Showing posts with label #Religious Conversion. Show all posts
Showing posts with label #Religious Conversion. Show all posts

बेटा UP पुलिस में SI, बाप लोगों को बनाता है ईसाई: मीडिया रिपोर्ट, शिकायत के बाद प्रेमपाल गिरफ्तार, बरेली SP ने क्या बताया, मजहबी किताबें हुई बरामद

उत्तर प्रदेश के बरेली में ईसाई धर्मांतरण का मामला सामने आया है। पुलिस ने ईसाई मिशनरी के एक आरोपित को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक, 09 जुलाई 2026 को गाँव में एक प्रार्थना सभा के दौरान लोगों को ईसाई बनने के लिए लालच दिया जा रहा था। इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज में मुकदमा दर्ज किया गया और अगले ही दिन आरोपित प्रेमपाल को गिरफ्तार कर लिया गया।

पुलिस ने बताया कि गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव का रहने वाला है। उसके पास से बाइबल समेत 6 ईसाइयत की किताबें, एक हाथ से लिखी नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद हुआ है। यह भी सामने आया कि प्रेमपाल यादव वर्षों पहले खुद धर्मांतरण कर चुका है और अब हिंदुओं को धर्मांतरण करवाने वाले नेटवर्क से जुड़ा हुआ था।

सैजना गाँव में प्रार्थना सभा से FIR तक, जानिए कैसे शुरू हुआ पूरा मामला?

बरेली के मीरगंज थाना क्षेत्र के सैजना गाँव में धर्मांतरण का मामला 09 जुलाई 2026 को सामने आया। थाना मीरगंज में दर्ज FIR के मुताबिक, गाँव के रहने वाले अंकित पुत्र खूबकरन ने पुलिस को शिकायत देकर आरोप लगाया कि शीशगढ़ थाना क्षेत्र के भुडासी गाँव निवासी 51 वर्षीय प्रेमपाल ने गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर एक प्रार्थना सभा आयोजित की थी।

शिकायत में कहा गया कि इस प्रार्थना सभा के दौरान हिंदुओं को ईसाई बनने के लिए प्रेरित किया जा रहा था। बताया गया कि वहाँ मौजूद लोगों को ईसाइयत से जुड़ी प्रचार सामग्री दी गई, नौकरी और पैसों का लालच दिया गया। शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि सभा के दौरान हिंदू धर्म के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणियाँ भी की गईं।

इसी शिकायत के आधार पर थाना मीरगंज पुलिस ने प्रेमपाल के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 62 और 299 के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध संपरिवर्तन अधिनियम की धारा 3/5(1) के तहत मुकदमा दर्ज कर मामले की जाँच शुरू कर दी।

भागने की फिराक में प्रेमपाल को पुलिस ने धरा, ईसाइयत की किताबें बरामद

प्रेमपाल के खिलाफ मुकदमा दर्ज होने के बाद थाना मीरगंज पुलिस ने मामले की जाँच शुरू की। पुलिस के मुताबिक, 10 जुलाई 2026 को मुखबिर से सूचना मिली कि आरोपित प्रेमपाल इलाके से निकलने की फिराक में है। इसके बाद पुलिस टीम ने नगरिया सादात फाटक के सामने अंडरपास के नीचे घेराबंदी कर उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित की पहचान प्रेमपाल पुत्र पातीराम, निवासी ग्राम भुडासी, थाना शीशगढ़, जनपद बरेली के रूप में हुई। तलाशी के दौरान उसके पास से एक बाइबल, ‘शास्त्र भजनसंहिता और नीतिवचन’, ‘नया नियम’, ‘मुक्तिदाता कौन’, ‘बेदारी के गीत’ नाम से 6 ईसाइयत की किताबें, एक हस्तलिखित नोटबुक और एक मोबाइल फोन बरामद किया गया। पुलिस ने इन सभी सामानों को कब्जे में लेकर उन्हें जाँच का हिस्सा बनाया है।

आधिकारिक जानकारी के मुताबिक, गिरफ्तारी की कार्रवाई उपनिरीक्षक नितिन शिरीष, उपनिरीक्षक राजवीर सिंह, हेड कांस्टेबल मोहम्मद उमर और कॉन्स्टेबल अमित कुमार की टीम ने की। पुलिस का कहना है कि आरोपित के खिलाफ आगे की विधिक कार्रवाई पूरी करते हुए उसे कोर्ट में पेश किया जाएगा।

पुलिस हिरासत में माफी माँगने लगा आरोपित प्रेमपाल

मामले में पुलिस की ओर से जारी किए गए प्रेस नोट के अनुसार, गिरफ्तार आरोपित प्रेमपाल ने खुद को ईसाई धर्म का प्रचारक बताया है। पुलिस का कहना है कि पूछताछ के दौरान उसने स्वीकार किया कि 09 जुलाई 2026 को सैजना गाँव में गजेंद्र पुत्र छेदालाल के घर पर ईसाइयत के प्रचार और धर्म परिवर्तन के संबंध में एक सभा आयोजित की गई थी।

पुलिस के मुताबिक, आरोपित ने पूछताछ में बताया कि उस सभा में अमित, रोहित, धर्मेंद्र और तीरथराम समेत कई लोग मौजूद थे। उसका यह भी कहना था कि काफी प्रयास करने के बावजूद वहाँ मौजूद ये लोग ईसाई नहीं बने। पुलिस को आरोपित ने यह भी बताया कि उसके खिलाफ मुकदमा दर्ज होने की जानकारी मिलने के बाद वह वहाँ से भागने की कोशिश कर रहा था, लेकिन इससे पहले ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया।

पुलिस के अनुसार, पूछताछ के दौरान आरोपित ने अपने किए पर पछतावा जताते हुए कहा कि उससे गलती हो गई।

ईसाई धर्मांतरण करवाने वाले प्रेमपाल का बेटा सब-इंस्पेक्टर: रिपोर्ट्स

धर्मांतरण का मामले सामने आने के बाद मीडिया रिपोर्ट्स में कई दावे भी किए गए हैं, जिनका उल्लेख पुलिस की FIR या आधिकारिक प्रेस नोट में नहीं है। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, गिरफ्तार प्रेमपाल वर्षों पहले ईसाई में परिवर्तित हुआ था। रिपोर्ट्स में यह भी बताया गया कि उसका बेटा उत्तर प्रदेश पुलिस में सब-इंस्पेक्टर के पद पर तैनात है।

मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी कहा गया है कि प्रेमपाल लंबे समय से ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार से जुड़ा हुआ था और गाँवों में प्रार्थना सभाएँ आयोजित करता था। कुछ रिपोर्ट्स में इसे धर्म परिवर्तन के नेटवर्क पर प्रशासन की बड़ी कार्रवाई बताया गया है। हालाँकि, पुलिस ने इसको लेकर अब तक कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। फिलहाल पुलिस केवल आरोपों और जाँच के आधार पर आगे बढ़ रही है।

पारसी महिला द्वारा मुस्लिम से निकाह करने के अपराध में मरने पर दोनों समुदायों ने कब्रिस्तान में दफ़नाने नहीं दिया, अंत में हिन्दू रीति-रिवाज से दाह संस्कार हुआ

                         पारसी महिला का सनातनियों ने किया अंतिम संस्कार (साभार-इंडियन एक्सप्रेस)
मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।

मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।

पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।

लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।

शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।

महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।

मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”

दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।

भारत में कैसे आए पारसी

लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।

कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी

पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।

पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।

सच उगलने तक कस्टडी में रखो’: TCS नासिक कांड में निदा खान को नहीं मिली बेल, प्रेग्नेंसी के नाम पर माँग रही थी राहत

                                      निदा खान की जमानत याचिका खारिज (साभार : Dall-E)
नासिक की एक अदालत ने 2 मई को TCS धर्मांतरण मामले की आरोपित निदा एजाज खान को अग्रिम 
जमानत देने से मना कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि अब तक की जाँच से साफ है कि निदा एक सोची-समझी साजिश में शामिल थी, जिसका मकसद पीड़िता को बहला-फुसलाकर उसका धर्म बदलवाना था।

जज केजी जोशी ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला काफी गंभीर है, इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए निदा को पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ करना बहुत जरूरी है। निदा के खिलाफ देवलाली पुलिस स्टेशन में अलग-अलग धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज है।

कोर्ट में निदा खान की सफाई: क्या थीं बचाव पक्ष की दलीलें?

