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कैसे पड़ा त्रिपुरारी नाम भगवान शिव का


तारक पुत्रो के साथ हुआ युद्ध. सभी देवतागण ब्रह्मा और विष्णु को साथ में लेकर शिवजी की शरण में चले गए और शिवजी से तारकासुर के पुत्रों के विनाश के लिए प्राथना की. उस समय शिवजी ने देवताओं से कहा जब तक वह तीन महान दैत्य मेरे भक्त है में उनका अहित नहीं करूँगा फिर भी वह तीनो मेरी भक्ति से बलवान होकर सृष्टि में अधर्म का फैलाव कर रहे है इसलिए तुम सब मिलकर ऐसा कुछ उपाय करो कि वह तीनों मेरी भक्ति से विमुख हो जाए।

शिवजी की आज्ञा के अनुसार देवताओं का यह कार्य करने के लिए भगवान विष्णु ने एक सुंदर दिव्य स्वरूप धारण किया. वह मुनि वेश में तीनो नगरों में गए और वहां वेदों के विरुद्ध उपदेश किया. उन नगरों के असुरों को अपने वाणी से शिव भक्ति से दूर कर दिया. उस वेद विरुद्ध उपदेश से प्रभावित होकर उन नगरों की स्त्रियों ने पतिव्रत धर्म छोड़ दिया. जब वह तीनो नगर शिव भक्ति से विमुख हो गए तब पुनः देवता गण शिवजी की पास आये और उन्हें उन तीन असुरों का उनके नगर के साथ नष्ट करने के लिए प्राथना की।
उस समय शिवजी ने देवताओं से कहा यद्यपि वह तीन असुर मेरी भक्ति से विमुख हुए है परंतु एक समय था वह मेरे परम भक्त है. इसलिए में उनका विनाश क्यों करू उनका विनाश भगवान विष्णु को करना चाहिए जिन्होंने उन्हें मेरी भक्ति से विमुख किया है. उस समय सभी देवता उदास हो गए. यह देखकर ब्रह्माजी ने शिवजी से कहा है प्रभु आप हम सब के राजा है. भगवान विष्णु आप के युवराज है और में आप का पुरोहित हूँ. यह सब देवता आप की प्रजा है जो आप की शरण में आई है. मेरे वरदान के अनुसार उन तीन असुर आप के आलावा सभी के लिए अवध्य है. इसलिए हम सब की रक्षा करे और उन असुरों का वध करे।
ब्रह्मा की बात सुनकर शिवजी ने मुस्कराते हुए कहा आप मुझे राजा कह रहे है परंतु मेरे पास कोई ऐसा रथ नहीं जो राजा के पास होता है और न ही मेरे पास कोई राजा के योग्य शस्त्र है. में उनका विनाश कैसे करू. उस समय ब्रह्माजी की आज्ञा से शिवजी से लिए एक दिव्य रथ का निर्माण करवाया गया. वह रथ सोने का बना हुआ था. उसके दाहिने चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विद्यमान थे. अंतरीक्ष उस रथ का ऊपर का भाग था और मंदराचल उस रथ का बैठने का स्थान था. ब्रह्माजी उस रथ के सारथि बने. हिमालय से धनुष बनाया गया और वासुकी को प्रत्यंचा बनाया गया. भगवान विष्णु उस धनुष के बाण और अग्नि उस बाण की नोक बने. वेद उस रथ के अश्व बन गए. संसार में जो भी कुछ तत्व तह वह सभी उस रथ में मौजूद थे ।
उस समय ब्रह्माजी ने भगवान शिव से रथ पर सवार होने के लिए प्राथना की. शिव के सवार होते ही वह रथ शिव के भार से निचे झुक गया. वेदरूपी अश्व शिवजी का भार सहन न कर पाए और जमीन पर बैठ गए. सबको लगा कोई भूकंप आ गया है. उस समय नंदी जी वहां पर उपस्थित हुए और उस रथ के निचे जाकर शिवजी के भार को स्वयं सहन करने लगे. वह भी बड़ी मुश्किल से शिवजी की कृपा से शिवजी का भार सहन कर सके।
उस समय भगवान शिव की आज्ञा से सभी देवतागण पशुभाव में स्थित हो गए. भगवान शिव उनके अधिपति हुए इसलिए उन्हें पशुपति भी कहा जाता है. उसके बाद ब्रह्मा ने उस रथ को हांकना शुरू किया परंतु वह रथ आगे नहीं बढ़ा तब शिव की आज्ञा से सभी देवताओं ने विघ्न को दुर करने वाले गणनायक गणपति से प्राथना की और वह रथ आगे बढ़ने लगा।
उसके बाद जब भगवान शिव ने अपना रौद्र स्वरूप धारण किया. उस समय संयोग वश वह तीनो नगर एक ही रेखा में बने हुए थे. शिव ने वह हिमालय स्वरूप धनुष पर विष्णु स्वरूप बाण का संधान किया. बाण के संधान करते ही शिवजी के क्रोध से प्रभावित होकर वह तीनो नगर जलने लगे. शिवजी के उस महान धनुष के द्वारा एक ही बाण में तारकासुर के तीनो पुत्रो का संहार हो गया. शिवजी की कृपा से उन तीनो असुरों को मोक्ष की प्राप्ति हुई. देवताओं का कार्य भी सिद्ध हुआ. उन तीन नगर में जो लोग शिव की भक्ति से विमुख नहीं हुए थे उनकी शिवजी ने रक्षा की. इस तरह भगवान शिव ने तारकासुर के तीनो असुरो का अंत किया और त्रिपुरारी कहलाये।

