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न्यायपालिका भी क्या हिंदू धर्म में सनातन काल से चल रही प्रथाओं को कुचलना चाहती है; किसी ने 75 साल से क्यों नहीं कहा हिन्दू मैरिज एक्ट में “कन्यादान” जरूरी नहीं है

सुभाष चंद्र  

अभी तक तो कुर्सी के भूखे नेता और उनकी पार्टियां सनातन के विरुद्ध विष फैलाते रहते हैं, लेकिन उसी पंक्ति में न्यायपालिका भी खड़ी हो गयी है, जो सनातन प्रेमियों को विवश कर रही है कि आदि काल से प्रचलित हिन्दू प्रथाओं के विरुद्ध विष उगलने के विरुद्ध खड़े हों। न्यायपालिका ज्ञान होना चाहिए कि सनातन में दो दान महान हैं, एक कन्यादान और दूसरा गौ दान। न्यायपालिका को ज्ञान होना चाहिए कि जिन हिन्दू परिवार में कन्या नहीं होती वो दूसरे परिवार में विवाह में कन्यादान की रस्म कर धन्य होते हैं। न्यायपालिका कौन से ज्ञान से हिन्दुओं को भ्रमित कर रही है। और जो न्यायधीश कन्यादान को जरुरी नहीं मानता, वह निश्चितरूप से भटका हुआ हिन्दू है। उसकी शिक्षा और पालनपोषण निश्चितरूप से हिन्दू संस्कारों में नहीं हुआ है। 

लेखक 
डर है कहीं किसी दिन पाखंडी जज आरती और हवन आदि के विरुद्ध ही निर्णय न देते। ब्रह्मा, विष्णु और महेश को ही मानने के विरुद्ध निर्णय न दे दें। जनमानस न्यायपालिका में परमपिता परमेश्वर का रूप मानता है, जनमानस के इस विश्वास को कुचलने का क्यों प्रयास किया जा रहा है?

"कन्यादान" को जरुरी नहीं बताने वाले जज को नहीं मालूम कि सनातन धर्म अरबों वर्ष पुराना है, और यह प्रथा तभी से आज तक मान्य है। और भविष्य में प्रचलित रहेगी, जजों को भी इस प्राचीनतम प्रथा को अपनाना होगा, पीछे हटने का साहस नहीं पाएंगे। भूल जायेंगे सब निर्णय।   

किसी न्यायधीश में तीन तलाक और हलाला को ख़त्म करने की हिम्मत नहीं थी, ये हिम्मत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी में ही है। न्यायधीशों को एक्स-मुस्लिमों से संपर्क रखना चाहिए, जिन्होंने खतना और अन्य कुरीतियों पर ही प्रश्नचिन्ह लगाया हुआ है। उनके तीखे सवालों का किसी मौलाना/मौलवी के पास जवाब नहीं। नूपुर शर्मा विवाद दिनों के Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' आदि देखने चाहिए।  

अभी 5 अप्रैल, 2024 को इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच के जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकल खंडपीठ ने हिंदू धर्म में सनातन काल से चल रही विवाह में “कन्यादान” की प्रथा पर ही कैंची चला कर कह दिया कि विवाह संपन्न कराने के लिए हिन्दू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 7 के तहत  यह रस्म अनिवार्य परंपरा नहीं है 

हिन्दू मैरिज एक्ट हिंदुओं पर कुठाराघात करने के लिए जवाहर लाल नेहरू ने संसद से पास कराया था और कौन नहीं जानता कि भारतीय संस्कृति और सनातन रीति रिवाजों से नेहरू को सख्त नफरत थी विगत में यह विषय शायद अन्य अदालतों में भी गया है लेकिन अब जिस तरह इलाहाबाद हाई कोर्ट ने “कन्यादान” को गैर-जरूरी बता दिया, उससे लगता है वे भी हिंदू परंपराओं को कुचलने को  आतुर हैं

यह बात गौर करने की है कि हिंदू मैरिज एक्ट 1955 में लागू हुआ और तब से लेकर अब तक 75 वर्ष में सुप्रीम कोर्ट ने “कन्यादान” पर ज्ञान नहीं पेला जस्टिस विद्यार्थी ने अपने फैसले में कहा है कि सप्तपदी (अग्नि के चारों तरफ 7 फेरों और वचनों) की रस्म से विवाह संपन्न हो जाता है और कन्यादान जरूरी नहीं है

लेकिन IPC के section 497 को निरस्त करते हुए वर्तमान चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने तो वैवाहिक संबंधो को संबंध होते हुए भी ख़त्म कर दिया था जब उन्होंने कहा था:-

Man is not owner of wife’s sexuality: 

‘She can make her own sexual choices’

इससे बड़ा सत्यानाश हिंदुत्व पर आधारित परिवारों में जीवन मूल्यों का हो नहीं सकता और अभी अगर ये मामला उनके पास जाता है तो क्या ज्ञान पेलेंगे कोई नहीं जानता

हिंदू मैरिज एक्ट, 1955 की धारा 7 कहती है 

(1) A Hindu marriage may be solemnized in accordance with the customary rites and ceremonies of either party thereto; 

(2) Where such rites and ceremonies include the Saptapadi (that is, the taking of seven steps by the bridegroom and the bride jointly before the sacred fire), the marriage becomes complete and binding when the seventh step is taken.

