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वीणा की नाद, माँ सरस्वती का आशीर्वाद और प्रकृति में उल्लास: क्यों बसंत पंचमी केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि भारतीय चेतना का उत्सव है

                   बसंत पंचमी: पीले रंग की आभा में ज्ञान, कला और संस्कृति का उत्सव (फोटो साभार: AI)
पश्चिमी सभ्यता के आगे नतमस्तक होकर भारतीय अपने सनातन धर्म के महत्व को भूल गए। हमारे त्यौहार केवल एक त्यौहार नहीं बल्कि आने वाली ऋतु का संकेत देते हैं, जो विश्व के किसी भी धर्म/मजहब में नहीं। हिन्दू नववर्ष भी चैत्र मास में नवरात्रों से प्रारम्भ होता है यानि देवी आराधना से।    

भारतीय परंपरा में त्योहार केवल कैलेंडर की तारीख नहीं होते, बल्कि वे प्रकृति, जीवन और चेतना के साथ गहरे संवाद का माध्यम होते हैं। बसंत पंचमी ऐसा ही एक पर्व है, जो मौसम के बदलाव से कहीं आगे जाकर मनुष्य के भीतर नई ऊर्जा, नई संवेदनशीलता और नई दृष्टि का संचार करता है।

यह पर्व माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है और इसे माघ पंचमी या श्री पंचमी भी कहा जाता है। हिंदू चूँकि इस पर्व के बाद के समय को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी मानते हैं इसलिए इसे ‘बसंत पंचमी’ के तौर पर भी जाना जाता है। यहाँ ‘बसंत’ का अर्थ सिर्फ ऋतु से नहीं, बल्कि इसका तात्पर्य जीवन में गति के आगमन से है।

बसंत पंचमी: ऋतु परिवर्तन नहीं, जीवन में गति का आगमन

बसंत पंचमी केवल ठंड के अंत और गर्मी की शुरुआत का संकेत नहीं है, बल्कि यह ठहराव से गति की ओर बढ़ने का पर्व है। शीत ऋतु को भारतीय दर्शन में निष्क्रियता और जड़ता का समय माना गया है, जबकि बसंत सक्रियता, सृजन और विस्तार का प्रतीक है।

प्रकृति के साथ-साथ मानव जीवन भी इस परिवर्तन से प्रभावित होता है। मन अधिक उत्साही होता है, भावनाएँ प्रबल होती हैं और जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित होता है। यही कारण है कि बसंत पंचमी को शुभ कार्यों, नई शिक्षा, गृह प्रवेश, व्यवसाय आरंभ और विद्यारंभ के लिए अत्यंत मंगलकारी माना गया है।

सृष्टि में वाणी और ज्ञान का अवतरण

पौराणिक मान्यता के अनुसार, जब ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की, तब संसार दृश्य रूप में तो मौजूद था, लेकिन उसमें ध्वनि, संवाद और अभिव्यक्ति का अभाव था। चारों ओर मौन और निस्तब्धता छाई हुई थी। इस अपूर्णता को देखकर ब्रह्मा संतुष्ट नहीं थे।

भगवान विष्णु की अनुमति से ब्रह्मा ने अपने कमंडल से जल छिड़का। जैसे ही जल धरती पर गिरा, उसमें कंपन उत्पन्न हुआ और एक दिव्य शक्ति प्रकट हुई। यह शक्ति थीं माँ सरस्वती, जिनके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर मुद्रा थी।

जब देवी ने वीणा का नाद किया, तब सृष्टि को वाणी प्राप्त हुई। पशु-पक्षी, मनुष्य, जल और वायु, सबमें ध्वनि और चेतना का संचार हुआ। इसी दिन को बसंत पंचमी माना गया और इसे सरस्वती जयंती के रूप में प्रतिष्ठा मिली।

माँ सरस्वती: विद्या से आगे विवेक की अधिष्ठात्री

भारतीय संस्कृति में ज्ञान को केवल सूचना या डिग्री तक सीमित नहीं माना गया। माँ सरस्वती उस ज्ञान की प्रतीक हैं जो मनुष्य को अधिक शांत, अधिक विचारशील और अधिक संवेदनशील बनाता है। ऋग्वेद में सरस्वती को चेतना की प्रवाहमान धारा कहा गया है, जो मनुष्य की बुद्धि, प्रज्ञा और आचार का आधार बनती है।

