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शराब के बाद अब मीट पॉलिसी, मीट की दुकान खोलने के लिए इमाम से लेनी होगी अनुमति, मस्जिदों के आसपास नहीं बिकेंगे सूअर के मांस: AAP शासित MCD का फैसला

अब दिल्ली में मंदिर, मस्जिद और गुरुद्वारों सहित सभी धार्मिक स्थलों के आसपास मीट की दुकानें नहीं दिखाई देंगी। दरअसल, ‘दिल्ली नगर निगम’ (MCD) की मंगलवार (31अक्टूबर, 2023) की बैठक हुई। इसमें सदन के लाए किए गए 58 में से 54 प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। इसमें से मीट की दुकानों के लिए नई लाइसेंस पॉलिसी भी शामिल रही।

इसमें एमसीडी ने राजधानी में धार्मिक स्थलों के नजदीक मीट की दुकानों को लेकर नई लाइसेंस पॉलिसी को मंजूरी दे दी। एमसीडी के 12 जोन में ये पॉलिसी लागू होगी। मीट की दुकानों के लिए इस नई लाइसेंस पॉलिसी को लेकर एमसीडी सदन में खासा हंगामा भी हुआ।

सदन में पेश एजेंडे के मुताबिक, प्रस्तावित नई पॉलिसी में मीट की दुकानों, मीट प्रोसेसिंग यूनिट्स, पैकेजिंग या स्टोर प्लांट्स और ऐसे अन्य प्रतिष्ठानों के लिए नया लाइसेंस और लाइसेंस का नवीनीकरण शामिल होगा।

MCD के अधिकार क्षेत्र में मीट की दुकानों के लिए नए लाइसेंस देने की पॉलिसी पशु चिकित्सा सेवा विभाग की अधिसूचना जारी होने के बाद लागू होगी और अन्य सभी मौजूदा पॉलिसीज की जगह लेगी। गौरतलब है कि इससे पहले एमसीडी के उत्तर, दक्षिण और पूर्वी निगम में मीट की दुकानों की लाइसेंस फीस और नियम एक नहीं थे। नई लाइसेंस पॉलिसी में एमसीडी के पहले के उत्तर, दक्षिण और पूर्वी निगमों में मांस की दुकानों के लिए लाइसेंस जारी करने और नवीनीकरण के लिए दुकानों के लिए 18,000 रुपए और प्रोसेसिंग यूनिट्स के लिए 1.5 लाख रुपए तक की फीस तय की गई है।

मीट स्टोर के लिए एक साल के लिए लाइसेंस रिन्यू करने की फीस 7000 रुपए, दो साल के लिए 12,000 रुपए और तीन साल के लिए 18,000 रुपए होगी। इसके अलावा 500 रुपए की प्रोसेसिंग फीस भी ली जाएगी। मीट की दुकान के लाइसेंसी की मौत होने पर कानूनी वारिस को लाइसेंस ट्रांसफर होने के लिए 5500 रुपए चार्ज लिया जाएगा।

मीट की दुकान के लाइसेंसी की मौत होने पर कानूनी वारिस को लाइसेंस ट्रांसफर करने के लिए 5500 रुपए चार्ज लिया जाएगा। पहली बार नियमों का उल्लंघन करने से मीट की दुकान या परिसर बंद होने से 20 हजार रुपए की प्रोसेसिंग फीस लिए जाएगी। इसके बाद नियमों को लगातार तोड़ने पर 50,000 रुपए लिए जाएँगे।

इसमें कहा गया है कि लाइसेंस दिए जाने की तारीख से हर तीन वित्तीय वर्षों के बाद सभी शुल्क और जुर्माने में 15 फीसदी की बढ़ोतरी की जाएगी। दिल्ली के साल 2021 के मास्टर प्लान के मुताबिक, आवासीय क्षेत्र में मांस की दुकान का आकार कम से कम 20 वर्ग मीटर है, जबकि वाणिज्यिक क्षेत्रों में दुकानों के आकार पर कोई रोक लागू नहीं होगी। प्रोसेसिंग यूनिट्स प्लांट्स के मामले में कम से कम जरूरी आकार 150 वर्ग मीटर है।

नई पॉलिसी के तहत सदन में पास प्रस्ताव के मुताबिक, मीट की दुकान और मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा या अन्य धार्मिक स्थलों के बीच कम से कम 150 मीटर की दूरी की शर्त रखी गई है। नई पॉलिसी के तहत मीट की दुकान और धार्मिक स्थल या श्मशान घाट के बीच न्यूनतम दूरी 150 मीटर से कम नहीं होनी चाहिए।

इस नई पॉलिसी को लेकर एमसीडी के प्रस्ताव में कहा गया है कि यदि मीट की दुकान लाइसेंस मिलने के बाद पूजा स्थल बनता है तो प्रशासन दुकान और धार्मिक स्थल के बीच की दूरी पर आपत्ति नहीं जताएगा। यदि मीट की दुकान खोलने वाला मस्जिद समिति या इमाम से NOC लेता है, तो एमसीडी उसे मस्जिद के आसपास सूअर के मांस को छोड़कर स्वीकृत नस्लों के जानवरों का मीट बेचने वाली दुकान खोलने की मंजूरी देता है।

ज्ञात हो, एक पालिसी शायद यह भी है कि किसी स्कूल के पास सिगरेट या तम्बाकू नहीं बिकेगा, लेकिन खुलेआम बिक रहा है। 

दिल्ली : हिन्दूराव हॉस्पिटल में पेट दर्द का इलाज कराने गई लड़की के शरीर से अंग निकालकर भर दी प्लास्टिक: बोर्ड का गठन

                                                                   सांकेतिक 
दिल्ली में नगर निगम द्वारा संचालित अस्पताल के डॉक्टरों पर एक नाबालिग लड़की की शव से अंग चोरी करने का आरोप लगा है। अंतिम संस्कार के समय परिजनों को लड़की के अंग गायब होने की जानकारी हुई। इसके बाद उस्मानपुर थाने में मामला दर्ज कराया गया है। मामला दर्ज होने के बाद शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है।

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, भजनपुरा इलाके में रहने वाली 15 वर्षीय किशोरी के पेट में दर्द की शिकायत थी। इसके बाद उसे 21 जनवरी 2023 को एमसीडी द्वारा संचालित हिन्दूराव अस्पताल में भर्ती कराया गया। 24 जनवरी 2023 को उसके पेट का ऑपरेशन किया गया।

