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पारसी महिला द्वारा मुस्लिम से निकाह करने के अपराध में मरने पर दोनों समुदायों ने कब्रिस्तान में दफ़नाने नहीं दिया, अंत में हिन्दू रीति-रिवाज से दाह संस्कार हुआ

                         पारसी महिला का सनातनियों ने किया अंतिम संस्कार (साभार-इंडियन एक्सप्रेस)
मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।

मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।

पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।

लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।

शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।

महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।

मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”

दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।

भारत में कैसे आए पारसी

लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।

कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी

पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।

पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।

स्त्री के मांग में भरे सिंदूर का महत्व क्या होता है

ऐसी मान्यता है कि यदि पत्नी के माँग के बीचों,बीच सिंदूर लगा हुआ है तो उसके पति की अकाल मृत्यु नहीं हो सकती है! जो स्त्री अपने माँग के सिंदूर को बालों से छिपा लेती है उसका पति समाज में छिप जाता है! जो स्त्री बीच माँग में सिंदूर न लगाकर किनारे की तरफ सिंदूर लगाती है उसका पति उससे किनारा कर लेता है! यदि स्त्री के बीच माँग में सिंदूर भरा हो तो पति की आयु लम्बी होती है।

रामायण में अलौकिक प्रसंग आता है जब बालि और सुग्रीव के बीच युद्ध हो रहा था तब श्री राम ने बालि को नहीं मारा। जब बालि के हाथों मार खाकर सुग्रीव श्री राम के पास पहुंचा तो श्री राम ने कहा कि तुम्हारी और बालि की शक्ल एक सी है। इसलिए मैं भ्रमित हो गया। अब आप ही बताइए श्री राम के नजरों से भला कोई छुप सकता है क्या?
असली बात तो यह थी जब श्री राम ने यह देख लिया कि बालि की पत्नी तारा की माँग सिंदूर से भरी हुई है तो उन्होंने सिंदूर का सम्मान करते हुये बालि को नहीं मारा। दूसरी बार जब सुग्रीव ने बालि को ललकारा तब तारा स्नान कर रही थी उसी समय भगवान ने देखा कि मौका अच्छा है और बाण छोड़ दिया तब आप ही बताइये कि जब माँग में सिंदूर भरा हो तो परमात्मा भी उसको नहीं मारते तो फिर उनके सिवाय कोई और क्या मारेगा।
आजकल फैशन चल रहा है सिंदूर न लगाने का या हल्का लगाने का या बीच में न लगाकर किनारे लगाने का। आशा 
है इस पोस्ट से आप लोग सिंदूर का महत्व समझ गयी होगीं और अपने पति की लम्बी आयु और नाम का सिंदूर अपने माँग में भरे रहेंगी, धन्यवाद। 
जय श्री राम , जय गोविंदा , ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः

गुरुवार व्रत कथा और पूजा विधि


गुरुवार व्रत पूजा कथा में कई ऐसी बातें बताई गई हैं जिन्हें मनुष्य को ध्यान पूर्वक अपनाना चाहिए। कहते हैं जो व्यक्ति श्रद्धा भाव से गुरुवार को भगवान विष्णु की पूजा करता है और गुरुवार व्रत की कथा कहता और सुनता है उसकी गरीबी और कष्ट को भगवान विष्णु दूर कर देते हैं। जीवन में सुख समृद्धि के लिए गुरुवार के दिन आप भी इस गुरुवार व्रत कथा को सुनें या पढ़ें।

सूर्योदय से पहले उठकर करें स्‍नान

बृहस्‍पतिवार के दिन सूर्योदय से पहले ही उठें और नित्‍यकर्म से निवृत्‍त होकर पीले रंग के वस्‍त्र पहनें। इसके बाद पूरे घर में गंगाजल छिड़कें। इसके बाद पूजा घर में श्रीहरि विष्‍णु की मूर्ति या चित्र स्थापित करें। फिर पीले रंग के गंध-पुष्प और अक्षत चढ़ाएं। इसके बाद चना-गुड़ और मुनक्‍का चढ़ाकर विधि- विधान से पूजन शुरू करें। इसके बाद धर्मशास्तार्थतत्वज्ञ ज्ञानविज्ञानपारग। विविधार्तिहराचिन्त्य देवाचार्य नमोऽस्तु ते॥ मंत्र का जप करें। इसके बाद व्रत की कथा पढ़ें। कथा पढ़ने के बाद केले के पेड़ में जल चढ़ाएं।