इसी कारण इस दिन विद्यार्थी, शिक्षक, लेखक, कवि, कलाकार और संगीतकार विशेष रूप से माँ सरस्वती की आराधना करते हैं। परंपरागत रूप से बसंत पंचमी को बच्चों के विद्यारंभ के लिए सबसे शुभ माना गया है। आंध्र प्रदेश में तो इसे विद्यारंभ पर्व के नाम से जाना जाता है, जहाँ बच्चों को इसी दिन पहली बार अक्षर ज्ञान कराया जाता है।

होली का शुभारंभ और ब्रज की परंपराएँ

बसंत पंचमी के साथ ही ब्रज क्षेत्र में होली की औपचारिक शुरुआत हो जाती है। मंदिरों में ठाकुरजी को गुलाल अर्पित किया जाता है और रसिया, धमार और होरी का गायन शुरू हो जाता है। बरसाना की लट्ठमार होली, वृंदावन की रंगपंचमी, बनारस में बाबा विश्वनाथ से लेकर महाश्मशान तक खेली जाने वाली होली, ये सब परंपराएँ इस बात का प्रतीक हैं कि भारतीय संस्कृति में मृत्यु के बीच भी जीवन का उत्सव मनाया जाता है।

भारत के विविध रंगों में बसंत पंचमी

बसंत पंचमी पूरे भारत में अलग-अलग रूपों में मनाई जाती है। बंगाल में यह सरस्वती पूजा का प्रमुख पर्व है। बिहार और उड़ीसा में इसका गहरा संबंध कृषि अनुष्ठानों से है। राजस्थान, मथुरा और वृंदावन में सांस्कृतिक उत्सवों की धूम रहती है। पंजाब में यह पर्व पतंगबाजी, सरसों के खेतों और लोकगीतों के साथ मनाया जाता है।

विशेष रूप से पंजाब में बसंत पंचमी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि लोकजीवन और खेती से जुड़ा बड़ा उत्सव है।

जब तक तुष्टिकरण में डूबे राजनीतिक दल सत्ता के लालच में इस्लामी कट्टरपंथियों को संरक्षण देंगे, तब तक हिंदू त्योहारों पर पत्थर चलते रहेंगे

                          हर हिंदू त्योहार पर पत्थरबाजी करना कट्टरपंथियों का पेशा बन गया है (फोटो- AI)
नवरात्रि और दशहरा बीत गया है। एक बार फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू आस्था को अपने आतंक से डराने की पूरी कोशिश की। हर बार की तरह वही कहानी फिर दोहराई गई, श्रद्धा और शोभायात्राओं के बीच कट्टरपंथियों ने पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। कहीं, काँच की बोतलें फेंकी गईं। हर बीतते साल के साथ हिंदू त्योहारों पर कट्टरपंथियों की हिंसा बढ़ती जा रही है।

किसने पत्थर फेंके ये तो हमने देख लिया लेकिन फिर एक सवाल सामने आता है कि पत्थर क्यों फेंके गए? हर बार निशाने पर सिर्फ हिंदू त्योहार ही क्यों आते हैं? क्या कभी किसी ने सुना कि हनुमान चालीसा पढ़ने गए लोगों ने किसी पर पथराव किया हो? नहीं सुना, क्योंकि यह असहिष्णुता एकतरफा है।

नेपाल में भी दुर्गा विसर्जन के दौरान शोभायात्रा पर हमला किया गया। इससे साफ पता चलता है कि यह भारत की समस्या नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता की समस्या है। यह मानसिकता क्या है? यह मानसिकता अपने मजहब को दूसरों की आस्था के ऊपर दिखाने की जिद है। यह मजहबी कट्टरता के साथ-साथ अपनी पहचान को आक्रामकता से दिखाने का सवाल भी है।

पहचान के संकट ने कट्टरपंथियों के अकीदे को हिंसा का हथियार बना दिया है। जब किसी समाज का एक हिस्सा अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने भविष्य पर भरोसा खो देता है, तो वह अपनी असुरक्षा को आक्रामकता से ढकने की कोशिश करता है।

त्यौहारों पर झंडे लहराने वाले, पत्थर चलाने वाले और नारे लगाने वाले खुद को बहादुर समझते हैं जबकि असल में वे अपनी पहचान के संकट को चीख-चीखकर जाहिर कर रहे होते हैं।

भारत में यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक नहीं रही, इसे राजनीतिक संरक्षण मिला है, जिससे यह और भी खतरनाक होती जा रही है। यह कट्टरपंथ राजनीति की गोद में पल रहा है। वोट बैंक की लालच में राजनीतिक दलों ने वर्षों से इस असहिष्णुता को ‘संवेदनशीलता’ का नाम दिया है।

