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कैसे पड़ा त्रिपुरारी नाम भगवान शिव का


तारक पुत्रो के साथ हुआ युद्ध. सभी देवतागण ब्रह्मा और विष्णु को साथ में लेकर शिवजी की शरण में चले गए और शिवजी से तारकासुर के पुत्रों के विनाश के लिए प्राथना की. उस समय शिवजी ने देवताओं से कहा जब तक वह तीन महान दैत्य मेरे भक्त है में उनका अहित नहीं करूँगा फिर भी वह तीनो मेरी भक्ति से बलवान होकर सृष्टि में अधर्म का फैलाव कर रहे है इसलिए तुम सब मिलकर ऐसा कुछ उपाय करो कि वह तीनों मेरी भक्ति से विमुख हो जाए।

शिवजी की आज्ञा के अनुसार देवताओं का यह कार्य करने के लिए भगवान विष्णु ने एक सुंदर दिव्य स्वरूप धारण किया. वह मुनि वेश में तीनो नगरों में गए और वहां वेदों के विरुद्ध उपदेश किया. उन नगरों के असुरों को अपने वाणी से शिव भक्ति से दूर कर दिया. उस वेद विरुद्ध उपदेश से प्रभावित होकर उन नगरों की स्त्रियों ने पतिव्रत धर्म छोड़ दिया. जब वह तीनो नगर शिव भक्ति से विमुख हो गए तब पुनः देवता गण शिवजी की पास आये और उन्हें उन तीन असुरों का उनके नगर के साथ नष्ट करने के लिए प्राथना की।
उस समय शिवजी ने देवताओं से कहा यद्यपि वह तीन असुर मेरी भक्ति से विमुख हुए है परंतु एक समय था वह मेरे परम भक्त है. इसलिए में उनका विनाश क्यों करू उनका विनाश भगवान विष्णु को करना चाहिए जिन्होंने उन्हें मेरी भक्ति से विमुख किया है. उस समय सभी देवता उदास हो गए. यह देखकर ब्रह्माजी ने शिवजी से कहा है प्रभु आप हम सब के राजा है. भगवान विष्णु आप के युवराज है और में आप का पुरोहित हूँ. यह सब देवता आप की प्रजा है जो आप की शरण में आई है. मेरे वरदान के अनुसार उन तीन असुर आप के आलावा सभी के लिए अवध्य है. इसलिए हम सब की रक्षा करे और उन असुरों का वध करे।
ब्रह्मा की बात सुनकर शिवजी ने मुस्कराते हुए कहा आप मुझे राजा कह रहे है परंतु मेरे पास कोई ऐसा रथ नहीं जो राजा के पास होता है और न ही मेरे पास कोई राजा के योग्य शस्त्र है. में उनका विनाश कैसे करू. उस समय ब्रह्माजी की आज्ञा से शिवजी से लिए एक दिव्य रथ का निर्माण करवाया गया. वह रथ सोने का बना हुआ था. उसके दाहिने चक्र में सूर्य और बाएं चक्र में चंद्रमा विद्यमान थे. अंतरीक्ष उस रथ का ऊपर का भाग था और मंदराचल उस रथ का बैठने का स्थान था. ब्रह्माजी उस रथ के सारथि बने. हिमालय से धनुष बनाया गया और वासुकी को प्रत्यंचा बनाया गया. भगवान विष्णु उस धनुष के बाण और अग्नि उस बाण की नोक बने. वेद उस रथ के अश्व बन गए. संसार में जो भी कुछ तत्व तह वह सभी उस रथ में मौजूद थे ।
उस समय ब्रह्माजी ने भगवान शिव से रथ पर सवार होने के लिए प्राथना की. शिव के सवार होते ही वह रथ शिव के भार से निचे झुक गया. वेदरूपी अश्व शिवजी का भार सहन न कर पाए और जमीन पर बैठ गए. सबको लगा कोई भूकंप आ गया है. उस समय नंदी जी वहां पर उपस्थित हुए और उस रथ के निचे जाकर शिवजी के भार को स्वयं सहन करने लगे. वह भी बड़ी मुश्किल से शिवजी की कृपा से शिवजी का भार सहन कर सके।
उस समय भगवान शिव की आज्ञा से सभी देवतागण पशुभाव में स्थित हो गए. भगवान शिव उनके अधिपति हुए इसलिए उन्हें पशुपति भी कहा जाता है. उसके बाद ब्रह्मा ने उस रथ को हांकना शुरू किया परंतु वह रथ आगे नहीं बढ़ा तब शिव की आज्ञा से सभी देवताओं ने विघ्न को दुर करने वाले गणनायक गणपति से प्राथना की और वह रथ आगे बढ़ने लगा।
उसके बाद जब भगवान शिव ने अपना रौद्र स्वरूप धारण किया. उस समय संयोग वश वह तीनो नगर एक ही रेखा में बने हुए थे. शिव ने वह हिमालय स्वरूप धनुष पर विष्णु स्वरूप बाण का संधान किया. बाण के संधान करते ही शिवजी के क्रोध से प्रभावित होकर वह तीनो नगर जलने लगे. शिवजी के उस महान धनुष के द्वारा एक ही बाण में तारकासुर के तीनो पुत्रो का संहार हो गया. शिवजी की कृपा से उन तीनो असुरों को मोक्ष की प्राप्ति हुई. देवताओं का कार्य भी सिद्ध हुआ. उन तीन नगर में जो लोग शिव की भक्ति से विमुख नहीं हुए थे उनकी शिवजी ने रक्षा की. इस तरह भगवान शिव ने तारकासुर के तीनो असुरो का अंत किया और त्रिपुरारी कहलाये।