इस धारा के दोनों खंड एक साथ भी पढ़े जा सकते हैं और अमल में लाए जा सकते हैं खंड 2 में यदि सप्तपदी पूरा होने की बात की गई है तो कन्यादान की रस्म को विशेषतौर पर मना भी नहीं किया गया जबकि खंड 1 के अनुसार वह किसी एक पार्टी के Customary rites and ceremonies में शामिल है तो उसकी अनिवार्यता भी मान्य मानी जानी चाहिए

इस दृष्टि से हाई कोर्ट का फैसला दोषपूर्ण लगता है

ऐसी सब बातें न्यायपालिका हिंदू धार्मिक रीति रिवाजों के लिए बेधड़क करती है लेकिन अन्य धर्मों के Personal Laws पर बोलने से डर लगता है चाहे वे Laws किसी की हत्या करने की अनुमति ही क्यों न देते हों

बॉलीवुड सबसे ज्यादा हिंदू धार्मिक रिवाज़ों का मज़ाक उड़ाता है याद होगा आलिया भट्ट ने एक विज्ञापन में “कन्यादान” शब्द ही ख़त्म कर उसे नया रूप देकर “कन्यामान” कर दिया था

गूगल सर्च में दम ठोक कर कह रहे हैं कि वेदों में “कन्यादान” का जिक्र नहीं है जबकि अथर्ववेद के 14 वें कांड में इसका वर्णन है

भगवान राम सहित चारों भाइयों के विवाह के समय सीता सहित चारों बहनों का कन्यादान करना क्या राजा जनक की मूर्खता थी सनातन काल से चली आ रही मान्यताओं को किसी कोर्ट के जज खारिज करने का कोई अधिकार नहीं रखते 

हर बात पर कानून का चाबुक चलाने की कोशिश मत कीजिए कल को हिंदू समाज के भ्रष्ट राजनीतिक लोग “कन्यादान” को बाल विवाह और सती प्रथा की तरह “कुप्रथा” बता कर तांडव कर देंगे और आपके कोर्ट के फैसले का  ज्ञान पेलते रहेंगे

मंच पर बैठे मंत्री जयंत पाटिल और धनंजय मुंडे के सामने NCP नेता अमोल मितकारी ने खुलेआम हिंदू रीति-रिवाजों का उड़ाया मजाक

                            अमोल मितकारी द्वारा पुजारी की नकल करने पर ठहाका लगाते धनंजय मुंडे
महाराष्ट्र (Maharashtra) में हिंदुओं (Hindus) का लगातार मजाक उड़ाया जा रहा है। राज्य में शरद पवार (Sharad Pawar) की पार्टी एनसीपी के एमएलसी अमोल मितकारी (NCP MLC Amol Mitkari) ने 19 अप्रैल 2022 को पश्चिम महाराष्ट्र के सांगली जिले के इस्लामपुर में एनसीपी परिवार संवाद यात्रा के दौरान रैली में शादियों में किए जाने वाले कन्यादान और हिंदू रीति-रिवाजों का मखौल उड़ाया। यहीं नहीं, उन्होंने झूठे मंत्र और उनके झूठे अर्थ भी बताकर ब्राह्मणों को अपमानित किया।

 

दरअसल, लाउडस्पीकर से अजान विवाद के बीच मनसे चीफ राज ठाकरे (MNS Chief Raj Thackeray) ने राज्य सरकार को सख्त चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था कि अगर सरकार मस्जिदों में लाउडस्पीकरों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करती है तो उनकी पार्टी अजान की तुलना में दोगुनी आवाज में मस्जिदों के सामने हनुमान चालीसा बजाएगी। इस बीच अब राज ठाकरे को जबाव देने के लिए अमोल मितकारी ने सबसे पहले हनुमान चालीसा का पाठ किया और कहा, “राज ठाकरे को हमें हमारे धर्म का प्रचार करने की आवश्यकता नहीं है। लाउडस्पीकर लगाने से पहले उन्हें पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि क्या वह हनुमान चालीसा का पाठ कर सकते हैं। मुझे पूरी हनुमान चालीसा याद है और मैं इसका पाठ कर सकता हूँ।”

