Showing posts with label #nitish kumar. Show all posts
Showing posts with label #nitish kumar. Show all posts

बिहार में बड़े बदलाव की बयार, नितीश कुमार की राज्यसभा की राह के साथ नए समीकरण और BJP का बड़ा उभार


बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी दिखाई दे रही है। दरअसल, सियासत में कई बार ऐसे क्षण आते हैं, जब एक निर्णय पूरे राजनीतिक परिदृश्य को बदल देता है। इन दिनों बिहार की राजनीति में भी कुछ वैसी ही हलचल दिखाई दे रही है। लंबे समय तक राज्य की सत्ता की धुरी बने रहे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने की सुर्खियों ने सियासी गलियारों में नए समीकरणों की अटकलें तेज कर दी हैं। यह केवल एक नेता के पद परिवर्तन की कहानी नहीं है, बल्कि बिहार की राजनीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत भी है। इस बदलाव से पूरे राज्य की राजनीति की दिशा और दशा दोनों प्रभावित होंगी। नीतीश कुमार के राज्यसभा में जाने से बिहार में भाजपा के लिए एक ऐतिहासिक अवसर होगा। लंबे समय तक सहयोगी की भूमिका निभाने के बाद पहली बार भाजपा को बिहार में मुख्यमंत्री पद हासिल करने का मौका मिल सकता है। राज्य की राजनीति में भाजपा का सफर आसान नहीं रहा है। एक समय ऐसा था जब पार्टी का जनाधार सीमित था और वह मुख्यतः गठबंधन की राजनीति पर निर्भर थी। भाजपा ने लगातार कठिन परिश्रम, समर्पित सेवा भावना और विकास की राह से जीरो से मुख्यमंत्री बनने तक का सफर तय किया है।

JDU से ज्यादा सीटें होने के बावजूद बीजेपी द्वारा अपना मुख्यमंत्री नहीं बनाने की असली वजह थी राज्य में अपना जनाधार बनाना। मौका मिलते ही बीजेपी ने अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया। पहली बार गृह मंत्रालय अपने पास रख स्पष्ट दे दिया कि खेला होने वाला है।  

दो दशक की राजनीति के बाद नए सत्ता समीकरण की शुरुआत
नीतीश कुमार ने राज्यसभा में जाने के लिए नामांकन भर दिया है। उनके साथ जद (यू) के रामनाथ ठाकुर, भाजपा के नितिन नवीन व शिवेश कुमार तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा ने भी नामांकन किया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह इस मौके गवाह बनने पटना पहुंचे हैं। नामांकन के बाद एनडीए नेताओं के साथ बैठक कर वो नई सरकार के गठन पर चर्चा भी कर सकते हैं। यह सिर्फ एक नेता के राज्यसभा पहुंचने की नहीं, बल्कि बिहार की 20 साल पुरानी राजनीतिक व्यवस्था के अंत और नए सत्ता समीकरण की शुरुआत है। नीतीश कुमार 75 वर्ष के हो चुके हैं। नवंबर 2025 के विधानसभा चुनाव में एनडीए ने भारी जीत हासिल की। भाजपा अकेले 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जद (यू) ने 85 सीटें जीतीं। चुनाव परिणामों को पीएम मोदी की बेहद लोकप्रियता का परिणाम माना गया। चुनाव के बाद नीतीश कुमार दसवीं बार मुख्यमंत्री बने, लेकिन मात्र चार महीने बाद यह निर्णय ले लिया है। जेडीयू के लोग इसे नीतीश की अपनी मर्जी बता रहे हैं, लेकिन राजनीतिक गलियारों में इसे राज्य की राजनीति से सम्मानित विदाई के रूप में देखा जा रहा है।

बेटे के लिए बिहार की राजनीति, अपने लिए केंद्र की सियासत
नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री पद छोड़कर राज्यसभा जाना बिहार राजनीति में बड़ा बदलाव है। पर एक सवाल हर किसी के मन में उठ रहा है कि नीतीश कुमार के इस फैसले से उन्हें हासिल क्या होगा। आम तौर पर मुख्यनेता अपनी कुर्सी नहीं छोड़ते। ऐसे तमाम उदाहरण हैं कि नेता मृत्युशैया पर होने के बाद भी रिजाइइन देने से बचते रहे हैं। जेल में महीनों बिताने के बाद भी एक नेता ने सीएम का पद नहीं छोड़ा। विधानसभा में बहुमत न होने के बाद भी मुख्यमंत्रियों को ये भरोसा रहा है कि वे अंतिम समय में कोई न कोई विकल्प निकाल ही लेंगे। पर नीतीश कुमार के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। जाहिर है कि सवाल कौंधेगा कि नीतीश कुमार क्यों करने जा रहे हैं? फिलहाल इसके पीछे दो कारण नजर आ रहे हैं। एक तो इससे नीतीश कुमार अपने बेटे के लिए बिहार में राजनीति का नया रास्ता बना पाएंगे। दूसरे, वे राज्य की राजनीति से निकलकर देश की राजनीति में पैर रख सकेंगे। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार नीतीश कुमार को केंद्रीय मंत्री का पद मिल सकता है।

नीतीश के बाद निशांत संभाल सकते हैं पार्टी की कमान
जद (यू) का नेतृत्व नीतीश कुमार के राज्यसभा जाने से थोड़ा हिल-डुल सकता है। नीतीश कुमार ने अपने अलावा पार्टी में किसी को उभरने नहीं दिया। जाहिर है कि नीतीश कुमार के बाद पार्टी में और कोई ऐसा है भी नहीं जिससे पार्टी के बंटने का भी खतरा हो। अब जेडीयू के लोगों के सामने ऑप्शन यही होगा कि वे या तो बीजेपी की छत्रछाया में रहें या बीजेपी जॉइन कर लें। अगर निशांत उप-मुख्यमंत्री बनते हैं, तो पार्टी उनके नाम पर एकजुट रह सकती है। संजय झा जैसे नेता अंतरिम कमान संभाल सकते हैं, लेकिन लॉन्ग टर्म की लीडरशिप के लायक पार्टी में कोई बड़ा नेता नहीं दिख रहा है। ऐसे में नीतीश के बाद निशांत ही पार्टी की कमान संभाल सकते हैं। या फिर भविष्य में पार्टी का विलय बीजेपी में हो जाए तो कोई अचंभित करने वाली बात नहीं होगी।

जद-यू में नीतीश के बाद बड़ा नेता नहीं जो सर्वसम्मति से उभर सके
हालांकि जद (यू) में श्रवण कुमार, अशोक चौधरी और विजय कुमार चौधरी जैसे दूसरे दर्जे के नेता हैं, लेकिन कोई भी ऐसा नेता नहीं है जो सर्वसम्मति से उभर सके। ऐसे में नीतीश के बेटे निशांत जेडीयू के लिए सबसे अच्छा विकल्प प्रतीत होते हैं। नीतीश देश के इकलौते क्षेत्रीय राजनेता हैं जिन्होंने लंबे समय तक अपने बेटे को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन अब जब निशांत को आगे बढ़ाया जा रहा है और नई सरकार में उन्हें जगह मिलने की उम्मीद है, तो कई लोग सोच रहे हैं कि क्या बहुत देर हो चुकी है। जेडीयू के एक नेता ने कहा कि निशांत की ताकत और कमजोरी दोनों यही है कि वह नीतीश कुमार के बेटे हैं। उन्हें एक नेता के रूप में तेजी से विकसित होना होगा। उन्होंने अपने पिता की राजनीति को करीब से देखा है। उन्हें बस बिहार में घूमना-फिरना है। अपने पिता की समृद्ध राजनीतिक विरासत के कारण उन्हें जनता का समर्थन और आशीर्वाद दोनों मिलेगा।

बिहार के सीएम का नाम चौंकाने वाला भी हो सकता है!
बीजेपी के लिए यह किसी बड़े अवसर से कम नहीं है। 89 सीटों के साथ, वह अगले कुछ वर्षों में जेडीयू और अन्य छोटे सहयोगी दलों के साथ निर्बाध रूप से सत्ता में बने रहने की उम्मीद कर सकती है। उसकी असली चुनौती 2030 के बाद आएगी और उसे एक मजबूत नेता नियुक्त करने की आवश्यकता है। सुशील मोदी के निधन के बाद से, भाजपा के पास राज्य में और भी चेहरे हैं। 2024 के बाद ही उसे सम्राट चौधरी के रूप में एक मजबूत नेता मिला, जो ओबीसी कुशवाहा निर्वाचन क्षेत्र से आते हैं। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में उनका नाम भी है। लेकिन बीजेपी पिछले एक दशक से मुख्यमंत्री के रूप में कई बार चौंकाने वाले नाम भी सामने लाई है। इसलिए ऐसा भी हो सकता है कि बिहार के नए मुख्यमंत्री का नाम सबको चौंकाने वाला भी हो सकता है। हाल ही में बीजेपी ने बिहार से ही नितिन नबीन को पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाकर सबको चौंकाया है।

बिहार में जीरो से शिखर तक का भाजपा का शानदार सफर
बिहार में भाजपा का सफर वास्तव में “जीरो से शिखर” तक पहुंचने की कहानी है। शुरुआती दौर में पार्टी की मौजूदगी बहुत सीमित थी। लेकिन संगठन के विस्तार, कार्यकर्ताओं की मेहनत और राष्ट्रीय नेतृत्व की रणनीति ने धीरे-धीरे पार्टी को मजबूत किया। अटल-अडवाणी के दौर से शुरू हुआ यह विस्तार अब पीएम नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में नई ऊंचाइयों तक पहुंचा है। बिहार की राजनीति लंबे समय तक गठबंधन की राजनीति से संचालित होती रही है। भाजपा ने भी इस वास्तविकता को स्वीकार करते हुए रणनीति बनाई। जदयू के साथ गठबंधन ने भाजपा को राज्य में स्थायित्व और विस्तार दोनों दिया। लेकिन जनता-जनार्दन के अटूट विश्वास और कार्यकर्ताओं की असीम मेहनत से भाजपा का संगठन इतना मजबूत हो गया कि अब वह अपने दम पर सत्ता का दावेदार बन चुका है। यही कारण है कि सत्ता परिवर्तन की स्थिति में भाजपा पहली बार मुख्यमंत्री पद संभाल सकती है।

मुस्लिम कट्टरपंथियों का दोगलापन : नीतीश पर सियापा, शामली पर सन्नाटा क्यों?

