसर शैजा अन्दावन ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया, “मेरा कमेन्ट गाँधीजी की हत्या की प्रशंसा करना नहीं था और ना ही मैं कभी ऐसा करना चाहती थी। मैंने गोडसे की ‘मैंने गाँधी को क्यों मारा’ किताब पढ़ी है। इस किताब में कई खुलासे और जानकारियाँ हैं, जो कि आम लोगों को नहीं पता। गोडसे ने इस किताब में हमें वह बताया है। मैंने इसी सम्बन्ध में फेसबुक पर डाली गई एक पोस्ट पर कमेन्ट किया था। जब मैंने देखा कि लोग मेरे कमेन्ट का गलत मतलब निकाल रहे हैं, तो मैंने वह हटा दिया।”

हाल ही में NIT कोझिकोड में श्रीराम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा एक विरोध में एक छात्र ने यहाँ पूरे कैम्पस में पोस्टकार्ड लहराए थे, जिसके बाद विवाद हो गया था। उसने यहाँ कुछ छात्रों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा उत्सव मनाए जाने का विरोध किया था।

National Archives of India : जेल में बंद नाथूराम गोडसे को धर्मांतरित कर ईसाई बनाने का हुआ था प्रयास, नेहरू को पता था निर्दोष हैं सावरकर: दस्तावेजों से खुलासा

                       गोडसे को ईसाईयत में धर्मांतरण की कोशिश (साभार: सोशल मीडिया)
केरल के भाजपा नेता टीजी मोहनदास (TG Mohandas) ने महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) को लेकर सनसनीखेज दावा किया है। मोहनदास ने कहा कि जेल में रहने के दौरान गोडसे का धर्मांतरण कर ईसाई (Religious Conversion in Christianity) बनाने की कोशिश की गई थी।

मोहनदास का दावा है कि इसकी जानकारी उन्होंने नई दिल्ली स्थित भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India) से जुटाई है। उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्होंने हजारों दस्तावेजों को खंलागा है। इससे संबंधित एक दस्तावेज की कॉपी भी उन्होंने ट्विटर पर शेयर किया है।

अपने ट्वीट में मोहनदास ने कहा, “मैंने महात्मा गाँधी की हत्या पर भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में लगभग 11,000 दस्तावेजों का निरीक्षण किया है। सबसे दिलचस्प चीजों में से एक जो मैंने पाया वह यह थी कि मुकदमे के तहत जेल में रहे गोडसे को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया था!”

मोहनदास द्वारा साझा किए गए दस्तावेज में दिख रहा है कि पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त वाईके पुरी ने भारत के विदेश मंत्रालय के अपर सचिव प्रेम कृशन को एक पत्र लिखा था। यह पत्र 14 सितंबर 1949 को पाकिस्तान के लाहौर शहर से लिखा गया था।

इस पर लिखा है, “प्रिय प्रेम कृशन जी, मैं दो एयरमेल पत्र भेज रहा हूँ, जिसमें ईसाइयत के बारे में उपदेश है। यह गाँधी जी की हत्या में आरोपित श्री नाथूराम विनायक गोडसे और नारायण आप्टे के लिए ब्रिटेन से आया है।”

मोहनदास कहते हैं कि ब्रिटेन द्वारा भेजा गया असली पत्र उपलब्ध नहीं है। उसका कवर लेटर ही सिर्फ उपलब्ध है। मोहनदास ने सवाल उठाया है कि क्या वह पत्र नाथूराम गोडसे को दे दिया गया था? अगर दिया गया था कि उनकी प्रतिक्रिया क्या थी? इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है।

पाकिस्तान को लेकर महात्मा गाँधी के प्रयासों से क्षुब्ध होकर नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में गोडसे केे साथ-साथ नारायण आप्टे को भी गिरफ्तार किया गया था। दोनों को 10 फरवरी 1949 को फाँसी की सजा सुनाई गई थी और 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में फाँसी दे दी गई थी।

महात्मा गाँधी की हत्या में कुल नौ आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। सुनवाई के दौरान सिर्फ एक व्यक्ति को बरी किया गया था, जिनका नाम विनायक दामोदर सावरकर है। गोडसे और आप्टे को फाँसी के अलावा बाकी छह लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इनमें गोडसे के भाई गोपाल गोडसे भी शामिल थे।

राहुल गाँधी आपके दादा गांधी नही फिरोज खान हैं; आप मुस्लिम/कैथोलिक डीएनए का एक संयोजन मात्र हैं : श्रीकृष्ण कुलकर्णी , महात्मा गाँधी प्रपौत्र

आखिर कब तक कांग्रेस महात्मा गाँधी और नाथूराम गोडसे के नाम से जनता को पागल बनाती रहेगी? कब तक इन दोनों के नाम से जनता को पागल बनाकर सियासत की जाती  रहेगी? कांग्रेस और गोडसे विरोधियों राष्ट्र को बताओ :-

1. अगर गोडसे ने गलत मारा था क्यों गोडसे के 150 बयानों को सार्वजनिक होने पर पाबन्दी लगवायी थी?

