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केजरीवाल सरकार को हाई कोर्ट ने फटकारा : सैलरी के लाले और अखबारों में तस्वीरों संग फुल पेज विज्ञापन

दिल्‍ली नगर निगम (MCD) के कर्मचारियों को समय से सैलरी और पेंशन नहीं मिलने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को फटकार लगाई है। इससे जुड़ी जनहित याचिका (PIL) पर सोमवार (5 अप्रैल 2021) को सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि एक तरफ विज्ञापनों पर पैसे खर्च किए जा रहे दूसरी ओर इस मुश्किल समय में कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़े हैं।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट ने कहा, हम देख सकते हैं कि किस तरह से सरकार राजनेताओं की तस्वीरों के साथ अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देने पर खर्च कर रही है। लेकिन कर्मचारियों की सैलरी तक नहीं दी जाती है।

केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने सवाल किया, “क्या ये अपराध नहीं है कि इतने कठिन समय में भी, आप विज्ञापन पर पैसा खर्च कर रहे हैं।” आप सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि नगर निगमों को धन नहीं देना पड़े, इसलिए सरकार वित्तीय संकट का हवाला देती है। लेकिन, अखबारों और अन्य माध्यमों से विज्ञापन पर पैसा खर्च करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं है।

कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को किसी भी तरह की मोहलत देने से इनकार करते हुए कर्मचारियों का मार्च तक का पूरा बकाया क्लियर करने का आदेश दिया है। वित्तीय वर्ष 2020-21 के संशोधित अनुमान के अनुसार, दिल्ली सरकार को ईडीएमसी को 864.8 करोड़ रुपए, एसडीएमसी को 405.2 करोड़ रुपए और उत्तरी दिल्ली नगर निगम को 764.8 करोड़ रुपए देने हैं।

आजतक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि एमसीडी को वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए 400 करोड़ रुपए का फंड मिलना था, लेकिन उसे दिल्ली सरकार से केवल 109 करोड़ रुपए मिले हैं।

4 साल में कोई अस्पताल या फ्लाईओवर तक नहीं बना 

हाल ही में तेजपाल सिंह द्वारा दायर एक आरटीआई से पता चला था कि AAP सरकार द्वारा किए गए विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचे के लम्बे-लम्बें दावों के विपरीत, राजधानी में 2015-2019 के बीच यानी 4 सालों में न तो कोई नया अस्पताल बनाया और न ही किसी फ्लाईओवर का निर्माण किया। केजरीवाल सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों में स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में किए गए कार्यों की जानकारी के लिए 2019 में RTI दायर की गई थी।

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अक्षय लाकड़ा ने आरटीआई द्वारा 3 जुलाई 2019 को पूछे गए सवालों के जवाबों की प्रति को शुक्रवार (2 अप्रैल, 2021) को ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है, ”RTI से खुलासा हुआ कि 1 अप्रैल 2015 से लेकर 31 मार्च 2019 के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ना ही किसी हॉस्पिटल को अनुदान दिया और न ही किसी नए फ्लाईओवर का निर्माण करवाया। बस झूठे विज्ञापन दे-दे कर जनता को मूर्ख बना लिया और जनता भी इसकी बातों में आ गई।”

इस बीच, खान मार्केट इलाके को सँवारने के नाम पर वहाँ एक नया सेल्फी पॉइंट बनाया गया है।

शीला दीक्षित सरकार में परिवहन मंत्री रहे हारून यूसुफ का आरोप है कि केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में विज्ञापन और प्रचार पर 611 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की स्थिति और बुनियादी सुविधाओं के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है।

केजरीवाल सरकार पर पूर्व में जनता के लिए काम करने की जगह झूठे और भ्रामक प्रचारों के जरिए अपना महिमामंडन करने के आरोप भी लग चुके हैं।

16 वर्षो के ‘लोकतंत्र सेनानी’ आज़म खान की पेंशन पर योगी सरकार ने लगाई रोक

‘भू-माफिया’ घोषित किए जा चुके उत्तर प्रदेश के रामपुर से सांसद आजम खान को ‘लोकतंत्र सेनानी’ के रूप में हर महीने पेंशन मिल रही थी, जिस पर योगी आदित्यनाथ की सरकार ने रोक लगा दी है। आजम खान और उनके ट्रस्ट के नाम पर करोड़ों की संपत्ति और कई अवैध निर्माण व कब्जाई गई जमीनें हैं। उन पर कई आपराधिक मुक़दमे चल रहे हैं। ‘लोकतंत्र सेनानी पेंशन’ के रूप में वो हर माह 20,000 रुपए अलग से उठा रहे थे, जिसे रोक दिया गया है।

ये ही सरकारी लूट के मुद्दे हैं, जिसे विपक्ष को उठाने चाहिए, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इस सरकारी लूट की ओर गंभीरता से विचार कर तुरंत बंद करनी चाहिए। आपातकाल में पता नहीं कितने लोग जेल गए और न जाने कितनों को कोपभवन यानि गुमनामी जीवन जीना पड़ा था। जनसेवा के नाम पर किस तरह जनता को लूटा जा रहा है, योगी ने अभी मात्र एक के ऊपर से पर्दा उठाया है। जनसेवक को पेंशन किस आधार पर? जिस दिन ये सरकारी लूट बंद हो गयी सरकारी खजाने में धन का कोई आभाव नहीं होने पाएगा। सरकारी कर्मचारियों का महंगाई भत्ता रुका हुआ। क्यों जनसेवा को एक व्यापार बनाया जा रहा है?

इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार द्वारा 1975 में लगाए गए आपातकाल के दौरान जेल जाने वाले नेताओं को ‘लोकतंत्र सेनानी’ का दर्जा देकर उन्‍हें मासिक पेंशन दिए जाने का प्रावधान किया गया था, जिसका आजम खान भी जम कर फायदा उठा रहे थे। 2005 में उत्तर प्रदेश की सरकार ने उन्हें ‘लोकतंत्र सेनानी’ घोषित करते हुए उनके लिए पेंशन की व्यवस्था की थी। तब लखनऊ में सपा संस्थापक मुलायम सिंह यादव की सरकार थी।

शुरुआत में इस पेंशन के तहत 500 रुपए प्रतिमाह मिलते थे लेकिन बाद में इसे बढ़ाकर 20,000 रुपए कर दिया गया। कहा जा रहा है कि कई मुकदमों में उनके आरोपित होने की वजह से यूपी सरकार ने उन्हें मिलने वाली पेंशन पर रोक लगाई है। इमरजेंसी के काल में आजम खान अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में छात्र संघ से जुड़े हुए थे और उन्हें पकड़ कर जेल में डाल दिया गया था। उन्होंने तत्कालीन कॉन्ग्रेस सरकार का विरोध किया था।

अब फरवरी 24, 2021 को रामपुर के जिला प्रशासन ने जब ‘लोकतंत्र सेनानियों’ की सूची जारी की तो उसमें आजम खान का नाम शामिल नहीं था। इस सूची में जिले के 35 लोगों के नाम थे। इससे पहले 37 लोगों को ये पेंशन दी जा रही थी। रामपुर के डीएम आंजनेय कुमार सिंह ने कहा कि आपराधिक मुकदमों की वजह से आजम की पेंशन रोकी गई है। सरकार ने इस सम्बन्ध में जानकारी भी माँगी थी।

हाल ही में उनके जौहर ट्रस्ट की 173 एकड़ (70 हेक्टेयर) जमीन यूपी सरकार के नाम दर्ज हो गई थी। राजस्व अभिलेखों में जमीन से जौहर ट्रस्ट का नाम काट कर यूपी सरकार के नाम पर चढ़ा दिया गया था। अखिलेश सरकार में जौहर ट्रस्ट द्वारा खरीदी गई जमीन पर जौहर यूनिवर्सिटी बनी हुई है। इसकी खरीद के दौरान उचित शर्तों का पालन नहीं किया गया। ट्रस्ट की जमीन पर पिछले दस सालों में चैरिटी का कोई कार्य न होने की बात भी सामने आई है।

मोदी का वी आई पी कल्चर पर वार

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार आयी है, हर वह काम हो रहा है, जिसकी जनमानस ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। पिछली सरकारों ने आतंकवाद और पाकिस्तान पर कभी कोई ठोस कार्यवाही करने का साहस नहीं दिखाया, वह मोदी ने संभव कर, पाकिस्तान को ही घुटनों के बल चलने को विवश कर दिया। 
वर्षों से लम्बित कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने की मांग को पूरा करना आदि कई अनेक ऐसे काम हुए हैं, जिसके लिए वर्तमान मोदी सरकार बधाई की पात्र है। 
अब देश से वीआईपी कल्चर को पूरी तरह खत्म करने में लगी है। अब संसद भवन की कैंटीन में खाने पर मिलने वाली सब्सिडी खत्म हो जाएगी। सब्सिडी खत्म करने के प्रस्ताव को सभी पार्टियों ने मंजूरी दे दी है। अभी कुछ दिन पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के साथ बैठक में सभी दलों के सांसदों ने इस पर सहमति जताई। इस फैसले को अगले सत्र से लागू किया जा सकता है। बताया जा रहा है कि संसद की कैंटीन से सब्सिडी को हटाने से सालाना 17 करोड़ रुपये की बचत होगी। यहां मिलने वाली सब्सिडी कई बार विवादों में रही है। सब्सिडी के तहत संसद की कैंटीन में खाना काफी कम दाम पर मिलता है। सब्सिडी हटाए जाने के बाद कैंटीन में खाने के दाम लागत के हिसाब से तय होंगे। पिछली लोकसभा में कैंटीन के खाने के दाम बढ़ा कर सब्सिडी का बिल कम किया गया था।
निर्वाचित सदस्यों को मिलने वाली पेंशन 
नगर निगम से लेकर संसद तक निर्वाचित सदस्यों को मिलने वाली पेंशन भी विवादों में हैं। जिस पर हर माह करोड़ों रूपए खर्च होते हैं। जब जनसेवा के नाम पर किसी भी सदन में जाते हैं, फिर किस आधार पर किसी जनसेवक को पेंशन क्यों? इतना ही नहीं, यदि कोई पार्षद विधानसभा और फिर लोक/राज्य सभा जाता है, उसे पार्षद से लेकर सांसद तक की तीन पेंशन मिलती हैं। संभव है, आगामी दिनों पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस सरकारी खर्चे पर भी अंकुश लगाने के साथ-साथ मुफ्त में मिलने वाली सुविधाओं पर भी अंकुश लगा सकते हैं, क्योकि इस पर प्रति माह करोड़ों का खर्च बैठता है। विशेषकर, इस मुद्दों पर आम नागरिक से कहीं अधिक रोष सरकारी कर्मचारियों में है, जिनकी पेंशन बंद हो चुकी है। यदि मोदी सरकार निर्वाचित सदस्यों को मिलने वाली पेंशन और मुफ्त सुविधाओं पर अंकुश लगाने में सफल होते हैं, उससे करोड़ों सरकारी कर्मचारियों का इस सरकार पर विश्वास ही नहीं, वोट प्रतिशत भी बढ़ जाएगा। 
जनता की सरकार है मोदी सरकार
प्रधानमंत्री मोदी ने पहले दिन से ही साबित किया है कि उनकी सरकार वीआईपी या पूंजीपतियों के लिए नहीं, देश की जनता के लिए सोचती है। साढ़े तीन साल में उन्होंने जो भी कदम उठाए हैं, उसका लक्ष्य सभी सवा सौ करोड़ देशवासी रहे हैं। ‘सबका साथ, सबका विकास’ ये एक नारा नहीं है, ये पीएम मोदी के गवर्नेंस की आत्मा है। वो जानते हैं कि देश की जनता ने उनपर जो भरोसा किया है, उसकी भावनाओं के अनुसार काम करना उनकी जिम्मेदारी है।