बुर्का/हिजाब विवाद मेरे हिसाब से कई दशक पुराना है। Organiser Weekly के तत्कालीन संपादक प्रो वी पी भाटिया अपना बहुचर्चित स्तम्भ Cabbages & Kings में पता नहीं कितनी बार लिखा कि "burqa is not islamic culture......even attractive and charming boys were asked to go in purdah..." लेकिन कभी किसी ने इसका खंडन नहीं किया। प्रो भाटिया के इस स्तम्भ को लगभग हर शिक्षित मुस्लिम बड़े शौक से पढ़ता था। टीवी परिचर्चाओं में मुस्लिम महिलाओं द्वारा मौलानाओं से यही सवाल पूछने पर बगलें झांकते नज़र आते हैं।    
अगर बुर्का Islamic Culture है तो चीन में दाढ़ी और रोज़ा रखने तक पर पाबन्दी है। किसी भी कट्टरपंथी संस्था ने चीन दूतावास पर धरना या प्रदर्शन करने की हिम्मत की? इतना ही नहीं अब तो विदेशों में बैन लगना शुरू होने पर किसी की आवाज़ नहीं निकल रही। भारत में इसलिए सियापा करते है कि इन कट्टरपंथियों के आगे पाखंडी सेक्युलरिस्ट्स घुटने टेक चुके हैं।   
भारत में बुर्के और हिजाब को लेकर छिड़ी ताजा बहस ने एक बार फिर समाज के दोहरेपन को उजागर कर दिया है। एक तरफ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक महिला डॉक्टर का हिजाब हटाने पर बवाल मचा है, जहाँ पाकिस्तानी डॉन से लेकर देश के तमाम इस्लामी संगठन इसे ‘सम्मान’ की लड़ाई बताकर धमकी दे रहे हैं। लेकिन विडंबना देखिए, ठीक इसी समय उत्तर प्रदेश के शामली से एक रूहँकपा देने वाली खबर आती है, जहाँ एक शौहर ने अपनी बीवी और दो मासूम बच्चों को सिर्फ इसलिए मार डाला क्योंकि महिला बिना बुर्के के अपने मायके चली गई थी।

हैरानी की बात यह है कि नीतीश कुमार के मुद्दे पर आसमान सिर पर उठाने वाले कट्टरपंथी और ‘नारीवादी’ सुर, शामली की उस बेगुनाह माँ और बच्चों की मौत पर पूरी तरह खामोश हैं। यह दोहरा रवैया साफ करता है कि इस देश में मुस्लिम महिलाओं के ‘अधिकार’ क्या होंगे, यह वो खुद नहीं बल्कि कट्टरपंथी जमात तय करती है। जहाँ ईरान जैसे देशों में महिलाएँ हिजाब की बंदिशों से आजादी के लिए जान दे रही हैं, वहीं भारत में बेंगलुरु से लेकर पटना तक, उसी हिजाब को ‘अनिवार्यता’ बनाने के लिए छात्राओं को मोहरा बनाकर सड़कों पर उतारा जा रहा है।

चुनिंदा नारीवाद: जब ‘एजेंडा’ देखकर बदल जाती है संवेदना

भारत में बुर्का विवाद पर होने वाली चर्चा अक्सर ‘सुविधाजनक राजनीति’ की भेंट चढ़ जाती है। यहाँ खुद को नारीवादी (Feminist) और उदारवादी कहने वाले लोगों का एक ऐसा वर्ग है, जिसका रुख घटना के पात्रों को देखकर बदल जाता है। जब नीतीश कुमार जैसे नेता किसी महिला का हिजाब खींचते हैं, तो यही लोग इसे ‘अस्मिता’ और ‘सम्मान’ की लड़ाई बना देते हैं। बॉलीवुड हस्तियाँ वीडियो जारी कर इसे इस्लाम का अपमान बताती हैं और मुख्यमंत्री से इस्तीफे की माँग करती हैं। लेकिन उत्तर प्रदेश के शामली जैसे मामले में ये ‘प्रगतिशील’ स्वर अचानक खामोश हो जाते हैं।

यह मौन बहुत खतरनाक है। यह दर्शाता है कि इन लोगों के लिए ‘महिला अधिकार’ केवल एक राजनीतिक हथियार है। जब कट्टरपंथ की वजह से किसी मुस्लिम महिला की जान जाती है, तो ये लोग इसे ‘मजहबी मामला’ कहकर पल्ला झाड़ लेते हैं, लेकिन जब किसी गैर-मुस्लिम नेता से गलती होती है, तो इसे ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ बना दिया जाता है। शामली की घटना, जहाँ शौहर फारुख ने अपनी बीवी ताहिरा और दो मासूम बेटियों की हत्या कर उन्हें सेफ्टी टैंक में दबा दिया क्योंकि बीवी बुर्का नहीं पहनी थी।

इसके साथ ही, बुर्के की आड़ में कट्टरपंथी सोच एक ऐसा समाज रच रही है जहाँ महिलाओं की पहचान केवल उनके पहनावे तक सीमित कर दी गई है। कट्टरपंथी तत्व बुर्के को ‘सुरक्षा’ का नाम देते हैं, लेकिन हकीकत में यह नियंत्रण का एक माध्यम है। बुर्के की आड़ में कई बार ऐसी आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया जाता है जहाँ अपराधी की पहचान करना नामुमकिन हो जाता है। चाहे वह मतदान केंद्रों पर फर्जी वोटिंग की कोशिश हो या संदिग्ध गतिविधियों में शामिल होना, बुर्का एक सुरक्षा कवच के बजाय एक ढाल की तरह इस्तेमाल होने लगा है। जब तक समाज इस कट्टरपंथी सोच और नारीवाद के दोहरे मापदंडों को नहीं पहचानेगा, तब तक नुसरत परवीन जैसी महिलाएँ राजनीति का मोहरा बनती रहेंगी और शामली जैसी महिलाएँ कट्टरपंथ की भेंट चढ़ती रहेंगी।

दुनिया में क्यों बढ़ रही है बुर्का बैन की माँग?

 दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में बुर्का और नकाब को लेकर बहस तेज होती जा रही है। भारत में इसे कई बार महिला अधिकार और पसंद से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन कई विकसित देशों में इसे बिल्कुल अलग नजरिए से देखा जा रहा है। वहाँ बुर्का को महिलाओं पर दबाव का प्रतीक और सार्वजनिक सुरक्षा के लिए खतरा माना जा रहा है। यही वजह है कि यूरोप और अन्य देशों में बुर्का बैन की माँग लगातार बढ़ रही है।

यूरोप में बुर्का पर रोक की लहर- यूरोप के कई देशों ने बीते कुछ सालों में बुर्का और नकाब पर सख्त कदम उठाए हैं। हाल ही में स्वीडन की उप प्रधानमंत्री एब्बा बुश ने सार्वजनिक जगहों पर बुर्का और नकाब पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाने की बात कही। उन्होंने साफ कहा कि यह महिलाओं के लिए एक तरह का उत्पीड़न है, जिसे सहन नहीं किया जाना चाहिए।

फ्रांस 2011 में ऐसा पहला देश बना, जिसने सार्वजनिक स्थानों पर चेहरा ढकने वाले कपड़ों पर पूरी तरह रोक लगा दी। इसके बाद बेल्जियम, ऑस्ट्रिया, डेनमार्क और नीदरलैंड जैसे देशों ने भी इसी तरह के कानून बनाए। इन देशों का कहना है कि खुले समाज में लोगों को एक-दूसरे को पहचानने का अधिकार होना चाहिए।

बुर्का बैन के पीछे सबसे बड़ा कारण सुरक्षा को बताया गया। यूरोपीय देशों की सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि चेहरा ढकने से किसी व्यक्ति की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इससे अपराध और आतंकी गतिविधियों को छिपने का मौका मिल सकता है।

इसी वजह से चीन के शिंजियांग प्रांत और श्रीलंका जैसे देशों ने भी बम धमाकों और आतंकी हमलों के बाद सार्वजनिक जगहों पर लंबी दाढ़ी और बुर्का पहनने पर पाबंदी लगाई। सरकारों का कहना है कि सुरक्षा के मामले में कोई समझौता नहीं किया जा सकता।

यूरोप में बुर्का को केवल सुरक्षा का मुद्दा नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे लैंगिक असमानता से भी जोड़ा जा रहा है। कई देशों का तर्क है कि बुर्का महिलाओं को समाज से अलग-थलग कर देता है और उन्हें मुख्यधारा से दूर कर देता है।

यूरोपीय नेताओं का कहना है कि अगर कोई महिला समाज का हिस्सा बनना चाहती है, तो उसे पूरी तरह ढका हुआ नहीं रहना चाहिए। उनके अनुसार, चेहरा छिपाने से संवाद, पढ़ाई, नौकरी और सामाजिक मेल-जोल में रुकावट आती है।

पुर्तगाल की संसद ने हाल ही में बुर्का बैन से जुड़े एक बिल को मंजूरी दी है। इस कानून के तहत सार्वजनिक स्थानों पर नकाब पहनने पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है। दूसरे यूरोपीय देशों में भी इसी तरह के नियम लागू हैं, जहाँ बार-बार नियम तोड़ने पर जुर्माने के साथ सजा का प्रावधान है। इन देशों का साफ कहना है कि मजहब निजी मामला है, लेकिन सार्वजनिक जगहों पर नियम सभी के लिए एक जैसे होने चाहिए।

ऑस्ट्रेलिया में भी सांसद पॉलिन हैनसन संसद में बुर्का पहनकर पहुँचीं, ताकि यह दिखा सकें कि चेहरा ढककर किसी सार्वजनिक जगह पर जाना सुरक्षा के लिए कितना जोखिम भरा हो सकता है। उनका कहना है कि अगर आम लोग चेहरा ढककर हर जगह जा सकते हैं, तो सुरक्षा व्यवस्था कमजोर पड़ सकती है। इस कदम पर उनकी आलोचना भी हुई, लेकिन मुद्दे को लेकर बहस भी हुई।

पश्चिमी देशों का मानना है कि खुले और आधुनिक समाज में पहचान छिपाने की परंपरा को बढ़ावा नहीं दिया जा सकता। उनके लिए यह सिर्फ कपड़ों का मुद्दा नहीं, बल्कि समानता, सुरक्षा और सामाजिक मेल-जोल से जुड़ा सवाल है। यही वजह है कि दुनिया के कई हिस्सों में बुर्का बैन की माँग लगातार तेज होती जा रही है।

क्या वाकई इस्लाम में बुर्का या हिजाब अनिवार्य है?