परिजनों का आरोप है कि ऑपरेशन के बाद उन्हें मरीज से मिलने नहीं दिया गया। डॉक्टरों ने कुछ घंटे में होश आने की बात कही, लेकिन दो दिनों तक लड़की को होश नहीं आया। 26 जनवरी 2023 की सुबह डाक्टरों ने लड़की को मृत घोषित कर दिया।

 परिजन के अनुसार, शव लेकर वे घर लौट आए। अंतिम संस्कार की तैयारी करने के दौरान उनकी नजर लड़की के पेट पर पड़ी। परिजनों का आरोप है कि लड़की के पेट पर बने घाव के भीतर पॉलिथीन भरी हुई थी। इसके साथ ही शरीर के भीतरी अंग भी गायब थे। परिजनों ने इसकी जानकारी पुलिस को दी। पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए अस्पताल भेज दिया।

दूसरी तरफ हिंदू राव अस्पताल प्रशासन ने लगाए गए आरोपों से इनकार किया है। डॉक्टरों का कहना है कि मरीज के आँतों में घाव था। कोई भी अंग चोरी नहीं किया गया है। अस्पताल के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. मुकेश कुमार ने कहा है कि जाँच में सहायता के लिए अस्पताल की तरफ से पुलिस को सारे विवरण साझा किए जा रहे हैं।

मुकेश कुमार का कहना है कि अस्पताल प्रशासन जाँच में पुलिस की मदद के लिए तैयार है। मामले की जाँच के लिए एक मेडिकल बोर्ड का गठन किया गया है, जो जीटीबी अस्पताल में रखे शव की जाँच कर रही है। पुलिस का कहना है कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद ही आगे की कार्रवाई की जाएगी।

केजरीवाल सरकार को हाई कोर्ट ने फटकारा : सैलरी के लाले और अखबारों में तस्वीरों संग फुल पेज विज्ञापन

दिल्‍ली नगर निगम (MCD) के कर्मचारियों को समय से सैलरी और पेंशन नहीं मिलने को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को फटकार लगाई है। इससे जुड़ी जनहित याचिका (PIL) पर सोमवार (5 अप्रैल 2021) को सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि एक तरफ विज्ञापनों पर पैसे खर्च किए जा रहे दूसरी ओर इस मुश्किल समय में कर्मचारियों को वेतन के लाले पड़े हैं।

न्यूज 18 की रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट ने कहा, हम देख सकते हैं कि किस तरह से सरकार राजनेताओं की तस्वीरों के साथ अखबारों में पूरे पन्ने का विज्ञापन देने पर खर्च कर रही है। लेकिन कर्मचारियों की सैलरी तक नहीं दी जाती है।

केजरीवाल सरकार को फटकार लगाते हुए कोर्ट ने सवाल किया, “क्या ये अपराध नहीं है कि इतने कठिन समय में भी, आप विज्ञापन पर पैसा खर्च कर रहे हैं।” आप सरकार की मंशा पर सवालिया निशान लगाते हुए कोर्ट ने कहा कि नगर निगमों को धन नहीं देना पड़े, इसलिए सरकार वित्तीय संकट का हवाला देती है। लेकिन, अखबारों और अन्य माध्यमों से विज्ञापन पर पैसा खर्च करने में सरकार को कोई दिक्कत नहीं है।

कोर्ट ने केजरीवाल सरकार को किसी भी तरह की मोहलत देने से इनकार करते हुए कर्मचारियों का मार्च तक का पूरा बकाया क्लियर करने का आदेश दिया है। वित्तीय वर्ष 2020-21 के संशोधित अनुमान के अनुसार, दिल्ली सरकार को ईडीएमसी को 864.8 करोड़ रुपए, एसडीएमसी को 405.2 करोड़ रुपए और उत्तरी दिल्ली नगर निगम को 764.8 करोड़ रुपए देने हैं।

आजतक की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि एमसीडी को वित्तीय वर्ष 2020-21 के लिए 400 करोड़ रुपए का फंड मिलना था, लेकिन उसे दिल्ली सरकार से केवल 109 करोड़ रुपए मिले हैं।

4 साल में कोई अस्पताल या फ्लाईओवर तक नहीं बना 

हाल ही में तेजपाल सिंह द्वारा दायर एक आरटीआई से पता चला था कि AAP सरकार द्वारा किए गए विश्वस्तरीय बुनियादी ढाँचे के लम्बे-लम्बें दावों के विपरीत, राजधानी में 2015-2019 के बीच यानी 4 सालों में न तो कोई नया अस्पताल बनाया और न ही किसी फ्लाईओवर का निर्माण किया। केजरीवाल सरकार द्वारा पिछले 5 वर्षों में स्वास्थ्य और बुनियादी ढाँचे के क्षेत्र में किए गए कार्यों की जानकारी के लिए 2019 में RTI दायर की गई थी।

नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआई) की दिल्ली इकाई के अध्यक्ष अक्षय लाकड़ा ने आरटीआई द्वारा 3 जुलाई 2019 को पूछे गए सवालों के जवाबों की प्रति को शुक्रवार (2 अप्रैल, 2021) को ट्वीट किया है। उन्होंने लिखा है, ”RTI से खुलासा हुआ कि 1 अप्रैल 2015 से लेकर 31 मार्च 2019 के बीच दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार ने ना ही किसी हॉस्पिटल को अनुदान दिया और न ही किसी नए फ्लाईओवर का निर्माण करवाया। बस झूठे विज्ञापन दे-दे कर जनता को मूर्ख बना लिया और जनता भी इसकी बातों में आ गई।”

इस बीच, खान मार्केट इलाके को सँवारने के नाम पर वहाँ एक नया सेल्फी पॉइंट बनाया गया है।

शीला दीक्षित सरकार में परिवहन मंत्री रहे हारून यूसुफ का आरोप है कि केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में विज्ञापन और प्रचार पर 611 करोड़ रुपए खर्च किए हैं, लेकिन सरकारी स्कूलों की स्थिति और बुनियादी सुविधाओं के उत्थान के लिए कुछ नहीं किया है।

केजरीवाल सरकार पर पूर्व में जनता के लिए काम करने की जगह झूठे और भ्रामक प्रचारों के जरिए अपना महिमामंडन करने के आरोप भी लग चुके हैं।

दिल्ली : निगम चुनावों में आप ने बाज़ी मार, क्या भाजपा का सफाया करने की दस्तक दे दी है?