देश में लगभग 15-16 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, और यही संख्या कई राज्यों में जीत-हार तय कर सकती है। यही वजह है कि राहुल गाँधी हों या अखिलेश यादव, ममता बनर्जी हों या असदुद्दीन ओवैसी ये सब एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं कि कौन खुद को बड़ा ‘मुस्लिम हितैषी’ दिखा सके।

बरेली में हाल में जो हुआ, वह इसका ताजा उदाहरण है। I Love Muhammad के नाम पर दंगाइयों ने उपद्रव किया। पुलिस पर गोली चलाई गईं, पत्थराव किया गया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी का दल वहाँ दौड़ पड़ा, वो भी आरोपितों का पक्ष लेने के लिए। इन्हें दंगाई बेगुनाह नजर आते हैं और पुलिस-प्रशासन को ये अत्याचारी बताते हैं।

यह वही राजनीति है जिसने दंगाइयों को यह भरोसा दिला दिया है कि चाहे कुछ भी कर लो, ‘वोट बैंक’ के लिए कुछ दल तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हारे लिए वकील खड़े होंगे, तुम्हें बचाने वाले बयान आएँगे और मीडिया का एक हिस्सा तुम्हें पीड़ित दिखाने में जुट जाएगा।

यह सिलसिला नया नहीं है। दशकों से यही खेल चल रहा है। मजहब की आड़ में एक वर्ग ने आक्रामकता को सामान्य बना दिया है और यही सबसे खतरनाक है। क्योंकि जब समाज का कोई हिस्सा यह मान ले कि कानून से ऊपर उसकी मजहबी भावनाएँ हैं, तो फिर राज्य की सत्ता भी बेबस दिखने लगती है।

अब यह समझना होगा कि हर बार पत्थर चलने के बाद सिर्फ कुछ गिरफ्तारियाँ और बयान काफी नहीं हैं। यह मानसिकता तब तक नहीं बदलेगी जब तक समाज और राज्य मिलकर इसे वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं देंगे। यह कह देना कि ‘हर धर्म में कुछ कट्टर लोग होते हैं’ अब बहाना बन गया है।

क्योंकि यहाँ समस्या ‘कुछ’ की नहीं बल्कि एक मानसिकता की है जो हर उत्सव, हर धार्मिक पर्व पर आतंक का अपना चेहरा दिखाती है।

AXIS बैंक के विज्ञापन में नवरात्रि की धूम के बीच अचानक टपके सांता क्लॉज, फिर वही ‘हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ

    एक्सिस बैंक के विज्ञापन में हिंदू त्योहार नवरात्रि और दीवाली के बीच सांता क्लॉड को दिखाया (साभार: Axis Bank)

हिंदू त्योहार दीवाली के मौके पर एक्सिस बैंक (Axis Bank) ने अपना नया विज्ञापन कैंपेन ‘दिल से ओपन सेलिब्रेशन 2025’ लॉन्च किया है। हैरानी की बात यह है कि इस विज्ञापन में दीवाली की रोशनी और नवरात्रि की धूम के बीच अचानक सांता क्लॉज टपक पड़ते हैं।

जाहिर है, यह वही सांता है जो आमतौर पर क्रिसमस का प्रतीक है। इन्हीं सांता को हिंदू त्योहारों के बीच लाकर यह संदेश देने की कोशिश की गई कि त्यौहार सबका है और उत्सव धर्म की सीमाओं से परे होना चाहिए। यानि वही हिन्दू त्योहारों पर सेक्युलरिज्म का भाषण।

इस विज्ञापन की वीडियो में दिखाया गया कि नवरात्रि के अवसर पर ‘गरबा डांस’ चल रहा होता है तभी अचानक सांता क्लॉज की एंट्री हो जाती है। इस विज्ञापन से एक्सिस बैंक ने अपने ऑफर्स प्रोमोट करने की कोशिश की है, जो नवरात्रि से लेकर दीवाली और फिर क्रिसमस तक चलेंगे।

हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ

एक्सिस बैंक ने हिंदू त्योहारों पर सेक्युलरिज्म का वही पुराना पाठ पढ़ाने की कोशिश की है, जो पहले भी कई ब्रांड्स और कंपनियाँ दे चुकी है। यानि हिंदू त्योहार को निशाना बनाकर नीचा दिखाने का यह पहला मामला नहीं है। साल 2020 में ज्वैलरी ब्रांड ‘तनिष्क’ ने दीवाली पर लव जिहाद को प्रमोट करते विज्ञापन बनाया था।