बुर्का या हिजाब को लेकर दुनिया दो धड़ों में बँटी हुई है। कट्टरपंथी सोच इसे इस्लाम का अभिन्न हिस्सा और महिलाओं के लिए ‘अनिवार्य’ (Mandatory) बताती है, लेकिन यदि गहराई से कुरान और इस्लामी सामग्रियों का लिखित विश्लेषण करेंगे, तो तस्वीर कुछ अलग नजर आती है।

कुरान इस्लाम की बेवसाइट के ट्रू इस्लाम में जानकारी दी गई है। इसका टाइटल ‘बुर्का- इस्लामी या सांस्कृतिक?’। कुरान में ‘हिजाब’ शब्द का जिक्र सात बार आया है। लेकिन इसका इस्तेमाल महिलाओं के पहनावे या ड्रेस कोड के संदर्भ में नहीं किया गया है। वहाँ हिजाब का अर्थ एक ‘पर्दा’ या ‘अवरोध’ (Barrier) है, जो दो चीजों के बीच अलगाव पैदा करता है। कुरान की आयत 24:31 और 33:59 शालीनता (Modesty) की बात करती हैं। आयत 24:31 महिलाओं को अपना ‘सीना’ (जयब) ढकने का निर्देश देती है, न कि चेहरे या बालों को पूरी तरह ढँकने का।

                                      बुर्का-हिजाब पर कुरान व इस्लामी इतिहास क्या कहता है?

इस्लामी विद्वानों का एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि चेहरे को पूरी तरह ढकना (नकाब या बुर्का) एक मजहबी उर्फ यानि सांस्कृतिक परंपरा है, जो समय के साथ मजहबी रंग में रंग गई। यदि चेहरा ढकना अनिवार्य होता, तो कुरान की वह आयत बेमानी हो जाती जो पुरुषों को अपनी निगाहें नीची रखने और महिलाओं की ‘सुंदरता’ से आकर्षित न होने की सलाह देती है।

चेहरा ढका होने पर सुंदरता और आकर्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता। आज के दौर में सऊदी अरब जैसे देशों में भी ‘अबाया’ (ढीला वस्त्र) अनिवार्य नहीं रहा, जबकि तालिबान शासित अफगानिस्तान में बुर्का न पहनना मौत को दावत देने जैसा है। यह विरोधाभास साबित करता है कि बुर्का पहनना मजहब से ज्यादा उस देश की सत्ता और वहां के कट्टरपंथियों की सनक पर निर्भर करता है।

भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में संविधान हर नागरिक को अपनी पसंद के कपड़े पहनने और धर्म का पालन करने की आजादी देता है, लेकिन जब यह ‘पसंद’ दबाव में बदल जाती है, तो वह शोषण बन जाती है।

मजहब, अधिकार और असुरक्षा की त्रिवेणी

नीतीश कुमार का मामला हो या शामली का हत्याकांड, केंद्र में ‘बुर्का’ ही है। समस्या बुर्के के कपड़े में नहीं, बल्कि उसे पहनने या न पहनने के पीछे छिपे ‘दबाव’ में है। यदि कोई महिला अपनी स्वेच्छा से इसे पहनती है, तो वह उसका अधिकार है, लेकिन यदि इसे न पहनने पर उसे नौकरी छोड़ने पर मजबूर किया जाए या उसकी जान ले ली जाए, तो यह मजहब नहीं, बल्कि अपराध है।

भारत में इस मुद्दे पर हो रही चर्चा में सबसे बड़ी कमी ‘ईमानदारी’ की है। हम एक तरफ तो आधुनिक भारत का सपना देखते हैं, लेकिन दूसरी तरफ सात साल की बच्चियों को बुर्के में लपेटकर उनकी मानसिक आजादी को कुचलने वाली सोच पर चुप रहते हैं। पाकिस्तान के डॉन द्वारा दी गई धमकी यह बताती है कि यह मुद्दा केवल आस्था का नहीं बल्कि वर्चस्व का है। यदि हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि किसी भी महिला की पहचान उसकी योग्यता और उसके चेहरे से होनी चाहिए, न कि उस कपड़े के टुकड़े से जो उसे समाज से अलग करता है। अंततः, आजादी केवल कपड़े पहनने की नहीं, बल्कि बिना डरे जीने की होनी चाहिए।

बिहार : हार देख राहुल गाँधी ने किया सरेंडर? चुनाव से ठीक पहले सीन से गायब हैं राहुल गाँधी कांग्रेस के ‘पार्ट टाइम’ नेता; फिर चीख-पुकार होगी वोट चोरी हो गया

क्या बिहार में चुनाव राज्य सरकार के लिए हो रहा है या जातिगत सियासत का, जिसमे चुनाव आयोग बेगानी शादी में दीवाना बना हुआ है? एक छोटे राज्य में जातियों के नाम पर कितनी पार्टियां बनी हुई हैं। हर कस्बे का खलीफा नेता बन सौदेबाज़ी कर देशभक्त नज़र आ रहा है। ऐसे सौदेबाज़ न देश का भला कर सकता है, न राज्य का और ना ही अपनी जाति का, बल्कि अपनी रोजी-रोटी का जुगाड़ कर रहे हैं। दूसरे, मिडिल क्लास वाले नेता बने फिर रहे हैं और उससे ज्यादा शिक्षित लोग कम पढ़े की जी-हजूरी कर शिक्षा को ही बदनाम कर रहे हैं। 

खैर, बिहार में चुनावी रंग चढ़ चुका है। 6 नवंबर को पहला फेज वोटिंग होने वाला है और कैंपेनिंग 4 नवंबर तक चलेगी। एक हफ्ता बाकी है, लेकिन महागठबंधन के कैंप में हड़कंप मचा हुआ है। एक तरफ NDA के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार रोज रैलियाँ कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ विपक्ष का चेहरा माने जाने वाले राहुल गाँधी सीन से गायब। दो महीने से बिहार नहीं आए, न रैली की, न सड़क पर उतरे। आखिरी दौरा तो 1 सितंबर को हुई थी, जब ‘वोटर अधिकार यात्रा’ खत्म करने पटना आए थे।

प्रधानमंत्री मोदी तो जैसे बिहार को अपना दूसरा घर बना चुके हैं – हर दूसरे दिन रैली, हर रैली में विपक्ष पर जोरदार हमला। इस दौरान राहुल गाँधी पूरी तरह से गायब हो चुके हैं। लेकिन वोटर अधिकार यात्रा के दौरान बिहार के कोने-कोने में घूमने वाले राहुल गाँधी नदारद हैं। चुनाव का बिगुल बज चुका है, पहले चरण का नामांकन तक खत्म हो गया, लेकिन राहुल साहब कहीं नजर नहीं आ रहे। ये सवाल अब सिर्फ बीजेपी वाले नहीं पूछ रहे, कांग्रेस के अपने कार्यकर्ता भी परेशान हैं।

राहुल गाँधी की लंबी अनुपस्थिति: पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स या रणनीतिक चुप्पी?

बिहार चुनाव के ठीक बीच में राहुल गाँधी का गायब होना किसी रहस्य फिल्म जैसा लग रहा है। 1 सितंबर के बाद से दो महीने बीत चुके, लेकिन वो बिहार की सरजमीं पर कदम नहीं रखे। न रैली की, न प्रेस कॉन्फ्रेंस, न ही वर्चुअल तरीके से समर्थन दिया। जबकि पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, आरजेडी नेता तेजस्वी यादव जैसे नेता तो रोज मैदान में हैं।
कांग्रेस के अंदर भी बेचैनी है। बिहार प्रदेश कांग्रेस कमिटी (BPCC) के एक सीनियर पदाधिकारी ने कहा, “राहुल जी ने वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी में जान डाली थी, लेकिन अब उनकी अनुपस्थिति महँगी पड़ रही। दिल्ली में इमरती बनाते दिखे, लेकिन बिहार में नहीं।” डेक्कन हेराल्ड की रिपोर्ट में भी यही चिंता जताई गई – राहुल की गैरमौजूदगी महागठबंधन की संभावनाओं को प्रभावित कर रही। X पर भी डिबेट छिड़ी हुई है।
हालाँकि AICC जनरल सेक्रेटरी KC वेणुगोपाल ने कहा, “राहुल छठ पूजा के बाद आएँगे। 29 अक्टूबर को मुजफ्फरपुर में तेजस्वी के साथ जॉइंट रैली और प्रियंका 28 को बिहार पहुँचेंगी।” लेकिन ये आखिरी मिनट की बात लगती है। राहुल की अनुपस्थिति पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स जैसी हो या स्मार्ट स्ट्रैटेजी। इसका असर तो बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों के साथ समझ में आ ही जाएगा।

वोटर अधिकार यात्रा से जोश जगाने के बाद सन्नाटा क्यों?

अब बात उस ‘वोटर अधिकार यात्रा’ की, जिसने बिहार में हंगामा मचाया था। सितंबर में शुरू हुई ये यात्रा गाँव-गाँव घूमी, राहुल ने EVM पर सवाल उठाए, वोट चोरी का हाइड्रोजन बम फोड़ने की बात की। 1 सितंबर को पटना में राहुल गाँधी को न तो मनचाहा समापन मिल पाया और न ही किसी जनसभा को संबोधित कर पाए।
लेकिन उसके बाद? कुछ नहीं। यात्रा खत्म, राहुल दिल्ली चले गए और बिहार वाले अकेले रह गए। कॉन्ग्रेस कार्यकर्ता परेशान हैं। यहाँ तकि इंडी गठबंधन के पोस्टरों से उनकी तस्वीर तक गायब कर दी गई।
बिहार प्रदेश कांग्रेस कमेटी के एक पदाधिकारी ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “वोटर अधिकार यात्रा से पार्टी में नई जान आई, लेकिन राहुल की अनुपस्थिति से वो जोश ठंडा पड़ गया।” ये अनुपस्थिति महागठबंधन को नुकसान पहुँचा रही है। कॉन्ग्रेस के नेता राहुल को बुलाने की माँग कर रहे। अब 29 को रैली से शायद जोश लौटे, लेकिन देर हो चुकी। बिहार के लोग कह रहे, “यात्रा तो चली, लेकिन चुनाव लड़ना भूल गए क्या?”

