Showing posts with label #Sanatan Dharma. Show all posts
Showing posts with label #Sanatan Dharma. Show all posts

‘तमिलनाडु में मोदी की हार, सनातन की हार’: कांग्रेस विधायक JMH मौलाना ने उगला हिंदुओं के खिलाफ जहर, कहा- राज्य में नहीं रहेगा ये धर्म

                                                      तमिलनाडु कांग्रेस नेता मौलाना
तमिलनाडु के वेलाचरी से विधानसभा चुनाव जीते कांग्रेस विधायक जेएमएच आसान मौलाना ने सनातन धर्म पर हमला बोला है। उनका कहना है कि राज्य की सत्ता से पलनीस्वामी बाहर है मतलब पीएम मोदी बाहर हैं। इसका मतलब है कि सनातन धर्म तमिलनाडु से बाहर हो चुकी है और राज्य में यह हार गई है।

एक समय था जब कांग्रेस दक्षिण भारत के बलबूते केंद्र में सरकार बनाकर सुरमा भोपाली बनती थी आज उसी दक्षिण में कांग्रेस लगभग शून्य है। और अब वर्तमान तमिलनाडु चुनाव में सिर्फ 5 सीट जीत सुरमा भोपाली बन सनातन के विरुद्ध बकवास कर रही है। सच्चाई यह है कि अन्य प्रदेशों की भांति तमिलनाडु में भी हिन्दू जातिगत सियासत में जकड़ा हुआ है, जबकि हिन्दू बहुसंख्यक है। और जिस दिन हिन्दू इस जकड़न से बाहर हुआ जितने भी सनातन विरोधी हैं सभी चारों खाने चित होंगे जिस तरह बंगाल में। यह लगता है एक या दो चुनाव की बात है जब तमिलनाडु, केरलम आदि राज्यों में सनातन पताका फहराएगी।    

उनके बयान का वीडियो सामने आने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया सामने आ रही है। कई लोग इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला और हिन्दू विरोधी करार दिया है।

तमिलनाडु में कांग्रेस ने 5 विधानसभा सीटें जीती हैं और विजय सरकार का समर्थन कर रही है। 

अवलोकन करें:-

असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
 

वीणा की नाद, माँ सरस्वती का आशीर्वाद और प्रकृति में उल्लास: क्यों बसंत पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उत्सव है

                   बसंत पंचमी: पीले रंग की आभा में ज्ञान, कला और संस्कृति का उत्सव (फोटो साभार: AI)
पश्चिमी सभ्यता के आगे नतमस्तक होकर भारतीय अपने सनातन धर्म के महत्व को भूल गए। हमारे त्यौहार केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि आने वाली ऋतु का संकेत देते हैं, जो विश्व के किसी भी धर्म/मजहब में नहीं। हिन्दू नववर्ष भी चैत्र मास में नवरात्रों से प्रारम्भ होता है यानि देवी आराधना से।    

भारतीय परंपरा में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, जीवन और चेतना के साथ गहरे संवाद का माध्यम होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो मौसम के बदलाव से कहीं आगे जाकर मनुष्य के भीतर नई ऊर्जा, नई संवेदनशीलता और नई दृष्टि का संचार करता है।

यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है और इसे माघ पंचमी या श्री पंचमी भी कहा जाता है। हिंदू चूँकि इस पर्व के बाद के समय को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी मानते हैं इसलिए इसे ‘बसंत पंचमी’ के तौर पर भी जाना जाता है। यहाँ ‘बसंत’ का अर्थ सिर्फ ऋतु से नहीं, बल्कि इसका तात्पर्य जीवन में गति के आगमन से है।

बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन नहीं, जीवन में गति का आगमन

बसंत पंचमी केवल ठंड के अंत और गर्मी की शुरुआत का संकेत नहीं है, बल्कि यह ठहराव से गति की ओर बढ़ने का पर्व है। शीत ऋतु को भारतीय दर्शन में निष्क्रियता और जड़ता का समय माना गया है, जबकि बसंत सक्रियता, सृजन और विस्तार का प्रतीक है।

प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन भी इस परिवर्तन से प्रभावित होता है। मन अधिक उत्साही होता है, भावनाएँ प्रबल होती हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

सृष्टि में वाणी और ज्ञान का अवतरण

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तब संसार दृश्य रूप में तो मौजूद था, लेकिन उसमें ध्वनि, संवाद और अभिव्यक्ति का अभाव था। चारों ओर मौन और निस्तब्धता छाई हुई थी। इस अपूर्णता को देखकर ब्रह्मा संतुष्ट नहीं थे।

भगवान विष्णु की अनुमति से ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का। जैसे ही जल धरती पर गिरा, उसमें कंपन उत्पन्न हुआ और एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति थीं माँ सरस्वती, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी।

जब देवी ने वीणा का नाद किया, तब सृष्टि को वाणी प्राप्त हुई। पशु-पक्षी, मनुष्य, जल और वायु, सबमें ध्वनि और चेतना का संचार हुआ। इसी दिन को बसंत पंचमी माना गया और इसे सरस्वती जयंती के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

माँ सरस्वती: विद्या से आगे विवेक की अधिष्ठात्री

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सूचना या डिग्री तक सीमित नहीं माना गया। माँ सरस्वती उस ज्ञान की प्रतीक हैं जो मनुष्य को अधिक शांत, अधिक विचारशील और अधिक संवेदनशील बनाता है। ऋग्वेद में सरस्वती को चेतना की प्रवाहमान धारा कहा गया है, जो मनुष्य की बुद्धि, प्रज्ञा और आचार का आधार बनती है।

इसी कारण इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकार विशेष रूप से माँ सरस्वती की आराधना करते हैं। परंपरागत रूप से बसंत पंचमी को बच्चों के विद्यारंभ के लिए सबसे शुभ माना गया है। आंध्र प्रदेश में तो इसे विद्यारंभ पर्व के नाम से जाना जाता है, जहाँ बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

होली का शुभारंभ और ब्रज की परंपराएँ

बसंत पंचमी के साथ ही ब्रज क्षेत्र में होली की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। मंदिरों में ठाकुरजी को गुलाल अर्पित किया जाता है और रसिया, धमार और होरी का गायन शुरू हो जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की रंगपंचमी, बनारस में बाबा विश्वनाथ से लेकर महाश्मशान तक खेली जाने वाली होली, ये सब परंपराएँ इस बात का प्रतीक हैं कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु के बीच भी जीवन का उत्सव मनाया जाता है।

भारत के विविध रंगों में बसंत पंचमी

बसंत पंचमी पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। बंगाल में यह सरस्वती पूजा का प्रमुख पर्व है। बिहार और उड़ीसा में इसका गहरा संबंध कृषि अनुष्ठानों से है। राजस्थान, मथुरा और वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सवों की धूम रहती है। पंजाब में यह पर्व पतंगबाजी, सरसों के खेतों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।

विशेष रूप से पंजाब में बसंत पंचमी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोकजीवन और खेती से जुड़ा बड़ा उत्सव है।

दिल्ली : कालिका मंदिर का 3000 वर्ष पुराना है इतिहास : जब माँ कौशकी ने किया असुरों का संहार, माँ काली ने दैत्यों का खून पिया…

आज मुस्लिम वोटों के भूखे सनातन विरोधी नेताओं और उनकी पार्टियों ने मुस्लिम कट्टरपंथियों के पैरों में अपनी पगड़ी रख दिल्ली के इतिहास को ही बदलकर अपने पूर्वजों को तो कलंकित किया है साथ में देश के वास्तविक इतिहास के साथ भी भयंकर मजाक किया है। हमें पढ़ा दिया कि दिल्ली मुग़ल आक्रांताओं ने बसाई थी। इतना बड़ा सफ़ेद झूठ बगैरत इतिहासकारों ने परोस दिया। इन बगैरतों से पूछो सनातन पहले आया या इस्लाम?