लाल बत्ती की परंपरा खत्म की
प्रधानमंत्री मोदी स्वयं को प्रधानसेवक मानते हैं। इसी के तहत वो देश में वीआईपी कल्चर खत्म करने के लिए हर तरह के प्रयास में लगे हैं। इसी सोच के मुताबिक उन्होंने 01 मई, 2017 से कुछ इमरजेंसी सेवाओं को छोड़कर राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तक को लाल बत्ती के उपयोग के अधिकार को खत्म कर दिया है। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले दिन से ही साबित किया है कि उनकी सरकार वीआईपी या पूंजीपतियों के लिए नहीं, देश की आम जनता के लिए सोचती है। पिछले कई दशकों से लालबत्ती रसूख और वीआईपी कल्चर का प्रतीक बनी हुई थी।
राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति की गाड़ियों पर भी नंबर प्लेट
वीवीआईपी की गाड़ियों पर लालबत्ती के इस्तेमाल पर रोक लगाने के बाद अब इन गाड़ियों में नंबर प्लेट लगाना भी अनिवार्य किया गया है। केंद्र सरकार चाहती है कि अब आम नागरिक की तरह ही राष्ट्रपति, उप-राष्ट्रपति, राज्यपाल और अन्य संवैधानिक अधिकारी भी अपने वाहनों पर नंबर प्लेट लगाएं। फिलहाल इन विशेष लोगों की गाड़ियों पर केवल भारत का राज्य चिन्ह बना होता है, नंबर नहीं लिखा होता। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी की बात ही अलग है, पीएम मोदी की गाड़ी पर नंबर प्लेट पहले से ही लगी हुई है।

सरकारी बंगलों में रहने की मनमानी खत्म
17 मई, 2017 को मोदी सरकार ने सरकारी आवास (अनाधिकृत कब्जा विरोधी) अधिनियम, 1971 में बदलाव को मंजूरी दे दी। इसके बाद तय हो गया कि पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, मुख्यमंत्री या को अधिकारी किसी भी सूरत में निर्धारित समय-सीमा से अधिक समय तक अपने सरकारी बंगले में नहीं रह सकते। इस फैसले के बाद खुद को वीआईपी मानकर सरकारी बंगलों पर मनमाने समय तक कब्जा बनाए रखने की परंपरा भी खत्म हो गई। अब किसी ने इसका उल्लंघन किया तो उनका बोरिया-बिस्तर समेट कर बंगले से बाहर कर दिया जाएगा।

मंत्रियों के गैर-जरूरी होटल निवास पर लगाम
प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रियों के सामने यह स्पष्ट कर दिया है कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टॉलरेंस की अपनी नीति से कोई समझौता नहीं करेंगे। यानी किसी भी स्तर पर वीआईपी कल्चर को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 20 अगस्त को पीएम मोदी ने अपने मंत्रियों को चेताया कि उन्हें 5 सितारा होटलों में ठहरने से बचना चाहिए। दरअसल वे कुछ मंत्रियों के फाइव स्टार होटल में ठहरने की आदत के कारण नाखुश थे। उन्होंने साफ कर दिया कि मंत्रियों को अपनी आधिकारिक यात्रा के दौरान सरकारी व्यवस्थाओं का ही लाभ उठाना चाहिए।

पीएसयू की गाड़ियों का उपयोग न करने की हिदायत
20 अगस्त, 2017 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रिपरिषद के सहयोगियों से साफ कहा कि कहा कि वे अपने मंत्रालयों के अधीन आने वाले पीएसयू की गाड़ियों का इस्तेमाल न करें। उन्होंने सहयोगियों को चेतावनी भी दी कि अगर कोई मंत्री या उनके परिजन ऐसा करते हुए पाए जाते हैं तो वह कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे। मंत्रियों को उन्होंने यह भी निर्देश दिए कि वे यह भी सुनिश्चित करें कि उनके स्टाफ भी पीएसयू से मिलने वाली सुविधाओं का निजी इस्तेमाल न करें।

रेलवे बोर्ड का वीआईपी प्रोटोकॉल खत्म
प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर रेलवे बोर्ड की ओर से 1981 में जारी एक सर्कुलर के कुछ निर्देशों को भी समाप्त कर दिया गया है। इस सर्कुलर के तहत महाप्रबंधकों के लिए आवश्यक था कि वे रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और बोर्ड के दूसरे सदस्यों की यात्राओं के दौरान उनके आगमन और प्रस्थान वाली जगह पर मौजूद रहें, लेकिन रेल मंत्रालय के एक आदेश के अनुसार रेलवे बोर्ड के चेयरमैन और बोर्ड के अन्य सदस्यों की यात्राओं के दौरान हवाईअड्डों और रेलवे स्टेशनों पर अपनाए जाने वाले प्रोटोकॉल के निर्देशों को तत्काल प्रभाव से वापस ले लिया गया। यही नहीं अब रेलवे के वरिष्ठ अधिकारी रेलवे के ट्रैकमैन को अपने घरेलू कर्मचारी के तौर पर भी काम नहीं करा सकेंगे। गौरतलब है कि मोदी सरकार के फैसले से पहले लगभग 30 हजार ट्रैकमैन रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों के घरों पर सेवाएं दे रहे थे। यही नहीं रेलवे के 50 मंडल प्रबंधकों को भी एक्जिक्यूटिव श्रेणी की जगह स्लीपर और थर्ड एसी में सफर करने के निर्देश दिए गए हैं। साथ ही गुलदस्ता और बाकी उपहार लेने की भी मनाही कर दी गई है।