निदा खान के वकील ने कोर्ट में सफाई देते हुए कहा कि निदा और पीड़िता बस साथ में काम करने वाले सहकर्मी थे और एक-दूसरे को जानते थे। उन्होंने निदा पर लगे सभी आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उन्हें जानबूझकर फँसाया गया है, जबकि मुख्य आरोप तो दानिश और तौसीफ पर हैं। वकील का यह भी कहना था कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि निदा ने सबके सामने जाति को लेकर पीड़िता का अपमान किया हो।

आगे दलील दी गई कि महाराष्ट्र में धर्म बदलने को लेकर कोई अलग कानून नहीं है और जिस धारा (BNS 299) का जिक्र हो रहा है, वह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए है, न कि धर्म परिवर्तन के लिए। वकील के मुताबिक, धर्म पर सामान्य चर्चा करना कोई अपराध नहीं है और इसमें केवल जमानत मिलने वाली धाराएँ ही लगनी चाहिए। साथ ही, निदा के गर्भवती होने का हवाला देते हुए कहा गया कि इस हालत में गिरफ्तारी उनके होने वाले बच्चे की सेहत के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है।

अभियोजन पक्ष का कड़ा रुख: ‘निदा खान सिर्फ मूकदर्शक नहीं, बल्कि मुख्य साजिशकर्ता’

अभियोजन पक्ष ने निदा खान की अग्रिम जमानत का पुरजोर विरोध किया। कोर्ट को बताया गया कि जुलाई 2023 से 2026 के बीच निदा खान और अन्य आरोपितों ने मिलकर पीड़िता पर धर्मांतरण के लिए दबाव बनाया। सरकारी वकील ने दलील दी कि निदा ने न केवल पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, बल्कि FIR में भी उसके नाम और भूमिका का स्पष्ट जिक्र है। जाँच से यह संकेत मिले हैं कि सभी आरोपितों ने आपस में संपर्क कर इस पूरी साजिश को अंजाम दिया है।

कोर्ट को सूचित किया गया कि निदा खान इस मामले में कोई मामूली भूमिका में नहीं थी। वह ऑफिस में ब्रेक के दौरान पीड़िता से बात करती थी और इस्लाम कबूलने के लिए उसका ब्रेनवॉश करती थी। आरोप है कि उसने पीड़िता को खास मजहबी प्रथाओं का पालन करने के लिए मजबूर करने में अहम भूमिका निभाई। अभियोजन पक्ष ने अपनी दलीलों के समर्थन में पीड़िता, उसकी माँ और भाई के बयानों को आधार बनाया।

जाँच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि निदा खान ने ही पीड़िता को बुर्का और इस्लाम से जुड़ी किताबें मुहैया कराई थीं। पीड़िता के फोन में एक ऐसा ऐप भी मिला, जिसे धर्मांतरण के इरादे से इंस्टॉल करवाया गया था। इसके अलावा, निदा उसे यूट्यूब और इंस्टाग्राम के ऐसे लिंक भेजती थी जिनमें मजहबी उपदेश होते थे। पुलिस का कहना है कि इन सामग्रियों के सोर्स (Source) और निदा के बाहरी संपर्कों की गहराई से जाँच करना जरूरी है।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि निदा खान पीड़िता के घर भी जाती थी। वहाँ उसने पीड़िता को नमाज पढ़ने की ट्रेनिंग दी और उसे हिजाब व बुर्का पहनने के निर्देश दिए। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता का नाम बदलकर ‘हानिया’ रखने की योजना थी। यही नहीं, उसे मलेशिया भेजने की भी तैयारी थी और इसके लिए ‘मालेगाँव पार्टी’ की मदद से दस्तावेज बनवाए जाने थे। इन तमाम विदेशी कड़ियों और बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए कोर्ट से आरोपित की कस्टडी (हिरासत) की माँग की गई।

पीड़िता के वकील का दावा: पद का फायदा उठाकर बनाया धर्मांतरण का दबाव

सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील ने विस्तार से बताया कि कैसे निदा खान और अन्य आरोपितों ने मिलकर पीड़िता का ब्रेनवॉश किया। वकील ने आरोप लगाया कि निदा और बाकी आरोपितों ने कंपनी में अपने ऊँचे पदों का गलत इस्तेमाल किया ताकि पीड़िता पर दबाव बनाया जा सके। उन्हें न केवल इस्लाम का पालन करने के लिए मजबूर किया गया, बल्कि उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें मांसाहारी (Non-veg) खाना खाने के लिए भी विवश किया गया। इसके अलावा, कोर्ट को बताया गया कि आरोपित हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और ऑफिस में पीड़िता को उनकी जाति को लेकर अपमानित किया जाता था।

पीड़िता के पक्ष ने एक और गंभीर बात कोर्ट के सामने रखी। उन्होंने कहा कि निदा खान सिर्फ पीड़िता तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उसके परिवार को भी धर्मांतरण के लिए मजबूर करने की कोशिश की। इसके लिए बाकायदा धमकी भरे और डराने वाले तरीके अपनाए गए ताकि पूरे परिवार पर दबाव बनाया जा सके। इन दलीलों के जरिए कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की गई कि यह मामला केवल आपसी बातचीत का नहीं, बल्कि एक गहरी और डरावनी साजिश का हिस्सा है।

कोर्ट का फैसला: ‘पहली नजर में आरोपित की भूमिका साफ दिखती है’

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, कोर्ट ने सह-आरोपितों और निदा खान की भूमिकाओं के बीच एक स्पष्ट अंतर बताया। जज ने गौर किया कि जहाँ अन्य दो आरोपित पहली नजर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 75 के तहत अपराधों में शामिल थे, वहीं निदा खान की भूमिका धारा 299 और SC/ST एक्ट के प्रावधानों के तहत दिखाई दे रही है।

जज ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि FIR में न केवल निदा खान का नाम शामिल है, बल्कि उसकी भूमिका का भी साफ जिक्र है। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सबूतों से पता चलता है कि आरोपितों ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में ‘आपत्तिजनक कहानियाँ’ सुनाईं और पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई। कोर्ट के आदेश में यह भी दर्ज किया गया है कि निदा खान ने पीड़िता को बुर्का दिया था। इसके अलावा, आरोपितों ने उसे पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर आधारित एक किताब दी और निदा खान खुद पीड़िता के घर जाकर उसे मजहबी ट्रेनिंग देती थी।

कोर्ट की टिप्पणी: ‘यह कोई साधारण बातचीत नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश’

कोर्ट ने अपनी बातों को और स्पष्ट करते हुए कहा कि पीड़िता और निदा खान के बीच धर्म पर हुई बातचीत कोई इत्तेफाक या साधारण चर्चा नहीं थी। रिकॉर्ड में मौजूद सबूत साफ दिखाते हैं कि पीड़िता को फँसाने के लिए बहुत ही सलीके से और योजना बनाकर काम किया गया था। जज ने इस बात को गंभीरता से रखा कि यह अपराध कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई गहरी परतें और एक बहुत बड़ी साजिश छिपी हुई है।

अदालत ने उन सबूतों पर भी कड़ी चिंता जताई, जिनसे पता चला कि आरोपित पीड़िता का नाम बदलना चाहते थे और उसे मलेशिया भेजने की तैयारी में थे। जज ने साफ कहा कि हमारा संविधान हर किसी को अपनी पसंद का धर्म और नाम चुनने की आजादी देता है, लेकिन किसी का ब्रेनवॉश करके या साजिश रचकर उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना बिल्कुल गलत है। कोर्ट ने माना कि व्यक्ति के अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन किसी को धोखे का शिकार बनाकर उसका धर्म बदलवाना कानूनी रूप से अपराध है।

कोर्ट का फैसला: ‘सच उगलवाने के लिए पुलिस कस्टडी है जरूरी’