कुछ वर्ष पहले ZEENews पर सुबह धर्म पर शो आता था। उसमे महरौली स्थित योगमाया मंदिर के इतिहास को वर्णित करते बताया था कि 7-मंज़िल का सूरज ध्वज(जिसे आज क़ुतुब मीनार बताया जाता है) के निर्माण करते खुदाई में योगमाया माता का मन्दिर निकलकर आया। पृथ्वीराज चौहान ने सर्वप्रथम माता के मंदिर का जीर्णोद्वार कर मन्दिर से दूर सूरजध्वज का निर्माण किया। जब एक हिन्दी पाक्षिक को सम्पादित करते स्तम्भ(नीचे देखिए) भी लिखता था। देश गलत इतिहास लिखकर पढ़वाने वाले इतिहासकारों को कब मोदी सरकार ब्लैकलिस्ट करेगी?   

सफ़ेद झूठ 

फिर लाल किला को बता दिया कि इसे शाहजहां ने बनवाया, इन महामूर्खों से पूछो कि इसे हिन्दू सम्राट अनन्तपाल तोमर ने यमुना नदी के बीच बनवाया था। शाहजहां के फ़रिश्ते भी यमुना के बीचोबीच बनवाने तो दूर सोंच भी नहीं सकते थे। देखो इन दगाबाज़ इतिहासकारों ने कितना बड़ा सच छुपाया। ये ऊपर पृष्ठ में जो फोटो देख रहे हैं है इसमें फारस, जिसे आज ईरान कहते हैं, का राजदूत शाहजहां के दिल्ली सत्ता हथियाने के बाद लाल किला में मिलता है। जवाब दो "लाल किला क्या शाहजहां माँ के पेट से लेकर आया था?" ये ब्रिटिश काल में यमुना को लाल किले के पीछे मोड़ा गया था। दूसरे, पुराना किला जो पांडव युग से है हमें पढ़ा दिया शेरशाह सूरी ने बनवा था। अगर इसको शेरशाह ने बनवाया था फिर यहाँ भैरव बाबा का मन्दिर कहाँ से आ गया? 

भारत के इतिहास पर देखिए इस वीडियो को:- 

      

इतना ही नहीं जब कश्मीरी गेट से बल्लबगढ़ जाने वाली मेट्रो की खुदाई में जामा मस्जिद के पास मिले मंदिर को Archeological Survey of India को सौंपने की बजाए फिरकापरस्त मेट्रो प्रशासन ने फिरकापरस्त तत्कालीन शीला सरकार को सौंप दी और शीला ने तत्कालीन वहां के विधायक शोएब इक़बाल के हवाले कर दी, क्यों? और शोएब ने दिनरात एक कर मस्जिद की शक्ल दे दी। जो आजतक विवादित है। क्या किसी नदी के किनारे मस्जिद देखी? नदी के किनारे मन्दिर होते हैं। 
खैर, दिल्ली, जो पांडव युग में इंद्रप्रस्थ के नाम से चर्चित थी, में कई धार्मिक स्थल ऐसे है जो सनातन को अतिप्राचीन होने के प्रमाण देते हैं। निगमबोध घाट के निकट मरखट वाले हनुमान मन्दिर का भी इतिहास है। यहां श्रीराम के परमभक्त श्री हनुमान की मूर्ति किसी ने स्थापित नहीं थी, अपने आप प्रकट हुई थी।     
 
अब आते है करोड़ों सनातन प्रेमियों की पूज्यनीय माता कालका मन्दिर पर। देश की राजधानी दि्ल्ली की धड़कती रफ्तार के बीच एक ऐसा स्थान है जहाँ आत्मा को नई ऊर्जा मिलती है। यह जगह है श्री कालकाजी मंदिर। देवी काली को समर्पित ये मंदिर दिल्ली के दक्षिणी भाग में स्थित है। यहाँ देवी काली को ‘कालिका’ के नाम से पूजा जाता है। माँ कालिका को शक्ति और समय की अधिष्ठात्री देवी माना जाता है। मंदिर का नाम भी ‘कालकाजी’ इसी कारण पड़ा है।

नवरात्रों में जहाँ ये मंदिर एक महाआरती स्थल बन जाता है। वहीं, रोजमर्रा में भी श्रद्धालुओं की लंबी कतारें गवाह हैं कि मंदिर में केवल देवी की मूर्ति नहीं बल्कि माँ कालिका का जीवंत रूप विराजमान है। कहा जाता है कि सच्चे मन से पुकारने वाले भक्तों की आवाज माता जरूर सुनती हैं। दिल्लीवासी हर शुभ कार्य से पहले माँ के दरबार में माथा टेकने आते हैं।

मंदिर रोज़ाना खुलता है। सुबह 4 बजे से लेकर रात 11 बजे तक भक्त दर्शन के लिए पहुँच सकते हैं। सुबह की मंगला आरती और शाम की संध्या आरती यहाँ की खास हैं। इस दौरान देवी को विशेष श्रृंगार में सजाया जाता है और मंदिर का वातावरण दिव्य संगीत से भर जाता है।

                 मंदिर का इतिहास

कालकाजी मंदिर को कालकाजी तीर्थस्थल भी कहा जाता है। मंदिर का इतिहास तीन हजार वर्षों से भी पुराना माना जाता है। यानी महाभारत काल से भी पहले की स्थापना है। मान्यता है कि यहीं पर माँ ने असुरों का संहार कर धरती से बुराई को मिटाया था। उसी क्षण से यह स्थान देवी के विशेष रूप का प्रतीक बन गया।
हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, कालका देवी की उत्पत्ति मंदिर के वर्तमान स्थान दिल्ली के पूर्वी कैलाश के अरावली हिल्स में हुई। सतयुग के दौरान कई देवता सदियों पहले श्री कालका जी मंदिर के आसपास के क्षेत्र में रहते थे। लाखों साल पहले दो असुरों ने मंदिर स्थल के पास रहने वाले देवताओं को परेशान करना शुरू कर दिया। परेशान देवताओं ने देवी पार्वती से मदद माँगी और पार्वती के मुख से देवी कौशकी प्रकट हुईं। उन्होंने इन विशाल जीवों पर हमला किया और मारने में कामयब रहीं।
इस दौरान इन जीवों का खून धरती पर गिर गया, जिससे हज़ारों ऐसे और असुर पैदा हो गए। इतने सारे अपवित्र जीवों से एक साथ लड़ना कौशकी देवी के लिए बड़ा काम था। इसका साथ देने के लिए माँँ पार्वती ने अपना अलग अवतार लिया, जो देवी काली थीं।
देवी काली ने कौशकी देवी द्वारा मारे गए दैत्यों से गिरे खून को चूस लिया। दोनों देवियों ने मिलकर दैत्यों के खतरे को पूरी तरह से मिटा दिया। इसके बाद से देवी काल को क्षेत्र के दिव्य प्राणियों की प्रमुख माना जाने लगा। यही देखते हुए देवी ने अनिश्चित काल तक वहीं रहने का फैसला किया।

मंदिर की संरचना

मंदिर की वास्तुकला हिंदू मंदिरों की पारंपरिक शैली में बनी है। माना जाता है कि इसका सबसे पुराना हिस्सा मराठों द्वारा 1764 ई. के आसपास स्थापित किया गया था। कालका जी मंदिर पर संगमरमर की नक्काशी शानदार है। नींव ईंट की है, लेकिन ब्लॉकों को प्लास्टर किया गया है और फिर अधिक भव्यता के लिए संगमरमर से ढका गया है।

मंदिर की बाहरी संरचना एक पिरामिड के आकार के टॉवर द्वारा संरक्षित है। केंद्र के कमरे में 12 पक्ष हैं, जिसके अपने प्रवेश द्वार हैं। हर पक्ष की लंबाई 24 फीट है। सभी दरवाज़े गलियारे की ओर ले जाते हैं। इनमें से हर गैलरी आठ फीट और नौ इंच चौड़ी है। इसमें तीन बाहरी द्वार भी हैं।

मंदिर के बीचोबीच संगमरमर का चबूतरा है, जिसपर पत्थर को तराश कर माँ की काली की मूर्ति रखी गई है। इसी मूर्ति पर एक शिलालेख है जिसपर देवी का नाम हिंदी में खोदा गया है। कालकाजी की प्रतिमा संगमरमर की रेलिंग से सुरक्षित हैं। इन सलाखों और चबूतरे पर नस्तलक शैली में सुलेख भी अंकित है।

                                नवरात्रों पर माँ का खास शृंगार

नवरात्रों के दौरान यह मंदिर एक उत्सव का रूप ले लेता है। नौ दिनों तक यहाँ मेला लगता है, जिसमें लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं। माता के जयकारों से गूंजता वातावरण, रंग-बिरंगे झूले, भक्ति संगीत और पूजा-पाठ का माहौल हर किसी के हृदय को छू जाता है। मंदिर के बाहर का चौक इन दिनों जीवन से भर उठता है। दुकानों में प्रसाद, खिलौने, चूड़ियाँ और धार्मिक वस्तुएँ बिकती हैं। हर कोना माँ की भक्ति में डूबा नजर आता है।

कैसे पहुँचे कालकाजी मंदिर?