शिव का त्रिशूल और इसकी विशेषता

प्रत्येक प्राणी के जीवन में त्रिशूल, ॐ और स्वातिक का उतना ही महत्व है, जितना देवी-देवताओं द्वारा त्रिशूल का धारण करना। ॐ उच्चारण करने से प्राणी की एक-एक नाड़ी हरकत में आने से कई गुप्त बिमारियों का भी निदान होता है, जिनका हमें ज्ञान भी नहीं होता। स्वस्तिक हर शुभ काम में बनाया जाता है। ॐ और स्वस्तिक केवल प्रतीक ही नहीं, बल्कि इनमे हर देवी-देवता का समायोजन होता है। इसी तरह त्रिशूल का भी हमारे जीवन में महत्वपूर्ण योगदान है। लेकिन हम अज्ञानतावश केवल शिव का शस्त्र मानते हैं।  
शिव का त्रिशूल जीवन के तीन मूल पहलुओं को दर्शाता है। योग परंपरा में उसे रुद्र, हर और सदाशिव कहा जाता है। ये जीवन के तीन मूल आयाम हैं, जिन्हें कई रूपों में दर्शाया गया है। उन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना भी कहा जा सकता है। ये तीनों प्राणमय कोष यानि मानव तंत्र के ऊर्जा शरीर में मौजूद तीन मूलभूत नाड़ियां हैं – बाईं, दाहिनी और मध्य। नाड़ियां शरीर में उस मार्ग या माध्यम की तरह होती हैं जिनसे प्राण का संचार होता है। तीन मूलभूत नाड़ियों से 72,000 नाड़ियां निकलती हैं। इन नाड़ियों का कोई भौतिक रूप नहीं होता। यानी अगर आप शरीर को काट कर इन्हें देखने की कोशिश करें तो आप उन्हें नहीं खोज सकते। लेकिन जैसे-जैसे आप अधिक सजग होते हैं, आप देख सकते हैं कि ऊर्जा की गति अनियमित नहीं है, वह तय रास्तों से गुजर रही है। प्राण या ऊर्जा 72,000 विभिन्न रास्तों से होकर गुजरती है। इड़ा और पिंगला जीवन के बुनियादी द्वैत के प्रतीक हैं। इस द्वैत को हम परंपरागत रूप से शिव और शक्ति का नाम देते हैं। या आप इसे बस पुरुषोचित और स्त्रियोचित कह सकते हैं, या यह आपके दो पहलू तर्क-बुद्धि और सहज-ज्ञान हो सकते हैं।

जीवन की रचना भी इसी के आधार पर होती है। इन दोनों गुणों के बिना, जीवन ऐसा नहीं होता, जैसा अभी है। सृजन से पहले की अवस्था में सब कुछ मौलिक रूप में होता है। उस अवस्था में द्वैत नहीं होता। लेकिन जैसे ही सृजन होता है, उसमें द्वैतता आ जाती है। पुरुषोचित और स्त्रियोचित का मतलब लिंग भेद से – या फिर शारीरिक रूप से पुरुष या स्त्री होने से – नहीं है, बल्कि प्रकृति में मौजूद कुछ खास गुणों से है। प्रकृति के कुछ गुणों को पुरुषोचित माना गया है और कुछ अन्य गुणों को स्त्रियोचित। आप भले ही पुरुष हों, लेकिन यदि आपकी इड़ा नाड़ी अधिक सक्रिय है, तो आपके अंदर स्त्रियोचित गुण हावी हो सकते हैं। आप भले ही स्त्री हों, मगर यदि आपकी पिंगला अधिक सक्रिय है तो आपमें पुरुषोचित गुण हावी हो सकते हैं। अगर आप इड़ा और पिंगला के बीच संतुलन बना पाते हैं तो दुनिया में आप प्रभावशाली हो सकते हैं। इससे आप जीवन के सभी पहलुओं को अच्छी तरह संभाल सकते हैं। अधिकतर लोग इड़ा और पिंगला में जीते और मरते हैं, मध्य स्थान सुषुम्ना निष्क्रिय बना रहता है। लेकिन सुषुम्ना मानव शरीर-विज्ञान का सबसे अहम पहलू है। जब ऊर्जा सुषुम्ना नाड़ी में प्रवेश करती है, जीवन असल में तभी शुरू होता है। आप एक नए किस्म का संतुलन पा लेते हैं, एक अंदरूनी संतुलन, जिसमें बाहर चाहे जो भी हो, आपके भीतर एक खास जगह बन जाती है, जो किसी भी तरह की हलचल में कभी अशांत नहीं होती, जिस पर बाहरी हालात का असर नहीं पड़ता। आप चेतनता की चोटी पर सिर्फ तभी पहुंच सकते हैं, जब आप अपने अंदर यह स्थिर अवस्था बना लें।