तेजस्वी पर सहमति के बाद कांग्रेस पड़ी ढीली

CM चेहरा तय करने में भी देरी। लालू दबाव डालते रहे, तेजस्वी को नाम दो। कॉन्ग्रेस टालती रही, फिर गहलोत भेजे गए। आखिरकार 23 अक्टूबर को घोषणा की गई कि तेजस्वी यादव ही सीएम पद का चेहरा होंगे, लेकिन इसके बाद से कॉन्ग्रेस पूरी तरह ठंडी पड़ गई। अब 29 अक्टूबर को राहुल-तेजस्वी की जॉइंट रैली है, लेकिन इसका सारा क्रेडिट साफ तौर पर आरजेडी ले जाएगी।
कॉन्ग्रेस उम्मीदवार परेशान हैं। एक कैंडिडेट ने बताया (नाम नहीं लूँगा, लेकिन असल बात है) – “हम पोस्टर लगा रहे हैं, घर-घर जाकर वोट माँग रहे हैं। लोग पूछते हैं, राहुल जी कहाँ हैं? उनका भाषण सुनना चाहते हैं। बिना उनके मंच खाली लगता है।” कई सीटों पर तैयारी आधी-अधूरी ही है।
सियासी जानकार कहते हैं – राहुल की स्टाइल है। भारत जोड़ो यात्रा जैसी मेगा इवेंट करते हैं, फिर ब्रेक। लेकिन चुनाव में ये महँगा पड़ता है। 2020 में बिहार चुनाव में भी कॉन्ग्रेस 70 सीटों पर लड़ी, 19 जीती। इस बार भी वही रास्ता। ऐसे में अगर विपक्षी गठबंधन को हार मिलती है, तो फिर से वही ईवीएम का रोना रोया जाएगा।

राहुल की पार्ट-टाइम पॉलिटिक्स वाली पुरानी बीमारी फिर से जाग गई?

बिहार में कांग्रेस का जोश ठंडा पड़ चुका है, लेकिन पार्टी कार्यकर्ताओं में जोश जगाने के बजाय कांग्रेस नेता राहुल गाँधी दिल्ली में इमरती छानते दिखे। कांग्रेस के अंदर कोहराम मचा हुआ है। उम्मीदवार राज्य के नेताओं पर टिकट के बदले उगाही का आरोप लगा रहे हैं। यहाँ तक कि पप्पू यादव पर भी कई लोगों को टिकट बाँटने का आरोप लग रहा है। ऐसे में राहुल गाँधी हैं कहाँ? पार्टी को एकजुट करने के लिए वे क्या कर रहे हैं? ये सवाल बिहारियों के दिमाग में है। 
राहुल गाँधी की विदेश यात्राओं की संख्या लगातार बढ़ती रही है। पिछले नौ महीनों में उन्होंने कम से कम छह विदेश यात्राएँ की हैं, जिनमें टेक्सस, इटली, वियतनाम, दुबई, कतर, मलेशिया और साउथ अमेरिका शामिल हैं। विदेश यात्रा के दौरान उनके कई बयान विवादों में रहते हैं।
उदाहरण के लिए, वर्जीनिया में सिखों के बारे में उनकी टिप्पणी और अमेरिका यात्रा पर उनकी टिप्पणियाँ विवादास्पद रही हैं। विपक्षी नेता होने के नाते उनके विदेश यात्राओं के खर्च और प्रोटोकॉल पर भी सवाल उठते हैं। इसके बावजूद वो चुनाव जैसे अहम मौकों पर गायब हो जाते हैं। सोचिए, बीते कुछ दिनों से वो विदेश नहीं भी गए, तब भी वो बिहार चुनाव में बिल्कुल भी सक्रिय नहीं रहे।
हालाँकि कांग्रेस पार्टी प्रवक्ता लगातार अपनी पार्टी का बचाव करते नजर आए हैं। कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने कहा कि राहुल जी का कार्यक्रम तय हो गया है। बिहार में उनकी रैलियों की योजना बनाई जा रही है। हम भीड़ की राजनीति नहीं, बल्कि मुद्दों पर आधारित राजनीति करते हैं।
बीजेपी राहुल गाँधी की अनुपस्थिति को चुनावी मुद्दा बना रही है। बीजेपी प्रवक्ता संजय मयूख ने कहा कि राहुल गाँधी को बिहार के मतदाताओं पर भरोसा नहीं है। इसीलिए वो चुनावी मैदान से गायब हैं। राहुल गाँधी की अनुपस्थिति बिहार में अब चर्चा का विषय बन चुकी है। अब तो कांग्रेस प्रत्याशी और समर्थक भी राहुल गाँधी के इंतजार में है कि वह कब बिहार आकर चुनाव में बिगुल फूँकते हैं.. बाकी सवाल उनके मन में भी है कि कहीं वाकई इस बार देर तो नहीं हो गई?

सुनो कंचना यादव! जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, इसलिए आज भी डरता है बिहार: TV पर गों-गों मत करो, हाई कोर्ट ने लालू-राबड़ी राज को ‘नरक’ भी कहा था

लालू यादव के लिए जंगलराज का शब्द पटना हाई कोर्ट की तरफ से 1997 में कहा गया था (साभार : ABP & Kanchana Yadav)
बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। एक बार फिर बिहार में नीतीश राज के विकास और लालू राज के ‘जंगलराज’ को लेकर जमीनी स्तर पर चर्चा होने लगी है। RJD के नेता और प्रवक्ता किसी भी तरह खुद को अपनी ‘जंगलराज’ की छवि से बचाने में लगे हैं। इसी बीच, RJD प्रवक्ता कंचन यादव ‘जंगलराज’ शब्द कहाँ से जन्मा है इसका सबूत आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से लाइव डिबेट में माँगा।

अब तक तेजस्वी यादव में जितना चुनावी प्रचार किया है अपने आपको प्रसारित किया है लालू का नाम तक नहीं लिया, क्योकि सच्चाई जानते हैं पिता का नाम लेने पर जनता के दिमाग में "जंगल राज" और "नौकरी के बदले जमीन घोटाला" आ गया तो चुनाव ही हाथ से निकल जाएगा।      

कहाँ से आया जंगलराज शब्द?- RJD प्रवक्ता

हाल ही में एक टीवी डिबेट में RJD प्रवक्ता कंचन यादव ने जब आजतक की एंकर अंजना ओम कश्यप से यह सवाल किया गया कि ‘जंगलराज’ शब्द का जन्म कहाँ से हुआ?, तो अंजना ओम कश्यप ने जवाब दिया, “पटना हाई कोर्ट ने यह शब्द मौखिक रूप से इस्तेमाल किया था।”

आरजेडी प्रवक्ता कंचन यादव ने इस पर आपत्ति जताते हुए ट्वीट किया और चुनौती दी कि अगर कोर्ट ने ऐसा कहा हो तो आदेश निकालकर दिखाएँ। आरजेडी की प्रवक्ता ने यह भी कहा कि यह शब्द बीजेपी और मीडिया ने मिलकर फैलाया है, कोर्ट ने कभी ‘जंगलराज’ जैसे शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।

जब हाईकोर्ट ने कहा था ‘बिहार में कोई सरकार नहीं, जंगलराज है’

सच्चाई यह है कि 1997 में पटना हाई कोर्ट ने एक याचिका की सुनवाई के दौरान मौखिक टिप्पणी में कहा था कि ‘बिहार में नाम के लायक कोई सरकार नहीं है, और यहाँ जंगलराज चल रहा है’। यह टिप्पणी जस्टिस बीपी सिंह और जस्टिस धर्मपाल सिन्हा की बेंच ने की थी। टिप्पणी किसी राजनीतिक केस में नहीं, बल्कि पटना की बदहाल नगर व्यवस्था और जलजमाव को लेकर थी। जजों ने पटना को ‘Veritable Hell’ यानी ‘वास्तविक नरक’ कहा था।

यह टिप्पणी सीधे तौर पर प्रशासनिक उदासीनता और शहर की गंदगी पर थी, न कि किसी आपराधिक मामले पर। कोर्ट ने यहाँ तक कह दिया था कि पटना भारत की सबसे गंदी राजधानी होने का दावा कर सकता है। कोर्ट ने भ्रष्ट नौकरशाहों को प्रशासन चलाने के लिए जिम्मेदार ठहराया था।

जंगलराज 2.0: अब भी डर कायम है?

आज तेजस्वी यादव खुद को ‘नई सोच का नेता’ कहकर पेश करते हैं। लेकिन सच यही है कि लालू यादव की RJD का नाम आते ही अब भी बिहार के कई हिस्सों में लोग डरने लगते हैं। पटना से गया तक कई जगहों पर युवाओं, व्यापारियों, महिलाओं में अब भी यह चिंता बनी रहती है कि अगर राजद सत्ता में लौटी तो क्या फिर वही 90 के दशक जैसा डर लौट आएगा?

 जंगलराज कोई अखबार की हेडलाइन नहीं, वह बच्चा है जो स्कूल जाने से पहले माँ की आँखों में डर देखता है। वह व्यापारी है जो दुकान की गल्ले पर बैठा हर आहट पर चौंकता है। वह बेटी है जो कॉलेज जाते वक्त हर मोड़ पर डरती है कि कहीं पीछे कोई बाइक न आ जाए।

और इसीलिए, जंगलराज सिर्फ एक शब्द नहीं, बिहार के उस दौर की बदनसीबी का नाम है… एक ऐसा नाम, जिसे आज भी सुनते ही लोग सिहर उठते हैं।

बिहार : पहलगाम की तरह दरभंगा में जेहादियों ने दरभंगा में लोगों ने राह चलते हिंदुओं पर धर्म पूछ लाठी-तलवार से किए हमले; पाकिस्तान परस्तों को तुरंत गिरफ्तार कर सारी सरकारी सुविधाओं से ब्लैकलिस्ट किया जाए

                                                बिहार के दरभंगा में हिंदुओं पर धर्म पूछकर हमला
पहलगाम आतंकी हमले में 22 अप्रैल को हिंदुओं को धर्म पूछकर मौत के घाट उतारा गया और अब बिहार के दरभंगा में धर्म पूछकर हिंदुओं पर हमला करने का मामला सामने आया है। पीड़ितों ने बताया है कि सड़क किनारे खड़े होकर कुछ मजहबी लोगों ने उनसे पहले उनका धर्म पूछा और फिर बाद में उनपर लाठी-डंडा और तलवार से हमला किया।

इस घटना में कई लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की बात सामने आई है और पुलिस द्वारा 4 लोगों की गिरफ्तारी की जानकारी दी गई है।

दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी घटना जाले थाना क्षेत्र की है। पीड़ितों की पहचान राजकिशोर यादव, रामसागर यादव, अमित कुमार, सुमित कुमार, रंजीत यादव, ऋतिक यादव, मिथिलेश यादव, लक्ष्मण यादव, सोनू कुमार, दिनेश मांझी के तौर पर हुई है।

