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अरुणाचल प्रदेश : जहाँ से राहुल गाँधी ने शुरू की यात्रा, वहीं से कांग्रेस के आधे विधायक BJP में शामिल

                 न्याय यात्रा के बाद आधी कॉन्ग्रेस बीजेपी में हो गई शामिल (फोटो साभार : X_PemaKhanduBJP)
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी अपनी पार्टी को मजबूती देने के लिए भारत जोड़ो यात्रा के बाद अब भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे हैं। ये अलग बात है कि उनकी ‘न्याय’ यात्रा जिस राज्य में पहुँचती है, या जिस राज्य से गुजरती है, वहाँ पर न सिर्फ कांग्रेस बल्कि पूरे इंडी गठबंधन के लिए दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। राहुल की यात्रा पूर्वोत्तर में जिस अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरी थी, महज एक दिन की यात्रा का असर ऐसा हुआ कि कांग्रेस पार्टी के आधे विधायक ही टूटकर पार्टी से अलग हो गए और बीजेपी में शामिल हो गए।

खास बात ये है कि अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा में 60 सीटें हैं। इनमें से अब कांग्रेस के पास सिर्फ 2 विधायक ही बचे हैं और विपक्ष में कुल मिलाकर सिर्फ तीन विधायक। बाकी सभी विधायक सत्ता पक्ष में हैं, जिसमें से दो निर्दलीय विधायक भी हैं। नहीं समझे न? दरअसल, अरुणाचल प्रदेश में जब साल 2019 में विधानसभा चुनाव हुए थे, तो बीजेपी ने 41 सीटें जीती थी और दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाई थी। इसके साथ ही जेडीयू ने 7 सीटें जीती थी। नेशनल पीपल्स पार्टी ने 5 विधानसभा सीटें जीती, तो कांग्रेस ने चार सीटें। वहीं, पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल ने भी एक सीट जीती थी। इसके अलावा 2 निर्दलीय विधायक थे।

इसके बाद अरुणाचल में जेडीयू के सभी विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे। पीपल्स पार्टी का विधायक भी बीजेपी में शामिल हो गया था। एनपीपी वैसे भी एनडीए का हिस्सा है। ऐसे में कांग्रेस के चार विधायक ही विपक्ष में बैठे थे। एक निर्दलीय विधायक बाद में टीएमसी में शामिल हो गए थे। कुल 5 विपक्षी विधायकों वाली अरुणाचल प्रदेश में अब कांग्रेस के दो ही विधायक बचे हैं, तो टीएमसी का एक। बाकी के दो निर्दलीय विधायक सरकार को समर्थन दे रहे हैं। इस तरह से राहुल गाँधी ने जिस अरुणाचल प्रदेश में अपनी न्याय यात्रा एक दिन निकाली, उस अरुणाचल प्रदेश में पार्टी के आधे विधायक ही बागी हो गए और वो बीजेपी में शामिल हो गए।

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू ने खुद एक्स पर इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री निनॉन्ग एरिंग, जो पासीघाट पश्चिम सीट से कांग्रेस के विधायक हैं, वो अब बीजेपी में आ चुके हैं। उनके साथ ही बोरदुनिया-बोगापानी के कांग्रेस विधायक वांगलिन लोवांगडोंग ने भी बीजेपी की सदस्यता ले ली। इस दौरान एनपीपी के विधायक मुच्चू मीठी जो रोइंग सीट से विधायक हैं, और उनके साथी बसर सीट से विधायक गोकर बसर भी बीजेपी में शामिल हो गए। इस दौरान असम के मंत्री और अरुणाचल में बीजेपी के चुनाव प्रभारी अशोक सिंघल भी मौजूद रहे।