बृहस्‍पतिवार व्रत की कथा

मंत्रोच्‍चार के बाद बृहस्‍पतिवार व्रत की कथा पढ़ें। यह इस प्रकार से है कि प्राचीन समय की बात है। भारतवर्ष में एक राजा राज्य करता था। वह बड़ा प्रतापी और दानी था। वह नित्य गरीबों और ब्राह्मणों की सेवा-सहायता करता था। वह प्रतिदिन मंदिर में भगवान दर्शन करने जाता था लेकिन यह बात उसकी रानी को अच्छी नहीं लगती थी। वह न ही पूजन करती थी और न ही दान करने में उसका मन लगता था। एक दिन राजा शिकार खेलने वन को गए हुए थे तो रानी और दासी महल में अकेली थी। उसी समय बृहस्पतिदेव साधु भेष में राजा के महल में भिक्षा के लिए गए और भिक्षा मांगी तो रानी ने भिक्षा देने से मन कर दिया। रानी ने कहा कि हे साधु महाराज मैं तो दान पुण्य से तंग आ गई हूं। इस कार्य के लिए मेरे पतिदेव ही बहुत है अब आप ऐसी कृपा करें कि सारा धन नष्ट हो जाए तथा मैं आराम से रह सकूं। साधु ने कहा- देवी तुम तो बड़ी अजीब हो। धन और संतान से कौन दुखी होता है। इसकी तो सभी कामना करते हैं। पापी भी पुत्र और धन की इच्छा करते हैं। अगर तुम्हारे पास अधिक धन है तो भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ, प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, कुआं, तालाब, बावड़ी बाग-बगीचे आदि का निर्माण कराओ। मंदिर, पाठशाला धर्मशाला बनवाकर दान दो। निर्धनों की कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ। साथ ही यज्ञ आदि कर्म करो अपने धन को शुभ कार्यों में खर्च करो। ऐसे करने से तुम्हारा नाम परलोक में सार्थक होगा एवं होगा एवं स्वर्ग की प्राप्ति होगी। लेकिन रानी पर उपदेश का कोई प्रभाव न पड़ा। वह बोली- महाराज मुझे ऐसे धन की आवश्यकता नहीं जिसको मैं अन्य लोगों को दान दूं, जिसको रखने और संभालने में ही मेरा सारा समय नष्ट हो जाए अब आप ऐसी कृपा करें कि सारा धन नष्ट हो जाए तथा मैं आराम से रह सकूं।

गुरुवार व्रत कथा साधु और रानी का संवाद

साधु ने उत्तर दिया यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है तो जैसा मैं तुम्हें बताता हूं तुम वैसा ही करना बृहस्पतिवार को घर को गोबर से लीपना अपने केशों को पीली मिट्टी से धोना। राजा से कहना वह बृहस्‍पतिवार को हजामत बनवाए, भोजन में मांस- मदिरा खाना और कपड़ा धोबी के यहां धुलने डालना। ऐसा करने से सात बृहस्पतिवार में ही आपका सारा धन नष्ट हो जाएगा। इतना कहकर वह साधु महाराज वहां से अंतर्धान हो गये। इसके बाद रानी ने वही किया जो साधु ने बताया था। तीन बृहस्पतिवार ही बीते थे कि उसका समस्त धन- संपत्ति नष्ट हो गया और भोजन के लिए राजा-रानी तरसने लगे। तब एक दिन राजा ने रानी से कहा कि तुम यहां पर रहो मैं दूसरे देश में चाकरी के लिए चला जाउं क्योंकि यहां पर मुझे सभी मनुष्य जानते हैं इसलिए कोई कार्य नहीं कर सकता। देश चोरी परदेश भीख बराबर है ऐसा कहकर राजा परदेश चला गया वहां जंगल को जाता और लकड़ी काटकर लाता और शहर में बेंचता इस तरह जीवन व्यतीत करने लगा।