पीड़ितों ने बताया कि वो लोग 6 मई को शाम 7 बजे बहेड़ा पोखर के पास मुस्लिम समुदाय के युवक लाठी, भाला, तलवार, रॉड और पिस्टल लेकर खड़े थे। जैसे ही वो लोग उस रास्ते से गुजरे वहाँ उनसे पहले उनका धर्म पूछा गया और फिर जानलेवा हमला कर दिया गया।

घायलों में एक अमित कुमार भी हैं। अमित ने बताया कि उन लोगों ने पहले धर्म पूछा और जैसे ही हमने खुद को हिंदू बताया, उन लोगों ने हमला कर दिया। वो लोग बस हिंदुओं को मार रहे थे।

घटना में कुल 11 लोग घायल हुए हैं। इनमें एक इन्हें सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र जाले में भर्ती कराया गया है। कुछ लोगों की हालत गंभीर है। वहीं कुछ को इलाज के बाद छुट्टी दे दी गई।

घटना के संबंध में लक्ष्मण कुमार यादव, मनोज कुमार यादव, सोनू यादव, दिनेश यादव, संजय यादव ने थाने में शिकायत दी है।

एफआईआर में 21 आरोपितों का नाम दिया गया है। इनमें कुरबान कुरैशी इरफान कुरैशी, सलमान इब्रान कुरैशी, पप्पू कुरैशी, मेराज, रेयाज, आसिफ, इम्तियाज, सरफरराज, एजाज, शहनवाज, दर्जी रिजवान के नाम हैं।

इस पूरे मामले में बता दें कि ये भी कहा जा रहा है कि ये विवाद स्कूटी में टक्कर लगने के बाद शुरू हुआ। टक्कर ऋतिक और दर्जी नूर आलम की बेटे की स्कूटी के बीच हुई थी। ऋतिक ने जब नुकसान का मुआवजा माँगा तो नूर का बेटा आनाकानी करने लगा। ऋतिक ने स्कूटी अपने पास रख ली और कहा स्कूटी अगले दिन मिलेगी।

इसके बाद दोनों को समझाया गया और मामला शांत कराकर उन्हें वापस भेज दिया गया। लेकिन, अगले दिन मुस्लिम भीड़ इकट्ठा हुई और फिर हिंदुओं को निशाना बनाने लगी।

पुलिस कार्रवाई की बात करें तो यही पता चला है कि इस केस में 4 लोग गिरफ्तार हुए हैं और आगे की कार्रवाई के लिए जाँच जारी है। पूरे मामले में पुलिस ने शांति-व्यवस्था बनाए रखने के लिए थाना परिसर में शांति समिति की बैठक कराई। थानाध्यक्ष ने बताया कि अन्य आरोपितों की तलाश के लिए छापेमारी जारी है।

पंजाब में स्थानीय भीड़ ने बिहारी स्टूडेंट्स पर बोला हमला… हाथ में तलवारें, छात्र लहूलुहान

          भटिंडा में बिहार के छात्रों पर हमले की रिपोर्ट्स (फोटो साभार: Bhaskar/X_SatyamS66192465)
पंजाब के बठिंडा में गुरु काशी यूनिवर्सिटी के कैंपस में बिहार के छात्रों पर हमलों की खबर आ रही है। न्यूज 18 की रिपोर्ट के मुताबिक, बिहारी छात्रों को निशाना बनाकर तलवारों से हमला किया गया। कई छात्रों के सिर फट गए, हड्डियाँ टूट गईं और खून से लथपथ हालत में वो मदद की गुहार लगा रहे हैं।

बठिंडा के गुरु काशी यूनिवर्सिटी के पीड़ित छात्रों का कहना है कि पिछले 5 दिनों से हालात भयावह बने हुए हैं। इनमें बीटेक, बीफार्मा, बीसीए, एमसीए, एमबीए जैसे कोर्स के छात्र शामिल हैं, जो पढ़ाई के लिए घर से इतनी दूर आए थे। लेकिन अब उनकी जान पर बन आई है।

छात्रों ने बताया कि हमलावरों में स्थानीय लोग भी शामिल थे, जिन्होंने बेरहमी से तलवारें चलाईं। दो दर्जन से ज्यादा छात्र घायल हैं और कुछ की हालत गंभीर है। छात्रों का आरोप है कि पंजाब पुलिस ने उनकी मदद करने की बजाय उल्टा बिहारी छात्रों को ही हिरासत में ले लिया।

छात्रों का आरोप है कि यूनिवर्सिटी के सुरक्षा गार्ड भी हमलावरों के साथ मिले हुए थे और उन्होंने फायरिंग तक की। लहूलुहान छात्रों ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और शिक्षा मंत्री को मेल भेजकर मदद माँगी है। इस घटनाक्रम से जुड़े फोटो और वीडियो सोशल मीडिया पर भी वायरल हो रहे हैं।

वहीं, यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. एसके बावा ने कहा कि ये झगड़ा बिहारी और पंजाबी छात्रों के बीच नहीं, बल्कि बिहार के छात्रों के दो गुटों के बीच हुआ था। एक गुट ने अपने स्थानीय दोस्तों को बुला लिया, जिससे बात बिगड़ गई। डॉ. बावा ने कहा कि हमलावर छात्रों की पहचान कर ली गई है और उन्हें यूनिवर्सिटी से निकाल दिया जाएगा।

‘वे सिर्फ आँख सेंकने जा रहे हैं’: नीतीश कुमार की ‘महिला संवाद यात्रा’ पर लालू यादव के बिगड़े बोल; क्या अपनी आंखें सेकने के लिए ममता की वकालत कर रहे हो लालू जी?

                                                         नीतीश कुमार, ममता बनर्जी और लालू यादव 
राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। लालू ने कहा कि नीतीश कुमार ‘महिला संवाद यात्रा’ के नाम पर नयन सुख लेने जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार पहले अपनी आँख सेंके, फिर बिहार विधानसभा चुनावों में 225 सीट लेने की बात करेंगे। लालू ने INDI गठबंधन को लेकर कांग्रेस  को भी झटका दिया है।

दरअसल, बिहार की महिलाओं से संवाद स्थापित करने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जल्द ही ‘महिला संवाद यात्रा’ निकालने जा रहे हैं। वे अलग-अलग जिलों में जाकर महिलाओं से बातचीत करेंगे और उनकी समस्याओं एवं सरकारी योजनाओं को लेकर उनके विचार सुनेंगे। इसको लेकर विपक्षी दल राजद के तेजस्वी यादव ने कहा कि नीतीश कुमार यात्रा के नाम पर पैसे की बर्बादी कर रहे हैं।

महिला यात्रा को लेकर जब संवाददाताओं ने लालू यादव से सवाल किए तो उन्होंने कहा, “नीतीश कुमार नयन सेंकने जा रहे हैं।” नीतीश कुमार द्वारा बिहार में NDA को 225 सीटें मिलने के सवाल पर लालू यादव ने कहा, “अरे, पहले वो आँख सेंके ना अपना। जा रहे हैं आँख सेंकने।” लालू यादव के बयान पर जदयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने कहा कि लालू की बुद्धि आज भी चरवाहा विद्यालय वाली ही है।

INDI गठबंधन की कमान ममता को दी जाए: लालू

लालू यादव ने बंगाल के मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के उस दावे का समर्थन किया है, जिसमें उन्होंने INDI गठबंधन की कमान सँभालने की बात कही थी। लालू ने कहा कि INDI गठबंधन की कमान ममता बनर्जी की दी जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के विरोध का कोई मतलब नहीं है। ममता को ही नेता बनाया जाना चाहिए।
सवाल यह हो रहा कि पहले क्यों राहुल गाँधी और कांग्रेस को गले लगा रहे थे? जब देख लिया कि कांग्रेस हो या राहुल दोनों ही थके और बेलगाम है। इनको साथ लिए बिना चुनाव लड़ा होता कुछ इज्जत बच जाती, लेकिन हमारे कंधे बैठ 99 सीट लेकर वाह-वाही लूट रही है कांग्रेस।    

इससे पहले लालू यादव के बेटे एवं राजद के नेता तेजस्वी यादव ने कहा था कि ममता बनर्जी समेत इंडिया ब्लॉक के किसी भी वरिष्ठ नेता द्वारा गठबंधन का नेतृत्व करने पर उन्हें कोई आपत्ति नहीं है। हालाँकि, उन्होंने यह भी कहा था कि इस निर्णय पर आम सहमति से पहुँचा जाना चाहिए। बता दें कि राजद ने दावा किया था कि INDI गठबंधन के असली आर्किटेक्ट लालू हैं।

दरअसल, महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनावों में INDI गठबंधन की करारी हार के बाद तृणमूल कॉन्ग्रेस की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने गठबंधन को संभालने की इच्छा दोहराई थी। उन्होंने कहा था कि वह INDI गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। हालाँकि, ममता बनर्जी के बयान का कांग्रेस ने विरोध किया था। वहीं, जबकि समाजवादी पार्टी और उद्धव ठाकरे गुट ने समर्थन किया था।

एक इंटरव्यू में तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी ने कहा था कि उन्होंने ने ही INDI गठबंधन को बनाया है। अगर इस गठबंधन का इसका नेतृत्व करने वाले इसे ठीक से नहीं चला सकते तो उन्हें (ममता को) मौका दें। ममता ने कहा था कि वह बंगाल से इस गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए तैयार हैं। बता दें कि गठबंधन का नेतृत्व फिलहाल कांग्रेस कर रही है।

जब मोदी विपक्ष में बैठने को तैयार थे, तब नायडू और नीतीश ने देशहित में अनर्थ होने से रोका


जिस तरह सिर्फ 99 आने पर कांग्रेस राष्ट्रवादी पत्रकारों पर प्रहार करने का कुचक्र चला रही है, ये उन सभी के लिए शर्म करने वाली बात है, जिन्होंने लालच और दुष्प्रचार में आकर नरेंद्र मोदी को हराने के वोट दिया। अगर I.N.D.I. गठबंधन के लालच और दुष्प्रचार को दरकिनार कर दिया होता, समस्त गठबंधन 100 से नीचे होता। लालच में वोट देने वाले क्यों नहीं 8500 रूपए मांग रहे। क्यों नहीं कोर्ट जाते, गारंटी कार्ड पर यह नहीं लिखा है कि सरकार बनने पर दिए जायेंगे। मोदी विरोधी जितने मोदी पर प्रहार करेंगे मोदी अब उतना ही सख्त होते जायेंगे। 