इस विज्ञापन में एक हिंदू बहू को उसकी मुस्लिम सास के साथ मिलकर गोद भराई का जश्न मनाते हुए दिखाया गया था। यह वही सेकुलर प्रोपेगेंडा है, जिसके बाद हिंदू लड़कियाँ फ्रिज और सूटकेस में मिलती हैं।

ऐसे कई ब्रांड्स और कंपनियाँ हौ जो सेकुलर विज्ञापन के नाम पर हिंदुओं का अपमान करते हैं। इसमें सभी धर्मों को एक बताते हुए हिंदुओं को कट्टर और असहिष्णु दिखाया जाता है। वहीं मुस्लिम को ‘पीड़ित’ और शांतिप्रिय दिखाते हैं और यह सब केवल हिंदू त्योहारों को निशाना बनाकर किया जाता है।

गौर करने वाली बात यह भी है कि रमजान या ईद के विज्ञापन आते हैं तो उनमें किसी और धर्म का प्रतीक या त्योहार नहीं घुसाया जाता। क्रिसमस के विज्ञापन में कभी दीवाली की झलक नहीं मिलती। लेकिन दीवाली और नवरात्रि जैसे हिंदू त्योहारों पर अक्सर बड़ी-बड़ी कंपनियाँ सेक्युलरिज्म का झंडा लेकर आ धमकती हैं।

एक्सिस बैंक का यह विज्ञापन भी उसी सोच का हिस्सा लगता है, जहाँ हिंदू त्योहारों को किसी न किसी बहाने ‘सभी के’ त्योहार में बदलने की कोशिश की जाती है। यह एक सोची-समझी मार्केटिंग रणनीति है, जिसमें कंपनियाँ जानबूझकर हिंदू पर्वों पर ही ‘सेक्युलरिज्म’ का पाठ पढ़ाती हैं।

सोशल मीडिया पर एक्सिस बैंक के ‘ईसाई करण’ का विरोध

एक्सिस बैंक के इस विज्ञापन को लेकर सोशल मीडिया में बवाल मचा हुआ है। एक्सिस बैंक पर ईसाई करण को लेकर विरोध हो रहा है। नेटिजन्स एक्सिस बैंक से विज्ञापन हटाने की माँग कर रहे हैं। ट्विटर/एक्स पर बैंक को बॉयकाट करने का हैशटैग ट्रेंड भी चल रहा है।

एक्सिस बैंक के विज्ञापन पर एक्स यूजर The Jaipur Dialogues ने लिखा, “एक्सिस बैंक सांता क्लॉज के साथ नवरात्रि मना रहा है। यह हिंदू त्योहार को नीचा दिखाने की चरम सीमा है। एक्सिस बैंक इस विज्ञापन को तुरंत वापस ले वरना बहिष्कार का सामना करे। एक्सिस बैंक को सबक सिखाना जरूरी है।”

एक्स पर Treeni ने लिखा, “नवरात्रि का ईसाई करण? एक्सिस बैंक नवरात्रि के दौरान सांता क्लॉज को उपहार बाँटते हुए दिखाकर हिंदू धर्म का मजाक उड़ा रहा है और आने वाले सभी हिंदू त्योहारों में भी ऐसा ही करने की योजना बना रहा है!”

एक्स यूजर अभय प्रताप सिंह ने लिखा, “Axis Bank ने किया नवरात्रि का ईसाई करण आख़िर हिंदू त्योहारों के साथ ही ऐसा खिलवाड़ क्यों होता है? क्या ईद के एड में सेंटा क्लॉज केपी दिखा सकते हैं? क्या क्रिसमस के एड में इस्लामिक प्रतीकों को दिखा सकते हैं? फिर नवरात्रि के एड में सेंटा क्लॉज क्यों?”

अदवाएता नाम की एक्स यूजर ने लिखा, “मैं अपनी बीमा योजना की जाँच करवाती हूँ, तुम्हारी बेवकूफी के चलते अपना खाता बंद करवाऊँगी। पागल आदमी.. इस bugger का हमारे नवरात्रि से क्या संबंध है??”