भगवान शिव के 12 अनमोल वचन

भगवान शिव के 12 अनमोल वचन
1.कल्पना ज्ञान से महत्वपूर्ण

आइंस्टीन से पूर्व शिव ने ही कहा था कि 'कल्पना' ज्ञान से ज्यादा महत्वपूर्ण है। हम जैसी कल्पना और विचार करते हैं, वैसे ही हो जाते हैं। सपना भी कल्पना है। अधिकतर लोग खुद के बारे में या दूसरों के बारे में बुरी कल्पनाएं या खयाल करते रहते हैं। दुनिया में आज जो दहशत और अपराध का माहौल है उसमें सामूहिक रूप से की गई कल्पना का ज्यादा योगदान है।
2.बदलाव के लिए जरूरी है ध्यान


आदमी को बदलाहट की प्रामाणिक विधि के बिना नहीं बदल सकते। मात्र उपदेश से कुछ नहीं बदलता। भगवान शिव ने अमरनाथ गुफा में माता पार्वती को मोक्ष की शिक्षा दी थी। पार्वती और शिव के बीच जो संवाद होता है उसे 'विज्ञान भैरव तंत्र' में संग्रहीत किया गया है। इसमें ध्यान की 112 विधियां संग्रहीत है।

3.शून्य में प्रवेश करो

विज्ञान भैरव तंत्र में शिव पार्वतीजी से कहते हैं, ‘आधारहीन, शाश्वत, निश्चल आकाश में प्रविष्ट होओ।’ वह तुम्हारे भीतर ही है। भगवान शिव कहते हैं- 'वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:' अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। -मेरुतंत्र...भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है।
4.आदमी पशुवत है
मनुष्य में जब तक राग, द्वेष, ईर्ष्या, वैमनस्य, अपमान तथा हिंसा जैसी अनेक पाशविक वृत्तियां रहती हैं, तब तक वह पशुओं का ही हिस्सा है। पशुता से मुक्ति के लिए भक्ति और ध्यान जरूरी है।

5.मरना सीखो

यदि जीवन में कुछ सीखना है तो मरना सीखो। जो मरना सीख जाता है वही सुंदर ढंग से जीना जानता है।
6.गायत्री मंत्र
'गायत्री-मंजरी' में 'शिव-पार्वती संवाद' आता है जिसमें भगवती पूछती हैं- 'हे देव! आप किस योग की उपासना करते हैं जिससे आपको परम सिद्धि प्राप्त हुई है?' उन्होंने उत्तर दिया- 'गायत्री ही वेदमाता है और पृथ्वी सबसे पहली और सबसे बड़ी शक्ति है। वह संसार की माता है। गायत्री भूलोक की कामधेनु है। इससे सब कुछ प्राप्त होता है। ज्ञानियों ने योग की सभी क्रियाओं के लिए गायत्री को ही आधार माना है।'
7. अन्न का सम्मान 
भोजन और पान (पेय) से उत्पन्न उल्लास, रस और आनंद से पूर्णता की अवस्था की भावना भरें, उससे महान आनंद होगा। या अचानक किसी महान आनंद की प्राप्ति होने पर या लंबे समय बाद बंधु-बांधव के मिलन से उत्पन्न होने वाले आनंद का ध्यान कर तल्लीन और तन्मय हो जाएं।
8.प्रकृति का सम्मान करो
प्रकृति हमें जीवन देने वाली है, इसका सम्मान करो। जो इसका अपमान करता है समझो मेरा अपमान करता है। दुनिया का हर काम प्रकृति के नियमों और तरीकों से ही होता है, लेकिन अहंकार से ग्रसित लोग ऐसा मानते हैं कि सबकुछ वही कर रहे हैं।
9.योग की शक्ति को समझो
विस्मयो योगभूमिका:।
स्वपदंशक्ति।
वितर्क आत्मज्ञानमू।
लोकानन्द: समाधिसुखम्। -शिवसूत्र
अर्थात : विस्मय योग की भूमिका है। स्वयं में स्थिति ही शक्ति है। वितर्क अर्थात विवेक आत्मज्ञान का साधन है। अस्तित्व का आनंद भोगना समाधि है।
10.अपनी तरफ देखो- न तो पीछे, न आगे। कोई तुम्हारा नहीं है। कोई बेटा तुम्हें नहीं भर सकेगा। कोई संबंध तुम्हारी आत्मा नहीं बन सकता। तुम्हारे अतिरिक्त तुम्हारा कोई मित्र नहीं है। -शिवसूत्र