दूसरे, जहाँ तक दिमाग जाता है देश में एक ऐसा चुनाव नहीं गया जो बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार के मुद्दे पर न लड़ा गया हो। लेकिन तीनों मुद्दे आज भी मुंह खोले खड़ी हैं। 

तीसरे, दुष्प्रचार किया कि संविधान बदल दिया जायेगा, Uniform Civil Code कानून लाकर मुस्लिमों के अधिकार छीन लिए जायेंगे; विश्व में ऐसा कौन-सा देश अपने यहाँ घुसपैठियों को रहने की इजाजत देता; फिर विश्व में विशेषकर किसी भी मुस्लिम देश में Waqf Board नहीं, फिर भारत में क्यों? जिन लोगों ने खुद सैंकड़ों बदलाव किये वो किस मुंह से संविधान की बात कर रहे हैं। दुष्प्रचारों के दुष्चक्र में वोट देने वालों पूछो कि जवाहर लाल नेहरू से लेकर राजीव गाँधी तक कितने बदलाव किये गए हैं? क्या वह बदलाव देशहित में थे या सिर्फ मुसलमानों को खुश करने? लेकिन हकीकत में मुसलमानों को भी उन बदलावों का लाभ नहीं मिलेगा, वह तो बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना की तरह झूम रहा है। 

खैर, अब करते हैं चुनाव परिणामों के बाद से सोशल मीडिया पर चर्चित निम्न समाचार की। जिसकी मै पुष्टि तो नहीं करता, अगर यह सत्य है, गठबंधन के लिए सुखद समाचार नहीं। लेकिन नीतीश कुमार द्वारा मोदी के पैर छुए जाने का कारण चीख-चीख कर बता रहा है। जो कांग्रेस और I.N.D.I. गठबंधन की बौखलाहट दिखाता है। गठबंधन चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार को अपनी ओर खींचने की कोशिश कर रहा है, लेकिन खाली हाथ रहने पर इनमे बौखलाहट होना स्वाभाविक है। इन्हे मालूम है कि इंदिरा गाँधी से लेकर राजीव गाँधी तक कांग्रेस ने चौधरी चरण सिंह से लेकर चंद्रशेखर तक की सरकारें गिराई हैं। बरहाल, चर्चा है कि देशहित में गठबंधन की कुछ पार्टियां NDA को बाहर से अपना समर्थन देने को तैयार बैठी हैं। अगर ये चर्चा सच साबित हो गयी, विपक्ष 150 या इससे भी नीचे आ सकता है। 

और अगर चुनाव आयोग ने 8500 रूपए मुद्दे पर गंभीरता से निर्णय लिया, पता नहीं गठबंधन की कितनी सीटें बचती है। 

लोकसभा नतीजों के बाद साफ हो गया कि बीजेपी को सिर्फ 240 सीटें मिलेंगी। उस समय  मोदी, राजनाथ सिंह, अमित शाह और नड्डा ने सोच-विचार कर निर्णय लिया कि वे विपक्षी दल में बैठेंगे। और घटक दलों से कहा गया कि आप अपना निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।

इंडी एलायंस को शासन करना चाहिए। तब सबसे पहले चिराग पासवान और शिंदे ने कहा कि हम आपके फैसले में शामिल हैं और हम विपक्षी दल में बैठने के लिए भी तैयार हैं। यहां आपको बता दें कि मोदी को शाम 4 बजे पार्टी दफ्तर आना था लेकिन यही वजह है कि वह देर शाम आए।

दिल्ली में सत्ता के गलियारे में सक्रिय मेरे एक मित्र ने मुझे इस लुभावनी, बेहद नाटकीय और आम आदमी की पहुंच से परे के बारे में 5 जून को ही बताया था।

नायडू और नीतीश को मोदी ने इसी वजह से दोपहर में बुलाया था कि तुम्हारा तुम देखो हमें कोई एतराज नहीं है। मोदी का ये फैसला सुनने के बाद दोनों की हालत खराब हो गई. संक्षेप में, उन दोनों के पैर ठंडे पड़ गए क्योंकि वे इंडी बलों की स्थिति जानते थे। ऐसी व्यवस्था भी की गई कि मोदी के फैसले की खबर इंडी दल को मिल जाएगी।

खड़गे और जयराम रमेश सदमे में थे क्योंकि वे इस स्थिति का सामना करने के लिए मानसिक रूप से तैयार नहीं थे। हालाँकि, उन्होंने इस खबर को बाहर नहीं आने दिया और शरद पवार से केवल नीतीश और नायडू से बात कराई। उनके अनुरोध के अनुसार, पवार चाचा ने नीतीश को फोन किया।
तब नीतीश ने शरद पवार से पूछा कि आपको कैसे पता चला कि मोदी विपक्षी पार्टी में शामिल होने के लिए तैयार हैं? शरद पवार ने नीतीश से कहा कि मुझे इस बात का एहसास नहीं है
। मैंने तो बस आपसे संपर्क करने के लिए कहा था। तब नीतीश जी ने शरद पवार को सब कुछ बताया, और यह भी पूछा कि सभी के खाते में 8500 रुपये देने होंगे, कांग्रेस ने लोगों से दो बड़े वादे किए हैं कि पिछड़े वर्गों को धन वितरित करना होगा प्रधानमंत्री बनेंगे? यह सुनकर पवार को एहसास हुआ कि उन्हें अंधेरे में रखा जा रहा है और उनका दिमाग खराब हो गया है तो उन्होंने सबसे पहले अखिलेश यादव को फोन किया और कहा कि भाई ऐसा कुछ हो गया है और कांग्रेस उन्हें अंधेरे में रखकर कुछ कर रही है। इतना सब होने के बाद पवार ने खड़गे को फोन किया और उनसे पूछा कि आपने मुझे यह क्यों नहीं बताया कि बीजेपी विपक्षी पार्टी के साथ जाने की तैयारी कर चुकी है, तब खडगे ने पवार से कहा कि मैंने आपको इसलिए नहीं बताया क्योंकि ऐसी खबरें खूब चल रही थीं पहले प्रधानमंत्री तय करें फिर हम आगे बढ़ेंगे, इसी बीच अखिलेश यादव ने भी खड़गे को फोन किया और कहा कि मैं उनसे पूछने के अलावा कुछ नहीं करना चाहता, नहीं तो मैं अकेला बैठ जाऊंगा।
इंडी दल के लिए सबसे बड़ी समस्या यह थी कि प्रति व्यक्ति 8500 रुपये प्रति माह कैसे लिया जाए और इसे पिछड़े वर्गों में कैसे वितरित किया जाए क्योंकि कांग्रेस ने एक बड़ी राशि देने का वादा किया था।

परदे के पीछे शुरू हो चुकी थी जबरदस्त बगावत, जानें क्या था फैसला नायडू और नीतीश कुमार को भी उम्मीद नहीं थी कि मोदी, शाह ऐसा फैसला लेंगे।

नीतीश कुमार और चंद्रबाबू ने बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं से फोन पर संपर्क किया और उन्हें आश्वासन दिया कि हम बीजेपी के साथ रहना चाहते हैं और मोदी को तुरंत सरकार बनानी चाहिए।

बीजेपी की ताकत 240 थी और पासवान, शिंदे, मिलेन और अन्य छोटे सहयोगियों के पास कुल मिलाकर 264 ताकत थी। इतने मजबूत विपक्ष के साथ हम इंडी एलायंस के साथ गठबंधन नहीं करेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह तय थी कि मोदी शाह के खिलाफ बैठकर कोई भजन नहीं करने वाले थे।
इधर, मोदी और शाह को जयंत चौधरी के जरिए इंडी गठबंधन में चल रही असमंजस की जानकारी थी
।

उत्तर प्रदेश और कर्नाटक में बीजेपी ने मुस्लिम समुदाय के बीच यह हवा छोड़ दी कि कांग्रेस की सरकार आ गई है और सभी को बैंक में 8500 रुपये मिलेंगे। इसके चलते बेंगलुरु और लखनऊ के बैंकों में मुस्लिम महिलाओं की कतारें लग गईं।

इंडी गठबंधन के नेताओं के बीच यह सवाल उठा कि अगर हम सरकार बनाते हैं तो हमें वादे के मुताबिक प्रति वर्ष 100,000 रुपये का भुगतान करना होगा, भले ही हम कह सकते हैं कि हम कुछ समय बाद धन को समान रूप से वितरित करेंगे, लेकिन हम कैसे कर सकते हैं यह 8500/ प्रति माह का भुगतान करें? इसलिए, प्रधान मंत्री बनना एक क्रॉस होगा, भले ही महिलाएं आधी आबादी हों, यह प्रति महिला 60 लाख करोड़ रुपये है और यहां लोग बैंक में आने लगे हैं।

तब यह निर्णय लिया गया कि नीतीश और नायडू हमारा यानी इंडी दल का समर्थन करेंगे, कांग्रेस भी बाहर से समर्थन दिखाएगी और सरकार में शामिल नहीं होगी, इसलिए धन देने और धन के समान वितरण का कोई सवाल ही नहीं होगा। कांग्रेस यह कहने के लिए स्वतंत्र होगी कि हमारी सरकार नहीं है. यानी कांग्रेस जनता के बीच अपनी छवि चमका कर फिर से चीत भी मेरी पट भी मेरी का खेल खेल रही थी।

नीतीश और नायडू ने तब जोर देकर कहा कि कांग्रेस का बाहर से समर्थन का ट्रैक रिकॉर्ड अच्छा नहीं था, उन्होंने चरण सिंह, चंद्रशेखर, दैवेगोड़ा, गुजराल को बाहर से समर्थन दिया था और फिर अचानक इसे वापस ले लिया और कुछ ही दिनों में उनकी सरकारें गिरा दीं। हम आपके साथ नहीं आ रहे हैं और मोदी जी वहां इतने मजबूत विपक्ष के साथ चुप नहीं बैठेंगे इतना ही नहीं बिहार में बीजेपी अपना समर्थन वापस ले लेगी और तेजस्वी ने पहले ही बिहार में मुख्यमंत्री पद का दावा नीतीश कुमार के सामने कर दिया है। ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ रहा था। गौर कीजिए कि जब नतीजे घोषित किए जा रहे थे तो पर्दे के पीछे कितनी तेजी से कूटनीतिक गतिविधियां चल रही थीं। तो नीतीश कुमार और नायडू के होश उड़ गए और उन्होंने मोदी और शाह से आग्रहपूर्वक अपील की और आश्वासन दिया कि आप सरकार बनाएं और हम आपके साथ रहेंगे।