दिल्ली मेट्रो की वायलेट और मैजेंटा लाइन पर ‘कालकाजी मंदिर’ नाम का स्टेशन स्थित है, जो मंदिर से मात्र पाँच सौ मीटर की दूरी पर है। स्टेशन से मंदिर तक पैदल कुछ ही मिनटों में पहुँचा जा सकता है या फिर स्थानीय ऑटो से भी जाया जा सकता है। इसके अलावा, दिल्ली की डीटीसी बसें, टैक्सियाँ और निजी वाहन से भी यहाँ पहुँचना बहुत सुगम है।

मुझे दुख होता है जब कुछ लोग कहते हैं और पूछते हैं कि मोदी ने हिंदुओं के लिए किया ही क्या है

अबू धाबी में मंदिर उद्घाटन करने बाद पूजा करते 
सुभाष चन्द्र

आजकल विपक्ष मोदी के लिए भाजपा समर्थकों और हिन्दू जनमानस के दिमाग को प्रदूषित करने की कोशिश कर रहे हैं और शायद यह प्रश्न उसी खेमे से आया होगा जिसे हमारे हिंदुओं ने मूर्ख बनकर लपक लिया है कि मोदी ने हिंदुओं के लिए क्या किया है? इस प्रश्न से मुझे सच में पीड़ा हुई क्योंकि ऐसा पूछने वालों ने कुछ तथ्यों को देखा ही नहीं। 

लेखक 
चर्चित YouTuber 
नरेंद्र मोदी ने हिन्दू जागरण का वह काम किया है जो कोई नहीं कर सकता; हिंदुओं को सर उठा कर जीना सिखाया है, वे न समझें तो यह उनकी मर्जी; यह उनके दिमाग का दिवालियापन; दुनिया भर में आज भारतीयों को भारत पर गर्व होता है और विदेशों में प्रवासी भारतीयों में मोदी ने जान डाल दी क्या ऐसा पहले किसी प्रधानमंत्री ने किया था?

नरेंद्र मोदी पहला प्रधानमंत्री है जो डंके की चोट पर हर मंदिर में जाकर विधि विधान से पूजा करता है वरना तो विगत में प्रधानमंत्री जालीदार टोपी पहन कर इफ्तार पार्टियों का मजा लूटा करते थे मुसलमान और मुस्लिम कट्टरपंथी खुश होते रहे, लेकिन जिसने रोज़ा नहीं रखा, उसके द्वारा रोजा इफ्तार करवाना गुनाह है। रोजदार अपना रोजा ख़राब करते रहे हैं। आज प्रधानमंत्री आवास में और राष्ट्रपति भवन नवरात्रों में कन्या पूजन होता है यह क्या हिंदू जागरण के लिए कम है?

आज कुछ मुसलमान कहते मिल सकते हैं कि हिंदुओं ने मोदी द्वारा राम मंदिर बनाने को भी भुला दिया लेकिन मोदी अगर बाबरी मस्जिद बनवा देता तो मुसलमान हमेशा उसे वोट देते, यह कह कर भ्रम फैलाते है क्योंकि मुसलमानों ने मोदी की सभी योजनाओं का भरपूर लाभ उठा कर भी उसे वोट नहीं दिया

मोदी के अगर हिंदू मंदिरों का निर्माण और पुनरुत्थान को भी हिंदुओं के लिए किया गया काम हिंदू मानस न माने तो उसे मूर्ख ही कहेंगे देश में ही नहीं, इस्लामिक देशों में भी बने मंदिर, जिसकी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता

-मुस्लिम देश बहरीन में 200 साल पुराने श्री कृष्ण मंदिर का Renovation 4.2 मिलियन डॉलर की लागत से 2019 में शुरू किया गया;

-अक्टूबर, 2022 में दुबई में भव्य मंदिर बनकर तैयार हुआ जिसमें शिव मंदिर और गुरुद्वारा भी है;

-फरवरी, 2024 में अबू धाबी में भव्य हिन्दू मंदिर का उद्घाटन स्वयं मोदी करके आए थे;

-धारा 370 हटाने के बाद कश्मीर घाटी में अनेक मंदिरों का Renovation किया गया और अभी भी चल रहा है ऐसे कई मंदिर हैं जिनमें 50-50 साल बाद पूजा शुरू हुई;

-यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ के 900 किलोमीटर की 4-धाम यात्रा 1500 करोड़ की लागत से शुरू की गई जिसकी monitoring मोदी खुद करते हैं;

-Ram Mandir in Ayodhya (500 साल बाद मुगलों की गुलामी से निजात मिली)

Kedarnath Temple (भव्य निर्माण हुआ)

Somnath Temple Renovation 

Kashi Vishwanath Corridor बना जिसके बाद बनारस में पहुंचने वाले यात्रियों की संख्या उच्चतम स्तर पर पहुंच गई,

महालोक उज्जैन का एक तिहाई काम पूरा हुआ,

कालिका माता मंदिर पावागढ़ 18 जून 2022 को भव्य निर्माण के बाद मोदी ने उद्घाटन किया,

-राम मंदिर उद्घाटन से पहले 11 दिन के अनुष्ठान में भगवान राम से जुड़े 6 मंदिरो में पूजा की;

-रामायण यात्रा ट्रेन से 14 तीर्थो को जोड़ा; और 

-गुरुनानक का 550वां, गुरु गोबिंद सिंह का 350वां और गुरु अर्जन देव का 400वां प्रकाश पर्व बड़ी धूम से मनाए

मोदी ने ये जो काम हिंदुओं के लिए किए वे सब हिंदू मानस को अपनी जड़ों से जोड़ने के लिए किए और इन सब से आर्थिक गतिविधि इस तरह से बढ़ी जिससे हर तबके को काम मिला

मोदी प्रधानमंत्री होने के नाते कोई योजना भेदभाव करने नहीं बना सकता और वह कभी कोई काम वोट हासिल करने के इरादे से नहीं करता मुसलमान क्या उसके साथ अहसान फरामोशी करेंगे, जब हिंदू ही उसके किए को नकार देते हैं चाहे वे गरीब, अमीर, या महिलाएं हों

हिंदू मानस एक बात याद रखे, मोदी जैसा हिंदू राजा फिर नहीं मिलेगा, आप उसकी अनदेखी करोगे आप ही पछताओगे और ऐसा करने से आप उसे पीड़ा ही देंगे