नटराज : शिव कलाओं का आधार



नटराज शिवजी का एक नाम है उस रूप में जिस में वह सबसे उत्तम नर्तक हैं। नटराज शिव का स्वरूप न सिर्फ उनके संपूर्ण काल एवं स्थान को ही दर्शाता है; अपितु यह भी बिना किसी संशय स्थापित करता है कि ब्रह्माण्ड में स्थित सारा जीवन, उनकी गति कंपन तथा ब्रह्माण्ड से परे शून्य की नि:शब्दता सभी कुछ एक शिव में ही निहित है। नटराज दो शब्दों के समावेश से बना है – नट (अर्थात कला) और राज। इस स्वरूप में शिव कलाओं के आधार हैं। शिव का तांडव नृत्य प्रसिद्ध है।
शिव के दो स्वरूप:
शिव के तांडव के दो स्वरूप हैं। पहला उनके क्रोध का परिचायक, प्रलयकारी रौद्र तांडव तथा दूसरा आनंद प्रदान करने वाला आनंद तांडव। पर ज्यादातर लोग तांडव शब्द को शिव के क्रोध का पर्याय ही मानते हैं। रौद्र तांडव करने वाले शिव रुद्र कहे जाते हैं, आनंद तांडव करने वाले शिव नटराज। प्राचीन आचार्यों के मतानुसार शिव के आनन्द तांडव से ही सृष्टि अस्तित्व में आती है तथा उनके रौद्र तांडव में सृष्टि का विलय हो जाता है। शिव का नटराज स्वरूप भी उनके अन्य स्वरूपों की ही भांति मनमोहक तथा उसकी अनेक व्याख्याएँ हैं।
नटराज शिव की प्रसिद्ध प्राचीन मूर्ति के चार भुजाएँ हैं, उनके चारों ओर अग्नि के घेरें हैं। उनका एक पाँव से उन्होंने एक बौने(अकश्मा) को दबा रखा है, एवं दूसरा पाँव नृत्य मुद्रा में ऊपर की ओर उठा हुआ है। उन्होंने अपने पहले दाहिने हाथ में (जो कि ऊपर की ओर उठा हुआ है) डमरु पकड़ा हुआ है। डमरू की आवाज सृजन का प्रतीक है। इस प्रकार यहाँ शिव की सृजनात्मक शक्ति का द्योतक है। ऊपर की ओर उठे हुए उनके दूसरे हाथ में अग्नि है। यहाँ अग्नि विनाश का प्रतीक है। इसका अर्थ यह है कि शिव ही एक हाथ से सृजन करतें हैं तथा दूसरे हाथ से विलय। उनका दूसरा दाहिना हाथ अभय (या आशीष) मुद्रा में उठा हुआ है जो कि हमें बुराईयों से रक्षा करता है।
उठा हुआ पांव मोक्ष का द्योतक है। उनका दूसरा बाया हाथ उनके उठे हुए पांव की ओर इंगित करता है। इसका अर्थ यह है कि शिव मोक्ष के मार्ग का सुझाव करते हैं। इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही मोक्ष है। उनके पांव के नीचे कुचला हुआ बौना दानव अज्ञान का प्रतीक है जो कि शिव द्वारा नष्ट किया जाता है। शिव अज्ञान का विनाश करते हैं। चारों ओर उठ रही आग की लपटें इस ब्रह्माण्ड की प्रतीक हैं। उनके शरीर पर से लहराते सर्प कुण्डलिनी शक्ति के द्योतक हैं। उनकी संपूर्ण आकृति ॐ कार स्वरूप जैसी दिखती है। यह इस बात को इंगित करता है कि ॐ शिव में ही निहित है।
वह ताण्डव नृत्य करते हें जिससे विश्व का संहार होता है।
'नटराज' शिव के 'तांडव नृत्य' का प्रतीक है।
चिदंबरम के गोपुर में तांडव के 108 रूप अंकित किए गये हैं। इस मूर्ति के एक एक अवयव, एक एक रेखा को वाचा प्राप्त है।
नटराज
डमरू से हमारी वर्णमाला प्रकट होती है।
चारों वाणी (परा, पश्यंती, मध्यमा, वैखरी) तथा 84 लाख योनियों के सर्जक शिव हैं।
शिव के दूसरे हाथ में स्थित अग्नि मलिनता दूर करती है।
तीसरा हाथ 'अभय मुद्रा' दर्शाती है। ऊपर उठा हाथ कहता है - ' मुक्ति की कामना हो तो माया मोह से दूर होकर ऊंचा उठो।
'प्रभामंडल' प्रकृति का प्रतीक है।
नटराज का यह नृत्य विश्व की पांच महान् क्रियाओं का निर्देशक है - सृष्टि, स्थिति, प्रलय, तिरोभाव (अदृश्य, अंतर्हित) और अनुग्रह।
नटराज की मूर्ति में धर्म, शास्त्र और कला का अनूठा संगम है।
जब भगवान शिव ने राधिका का रूप धर रास किया.....