2. गोडसे के गोली मारने के बाद 40 मिनट तक गाँधी जी जीवित थे, क्यों नहीं उन्हें डॉ राममनोहर लोहिया तत्कालीन विलिंग्डन हॉस्पिटल ले जाया गया? जबकि घटना स्थल से हॉस्पिटल का मुश्किल से 10 मिनट का रास्ता है। क्या ये किसी साज़िश को इंगित नहीं करता? इसका पर्दाफाश होना बहुत जरुरी है। 

3. क्या तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व गाँधी को जीवित नहीं देखना चाहता था? 

4. अगर गाँधी का मारा जाना गलत था, घर-घर नाथूराम गोडसे के बयानों का वितरण कर निर्णय जनता पर छोड़ दो। जस्टिस खोसला ने गोडसे को माइक से बयानों की इजाजत देकर विश्व रिकॉर्ड बनवा दिया, जिसे आज तक कोई नहीं तोड़ पाया कि किसी अपराधी को माइक से बयान पढ़ने की किसी कोर्ट ने इजाजत दी हो। आदि आदि प्रश्न बहुत हैं, जिनका राष्ट्र जवाब मांगता है। 

उगता भारत  द्वारा प्रकाशित महात्मा गाँधी के प्रपौत्र श्रीकृष्ण कुलकर्णी के पत्र को प्रकाशित कर एक बहुत बड़े मिथ्या को दूर करने का सफल किया है। फिर भी परिवार के अंधभक्त आंखे बंद रखे उसका इलाज नहीं। कुलकर्णी ने बहुत ही स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि तुम हिन्दू नहीं बल्कि मुस्लिम/कैथोलिक डीएनए का एक संयोजन हो।  

कांग्रेस द्वारा गांधी के प्रपौत्र को लिखे गये एक पत्र में कहा गया था कि RSS ने ही गांधी की हत्या की थी, ताकि वे भाजपा के विरुद्ध कांग्रेस का साथ देने आ जायें। इसके जवाब में गांधीजी के प्रपौत्र श्रीकृष्ण कुलकर्णी ने राहुल गांधी को ये खुला पत्र लिखा, जो उन्होंने पब्लिक डोमेन में भी प्रसारित किया था।

प्रिय राहुल गांधी!

"गांधीजी मेरे परदादा थे। उनकी हत्या श्री नाथूराम गोडसे ने की थी। कई जांचों और आयोगों ने इस मामले पर शोध किया है और किसी ने भी आरएसएस को नहीं फंसाया है। मेरे दादा स्व. रामदास गांधी ने तत्कालीन गृह मंत्री सरदार पटेल को श्री गोडसे को मृत्युदंड से मुक्त करने के लिए लिखा था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1969 में जब रामदास गांधी मुंबई में शरीर त्याग कर रहे थे, तब श्री नाथूराम गोडसे के छोटे भाई श्री गोपाल गोडसे ने उनसे मुलाकात की थी। यह मुद्दा पूरी तरह से अतीत का है और मेरा परिवार उससे आगे बढ़ चुका है। आपके लोगों को मेरा विनम्र सुझाव है कि जो कांग्रेस और आपकी भलाई चाहते हैं, वो आगे बढ़ें और गांधी के नाम और इस मुद्दे को अपने स्वार्थ के लिए दुहना बंद कर दें। आप सभी विभिन्न आयोगों के निर्णयों को स्वीकार करने की उदारता दिखायें। यह कहते रहना कि आरएसएस ने गांधी को मारा, यह कहने के समान है कि सिखों ने आपकी दादी को मार डाला, जबकि यह झूठ है, क्योंकि इसमें सारे सिख शामिल नहीं हैं।"

"आप गांधी परिवार से नहीं हैं। आपने भारत में गांधी के नाम का उपयोग करके बहुत से लोगों को बहुत लंबे समय तक बेवकूफ बनाया है। एक अवसरवादी की तरह गांधी के नाम का प्रयोग करना अब बन्द कर दें।"