786 नंबर का सनातन धर्म से गहरा सम्बन्ध ; जानिए कटु सच्चाई को


'सच विचलित हो सकता है, पराजित नहीं', सनातन को धूमिल और अपमानित करने वालों की भीड़ जरूर बढ़ रही, लेकिन सनातन को बर्बाद करने वाले आये और गए, लेकिन सनातन युगों से स्थिर है। 
ऑफिस में 'अल्लाह', 'नमाज़', काबा और 786 आदि को सनातन से सम्बंधित कहने पर कई बार 'मुल्ला निगम' कहते थे, समय बड़ा बलवान होता है, देखिए मुसलमान ही इन्हें सनातन से सम्बंधित बता रहा है। फेसबुक और व्हाट्सअप पर मेरे ऑफिस सहयोगियों को शायद अब अहसास होगा कि मेरी बात में कितना दम है। दोस्तों, रोज पूजा करते विनती करो कि देश में Ex-Muslims की संख्या दिन-दुगनी रात चौकनी की तरह बढ़े। ताकि उस समय कही बातें धरातल पर चरितार्थ हों।क्योकि असली इस्लाम को बताने की हिम्मत सिर्फ इन Ex-Muslims में है।     
यह हिन्दुओं का दुर्भाग्य है कि 4+ अरब वर्षों प्राचीन सनातन धर्म को अपमानित करने वालो की जय-जयकार की जा रही। कुर्सी के भूखे बेशर्म नेता और उनकी पार्टियां सनातन को अपमानित करने में गौरवविंत हो रहे  हैं।
मुस्लिम कट्टरपंथियों ने अपनी दुकाने चलाने हिन्दू और मुस्लिम के बीच ही दरार नहीं डाली हुई बल्कि मुसलमानों को ही डराकर असली इस्लाम से दूर रखे हुए हैं। ये "सिर तन से जुदा" गैंग से हिन्दुओं को डराने का प्रयास किया जा रहा है, लेकिन भूल रहे है कि हिन्दुओं का संयम टूटा इस गैंग का कोई सरगना घर से बाहर तक निकलने की हिम्मत करेगा। अभी कुछ ही महीनो पहले बौखलाहट में मौलाना मदनी ने रामलीला ग्राउंड दिल्ली में सच बोल ही दिया कि ॐ और अल्लाह एक हैं। दूसरे, अयोध्या में प्राण प्रतिष्ठा के दिनों लखनऊ से News18 के लाइव शो 'भइया जी कहिन' में बुजुर्ग मौलाना अंसारी ने भी 'नमाज़' को संस्कृत शब्द बता दिया। इतना ही नहीं बाकायदा संधि विच्छेद कर मतलब भी समझाया। सच्चाई सामने आने में समय लगेगा, लेकिन उसका शंखनाद हो चुका है। क्योकि इस काम को कोई हिन्दू नहीं बल्कि Ex-Muslim वर्ग कर रहा है। 
हर सनातनी परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना करे, यज्ञ करे कि मुस्लिम कट्टरपंथियों का बाजा बजाने भारत में इस्लाम छोड़ EX-Muslim बनने वालों की संख्या जल्दी से जल्दी 1 लाख से अधिक हो। दरअसल मुस्लिम कट्टरपंथियों ने मुसलमानों को इतना डरा-धमका के रखा हुआ, कि सच्चाई जानने की कोई हिम्मत ही नहीं कर पाता। हिन्दू और मुस्लिम एक दूसरे को नफरत की नज़र से देखते हैं, उसके जिम्मेदार ये कट्टरपंथी तो हैं ही आम मुसलमान भी कम नहीं। इन Ex-Muslim का जलवा नूपुर शर्मा विवाद के दिनों यूट्यूब पर Jaipur Dialogue, Aaj और चैनल News Nation पर 'इस्लाम क्या कहता है' शो पर देखने को मिला। सुरमा भोपाली बन फिर रहे मौलानाओं और मुस्लिम बुद्धिजीवियों की बारात चढ़ती देखी। वातानुकूलित कमरे में पसीना पोंछते देखा गया है। ढंग से कुरान की आयत भी नहीं पढ़ सके। वो भी इन Ex-Muslim ने बताया कि ऐसे पढ़ते हैं।  
इन Ex-Muslims के अलावा अब मुस्लिम महिलाएं भी आगे आ रही हैं। कई लाइव शोज में मौलाना पीटते देखे गए हैं। जब किसी चर्चा में मौलानाओं के पास कोई जवाब नहीं होता हिन्दुओं को विभाजित करने जातपात पर आ जाते हैं। जिसका करवाचौथ 2022 के दिन News 18 पर एंकर अमिश देवगन के 'आर पार' शो में दिखने को मिला, जब मौलाना ने ऋग्वेद का गलत उदाहरण देने पर परिचर्चा में सहभागिनी सुश्री शुभद्रा ने मौलाना रशीदी को जलील किया, अपने बचाव में एंकर अमिश महिला को बेइज्जती करने से रोकने पर अमिश ने कहा: 'मुंह में हाथ दिया है सुनना पड़ेगा'। माहौल इतना गर्म हो गया था कि अगर दोनों स्टूडियो में होते, निश्चितरूप से मौलाना की पिटाई हो गयी होती। इस पुरे प्रकरण की खासबात यह थी कि मौलाना के पास ऋग्वेद है, जिसकी पन्नी भी उसी दिन हटी। चला था ऋग्वेद पर प्रवचन देने। इस शो का पूरा वीडियो कई लेखों में डाल चूका हूँ। हिन्दू ही नहीं मुस्लिम महिलाओं ने तो महिला मुद्दे पर इनकी पिटाई तक कर दी, लेकिन ये हैं कि सुधरते नहीं। 
        
 
वैसे तो हर नंबर आपके लिए भाग्यशाली होता है, लेकिन कुछ नंबर ऐसे भी होते है जो सबसे ज्यादा भाग्यशाली की श्रेणी में रखे गए है। हम आज एक ऐसे ही नंबर की बात कर रहे है जो भाग्यशाली माना जाता है। दरअसल, हम बात कर रहे है 786 नंबर की। इस्लाम धर्म में इस नंबर को काफी भाग्यशाली माना जाता है। जैसे किसी भी कार्य को शुरू करने से पहले हिंदू धर्म में भगवान गणेश जी की पूजा करके श्रीगणेश किया जाता है वैसे ही इस्लाम धर्म में 786 नबंर की इवादत करके काम की शुरूआत होती है। इस्लाम धर्म में 786 नबंर का मतलब बिस्मिल्लाह उर रहमान ए रहीम माना जाता है।

786 को जोड़ने(7+8+6) पर कुल अंक 21 आता, जो सनातन धर्म में शुभ माना जाता है। फिर 21 को जोड़ने(2+1) पर कुल अंक 3 यानि ब्रह्मा(सृष्टि रचियता), विष्णु(जगत पालनहार) और महेश(विनाशकारी/कल्याणकारी)। महेश यानि शिव जिन्हे आशुतोष(आशु मतलब जल्दी और तोष मतलब खुश होना) भी कहते हैं। क्योकि जब तक विनाश/कल्याण या कहा जाए कि धरती पर आया प्राणी मृत्यु को प्राप्त नहीं होगा, ब्रह्माजी सृष्टि कैसे रचेंगे और विष्णु कैसे पालनहार बनेंगे। 

दूसरा अंक आता है 7, सनातन धर्म में इसका भी बहुत महत्व है। विवाह में फेरे होते है सात(7)। जब गोवर्थन पर्वत की परिक्रमा करते हैं 5,7,9 या 11(व्यक्ति की क्षमता पर निर्भर) होती हैं और जब मुस्लिम हज करते हैं, तब हाजी 7 चक्कर, जिसे हिन्दू परिक्रमा कहते हैं, लगाते हैं, 6 या 8 नहीं।       

इतना ही नहीं, कट्टरपंथी मौलानाओं ने भारतीय मुसलमानों को इतना डरा-धमका के रखा है, कोई सच्चाई जानने की हिम्मत भी नहीं कर पाता। अगर कोई हिम्मत कर लेता है तो उस पर अल्लाह का कहर लाज़िम कहकर भीखी बिल्ली से बुरी हालत बना देते हैं।  

786 का श्रीकृष्ण से सम्बन्ध 

इस्लाम में 786 नंबर को काफी तबज्जो दी जाती हैं। कई लोग इस नंबर के नोट अपने पर्स में रखते है तो कई लोग अपनी गाड़ियों का नंबर भी यही रखते है। इस्लाम धर्म में इस नंबर को पाक साफ माना जाता है। लेकिन हैरानी की बात तो यह है कि कई लोग इसका संबंध भगवान श्रीकृष्ण से भी बताते हैं। पुराणों के अनुसार कृष्ण जी अपनी 7 छिद्रों वाली बांसुरी को तीन-तीन यानी 6 अंगुलियों से बजाया करते थे और वे देवकी के आठवें पुत्र थे। यानि तीनों अंक मिलकार 786 बनता है। इसके अलावा प्रसिद्ध शोधकर्ता राफेल पताई के अनुसार 786 नंबर की आकृति को देखा जाए तो यह एक संस्कृत में लिखा हुआ ॐ दिखाई देगी।