कोर्ट ने साफ कहा कि इस केस की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपित को पुलिस की गिरफ्त में रखना जरूरी है। कोर्ट का मानना है कि यह मामला काफी पेचीदा है, क्योंकि जाँच में ‘मालेगाँव पार्टी’ के साथ-साथ कई अन्य शहरों और विदेशों के नाम भी जुड़े मिले हैं। खासकर मलेशिया में बैठे ‘इमरान’ जैसे लोगों और इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए हिरासत में पूछताछ करना बेहद आवश्यक है, ताकि इस पूरी साजिश की हर कड़ी को जोड़ा जा सके।

अवलोकन करें:-

TCS नासिक कांड : 25 दिनों से फरार निदा खान को महाराष्ट्र पुलिस ने संभाजी नगर से गिरफ्तार किया; कोर्ट
TCS नासिक कांड : 25 दिनों से फरार निदा खान को महाराष्ट्र पुलिस ने संभाजी नगर से गिरफ्तार किया; कोर्ट
 

प्रेग्नेंसी की दलील भी नहीं आई काम, कोर्ट ने ठुकराई राहत

निदा खान के वकील ने दलील दी कि वह गर्भवती है और गिरफ्तारी का उसके होने वाले बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है। लेकिन सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में सिर्फ प्रेग्नेंसी के आधार पर कानून में कोई अलग छूट नहीं मिलती। कोर्त ने इस बात को सही माना और कहा कि अग्रिम जमानत जैसी बड़ी राहत केवल बहुत ही खास और मजबूरी वाले हालात में दी जाती है, जो इस केस में कहीं नहीं दिखते। इन्हीं वजहों से जज ने निदा खान की याचिका में कोई दम न पाते हुए उसकी जमानत की अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया।

शरीयत लाने वाले क्यों छिपकर संविधान की शरण में आ रहे हैं? नासिक TCS कांड में फरार निदा खान ने कोर्ट में दायर की जमानत याचिका: हिंदू लड़कियों को बुर्का पहनाना सिखाती थी, तौसीफ का हिंदू कर्मी को मजहबी टोपी पहनाने का Video आया सामने

आरोपित और फरार HR मैनेजर निदा खान, हिंदू कर्मचारी को मजहबी टोपी पहनाता तौसीफ (साभार: जनसत्ता, एक्स @IndiaToday)
नासिक के टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के बीपीओ यूनिट से हिंदू महिला कर्मचारियों के साथ यौन उत्पीड़न और जबरन धर्मांतरण के मामले में नया मोड़ सामने आया। इस मामले की मुख्य आरोपित और फरार निदा खान ने गिरफ्तारी से बचने के लिए नासिक की कोर्ट में अग्रिम जमानत (एंटीसिपेटरी बेल) याचिका दायर की है। कई खबरों में निदा खान को कंपनी की HR मैनेजर भी बताया जा रहा था।

भारत में शरीयत लाकर गज़वा-ए-हिन्द बनाने वाले भांडा फूटने पर उस भारतीय संविधान से न्याय की गुहार क्यों लगाने छिपे-छिपे फिर रहे हैं? जब ये लोग अल्लाह के सिवा किसी से नहीं डरते फिर किस से डर कर छिप रहे हो? हर मुसलमान को ऐसे भड़काऊ लोगों से इस सवाल का जवाब मांग इनके भड़काऊ मंसूबों को बेनकाब करना होगा। इन्ही भड़काऊ लोगों ने इस्लाम को बदनाम जहर फ़ैलाने का काम कर रहे हैं। फिर अपने-आपको गरीब, मजलूम आदि बताकर victim card खेल जनता और कानून की आँखों में धूल झोंकते हैं।           

मामले के सामने आने के बाद से ही फरार चल रही खान ने अब अपने वकीलों से दोबारा संपर्क किया, जबकि SIT लगातार उसकी तलाश में कर रही है। इस पूरे मामले में अब तक 9 हिंदू पीड़ितों की FIR दर्ज की जा चुकी हैं। पुलिस अब तक सात पुरुषों और एक महिला समेत कुल 8 कर्मचारियों को गिरफ्तार कर चुकी है, जबकि निदा खान अब भी फरार है।

निदा खान आंतरिक POSH कमेटी का हिस्सा थी और आरोप है कि उसने शिकायतों को दबाया और पीड़िताओं को कार्रवाई से हतोत्साहित किया। निदा खान दफ्तर की हिंदू लड़कियों को बुर्का पहनाना सिखाती थी। SIT की जाँच में यह भी सामने आया है कि HR विभाग और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा 70 से अधिक शिकायतों को नजरअंदाज किया गया।

डिजिटल साक्ष्य खंगालने में जुटी एजेंसियाँ, बढ़ सकती है जाँच का दायरा

पीड़िताओं का आरोप है कि बार-बार शिकायत करने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई और निदा खान ने उन्हें शिकायतें वापस लेने के लिए दबाव डाला। अब जाँच एजेंसियाँ ईमेल, कॉल रिकॉर्ड और चैट जैसे डिजिटल साक्ष्यों की गहन जाँच कर रही हैं, ताकि आरोपितों के बीच समन्वय और संभावित वित्तीय लेन-देन का पता लगाया जा सके।

अवलोकन करें:-

प्राइवेट पार्ट पर बात, गंदे इशारे और देवी-देवताओं का अपमान: नासिक TCS मामले में मुस्लिम गैंग कैसे
nigamrajendra.blogspot.com
प्राइवेट पार्ट पर बात, गंदे इशारे और देवी-देवताओं का अपमान: नासिक TCS मामले में मुस्लिम गैंग कैसे
नासिक के अशोका मार्ग पर स्थित टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) के बीपीओ यूनिट से हिंदू महिला कर्मचारियों के साथ यौन उत.....

इस मामले में आरोपित तौसीफ का वो Video मिला, जिसमें वह हिंदू कर्मचारी को मजहबी टोपी पहना रहा है। पीड़ित का कहना है कि 2023 में ईद के मौके पर उसे जबरदस्ती तौसीफ के घर ले जाया गया, जहाँ जबरन उसे मजहबी टोपी पहनाई गई, नमाज और कलमा पढ़ने के लिए मजबूर किया गया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए ATS और NIA जैसी एजेंसियों से भी संपर्क किया गया है, जिससे जाँच का दायरा और बढ़ सकता है। 

धर्म बदलने वाले SC-ST नहीं ले सकते आरक्षण: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने धर्मांतरण के बाद लाभ को बताया ‘संविधान के साथ धोखा’

                               आरक्षण पर इलाहाबाद हाई कोर्ट का अहम फैसला (साभार: AI ChatGPT/Canva)
भारत की आरक्षण व्यवस्था को लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला ‘क्रिप्टो क्रिश्चियन्स’ के लिए बड़ा झटका है। अपने फैसले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने साफ-साफ कहा है कि अगर कोई व्यक्ति हिंदू धर्म छोड़कर ईसाई, इस्लाम या किसी अन्य गैर-हिंदू धर्म को अपना लेता है, तो वह अनुसूचित जाति (SC) या अनुसूचित जनजाति (ST) के आरक्षण लाभों का हकदार नहीं रहता।

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इसे ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ करार दिया है। यह फैसला जस्टिस प्रवीण कुमार गिरि की सिंगल बेंच ने 21 नवंबर 2025 को सुनाया, जो जितेंद्र साहनी नाम के एक व्यक्ति की याचिका पर आधारित है। यह फैसला न सिर्फ उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव के विवाद से निकला है, बल्कि पूरे देश की आरक्षण नीति, धर्मांतरण के मुद्दे और सामाजिक न्याय की बहस को नई दिशा दे सकता है। आइए, जानते हैं क्यों महत्वपूर्ण है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला…

कैसे शुरू हुआ ये मामला, जो राष्ट्रीय स्तर पर बना महत्वपूर्ण

ये मामला उत्तर प्रदेश के महराजगंज जिले के सिंदुरिया थाने के अंतर्गत आने वाले ग्राम मथानिया लक्ष्मीपुर एकड़ंगा का है। यहाँ के निवासी जितेंद्र साहनी मूल रूप से केवट समुदाय से ताल्लुक रखते थे।