गुरुवार व्रत कथा के नियम

इधर, राजा के बिना रानी और दासी दुखी रहने लगीं । किसी दिन भोजन मिलता और किसी दिन जल पीकर ही रह जाती। एक समय जब रानी और दासियों को सात दिन बिना भोजन के रहना पड़ा, तो रानी ने अपनी दासी से कहा, हे दासी । पास ही के नगर में मेरी बहन रहती है। वह बड़ी धनवान है । तू उसके पास जा आ और 5 सेर बेझर मांग कर ले आ ताकि कुछ समय के लिए थोड़ा-बहुत गुजर-बसर हो जा‌ए। दासी रानी की बहन के पास ग‌ई । उस दिन बृहस्‍पतिवार था। रानी का बहन उस समय बृहस्‍पतिवार की कथा सुन रही थी। दासी ने रानी की बहन को अपनी रानी का संदेश दिया, लेकिन रानी की बहन ने को‌ई उत्तर नहीं दिया । जब दासी को रानी की बहन से को‌ई उत्तर नहीं मिला तो वह बहुत दुखी हु‌ई । उसे क्रोध भी आया । दासी ने वापस आकर रानी को सारी बात बता दी । सुनकर, रानी ने कहां की है दासी इसमें उसका कोई दोष नहीं है जब बुरे दिन आते हैं तब कोई सहारा नही अच्छे-बुरे का पता विपत्ति में ही लगता है जो ईश्वर की इच्छा होगी वही होगा यह सब हमारे भाग्य का दोष है। यह सब कहकर रानी ने अपने भाग्य को कोसा। उधर, रानी की बहन ने सोचा कि मेरी बहन की दासी आ‌ई थी। लेकिन मैं उससे नहीं बोली, इससे वह बहुत दुखी हु‌ई होगी। कथा सुनकर और पूजन समाप्त कर वह अपनी बहन के घर ग‌ई और कहने लगी, हे बहन। मैं बृहस्‍पतिवार का व्रत कर रही थी। तुम्हारी दासी ग‌ई लेकिन जब तक कथा होती है, तब तक न उठते है और न बोलते है, इसीलिये मैं नहीं बोली। कहो, दासी क्यों ग‌ई थी ।

गुरुवार व्रत कथा रानी और उसकी बहन का संवाद

रानी बोली, बहन । हमारे घर अनाज नहीं था । ऐसा कहते-कहते रानी की आंखें भर आ‌ई । उसने दासियों समेत 7 दिन तक भूखा रहने की बात भी अपनी बहन को बता दी । इसीलिए मैंने दासी को तुम्हारे पास 5 सेर बेझर लेने के लिए भेजा था।रानी की बहन बोली, बहन देखो बृहस्‍पति देव सबकी मनोकामना पूर्ण करते है । देखो, शायद तुम्हारे घर में अनाज रखा हो । पहले तो रानी को विश्वास नहीं हुआ परंतु बहन के आग्रह करने पर उसने दासी को अंदर भेजा।दासी घर के अंदर ग‌ई तो वहां पर उसे एक घड़ा बेझर से भरा मिल गया। उसे बड़ी हैरानी हु‌ई। उसने बाहर आकर रानी को बताया। दासी रानी से कहने लगी, हे रानी । जब हमको भोजन नहीं मिलता तो हम व्रत ही तो करते है, इसलिये क्यों न इनसे व्रत और कथा की विधि पूछ ली जाये, हम भी व्रत किया करेंगे । दासी के कहने पर रानी ने अपनी बहन से बृहस्‍पति व्रत के बारे में पूछा । उसकी बहन ने बताया, बृहस्‍पतिवार के व्रत में चने की दाल गुड़ और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले के वृक्ष की जड़ में पूजन करें तथा दीपक जलाएं और कथा सुनें । उस दिन एक ही समय भोजन करें भोजन में पीले खाद्य पदार्थ का सेवन जरूर करें। इससे गुरु भगवान प्रसन्न होते है, अन्न, पुत्र और धन का वरदान देते हैं। साथ ही सभी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। व्रत और पूजन की विधि बताकर रानी की बहन अपने घर लौट आ‌ई ।