प्रधानमंत्री मोदी खुद रोजमर्रा के जीवन में ऐसे कई उदाहरण पेश कर चुके हैं, जिनसे साफ साबित होता है कि उनका ‘Every Person is Important’ का मंत्र सिर्फ कहने के लिए नहीं है। इस मंत्र का वह खुद पालन करते हैं।
धानमंत्री मोदी ने पेश की सादगी की मिसाल
प्रधानमंत्री मोदी शुरू से ही वीआईपी कल्चर के विरोधी रहे हैं। प्रधानमंत्री सिर्फ वीआईपी कल्चर को खत्म करने की बात ही करते हैं, बल्कि पालन भी करते हैं। उसकी झलक प्रधानमंत्री मोदी के रूस में एक कार्यक्रम के दौरान भी देखने को मिली। व्लादीवोस्तोक में एक कार्यक्रम के दौरान भारतीय व्यापारिक प्रतिनिधिमंडल के साथ फोटो सेशन होनी थी। फोटो सेशन के लिए अधिकारियों ने प्रधानमंत्री मोदी के बैठने के लिए अलग से विशेष सोफे का इंतजाम किया था, जबकि भारतीय सीईओ के लिए कुर्सी की व्यवस्था की गई थी। प्रधानमंत्री की नजर जैसे ही इस पर पड़ी कि अन्य लोगों के लिए कुर्सी और उनके लिए सोफे की व्यवस्था की गई है, उन्होंने तुरंत अधिकारियों से इसे हटाने के लिए कहा और अपने लिए भी सबकी तरह कुर्सी लगाने को कहा। उन्होंने आयोजकों से कहा कि वो उनमें से ही हैं, वो खड़े रहना या फिर सबके लिए जैसी व्यवस्था है, उसी में रहना पसंद करेंगे। इसके बाद मोदी भी सामान्य कुर्सी पर ही बैठे।

पीएम मोदी की कथनी और करनी में फर्क नहीं है
प्रधानमंत्री मोदी की यही वो अलग शैली है, जो उन्हें दूसरे नेताओं से बिल्कुल अलग पहचान देती है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इसी सहज व्यवहार से 14 नवंबर, 2017 को लोगों को अचंभित कर दिया। गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान वे आम मतदाताओं के साथ मतदान के लिए लाइन में खड़े रहे और फिर काफी देर प्रतीक्षा के बाद अपनी बारी आने पर ही वोट डाले। पीएम मोदी चाहते तो वो बिना किसी प्रतीक्षा के जाकर वोट डाल सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। पीएम मोदी का ये सौम्य व्यक्तित्व देखकर वहां मौजूद मतदान और सुरक्षा अधिकारी भी हैरान रह गए। साथ ही साथ प्रधानमंत्री के साथ जो लोग उस समय मतदान केंद्र के अंदर थे, वे तो मोदी जी की झलक पाकर ही गदगद हो रहे थे। आम मतदाताओं में एक गर्व का भाव भी था कि देश का सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री आज उन लोगों के साथ मतदान के लिए इंतजार कर रहे हैं।

संस्कारों के भी धनी हैं प्रधानमंत्री मोदी
मोदी जी की एक झलक पाने के लिए लोग उतावले हो रहे थे। उसी दौरान पीएम मोदी की नजर अपने बड़े भाई सोम मोदी पर पड़ गई, जो वोट डालने के लिए वहां पहुंचे हुए थे। मोदी जी ने तुरंत गाड़ी से उतरकर उनके पास पहुंचकर पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया। इस दौरान वे कुछ दूर पैदल भी चले। लोग मोबाइल फोन में उनकी तस्वीर कैद करते जा रहे थे और साथ ही साथ मोदी-मोदी के नारे लगाते जा रहे थे। लोग छतों पर चढ़कर पीएम मोदी को देखने के लिए उतावले हो रहे थे।

इससे पहले राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भी प्रधानमंत्री मोदी ने संसद भवन में मौजूद चुनाव अधिकारियों और सांसदों को अचरज में डाल दिया था। वे मतदान शुरू होने से न केवल 10 मिनट पहले ही मतदान स्थल पर पहुंच गए, बल्कि वोटिंग के लिए लाइन में लग गए। प्रधानमंत्री को इस तरह से वोटिंग के लिए कतार में लगा देख मतदान अधिकारी बहुत हैरान हो गए। इस दौरान उन्होंने माहौल को हल्क करने के लिए कहा, कि समय की पाबंदी उनकी आदत में है और स्कूल भी वे समय से पहले ही पहुंच जाया करते थे।
काफिला रोक एंबुलेंस को दिया रास्ता
वीआईपी कल्चर खत्म करने को लेकर प्रधानमंत्री मोदी काफी गंभीर हैं। उन्होंने एसपीजी सुरक्षा घेरे में होने के बावजूद अपना काफिला रोक एक एंबुलेंस को रास्ता दिया था। प्रधानमंत्री मोदी गुजरात के गांधीनगर में अफ्रीकी विकास बैंक की बैठक से वापस लौट रहे थे। उन्हें एक दूसरे कार्यक्रम में शामिल होना था, लेकिन कार्यक्रम में तय समय से देर हो जाने के बाद भी जब उन्हें पता चला कि उनके काफिले के कारण एक एंबुलेंस रुका हुआ है तो उन्होंने सुरक्षाकर्मियों से अपने काफिले को किनारे करने को कहा और एंबुलेंस को आगे जाने का रास्ता दिया।