जितेंद्र साहनी ने अप्रैल 2023 में हाई कोर्ट में अर्जी देकर स्थानीय सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) से अपनी निजी जमीन पर रविवार और बुधवार को ‘यीशु मसीह के वचनों’ पर आधारित प्रार्थना सभाओं के आयोजन की अनुमति माँगी थी। SDM ने इसे मंजूरी दे भी दी थी, लेकिन स्थानीय हिंदुओं के विरोध के बाद 3 मई 2023 को यह अनुमति रद्द कर दी गई।

                                                         साहनी की याचिका

                                   याचिका का पूरा हिस्सा

हिंदू देवी-देवताओं पर विवादित टिप्पणी कर उनका मजाक उड़ाता था साहनी

ग्रामीणों का आरोप था कि साहनी ने इन सभाओं का इस्तेमाल गरीब हिंदू परिवारों को लालच देकर ईसाई मजहब अपनाने के लिए उकसाने के लिए किया। एक गवाह लक्षन विश्वकर्मा ने पुलिस जाँच में बयान दिया कि साहनी ने ग्रामीणों को इकट्ठा कर हिंदू देवी-देवताओं का मजाक उड़ाया।
लक्षन ने अपने लिखित बयान में कहा, “साहनी ने बताया कि हिंदू धर्म में हजारों देवी-देवता हैं। किसी के आठ हाथ, किसी के चार, किसी के चेहरे पर सूंड है। कोई चूहे की सवारी करता है, कोई मोर की। कोई भाँग पीता है, कोई गाँजा।” गवाह ने आगे आरोप लगाया कि साहनी ने कहा, “हिंदू धर्म में जाति के भेदभाव से कोई इज्जत नहीं मिलती, लेकिन ईसाई बनने से नौकरी, बिजनेस और मिशनरी से पैसे का फायदा होगा।”
                                                            गवाह का बयान रहा अहम
                                                       गवाह लक्षन के बयान की कॉपी

इन आरोपों पर पुलिस ने जितेंद्र साहनी के खिलाफ भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 153A (धर्म, जाति या जन्मस्थान के आधार पर शत्रुता फैलाना) और 295A (धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया। 11 मार्च 2024 को चार्जशीट दाखिल हुई और 24 जुलाई 2024 को ACJM कोर्ट ने संज्ञान ले लिया।
साहनी ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर इस मुकदमे को रद्द करने की गुहार लगाई। उनका दावा था कि सभाओं में कोई विवादास्पद भाषण नहीं हुआ और उन्हें झूठा फँसाया जा रहा है। लेकिन कोर्ट पहुँचते ही एक बड़ा राज खुल गया, वो ये था कि साहनी ने अपनी याचिका के साथ दाखिल हलफनामे में खुद को ‘हिंदू’ बताया, जबकि गवाह बयानों से साफ था कि वह ईसाई पादरी बन चुका था।
यह खुलासा कोर्ट के लिए आश्चर्यजनक था। अतिरिक्त सरकारी वकील पंकज त्रिपाठी ने CrPC की धारा 161 के तहत दर्ज गवाह बयानों का हवाला दिया। एक अन्य गवाह बुद्धि राम यादव ने भी पुष्टि की कि साहनी ने गरीबों को लालच देकर धर्मांतरण कराया। कोर्ट ने इसे गंभीरता से लिया और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस गिरि ने कहा, “ट्रायल कोर्ट ही साक्ष्यों की जाँच करेगा। साहनी ट्रायल कोर्ट में डिस्चार्ज अर्जी दे सकते हैं, जहाँ वे दावा कर सकते हैं कि IPC की इन धाराओं के तत्व मौजूद नहीं हैं।”

धर्मांतरण के बाद SC वर्ग का लाभ लेना क्यों है संविधान के ‘धोखाधड़ी’?

अब सवाल यह है कि एक आपराधिक मुकदमे की याचिका से आरक्षण का मुद्दा कैसे जुड़ गया? कोर्ट ने साहनी के हलफनामे को ‘गुमराह करने वाला’ बताते हुए इसे संविधान के साथ धोखे का उदाहरण माना। जस्टिस गिरि ने स्पष्ट किया कि SC/ST लाभ केवल उन लोगों के लिए हैं जो हिंदू, सिख, बौद्ध या जैन परंपरा का पालन करते हैं। संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के पैराग्राफ 3 में साफ लिखा है- “कोई व्यक्ति जो हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म से अलग कोई अन्य धर्म मानता है, उसे अनुसूचित जाति का सदस्य नहीं माना जाएगा।”
कोर्ट ने ‘हिंदू’ की परिभाषा पर भी रोशनी डाली। हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 की धारा 2 के अनुसार, हिंदू में सिख, बौद्ध, जैन और आर्य समाजी शामिल हैं। जो व्यक्ति मुस्लिम, ईसाई, पारसी या यहूदी नहीं है, वह हिंदू माना जाता है। SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम की धारा 2(c) भी इसी पर आधारित है। अनुच्छेद 341 और 342 के तहत SC/ST की सूची में केवल हिंदू, सिख या बौद्ध ही आ सकते हैं।
कोर्ट ने जोर दिया कि ईसाई या इस्लाम जैसे मजहबों में जाति व्यवस्था मान्य नहीं है। इसलिए इन मजहबों को अपनाने वाले व्यक्ति ऐतिहासिक जातिगत भेदभाव का शिकार नहीं रहते। SC/ST अधिनियम का मकसद ऐसी समुदायों की रक्षा करना है जो सदियों से जाति-आधारित उत्पीड़न झेलते आए हैं। अगर कोई व्यक्ति धर्म बदल लेता है, तो वह इस संरक्षण का हकदार नहीं रहता।
जस्टिस गिरि ने कहा, “धर्मांतरण के बाद SC दर्जा बनाए रखना संविधान के साथ धोखा है। यह आरक्षण नीति के मूल सिद्धांतों – सामाजिक न्याय और समानता के खिलाफ है।”

सुप्रीम कोर्ट और अन्य फैसलों का जिक्र, कानूनी इतिहास के फैसलों का रेफरेंस

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपना फैसला सुप्रीम कोर्ट के पुराने और नए फैसलों को ध्यान में रखकर सुनाया। इन फैसले में सबसे प्रमुख है 2024 का C. Selvarani vs. Special Secretary-District Collector मामला। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सिर्फ लाभ के लिए धर्मांतरण करना ‘संविधान के साथ धोखाधड़ी’ है। तमिलनाडु की एक महिला ने ईसाई बनने के बाद भी SC प्रमाणपत्र का दावा किया था, लेकिन कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया था। इस मामले में जज ने चेतावनी दी थी कि अगर धर्मांतरण सिर्फ आरक्षण का लाभ लेने के लिए छिपाया जा रहा है, तो यह इस नीति के खिलाफ है।
                                           तमिलनाडु के मामले का हाई कोर्ट ने किया जिक्र
इसके अलावा इलाहाबाद हाई कोर्ट ने साल 1986 के Soosai vs. Union of India मामले को भी अपने फैसले के रेफरेंस में शामिल किया। उस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि SC नियम केवल हिंदू या सिख मानने वालों पर लागू होते हैं। साल 2015 के K.P. Manu vs. Chairman, Scrutiny Committee में तीन शर्तें बताई गईं: (1) जाति की मान्यता, (2) मूल धर्म में वापसी और (3) समुदाय की स्वीकृति। इसके बिना किसी तरह के आरक्षण का लाभ नहीं मिल सकता है।
                                                            सूसई केस का रेफरेंस
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2025 के आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के Akkala Rami Reddy vs. State of A.P. का भी हवाला दिया। इसमें ईसाई बन चुके व्यक्ति को SC/ST अधिनियम के तहत सुरक्षा से वंचित कर दिया गया, क्योंकि ईसाई धर्म में जाति भेदभाव नहीं है। आंध्र प्रदेश के हाई कोर्ट ने कहा था कि ऐसे (कन्वर्टेड) व्यक्ति को अब उत्पीड़न का शिकार नहीं माना जा सकता।”
ये फैसले दिखाते हैं कि धर्मांतरण और आरक्षण का मुद्दा नया नहीं। 1950 के संविधान आदेश से ही यह स्पष्ट था, लेकिन हाल के वर्षों में मिशनरी गतिविधियों और आरक्षण दुरुपयोग के आरोपों से यह बहस तेज हो चुकी है।