इस्लाम में 786 का महत्व

इस्लाम धर्म के लोगों का मानना है कि 786 का स्मरण करने के बाद शुरू किए गए हर काम में बरकक्त होती है। इस्लाम में इस अंक को सीधे अल्लाह से जोड़कर देखा जाता है। इस्लाम धर्म के मानने वाले लोग इस नंबर को बेहद पवित्र और अल्लाह का वरदान मानते हैं। यही कारण है कि इस्लाम धर्म को मानने वाले अपने हर कार्य में 786 को शामिल करते हैं। उनका मानना है कि जिस काम में 786 शामिल किया जाता है उसके होने में अल्लाह की पूरी मर्जी होती है। अंक ज्योतिष के अनुसार 786 को परस्पर जोड़ने पर (7+8+6=21) 21 प्राप्त होता है। अब यदि 21 को भी परस्पर जोड़ा जाए तो 3 प्राप्त होता है। तीन को करीब-करीब सभी धर्मों में शुभ अंक माना जाता है।

भगवान के मिशन पर हैं मोदी और उनका कार्य पूर्ण होने तक मोदी जी नहीं हटेंगे; यह मोदी जी ने खुद कहा - विपक्ष इस खतरे की घंटी को सुन ले

सुभाष चन्द्र

भारत मंडपम में India TV के Editor रजत शर्मा के साथ इंटरव्यू के अंत में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ ऐसा कहा जो विपक्ष के लिए एक इशारा है कि मेरे हटने की प्रतीक्षा मत करो। रजत शर्मा से जब वे 4 जून की बात कर रहे थे कि विपक्ष के लोग इसके बाद बेहाल होंगे, तब रजत शर्मा ने कहा - “आपने तो 2047 की जो बात कर दी उससे विपक्ष को लग रहा है कि मोदी जी ने तो लंबा कार्यक्रम बना दिया, क्या ये 2047 तक रहेंगे”? इस बात का जवाब जो मोदी जी ने दिया, उसे बड़े ध्यान से पढ़िए उन्होंने कहा :- 

“मेरा मानना है कि ईश्वर ने मुझे किसी विशिष्ट काम करने के लिए भेजा है; परमात्मा ने मुझे किसी purpose के लिए भेजा हुआ है, वरना मैं जिस जिंदगी से निकला हुआ हूं, मेरे यहां आने का कोई logic ही नहीं बैठा जी, कोई रास्ता ही नहीं बनता जो मुझे यहां ले आए; ईश्वर ने मुझे इस काम के लिए कहा है मुझे भेजा है, मेरा मार्गदर्शन भी वे स्वयं करते हैं, मुझे रास्ता भी वो स्वयं दिखा रहे हैं; परिश्रम, पुरुषार्थ और पराक्रम का जो जज्बा है वो भी मुझे परमात्मा की कृपा से मिलता रहता है और उसी को लेकर मैं काम करता हूं और मुझे पक्का लगता है कि विकसित भारत का 2047 का टारगेट भी ईश्वर ने ही मुझसे करवाया है और जब तक वह पूरा नहीं होगा, वो मुझे वापस नहीं बुलाएंगे और मेरे लिए दुनिया में कोई और जगह नहीं है”

लेखक 
चर्चित youtuber 

अंतिम पंक्ति में यह कहने का क्या मतलब है कि 2047 का टारगेट मुझसे भगवान ने ही करवाया है और जब तक वह पूरा नहीं होगा वो मुझे नहीं बुलाएंगे - मतलब मैं कहीं नहीं जाने वाला

क्या विशिष्ट कार्य है जिसके लिए भगवान ने उन्हें भेजा है, ये वही जानते हैं लेकिन यह विपक्ष के लिए खतरे की घंटी जरूर है

मेरे ख्याल में 4 व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें मोदी के लिए दुःख पहुंचाने वाले अपशब्द बोलते हुए, उन्हें बात बात पर बेइज़्ज़त करते हुए, उनका मजाक उड़ाते हुए उस भगवान से डरना चाहिए जिसकी मोदी भक्ति करते हैं कोई ऐसे व्यक्ति को हर समय प्रताड़ित करेगा जो हर बात को सहन करता है तो निश्चित ही उसके दिल को पीड़ा तो होगी ही, लेकिन वह व्यक्ति कहेगा कुछ नहीं परंतु इतना समझ लेना चाहिए ऐसे लोगों को कि उस व्यक्ति से वे हर दिन “श्रापित” होते हैं और उसकी सजा ईश्वर उन्हें अवश्य देगा कब देगा, कहां देगा और कैसे देगा, वह ईश्वर अपने भक्त की पीड़ा समझ कर निश्चित करेगा

अब आप सोच रहे होंगे ऐसे 4 व्यक्ति कौन हैं मेरी नज़र में जिन्हें दंड मिलेगा वो है राहुल गांधी, केजरीवाल, तेजस्वी यादव और अखिलेश यादव इन लोगो को कालचक्र से डरना चाहिए 

कोई शक? 

“वक्त ने कभी भी उन्हें नहीं माफ़ किया, 

जिन्होंने दुखियों के अश्कों से दिल्लगी की है” 

क्या आप जानते है कि केला और नारियल का पूजा पाठ में खास स्थान क्यों है?


सनातन धर्म में किसी भी शुभ कार्य में नारियल और केला को प्रयोग करना का बहुत ही गूढ़ रहस्य है। क्योकि 
नारियल और केला ये दो ही ऐसे फल है जो किसी के जूठे बीज से उत्पन्न नही होते, मतलब अगर हमे आम का पेड़ लगाना है तो हम आम को खाते है और उसके बीज या गुठली को जमीन में गाड़ते है तो वह पौधे के रूप में उगता है,या फिर ऐसे ही गुठली निकाल के लगा दे तो भी वह उस पेड़ का बीज(जूठा या अंग) ही हुआ, लेकिन केले का या नारियल का पेड़ लगाने को केवल जमीन से निकला हुआ पौधा(ओधी) ही लगाते है, जो की खुद में ही पूर्ण है,न किसी का बीज न हिस्सा, न जूठा,इसलिए भगवान को सम्पूर्ण फल अर्पित किया जाता है।

यदि हम दूसरा फल खाकर उसके बीज फेंक दें तो वह फिर से पौधे के रूप में विकसित हो जाएगा। लेकिन अगर हम नारियल के छिलके को खाने के बाद फेंक देते हैं, अगर हम केले को या तो बाहरी छिलके को हटाकर या उसके बिना फेंक देते हैं, तो वह फिर कभी नहीं उग पाएगा। यह मुक्ति/मोक्ष अवस्था का प्रतिनिधित्व करता है जो कि सामाजिक मुक्ति की अंतिम अवस्था है, बार-बार पुनर्जन्म से मुक्ति। इस प्रकार हम भगवान से हमें मुक्ति राज्य प्रदान करने की कामना के लिए इन्हें अर्पित कर रहे हैं।

यह भी लगभग ऊपर वाले जैसा ही थोड़ा सा है। चूंकि नारियल और केला कभी भी हमारे द्वारा खाने के बाद फेंके गए बीजों से नहीं बन सकते, इसलिए उन्हें किसी भी तरह से मानव लार के संपर्क के बिना शुद्ध माना जाता है। इसलिए इन्हें सबसे शुद्ध फल के रूप में भगवान को अर्पित किया जाता है।

पूजा में बजने वाली घंटी और शंख की ध्वनि का भी सनातन में बहुत महत्व है। यह ध्वनि जितनी दूर जाएगी, असुर उतने ही दूर होते हैं। फिर हवन से होने वाले धुएं का भी अपना महत्व है, आज कल लोग धुएं को घर से बाहर निकालने के लिए एग्जॉस्ट को खोल देते हैं, जो सनातन धर्म गलत है। धुआं जितना देर घर में रहेगा वह कोने-कोने से शैतानी ताकतों को समाप्त करता है। क्योकि हवन करने इतने मन्त्रों का उच्चारण किये जाने से शैतानी हवाएं पस्त होती है और हवन किये जाने का उद्देश्य पूर्ण होता है। इसीलिए कहते है हवन द्वारा घर परिवार की शुद्धि। पूजा में कपूर के जलाये जाने का भी धार्मिक ही नहीं पारिवारिक दृष्टि में बहुत महत्व है।

हमारे पूर्वज कितने ज्ञाता थे,जो चीजे हमे आज तक पता नहीं वो पहले से जानते थे और उसका जीवन में इस्तेमाल कर जीवन पद्दति में ढाल लिए थे,जो हमे परंपरा से प्राप्त हुआ है,केवल हम उन्हे इस्तेमाल करते गए पर उनकी क्यों और क्या महत्ता है ये कभी भी जानने की कोशिश नही किये