गुज्जुभाई मन ही मन हँसे, उसने यह सब नाटक जानबूझ कर किया था। वे या तो इंडी फोर्स और सभी हितधारकों को दिखाना चाहते थे कि 8500 रुपये प्रति माह और धन के समान वितरण का उनका नारा कितना फर्जी था। वह यह भी दिखाना चाहती थी कि आने वाली इंडी गठबंधन सरकार के लिए यह किस तरह गले की फांस है। उसी समय, गुज्जुभाई ने हाथ उठाने का नाटक किया क्योंकि वह एनडीए में दो प्रमुख घटक ताकतों नीतीश और नायडू की सौदेबाजी की शक्ति को कम करना चाहते थे।
महज दो घंटे में नीतीश और नायडू के सिर ठिकाने लगाने का पहला काम सफल हुआ तो अमित शाह ने दूसरा बम यह फोड़ा कि सीसीएस यानी कैबिनेट कमेटी ऑन सिक्योरिटी पूरी तरह से बीजेपी की होगी यानी गृह, वित्त, रक्षा और विदेश मामले हमारे पास रहेंगे. . दोनों बिना कहे तुरंत राजी हो गए. इसके बाद शाम 7:30 बजे नरेंद्र मोदी बीजेपी दफ्तर आए और ऐलान किया कि हम सरकार बनाएंगे और हम अपना कार्यक्रम करेंगे
। आपको याद है मोदी का भाषण कितना आत्मविश्वास भरा था।

पर्दे के पीछे चल रहे ऐसे तमाम तेज राजनीतिक घटनाक्रम के बीच नीतीश कुमार एनडीए की बैठकों में बार-बार कहते रहे कि जल्दी सरकार बनाओ और 9 जून की जगह 8 जून को शपथ लेकर हमारी टेंशन दूर करो बाबा।

इधर 5 जून और 6 जून को भी लखनऊ और बेंगलुरु में लोग पैसे निकालने के लिए बैंक और कांग्रेस दफ्तर में आते रहे। बीजेपी ने हवा भर दी थी कि जाओ पैसे मिल कर रहेंगे।
इसलिए इंडी गठबंधन की शाम की बैठक में यह निर्णय लिया गया कि हमें कुछ नहीं करना चाहिए, अन्यथा हमें जनता के गुस्से का सामना करना पड़ेगा और हमारी लड़ाई होगी और कुछ लोग हम पर फिर से भरोसा नहीं करेंगे। राहुल गांधी का नारा 8500/रु
।

इसलिए खडगे ने पत्रवार्ता में कहा कि हम कोई सरकार नहीं बनाएंगे, सही समय पर भाजपा सरकार को हरा देंगे।

इसे एक शब्द में चाणक्य नीति कहा जाता है, I.N.D.I. गठबंधन और एनडीए में अस्तानी से ये दो पक्षी नीतीश और नायडू लेकिन गुज्जुभाई ने इन दोनों को कुचल दिया। आज 10 जून को कैबिनेट के हिसाब-किताब के आवंटन की जो घोषणा की गई है, उससे साबित होता है कि पूरी स्थिति पर मोदी शाह का नियंत्रण है।
अगर हम यह ध्यान रखें कि यह अटल और आडवाणी की भाजपा नहीं है तो हमें आश्चर्य नहीं होगा।

इसे ही आक्रामक रक्षा कहा जाता है।
मोदी पूरी ताकत से एक्शन में हैं
।

दिल्ली हाई कोर्ट और नितीश कुमार को बम से उड़ाने की धमकी

                                                                                                                साभार: इंडिया टुडे/एबीपी
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और दिल्ली हाई कोर्ट को बम से उड़ाने की धमकी दी गई है। कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को बुधवार (14 फरवरी 2024) की देर शाम को ईमेल मिला, जिसमें कहा गया कि गुरुवार को कोर्ट में बड़ा धमाका करने की बात कही गई है। वहीं, बिहार में नीतीश कुमार को भाजपा से अलग नहीं होने पर उन्हें बम से उड़ाने और उनके विधायकों को जान से मारने की धमकी दी गई है। यह धमकी DGP को ऑडियो क्लिप भेजकर दी गई है।

दरअसल, एक बदमाश ने बिहार के पुलिस महानिदेशक (DGP) आरएस भट्टी को एक ऑडियो क्लिप भेजा। आरोपित ने अपने वीडियो में कहा, “नीतीश को कहें कि वह भाजपा के साथ नहीं जाएँ, वरना उन्हें बम से उड़ा देंगे और उनके विधायकों को भी मारेंगे।” ऑडियो सामने आने के बाद पुलिस ने सोनू पासवान नाम के बदमाश को अरेस्ट कर लिया है। 

ऑडियो क्लिप के बाद आर्थिक अपराध इकाई में पहले सनहा हुआ। इसके बाद प्राथमिकी दर्ज की गई। फिर बिहार पुलिस बदमाश की पहचान में जुट गई। जाँच में पुलिस को पता चला कि धमकी देने वाला आरोपित सोनू पासवान बिहार के ही समस्तीपुर के दयानगर का रहना वाला है और वह बेंगलुरु में बोरी सिलाई का काम करता है।

सोनू को कर्नाटक के देवनगिरी जिले से गिरफ्तार किया गया है। सोनू ने बताया कि यूट्यूब और टीवी चैनलों पर तख्ता पलट की खबरों से विचलित होकर उसने धमकी वाला मैसेज भेजा था। बार-बार तख्ता पलट से बिहार में विकास प्रभावित हो रहा था और गरीबी एवं बेरोजगारी बढ़ रही है। पुलिस ने उसके मोबाइल को भी जब्त कर लिया है।

उधर, दिल्ली हाई कोर्ट में विस्फोट की धमकी मिलने के बाद पुलिस सतर्क हो गई। इसको लेकर भेजे गए ईमेल में कहा गया है, “मैं तुम्हें 15 फरवरी को बम से उड़ा दूँगा। यह विस्फोट दिल्ली में सबसे बड़ा विस्फोट होगा। जितना संभव हो सके उतनी सुरक्षा तैनात कर लो… सभी मंत्रियों को बुला लो। हम तुम सबको एक साथ उड़ा देंगे।”

दिल्ली हाई कोर्ट में विस्फोट की धमकी मिलने के बाद परिसर में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। पूरे परिसर की तलाशी ली जा रही है। हालाँकि, जाँच के बाद परिसर में किसी तरह की संदिग्ध वस्तु नहीं मिली। वहीं, धमकी वाला ईमेल भेजने वाले शख्स की पहचान करने की कोशिश जारी है।

बिहार : ‘5 करोड़ रुपए अभी, 5 करोड़ रुपए नीतीश सरकार गिरने के बाद’: विश्वासमत के बाद तेजस्वी यादव के करीबी पर अपहरण का केस दर्ज

ED की विश्वसनीयता की अग्नि परीक्षा का समय है, जब वह बिहार में करोड़ों के लेन-देन की बात सामने आने पर इसकी जाँच करती है। आखिर यह धन कहाँ से आया और किसने दिया की जाँच जरुरी है?  

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने 129 विधायकों के समर्थन के साथ बहुमत साबित कर दिया, जबकि राजद ने 2 दिनों से अपने विधायकों को पूर्व डिप्टी CM तेजस्वी यादव के आवास में रखा हुआ था। इसके बावजूद चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रह्लाद यादव ने पाला बदल कर सत्ताधारी गठबंधन का साथ दिया। अब जदयू विधायक सुधांशु शेखर ने एक केस दर्ज कराया है, जिसके बाद नया विवाद पैदा हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जदयू विधायकों को तोड़ने के लिए 10-10 करोड़ रुपए के ऑफर दिए गए थे।

उनके द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में कहा गया है कि जदयू विधायकों को ऑफर दिया गया था कि उन्हें 5 करोड़ पहले और बाकी के 5 करोड़ काम हो जाने के बाद दिए जाएँगे। बताया गया है कि तेजस्वी यादव के करीबी इंजीनियर सुनील की तरफ से ये ऑफर दिए गए थे। पूर्व मंत्री नागमणि का नाम भी इसमें सामने आया है, जिनके द्वारा कहा गया था कि अखिलेश नाम का एक शख्स आपसे बात करेगा। फिर खुद को राहुल गाँधी का करीबी बताते हुए अखिलेश ने इंटरनेट से कॉल किया।

शिकायत में कहा गया है कि कई विधायकों को इस तरह के ऑफर दिए गए थे। जदयू विधायकों से संपर्क करने वालों में शक्ति सिंह यादव का नाम भी सामने आया है। उधर जदयू अपने उन विधायकों पर सख्त कार्रवाई करने जा रही है, जिन्होंने विश्वासमत में धोखा किया। सुधांशु शेखर ने राजधानी पटना के कोतवाली थाने में मामला दर्ज कराया था। जिस सुनील पर अपहरण का आरोप लगाया गया है, वो ठेकेदार है और तेजस्वी यादव का करीबी माना जाता है।

जदयू विधायक बीमा भारती और दिलीप राय के अपहरण का मामला दर्ज कराया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी कह चुके हैं कि खेला करने वाले विधायकों पर कार्रवाई की जाएगी। पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी कहा है कि विधायकों की खरीद-फरोख्त से खेला करने की सारी जोड़-तोड़ को विफल कर दिया गया है। नीतीश कुमार भी कह चुके हैं कि वो इसकी जाँच कराएँगे कि राजद विधायकों को एक साथ रखा गया था उसका पैसा कहाँ से आया।

बैठक के लिए बुलाया, फिर तेजस्वी यादव के घर में नजरबंद कर दिए गए RJD के सभी MLA, क्यों? क्या विधायक भेड़-बकरी हैं जो खुला छोड़ने पर भाग जायेंगे?

जब भी किसी राज्य में बहुमत सिद्ध करने की बात होती है, हर पार्टी अपने-अपने विधायकों को किसी रिसोर्ट/होटल में कैद करने में कितना धन बर्बाद करते है, वह भी उन पर जिन्हे पार्टी अपना सिपाही मानती है। या फिर यह कहा जाए कि राजनीति एक व्यापार है, जब कोई अनपढ़ कहीं नौकरी न कर पाए तो सियासत में आ जाओ। इतना धन कहाँ से आता है? जब इतना धन विधायकों को अपनी मुठ्ठी में रखने के लिए खर्च होगा, उस धन की वसूली भ्रष्टाचार से ही होगी, फिर किस आधार पर नेता और पार्टियां भ्रष्टाचार दूर करने की बात कर जनता को गुमराह किया जाता है? या फिर दूसरे शब्दों में यही कहा जा सकता है कि इस तरह कैद होने वाले विधायक किसी भेड़-बकरी से कम नहीं। ऐसे विधायकों को वोट देना वोट का खुला अपमान है। ऐसे विधायकों को इस कटु अपवाद का जवाब देना होगा। 

तेजस्वी कितनी कक्षा पास है और उनकी पार्टी के विधायक कितनी कक्षा पास है और नगर निगम से लेकर सरकार तक में जितने भी शिक्षित है, क्या वह अपने से कम शिक्षित के अंतर्गत नौकरी करने को तैयार है?