हाई कोर्ट ने जाँच और कार्रवाई के लिए दिए सख्त निर्देश

इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वो निर्देश हैं, जिसमें कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के सभी जिलाधिकारियों (DM) को 4 महीने (मार्च 2026 तक) का समय दिया कि वे राज्य में ऐसे मामलों की जाँच करें, जहाँ धर्म बदल चुके लोग SC/ST लाभ ले रहे हैं। इसके साथ ही हाई कोर्ट ने जाँच के बाद कानूनी कार्रवाई को भी जरूरी बताया है, साथ ही सभी DM को मुख्य सचिव को रिपोर्ट देने को भी कहा है।
                                  इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले की कॉपी का स्क्रीनशॉट
इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने महाराजगंज के DM को विशेष निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि महाराजगंज के डएम को साहनी के धर्म की 3 महीने में जाँच करनी होगी। अगर साहनी का हलफनामा फर्जी साबित होता है, तो उसके खिलाफ फर्जीवाड़े के मामले में सख्त कार्रवाई के लिए कहा है। ताकि भविष्य में इस तरह के फर्जी हलफनामे दाखिल न किए जा सकें और फर्जीवाड़ों पर रोक लग सके।
                                                            हाई कोर्ट के फैसले का हिस्सा

अल्पसंख्यक और एससी-एसटी दर्जे के बीच के अंतर को स्पष्ट करे सरकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले से केंद्र और राज्य स्तर पर भी हलचल मचनी तय है। क्योंकि हाई कोर्ट ने भारत सरकार के कैबिनेट सचिव, UP के मुख्य सचिव, समाज कल्याण विभाग के अपर मुख्य सचिव, अल्पसंख्यक कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव को निर्देश दिए हैं कि वो अल्पसंख्यक दर्जा (ईसाई/मुस्लिम) और SC दर्जे के बीच सख्त अंतर सुनिश्चित करें। कोर्ट ने एडिशनल गवर्नमेंट एडवोकेट को ये आदेश सभी अधिकारियों तक पहुँचाने का जिम्मा भी सौंपा है।
हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा, “प्रिंसिपल सेक्रेटरी/एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, माइनॉरिटीज वेलफेयर डिपार्टमेंट, गवर्नमेंट ऑफ यूपी को भी मामले को देखने और सही कार्रवाई करने या अधिकारियों को निर्देश देने के लिए उचित आदेश पारित करने का निर्देश दिया जाता है ताकि कानून को असलियत/सही मायने में लागू किया जा सके। एडिशनल चीफ सेक्रेटरी, सोशल वेलफेयर डिपार्टमेंट को भी कानून के अनुसार काम करने का निर्देश दिया जाता है।”

सरकारों की बढ़ी जिम्मेदारी

इलाहाबाद हाई कोर्ट के इस फैसले के बाद अब UP सरकार के लिए चुनौती बढ़ गई है। यूपी सरकार की जाँच में 4 महीने में फर्जीवाड़ों के हजारों मामले सामने आ सकते हैं। ऐसे में अल्पसंख्यक कल्याण विभाग को SC और माइनॉरिटी लाभों के बीच बैलेंस भी बनाना पड़ेगा। वहीं, आने वाले समय के लिए सरकारों को भी SC/ST प्रमाणपत्र जारी करने की प्रक्रिया कड़ी करनी पड़ सकती है। खासकर क्रिप्टो क्रिश्चियन जैसे मामलो में।

क्रिप्टो क्रिश्चियन कौन होते हैं?

ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट्स में पहले भी क्रिप्टो क्रिश्चियन को लेकर साफ तौर पर बता चुका है कि अपने धर्म को छिपाकर खुद को मूल धर्म का दिखाना और संवैधानिक फायदों को उठाते रहने वाले लोग क्रिप्टो क्रिश्चियन की श्रेणी में आते हैं। जितेंद्र साहनी का भी मामला ऐसा ही है।
जितेंद्र साहनी मूल रूप से हिंदू धर्म के केवट जाति से आते हैं। लेकिन उन्होंने धर्मांतरण कर खुद को ईसाई होना स्वीकार किया। इसके साथ ही कथित तौर पर वो एससी-एसटी वर्ग के लिए दिए जाने वाले सारे फायदे भी प्राप्त करते रहे। उनकी हिम्मत देखिए, कि उन्होंने खुद को हाई कोर्ट में भी हिंदू बताया, जबकि पूरे मामले में साफ है कि वो न सिर्फ ईसाई बन चुका है, बल्कि वो पादरी जैसा पद भी अपने पास रखता है।
क्रिप्टो क्रिश्चियन का एक सबसे अलग और अनोखा रूप ये है कि एक तरफ जहाँ जितेंद्र खुलेआम ईसाइयत का पालन करता है, तो कई ऐसे लोगों को उसने ईसाई बनाया, जिन्होंने न तो सार्वजनिक तौर पर खुद को ईसाई बताया और न ही अपना नाम और धर्म और न ही पहचान बदली। यानि ऐसे लोग कागजों पर हिंदू-दलित बनकर मलाई भी चाट रहे और प्रैक्टिस ईसाई मजहब की करते हैं।

आरक्षण नीति पर नया सवाल, सामाजिक बहस की शुरुआत

भारत संविधानिक रूप से धर्मनिरपेक्ष है। अनुच्छेद 25 हर नागरिक को धर्म चुनने की आजादी देता है। लेकिन कोर्ट ने कहा, “धर्म बदलना व्यक्तिगत विश्वास से होना चाहिए, न कि लाभ के लिए।” ऐसे में कोर्ट का यह फैसला आरक्षण व्यवस्था की नींव को मजबूत करता है। SC/ST कोटा शिक्षा, नौकरी और राजनीति में 22.5% आरक्षण देता है, जो राज्यों के स्तर पर अलग-अलग होता है। लेकिन इसके दुरुपयोग के आरोप लंबे समय से लगते रहे हैं। कुछ लोग इस वर्ग को मिलने वाले लाभ के लिए धर्म बदलकर भी योजनाओं का लाभ लेते रहते हैं। ऐसे में कोर्ट के फैसले ने इस तरह के फर्जीवाड़े को रोकने का रास्ता दिखा दिया है।

इस पूरे मुद्दे पर ऑपइंडिया ने सीनियर एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय से बातचीत की। उन्होंने कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का जो रिजर्वेशन के ऊपर फैसला है, बिल्कुल ठीक फैसला है। हमारे संविधान निर्माता भी यही कह रहे थे कि जो हिंदू दलित है, जो हिंदू में पिछड़े हैं, ट्राइबल है, उनको ही रिजर्वेशन का फायदा मिलेगा। जो हिंदू कन्वर्ट हो जाएगा, चाहे वह इस्लाम में चला जाए या ईसाइयत में चला जाए, उसको रिजर्वेशन का फायदा नहीं मिलेगा। यह संविधान निर्माताओं की भी मंशा थी। यही संविधान भी कहता है और यही हाई कोर्ट का फैसला भी है।”

अपनी बात आगे बढ़ाते हुए अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “आप एक तरफ रिजर्वेशन का फायदा लो। यह कहते हुए हम तो ऐसी हैं और फिर दूसरी तरफ आप कन्वर्ट भी हो जाओ। अगर इसकी इजाजत दी गई तो कन्वर्जन बढ़ेगा और यह हमारे संविधान निर्माता बिल्कुल नहीं चाहते थे। रिजर्वेशन का सिस्टम लाया गया था। वह बहुत लिमिटेड समय के लिए लाया गया था। वह गरीबों के लिए लाया गया था। वो केवल और केवल हिंदुओं के लिए लाया गया था।”
एडवोकेट अश्विनी उपाध्याय ने कहा, “कुछ लोग सुप्रीम कोर्ट आए हुए यह कहने के लिए एक नई नई दलितों की स्थिति तो वैसे ही रहती है। भले वह क्रिश्चियन बन जाए या इस्लाम कबूल कर लें। उस पर माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सवाल पूछा ता कि अगर कन्वर्जन के बाद भी वही स्थिति रहनी है, तो फिर कन्वर्जन क्यों करना? फिर तो हिंदू बने रह सकते हैं। हालाँकि इसका जवाब अभी तक नहीं आया है। ये मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पेंडिंग है। दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में माँग की गई थी कि इस्लाम-ईसाई मजहब अपनाने वालों को भी SC-ST का फायदा मिलना चाहिए, लेकिन अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं आया है।
ऑपइंडिया से बातचीत में अश्विनी उपाध्याय ने आगे कहा, “इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला यूपी के लिए है लेकिन हाईकोर्ट का फैसला यह अपने आप में एक तरीके से बिल्कुल परफेक्ट फैसला है। इसलिए मध्य प्रदेश की सरकार, महाराष्ट्र की सरकार, देश के सभी अन्य राज्य सरकारों को भी इस फैसले को अपने स्तर पर लागू करना चाहिए और जो लोग कन्वर्ट हो गए हैं, चाहे वो इस्लाम में चले गए हों या ईसाई में, उनका एससी-एसटी का दर्जा खत्म करना चाहिए। उनको एससी-एसटी के मिलने वाले लाभ बंद होने चाहिए। जो लोग केवल हिंदू में रहते हैं और दलित हैं, उनको ही इसका फायदा मिलना चाहिए।”