प्रधानमंत्री मोदी के लिए नहीं रोका गया ट्रैफिक
प्रधानमंत्री मोदी ने साबित कर दिया है कि उनका ‘Every Person is Important’ का मंत्र सिर्फ कहने के लिए नहीं है, बल्कि वह खुद इस मंत्र का पालन भी करते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने साफ निर्देश दिया है कि उनके काफिले के लिए सामान्य ट्रैफिक को डिस्टर्ब नहीं किया जाए। 3 फरवरी, 2018 को उनका काफिला सरदार पटेल मार्ग से सामान्य ट्रैफिक के बीच गुजरता रहा। दरअसल प्रधानमंत्री असम में होने वाले ग्लोबल इंवेस्टमेंट समिट का उद्घाटन करने के लिए गुवाहाटी जा रहे थे। इस दौरान जब उनका काफिला लोक कल्याण मार्ग से सरदार पटेल मार्ग होकर गुजरा तो ट्रैफिक को रोका नहीं गया। आमतौर पर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का काफिला गुजरने पर ट्रैफिक को रोक दिया जाता है, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी नहीं चाहते कि उनके कारण आम जनता को कोई परेशानी हो।

नॉर्मल ट्रैफिक से गुजर कर एयरपोर्ट पहुंचे पीएम
प्रधानमंत्री मोदी बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की आगवानी के लिए भी वीवीआईपी कल्चर को दरकिनार कर सामान्य ट्रैफिक में लोककल्याण मार्ग से लेकर दिल्ली एयरपोर्ट कर का सफर तय किया था। प्रधानमंत्री आवास लोक कल्याण मार्ग से लेकर एयरपोर्ट तक पीएम का काफिला आम लोगों की गाड़ियों के बीच से ही गुजरता रहा। कहीं भी पीएम मोदी के लिए सामान्य ट्रैफिक को नहीं रोका गया और न ही कोई बदलाव किया गया।

राजभवन की जगह गेस्टहाउस में ठहरे प्रधानमंत्री मोदी
प्रधानमंत्री मोदी ने 19 दिसंबर को लक्षद्वीप, तमिलनाडु और केरल के चक्रवाती तूफान ‘ओखी’ से प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया और तूफान से प्रभावित लोगों, मछुआरों तथा किसानों से मुलाकात की। इस यात्रा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी केरल में थरकाड के सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरे। यहां के लिए यह ऐसा पहला अवसर था कि कोई प्रधानमंत्री आधिकारिक यात्रा पर होते हुए भी किसी गेस्ट हाउस में ठहरा हो। इससे पहले पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह ने हमेशा राज भवन या किसी बहुत बड़े होटल में रहने को ही प्राथमिकता दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सरकारी गेस्ट हाउस में ठहरने से यहां के कर्मचारी काफी उत्साहित और गौरवांवित अनुभव कर रहे थे। प्रधानमंत्री मोदी ने यहां की व्यवस्थाओं पर संतोष व्यक्त किया और कर्मचारियों के साथ फोटो भी खिंचवाया। यह उन सभी के लिए एक अविस्मरणीय अनुभव था।

‘एवरी पर्सन इज इंपौर्टेंट’ की सोच
दरअसल प्रधानमंत्री मोदी का कहना है कि भारत का हर नागरिक वीआईपी है, इसीलिए कुछ गिने-चुने लोगों को खास सुविधाएं भोगने का अधिकार नहीं है। उन्होंने 30 अप्रैल, 2017 को मन की बात में प्रधानमंत्री ने एक नए शब्द ‘EPI’ का सृजन कर साफ कर दिया कि न्यू इंडिया में वीआईपी कल्चर की कोई जगह नहीं होगी। यहां ‘EVERY PERSON IS IMPOROTANT’ है। दरअसल वे चाहते हैं कि देश का हर नागरिक स्वयं को सिस्टम से जुड़ा हुआ अनुभव करे।

मोदी मंत्रिमंडल की अमीर महिला सांसद हैं हरसिमरत कौर

Harsimrat Kaur, a rich woman MP of Modi Cabinet, has assets worth Rs 217 crore
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
मोदी सरकार में हरसिमरत कौर बादल को दोबारा मंत्री बनाया गया है। हरसिमरत कौर मोदी मंत्रिमंडल की अमीर महिला सांसद हैं। साल 2019 के हलफनामे के मुताबिक हरसिमरत कौर की कुल संपत्ति 217 करोड़ रुपए की है। हरसिमरत कौर ने पंजाब की बठिंडा लोकसभा सीट से जीत की हैट्रिक लगाई है। वो साल 2009 से बठिंडा संसदीय क्षेत्र से वो लगातार सांसद है। हरसिमरत मोदी सरकार में खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री भी रह चुकी हैं। 

संपत्ति 

हरसिमरत कौर की संपत्ति की बात करें, तो उनके अकाउंट में 41 लाख रुपए जमा हैं, जबकि 60 लाख रुपए के बांड, डिबेंचर और कंपनियों के शेयर हैं। हालांकि उन पर पर्सनल लोन भी 25 लाख करोड़ रुपए का है। हरसिमरत कौर के नाम 2 लाख रुपए कीमत के ट्रैक्टर हैं। इसके अलावा हरसिमरत के पास 7 करोड़ की ज्वैलरी है। हरसिमरत कौर के नाम पर सिरसा, गंगानगर राजस्थान समेत कुल 6 जगह 49 करोड़ रुपए की प्रॉपर्टी हैं। इसके अलावा 18 करोड़ रुपए की नॉन एग्रीकल्चर प्रॉपर्टी है। कॉमर्शियल बिल्डिंग 9 करोड़ रुपए की है, जबकि रेजिडेंशियल बिल्डिंग 39 करोड़ रुपए की है।