रानी ने ऐसे किया बृहस्‍पति देव को प्रसन्‍न

रानी और दासी दोनों ने निश्चय किया कि बृहस्‍पति देव भगवान का पूजन जरूर करेंगें । सात रोज बाद जब बृहस्‍पतिवार आया तो उन्होंने व्रत रखा । घुड़साल में जाकर चना और गुड़ बीन ला‌ईं तथा उसकी दाल से केले की जड़ तथा विष्णु भगवान का पूजन किया । अब पीला भोजन कहां से आ‌ए। दोनों बड़ी दुखी हु‌ई। परंतु उन्होंने व्रत किया था इसलिये बृहस्‍पतिदेव भगवान प्रसन्न थे । एक साधारण व्यक्ति के रुप में वे दो थालों में पीला भोजन लेकर आ‌ए और दासी को देकर बोले, हे दासी । यह भोजन तुम्हारे और तुम्हारी रानी के लिये है, इसे तुम दोनों ग्रहण करना । दासी भोजन पाकर बहुत प्रसन्न हु‌ई । उसने रानी से कहा चलो रानी जी भोजन कर लो परंतु रानी को भोजन आने के बारे में कुछ भी नहीं पता था इसलिए उसने कहा कि जा तू ही भोजन कर क्योंकि तू व्यर्थ में हमारी हंसी उड़ाती है। तब दासी ने कहा एक व्यक्ति भोजन दे गया है तब रानी ने कहा वह व्यक्ति तेरे लिए ही भोजन दे गया है तू ही भोजन कर। तब दासी ने कहा वह व्यक्ति हम दोनों के लिए दो थालों में सुंदर पीला भोजन दे गया है इसलिए मैं और आप दोनों ही साथ-साथ भोजन करेंगे। यह सुनकर रानी बहुत प्रसन्न हुई और दोनों ने गुरु भगवान को नमस्कार कर भोजन किया।

रानी और दासी संवाद

उसके बाद से वे प्रत्येक बृहस्‍पतिवार को गुरु भगवान का व्रत और पूजन करने लगी । बृहस्‍पति भगवान की कृपा से उनके पास धन हो गया । लेकिन रानी फिर पहले की तरह आलस्य करने लगी । तब दासी बोली, देखो रानी । तुम पहले भी इस प्रकार आलस्य करती थी, तुम्हें धन के रखने में कष्ट होता था, इस कारण सभी धन नष्ट हो गया । अब गुरु भगवान की कृपा से धन मिला है तो फिर तुम्हें आलस्य होता है । बड़ी मुसीबतों के बाद हमने यह धन पाया है, इसलिये हमें दान-पुण्य करना चाहिये । अब तुम भूखे मनुष्यों को भोजन कराओ प्याऊ लगवाओ, ब्राह्मणों को दान दो, कुआं- तालाब, बावड़ी और बाग-बगीचे आदि का निर्माण कराओ। मंदिर, पाठशाला और धर्मशाला बनवा कर दान दो। निर्धनों की कुंवारी कन्याओं का विवाह कराओ। साथ ही यज्ञ आदि कर्म करो अपने धन को शुभ कार्यों में खर्च करो। जिससे तुम्हारे कुल का यश बढ़े और स्वर्ग प्राप्त हो और पित्तर प्रसन्न हों । दासी की बात मानकर रानी शुभ कर्म करने लगी । उसका यश फैलने लगा। एक दिन रानी और दासी आपस में विचार करने लगीं कि न जाने राजा किस दशा में होंगें, उनकी को‌ई खोज खबर भी नहीं है। उन्होंने श्रद्धापूर्वक बृहस्‍पति भगवान से प्रार्थना की कि राजा जहां कहीं भी हो, शीघ्र वापस आ जा‌एं।