न्याय की राह में अहम कदम है इलाहाबाद हाई कोर्ट का ये फैसला

इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला जितेंद्र साहनी के व्यक्तिगत मामले से कहीं आगे जाता है। यह संविधान की भावना को बचाने की कोशिश है, जिसमें आरक्षण उत्पीड़ितों के उत्थान के लिए, न कि धोखे के लिए। जस्टिस गिरि की बेंच ने साफ कहा, “भारत सेक्युलर है, लेकिन कानून अंधा नहीं है।”
हालाँकि अब गेंद प्रशासन के पाले में आ गई है। ऐसे में क्या हाई कोर्ट के आदेश के मुताबिक, हाई कोर्ट के इस फैसले पर यूपी सरकार सख्ती से अमल करती है या फिर वो सुप्रीम कोर्ट में अपील करेगी, ये तो आने वाला समय ही बताएगा। वैसे, एक बात अब साफ हो चुकी है कि सामाजिक न्याय की यह लड़ाई के नाम चल रहे धर्मांतरण रैकेटों और फर्जीवाड़ा करने वाले लोगों के लिए आगे की राह कठिन हो चली है।

केरल का पादरी कानपुर में चला रहा था ‘हाउस चर्च’, हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए विदेश से आ रहा था पैसा

                           केरल का पादरी एल्विन और उसकी पत्नी (साभार : FB_Shubham Shaurya)
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की घाटमपुर पुलिस ने 13 जनवरी 2026 को केरल के रहने वाले एक पादरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इस पादरी पर लालच देकर और डरा-धमकाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने का गंभीर आरोप है। यह पूरा खेल घाटमपुर के नौरंगा गाँव में एक ‘हाउस चर्च’ (घर में बने अवैध चर्च) के जरिए चलाया जा रहा था। पादरी यहाँ आर्थिक रूप से कमजोर हिंदुओं को निशाना बनाता था और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाता था।

पुलिस ने यह कार्रवाई फतेहपुर जिले के जहानाबाद निवासी मुकेश कुमार की लिखित शिकायत के बाद की है। मुकेश की शिकायत के आधार पर पादरी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास उपलब्ध है। गिरफ्तारी के बाद आरोपित पादरी को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

बीमारी ठीक करने के नाम पर धर्मांतरण का धंधा

 यह घटना 13 जनवरी की है, जब पुलिस को सूचना मिली कि नौरंगा गाँव के एक घर के अंदर प्रार्थना सभा चल रही है। खबर मिलते ही बजरंग दल के कार्यकर्ता भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने देखा कि प्रार्थना और बीमारी ठीक करने के नाम पर असल में वहाँ लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। कार्यकर्ताओं ने तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को दी। मौके पर पहुँची पुलिस ने वहाँ मौजूद सभी लोगों को हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई।

इस मामले में बजरंग दल के जिला संयोजक शुभम शौर्य अग्निहोत्री ने एसीपी कृष्णकांत यादव को एक लिखित शिकायत सौंपी। शिकायत में बताया गया कि नौरंगा के एक घर से ‘हाउस चर्च’ चलाया जा रहा था, जहाँ केरल का रहने वाला एल्विन और उसकी पत्नी हिंदुओं को लालच देकर उनका धर्म बदलवाने का काम कर रहे थे।

शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने अन्य सभी लोगों को तो छोड़ दिया, लेकिन आरोपित पादरी को हिरासत में ले लिया। इस मामले में मुकेश कुमार की शिकायत पर एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसमें पादरी पर लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने और डराने-धमकाने के आरोप लगाए गए हैं।

पुलिस की जाँच और दर्ज शिकायत के मुताबिक, आरोपित पादरी एल्विन ने अपने घर को ही एक ‘हाउस चर्च’ बना रखा था। यहाँ वह नियमित रूप से प्रार्थना सभाएँ और बीमारी ठीक करने (हीलिंग सेशन) के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करता था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इन सभाओं में गरीब और मजबूर हिंदुओं को बुलाया जाता था। उन्हें पैसों का लालच और कई तरह के वादे किए जाते थे ताकि उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मनाया जा सके।

मीडिया से बातचीत में स्थानीय लोगों ने बताया कि पादरी खुद के पास चमत्कारी शक्तियाँ होने का दावा करता था। उसका कहना था कि उसके घर पर होने वाली प्रार्थना से बड़ी से बड़ी बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। कई बार तो लोगों को यह तक डराया जाता था कि उनकी बीमारी बुरी ताकतों (प्रेत बाधा) की वजह से है और अगर वे धर्म परिवर्तन कर लेंगे, तभी उन्हें इन बीमारियों से छुटकारा मिलेगा।

जाँच के दौरान पुलिस ने इस तथाकथित हाउस चर्च से कई फाइलें, दस्तावेज और भारी मात्रा में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार की सामग्री बरामद की है। अब पुलिस इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि क्या इन सामग्रियों का इस्तेमाल योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं को प्रभावित करने और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने का लालच देने के लिए किया जा रहा था।

विदेशी फंडिंग का एंगल

पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि आरोपित मूल रूप से केरल का रहने वाला है और पिछले करीब दस सालों से नौरंगा इलाके में रह रहा था। शुरुआत में वह किराए के मकान में रहता था, लेकिन बाद में उसने खुद की जमीन खरीदी और 2022 में अपना घर बना लिया। इसी घर को उसने बिना किसी अनुमति के एक ‘हाउस चर्च’ में बदल दिया।
हैरानी की बात यह है कि आरोपित का अपना कोई ज्ञात काम या कारोबार नहीं था, फिर भी वह काफी आराम की जिंदगी जी रहा था। इससे पुलिस को शक है कि उसे विदेश या कहीं और से भारी फंडिंग (पैसे) मिल रही थी। अब पुलिस इस बात की बारीकी से जांच कर रही है कि हाउस चर्च चलाने, प्रार्थना सभाएँ आयोजित करने और अन्य गतिविधियों के लिए पैसा कहाँ से आ रहा था।
अधिकारी इस बात की भी पड़ताल कर रहे हैं कि आरोपित अकेला ही यह सब कर रहा था या वह किसी ऐसे बड़े गिरोह का हिस्सा है जो अलग-अलग जिलों में धर्म परिवर्तन कराने के काम में लगा हुआ है।

एफआईआर में क्या लिखा है?