राजधानी दिल्ली में नगर निगम के हुए 5 उपचुनावों में भाजपा के प्रति  नाराजगी देखने को मिली है। आम आदमी पार्टी  को 4 सीटें  जबकि कांग्रेस को 1 सीट  मिली है। क्या भाजपा शीर्ष नेतृत्व दिल्ली प्रदेश से इसका जवाब मांगेगा? या प्रदेश जिला अथवा मंडल से?

अभी गुजरात में भाजपा ने निकाय और पंचायत चुनावों में विपक्ष को धूल चटवा दी, लेकिन दिल्ली में स्थिति एकदम विपरीत। अपनी छेंप मिटाने प्रदेश से लेकर मंडल तक बढ़ती महंगाई और किसान आंदोलन का सहारा लेंगे, जबकि यही समस्या गुजरात में भी थी। कारण स्पष्ट है, वहां प्रदेश से लेकर मंडल तक जमीनी स्तर पर काम कर रहे हैं, लेकिन दिल्ली में एकदम विपरीत, क्यों?  

यदि इस ब्लॉग पर मेरे पुराने लेखों को देखा जाए, स्पष्ट लिख चूका हूँ कि तीन नगर निगमों से कम से कम एक नगर निगम भाजपा गँवा सकती है, जिसके लक्षण इन उपचुनाव नतीजों ने अब तो दीवारों पर लिख दिया है। लोकसभा तक तो जनता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर पूर्णरूप से विश्वास करती है, लेकिन लोक सभा से नीचे नहीं। हर वक्त केजरीवाल के भ्रष्टाचार और नाकामियों को गिनवाने की बजाए नगर निगम में व्याप्त भ्रष्टाचार को भी दूर कर उदाहरण प्रस्तुत किया होता। चुनावों में चीखते-चिल्लाते आएंगे "हर हर मोदी, घर घर मोदी", लेकिन धरातल पर इनका काम जीरो है। इसका साफ तौर पर कारण भाजपा के निगम पार्षद हैं जिन्होंने अपने इलाकों में जनता का कोई काम नहीं किया  केवल  दिखावा किया है। इसमें कई निगम पार्षद अपने आप को प्रधानमंत्री मोदी से कम नहीं समझते। सारा दिन केवल स्वांग करने में, स्वागत करने में, स्वागत करवाने में उनका बीत जाता है। केवल मोदी-योगी-अमित के कन्धों पर अपने आपको किसी शहंशाह से कम नहीं समझते।

पुराने कमर्ठ कार्यकर्ताओं को दूध में से मक्खी की तरह निकाल कर फेंका हुआ है। केवल वही पुराने कार्यकर्ता हैं, जो भ्रष्टाचार में लिप्त रहते हैं। अगर कोई भाजपा कार्यकर्ता उनको कार्यक्रम में अपनी परेशानी बता दे तो उनका यह कहना होता है, 'अरे देख तो लो जगह कौन सी है  मेरे ऑफिस में आना और ऑफिस में जाने के बाद और हां हो जाएगा', लेकिन उसके बाद भी काम होते नहीं हैं जब नेता इस तरह से जनता को बरगलाएंगे तो भला पार्टी का क्या हाल होगा, इन उपचुनावों ने सिद्ध कर दिया है। 

आज दिल्ली में केंद्र को छोड़ दें तो नगर निगम और विधानसभा में भाजपा की सरकार नहीं बन पाई है। शीर्ष नेतृत्व ने कभी चिंतन नहीं किया। उसके पीछे छोटे-छोटे नेता हैं जो कि चुनाव जीतने के बाद  जनता का काम नहीं करते, उनका नाम लेने में भी शर्म आती है ज्यादातर निगम पार्षद दिनभर अपनी पत्नियों के साथ घूमते रहते हैं आप भी समझ गए होंगे कि मैं किसी की बात कर रहा हूं मैंने भी अपने क्षेत्र के नेता से एक परिवारिक काम करवाने की गूजराइश की थी, लेकिन वह काम आज तक नहीं हुआ। कोई बात नहीं समय आ गया है जब इस देश में रावण का घमंड चूर हो गया तो निगम पार्षद  किस खेत  की मूली है इधर से उधर घूमते रहते हैं, पर सब कुछ दिखावा है। कई नेता भी दिनभर चटुकारिता मे लगे रहते है आप जैसे नेताओं की अनदेखी की वजह से आने वाले समय मे भाजपा के लिए परेशानी होगी

केजरीवाल बॉर्डर पर, CM हाउस पर धरना: पार्षदों ने कहा- निगमों का ₹13,000 करोड़ दो, नहीं तो हड़ताल करेंगे सफाईकर्मी

केंद्र सरकार के कृषि कानूनों के विरोध में दिल्ली को घेरे बैठे ‘किसानों’ के समर्थन और सेवा में आम आदमी पार्टी (AAP) कोई कसर नहीं छोड़ रही है। जबकि दिल्ली में स्वयं इन बिलों को लागु करने की घोषणा कर चुके हैं, फिर किस आधार पर आंदोलनकारियों का साथ देने सिंधु बॉर्डर गए? आखिर कब तक दिल्ली वालों को पागल बनाते रहोगे? कुछ शर्म है या नहीं। अगर आंदोलन का समर्थन करना था, तो फिर क्यों इसे दिल्ली में लागु किया, अब इसे दोगलापन न कहा जाए, तो क्या कहा जाए? ये है दिल्ली के मुख्यमंत्री की कार्यशैली।

अब खुद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अपनी पूरी कैबिनेट के साथ सिंघु बॉर्डर पर किसानों से मिलने पहुँचे थे। दिलचस्प बात यह है दिल्ली के मुख्यमंत्री के घर के बाहर दिल्ली नगर निगम के पार्षद धरने पर बैठे हैं।

इनकी माँग है कि नगर निगमों के 13000 करोड़ रुपए की बकाया राशि चुकाई जाए। लेकिन, मुख्यमंत्री इनसे मुँह फेर कर किसान आंदोलन में पहुँच गए। अब पार्षदों व धरने पर बैठे लोगों का कहना है कि जब तक उनकी सुनवाई नहीं होगी, वे कहीं नहीं जाएँगे