एक बार की बात है 'नटराज' भगवान शिव के तांडव नृत्य में सम्मिलित होने के लिए समस्त देवगण कैलाश पर्वत पर उपस्थित हुए। जगज्जननी माता गौरी वहां दिव्य रत्नसिंहासन पर आसीन होकर अपनी अध्यक्षता में तांडव का आयोजन कराने के लिए उपस्थित थीं। देवर्षि नारद भी उस नृत्य कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए लोकों का परिभ्रमण करते हुए वहां आ पहुंचे थे। थोड़ी देर में भगवान शिव ने भावविभोर होकर तांडव नृत्य प्रारंभ कर दिया।
समस्त देवगण और देवियां भी उस नृत्य में सहयोगी बनकर विभिन्न प्रकार के वाद्य बजाने लगे। वीणा वादिनी मां सरस्वती वीणा वादन करने लगीं, विष्णु भगवान मृदंग बजाने लगे, देवराज इन्द्र वंशी बजाने लगे, ब्रह्माजी हाथ से ताल देने लगे और लक्ष्मीजी गायन करने लगीं। अन्य देवगण, गंधर्व, किन्नर, यक्ष, उरग, पन्नग, सिद्ध, अप्सराएं, विद्याधर आदि भाव-विह्वल होकर भगवान शिव के चतुर्दिक खड़े होकर उनकी स्तुति में तल्लीन हो गए।
भगवान शिव ने उस प्रदोषकाल में उन समस्त दिव्य विभूतियों के समक्ष अत्यंत अद्भुत, लोक विस्मयकारी तांडव नृत्य का प्रदर्शन किया। उनके अंग-संचालन-कौशल, मुद्रा-लाघव, चरण, कटि, भुजा, ग्रीवा के उन्मत्त किंतु सुनिश्चित विलोल-हिल्लोल के प्रभाव से सभी के मन और नेत्र दोनों एकदम चंचल हो उठे।
सभी ने नटराज भगवान शंकरजी के उस नृत्य की सराहना की। भगवती महाकाली तो उन पर अत्यंत ही प्रसन्न हो उठीं। उन्होंने शिवजी से कहा- 'भगवन्‌! आज आपके इस नृत्य से मुझे बड़ा आनंद हुआ है, मैं चाहती हूं कि आप आज मुझसे कोई वर प्राप्त करें।'
उनकी बातें सुनकर लोकहितकारी आशुतोष भगवान शिव ने नारदजी की प्रेरणा से कहा- 'हे देवी! इस तांडव नृत्य के जिस आनंद से आप, देवगण तथा अन्य दिव्य योनियों के प्राणी विह्वल हो रहे हैं, उस आनंद से पृथ्वी के सारे प्राणी वंचित रह जाते हैं। हमारे भक्तों को भी यह सुख प्राप्त नहीं हो पाता अत: आप ऐसा करिए कि पृथ्वी के प्राणियों को भी इसका दर्शन प्राप्त हो सके किंतु मैं अब तांडव से विरत होकर केवल 'रास' करना चाहता हूं।'
भगवान शिव की बात सुनकर तत्क्षण भगवती महाकाली ने समस्त देवताओं को विभिन्न रूपों में पृथ्वी पर अवतार लेने का आदेश दिया। स्वयं वे भगवान श्यामसुंदर श्रीकृष्ण का अवतार लेकर वृंदावन धाम में पधारीं। भगवान श्री शिवजी ने ब्रज में श्रीराधा के रूप में अवतार ग्रहण किया। यहां इन दोनों ने मिलकर देवदुर्लभ, अलौकिक रास नृत्य का आयोजन किया।
भगवान शिव की 'नटराज' उपाधि यहां भगवान श्रीकृष्ण को प्राप्त हुई। पृथ्वी के चराचर प्राणी इस रास के अवलोकन से आनंद-विभोर हो उठे और भगवान शिव की इच्छा पूरी हुई।
नटराज स्त्रोत:
भगवान शिव का नटराज स्वरूप अधिकांश संगीतकार, कलाकार, नृतक और गायक पूजते हैं। शिव अपने नटराज स्वरूप में इतने लीन होते हैं कि उनसे अपनी कला के लिए आशीष सहजता से मांगा जा सकता है। वे उस समय अपनी समस्त कलाओं की दिव्य अभिव्यक्ति कर रहे होते हैं। अगर आप भी किसी न किसी कला से जुड़े हैं तो प्रति सोमवार इस स्तुति का सस्वर पाठ करना न भूलें...
सत सृष्टि तांडव रचयिता
नटराज राज नमो नमः..
हेआद्य गुरु शंकर पिता
नटराज राज नमो नमः...
गंभीर नाद मृदंगना
धबके उरे ब्रह्मांडना
नित होत नाद प्रचंडना
नटराज राज नमो नमः...
शिर ज्ञान गंगा चंद्रमा
चिद्ब्रह्म ज्योति ललाट मां
विषनाग माला कंठ मां
नटराज राज नमो नमः...
तवशक्ति वामांगे स्थिता
हे चंद्रिका अपराजिता
चंहु वेद गाए संहिता
नटराज राज नमोः...।
🙏हर-हर महादेव🙏