ऑपइंडिया के पास मौजूद एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, यह शिकायत 13 जनवरी को बजरंग दल के कार्यकर्ता मुकेश कुमार ने दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 352 और 351(3) के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।
मुकेश ने अपनी शिकायत में बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि नौरंगा गाँव में एल्विन नाम के व्यक्ति ने अपने घर को चर्च बना लिया है। वह वहाँ गरीब लोगों को बुलाकर उन्हें तरह-तरह के लालच देता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए उनका ब्रेनवॉश कर रहा था।
शिकायत में आगे कहा गया है कि जब मुकेश अपने दोस्त मनीष सचान के साथ उस चर्च में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि आरोपित जबरन लोगों को घर के अंदर बिठाकर प्रार्थना करवा रहा था और उन्हें हिंदू धर्म छोड़ ईसाई बनने के लिए उकसा रहा था। जब मुकेश और उनके साथी ने इस पर आपत्ति जताई, तो आरोपित एल्विन ने उन्हें गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद वहाँ मौजूद लोग घर छोड़कर चले गए।

बजरंग दल के खिलाफ शिकायत

बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ शिकायत पादरी की गिरफ्तारी के बाद उसके परिवार और कुछ स्थानीय लोगों ने पुलिस को एक अलग शिकायत दी है। इसमें आरोप लगाया गया है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट की। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन आरोपों की अलग से जाँच की जा रही है और अगर सबूत मिलते हैं, तो उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

घाटमपुर इलाके में धर्मांतरण के पुराने विवादों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। इससे पहले भी यहाँ इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। पुलिस अधिकारी अब इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि क्या इस पादरी के तार पहले के मामलों से जुड़े हैं। साथ ही, यह भी देखा जा रहा है कि पादरी अकेला काम कर रहा था या वह किसी ऐसे संगठित गिरोह का हिस्सा है जो कई जिलों में सक्रिय है।

प्रशासन का कहना है कि जाँच के दौरान मिले दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और पैसों के लेनदेन (फंडिंग) के सबूतों के आधार पर आगे की सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

उत्तर प्रदेश : ‘मस्जिद के चंदे से 20 लाख रूपए दूँगा, पूरा परिवार इस्लाम कबूलो’

          मोहम्मद जुबैर को नाबालिग से रेप और धर्मांतरण मामले में किया गिरफ्तार (साभार: Dainik Bhaskar)
उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले में तमंचे की नोक पर रेप और धर्म परिवर्तन करने का मामला सामने आया है। मोहम्मद जुबैर ने 16 साल की नाबालिग लड़की को फँसाया और डेढ़ साल तक लगातार रेप किया। साथ ही मस्जिद के चंदे से 20 लाख रूपए का लालच देकर पीड़िता के पूरे परिवार पर धर्मांतरण का दबाव भी बनाया। 

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मझौला थाना क्षेत्र स्थित ढक्का निवासी नाबालिग युवती ने रेप और धर्म परिवर्तन मामले में 6 लोगों के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया है। शिकायत में बताया कि पीड़िता के घर के सामने रहने वाले जुबैर ने अपनी बहनों की मदद से नाबालिग को फँसाया।

पीड़िता के पिता की गैर मौजूदगी में जुबैर घर पर आया करता था। तब नाबालिग और उसके परिवार को धर्मांतरण का दबाव बनाया करता था। पीड़िता का आरोप है कि जुबैर ने नाबालिग को कमरे में बंद करके रेप भी किया और वीडियो बनाकर ब्लैकमेल करने लगा।

जुबैर ने तमंचे के नोक पर बार-बार नाबालिग से दुष्कर्म किया। विरोध करने पर परिवार को जान से मारने की धमकी दी। पीड़िता ने बताया कि वह पूरे परिवार को मस्जिद के चंदे से 20 लाख रूपए और मकान देने का लालच देकर जबरन धर्म परिवर्तन करने का दबाव बना रहा था।

जुबैर ने पीड़िता की माँ को भी अपनी तरफ कर लिया। पीड़िता की माँ की मदद से पूरे परिवार को डरा-धमकाकार रखता था। पीड़िता के भाई-बहनों और पिता को भी धर्म परिवर्तन करवाना चाहता था। पीड़िता की शिकायत पर पुलिस ने कार्रवाई करते हुए मुख्य आरोपित जुबैर और पीड़िता की माँ को गिरफ्तार कर लिया है। वहीं बाकी चार आरोपितों की तलाश जारी है।

मिर्जापुर : क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर 2000+ को ईसाई बनाने का खेल धर्मांतरण कराने वाला मिशनरी गिरोह का खेल फेल हुआ, 8 महिला-पादरी समेत 11 गिरफ्तार

ईसाई धर्मांतरण रैकेट का भंडाफोड़ (फोटो साभार: AI GROK)
उत्तर प्रदेश के मिर्जापुर जिले के देहात इलाके में दो साल से चल रहा एक सीक्रेट गेम का खुलासा हो गया। यहाँ के खरहरा गाँव के छोटे से चर्च में हिंदू परिवारों को ईसाई बनाने का काम चल रहा था। लेकिन स्थानीय युवक की समझदारी के चलते मिशनरी गैंग का पर्दाफाश हो गया।

मिर्जापुर में रविवार (14 दिसंबर 2025) को हुई पुलिस छापेमारी में चर्च के पादरी भोलानाथ पटेल समेत 11 लोग गिरफ्तार हुए हैं। ऑपइंडिया के पास इस पूरे मामले की FIR की कॉपी मौजूद है। जिसमें इस गंदे खेल के बारे में विस्तार से जानकारी दर्ज है।

सूत्रों के मुताबिक, 25 दिसंबर को क्रिसमस पर बड़े पैमाने पर धर्मांतरण की साजिश रची जा रही थी। लेकिन सवाल यह है कि आखिर यह सब कैसे शुरू हुआ? दो सालों में सैकड़ों परिवार क्यों फँसते चले गए? इस ग्राउंड रिपोर्ट में मिशनरी गिरोह के कारनामों को उजागर किया गया है।

किसान की सतर्कता से खुला धर्मांतरण का गंदा खेल

मिर्जापुर के इस इलाके में गंगा की लहरें विंध्याचल की पहाड़ियों से टकराती हैं। इलाके में गरीबी और बेरोजगारी फैली है। छोटे-छोटे गांवों में किसान, मजदूर और दिहाड़ी मजूर दिन-रात गुजारते हैं। यहीं के कुरकुठिया गाँव के रहने वाले आनंद दुबे (35 वर्ष) एक साधारण किसान हैं। उनके दो बच्चे हैं और पत्नी लंबे समय से बीमार है, जिसकी वजह से घर का खर्चा मुश्किल से चलता है।

आनंद ने मिशनरियों के खेल को बताते हुए कहा, “साहब, एक हफ्ते पहले एक आदमी आया था। नाम था भोलानाथ पटेल, खुद को पादरी बताता था। बोला, ‘भाई, तुम्हारी परेशानियाँ खत्म हो जाएँगी। जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ। पैसे देंगे, बच्चों की फ्री पढ़ाई कराएँगे, बीवी का इलाज मुफ्त में होगा। शादी-ब्याह में भी मदद करेंगे।’ मैंने सोचा, गरीब आदमी हूँ, क्या बिगड़ जाएगा। लेकिन जब रविवार को चर्च बुलाया, तो वहाँ का नजारा देखकर रोंगटे खड़े हो गए।”

2023 से जारी है खरहरा चर्च में धर्मांतरण का खेल

आनंद की यह कहानी कोई पहली नहीं है। दो साल पहले साल 2023 के आखिर से खरहरा चर्च में अनगिनत लोगों का धर्मांतरण कराया जा चुका है। बहुत सारे लोग लल्लू से जोसेफ जैसे नाम वाले हो चुके हैं। दिखने में खरहरा गाँव का चर्च पुराना लगता है, लेकिन अंदर से काफी सजा-धजा है। यहाँ आसपास के गाँवों कुरकुठिया, बढ़ौली, लेढ़ू, जसोहर पहाड़ी से लोग आते रहते हैं। किसी की तबियत ठीक नहीं रहती, तो कोई आर्थिक रूप से टूटा हुआ है और इन सबका फायदा उठाते हैं धर्मांतरण गिरोह, जो लोगों को छल-कपट से ईसाई बनाते हैं।
एक व्यक्ति ने नाम न छापने की शर्त पर ऑपइंडिया से कहा, “बहू की तबीयत खराब थी। डॉक्टरों ने कहा-ऑपरेशन के 50 हजार लगेंगे। पादरी साहब आए, बोले ‘चिंता मत करो, जीसस सब ठीक कर देंगे। बस, प्रार्थना में शामिल हो जाओ।’ हम गए, पानी छिड़क दिया, नाम बदल दिया। पैसा मिला भी लेकिन अब लगता है धोखा हुआ है।” उन्होंने कहा कि बेटे ने बताया कि वो घर वापसी भी नहीं कर सकते, क्योंकि पादरी और उनके लोगों ने ईसाई बनाते समय उनका वीडियो-फोटो लिया हुआ है।