भाजपा दिल्ली के ट्विटर अकाउंट पर धरने का वीडियो शेयर करते हुए लिखा गया है, “नगर निगम दिल्ली के 13,000 करोड़ रुपए की बकाया राशि न देने पर, आज, मुख्यमंत्री निवास स्थान पर केजरीवाल सरकार के ख़िलाफ़ तीनों निगम के पार्षदों द्वारा धरना प्रदर्शन जारी है।”

अगले ट्वीट में लिखा गया, “अपनी नाकामियों का ठीकरा दिल्ली सरकार दूसरे राज्यों पर फोड़ती आई है और अब नगर निगम, जो दिल्लीवासियों के लिए वास्तव में काम करती है, उसे भी पंगु बनाने में जुटी हुई है। मुख्यमंत्री जी शर्म करो, निगम का बकाया पैसा जारी करो।”

इसी क्रम में अगले ट्वीट में कहा गया, “केजरीवाल सरकार दलगत राजनीति से ऊपर उठकर दिल्ली के विकास और जन सेवा के लिए निगमों का बकाया 13000 करोड़ रुपए तत्काल प्रभाव से दे। निगमों को पंगु बनाना बंद करे केजरीवाल सरकार।”

शेयर किए गए वीडियो में प्रदर्शनकारियों को कहते सुना जा सकता है कि केजरीवाल सरकार ने उनसे वादा किया था कि सारा बकाया चुकाया जाएगा और उनसे यह भी कहा गया था कि वह लोग उनसे आकर कभी भी मिल सकते हैं। प्रदर्शनकारी कहते हैं कि आज सुबह जब वे मुख्यमंत्री से मिलने आए तो कहा गया कि वह उनसे मिलेंगे, लेकिन थोड़ी देर बाद सीएम बिन कुछ कहे और बिना उनसे मिले चले गए।

अब मुख्यमंत्री का रवैया देखकर प्रदर्शन पर बैठे लोगों का कहना है कि वह उनके आवास पर बैठे हैं और जब सीएम वापस आएँगे तब वह पहले उनसे बात करेंगे और तभी उनको अंदर जाने दिया जाएगा। प्रदर्शनकारी कहते हैं, “उन्होंने अगर हमारा पैसा क्लियर किया तो हम यहाँ से जाएँगे, वरना सभी सफाई कर्मचारी हड़ताल पर जाने को तैयार हैं। यदि दिल्ली में कोरोना की चौथी लहर आई तो उसके जिम्मेदार भी मुख्यमंत्री ही होंगे।”

प्रदर्शनकारी बताते हैं, “ये पैसा कोई हमारा नहीं है। ये राज्य वित्त आयोग जिसका गठन राज्य सरकार ने किया है, उसकी सिफारिश के अनुसार तीनों नगर निगम का पैसा 13,500 करोड़ रुपया नगर निगम को दिल्ली सरकार से लेना है।”

उल्लेखनीय है कि अपने आवास पर निगम पार्षदों की सुनवाई करने की बजाय दिल्ली मुख्यमंत्री केजरीवाल ने थोड़ी देर पहले अपने ट्विटर पर किसान प्रदर्शन की वीडियो शेयर की है। इस वीडियो में वह कहते नजर आ रहे हैं कि किसानों की माँग बिलकुल जायज है और उनकी पार्टी शुरू से इस संघर्ष में साथ हैं। 

दिल्लीवासियों को मुफ्त की रेवड़ियों से फुसलाकर रंग बदलने में गिरगिट को भी मात देने वाले दिल्ली के मुख्यमंत्री को आज तक मुफ्त की रेवड़ियां खाने वाले पहचान नहीं सके। प्रदुषण मद में मिले धन का चुटकी भर खर्च जिस पंजाब के किसानों को पराली जलाने के लिए बदनाम किया जा रहा था, आज उसी पंजाब के किसानों की खातिर उस दिल्ली को परेशान कर रखा है, जहाँ का वह मुख्यमंत्री है। यदि किसी कारण बिल्ली भागों छीका टूट गया, और आप सत्ता में आ गयी, तुरंत दिल्ली छोड़ पंजाब का रास्ता ले लेगा ये मुख्यमंत्री। यही कारण है कि एक विभाग अपने पास नहीं रखने का मुख्य कारण भी यही है। अब देखिए ट्विटर पर कैसी क्लास लग रही है:-

वह कहते हैं कि शुरू-शुरू में जब किसान बॉर्डर पर आए तो केंद्र सरकार और दिल्ली पुलिस ने उनसे 9 स्टेडियम माँगे। बहुत दबाव बनाया गया ताकि किसान दिल्ली आए और उन्हें पकड़कर स्टेडियम में डाल दिया जाए, लेकिन उनकी सरकार ने परमिशन नहीं दी और इससे आंदोलन को बढ़ने में मदद मिली। इसके बाद से उनकी पार्टी से जुड़े सभी लोग सेवादार की तरह किसानों की सेवा करने में लगे हैं। वह कहते हैं कि वह आज भी प्रोटेस्ट में बतौर सेवादार ही पहुँचे हैं।

दिल्ली : डॉक्टरों, म्युनिसिपल कर्मचारियों को सैलरी नहीं मिलने के कारण केजरीवाल के घर के बाहर धरने पर बैठे तीनों मेयर

दिल्ली के सभी 3 म्युनिसिपल कॉर्पोरेशंस के मेयरों ने मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के घर के बाहर धरना दिया। उनका आरोप है कि म्युनिसिपल कॉर्पोरेशंस के कर्मचारियों को आम आदमी पार्टी की सरकार सैलरी नहीं दे रही है, जिस कारण उन्हें सड़क पर उतरने को बाध्य होना पड़ा है। मेयरों ने AAP सुप्रीमो से कहा है कि या तो वो अंदर बुला कर उनसे बातचीत करें, नहीं तो वो ऐसे ही विरोध प्रदर्शन करते रहेंगे। उधर डॉक्टरों की सैलरी को लेकर भी हंगामा मचा है।

अक्टूबर 22, 2020 को भी तीनों म्युनिसिपल कॉर्पोरेशंस के डॉक्टरों ने जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया। 7 दिनों के भीतर ये उनका दूसरा विरोध प्रदर्शन था। हिंदूराव, कस्तूरबा गाँधी और राजन बाबू अस्पताल के डॉक्टरों ने दिल्ली सरकार के खिलाफ हुए विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया। उन्होंने दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के खिलाफ भी नारेबाजी की और मिल-बैठ कर सैलरी का मुद्दा सुलझाने को कहा।