"आपके दादा गांधी नही फिरोज खान हैं। वे जूनागढ़ के गुजराती पठान 'नवाब खान' के पुत्र थे। नवाब खान की पत्नी एक पारसी थीं, जिन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था। आपकी दादी इंदिरा भी मुस्लिम थीं, क्योंकि फिरोज खान से शादी करने के लिए उन्होंने इस्लाम धर्म अपना लिया था। आप मुस्लिम और ईसाई के मिश्रण हैं। आपमें न तो कुछ राहुल ही है न ही गांधी ही। आप कहीं से भी हिंदू होने के करीब नहीं हैं। बल्कि आप मुस्लिम/कैथोलिक डीएनए का एक संयोजन मात्र हैं।"

"मैं इसे इसलिए सार्वजनिक कर रहा हूं ताकि गांधी परिवार के किसी भी व्यक्ति को आप अब झांसा न दे सकें"।

श्री श्रीकृष्ण कुलकर्णी                                                                                                                                                             (साभार : उगता भारत)

स्वामी श्रद्धानंद हुए थे महात्मा गांधी की राजनीति के शिकार

आज छद्दम सेक्युलरिस्ट्स और कट्टरपंथी बात-बात पर महात्मा गाँधी की क्यों बात करते हैं, उस पर रौशनी डाल रहा है उगता भारत में प्रकशित डॉ विवेक आर्य का निम्न लेख:-

जिन्होंने इतिहास के उन पन्नों को पलटा है, जब गांधी जी दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद के विरुद्ध लड़ाई लड़ रहे थे, तब उन्होंने आर्थिक सहायता के लिये अभ्यर्थना भारत से की| उन दिनों गुरुकुल कांगड़ी में 2-3 अंग्रेजी अख़बार आते थे | स्वामी श्रद्धानंद ने उन अखबारों के आधार पर गांधीजी की सहायता करने की सोची | गुरुकुल के छात्रों ने दिसम्बर की ठण्ड में गंगा किनारे कुछ श्रम कर कुछ रुपये इकठ्ठे करके ‘गुरुकुल सहायता’ के नाम से उनको भेजे |
स्वामी श्रद्धानंद आयु, ज्ञान, अनुभव तथा सेवा में गांधी से श्रेष्ठ और ज्येष्ठ तो थे ही | इस कारण गांधी उन्हें बड़े आदर से ‘बड़े भाई जी’ शब्द से सम्बोधित किया करते थे | स्वामी श्रद्धानंद कांग्रेस में देश सेवा हेतु शामिल हुए थे, परन्तु हिन्दू-मुस्लिम एकता के नाम पर मुसलमानों की चापलूसी, हिन्दू हितो की अपेक्षा, खिलाफत आन्दोलन को समर्थन, दंगो की निन्दा तक न करना, अछूतों
(दलित) कहे जाने वाले 8 करोड़ हिन्दुओ के हित में कोई कदम न उठाना जैसे अनेक विषय थे जिनके कारण स्वामीजी को कांग्रेस से अलग होना पड़ा | भारतीय आश्रम-व्यवस्था में वानप्रस्थी को ‘महात्मा’ शब्द से ही सम्बोधित किया जाता है | उन दिनों जब गुरुकुल का वार्षिकोत्सव था, गांधी स्वामीजी से मिलने पहुंचे थे |
स्वामीजी उनको कोई उपहार या भेंट देना चाहते थे | ऋषि-मुनियों की परम्परा को मानते हुए स्वामीजी ने वार्षिकोत्सव के अंतिम दिन लाखों दर्शकों की उपस्थिथि में गांधी से कहा “आप मुझे अपना बड़ा भाई मानते हैं, इस बड़े भाई के पास तुम्हे देने के लिये के लिये एक ही वस्तु है | मैं अपना महात्मा (तब स्वामीजी महात्मा मुंशीराम के नाम से जाने जाते थे) उपाख्य इस अवसर पर आपको सादर भेंट करता हूँ | इसे अभी स्वीकार करलो | फिर क्या था, लाखों लोगों ने करतल ध्वनि की | कुछ लोग जानबूझकर इस घटना छिपाते हैं और मिथ्या घटना तक बुनते हैं की ये उपाधि गांधी को रविन्द्रनाथ टैगोर ने दी थी | यह प्रयास गुरुकुल और स्वामी श्रद्धानंद, आर्य समाज और ऋषि दयानन्द के ओर से ध्यान हटाने के लिये किया जाता है जो की एक अक्षम्य अपराध है |
1919 में हुए जलियांवाला कांड के कारण भयभीत जनता ने एक जुलूस निकला जिसका नेतृत्व स्वामी श्रद्धानंद कर रहे थे | जब जुलूस चांदनी चौक पहुंचा तो वहां मौजूद सेना की टुकड़ी में एक सिपाही ने बन्दूक स्वामीजी के सीने पर तान दी | स्वामीजी ने सिंहगर्जना करते हुए अपने छाती पर पड़ी चादर हटा दी और कहा “साहस है तो चलाओ गोली” लाखों की भीड़ का नेतृत्व करने वाले संन्यासी दुनिया को गरजते देख रही थी | कहते हैं इस घटना के पश्चात 3 दिनों तक पूरे दिल्ली प्रदेश में स्वामीजी का अघोषित राज कायम रहा | हिन्दू ही नही सैकड़ो मुस्लिम इस वीतराग संन्यासी के पास आते और अपनी समस्यायों का समाधान पाकर संतुष्ट होकर जाते | स्वामी श्रद्धानंद की अद्वितीय प्रभाव की खबर गांधी के कान तक पहुंचायी गयी| गांधी अपने प्रभाव की बागडोर फिसलते देखने लगे | उनमें ईर्ष्या की आग भड़क उठी| जिन्होंने गांधी के राजनीतिक क्रियाकलापों को नजदीक से देखा है, उनका स्पष्ट कथन है कि गांधी अपने बराबर किसी अन्य 
नेता को उठते नहीं देख सकते थे| उन्होंने अपने मार्ग में आने वाले हर नेता को चाहे वो नरम दल का रहा हो या गरम दल का, उसे किसी भी प्रकार हटाकर अपना मार्ग प्रशस्त किया | और ये एक कटु सत्य है कि उनकी इस राजनीति का पहला शिकार स्वामी श्रद्धानंद ही बने थे |