पादरी भोलानाथ पटेल संभालता है धर्मांतरण का खेल

मिर्जापुर के इस छोटे से गाँव में धर्मांतरण का पूरा खेल संभालता है पादरी भोलानाथ पटेल। खुद मूल रूप से गाजीपुर जिले के रेवतीपुर थाना इलाके में आने वाले तिवला गाँव का है। वो रहता भी पहले लखनऊ में था, जहाँ वो सेंट जीसस स्कूल में पढ़ाता था। टीचर थे।
पुलिस ने जब भोलानाथ पटेल और उसकी पत्नी को गिरफ्तार किया, तो उसने खुद के ईसाई बनने की कहानी बताई। भोलानाथ ने बताया, “साल 2008 में मुझे किडनी की गंभीर बीमारी हुई थी। डॉक्टरों ने जवाब दे दिया था, लेकिन ईसाई प्रार्थना सभा में शामिल होने के बाद वे ‘चमत्कारिक’ तरीके से ठीक हो गए।”
भोलानाथ (पुलिस पूछताछ के दौरान) ने बताया, “मैंने जीसस का शुक्रिया अदा किया। उसी ने मुझे नई जिंदगी दी। तब से मैंने फैसला किया, दूसरों को भी यह रास्ता दिखाऊँगा।” इसके बाद भोलानाथ को लखनऊ के मिशनरी कार्यालय से खरहरा चर्च भेजा गया। यहाँ वो अपनी पत्नी माया पटेल के साथ रहने लगा। बीवी माया महिलाओं को धर्मांतरण के जाल में फँसाती, तो खुद भोला पुरुषों को।

सामाजिक बहिष्कार के शिकार हो चुके हैं ईसाई बने लोग

भोलानाथ के मुताबिक, “हम कोई जबरदस्ती नहीं करते। लोग खुद आते हैं। जीसस की कृपा से उनकी जिंदगी बदल जाती है।” लेकिन ग्रामीणों का कहना अलग है। विजय (नाम-परिवर्तित) ने कहा, “मैंने पहले धर्मांतरण किया था। शुरु में ये अच्छा लगता था। पैसे भी मिले, नौकरी भी लगी। लेकिन अब लगता है, हमारी पहचान ही छीन ली गई। गाँव वाले ताने मारते हैं।”
14 दिसंबर 2025 को दोपहर करीब 12:45 बजे आनंद दुबे को चर्च बुलाया गया। वहाँ 35-40 ग्रामीण थे, ज्यादातर आर्थिक रूप से कमजोर। पादरी भोलानाथ ने कहा, “आज तुम जीसस भगवान के आश्रय में आओगे। सारी तकलीफें खत्म हो जाएँगी। जो ना मानेगा, उसके साथ बुरा होगा।”
पादरी ने आनंद पर पवित्र पानी छिड़का, नाम बदलकर ‘जोसेफ आनंद’ कर दिया। फिर ‘पवित्र डुबकी’ की रस्म शुरू की, लेकिन आनंद हल्ला मचाकर भाग निकले। सीधे थाने पहुँचे और तहरीर दी।
शिकायत पाने के बाद सक्रिय हुई पुलिस ने तुरंत छापेमारी की और भोलानाथ, माया, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, फूलपत्ती, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी और साधना समेत को 11 को गिरफ्तार कर लिया। पुलिस को मौके से चार बाइबल, 10 कॉपी-किताबें, तीन स्मार्टफोन और एक की-पैड फोन मिले। लोगों के वीडियो और फोटो थे, जो धर्मांतरण की रस्मों के थे। इस मामले में पुलिस ने उत्तर प्रदेश धार्मिक विधि (संशोधन) अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।
ऑपइंडिया के पास उपलब्ध एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, तहरीर में आनंद दुबे ने लिखा,”मेरी पत्नी को पुरानी बीमारी है। एक सप्ताह पूर्व आरोपी भोलानाथ पटेल उर्फ पादरी जीसस चर्च खरहरा आकर मेरे घर पर आया और बोला कि यदि आप ईसाई धर्म अपना लेंगे तो आर्थिक लाभ, बच्चों की फ्री शिक्षा, मेडिकल सुविधा आदि प्रदान की जाएगी। मैंने सहमति जताई। आज (14 दिसंबर 2025) को दोपहर लगभग 12:45 बजे मुझे चर्च बुलाया। वहाँ 35-40 ग्रामीण उपस्थित थे।”
                                                                 एफआईआर की कॉपी
आनंद ने आगे लिखा है, “आरोपित भोलानाथ पटेल, माया पटेल, कृष्णकांत तिवारी, अंगनू प्रसाद, निशा देवी, सुशीला देवी, हीरावती देवी, रेनू, लक्ष्मी, साधना और फूलपत्ती मौजूद थे। उन्होंने कहा कि जीसस भगवान के आश्रय में आ जाओ, सारी पीड़ाएँ समाप्त हो जाएँगी। ना मानने पर दुर्भाग्य आएगा। उन्होंने मेरे ऊपर पवित्र जल छिड़का, नाम ‘जोसेफ आनंद’ रखा और पवित्र स्नान कराने का प्रयास किया। मैंने विरोध किया और भाग आया। यह अवैध धर्मांतरण है।”
                                                                    एफआईआर की कॉपी

प्रशासन कर रहा कार्रवाई, पूछताछ जारी

वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक सोमेन बर्मा ने बताया, “धर्म परिवर्तन के काम में लगे 11 लोगों को गिरफ्तार किया गया है। आरोपी लोगों को प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन करा रहे थे। उनके पास से मजहबी पुस्तकें और मोबाइल फोन बरामद किए गए हैं। खुफिया सूचना थी कि 25 दिसंबर को बड़े स्तर पर धर्मांतरण होने वाला था। जाँच जारी है।”
देहात कोतवाल अमित मिश्रा ने खुलासा किया, “खरहरा चर्च में लगभग दो हजार लोगों का धर्मांतरण कराने की साजिश थी। स्थानीय और आसपास के गाँवों के भोले-भाले लोग निशाना बनाए जा रहे थे। पादरी भोलानाथ लखनऊ से फंडिंग लेता था। हम सख्ती से कार्रवाई करेंगे।”

साल 2023 से धर्मांतरण के 15 केस आ चुके हैं सामने

बीते 2 सालों में मिर्जापुर में ईसाई मिशनरी की सक्रियता ने स्थानीय प्रशासन को हिलाकर रख दिया है। 2023 से अब तक कम से कम 15 मामले दर्ज हो चुके हैं, जिनमें अवैध धर्मांतरण के आरोप लगे हैं। इनमें से 11 मामले युवतियों को बहला-फुसलाकर भगाने, फिर धर्म परिवर्तन कर शादी कराने के हैं। बाकी चार बड़े रैकेट से जुड़े हैं।
उदाहरण के तौर पर, विंध्याचल थाने में एक केस दर्ज हुआ, जिसमें भुजवा चौकी के विजय एम को गिरफ्तार किया गया। अहरौरा थाने में 30 सितंबर 2025 को देव सहायम डेनियर समेत पाँच गिरफ्तार हुए। लालगंज पुलिस ने जेम्स उर्फ रामदीन उर्फ राजू और उनकी पत्नी सरिता देवी को पकड़ा। इन मामलों में प्रलोभन का पैटर्न एक जैसा रहा- पैसे, नौकरी, शिक्षा।
इन 15 मामलों ने न सिर्फ परिवारों को तोड़ा है, बल्कि सामाजिक ताने-बाने को भी प्रभावित किया है। ग्रामीणों में डर का माहौल है। एक सामाजिक कार्यकर्ता, बजरंग दल के शांतनु तिवारी ने कहा, “ये मिशनरी गरीबी का फायदा उठाते हैं। हिंदू समाज जागे, तो ये रुकेंगे।” खरहरा की यह घटना एक चेतावनी है। गरीबों के सपनों पर डाका डालने वाले इस खेल को रोकना होगा, वरना और कितने आनंद दुबे फँसेंगे?