खैर, ये मामला सिर्फ अरुणाचल का ही नहीं है, बल्कि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा जिन राज्यों से गुजरी, या जिन राज्यों में पहुँची या पहुँचने वाली थी। यानी किसी भी तरह का जुड़ाव न्याय यात्रा से अगर था, तो वहाँ पार्टी ही नहीं, बल्कि इंडी गठबंधन को नुकसान ही हुआ है। अरुणाचल से लेकर असम तक विद्रोह हुआ, तो पश्चिम बंगाल में दीदी ममता ने आँखें दिखा दी। बिहार में इंडी गठबंधन के सूत्रधार ने ही इंडी गठबंधन को छोड़ दिया, तो उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी जैसे नेताओं ने भी राहुल गाँधी का हाथ झटक दिया। महाराष्ट्र में अशोक चौहान से लेकर बाबा सिद्दीकी तक ने झटका दिया, तो कांग्रेस को सहयोगी दलों के सामने भी घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा है।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में उसे सपा की शर्तों पर लोकसभा चुनाव सिर्फ 17 सीटों पर लड़ना पड़ रहा है, तो पंजाब में इंडी गठबंधन में होने के बावजूद उसे आम आदमी पार्टी के खिलाफ अलग ही लड़ाई लड़नी पड़ रही है। वहीं, दिल्ली की सात में से 4 लोकसभा सीटें भी आप के लिए छोड़नी पड़ गई। ऐसे में समझ सकते हैं कि इंडी गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को लगातार नुकसान पर नुकसान ही झेलना पड़ रहा है।

बैठक के लिए बुलाया, फिर तेजस्वी यादव के घर में नजरबंद कर दिए गए RJD के सभी MLA, क्यों? क्या विधायक भेड़-बकरी हैं जो खुला छोड़ने पर भाग जायेंगे?

जब भी किसी राज्य में बहुमत सिद्ध करने की बात होती है, हर पार्टी अपने-अपने विधायकों को किसी रिसोर्ट/होटल में कैद करने में कितना धन बर्बाद करते है, वह भी उन पर जिन्हे पार्टी अपना सिपाही मानती है। या फिर यह कहा जाए कि राजनीति एक व्यापार है, जब कोई अनपढ़ कहीं नौकरी न कर पाए तो सियासत में आ जाओ। इतना धन कहाँ से आता है? जब इतना धन विधायकों को अपनी मुठ्ठी में रखने के लिए खर्च होगा, उस धन की वसूली भ्रष्टाचार से ही होगी, फिर किस आधार पर नेता और पार्टियां भ्रष्टाचार दूर करने की बात कर जनता को गुमराह किया जाता है? या फिर दूसरे शब्दों में यही कहा जा सकता है कि इस तरह कैद होने वाले विधायक किसी भेड़-बकरी से कम नहीं। ऐसे विधायकों को वोट देना वोट का खुला अपमान है। ऐसे विधायकों को इस कटु अपवाद का जवाब देना होगा। 

तेजस्वी कितनी कक्षा पास है और उनकी पार्टी के विधायक कितनी कक्षा पास है और नगर निगम से लेकर सरकार तक में जितने भी शिक्षित है, क्या वह अपने से कम शिक्षित के अंतर्गत नौकरी करने को तैयार है?

बिहार की राजनीति में हलचल अब भी जारी है। सोमवार (12 फरवरी, 2024) को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को विधानसभा में बहुमत साबित करना है। भाजपा और जदयू को मिला कर बहुमत का आँकड़ा पार हो जाता है, लेकिन साथ में जीतन राम माँझी की HAM और मुकेश साहनी की VIP भी है। इधर अब खबर आ रही है कि राजद नेता तेजस्वी यादव ने अपने आवास पर ही राजद के विधायकों एवं विधान पार्षदों को नज़रबंद कर के रख लिया है।

‘न्यूज़ 18’ ने अपने सूत्रों के हवाले से बताया है कि पटना के 5, देशरत्न मार्ग स्थित अपने आवास में पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अपने विधायकों और विधान पार्षदों को कैद कर के रखा हुआ है। फ्लोर टेस्ट संपन्न होने से पहले इनमें से किसी को भी बाहर जाने की अनुमति नहीं मिलेगी। खबर के अनुसार, तेजस्वी यादव ने सभी विधायकों और विधान पार्षदों को कह दिया है कि वो अपने-अपने घर से पहनने वाले अतिरिक्त कपड़े मँगा लें।