इन डॉक्टरों को पिछले 3 महीने से सैलरी नहीं मिली है। उनका कहना है कि कोरोना वायरस आपदा के दौरान उन्होंने अपनी जिंदगी खतरे डाल कर काम किया लेकिन अब उन्हें ही सैलरी नहीं दी जा रही है। साथ ही सातवें वेतन आयोग के हिसाब से उन्हें कई अन्य भत्ते भी नहीं प्रदान किए गए हैं। ये डॉक्टर पिछले कई सप्ताह से विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि अब सिर्फ मौखिक आश्वासन काफी नहीं है, एक्शन होना चाहिए।

अब खबर आई है कि दिल्ली सरकार के मंत्री सत्येन्द्र जैन इन मेयरों से मुलाकात कर के उनकी बात सुनेंगे। दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री के साथ बैठक के बाद क्या नतीजा निकलता है, इस पर सबकी नजर है। मेयर जय प्रकाश ने पूछा कि दिल्ली सरकार पब्लिसिटी पर करोड़ों रुपए क्यों खर्च कर रही है? उन्होंने कहा कि दिल्ली सरकार कुछ नहीं कर रही है और वो सीएम से मिल कर पूछना चाहते हैं कि कब तक वो इस मामले में हरकत में आएँगे।

उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश का कहना है कि दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है। जयप्रकाश ने इसके पीछे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहराते हुए कहा था, “दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है। दिल्ली सरकार ज़िम्मेदार रवैया अपनाते हुए हमारे इस साल के जो 1600 करोड़ रुपए और पिछले साल के 9000 करोड़ रुपए रोक रखे हैं, उसे जारी करे और दिल्ली की जनता के साथ खिलवाड़ न करे।”

मेयर जय प्रकाश का आरोप : ‘6 साल से केजरीवाल सरकार, और तब से ही डॉक्टर्स की सैलरी पर संकट’: रोक रखा है ₹10600 करोड़

उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश (बाएँ), केजरीवाल (दाएँ)
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल प्रारम्भ से जनता को भ्रमित करते रहे हैं, मुफ्त रेवड़ियों बाँट सत्ता पर काबिज होते रहे हैं। इनकी महत्वकांशा इतनी अधिक है, लगता है राष्ट्रपति पद मिलने पर भी इन्हें लगेगा कि राष्ट्रपति के अधिकार बहुत कम है। इस स्वभाव के व्यक्ति कभी संतुष्ट नहीं हो सकते। 

केजरीवाल से पूर्व जितनी भी दिल्ली के मुख्यमंत्री रहे, सभी के पास उतने अधिकार थे, जितने की आज केजरीवाल के पास, परन्तु किसी भी मुख्यमंत्री ने कभी किसी भी विभाग के कर्मचारी का वेतन नहीं रोका। समझ में नहीं आता कि आखिर क्यों इन्हे किसी का वेतन रोकने में कौन-सा सुख मिलता है? विज्ञापनों में कहते हैं कि "मैं आपके परिवार का सदस्य हूँ, आपका भाई हूँ", लेकिन परिवार के सदस्य एवं भाई होने का ढोंग रच कर्मचारियों का वेतन रोक, कौन-से पारिवारिक कर्तव्य निभा रहे हैं? 

कभी राज्यपाल से टकराव, तो कभी केन्द्र से, जबकि केजरीवाल से पूर्व किसी भी मुख्यमंत्री का राज्यपाल से लेकर केन्द्र तक से कभी कोई टकराव नहीं हुआ, केन्द्र में सत्ता में कोई भी पार्टी हो, सभी ने मिलजुल कर काम किया, एक ये केजरीवाल है, जो हमेशा किसी न किसी बात को लेकर टकराते रहते हैं, क्या ये अराजक पृष्ठभूमि से हैं? लक्षण तो यही बताते हैं।   

उत्तरी दिल्ली नगर निगम के तहत आने वाले डॉक्टर्स पिछले चार महीनों से वेतन का भुगतान नहीं करने पर आंदोलन कर रहे हैं। इस पर दिल्ली के हिंदू राव अस्पताल के डॉक्टर और कर्मचारियों ने कल, 16 अक्टूबर को दिल्ली स्थित जंतर-मंतर पर विरोध-प्रदर्शन करने का फैसला लिया है। उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश का कहना है कि दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है।

अभी तक मेडिकल स्टाफ सिर्फ अस्पताल परिसर में ही विरोध-प्रदर्शन कर रहा था, लेकिन अब उन्होंने सड़क पर उतरने का फैसला लिया है। हिन्दू राव अस्पताल के साथ ही उत्तरी दिल्ली नगर निगम द्वारा संचालित कस्तूरबा अस्पताल के रेजिडेंट डॉक्टर्स एसोसिएशन (आरडीए) ने भी वेतन न मिलने के कारण अक्टूबर 14, 2020 से एक सप्ताह की हड़ताल पर जाने का फैसला किया और वेतन न मिलने पर इस्तीफा देने की धमकी भी दी है।

डॉक्टर्स और मेडिकल स्टाफ की इस समस्या पर बृहस्पतिवार (अक्टूबर 15, 2020) को उत्तरी दिल्ली नगर निगम के महापौर जयप्रकाश ने कहा है कि उन्होंने कल ही हिंदू राव और कस्तूरबा गाँधी समेत करीब 6 अस्पतालों के कर्मचारियों की 1 महीने की सैलरी जारी कर दी है और बकाया सैलरी भी जल्द से जल्द दे दी जाएगी।

समाचार एजेंसी एनआई के मुताबिक, हिंदू राव अस्पताल के डॉक्टरों की हड़ताल पर उत्तरी दिल्ली नगर निगम के मेयर जय प्रकाश ने कहा, “डॉक्टरों की तीन महीने की सैलरी बकाया थी, उसमें से एक महीने का वेतन मैंने कल रात को जारी करा दिया। सिर्फ दो महीने का वेतन बकाया है, जैसे महीना पूरा होगा एक महीने का वेतन हम और जारी कर देंगे।”