महामृत्युंजय मंत्र संपूर्ण व्याख्या


।।महामृत्युंजय मंत्र संपूर्ण व्याख्या।। मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षि वशिष्ठ के अनुसार 33 कोटि(प्रकार)देवताओं के द्योतक हैं उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1षटकार हैं। इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहित होती हैं

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।

हर की पौड़ी हरिद्वार में गंगा में बैठ
शिव की स्तुति करते
 

महामृत्युंजय मंत्र"मृत्यु को जीतने वाला महान मंत्र" जिसे त्रयंबकम मंत्र भी कहा जाता है, ऋग्वेद का एक श्लोक है।

यह त्रयंबक "त्रिनेत्रों वाला", रुद्र का विशेषण (जिसे बाद में शिव के साथ जोड़ा गया)को संबोधित है।यह श्लोक यजुर्वेद में भी आता है।गायत्री मंत्र के साथ यह समकालीन हिंदू धर्म का सबसे व्यापक रूप से जाना जाने वाला मंत्र है।शिव को मृत्युंजय के रूप में समर्पित महान मंत्र ऋग्वेद में पाया जाता है।
इसे मृत्यु पर विजय पाने वाला महा मृत्युंजय मंत्र कहा जाता है।

इस मंत्र के कई नाम और रूप हैं।
इसे शिव के उग्र पहलू की ओर संकेत करते हुए रुद्र मंत्र कहा जाता है;
शिव के तीन आँखों की ओर इशारा करते हुए त्रयंबकम मंत्र और इसे कभी कभी मृत-संजीवनी
मंत्र के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह कठोर तपस्या पूरी करने के बाद पुरातन ऋषि शुक्र को प्रदान की गई "जीवन बहाल" करने वाली विद्या
का एक घटक है।
ऋषि-मुनियों ने महा मृत्युंजय मंत्र को वेद का
ह्रदय कहा है।
चिंतन और ध्यान के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले अनेक मंत्रों में गायत्री मंत्र के साथ इस मंत्र का सर्वोच्च स्थान है।
महा मृत्युंजय मंत्र का अक्षरशः अर्थ
त्रयंबकम = त्रि-नेत्रों वाला (कर्मकारक)
यजामहे = हम पूजते हैं,सम्मान करते हैं,हमारे श्रद्देय।
सुगंधिम= मीठी महक वाला, सुगंधित (कर्मकारक)
पुष्टि = एक सुपोषित स्थिति, फलने-फूलने वाली,समृद्ध जीवन की परिपूर्णता।
वर्धनम = वह जो पोषण करता है,शक्ति देता है, (स्वास्थ्य,धन,सुख में) वृद्धिकारक;जो हर्षित करता है,आनन्दित करता है और स्वास्थ्य प्रदान करता है,एक अच्छा माली।
उर्वारुकम= ककड़ी (कर्मकारक)।
इव= जैसे,इस तरह।
बंधना= तना (लौकी का); ("तने से" पंचम विभक्ति - वास्तव में समाप्ति -द से अधिक लंबी है जो संधि के माध्यम से न/अनुस्वार में परिवर्तित होती है)।
मृत्युर = मृत्यु से।
मुक्षिया = हमें स्वतंत्र करें, मुक्ति दें।
मा= न।
अमृतात= अमरता, मोक्।ष