राजा को दिए बृहस्‍पति देव ने स्‍वप्‍न में दर्शन

उसी रात्रि को बृहस्पति देव ने राजा को स्‍वप्‍न में कहा कि हे राजा उठ तेरी रानी तुझको याद करती है अपने देश को लौट जा। राजा प्रात: काल उठा और जंगल से लकड़ी काटने के लिए जंगल की ओर चल पड़ा। जंगल से गुजरते हुए विचार करने लगा कि रानी की गलती से उसे कितने दुःख भोगने पड़े राजपाट छोड़कर जंगल में आकर में आकर रहना पड़ा जंगल से लकड़ी काटकर शहर में बेचकर गुजारा करना पड़ा। और अपनी दशा को याद करके व्याकुल होने लगा। उसी समय राजा के पास बृहस्‍पति देव साधु के वेष में आकर बोले, हे लकड़हारे । तुम इस सुनसान जंगल में किस चिंता में बैठे हो, मुझे बतला‌ओ । यह सुन राजा के नेत्रों में जल भर आया । साधु की वंदना कर राजा ने अपनी संपूर्ण कहानी सुना दी । महात्मा दयालु होते है । वे राजा से बोले, हे राजा तुम्हारी पत्नी ने बृहस्‍पति देव के प्रति अपराध किया था, जिसके कारण तुम्हारी यह दशा हु‌ई । अब तुम चिंता मत करो भगवान तुम्हें पहले से अधिक धन देंगें । देखो, तुम्हारी पत्नी ने बृहस्‍पतिवार का व्रत शुरू कर दिया है । अब तुम भी बृहस्‍पतिवार के व्रत में चने की दाल गुड़ और मुनक्का से विष्णु भगवान का केले के वृक्ष की जड़ में पूजन करो तथा दीपक जलाकर कथा सुनों। उस दिन एक ही समय भोजन करना लेकिन भोजन में पीले खाद्य पदार्थ का सेवन जरूर करना। भगवान तुम्हारी सब कामना‌ओं को पूर्ण करेंगें । साधु की बात सुनकर राजा बोला, हे प्रभो । लकड़ी बेचकर तो इतना पैसा भ‌ई नहीं बचता, जिससे भोजन के उपरांत कुछ बचा सकूं । मैंने रात्रि में अपनी रानी को व्याकुल देखा है । मेरे पास को‌ई साधन नही, जिससे उसका समाचार जान सकूं । फिर मैं कौन सी कहानी कहूं, यह भी मुझको मालूम नहीं है । साधु ने कहा, हे राजा । मन में बृहस्‍पति भगवान के पूजन-व्रत का निश्चय करो । वे स्वयं तुम्हारे लिये को‌ई राह बना देंगे । बृहस्‍पतिवार के दिन तुम रोजाना की तरह लकड़ियां लेकर शहर में जाना । तुम्हें रोज से दोगुना धन मिलेगा जिससे तुम भली-भांति भोजन कर लोगे तथा बृहस्‍पति देव की पूजा का सामान भी आ जायेगा ।राजा ने ऐसा ही किया और उसको मनोवांछित फल की प्राप्ति हो गई। इस प्रकार जो भी यह कथा पढ़ता या सुनता है उसके सभी मनोरथ पूरे होते हैं।
आरती 
ओम जय बृहस्पति देवा, प्रभु जय बृहस्पति देवा। भगवान बृहस्पति भगवान विष्णु के ही रूप हैं। इन्होंने ही देवताओं के कल्याण के लिए बृहस्पति का रूप धारण किया और देवताओं के गुरु बने। हर गरुवार को जो लोग भगवान बृहस्पति की पूजा करते हैं और इन्हें घी का दीप दिखाकर परिवार सहित यह गुरुवार की आरती गाते हैं, कहते हैं कि उन पर गुरु बृहस्पति बड़े प्रसन्न होते हैं। ज्योतिष शास्त्र में देव गुरु बृहस्पति को शुभ ग्रह बताया गया है जो धर्म, धन, सुख और परिवार में आनंद प्रदान करते हैं। गुरुवार को गुरु बहस्पति की भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर सामने रखकर पूजा कीजिए और केले का जड़ को दूध से सींचे साथ ही चने की दाल का प्रसाद अर्पित करके इस आरती का गायन करें।
ओम जय बृहस्पति देवा, जय जय बृहस्पति देवा।
छिन-छिन भोग लगाऊं, कदली फल मेवा।।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।
तुम पूर्ण परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
जगतपिता जगदीश्वर, तुम सबके स्वामी।।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।
चरणामृत निज निर्मल, सब पातक हर्ता।
सकल मनोरथ दायक, कृपा करो भर्ता।।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।
तन, मन, धन अर्पण कर, जो जन शरण धरे।
प्रभु प्रकट तब होकर, आकर द्वार खड़े।।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।
दीनदयाल दयानिधि, भक्तन हितकारी।
पाप दोष सब हर्ता, भव बंधन हारी।।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।
सकल मनोरथ दायक, सब संशय टारो।
विषय विकार मिटाओ, संतन सुखकारी।।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।
जो कोई आरती तेरी प्रेम सहित गावे। हे गुरु मन को लगाके गावे।
कष्ट हरो तुम उनके, मन इच्छित फल पावे।
ओम जय बृहस्पति देवा।। प्रभु जय बृहस्पति देवा।

कुरुक्षेत्र में ही क्यों लड़ा गया था महाभारत का युद्ध


महाभारत के अनुसार, भरतवंश में राजा कुरु ने जिस भूमि को बार-बार जोता, वह स्थान कुरुक्षेत्र कहलाया। राजा कुरु को देवराज इंद्र ने वरदान दिया था कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर युद्ध करते हुए मरेगा, उसे स्वर्ग की प्राप्ति होगी। यही कारण है कि महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया ?