निजी और राजनीतिक जीवन

हरसिमरत कौर का 25 जुलाई 1966 को दिल्ली के एक सिख परिवार में जन्म हुआ। वो गुड़गांव ट्राइडेंट होटल में निजी ज्वैलरी कारोबार चलाती है साथ ही फैशन डिजाइनर भी हैं। उन्होंने दिल्ली के लारेटो कॉन्वेंट स्कूल से पढ़ाई की। साथ ही मैट्रिक्यूलेट और ड्रेस डिजाइन में डिप्लोमा भी किया है। हरसिमरत की राजनीति की शुरुआत साल 2009 में हुई। साल 2009 में हुए लोकसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल ने हरसिमरत को बठिंडा से कांग्रेस के उम्मीदवार राहींदर सिंह के खिलाफ चुनावी मैदान में उतारा। इस चुनावी जंग में हरसिमरत को फतह हासिल हुई और उन्होंने कांग्रेस उम्मीदवार को 120960 वोटों से मात दी थी। 
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क्या कौर जैसे करोड़पतियों को पेंशन की आवश्यकता है?
प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के एक आव्हान पर देश के करोड़ों लोगों ने एलपीजी सब्सिडी छोड़ दी, परन्तु क्या इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी कौर जैसे करोड़पति जन प्रतिनिधियों से उनको मिलने वाली पेंशन छोड़ने का आव्हान कर सकते हैं, यदि ऐसा होता है देश के खजाने में हर माह करोड़ों की वृद्धि होगी। जिसका देश के विकास में प्रयोग किया जा सकता है। निगम पार्षद से लेकर संसद और मंत्रिमंडल में ऐसे हज़ारों जनप्रतिनिधि हैं, जो अपनी राशि पर अर्जित ब्याज तक नहीं खा सकते, फिर उनको पेंशन की क्या आवश्यकता?   

निर्वाचित सदस्यों को पेंशन क्यों?