सरल अनुवाद
हम त्रि-नेत्रीय वास्तविकता का चिंतन करते हैं जो जीवन की मधुर परिपूर्णता को पोषित करता है और वृद्धि करता है।
ककड़ी की तरह हम इसके तने से अलग ("मुक्त") हों,अमरत्व से नहीं बल्कि मृत्यु से हों।

||महा मृत्युंजय मंत्र ||
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं
यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारुकमिव
बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्
ॐ स्वः भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ !!
||महा मृत्युंजय मंत्र का अर्थ ||

''समस्त संसार के पालनहार,तीन नेत्र वाले शिव की हम अराधना करते हैं। विश्व में सुरभि फैलाने वाले भगवान शिव मृत्यु न कि मोक्ष से हमें मुक्ति दिलाएं।''
महामृत्युंजय मंत्र के वर्णो (अक्षरों) का अर्थ महामृत्युंघजय मंत्र के वर्ण पद वाक्यक चरण
आधी ऋचा और सम्पुतर्ण ऋचा-इन छ: अंगों
के अलग-अलग अभिप्राय हैं।
ओम त्र्यंबकम् मंत्र के 33 अक्षर हैं जो महर्षिवशिष्ठर के अनुसार 33 कोटि(प्रकार) देवताओं के घोतक हैं।
उन तैंतीस देवताओं में 8 वसु 11 रुद्र और 12 आदित्यठ 1 प्रजापति तथा 1 षटकार हैं।
इन तैंतीस कोटि देवताओं की सम्पूर्ण शक्तियाँ महामृत्युंजय मंत्र से निहीत होती है जिससे महा महामृत्युंजय का पाठ करने वाला प्राणी दीर्घायु तो प्राप्त करता ही हैं।
साथ ही वह नीरोग,ऐश्वर्य युक्ता धनवान भी होता है।
महामृत्युंरजय का पाठ करने वाला प्राणी हर दृष्टि से सुखी एवम समृध्दिशाली होता है।
भगवान शिव की अमृतमययी कृपा उस निरन्तंर बरसती रहती है।
त्रि – ध्रववसु प्राण का घोतक है जो सिर में स्थित है।
यम – अध्ववरसु प्राण का घोतक है,जो मुख में स्थित है।
– सोम वसु शक्ति का घोतक है,जो दक्षिण कर्ण में स्थित है।
कम – जल वसु देवता का घोतक है,जो वाम कर्ण में स्थित है।
– वायु वसु का घोतक है,जो दक्षिण बाहु में स्थित है।
जा- अग्नि वसु का घोतक है,जो बाम बाहु में स्थित है।
– प्रत्युवष वसु शक्ति का घोतक है, जो दक्षिण बाहु के मध्य में स्थित है।
हे – प्रयास वसु मणिबन्धत में स्थित है।
सु -वीरभद्र रुद्र प्राण का बोधक है। दक्षिण हस्त के अंगुलि के मुल में स्थित है।
-शुम्भ् रुद्र का घोतक है दक्षिणहस्त् अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
न्धिम् -गिरीश रुद्र शक्ति का मुल घोतक है। बायें हाथ के मूल में स्थित है।
पु- अजैक पात रुद्र शक्ति का घोतक है। बाम हस्तह के मध्य भाग में स्थित है।
ष्टि – अहर्बुध्य्त् रुद्र का घोतक है,बाम हस्त के मणिबन्धा में स्थित है।
– पिनाकी रुद्र प्राण का घोतक है। बायें हाथ की अंगुलि के मुल में स्थित है।
र्ध – भवानीश्वपर रुद्र का घोतक है,बाम हस्त अंगुलि के अग्र भाग में स्थित है।
नम् – कपाली रुद्र का घोतक है। उरु मूल में स्थित है।
- दिक्पति रुद्र का घोतक है। यक्ष जानु में स्थित है।
र्वा – स्था णु रुद्र का घोतक है जो यक्ष गुल्फ् में स्थित है।
रु – भर्ग रुद्र का घोतक है,जो चक्ष पादांगुलि मूल में स्थित है।
– धाता आदित्यद का घोतक है जो यक्ष पादांगुलियों के अग्र भाग में स्थित है।
मि – अर्यमा आदित्यद का घोतक है जो वाम उरु मूल में स्थित है।
– मित्र आदित्यद का घोतक है जो वाम जानु में स्थित है।
– वरुणादित्या का बोधक है जो वाम गुल्फा में स्थित है।
न्धा – अंशु आदित्यद का घोतक है। वाम पादंगुलि के मुल में स्थित है।
नात् – भगादित्यअ का बोधक है। वाम पैर की अंगुलियों के अग्रभाग में स्थित है।
मृ – विवस्व्न (सुर्य) का घोतक है जो दक्ष पार्श्वि में स्थित है।
र्त्यो् – दन्दाददित्य् का बोधक है। वाम पार्श्वि भाग में स्थित है।
मु – पूषादित्यं का बोधक है। पृष्ठै भगा में स्थित है।
क्षी – पर्जन्य् आदित्यय का घोतक है। नाभि स्थिल में स्थित है।
– त्वणष्टान आदित्यध का बोधक है। गुहय भाग में स्थित है।
मां – विष्णुय आदित्यय का घोतक है यह शक्ति स्व्रुप दोनों भुजाओं में स्थित है।
मृ – प्रजापति का घोतक है जो कंठ भाग में स्थित है।
तात् – अमित वषट्कार का घोतक है जो हदय प्रदेश में स्थित है।

