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पारसी महिला द्वारा मुस्लिम से निकाह करने के अपराध में मरने पर दोनों समुदायों ने कब्रिस्तान में दफ़नाने नहीं दिया, अंत में हिन्दू रीति-रिवाज से दाह संस्कार हुआ

                         पारसी महिला का सनातनियों ने किया अंतिम संस्कार (साभार-इंडियन एक्सप्रेस)
मुस्लिम से निकाह करने वाली गुजरात की एक पारसी महिला का शव इसलिए दो दिनों तक अंतिम संस्कार की बाट जोहता रहा, क्योंकि उसे सुपुर्द ए खाक किए जाने की अनुमति नहीं मिली। शौहर ने कुछ मौलवियों से संपर्क किया। निकाह के बावजूद इस्लामिक रीति से उसे सुपुर्दे खाक करने की इजाजत नहीं दी गई। शौहर के जिंदा रहते भी नहीं। दूसरी तरफ पारसी समुदाय अडा रहा। समाज के मुताबिक अंतिम संस्कार करने की इजाजत नहीं दी गई। आखिर में सनातन रीति रिवाज से महिला का अंतिम संस्कार किया गया।

हिन्दू धर्म अपनी सहनशीलता और दूसरों को अपने में समाहित करने की प्रवृति के लिए जाना जाता है। सनातनियों की इसी खासियत ने सैकड़ों सालों तक आक्रांताओं की कोशिशों के बावजूद इसे जिंदा रखा है। यही सद्भावना और विशालतापूर्व सनातन धर्म ने महिला को गौरवपूर्ण अंतिम विदाई दी।

मुस्लिम से निकाह करने वाली पारसी समुदाय की एक 55 साल की महिला की मौत के बाद अंतिम संस्कार के लिए दो दिन तक उसके शव मॉर्चरी में ही रखा रहा। उसे न तो इस्लामिक तरीके से सुपुर्द ए खाक किया जा रहा था और न ही पारसी समुदाय अपने तरीके से अंतिम संस्कार कर रहा था। ये घटना गुजरात के नवसारी की है, जहाँ शुक्रवार (5 जून 2026) को पारसी महिला के शव को नवसारी के वेरावल इलाके में स्थित श्मशान घाट ले जाया गया। पारसी महिला के कुछ करीबी सदस्यों और उनके शौहर के कई करीबी रिश्तेदारों ने अंतिम संस्कार में भाग लिया।

द इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक, पैंतीस साल पहले नवसारी की पारसी छात्रा ने प्रोफेसर निसार अहमद से निकाह किया था। प्रोफेसर निसार अहमद की मुलाकात छात्रा से तब हुई जब वह गुजराती भाषा में बैचलर कर रही थी। प्रोफेसर वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय से संबद्ध एक स्थानीय कॉलेज में पढ़ाते थे।

दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ीं। छात्रा ने अपने परिवार से कहा कि वह उस आदमी से शादी करना चाहती है जो उससे 15 साल बड़ा था। महिला के पिता एक निजी फर्म में काम करते थे, जबकि उसकी माँ नवसारी में एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थीं। परिवार की नाराजगी के बीच पारसी छात्रा ने प्रोफेसर अहमद से निकाह कर लिया।

पारसी समाज ने उस छात्रा को अपने समुदाय से बाहर कर दिया और परिवार ने भी उससे रिश्ता तोड़ लिया। महिला को पारसी समुदाय के किसी भी सामाजिक समारोह में भाग लेने की अनुमति नहीं थी। माता-पिता ने लगभग 10 वर्षों तक उससे दूरी बनाए रखी, लेकिन बाद में मान गए।

लेकिन परिवार के करीबी सदस्य के मुताबिक, कुछ साल पहले उन्हें अपने बड़े भाई और छोटी बहन की शादियों में शामिल होने की अनुमति नहीं दी गई थी।

कहा जाता है कि उसने इस्लाम नहीं कबूला था और जोरोस्ट्रियन धर्म को मानती थी। दंपति के कोई बच्चे नहीं हैं। हाल ही में वह बीमार पड़ गई और पारसी लोगों के हॉस्पिटल में कई दिनों तक इलाज के बाद 4 जून को उसकी मौत हो गई।