रितु प्रिया नाम की एक्स यूजर ने लिखा, “ये क्या मजाक है?? थोड़ा दिन में रहना सीखो, हमारे पर्व त्यौहार पर अपनी रोटी सेंकने की कोशिश न करें।”

इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ बिहार : जुमे पर स्कूल बंद रख सकते हैं , नीतीश सरकार ने हिंदू त्योहारों की छुट्टियाँ घटाई; ईद-मुहर्रम की बढ़ाई


बीते साल बिहार के 500 से अधिक सरकारी स्कूलों में रविवार की जगह साप्ताहिक अवकाश शुक्रवार यानी जुमे के दिन होने का मामला सामने आया था। ऐसा बगैर किसी आधिकारिक आदेश के हो रहा था। लेकिन अब बिहार की जदूय-राजद सरकार ने स्कूलों में शुक्रवार के साप्ताहिक आदेश को ‘आधिकारिक’ रूप दे दिया है।

बिहार के शिक्षा विभाग ने साल 2024 के लिए स्कूलों का छुट्टी कैलेंडर जारी कर दिया है। इसमें बड़े फेरबदल देखने को मिले हैं। 2023 में सरकारी स्कूलों में रविवार सहित 64 दिन की छुट्टी थी। 2024 में रविवार सहित कुल 60 छुट्टी ही मिलेंगे। एक तरफ हिंदू त्योहारों की छुट्टियाँ कम कर दी गई है तो दूसरी ओर ईद-मुहर्रम की छुट्टी बढ़ा दी गई है।

रिपोर्टों के अनुसार उर्दू प्राथमिक/मध्य/ माध्यमिक/उच्च माध्यमिक या मकतब रविवार को खुले रहेंगे। इन जगहों पर साप्ताहिक अवकाश शुक्रवार को होंगे। इतना ही नहीं मुस्लिम बहुल इलाकों में चलने वाले अन्य सरकारी स्कूल भी साप्ताहिक अवकाश अब शुक्रवार को रख सकते हैं। इसके लिए उन्हें केवल जिलाधिकारी से अनुमति लेनी होगी।

                                                 लाइव हिंदुस्तान में प्रकाशित खबर का अंश
          दैनिक भास्कर में प्रकाशित खबर। लाल घेरे में आप स्कूलों में शुक्रवार की छुट्टी से जुड़ी जानकारी पढ़ सकते है

2024 में सरकारी स्कूलों के लिए नीतीश सरकार ने छुट्टी का जो कैलेंडर जारी किया है उससे पता चलता है कि रामनवमी, जन्माष्टमी, महाशिवरात्रि और रक्षाबंधन जैसी छुट्टियाँ हटा दी गई हैं। वहीं बकरीद और मुहर्रम पर छुट्टी एक-एक दिन के लिए बढ़ा दी गई है। यह कैलेंडर बिहार के कक्षा 1 से लेकर कक्षा 12 तक के विद्यालयों पर लागू होगा।

 2023 में तीज पर दो दिन और जिउतिया पर एक दिन की छुट्टी थी, जो अब नहीं मिलेगी। दीपावली पर भी मात्र एक दिन की छुट्टी दी गई है। राज्य में इससे पहले अशोक अष्टमी और अंतिम श्रावणी की छुट्टी भी होती थी, लेकिन इस बार इन्हें भी रद्द किया गया है। भाईदूज और मकर संक्रान्ति जैसे त्योहारों की कोई छुट्टी नहीं होगी।

                                                        बिहार सरकार का छुट्टी कैलेंडर

इसके उलट 2024 में बकरीद की तीन दिन की जबकि मोहर्रम की दो दिन छुट्टी रहेगी। वर्ष 2023 में यह छुट्टियाँ क्रमशः 2 और 1 दिन थीं। इनमें इजाफा किया गया है। साथ ही ईद की भी छुट्टी भी तीन दिनों की होगी। शब ए बारात और चेहल्लुम जैसे मुस्लिम त्यौहारों के साथ नए कैलेंडर में मुस्लिमों के कुल 6 त्योहारों पर कुल 10 दिनों की छुट्टी दी गई है।

                                                             बिहार सरकार का छुट्टी कैलेंडर

कैलेंडर में हिन्दुओं के मात्र 4 त्योहार शामिल किए गए हैं जिनके लिए कुल 9 दिनों की छुट्टी घोषित की गई है। महापुरुषों की जयंती पर होने वाली छुट्टियों को भी बंद किया गया है। नए आदेश में कहा गया है कि इन पर छुट्टी ना होकर भोजनावकाश तक पढ़ाई और फिर उनके बारे में चर्चा होगी। बिहार में गाँधी जयंती की भी छुट्टी नहीं होगी।

नीतीश सरकार के इस फरमान को भारतीय जनता पार्टी ने ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ़ बिहार‘ बताया है।

बिहार भाजपा के अध्यक्ष सम्राट चौधरी ने कहा है कि नीतीश सरकार तुष्टिकरण के चलते ऐसा कर रही है।

राज्य के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशिल कुमार मोदी ने इसे हिन्दुओं को जातियों में बाँटने और अल्पसंख्यकों के तुष्टिकरण की राजनीति बताया है।