ऐसे आगे बड़ा कुरुवंश
राजा कुरु का विवाह शुभांगी से हुए, जिनसे उनके पुत्र विदुरथ हुए, विदुरथ के संप्रिया से अनाश्वा, अनाश्वा के अमृता से परीक्षित, परीक्षित के सुयशा से भीमसेन, भीमसेन के कुमारी से प्रतिश्रावा, प्रतिश्रावा से प्रतीप, प्रतीप के सुनंदा से तीन पुत्र देवापि, बाह्लीक एवं शांतनु का जन्म हुआ। देवापि किशोरावस्था में ही संन्यासी हो गए एवं बाह्लीक युवावस्था में अपने राज्य की सीमाओं को बढ़ाने में लग गए। इसलिए सबसे छोटे पुत्र शांतनु को गद्दी मिली।
शांतनु के गंगा से देवव्रत हुए, जो आगे चलकर भीष्म के नाम से प्रसिद्ध हुए। भीष्म का वंश आगे नहीं बढ़ा, क्योंकि उन्होंने आजीवन ब्रह्मचारी रहने की प्रतिज्ञा की थी। शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती से चित्रांगद और विचित्रवीर्य हुए। चित्रांगद की मृत्यु के बाद विचित्रवीर्य का विवाह काशी की राजकुमारी अंबिका व अंबालिका से हुआ। इनसे धृतराष्ट्र व पांडु हुए। धृतराष्ट्र के पुत्र कौरव कहलाएं और पांडु के पुत्र पांडव।
इसलिए इंद्र ने दिया राजा कुरु को वरदान
महाभारत के अनुसार, कुरु ने जिस क्षेत्र को बार-बार जोता था, उसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा। कहते हैं कि जब कुरु इस क्षेत्र की जुताई कर रहे थे तब इन्द्र ने उनसे जाकर इसका कारण पूछा। कुरु ने कहा कि जो भी व्यक्ति इस स्थान पर मारा जाए, वह पुण्य लोक में जाए, ऐसी मेरी इच्छा है। इन्द्र उनकी बात को हंसी में उड़ाते हुए स्वर्गलोक चले गए। ऐसा अनेक बार हुआ। इन्द्र ने अन्य देवताओं को भी ये बात बताई। देवताओं ने इन्द्र से कहा कि यदि संभव हो तो कुरु को अपने पक्ष में कर लो। तब इन्द्र ने कुरु के पास जाकर कहा कि कोई भी पशु, पक्षी या मनुष्य निराहार रहकर या युद्ध करके इस स्थान पर मारा जायेगा तो वह स्वर्ग का भागी होगा। ये बात भीष्म, कृष्ण आदि सभी जानते थे, इसलिए महाभारत का युद्ध कुरुक्षेत्र में लड़ा गया।
कुरुक्षेत्र का महत्व
महाभारत एवं अन्य पुराणों में कुरुक्षेत्र की महिमा के बारे में बताया गया है। महाभारत के वनपर्व के अनुसार, कुरुक्षेत्र में आकर सभी लोग पापमुक्त हो जाते हैं और जो ऐसा कहता है कि मैं कुरुक्षेत्र जाऊंगा और वहीं निवास करुंगा। यहां तक कि यहां की उड़ी हुई धूल के कण पापी को परम पद देते हैं। नारद पुराण में आया है कि ग्रहों, नक्षत्रों एवं तारागणों को कालगति से (आकाश से) नीचे गिर पड़ने का भय है, किन्तु वे, जो कुरुक्षेत्र में मरते हैं पुन: पृथ्वी पर नहीं गिरते, अर्थात् वे पुन:जन्म नहीं लेते। भगवद्गीता के प्रथम श्लोक में कुरुक्षेत्र को धर्मक्षेत्र कहा गया है
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