फ्लोर टेस्ट में शामिल होने के लिए इन सभी विधायकों को तेजस्वी यादव के आवास से ही विधानसभा से लेकर जाया जाएगा। तेजस्वी यादव ने बैठक में कॉन्ग्रेस और लेफ्ट के भी सभी विधायकों और विधान पार्षदों को एकजुट रहने के लिए कहा है। इस दौरान विधायकों ने हाथ उठा कर तेजस्वी यादव का समर्थन किया। तेजस्वी यादव के आवास पर फ़िलहाल सुरक्षा भी कड़ी कर के रखी गई है। साथ ही मीडियाकर्मियों के प्रवेश करने पर भी रोक लगा दी गई है।

पुरुष एवं महिला विधायकों-विधान पार्षदों के रुकने के लिए आवास के भीतर ही अलग-अलग व्यवस्था की गई है। साथ ही मुख्य दरवाजे पर बैरिकेडिंग कर दी गई है। उनके खाने-पीने से लेकर आराम करने तक के सारे इंतज़ाम कर दिए गए हैं। इस दौरान कुछ लोगों को सामान लेकर तेजस्वी यादव के आवास के भीतर जाते हुए भी देखा गया। बता दें कि बिहार में नीतीश कुमार ने राजद का साथ छोड़ कर भाजपा का दामन थामा है। 9वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अब उन्हें विधानसभा में बहुमत साबित करना है।

राजद के राज्यसभा सांसद मनोज झा ने कहा है कि हमारे लिए 12 फरवरी कोई सामान्य तारीख़ नहीं है। उन्होंने इसकी पुष्टि की कि विधायकों ने निर्णय लिया है कि वो अगले 48 घंटे तक एक साथ रहेंगे और विभिन्न मुद्दों पर चर्चा करेंगे। उन्होंने कहा कि विधायक अंदर अंतराक्षरी खेल रहे हैं। उन्होंने कहा कि हमने इस खेल को शुरू नहीं किया, लेकिन तेजस्वी यादव इसे खत्म करेंगे। उन्होंने दावा किया कि नीतीश कुमार खुद ही गठबंधन करने आए थे।


AAP विधायकों पर लीगल एक्शन लेंगे उपराज्यपाल वीके सक्सेना, विधानसभा में लगाए गए थे 1400 करोड़ रूपए घोटाले का आरोप

दिल्ली में सियासी पारा सातवें आसमान में पहुँचता जा रहा है। एक ओर जहाँ भाजपा और आप आमने-सामने हैं, वहीं दूसरी ओर उप-राज्यपाल को भी सियासी घमासान में शामिल कर लिया गया है। दरअसल, आम आदमी पार्टी के नेता बीते कुछ दिनों से उप-राज्यपाल वीके सक्सेना पर 1400 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगा रहे हैं। इसके बाद अब LG ने इन नेताओं पर कानूनी कार्रवाई करने की बात कही है।

आप (AAP) नेताओं ने उपराज्यपाल वीके सक्सेना (LG Vk Saxena) पर खादी ग्रामोद्योग के अध्यक्ष रहते हुए 1400 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया था। जिस पर अब एलजी हाउस की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि “दिल्ली के उपराज्यपाल वीके सक्सेना आप नेताओं सौरभ भारद्वाज, आतिशी मर्लेना, दुर्गेश पाठक और जैस्मीन शाह सहित अन्य पर भ्रष्टाचार के झूठे आरोपों और मानहानि के लिए कानूनी कार्यवाही करेंगे।”

आम आदमी पार्टी (AAP) के विधायक दुर्गेश पाठक ने उप-राज्यपाल वीके सक्सेना पर 1400 करोड़ रुपए के घोटाले का आरोप लगाया था। पाठक ने विधानसभा में दावा किया था कि नोटबंदी के दौरान ‘खादी ग्रामोद्योग’ के प्रमुख रहते हुए वीके सक्सेना ने कालेधन को सफेद किया है। यही नहीं, उन्होंने उप-राज्यपाल को ‘भ्रष्ट’ बताते हुए सीबीआई और ईडी की जाँच की माँग की थी और कहा था कि सक्सेना को अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए।