बिहार की राजनीति में हलचल अब भी जारी है। सोमवार (12 फरवरी, 2024) को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विधानसभा में बहुमत साबित करना है। भाजपा और जदयू को मिला कर बहुमत का आँकड़ा पार हो जाता है, लेकिन साथ में जीतन राम माँझी की HAM और मुकेश साहनी की VIP भी है। इधर अब खबर आ रही है कि राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपने आवास पर ही राजद के विधायकों एवं विधान पार्षदों को नज़रबंद कर के रख लिया है।

‘न्यूज़ 18’ ने अपने सूत्रों के हवाले से बताया है कि पटना के 5, देशरत्न मार्ग स्थित अपने आवास में पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अपने विधायकों और विधान पार्षदों को कैद कर के रखा हुआ है। फ्लोर टेस्ट संपन्न होने से पहले इनमें से किसी को भी बाहर जाने की अनुमति नहीं मिलेगी। खबर के अनुसार, तेजस्वी यादव ने सभी विधायकों और विधान पार्षदों को कह दिया है कि वो अपने-अपने घर से पहनने वाले अतिरिक्त कपड़े मँगा लें।

फ्लोर टेस्ट में शामिल होने के लिए इन सभी विधायकों को तेजस्वी यादव के आवास से ही विधानसभा से लेकर जाया जाएगा। तेजस्वी यादव ने बैठक में कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के भी सभी विधायकों और विधान पार्षदों को एकजुट रहने के लिए कहा है। इस दौरान विधायकों ने हाथ उठा कर तेजस्वी यादव का समर्थन किया। तेजस्वी यादव के आवास पर फ़िलहाल सुरक्षा भी कड़ी कर के रखी गई है। साथ ही मीडियाकर्मियों के प्रवेश करने पर भी रोक लगा दी गई है।

पुरुष एवं महिला विधायकों-विधान पार्षदों के रुकने के लिए आवास के भीतर ही अलग-अलग व्यवस्था की गई है। साथ ही मुख्य दरवाजे पर बैरिकेडिंग कर दी गई है। उनके खाने-पीने से लेकर आराम करने तक के सारे इंतज़ाम कर दिए गए हैं। इस दौरान कुछ लोगों को सामान लेकर तेजस्वी यादव के आवास के भीतर जाते हुए भी देखा गया। बता दें कि बिहार में नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़ कर भाजपा का दामन थामा है। 9वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अब उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करना है।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा है कि हमारे लिए 12 फरवरी कोई सामान्य तारीख़ नहीं है। उन्होंने इसकी पुष्टि की कि विधायकों ने निर्णय लिया है कि वो अगले 48 घंटे तक एक साथ रहेंगे और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करेंगे। उन्होंने कहा कि विधायक अंदर अंतराक्षरी खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमने इस खेल को शुरू नहीं किया, लेकिन तेजस्वी यादव इसे खत्म करेंगे। उन्होंने दावा किया कि नीतीश कुमार खुद ही गठबंधन करने आए थे।


बिहार : पलटी मार विशेषज्ञ और सिद्धांतहीन नीतीश का गांधी और लालू परिवार पर हमला क्या विश्वास करने योग्य है?

भारतीय राजनीति में अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल यू-टर्न में महारथी है तो बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पलटीमार विशेषज्ञ ने गांधी परिवार और लालू परिवार पर बड़ा हमला बोला है। ऐसे में प्रश्न यह है कि 'क्या यू-टर्न महारथी और पलटीमार विशेषज्ञ पर जनता को भरोसा करना चाहिए?' यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि अगर कल केजरीवाल भाजपा में शामिल होना चाहते हो तो क्या भाजपा उन पर भ्रष्टाचार आरोपों को भुला कर पार्टी में शामिल कर लेगी? लालू पार्टी से समझौता करने और प्रभु राम प्राण प्रतिष्ठा में न जाने के बाद से जेडीयू हाशिये पर आ गयी थी, जिसे नीतीश अच्छी तरह से अनुमान लगाने के कारण कुर्सी के भूखे और सिद्धांतहीन नीतीश ने भांप पलटी मार ली। दूसरे, अर्थों में यही कहा जा सकता है कि नीतीश और जेडीयू नेताओं का 'जहाँ दिखे तवा परात वहीं बिता सारी रात' वाले लालची और सिद्धांतहीन वाली है। लेकिन भाजपा ने मरती हुई जेडीयू में जान फूंक दी है।    

जननायक कर्पूरी ठाकुर की जन्म जयंती के अवसर पर नीतीश कुमार ने कहा कि कुछ लोग सिर्फ परिवार को आगे बढ़ाने पर लगे रहते हैं। पटना में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि कर्पूरी ठाकुर ने कभी अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन, आज लोग सिर्फ अपने परिवार को ही बढ़ाते रहते हैं। मैंने भी कभी अपने परिवार को आगे नहीं बढ़ाया। नीतीश कुमार ने कहा, “कर्पूरी ठाकुर जी की राह पर चलते हुए हमने भी कभी अपने परिवार को राजनीति में आगे नहीं बढ़ाया। लेकिन आजकल बहुत लोग अपने परिवार को ही राजनीति में आगे बढ़ाते रहते हैं”

राहुल गांधी और तेजस्वी-तेजप्रताप यादव पर तंज कसने वाले इस बयान को लोग सोशल मीडिया पर जमकर शेयर कर रहे हैं। आप भी देखिए लोग क्या कह रहे हैं।

बिहार : महागबंधन में सब कुछ ठीक नहीं है : तेजस्वी के सामने नीतीश ने लालू-राबड़ी शासन की बखिया उधेड़ी

                              नीतीश और DCM तेजस्वी यादव (चित्र साभार: @NitishKumar/x)
इंडी गठबंधन पर यकायक एक शायर का एक शेर याद आ रहा है:

बर्बाद करने को एक ही उल्लू काफी है 

यहाँ हर शाख पर उल्लू बैठा है, अंजामे गुलिस्तां क्या होगा। 

बिहार में जदयू और राजद के गठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। इसके संकेत लगातार मिल रहे हैं। बिहार के मुखिया नीतीश कुमार राज्य की गठबंधन सरकार में शामिल राजद को सरकार के किसी भी काम का क्रेडिट देने से परहेज कर रहे हैं। बड़े कार्यक्रमों के पोस्टरों से तेजस्वी यादव गायब हैं। उनमें सिर्फ नीतीश कुमार ही दिख रहे हैं। इतना ही नहीं, नीतीश कुमार ने अब लालू-राबड़ी के दौर की सरकार की बखिया उधेड़ी है, वह भी तेजस्वी यादव के सामने।

भारतीय राजनीति में नीतीश कुमार और अरविन्द केजरीवाल ये दो ऐसे नेता हैं, कब गिरगिट की तरह रंग बदल लें किसी को नहीं पता। वैसे लगभग यही स्थिति सभी पार्टियों की है। या कहा जाए तो हमाम में नंगे सभी है। 

बिहार की राजधानी पटना के गाँधी मैदान में 13 जनवरी 2024 को शिक्षकों की नियुक्ति पत्र वितरण कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने 1990 से लेकर 2005 तक बिहार की सत्ता पर काबिज रहे लालू यादव और राबड़ी देवी सरकार की कमियाँ गिनवाई। इस कार्यक्रम में बिहार में शिक्षक भर्ती में सफल हुए 96 हजार से अधिक शिक्षकों को नियुक्ति पत्र दिया जाना था।

उन्होंने लालू और राबड़ी के नेतृत्व वाली सरकार की विफलताओं को गिनवाते हुए कहा कि जब वह 2005 में मुख्यमंत्री बने थे तब बिहार में 12.5% बच्चे स्कूल नहीं जाते थे। इसके लिए उन्होंने टोला सेवक और तालीमी मरकज की नियुक्ति की। बिहार सरकार द्वारा नियुक्त ये लोग स्कूल ना जाने वाले बच्चों के अभिभावकों से बात करके उन्हें स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करते थे।

नीतीश कुमार ने इस बयान के जरिए तेजस्वी के सामने ही उनकी पार्टी की सरकार की विफलता गिनाने की कोशिश की। वहीं, इस कार्यक्रम के लिए लगाए पोस्टरों में भी तेजस्वी तेजस्वी यादव की फोटो नदारद रही। यहाँ तक कि राज्य के शिक्षा मंत्री के रूप में कार्य कर रहे राजद विधायक चन्द्रशेखर यादव का नाम तक नहीं लिखा गया।

पोस्टर के ऊपर स्लोगन में सिर्फ नीतीश कुमार का ही जिक्र किया गया था। स्लोगन में लिखा था, “रोजगार मतलब नीतीश सरकार।” मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो फोटो इस आयोजन की साझा की थीं, उनमें भी तेजस्वी यादव हाशिए में दिख रहे हैं। इस फोटो में सारा फोकस नीतीश पर ही है।

                                                   पोस्टर में नीतीश ही नीतीश, तेजस्वी गायब

बीते कुछ दिनों से तेजस्वी यादव बिहार में हुई शिक्षक भर्ती का खूब प्रचार प्रसार कर रहे हैं। राजद समर्थक इसका सारा क्रेडिट तेजस्वी को देने में लगे हैं। तेजस्वी भी शिक्षा और पुलिस विभाग में हुई भर्तियों को गठबंधन सरकार की सफलता के रूप में पेश कर रहे थे। हालाँकि, नीतीश कुमार ने अपने पोस्टर बैनर में मात्र अपना ही नाम छपवाया है।

उधर INDI गठबंधन के तहत सीट बँटवारा भी दोनों पार्टियों के बीच समस्या बन सकता है। बिहार की कुल 42 सीट में से कॉन्ग्रेस 10 सीट चाहती है, जबकि कम्युनिस्ट पार्टी भी कुछ सीटों पर दावा कर रही है। नीतीश कुमार अपनी 16 सीट को बनाए रखना चाहेंगे। राजद भी इसी संख्या में सीट चाहती है। ऐसे में इन पार्टियों के बीच विवाद की स्थिति जल्दी नहीं सुलझने वाली है।