न्यायपालिका भी क्या हिंदू धर्म में सनातन काल से चल रही प्रथाओं को कुचलना चाहती है; किसी ने 75 साल से क्यों नहीं कहा हिन्दू मैरिज एक्ट में “कन्यादान” जरूरी नहीं है

सुभाष चंद्र  

अभी तक तो कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां सनातन के विरुद्ध विष फैलाते रहते हैं, लेकिन उसी पंक्ति में न्यायपालिका भी खड़ी हो गयी है, जो सनातन प्रेमियों को विवश कर रही है कि आदि काल से प्रचलित हिन्दू प्रथाओं के विरुद्ध विष उगलने के विरुद्ध खड़े हों। न्यायपालिका ज्ञान होना चाहिए कि सनातन में दो दान महान हैं, एक कन्यादान और दूसरा गौ दान। न्यायपालिका को ज्ञान होना चाहिए कि जिन हिन्दू परिवार में कन्या नहीं होती वो दूसरे परिवार में विवाह में कन्यादान की रस्म कर धन्य होते हैं। न्यायपालिका कौन से ज्ञान से हिन्दुओं को भ्रमित कर रही है। और जो न्यायधीश कन्यादान को जरुरी नहीं मानता, वह निश्चितरूप से भटका हुआ हिन्दू है। उसकी शिक्षा और पालनपोषण निश्चितरूप से हिन्दू संस्कारों में नहीं हुआ है। 

लेखक 
डर है कहीं किसी दिन पाखंडी जज आरती और हवन आदि के विरुद्ध ही निर्णय न देते। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को ही मानने के विरुद्ध निर्णय न दे दें। जनमानस न्यायपालिका में परमपिता परमेश्वर का रूप मानता है, जनमानस के इस विश्वास को कुचलने का क्यों प्रयास किया जा रहा है?

"कन्यादान" को जरुरी नहीं बताने वाले जज को नहीं मालूम कि सनातन धर्म अरबों वर्ष पुराना है, और यह प्रथा तभी से आज तक मान्य है। और भविष्य में प्रचलित रहेगी, जजों को भी इस प्राचीनतम प्रथा को अपनाना होगा, पीछे हटने का साहस नहीं पाएंगे। भूल जायेंगे सब निर्णय।   

किसी न्यायधीश में तीन तलाक और हलाला को ख़त्म करने की हिम्मत नहीं थी, ये हिम्मत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में ही है। न्यायधीशों को एक्स-मुस्लिमों से संपर्क रखना चाहिए, जिन्होंने खतना और अन्य कुरीतियों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया हुआ है। उनके तीखे सवालों का किसी मौलाना/मौलवी के पास जवाब नहीं। नूपुर शर्मा विवाद दिनों के Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' आदि देखने चाहिए।  

अभी 5 अप्रैल, 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल खंडपीठ ने हिंदू धर्म में सनातन काल से चल रही विवाह में “कन्यादान” की प्रथा पर ही कैंची चला कर कह दिया कि विवाह संपन्न कराने के लिए हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 7 के तहत  यह रस्म अनिवार्य परंपरा नहीं है 

हिन्दू मैरिज एक्ट हिंदुओं पर कुठाराघात करने के लिए जवाहर लाल नेहरू ने संसद से पास कराया था और कौन नहीं जानता कि भारतीय संस्कृति और सनातन रीति रिवाजों से नेहरू को सख्त नफरत थी विगत में यह विषय शायद अन्य अदालतों में भी गया है लेकिन अब जिस तरह इलाहाबाद हाई कोर्ट ने “कन्यादान” को गैर-जरूरी बता दिया, उससे लगता है वे भी हिंदू परंपराओं को कुचलने को  आतुर हैं

यह बात गौर करने की है कि हिंदू मैरिज एक्ट 1955 में लागू हुआ और तब से लेकर अब तक 75 वर्ष में सुप्रीम कोर्ट ने “कन्यादान” पर ज्ञान नहीं पेला जस्टिस विद्यार्थी ने अपने फैसले में कहा है कि सप्तपदी (अग्नि के चारों तरफ 7 फेरों और वचनों) की रस्म से विवाह संपन्न हो जाता है और कन्यादान जरूरी नहीं है

लेकिन IPC के section 497 को निरस्त करते हुए वर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने तो वैवाहिक संबंधो को संबंध होते हुए भी ख़त्म कर दिया था जब उन्होंने कहा था:-

Man is not owner of wife’s sexuality: 

‘She can make her own sexual choices’

इससे बड़ा सत्यानाश हिंदुत्व पर आधारित परिवारों में जीवन मूल्यों का हो नहीं सकता और अभी अगर ये मामला उनके पास जाता है तो क्या ज्ञान पेलेंगे कोई नहीं जानता

हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 7 कहती है 

(1) A Hindu marriage may be solemnized in accordance with the customary rites and ceremonies of either party thereto; 

(2) Where such rites and ceremonies include the Saptapadi (that is, the taking of seven steps by the bridegroom and the bride jointly before the sacred fire), the marriage becomes complete and binding when the seventh step is taken.

इस धारा के दोनों खंड एक साथ भी पढ़े जा सकते हैं और अमल में लाए जा सकते हैं खंड 2 में यदि सप्तपदी पूरा होने की बात की गई है तो कन्यादान की रस्म को विशेषतौर पर मना भी नहीं किया गया जबकि खंड 1 के अनुसार वह किसी एक पार्टी के Customary rites and ceremonies में शामिल है तो उसकी अनिवार्यता भी मान्य मानी जानी चाहिए

इस दृष्टि से हाई कोर्ट का फैसला दोषपूर्ण लगता है

ऐसी सब बातें न्यायपालिका हिंदू धार्मिक रीति रिवाजों के लिए बेधड़क करती है लेकिन अन्य धर्मों के Personal Laws पर बोलने से डर लगता है चाहे वे Laws किसी की हत्या करने की अनुमति ही क्यों न देते हों

बॉलीवुड सबसे ज्यादा हिंदू धार्मिक रिवाज़ों का मज़ाक उड़ाता है याद होगा आलिया भट्ट ने एक विज्ञापन में “कन्यादान” शब्द ही ख़त्म कर उसे नया रूप देकर “कन्यामान” कर दिया था

गूगल सर्च में दम ठोक कर कह रहे हैं कि वेदों में “कन्यादान” का जिक्र नहीं है जबकि अथर्ववेद के 14 वें कांड में इसका वर्णन है

भगवान राम सहित चारों भाइयों के विवाह के समय सीता सहित चारों बहनों का कन्यादान करना क्या राजा जनक की मूर्खता थी सनातन काल से चली आ रही मान्यताओं को किसी कोर्ट के जज खारिज करने का कोई अधिकार नहीं रखते 

हर बात पर कानून का चाबुक चलाने की कोशिश मत कीजिए कल को हिंदू समाज के भ्रष्ट राजनीतिक लोग “कन्यादान” को बाल विवाह और सती प्रथा की तरह “कुप्रथा” बता कर तांडव कर देंगे और आपके कोर्ट के फैसले का  ज्ञान पेलते रहेंगे

वैदिक युग में क्या कहते थे होली को?