जयप्रकाश ने इसके पीछे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल को दोषी ठहराते हुए कहा, “दिल्ली में 6 साल से अरविंद केजरीवाल सरकार है और पिछले 6 सालों से ही ये संकट है। दिल्ली सरकार ज़िम्मेदार रवैया अपनाते हुए हमारे इस साल के जो 1600 करोड़ रुपए और पिछले साल के 9,000 करोड़ रुपए रोक रखे हैं, उसे जारी करे और दिल्ली की जनता के साथ खिलवाड़ न करे।”

उन्होंने कहा कि नगर निगम की कमाई के 2 ही साधन हैं, पहला- राजस्व, संपत्ति कर, विज्ञापन, कार पार्किंग, लाइसेंस, नक्शे पास करने की फीस, चालान और जुर्माने इकट्ठा होने वाला पैसा और दूसरा साधन वो पैसा, जो ग्रांट के तौर पर दिल्ली सरकार से मिलता है। जयप्रकाश का कहना है कि पिछले 4-5 महीने से दिल्ली सरकार ने एक भी रुपया नहीं दिया है।

एमसीडी का चौंकाने वाला बयान : क्या दिल्ली में कोरोना से अब तक 998 नहीं बल्कि 2098 लोगों की मौत?

कोरोना से मौत के आंकड़े किसके सही किसके गलत
देश की राजधानी दिल्ली में कोरोना के लगातार बढ़ते आंकड़ों के बीच चौंकाने वाली बात सामने आई है। दिल्ली सरकारी द्वारा जारी ताजा हेल्थ बुलेटिन में बताया गया कि कोविड-19 से अब तक दिल्ली में 984 लोगों की मौत हुई है लेकिन एमसीडी की आंकड़े कुछ और ही कहते हैं। एमसीडी के मुताबिक कोरोना से दिल्ली में अब तक 2098 लोगों की मौत हो चुकी है
कौन सच बोल रहा है कौन झूठ? किसके आंकड़ों को सच माना जाए किसको झूठ इस बारे में संशय बरकार है। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली की तीनों एमसीडी का कहना है कि दिल्ली के अलग-अलग इलाकों में बने शमशान घाट और कब्रिस्तान में अब तक 2098 लोगों का अंतिम संस्कार किया है जिनकी मौत कोरोना से हुई थी। वहीं दिल्ली सरकार का ताजा हेल्थ बुलेटिन कह रहा है कि अब तक सिर्फ 984 लोगों ने ही कोरोना के चलते जान गंवाई है।
कोरोना के चरण को लेकर भी दिल्ली और केंद्र सरकार के बीच विवाद है। दिल्ली सरकार दबे मुंह कह रही है कि राजधानी में कोरोना स्टेज 3 में प्रवेश कर गया है और अब राजधानी में कोरोना का कम्यूनिटी स्प्रेड हो रहा है। इसके पीछे तर्क ये दिया जा रहा है कि कोरोना के कई मामले ऐसे सामने आए हैं जिसमें पता ही नहीं कि मरीज कहां से संक्रमित हुआ है लेकिन केंद्र सरकार मानने को तैयार ही नहीं कि दिल्ली में कोरोना का कम्यूनिटी स्प्रेड हो रहा है। फिलहाल कोरोना से दिल्ली में हुई मौत के आंकड़ों में दोगुने अंतर ने लोगों की चिंता बढ़ा दी है। फिलहाल इस मामले पर दिल्ली सरकार या नगर निगम की तरफ से कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है
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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार राजधानी दिल्ली में कोरोना का विस्फोट हो रहा है। दिल्ली में पिछले कुछ दिनों से 1000 से 1200 क...

दिल्ली : अस्पताल और श्मशान में शव रखने की जगह नहीं, हाइकोर्ट ने भेजा केजरीवाल सरकार, तीनों निगमों को नोटिस

दिल्ली, कोरोना से मौतदिल्ली हाई कोर्ट ने लोकनायक अस्पताल में शवों की बदत्तर स्थिति का जायजा लेने के बाद दिल्ली सरकार और तीनों नगर निगमों को नोटिस जारी किया है। हाईकोर्ट ने शवों को लेकर मानवाधिकारों के उल्लंघन पर आपत्ति जताई गई है। साथ ही इस मामले पर वकीलों के साथ दिल्ली सरकार और तीनों एमसीडी को अदालत में पेश होने को कहा है।
देश में लगातार कोरोना के आँकड़े बढ़ते चले जा रहे है। ऐसे में दिल्ली की दशा भी आए दिन और खराब होती चली जा रही है। दिल्ली में कोरोना संक्रमित लोगों के मौत के मामलों में वृद्धि लोकनायक अस्पताल के लिए परेशानी का सबब बन गई है। बता दें इस वक्त दिल्ली में लोक नायक जयप्रकाश अस्पताल कोविड-19 का सबसे बड़ा अस्पताल है।
हाल ही में मीडिया में लोकनायक अस्पताल की मॉर्चरी में रखे शवों को लेकर एक रिपोर्ट सामने आई थी। जिसमें अस्पताल स्थित कोविड-19 मॉर्चरी में 108 शव रखे हुए हैं। मोर्चरी में 80 शवों वाले रेक के भरने के बाद 28 कोरोना संक्रिमत शवों को ज़मीन पर एक के ऊपर रखा गया था।
लोकनायक अस्पताल में इस वक्त सिर्फ कोविड 19 के मरीजों का ही इलाज चल रहा है। जिसके चलते अस्पताल का शवगृह सिर्फ़ उन शवों से भरा है जिनकी मौत कोरोना से हुई है या वो कोरोना के संदिग्ध थे। सभी शवों को अलग-अलग पीपीई किटों में पैक किया गया हैं। दिल्ली के 16 कोविड 19 अस्पतालों में भर्ती 2242 में से 602 मरीज लोकनायक में भर्ती हैं।
अस्पताल अधिकारी ने शवगृह की हालत बताते हुए कहा कि, अभी तक पाँच दिन पहले जिनकी मौत हुई थी उनका अंतिम संस्कार नहीं हो पाया है। जिसकी वजह से मोर्चरी में हर दिन संख्या बढ़ती चली जा रही है। पिछले हफ्ते जमीन पर 28 की जगह 34 शव रखें हुए थे।
26 मई को आठ शवों को निगमबोध घाट के सीएनजी श्मशान घाट से लौटा दिया गया क्योंकि सीएनजी श्मशान घाट और ज्यादा शवों का शवदाह करने की स्थिति में नहीं था। वहाँ की छह भट्टियों में से केवल दो ही काम कर रही थीं।
रिपोर्ट्स के अनुसार मंगलवार निगमबोध घाट पर इलेक्ट्रिक शवदाह भट्ठी की सिर्फ दो ही सीएनजी शवदाह भट्टियाँ काम कर रही थी, जिसकी वज़ह से वो ज्यादा भार नहीं ले सकते इसलिए बचे हुए शवों को उन्होंने वापस अस्पताल भेज दिया था। इस श्मशान घाट पर अब तक 244 कोविड संक्रमित या संदिग्ध संक्रमितों का दाह संस्कार कर चुका है।
कोर्ट ने इस भयावह स्थिति को लेकर सरकार और नगर निगम से जवाब माँगा है। कोर्ट ने नोटिस के जरिए शवों के अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी तय करने और इससे निपटने के लिए आधिकारिक तौर पर पूरा भी माँगा है।
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प्रतीकात्मक आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली में कोरोना के कदम रखते ही, मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उनकी स...
कोरोना के सभी हिंदू मरीजों या संदिग्धों का इलेक्ट्रिक भट्ठी में दाह संस्कार होता है। जिसके लिए इन्हें निगमबोध घाट या पंजाबी बाग ले जाया जाता है। वहीं मुसलमानों और ईसाइयों के शवों का अंतिम संस्कार आयकर कार्यालय के इलाके में बने चार कब्रिस्तान मंगोलपुरी, मदनपुर खादर और शास्त्री पार्क में किया जाता है।