पाठक ने कहा था, “यह घोटाला राष्ट्रपति महात्मा गाँधी और खादी के नाम पर हुआ है। बड़े दुख और शर्म के साथ कह रहा हूँ कि यह किसी और ने नहीं बल्कि दिल्ली के उप-राज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने किया, जब वह खादी ग्रामोद्योग के चेयरमैन थे।”

इसके अलावा, आप नेता आतिशी मर्लेना ने कहा था, “मैं तो यह पूछना चाहती हूँ कि विनय सक्सेना सीबीआई जाँच से भाग क्यों रहे हैं? कुछ नहीं किया होगा तो बच जाएँगे। सीबीआई और ईडी को जाँच करने दीजिये। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहा था, “हम उम्मीद कर रहे हैं कि ये पता चल जाए की सीबीआई इंडिपेंडेंट एजेंसी है या बीजेपी के ऑपरेशन लोटस की एजेंसी है?”

निर्वाचित सदस्यों को पेंशन क्यों?


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सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है। भारत में हर नागरिक को आवाज उठानी चाहिए, वैसे भी अभी लगभग आधी संसद के लिए मतदान होना शेष है। पीछे-पीछे नगर निगम तो किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। लोकसभा चुनावों के चलते ही देखिए किस तरह दल-बदलू इधर-उधर भाग रहे हैं, क्यों? जनता सेवा के लिए नहीं, बल्कि केवल अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्जवल करने के लिए। व्यापार रूप धारण कर चुकी राजनीती को भी बदलने की उस तरह जरुरी है, जिस तरह देश से आतंकवाद समाप्त करना जरुरी है। 
लाखों रूपए खर्च कर पंचायत से लेकर संसद तक जाने के लिए कोई ऐसे ही नहीं लुटाता। एक के दस बनाने के लिए खर्च करता है, क्योकि उसे मालूम है कि बस एक बार निर्वाचित हो गए, चाँदी ही चाँदी नहीं, बल्कि सोना ही सोना है। एक बार सदस्य बन गए कम से कम एक पीढ़ी के खाने का प्रबन्ध। 
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सभी कार्टून साभार 
वैसे भी कुछ लोगों ने चुनाव को व्यापार ही बना रखा है। धरातल पर आकर ही वास्तविकता का बोध होता है। निर्दलीय उम्मीदवार, जिसकी पड़ोसी तक इज्जत नहीं करता, वह भी किसी न किसी रूप में सौदेबाज़ी करते रहते हैं, उन्हें फिर इस बात की भी चिन्ता नहीं होती, जमानत जब्त होगी या नहीं। उससे अधिक पहले ही उनकी जेब आ चूका होता है। निर्दलीय उम्मीदवारों के अतिरिक्त पार्टियों के उम्मीदवार भी जेब भरने में पीछे नहीं, कई बात तो सामने हार देख दूसरी पार्टी से चुपचाप हाथ मिला, अपनी गरीबी दूर कर ली जाती है, पार्टी जाए भाड़ की भट्टी में। हारा हुआ उम्मीदवार जानता है, हार बाद भी पार्टी कोई न कोई लाभ का पद दे ही देगी। कार्यकर्ता पागलों की तरह पार्टी के नाम पर अपनी भूख-प्यास की परवाह नहीं करता। हर पार्टी को इस कटु सच्चाई पर मन्थन करना चाहिए। केवल आरोप या मनघडंत पटकथा समझ, नज़रअंदाज़ न करें।   
अभी कल(अप्रैल 26) को ही प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव खर्च कम करने की बात कही, लेकिन समाजसेवा के नाम पर मेवा खाने और तिजोरियाँ भरने वालों पर चुप्पी साधे रहे। प्रधानमन्त्री के एक आव्हान पर देश के हज़ारों नागरिकों ने गैस सब्सिडी लेनी बंद कर दी, फिर इसी तरह का आव्हान सांसदों और अन्य सदनों में निर्वाचित सदस्यों से मुफ्त मिल रही सुविधाओं को वापस लेने का भी होना चाहिए। लेकिन लगता है ऐसे आव्हान करने के लिए 56X10 सीना चाहिए। यदि पेंशन आदि बंद हो गयी, सरकारी खजाने में हर महीने करोड़ों की बचत होगी, बजट का घाटा भी लगभग शून्य भी आ सकता है।     