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सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका दायर हुई है। भारत में हर नागरिक को आवाज उठानी चाहिए, वैसे भी अभी लगभग आधी संसद के लिए मतदान होना शेष है। पीछे-पीछे नगर निगम तो किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव आने वाले हैं। लोकसभा चुनावों के चलते ही देखिए किस तरह दल-बदलू इधर-उधर भाग रहे हैं, क्यों? जनता सेवा के लिए नहीं, बल्कि केवल अपना और अपने परिवार का भविष्य उज्जवल करने के लिए। व्यापार रूप धारण कर चुकी राजनीती को भी बदलने की उस तरह जरुरी है, जिस तरह देश से आतंकवाद समाप्त करना जरुरी है। 
लाखों रूपए खर्च कर पंचायत से लेकर संसद तक जाने के लिए कोई ऐसे ही नहीं लुटाता। एक के दस बनाने के लिए खर्च करता है, क्योकि उसे मालूम है कि बस एक बार निर्वाचित हो गए, चाँदी ही चाँदी नहीं, बल्कि सोना ही सोना है। एक बार सदस्य बन गए कम से कम एक पीढ़ी के खाने का प्रबन्ध। 
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वैसे भी कुछ लोगों ने चुनाव को व्यापार ही बना रखा है। धरातल पर आकर ही वास्तविकता का बोध होता है। निर्दलीय उम्मीदवार, जिसकी पड़ोसी तक इज्जत नहीं करता, वह भी किसी न किसी रूप में सौदेबाज़ी करते रहते हैं, उन्हें फिर इस बात की भी चिन्ता नहीं होती, जमानत जब्त होगी या नहीं। उससे अधिक पहले ही उनकी जेब आ चूका होता है। निर्दलीय उम्मीदवारों के अतिरिक्त पार्टियों के उम्मीदवार भी जेब भरने में पीछे नहीं, कई बात तो सामने हार देख दूसरी पार्टी से चुपचाप हाथ मिला, अपनी गरीबी दूर कर ली जाती है, पार्टी जाए भाड़ की भट्टी में। हारा हुआ उम्मीदवार जानता है, हार बाद भी पार्टी कोई न कोई लाभ का पद दे ही देगी। कार्यकर्ता पागलों की तरह पार्टी के नाम पर अपनी भूख-प्यास की परवाह नहीं करता। हर पार्टी को इस कटु सच्चाई पर मन्थन करना चाहिए। केवल आरोप या मनघडंत पटकथा समझ, नज़रअंदाज़ न करें।   
अभी कल(अप्रैल 26) को ही प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने चुनाव खर्च कम करने की बात कही, लेकिन समाजसेवा के नाम पर मेवा खाने और तिजोरियाँ भरने वालों पर चुप्पी साधे रहे। प्रधानमन्त्री के एक आव्हान पर देश के हज़ारों नागरिकों ने गैस सब्सिडी लेनी बंद कर दी, फिर इसी तरह का आव्हान सांसदों और अन्य सदनों में निर्वाचित सदस्यों से मुफ्त मिल रही सुविधाओं को वापस लेने का भी होना चाहिए। लेकिन लगता है ऐसे आव्हान करने के लिए 56X10 सीना चाहिए। यदि पेंशन आदि बंद हो गयी, सरकारी खजाने में हर महीने करोड़ों की बचत होगी, बजट का घाटा भी लगभग शून्य भी आ सकता है।     
2018 का सुधार अधिनियम
सांसदों को पेंशन नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि राजनीति कोई नौकरी या रोजगार नही है बल्कि एक निःशुल्क सेवा है।
राजनीति लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत एक चुनाव है, इसकी पुनर्निर्माण पर कोई सेवानिवृत्ति नहीं है, लेकिन उन्हें फिर से उसी स्थिति में फिर से चुना जा सकता है। (वर्तमान में उन्हें पेंशन मिलती है सेवा के 5 साल होने पर)। इसमें एक और बड़ी गड़बड़ी यह है कि अगर कोई व्यक्ति पहले पार्षद रहा हो, फिर विधायक बन जाए और फिर सांसद बन जाए तो उसे एक नहीं, बल्कि तीन-तीन पेंशनें मिलती हैं। यह देश के नागरिकों साथ बहुत बड़ा विश्वासघात है जो तुरंत बंद होना चाहिए।
यदि प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी पुनः वापसी करते हैं या गठबन्धन सत्ता में आता है, तो पेंशन की इस सुविधा को तुरन्त बंद कर देनी चाहिए। जिससे प्रति माह सरकार को करोड़ों की बचत होगी और यही बचत देश के विकास में और तेजी से आगे बढ़ाएगी, बजट में होने वाले वित्तीय घाटे को भी बहुत कम या दूसरे अर्थों में कहा जाए लगभग न्यूनतम पर रहा सकता है।  
केंद्रीय वेतन आयोग के साथ संसद सदस्यों सांसदो का वेतन भत्ता संशोधित किया जाना चाहिए और इनको इनकम टैक्स के दायरे में लाया जाए। (वर्तमान में वे स्वयं के लिए मतदान करके मनमाने ढंग से अपने वेतन व भत्ते बढा लेते हैं और उस समय सभी दलों के सुर एक हो जाते हैं।
सांसदों को अपनी वर्तमान स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली त्यागनी चाहिए और भारतीय जन-स्वास्थ्य के समान स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में भाग लेना चाहिए। इलाज विदेश में नही भारत मे होना चाहिए,  इनका अगर विदेश में करवाना है तो अपने खर्च से करवाएँ।
मुफ्त छूट जैसे: बिजली, पानी, फोन बिल जैसी सभी रियायत समाप्त होनी चाहिए। (वे न केवल ऐसी बहुत सी रियायतें प्राप्त करते हैं बल्कि वे नियमित रूप से इसे बढ़ाते भी रहे हैं)
अपराधी नेताओं को चुनाव लड़ने से रोका जाए, संदिग्ध व्यक्तियों के साथ दंडित रिकॉर्ड, अपराधिक आरोप और दृढ़ संकल्प, अतीत या वर्तमान को संसद से प्रतिबंधित किया जाना चाहिए,
कार्यालय में राजनेताओं के कारण होने वाली वित्तीय हानि, उनके परिवारों, नामांकित व्यक्तियों, संपत्तियों से वसूल की जानी चाहिए।
सांसदों को भी सामान्य भारतीय लोगों पर लागू सभी कानूनों का समान रूप से पालन करना चाहिए। - नागरिकों द्वारा एलपीजी गैस सब्सिडी का कोई समर्पण नहीं जब तक सांसदों और विधायकों को उपलब्ध सब्सिडी, संसद कैंटीन में सब्सिडी वाले भोजन, सहित अन्य रियायतें वापस नहीं ले ली जाती।
संसद में सेवा करना एक सम्मान है, लूटपाट के लिए एक आकर्षक करियर नहीं।
फ्री रेल और हवाई जहाज की यात्रा की सुविधा बंद हो। आम आदमी क्यो उठाये इनकी मौज मस्ती का खर्च 
क्या आपको नहीं लगता कि यह मुद्दा उठाने का सही समय है ?
विस्तार से देखिये एक निर्वाचित सदस्य टैक्स भुगतान करने वालों का कितना बड़ा भाग हड़प जाते हैं:-