गोपाल राय का कांग्रेस-BJP पर गंभीर आरोप, कहा- जोन चुनाव में दोनों में हुआ गठबंधन

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्ली विधानसभा के चुनाव के लिए गरमा रही राजनीति के बीच आम आदमी पार्टी (आप) ने कांग्रेस और भाजपा के बीच गठबंधन होने का आरोप लगाया है। आप ने कहा कि शहरी-सदर पहाड़गंज (सिटी एसपी) जोन के चेयरमैन के चुनाव को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के कहने पर भाजपा से गठबंधन करने का रुख कांग्रेस के निगम पार्षदों ने अपनाया।
पार्टी के दिल्ली प्रदेश संयोजक गोपाल राय ने कहा कि उत्तरी निगम के अंदर नरेला और सिटी एसपी जोन हैं। सिटी एसपी जोन में आप के 8 पार्षद हैं। इसका मतलब है कि 8 वोट आम आदमी पार्टी के पास हैं, 6 पार्षद अर्थात 6 वोट कांग्रेस के पास हैं, और 3 पार्षद भाजपा के पास अर्थात 3 वोट भाजपा के पास हैं।
जोन के चुनाव में 3 पद होते हैं। पहला अध्यक्ष का होता है, दूसरा उपाध्यक्ष और तीसरा पद स्थायी समिति के सदस्य का होता है। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर कांग्रेस के प्रत्याशी 9-9 वोट के साथ जीते और स्थायी समिति के सदस्य के पद पर भाजपा का प्रत्याशी 9 वोट के साथ जीता।
इस तरह कांग्रेस के अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पद के प्रत्याशियों के पक्ष में 6-6 वोट कांग्रेस के और तीन वोट भाजपा के पड़े। इसी प्रकार भाजपा के स्थायी समिति के सदस्य के पद के प्रत्याशी के पक्ष में 6 वोट कांग्रेस के और 3 वोट भाजपा के पड़े। इससे साफ जाहिर हो गया है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों मिली हुई हैं और दोनों ने मिलकर जोन का चुनाव लड़ा है।
राय ने कहा कि लोकसभा चुनाव के समय भी यह प्रश्न उठे थे कि अगर कांग्रेस भाजपा को हराना चाहती है तो दिल्ली समेत उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, आंध्र प्रदेश और हरियाणा आदि राज्यों में हर जगह जहां पर विपक्ष मजबूत है, वहां अपने प्रत्याशियों को अलग से चुनाव लड़वाकर वोट काटने का काम क्यों कर रही है? उन्होंने कहा कि इस जोन के चुनाव में कांग्रेस ने भाजपा के साथ गठबंधन करके आप के खिलाफ जो षड्यंत्र किया है, उसने कांग्रेस की उस समय की मंशा को साफ कर दिया है।

अवैध फैक्‍ट्रियां बंद की जाएं-- सुप्रीम कोर्ट

सीलिंग के बाद दिल्‍ली के लिए सुप्रीम कोर्ट का एक और बड़ा आदेश, कहा- अवैध फैक्‍ट्रियां बंद की जाएं
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
दिल्‍ली में अवैध फैक्ट्री मामले में सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने 13 सितंबर को कहा कि संसद कानून बनाती है और अगर लोग कानून का उल्लंघन करते रहे तो दिल्ली को कोई नहीं बचा सकता. कोर्ट ने इसके साथ ही दिल्‍ली में चल रहीं अवैध फैक्ट्रियां बंद करने का आदेश पारित किया. कोर्ट में विश्वास नगर के फैक्टरी मालिक रिलीफ के लिए आए थे। हैरानी इस बात से होती है, जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते समय कोर्ट राज्य  
सीलिंग मामले में भी कोर्ट ने की थी खिंचाई
इससे पहले शीर्ष अदालत ने सीलिंग मामले में दिल्ली के स्थानीय निकाय को अपनी आंखे मूंदने और कोई हादसा होने का इंतजार करने पर आड़े हाथ लिया था। साथ ही दिल्ली विकास प्राधिकरण से नगर के मास्टर प्लान 2021 में बदलाव करने के उसके प्रस्तावों पर सवाल खड़े किए थे। कोर्ट ने कहा था कि ऐसा लगता है कि दिल्ली विकास प्राधिकरण किसी तरह के दबाव के आगे झुक रहा है। न्यायमूर्ति मदन बी. लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की पीठ ने कहा, 'दिल्ली में हर कोई अपनी आंखें मूंदे है और कोई हादसा होने का इंतजार कर रहा है। आपने (नगर निकाय) उपहार सिनेमा अग्निकाण्ड त्रासदी और बवाना तथा कमला मिल्स जैसी घटनाओं से भी कुछ नहीं सीखा है'
सीलिंग से कारोबारियों को बड़ी राहत मिली थी
दिल्ली विकास प्राधिकरण ने हाल ही में दुकान-रिहाइशी भूखण्डों और परिसरों का एफएआर और रिहाइशी भूखण्डों के बराबर करने का प्रस्ताव किया है। प्राधिकरण के इस कदम से सीलिंग के खतरे का सामना कर रहे कारोबारियों को बहुत बड़ी राहत मिलेगी। पीठ ने प्राधिकरण से सवाल किया, 'दिल्ली में रहने वाली जनता के बारे में क्या कहना है?' पीठ ने कहा, 'आपको जनता का पक्ष भी सुनना होगा। आप सिर्फ कुछ लोगों को ही नहीं सुन सकते' पीठ ने दिल्ली में हो रहे अनधिकृत निर्माणों का जिक्र किया और कहा, 'आप दिल्ली की जनता के हितों का ध्यान रख रहे हैं या नहीं?' पीठ ने कानून का शासन बनाये रखने पर जोर देते हुये कहा कि दिल्ली कचरा प्रबंधन, प्रदूषण और पार्किंग जैसी अनेक समस्याओं से जूझ रही है। 
दिल्ली में चाहे अधिक्रमण हो, अवैध निर्माण हो या अवैध फैक्ट्रियां बिना पुलिस, नेता और प्रशासन की मिलीभगत के बिना असम्भव है। 