2018 का सुधार अधिनियम
सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि राजनीति कोई नौकरी या रोजगार नही है बल्कि एक निःशुल्क सेवा है।
राजनीति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत एक चुनाव है, इसकी पुनर्निर्माण पर कोई सेवानिवृत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें फिर से उसी स्थिति में फिर से चुना जा सकता है। (वर्तमान में उन्हें पेंशन मिलती है सेवा के 5 साल होने पर)। इसमें एक और बड़ी गड़बड़ी यह है कि अगर कोई व्यक्ति पहले पार्षद रहा हो, फिर विधायक बन जाए और फिर सांसद बन जाए तो उसे एक नहीं, बल्कि तीन-तीन पेंशनें मिलती हैं। यह देश के नागरिकों साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है जो तुरंत बंद होना चाहिए।
यदि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पुनः वापसी करते हैं या गठबन्धन सत्ता में आता है, तो पेंशन की इस सुविधा को तुरन्त बंद कर देनी चाहिए। जिससे प्रति माह सरकार को करोड़ों की बचत होगी और यही बचत देश के विकास में और तेजी से आगे बढ़ाएगी, बजट में होने वाले वित्तीय घाटे को भी बहुत कम या दूसरे अर्थों में कहा जाए लगभग न्यूनतम पर रहा सकता है।  
केंद्रीय वेतन आयोग के साथ संसद सदस्यों सांसदो का वेतन भत्ता संशोधित किया जाना चाहिए और इनको इनकम टैक्स के दायरे में लाया जाए। (वर्तमान में वे स्वयं के लिए मतदान करके मनमाने ढंग से अपने वेतन व भत्ते बढा लेते हैं और उस समय सभी दलों के सुर एक हो जाते हैं।
सांसदों को अपनी वर्तमान स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली त्यागनी चाहिए और भारतीय जन-स्वास्थ्य के समान स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में भाग लेना चाहिए। इलाज विदेश में नही भारत मे होना चाहिए,  इनका अगर विदेश में करवाना है तो अपने खर्च से करवाएँ।
मुफ्त छूट जैसे: बिजली, पानी, फोन बिल जैसी सभी रियायत समाप्त होनी चाहिए। (वे न केवल ऐसी बहुत सी रियायतें प्राप्त करते हैं बल्कि वे नियमित रूप से इसे बढ़ाते भी रहे हैं)
अपराधी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका जाए, संदिग्ध व्यक्तियों के साथ दंडित रिकॉर्ड, अपराधिक आरोप और दृढ़ संकल्प, अतीत या वर्तमान को संसद से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए,
कार्यालय में राजनेताओं के कारण होने वाली वित्तीय हानि, उनके परिवारों, नामांकित व्यक्तियों, संपत्तियों से वसूल की जानी चाहिए।
सांसदों को भी सामान्य भारतीय लोगों पर लागू सभी कानूनों का समान रूप से पालन करना चाहिए। - नागरिकों द्वारा एलपीजी गैस सब्सिडी का कोई समर्पण नहीं जब तक सांसदों और विधायकों को उपलब्ध सब्सिडी, संसद कैंटीन में सब्सिडी वाले भोजन, सहित अन्य रियायतें वापस नहीं ले ली जाती।
संसद में सेवा करना एक सम्मान है, लूटपाट के लिए एक आकर्षक करियर नहीं।
फ्री रेल और हवाई जहाज की यात्रा की सुविधा बंद हो। आम आदमी क्यो उठाये इनकी मौज मस्ती का खर्च 