शौहर ने पारसी समुदाय से संपर्क किया, लेकिन अंतिम संस्कार की इजाजत नहीं मिला। उसने मौलवियों से पूछा, लेकिन मौलवी अड़ गए। इस्लाम जो धर्मांतरण के लिए बदनाम है। छल प्रपंच कर महिलाओं को प्रेम जाल में फँसाने और उसपर धर्मांतरण कर निकाह करने का दबाव डालने से जुड़ी खबरें रोज अखबारों की सुर्खियाँ बनती हैं, उससे जुड़े मौलवियों ने महिला की मौत का ‘सम्मान’ नहीं किया।

महिला की रिश्तेदार के मुताबिक, प्रोफेसर ने एक मुस्लिम कब्रिस्तान के रखवालों से संपर्क किया, जिन्होंने उन्हें इस्लामी रीति-रिवाजों के अनुसार शव को दफनाने की अनुमति देने से भी इनकार कर दिया। परिवारवाले काफी परेशान थे, क्योंकि शव दो दिनों तक अस्पताल के मुर्दाघर में पड़ा रहा। महिला के माता-पिता इस दुनिया में नहीं रहे। उसके भाई और छोटी बहन को उसकी मृत्यु की सूचना दी गई, तो वे भी आ गए।

मृतक महिला की बहन ने कहा, “कोई रास्ता न देखकर नवसारी के समाजसेवी और विश्व हिन्दू परिषद के नेता साजन भरवाड से मदद माँगी। उन्होंने प्रस्ताव दिया कि यदि हम सभी सहमत हों, तो वे शव का अंतिम संस्कार कर देंगे… जिस पर हम सभी सहमत हो गए।”

दरअसल पारसी यानी जोरोएस्ट्रियन समुदाय भारत के सबसे छोटे और सबसे पुराने धार्मिक समुदायों में से एक है। उनके कई सामाजिकऔर धार्मिक नियम सदियों पुराने हैं, जिनका उद्देश्य अपनी अलग धार्मिक पहचान और परंपराओं को सुरक्षित रखना है। समय के साथ इसमें कोई बदलाव नहीं आया है।

आज भी महिला के बिरादरी से अलग शादी करते ही सारे अथिकार खत्म कर दिए जाते हैं। न तो वह अग्निमंदिर जैसे पूजा स्थल जा सकती है और न ही सामाजिक कार्यक्रम में हिस्सा ले सकती है।

भारत में कैसे आए पारसी

लोकप्रिय पारसी परंपरा के अनुसार, फारस यानी ईरान में इस्लामी विजय के बाद धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए पारसी शरणार्थी के रूप में 8वीं से 10वीं शताब्दी के बीच भारत के पश्चिमी तट खासकर गुजरात में आए थे। ‘किस्सा-ए-संजान’ नामक पारसी परंपरा के मुताबिक, स्थानीय राजा जादी राणा ने उन्हें बसने की अनुमति दी थी।

कथा के अनुसार, पारसियों ने वचन दिया था कि वे स्थानीय समाज में शांतिपूर्वक रहेंगे, स्थानीय भाषा अपनाएँगे और अपनी पहचान बनाए रखते हुए समाज में घुल-मिल जाएँगे। यह ऐतिहासिक परंपरा पारसी समुदाय की सामूहिक स्मृति का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

क्यों कम होते जा रहे हैं पारसी

पारसियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है। राज्यसभा में एक प्रश्न के उत्तर में केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था कि 1941 में देश में एक लाख 14 हजार से अधिक पारसी थे, जो 2011 की जनगणना में घटकर 57 हजार रह गए। राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम 1992 के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की आबादी में गिरावट को रोकने के लिए केंद्र सरकार ने कई पहल की है। उन्होंने कहा कि जियो पारसी योजना शुरू की गई है, जिसका उद्देश्य पारसी समुदाय में विवाह, परिवार और बच्चों के जन्म को प्रोत्साहित देना है।

पारसी समुदाय की प्रजनन दर भारत के लगभग सभी बड़े समुदायों से काफी कम है। बड़ी संख्या में युवा पारसी विवाह नहीं करते या काफी देर से करते हैं। बूढों की आबादी ज्यादा हो गई है। मृत्यु दर जन्म दर से ज्यादा है। दूसरे धर्म में विवाह को लेकर नियम काफी सख्त हैं। अगर कोई महिला दूसरे धर्म में विवाह करती है तो उसकी धार्मिक पहचान खत्म कर दी जाती है। यहाँ तक कि बच्चों के धार्मिक पहचान पर भी विवाद रहता है। भारत से बड़ी संख्या में पारसी विदेशों में जाकर बस गए हैं। ये भी उनकी संख्या कम होने की बड़ी वजह है।