मितकारी ने हनुमान चालीसा के कुछ छंदों को पढ़ा भी। इस पर उनकी प्रशंसा करते हुए एनसीपी के प्रदेश अध्यक्ष और महाराष्ट्र सरकार में मंत्री जयंत पाटिल (Jayant Patil) ने उन्हें मारुति स्तोत्रम का पाठ करने के लिए कहा। इस पर मितकारी ने मारुति स्त्रोतम की जगह रामरक्षा स्तोत्रम का एक श्लोक पठा, जिसमें भगवान हनुमान का वर्णन किया गया है। जब इसके लिए उनकी तारीफ हुई तो उन्होंने संक्षिप्त रामायण के श्लोक का पाठ किया। इसमें केवल चार पंक्तियों में भगवान राम की पूरा कथा का वर्णन किया गया है। इसके अंत में मितकारी ने पुजारी की नकल करते हुए कहा, “अपनी आँखों में जल डाल दो।”

इतना सुनते ही मंच पर बैठे जयंत पाटिल और एनसीपी नेता धनंजय मुंडे ठहाके मार के हँसने लगे। हिंदू परंपराओं के प्रति अपनी नफरत को जाहिर करते हुए मितकारी ने कहा, “यह ऐसे किया जाता है। कौन जाने हमारा बहुजन समाज इससे कब उबरेगा?” वो यहीं नहीं रुके। हिंदुओं के प्रति अपनी भड़ास निकालते हुए एनसीपी नेता ने आगे कहा, “आचमन करो। जल छोड़ दो।”

मितकारी ने धनंजय मुंडे को संबोधित करते हुए कहा, “मुंडे साहब, एक बार मैं एक जगह गया था। कन्यादान की रस्म अदा की जा रही थी। लड़की के पिता ने मुझे कुछ देर बैठने को कहा। उन्होंने कहा कि कुछ देर बैठिए कन्यादान चल रहा है। मैंने उनसे पूछा सर, मैंने अन्नदान (भोजन दान), नेत्रदान, रक्तदान आदि के बारे में सुना है। क्या बेटी दान की वस्तु है? उन्होंने कहा कि हाँ बस ऐसे ही है। हमें इस तरह सिखाया गया है। जैसे ही उन्होंने मुझे बैठने के लिए कहा, मैं वहीं एक कुर्सी पर बैठ गया।”

एनसीपी नेता ने कहा, “दूल्हा पीएचडी था और दुल्हन एमए थी।” पुजारी की नकल उतारते हुए अमोल मितकारी ने कहा, “धूपं दीपं नैवेद्यं नमस्कारम। जल को आँखों से लगाओ।” लगातार मंत्रों का जाप करते हुए मितकारी ने कहा, “अपना हाथ मेरे हाथ में दो। अपनी पत्नी का हाथ मेरे हाथ में दो। इसके बाद पुजारी कहता है मैं जो कहूँ वो कहो, मैं अपनी पत्नी को आपको समर्पित करता हूँ। मैं उस दूल्हे के कानों में बुदबुदाया। तुम एक बेवकूफ हो! वह पुजारी आपकी पत्नी को ले जाने के लिए कह रहा है।”

हिंदू परंपराओं का मजाक बनाते हुए अमोल मितकारी ने कहा, “ये लोग आज हनुमान चालीसा के बारे में हमें बता रहे हैं। मेरे भाषण के बाद कई और नेता बोलेंगे। साहेब, अब मैं उद्यापन करूँगा। बस मुझे उचित दक्षिणा मिलनी चाहिए। जैसे ही दक्षिणा मिलेगी मैं गायब हो जाऊँगा।” मितकारी का कहना था कि पुजारी को केवल दक्षिणा चाहिए, बस।

कन्यादान पर फैलाया झूठ

सनातन परंपरा में कन्यादान का बड़ा महत्व है। कन्यादान संस्कृत शब्द है, जो कन्या+आदान से मिलकर बना है। इसमें कन्या का अर्थ लड़की है तो आदान का अर्थ प्राप्त करना होता है। अर्थात शादी समारोहों में विवाह के दौरान दूल्हा अपने परिवार में लड़की को प्राप्त करने के लिए सहमत होता है। हालाँकि, मितकारी ने इसे किसी प्रकार का दान समझकर महिलाओं का विरोध किया।

इतना ही नहीं, एनसीपी के एमएलसी ने हाथ में हाथ लेने की बात पर झूठ फैलाया। विवाह की रस्मों के संकल्प की शुरुआत करते हुए दुल्हन, उसके माता-पिता और दूल्हा हाथों को मिलाते हैं। अमोल मितकारी ने झूठ फैलाया कि पुजारी जोड़े का हाथ अपने हाथ में लेता है और दूल्हे को अपनी पत्नी को पुजारी को सौंपने के लिए कहता है।