क्या आपको नहीं लगता कि यह मुद्दा उठाने का सही समय है ?
विस्तार से देखिये एक निर्वाचित सदस्य टैक्स भुगतान करने वालों का कितना बड़ा भाग हड़प जाते हैं:-
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानहमारे देश में सालाना प्रति व्यक्ति आय (per capita income) अगर देखें तो वो करीब 1 लाख रुपए है। यानी औसतन हर भारतीय साल में 1 लाख रुपए कमा ही लेता है, लेकिन क्या आप अपने द्वारा ही चुने गए नेताजी के वेतन के बारे में जानते हैं? अगर नहीं, तो ये जानकारी आपको हैरान कर देगी। इन जनप्रतिनिधियों को वेतन के अलावा इतना भत्ता मिलता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। एक सांसद को हर माह 1 लाख 40 हजार रुपए फिक्स मिलता है जिसके ऊपर इससे ज्यादा भत्ता दिया जाता है। बात करें फिक्स वेतन की तो इसमें फिक्स सैलरी/महीना : 50, 000+ कंस्टीट्यूटेन्सी अलाउंस/महीना : 45, 000 + ऑफिस अलाउंस/महीना : 45,000 जुड़ा होता है। 
इसके ऊपर मिलते हैं इतने भत्ते
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरान
सैलरी के ऊपर मिलने वाले भत्तों की तो इसकी लिस्ट बहुत लंबी है। इसमें डायरेक्ट एरियर (सालाना) : 3 लाख 80 हजार रु, हवाई सफर भत्ता (सालाना) : 4 लाख 8 हजार रु, रेल सफर भत्ता (सालाना) : 5 हजार रु, पानी भत्ता (सालाना) : 4 हजार रुपए रु, बिजली भत्ता (सालाना) : 4 लाख रु जैसे कई भत्ते शामिल हैं। एक सांसद को सैलरी के अलावा करीब 1 लाख 51 हजार 833 रुपए प्रतिमाह यानी 18 लाख 22 हजार रुपए सालाना भत्ता दिया जाता है। तो कितनी हुई कुल सैलरी
- फिक्स्ड सैलरी और भत्ते को जोड़ें तो एक सांसद एक महीने में 2,91,833 रुपए वेतन पाता है। यानी देश को एक सांसद सालाना 35 लाख रुपए का पड़ता है।
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानमाननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानटैक्स नहीं लगता, और ये सुविधाएं भी फ्री
सबसे खास बात ये है कि इनकी सैलरी पर कोई टैक्स नहीं मिलता। वहीं इन्हें मिलने वाले भत्ते कई तरह के होते हैं, जिनमें कई सुविधाएं इनके परिवार के लोगों के लिए भी होती हैं। इसमें वाइफ या पार्टनर के लिए 34 फ्री हवाई सफर, अनलिमिटेड ट्रेन का सफर और संसद सत्र के दौरान घर से दिल्ली तक सालाना 8 हवाई सफर भी शामिल हैं।
भत्ते में जुड़ी हैं ये चीजें
बात करें भत्ते में जुड़ी चीजों की तो एक सांसद को 50 हजार यूनिट फ्री बिजली, 1 लाख 70 हजार फ्री कॉल्स, 40 लाख लीटर पानी, रहने के लिए सरकारी बंगला (जिसमें सारे फर्नीचर और एयरकंडीशन, और इनका मेंटेनेंस भी फ्री) शामिल है।
ये तो मिलना ही है
इस सबके अलावा जो बचता है, वो है सिक्युरिटी गार्ड्स, जिंदगीभर की पेंशन, जीवन बीमा और सरकारी गाड़ी, जो सरकार की तरफ से सांसद को मुफ्त दिया जाता है। अब आप भी सोच रहे होंगी कि नेता जी की जिंदगी कितनी आरामदायक होती होगी?
कभी एक सांसद को मिलते थे 20 रूपए महीना
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साल 2018-2019 का बजट पेश किया। जिसमें उन्होंने देश के राष्ट्रपति की सैलरी 5 लाख रुपये प्रति महीना दिए जाने का ऐलान किया। वहीं उपराष्ट्रपति का वेतन 4 लाख और राज्यपाल का वेतन 3.5 लाख रुपये करने का प्रस्ताव पेश किया।