'नवान्नेष्टि यज्ञ' यानी होली 

वैदिक युग में होली को 'नवान्नेष्टि यज्ञ' कहा गया था, क्योंकि यह वह समय होता है, जब खेतों में पका हुआ अनाज काटकर घरों में लाया जाता है। जलती होली में जौ और गेहूं की बालियां तथा चने के बूटे भूनकर प्रसाद के रूप में बांटे जाते हैं। होली की अग्नि में भी बालियां होम की जाती हैं।

यह लोक-विधान अन्न के परिपक्व और आहार के योग्य हो जाने का प्रमाण है इसलिए वेदों में इसे 'नवान्नेष्टि यज्ञ' कहा गया है यानी यह समय अनाज के नए आस्वाद के आगमन का समय है। यह नवोन्मेष खेती और किसानी की संपन्नता का द्योतक है, जो ग्रामीण परिवेश में अभी भी विद्यमान है। इस तरह यह उत्सवधर्मिता आहार और पोषण का भी प्रतीक है, जो धरती और अन्न के सनातन मूल्यों को एकमेव करती है।
होली का सांस्कृतिक महत्व : होली का सांस्कृतिक महत्व 'मधु' अर्थात 'मदन' से भी जुड़ा है। संस्कृत और हिन्दी साहित्य में इस मदनोत्सव को वसंत ऋतु का प्रेम-आख्यान माना गया है। वसंत यानी शीत और ग्रीष्म ऋतु की संधि-वेला अर्थात एक ऋतु का प्रस्थान और दूसरी का आगमन।

यह वेला एक ऐसा प्राकृतिक परिवेश रचती है, जो मधुमय होता है, रसमय होता है। मधु का ऋग्वेद में खूब उल्लेख है, क्योंकि इसका अर्थ ही है संचय से जुटाई गई मिठास। मधुमक्खियां अनेक प्रकार के पुष्पों से मधु को जुटाकर एक स्थान पर संग्रह करने का काम करती हैं। जीवन में मधु-संचय के लिए यह संघर्ष जीवन को मधुमय, रसमय बनाने का काम करता है।

'मदनोत्सव : होली पर्व को 'मदनोत्सव' भी कहा गया है, क्योंकि इस रात को चन्द्रमा अपने पूर्ण आकार में होता है। चन्द्रमा के इसी शीतल आलोक में भारतीय स्त्रियां अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना करती हैं। लिंग-पुराण में होली त्योहार को 'फाल्गुनिका' की संज्ञा देकर इसको बाल-क्रीड़ा से जोड़ा गया है।

मनु का जन्म फाल्गुनी को हुआ था इसे 'मन्वादि तिथि' भी कहा जाता है। इसके साथ ही भविष्य-पुराण में भूपतियों से आवाहन किया गया है कि वे इस दिन अपनी प्रजा के भयमुक्त रहने की घोषणा करें, क्योंकि यह ऐसा अनूठा दिन है जिस दिन लोग अपनी पूरे एक साल की सभी कठिनाइयों को प्रतीकात्मक रूप से होली में फूंक देते हैं। इन कष्टों को भस्मीभूत करके उन्हें जो शांति मिलती है, उसे पूरे साल अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए ही भविष्यपुराण में राजाओं से अपनी प्रजा को अभयदान देने की बात कही गई है।

भारतीय कुटुम्ब की भावना इस दर्शन में अंतरनिहित है यानी होली के सांस्कृतिक महत्व का दर्शन नैतिक, धार्मिक और सामाजिक आदर्शों को मिलाकर एकरूपता गढ़ने का काम करता है। कुल मिलाकर होली के पर्व की विलक्षणता में कृषि, समाज, अर्थ और सद्भाव के आयाम एकरूप हैं। इसलिए यही एक अद्वितीय त्योहार है, जो कि सृजन के बहुआयामों से जुड़ा होने के साथ-साथ सामुदायिक बहुलता के आयाम से भी जुड़ा हुआ है।

होली को पावन त्यौहार आज कछु ऐसे मनाऊँगी।

लगाकर सबके चंदन माथे,

सौम्य हो जाऊंगी।

बड़ों को करके ॐ नमस्ते, छोटों को हृदय लगाऊंगी।

नवान्न आटे की गुजिया बना,

प्रसाद बनाऊंगी।

वृहद यज्ञ सामूहिक कर के

नौत खिलाऊंगी।

उंच नीच का भेद भुलाकर,

प्रीति निभाऊंगी

उत्तम पेय पिला ठंडाई,

फाग गवाऊँगी।

पूरे वर्ष की लगी गन्दगी,

मैल छुटाऊँगी,

“विमल” वेद के पक्के रंग से,

रंगूं रंगाऊंगी।

होली को पावन त्यौहार,

आज कछु ऐसे मनाऊंगी।।
विमलेश बंसल ‘आर्या’

#वैदिक_पद्धति_के_अनुसार_होली_कैसे_मनायें

तदनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा- प्रातःजागरण – प्रातः जागरण के मंत्रों के साथ योगाभ्यास – प्राणायाम, आसन, ध्यान और भ्रमण करना। स्नान – रात्रि को पानी में पलाश के फूल, गुलाब फूलों की पंखुड़ियों को भिगो कर रखना और प्रातः काल उससे स्नान करना।

आयुर्वेद – खाली पेट नीम की कोमल पत्तियों का १५ दिन तक सेवन करना, नीम पर जो फूल आते हैं उसका सब्जी में प्रयोग करना और नीम की दातुन करना

उपासना – ध्यान, संध्या अथवा गायत्री का जप करना

देवपूजा – नवसस्येष्टि (यज्ञ) फाल्गुन पूर्णिमा को अपने-अपने घरों में वैदिक विद्वानों को बुलाकर यज्ञ करना।

विशेष सामग्री – हवन सामग्री में गेहूं की नई बाल, हरा-चना, मसूर, मूंग, अरहर, तिलहन, १०-१०ग्राम की मात्रा में मिलाना, धान की खिले लाजा (खोई) 50 ग्राम, खांड या बुरा अथवा गुड़ 50 ग्राम मिलाना इसका तात्पर्य यह है कि रवि की जो फसलें आई है उनका सबसे पहला अधिकार देवताओं को का होता है। देवताओं को उनका पहला भाग देना। वैदिक संस्कृति का पालन करना।

मोहनभोग – स्थालीपाक केसर युक्त मीठे चावल बनाना, खीरानंद दूध डालकर मोटी खीर बनानी और बृहद यज्ञविधि के पवमान वाले मन्त्रो से आहुतियां देवें।

सोमपान (अमृत) – यज्ञ के पश्चात गिलोय की टहनी का रस निकालकर १०० ग्राम रस में 30 ग्राम शहद मिलाकर हवन में उपस्थित लोगों को पान कराना जिससे वर्ष पर बुखार और दूसरी व्याधि ना हो।

दान एवं सहायता – होलिकोत्सव पर वेदों का प्रचार करने वाले पुरोहित, आचार्य, विद्वान, सन्यासी तथा गुरूकुलों, गौशाला, अनाथालय का यथासंभव सहायता करना

सामाजिक कृत्य – अपने अपने संस्थान, संगठन से जुड़े हुए समाजों के द्वारा विभिन्न कार्यक्रम कविता, भजन, प्रीति सम्मेलन, हास्य कविताएं (किंतु अश्लील ना हो) का आयोजन करना। परस्पर मिल कर एक दूसरे को शुभकामनाएं देना, दूर स्थित अपने मित्रों परिजनों को दूरभाष के द्वारा शुभकामनाएं प्रदान करना फोन करके उनका हाल चाल एवं स्वास्थ्य पूछना। परिवार समाज एवं व्यापार से संबंधित लोगों के साथ हुए गिले-शिकवे दूर करना, वैमनस्य ईर्ष्या के भाव को दूर करना, प्रेम एवं भाईचारा बढ़ाना, समाज के पिछड़े तबके एवं उपेक्षित लोगों को सम्मानित करना, उन्हें मुख्यधारा में लाने के लिए प्रयास करना।

होली जलाना- होली जलाना यद्यपि हवन का अपभ्रंश है बड़े-बड़े हवन का बिगड़ा हुआ रुप है तथापि उसको सुन्दर ढंग से करने में कोई हानि नही है जैसे सुगंधित पदार्थ गाय का घी, केसर, जायफल, जावित्री, लौंग, इलायची, तेजपत्ता, दालचिनी, सुखे मेवे, ताल मखाना, सुखा नारियल, गुग्गुल, चन्दन, धूप उपरोक्त हवन सामग्री एवं विशेष सामग्री में लिखे पदार्थ यथासंभव डाले जिससे बड़े पैमाने पर पर्यावरण शुद्ध हो। लोगों को दूसरों की लकड़ी नही चुरानी चाहिए। लकडी में सिर्फ आम, बेल, बड़, पीपल, पलाश की ही होनी चाहिए इसका विशेष रुप से ध्यान रखना चाहिए। कपूर का प्रयोग सिर्फ अग्नि जलाने के लिये करें।