ऊपर वर्णन किये स्थानों पर उपरोक्तध देवता, वसु आदित्य आदि अपनी सम्पुर्ण शक्तियों सहित विराजत हैं।
जो प्राणी श्रध्दा सहित महामृत्युजय मंत्र का पाठ करता है उसके शरीर के अंग–अंग (जहां के जो देवता या वसु अथवा आदित्यप हैं) उनकी रक्षा होती है।
मंत्रगत पदों की शक्तियाँ जिस प्रकार मंत्रा में अलग अलग वर्णो (अक्षरों) की शक्तियाँ हैं। उसी प्रकार अलग–अलग पदों की भी शक्तियाँ है।
त्र्यम्‍‍बकम् – त्रैलोक्यक शक्ति का बोध कराता है जो सिर में स्थित है।
यजा- सुगन्धात शक्ति का घोतक है जो ललाट में स्थित है।
महे- माया शक्ति का द्योतक है जो कानों में स्थित है।
सुगन्धिम् – सुगन्धि शक्ति का द्योतक है जो नासिका (नाक) में स्थित है।
पुष्टि – पुरन्दिरी शक्ति का द्योतक है जो मुख में स्थित है।
वर्धनम – वंशकरी शक्ति का द्योतक है जो कंठ में स्थित है।
उर्वा – ऊर्ध्देक शक्ति का द्योतक है जो ह्रदय में स्थित है।
रुक – रुक्तदवती शक्ति का द्योतक है जो नाभि में स्थित है।
मिव रुक्मावती शक्ति का बोध कराता है जो कटि भाग में स्थित है।
बन्धानात् – बर्बरी शक्ति का द्योतक है जो गुह्य भाग में स्थित है।
मृत्यो: – मन्त्र्वती शक्ति का द्योतक है जो उरुव्दंय में स्थित है।
मुक्षीय – मुक्तिकरी शक्तिक का द्योतक है जो जानुव्दओय में स्थित है।
मा – माशकिक्तत सहित महाकालेश का बोधक है जो दोंनों जंघाओ में स्थित है।
अमृतात – अमृतवती शक्तिका द्योतक है जो पैरो के तलुओं में स्थित है।
महामृत्युजय प्रयोग के लाभ

कलौकलिमल ध्वंयस सर्वपाप हरं शिवम्।
येर्चयन्ति नरा नित्यं तेपिवन्द्या यथा शिवम्।।
स्वयं यजनित चद्देव मुत्तेमा स्द्गरात्मवजै:।
मध्यचमा ये भवेद मृत्यैतरधमा साधन क्रिया।।
देव पूजा विहीनो य: स नरा नरकं व्रजेत।
यदा कथंचिद् देवार्चा विधेया श्रध्दायान्वित।।
जन्मचतारात्र्यौ रगोन्मृदत्युतच्चैरव विनाशयेत्।


इसके अलावा हठयोग में तीन प्रकार के बंध होते हैं यदि उन्हें लगा लिया जाए उनकी संपूर्ण सिद्धि गुरु कृपा से हो जाए तो व्यक्ति मृत्युंजय ही हो जाता है उसके शरीर की कांति पुष्टि सुगंध बढ़ जाती है यह भी प्रयोगात्मक रूप से सच है
ओम नमः शिवाय जय भवानी जय भैरव ईश्वर सबका कल्याण करें