बजट से भले ही किसी को फायदा हुआ हो या ना हुआ हो, लेकिन राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपालों को इसका फायदा मिला। वहीं सांसदों के वेतन को लेकर जेटली ने कहा, सांसदों की तनख्वाह में बढ़ोतरी महंगाई इंडेक्स के आधार पर हर 5 साल पर तय होगी। यह 1 अप्रैल 2018 से लागू होगी। 
मजे की बात यह है कि संसद में न कोई शोर-शराबा हुआ और न ही किसी ने walkout किया यानि सबकुछ पलक छपकते ही पारित हो गया। इन्हे प्रलोभनों ने आज राजनीति को जनसेवा नहीं बल्कि एक व्यापार बना दिया है। 
वहीं कुछ आंकड़े हम आपके सामने पेश कर रहे हैं, जिसमें बताया जा रहा है कि संसद के सदस्यों की सैलरी में अब तक कितना बदलाव हुआ।
अगर हम इस बारे में ऐतिहासिक आंकड़ों पर गौर करें तो साल 1921 में संसद के सदस्यों को दैनिक भत्ते के रूप में 20 रुपये मिलते थे। जिसके बाद साल 1945 में दैनिक भत्ता 30 रुपये दिया जाता था। वहीं वाहन भत्ता 15 रुपये था। जिसे साल 1946 में बढ़ाकर 45 रुपये कर दिया गया।
वहीं, मासिक वेतन को लेकर महात्मा गांधी ने जोर देकर कहा था कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्तियों को न्यूनतम वेतन लेना चाहिए। उस दौरान संविधान सभा के कुछ सदस्यों को केवल 30 रुपये का भुगतान किया जाता था।
20 मई 1949 को वेतन और दैनिक भत्ते के लिए मसौदा संविधान प्रावधान( Draft Constitution provision) पेश किया गया, जिसमें मासिक आय को 750 से 1000 रुपये के बीच का भुगतान करने के लिए एक सुझाव दिया गया था। लेकिन एक दम से इतने पैसे बढ़ाने के लिए विधानसभा ने आपत्ति जताई थी।लेकिन दैनिक भत्ता 30 रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दिया गया। 
17 अक्टूबर 1949 में वी. आई. मुन्नीस्वामी पिल्लई ने दैनिक भत्ता को 40 रुपये करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा। मेंबर ऑफ पार्लियामेंट एक्ट 1954 के तहत मासिक वेतन के रूप में 400 रुपये और दैनिक भत्ता के रूप में 21 रुपये का प्रस्ताव रखा गया। साथ ही 1946 में पेंशन को भी शामिल किया गया।
इतने बदलाव के बाद सैलरी में बढ़ोत्तरी होती गई। जो इस प्रकार है:-
1964 में 500 रुपये, 1983 में 750 रुपये, 1985 में 1000 रुपये, 1988 में 4000 हजार रूपए, 1998 में 12000 रुपये और 2006 में हालिया पैमाने पर 16,000 रुपये की वृद्धि हुई थी। वहीं जिस प्रकार मासिक आय में बढ़ोतरी हुई वहीं दैनिक भत्ते में भी बढ़ोतरी हुई जो इस प्रकार है:- 1964 में 31 रुपये, 1969 में 51 रुपये, 1983 में 75 रुपये, 1988 में 150 रुपये, 1993 में 200 रुपये, 1998 में 400 रुपये और 2001 में 500 रुपये कर दिया गया।
सैलरी के साथ कितनी सुविधाएं लोकसभा के मेंबर को दी जाती है:- एक सांसद को 50 हजार रुपये हर महीने वेतन के रूप में मिलते हैं। जिसके साथ संसदीय क्षेत्र भत्ता 45 हजार रुपये, दैनिक भत्ता 2 हजार रुपये, ऑफिस के खर्चे के लिए 45,000 हजार रुपये मिलते हैं। इसी के साथ ट्रैवलिंग, रेल यात्रा, हवाई यात्रा के लिए सुविधाएं दी जाती है। जो कुल मिलाकर 2 लाख 20 हजार है। सांसद की पत्नी के लिए सुविधाएं: सांसद की पत्नी को रेल यात्रा के लिये फर्स्ट एसी का टिकट मुफ्त दिया जाता है। जिसमें वह साल में 8 बार यात्राएं कर सकती हैं।