रंगो की होली : 2 मार्च शुक्रवार को अच्छे पुष्प जैसे पलाश के फूल, गुलाब के फूल, चंपा, चमेली इत्यादि से बने गुलाल का प्रयोग करना। हानिकारक केमिकल वाले रंगों का बहिष्कार करना। जिसकी इच्छा न हो उनको जबरदस्ती रंग न लगाना। अगर लगा भी दिया तो कहना – “होली है भाई होली है बुरा न मानो होली है” किंतु महिलाओं के साथ अभद्रता नहीं करना, उनके सम्मान का ध्यान रखना।

बड़ी जिम्मेदारी के साथ, सोच समझकर के होली के वैदिक स्वरूप को लिखा गया है । आप लोगों को अवश्य अच्छा लगा होगा इसलिए, आइए परंपरागत अंधविश्वास पाखंड से ऊपर उठकर के होली के वैज्ञानिक एवं तर्कसंगत तथा आयुर्वेद से संबंधित भौगोलिक दृष्टि से संबंधित स्वरूप को समझें, समाज में जागरूकता बढ़ाएं और ऐसे ही व्यस्त रहिए स्वस्थ रहिए मस्त रहिए।  

"वीर हकीकत के बलिदान की प्रासांगिकता” पर गोष्ठी संपन्न : देश धर्म के बलिदानी अमर रहते हैं -आचार्या श्रुति सेतिया


अमन आर्य, उगता भारत, गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश  

आज कितने युवा हैं जो युवा "वीर हकीकत राय" के नाम से परिचित होंगे? वर्तमान आबादी का केवल प्रतिशत। जिसका दोषी कोई और नहीं बल्कि आज़ादी से पूर्व और बाद की समस्त सरकारें जिम्मेदार हैं। जिन्हे अपनी कुर्सी और तिजोरी प्यारी थी, भारतीय संस्कृति और प्रतिष्ठा नहीं। "वीर हकीकत राय" हिन्दू धर्म के लिए तुम्हारा बलिदान व्यर्थ नहीं जाएगा, जब तक आकाश में चाँद तारे रहेंगे, सनातन धर्म में आपका नाम अमर नहीं जीवित रहेगा। इनका बलिदान पढ़ आँखों से अश्रु बहने लगते हैं। उनके साथ इतनी क्रूरता करने वाले मुग़ल आक्रांता थे, जिन्हें छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेताओं और उनकी पार्टियों ने महान बादशाह बता समस्त देश को भ्रमित किया।  

केन्द्रीय आर्य युवक परिषद् के तत्वावधान में गाजियाबाद,सोमवार 5 फरवरी 2024, को ‘वीर हकीकत के बलिदान की प्रासांगिकता ” विषय पर ऑनलाइन गोष्ठी का आयोजन किया गया। यह  कोरोना काल से 615 वां वेबिनार था।

वैदिक विदुषी आचार्या श्रुति सेतिया ने कहा कि यूं तो सभी लोग इस नश्वर जगत में पैदा होते हैं,जीते हैं और अंत में मर जाते हैं,पर उन्हीं का जीना और मरना सार्थक होता है जो देश,जाति और धर्म के लिए जीते और मरते हैं। वास्तव में ऐसे ही मनुष्य सच्चे वीर हैं क्योंकि उनका अंत हो जाने पर भी उनकी अमर कीर्ति, उनकी शहादत कभी नहीं भुलाई जा सकती है। वे स्वयं मर कर जाति को अमर कर जाते हैं। ऐसे ही वीरात्मा शहीदो में बालक हकीकत राय का नाम भी स्वर्ण अक्षरों में अंकित है। इस बालक ने अपनी जान,धर्म के लिए कुर्बान कर दी परंतु इस्लाम धर्म कुबूल नही किया। जब जिस जाति का राज्य होता है,वह जाति अपने धार्मिक सिद्धांतो को सर्वोपरि समझती है। उस समय भारत में मुसलमानों का शासन था। शांति प्रिय हिंदू लोग जबरदस्ती मुसलमान बनाए जाते थे।जो मुसलमान नहीं बनते वे निर्दयता से मार डाले जाते थे।वीर बालक हकीकत राय के समक्ष यही समस्या उपस्थित थी।हकीकत राय को रसूल और कुरान की तौहीन करने की सजा के रूप में मौत के घाट उतार दिया गया।वीर बालक अमरत्व का बीज अपनी आत्मा में धारण किए हुए मृत्यु का प्याला पीने को तैयार हो गया। खुशी खुशी अपने प्राणों की बलि दे दी परंतु इस्लाम धर्म कदापि स्वीकार नहीं किया।बाल हकीकत राय अपने धर्म पर कुर्बान हो गया।इसके बाद लाहौर में हकीकत राय की समाधि बनाई गई।मुसलमानों का शासन अब ना रहा,पर धर्म के लिए बलिदान होने वाले हकीकत राय का नाम आज भी जीवित है और जब तक इस पृथ्वी तल पर हिंदू जाति जीवित है तब तक राम और कृष्ण के प्यारे भक्त हकीकत राय का नाम अमर रहेगा।
मुख्य अतिथि आर्य नेत्री सोनियां आनंद व अध्यक्ष राजश्री यादव ने भी उनके बलिदान की चर्चा कर श्रद्धांजलि अर्पित की।

परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष अनिल आर्य ने कुशल संचालन किया उन्होंने कहा कि जो देश धर्म के लिए जीते हैं वह सदा अमर रहते हैं।राष्ट्रीय मंत्री प्रवीण आर्य ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

गायिका कुसुम भंडारी, पिंकी आर्य, प्रवीना ठक्कर, कमला हंस, नरेंद्र आर्य सुमन, विजय खुल्लर, संतोष धर, कौशल्या अरोड़ा, जनक अरोड़ा, प्रतिभा कटारिया आदि के मधुर भजन हुए।

शिव का त्रिशूल और इसकी विशेषता

प्रत्येक प्राणी के जीवन में त्रिशूल, ॐ और स्वातिक का उतना ही महत्व है, जितना देवी-देवताओं द्वारा त्रिशूल का धारण करना। ॐ उच्चारण करने से प्राणी की एक-एक नाड़ी हरकत में आने से कई गुप्त बिमारियों का भी निदान होता है, जिनका हमें ज्ञान भी नहीं होता। स्वस्तिक हर शुभ काम में बनाया जाता है। ॐ और स्वस्तिक केवल प्रतीक ही नहीं, बल्कि इनमे हर देवी-देवता का समायोजन होता है। इसी तरह त्रिशूल का भी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन हम अज्ञानतावश केवल शिव का शस्त्र मानते हैं।  
शिव का त्रिशूल जीवन के तीन मूल पहलुओं को दर्शाता है। योग परंपरा में उसे रुद्र, हर और सदाशिव कहा जाता है। ये जीवन के तीन मूल आयाम हैं, जिन्हें कई रूपों में दर्शाया गया है। उन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना भी कहा जा सकता है। ये तीनों प्राणमय कोष यानि मानव तंत्र के ऊर्जा शरीर में मौजूद तीन मूलभूत नाड़ियां हैं – बाईं, दाहिनी और मध्य। नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है। तीन मूलभूत नाड़ियों से 72,000 नाड़ियां निकलती हैं। इन नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें नहीं खोज सकते। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह तय रास्तों से गुजर रही है। प्राण या ऊर्जा 72,000 विभिन्न रास्तों से होकर गुजरती है। इड़ा और पिंगला जीवन के बुनियादी द्वैत के प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू तर्क-बुद्धि और सहज-ज्ञान हो सकते हैं।

जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा अभी है। सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता है, उसमें द्वैतता आ जाती है। पुरुषोचित और स्त्रियोचित का मतलब लिंग भेद से – या फिर शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से – नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं। अगर आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे अहम पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, जीवन असल में तभी शुरू होता है। आप एक नए किस्म का संतुलन पा लेते हैं, एक अंदरूनी संतुलन, जिसमें बाहर चाहे जो भी हो, आपके भीतर एक खास जगह बन जाती है, जो किसी भी तरह की हलचल में कभी अशांत नहीं होती, जिस पर बाहरी हालात का असर नहीं पड़ता। आप चेतनता की चोटी पर सिर्फ तभी पहुंच सकते हैं, जब आप अपने अंदर यह स्थिर अवस्था बना लें।