दिल्ली की जामा मस्जिद के गुम्बद से स्वामीजी ने यह वेदमंत्र पढ़ा था-
“त्वं हि पिता वसो त्वं माता सखा त्वमेव । शतक्रतो बभूविथ । अधा ते सुम्नमी महे ।।”
संसार के इतिहास की ये इकलौती घटना है जब ‘एक काफ़िर’ मस्जिद के मिम्बर से वेद मंत्र का उच्चारण कर रहा था | इसके बाद मुसलमानों ने अन्य मस्जिदों में भी उनके व्याख्यान करवाये | मुसलमानों पर स्वामीजी के अमिट प्रभाव की खबर गांधी को लगी | अपनी लोकप्रियता के आड़े आते श्रद्धानंद उनको अपनी व्यक्तिगत पूजा में बाधा लगे | टर्की के बादशाह और अंग्रेजों का संघर्ष को लेकर ‘खिलाफत आन्दोलन’ जो की भारत के लिये निरर्थक था, गांधी ने मुस्लिम तुष्टिकरण के लिये अकारण ही ये आन्दोलन छेड़ जन शक्ति को भ्रमित किया| इससे कई नेता गांधी से असंतुष्ट होकर संगठन से अलग होने लगे | इनमें स्वामीजी भी थे |
काकीनाडा कांग्रेस सम्मेलन में देश के 8 करोड़ अछूतों के उद्धार की जो घृणित योजना बनी, उसके कारण भी काफी असंतोष फैला | योजना के मुताबिक अछूतों को हिन्दू और मुसलमानों में बराबर बांटने की बात कही गयी | यानी हिन्दू समाज के अभिन्न अंग करीब 4 करोड़ लोगों को सीधे सीधे इस्लाम की गोदी में सौंपने का षड़यंत्र था | ये बात स्वामीजी के लिये असहनीय थी क्योंकि उन्होंने तो अपना जीवन ही अछूतों के उद्धार को समर्पित कर दिया था | वे कांग्रेस से सदा के लिये अलग हो गये | उनके पीछे पीछे सेठ बिड़ला और मदन मोहन मालवीय जी ने भी कांग्रेस छोड़ दी | इस घटना ने गांधी की ईर्ष्या की आग को और भड़का दिया |
उन्होंने अपने पत्रों में आर्यसमाज और स्वामीजी के विरुद्ध विष वमन किया और उनके फैलाये सांप्रदायिक जाल ने आखिर अपना रंग दिखाया और 23 दिसम्बर 1926 को स्वामी श्रद्धानंद की हत्या एक मुस्लिम के हाथों करा दी गयी | स्वामीजी की शहादत पर गांधी ने भी ऐसी वीरोचित मृत्यु की कामना की थी | वैसी मृत्यु तो खैर उनको नहीं मिली पर भारत के बंटवारे के कारण लाखों-करोड़ों हिन्दुओं की आहों से भरी मृत्यु अवश्य मिली | भगवान सब की इच्छा पूर्ण नहीं करता | पर स्वामीजी का बलिदान व्यर्थ नहीं गया | लाखों आर्यसमाजी सदा के लिये कांग्रेस से अलग हो गये और कांग्रेस मात्र एक सांप्रदायिक पार्टी बनकर रह गयी |
महान संन्यासी को नमन |
(राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के मुख पत्र “राष्ट्र धर्म के जनवरी 2016 विशेषांक से साभार)