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानहमारे देश में सालाना प्रति व्यक्ति आय (per capita income) अगर देखें तो वो करीब 1 लाख रुपए है। यानी औसतन हर भारतीय साल में 1 लाख रुपए कमा ही लेता है, लेकिन क्या आप अपने द्वारा ही चुने गए नेताजी के वेतन के बारे में जानते हैं? अगर नहीं, तो ये जानकारी आपको हैरान कर देगी। इन जनप्रतिनिधियों को वेतन के अलावा इतना भत्ता मिलता है जिसकी आप कल्पना भी नहीं कर सकते। एक सांसद को हर माह 1 लाख 40 हजार रुपए फिक्स मिलता है जिसके ऊपर इससे ज्यादा भत्ता दिया जाता है। बात करें फिक्स वेतन की तो इसमें फिक्स सैलरी/महीना : 50, 000+ कंस्टीट्यूटेन्सी अलाउंस/महीना : 45, 000 + ऑफिस अलाउंस/महीना : 45,000 जुड़ा होता है। 
इसके ऊपर मिलते हैं इतने भत्ते
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरान
सैलरी के ऊपर मिलने वाले भत्तों की तो इसकी लिस्ट बहुत लंबी है। इसमें डायरेक्ट एरियर (सालाना) : 3 लाख 80 हजार रु, हवाई सफर भत्ता (सालाना) : 4 लाख 8 हजार रु, रेल सफर भत्ता (सालाना) : 5 हजार रु, पानी भत्ता (सालाना) : 4 हजार रुपए रु, बिजली भत्ता (सालाना) : 4 लाख रु जैसे कई भत्ते शामिल हैं। एक सांसद को सैलरी के अलावा करीब 1 लाख 51 हजार 833 रुपए प्रतिमाह यानी 18 लाख 22 हजार रुपए सालाना भत्ता दिया जाता है। तो कितनी हुई कुल सैलरी
- फिक्स्ड सैलरी और भत्ते को जोड़ें तो एक सांसद एक महीने में 2,91,833 रुपए वेतन पाता है। यानी देश को एक सांसद सालाना 35 लाख रुपए का पड़ता है।
माननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानमाननीय सांसद जी को कितना मिलता है, जानते हैं आप? ये खबर पढ़कर रह जाएंगे हैरानटैक्स नहीं लगता, और ये सुविधाएं भी फ्री
सबसे खास बात ये है कि इनकी सैलरी पर कोई टैक्स नहीं मिलता। वहीं इन्हें मिलने वाले भत्ते कई तरह के होते हैं, जिनमें कई सुविधाएं इनके परिवार के लोगों के लिए भी होती हैं। इसमें वाइफ या पार्टनर के लिए 34 फ्री हवाई सफर, अनलिमिटेड ट्रेन का सफर और संसद सत्र के दौरान घर से दिल्ली तक सालाना 8 हवाई सफर भी शामिल हैं।
भत्ते में जुड़ी हैं ये चीजें
बात करें भत्ते में जुड़ी चीजों की तो एक सांसद को 50 हजार यूनिट फ्री बिजली, 1 लाख 70 हजार फ्री कॉल्स, 40 लाख लीटर पानी, रहने के लिए सरकारी बंगला (जिसमें सारे फर्नीचर और एयरकंडीशन, और इनका मेंटेनेंस भी फ्री) शामिल है।
ये तो मिलना ही है
इस सबके अलावा जो बचता है, वो है सिक्युरिटी गार्ड्स, जिंदगीभर की पेंशन, जीवन बीमा और सरकारी गाड़ी, जो सरकार की तरफ से सांसद को मुफ्त दिया जाता है। अब आप भी सोच रहे होंगी कि नेता जी की जिंदगी कितनी आरामदायक होती होगी?
कभी एक सांसद को मिलते थे 20 रूपए महीना
वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साल 2018-2019 का बजट पेश किया। जिसमें उन्होंने देश के राष्ट्रपति की सैलरी 5 लाख रुपये प्रति महीना दिए जाने का ऐलान किया। वहीं उपराष्ट्रपति का वेतन 4 लाख और राज्यपाल का वेतन 3.5 लाख रुपये करने का प्रस्ताव पेश किया।
बजट से भले ही किसी को फायदा हुआ हो या ना हुआ हो, लेकिन राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और राज्यपालों को इसका फायदा मिला। वहीं सांसदों के वेतन को लेकर जेटली ने कहा, सांसदों की तनख्वाह में बढ़ोतरी महंगाई इंडेक्स के आधार पर हर 5 साल पर तय होगी। यह 1 अप्रैल 2018 से लागू होगी। 
मजे की बात यह है कि संसद में न कोई शोर-शराबा हुआ और न ही किसी ने walkout किया यानि सबकुछ पलक छपकते ही पारित हो गया। इन्हे प्रलोभनों ने आज राजनीति को जनसेवा नहीं बल्कि एक व्यापार बना दिया है। 
वहीं कुछ आंकड़े हम आपके सामने पेश कर रहे हैं, जिसमें बताया जा रहा है कि संसद के सदस्यों की सैलरी में अब तक कितना बदलाव हुआ।
अगर हम इस बारे में ऐतिहासिक आंकड़ों पर गौर करें तो साल 1921 में संसद के सदस्यों को दैनिक भत्ते के रूप में 20 रुपये मिलते थे। जिसके बाद साल 1945 में दैनिक भत्ता 30 रुपये दिया जाता था। वहीं वाहन भत्ता 15 रुपये था। जिसे साल 1946 में बढ़ाकर 45 रुपये कर दिया गया।
वहीं, मासिक वेतन को लेकर महात्मा गांधी ने जोर देकर कहा था कि सार्वजनिक जीवन में व्यक्तियों को न्यूनतम वेतन लेना चाहिए। उस दौरान संविधान सभा के कुछ सदस्यों को केवल 30 रुपये का भुगतान किया जाता था।
20 मई 1949 को वेतन और दैनिक भत्ते के लिए मसौदा संविधान प्रावधान( Draft Constitution provision) पेश किया गया, जिसमें मासिक आय को 750 से 1000 रुपये के बीच का भुगतान करने के लिए एक सुझाव दिया गया था। लेकिन एक दम से इतने पैसे बढ़ाने के लिए विधानसभा ने आपत्ति जताई थी।लेकिन दैनिक भत्ता 30 रुपये से बढ़ाकर 45 रुपये कर दिया गया। 
17 अक्टूबर 1949 में वी. आई. मुन्नीस्वामी पिल्लई ने दैनिक भत्ता को 40 रुपये करने के लिए एक प्रस्ताव भेजा। मेंबर ऑफ पार्लियामेंट एक्ट 1954 के तहत मासिक वेतन के रूप में 400 रुपये और दैनिक भत्ता के रूप में 21 रुपये का प्रस्ताव रखा गया। साथ ही 1946 में पेंशन को भी शामिल किया गया।
इतने बदलाव के बाद सैलरी में बढ़ोत्तरी होती गई। जो इस प्रकार है:-
1964 में 500 रुपये, 1983 में 750 रुपये, 1985 में 1000 रुपये, 1988 में 4000 हजार रूपए, 1998 में 12000 रुपये और 2006 में हालिया पैमाने पर 16,000 रुपये की वृद्धि हुई थी। वहीं जिस प्रकार मासिक आय में बढ़ोतरी हुई वहीं दैनिक भत्ते में भी बढ़ोतरी हुई जो इस प्रकार है:- 1964 में 31 रुपये, 1969 में 51 रुपये, 1983 में 75 रुपये, 1988 में 150 रुपये, 1993 में 200 रुपये, 1998 में 400 रुपये और 2001 में 500 रुपये कर दिया गया।
सैलरी के साथ कितनी सुविधाएं लोकसभा के मेंबर को दी जाती है:- एक सांसद को 50 हजार रुपये हर महीने वेतन के रूप में मिलते हैं। जिसके साथ संसदीय क्षेत्र भत्ता 45 हजार रुपये, दैनिक भत्ता 2 हजार रुपये, ऑफिस के खर्चे के लिए 45,000 हजार रुपये मिलते हैं। इसी के साथ ट्रैवलिंग, रेल यात्रा, हवाई यात्रा के लिए सुविधाएं दी जाती है। जो कुल मिलाकर 2 लाख 20 हजार है। सांसद की पत्नी के लिए सुविधाएं: सांसद की पत्नी को रेल यात्रा के लिये फर्स्ट एसी का टिकट मुफ्त दिया जाता है। जिसमें वह साल में 8 बार यात्राएं कर सकती हैं।