करोड़ों के मालिक ये सांसद और विधायक, पर नहीं रखते हैं PAN CARD

आपको अगर बैंक में कोई भी ट्रांजैक्शन करनी हो या कोई लोन लेना हो तो आपसे बार-बार परमानेंट अकाउंट नंबर (PAN) डिटेल मांगी जाती है, लेकिन आपको यह जानकार हैरानी होगी कि देश में कई ऐसे सांसद और विधायक हैं, जिनकी पैन डिटेल ही नहीं है। चुनावी सुधार पर काम करने वाली एडीआर (एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक्स रिफॉर्म्स) द्वारा जारी रिपोर्ट में यह खुलासा हुआ है। एडीआर के मुताबिक, सात वर्तमान सांसदों और 199 विधायकों ने चुनाव आयोग में अपने पैन की डिटेज नहीं दी है। एडीआर ने चुनाव आयोग के पास जमा कराए गए शपथ पत्र की स्टडी करने के बाद यह जानकारी दी है। रिपोर्ट में कहा गया है  कि 11 सांसद व 35 विधायक ऐसे भी हैं, जो दूसरी-तीसरी बाद चुने गए, लेकिन उनके शपथ पत्र में दी गई पैन डिटेल में गड़बड़ी है।
करोड़ों के हैं मालिक 
जिन सांसदों व विधायकों ने पैन डिटेल नहीं दी है, उनमें से कई करोड़पति हैं। सात सांसदों में से मिजोरम के कांग्रेसी सांसद सीएल रुआला की संपत्ति 2.57 करोड़ तो ओड़िशा के भुवनेश्वर संसदीय क्षेत्र के सांसद प्रसन्ना कुमार की संपत्ति 1.35 करोड़ रुपए है। हालांकि इस लिस्ट में लक्षद्वीप के मोहम्मद फैजल भी शामिल हैं, जिनकी संपत्ति कुल 5.38 लाख रुपए ही है। इसमें आसाम करीमगंज के राधेश्याम बिश्वास (संपत्ति 70.68 लाख), ओडिशा जाजपुर की सांसद रीता तराई (संपत्ति 16.22 लाख), तमिलनाडु, कृष्णानगरी के सांसद अशोक कुमार (संपत्ति 11.76 लाख) व तिरुवनामलाई के सांसद वनारोजा आर (संपत्ति 37  लाख) के नाम भी शामिल हैं। इन सांसदों ने अपने शपथ पत्र में पैन डिटेल नहीं दी है। 

सांसदों से आगे एमएलए 
संपत्ति के मामले में सांसदों से आगे विधायक हैं। कई एमएलए के पास 20 करोड़ से अधिक संपत्ति हैं, लेकिन उन्होंने भी अपनी पैन डिटेज जमा नहीं कराई है। मणिपुर के एक एमएलए की संपत्ति 36 करोड़ है तो मिजोरम के एमएलए की संपत्ति 25 करोड़ रुपए।

पैन में गड़बड़ी 
एडीआर की इस रिपोर्ट में कहा गया है कि कई सांसद व एमएलए ऐसे हैं, जो एक से अधिक बार तो चुने गए हैं, लेकिन जब उन्होंने अलग-अलग बार शपथ पत्र जमा कराया तो उसमें पैन की अलग अलग जानकारी दी गई है। जैसे कि, पहले पैन नंबर कुछ और था और बाद में बदला हुआ था। यहां दिलचस्प बात यह है कि इन सांसदों व एमएलए की सपंत्ति पहली बार सांसद बने नेताओं से कही अधिक है। जैसे कि पुरी से सांसद पिनाकी मिश्रा की संपत्ति 137 करोड़ रुपए है, जबकि महाराष्ट्र के सतारा के सांसद के पास 60 करोड़ रुपए की संपत्ति है।