क्या अधिकारी सो रहे हैं?--सुप्रीम कोर्ट 

इससे पूर्व दिल्ली में सीलिंग पर जुलाई 18 को सुप्रीम कोर्ट ने और सख्ती दिखाई। कोर्ट ने कहा कि सीलिंग रुकनी नहीं चाहिए। साथ ही आदेश दिया कि बिल्डिंग बाईलॉज को अनदेखा कर अवैध निर्माण करने वाले सभी बिल्डर, कांट्रेक्टर और आर्किटेक्ट ब्लैक लिस्ट किए जाएं। इस बाबत दो सप्ताह में नियम बनाए जाएं। जस्टिस एमबी लोकुर की बेंच ने कहा कि अवैध निर्माण करने वालों को सिर्फ 48 घंटे का नोटिस दिया जाए। जवाब नहीं मिले तो तुरंत कार्रवाई करें। अवैध निर्माण ढहाना है तो ढहा दें और सील करना है तो सील कर दें।
नजफगढ़ वार्ड कमेटी के चेयरमैन को कोर्ट ने पेश होने का आदेश दिया
नगर निगम ने कोर्ट को बताया कि नजफगढ़ में अवैध निर्माण ढहाने गए दस्ते को नजफगढ़ वार्ड कमेटी के चेयरमैन मुकेश सुर्यन ने काम नहीं करने दिया। इस पर कोर्ट ने सुर्यन को अगली सुनवाई पर पेश होने का आदेश जारी कर दिया। कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि सीलिंग करने वाले अधिकारियों के साथ पर्याप्त पुलिस बल भेजा जाए।
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क्या इस क्षेत्र में कभी कार्यवाही हो सकती है?
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 की इजाजत किसने दी?
कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल से पूछा आपके अधिकारी क्या कर रहे हैं
सुनवाई के दौरान अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कोर्ट को बताया कि सील किए गए अवैध निर्माण खोलने के लिए 1130 आवेदन मिले हैं। इनमें से 405 खोले जा चुके हैं। इस पर कोर्ट ने कहा, “आपके अधिकारी क्या कर रहे हैं? आप कह रहे हैं कि 405 मामलों में अवैध निर्माण नहीं मिला। बाकी 700 मामलों का क्या? क्या अधिकारी सो रहे हैं?’ अधिकारी सो नहीं रहे, बल्कि अपनी तिजोरियाँ भर रहे हैं। 
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क्या नगर निगम, डीडीए या दिल्ली प्रशासन इस क्षेत्र में
हुए अनधिकृत निमार्ण हटा सकते हैं? 
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कौन वसूलता है?

तीनों नगर निगमों में इंजीनियरों ने हड़ताल करने की धमकी दी थी

दरअसल, अवैध निर्माण पर कार्रवाई करने के खिलाफ नजफगढ़ जोन के डीसी विश्वेंद्र सिंह का ट्रांसफर कर दिया गया था। इसके बाद दिल्ली के तीनों नगर निगमों में इंजीनियरों ने हड़ताल करने की धमकी दी थी। उधर, सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण पर कार्रवाई के लिए जाने वाले निगम इंजीनियरों को पुलिस की ओर से पूरी सुरक्षा मुहैया कराई जाए। वहीं, कॉन्ट्रैक्टर, बिल्डर और आर्किटेक्ट को ब्लैक लिस्ट करने के सुझाव पर कोर्ट ने केंद्र को दो सप्ताह में डिजिटल मैपिंग को लेकर दिशा-निर्देश तय करने को कहा है। साथ ही कहा कि जरूरत पड़े तो इसके लिए इसरो और एनआईसी की भी मदद ली जा सकती है।

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार दिल्ली का लाजपत नगर मार्केट वैसे तो सरोजिनी नगर मार्केट के बाद सबसे बड़ा बाजार है। ले....

दिल्ली में कुछ क्षेत्र ऐसे भी हैं, जहाँ भ्रष्टाचार का ही बोलबाला है। और इन क्षेत्रों में कार्यवाही करने का किसी में साहस भी नहीं। सरकारी जमीन पर अधिक्रमण कर रखा है। यदि गम्भीरता से जाँच की जाए, तो सर्वप्रथम उन अधिकारियों और नेताओं के विरुद्ध भी कार्यवाही की जाए, जिनके कार्यकाल में सरकारी ज़मीन का अधिक्रमण या अवैध निर्माण किया गया। 2014 चुनावी रैलियों में भाजपा भ्रष्टाचार के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने को कहती थी, लेकिन दिल्ली की तीनों नगर निगमों पर भाजपा का ही कब्ज़ा है, भाजपा बताए नगर निगमों में कितना भ्रष्टाचार समाप्त हुआ? फिल्म "उपकार" का एक चर्चित संवाद है "राशन पर भाषण है, भाषण पर कोई राशन नहीं" जो आज भी हमारे नेता समाज पर सटीक बैठता है। नगर निगमों में सत्ता अगर भाजपा की है तो कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के भी सदस्य हैं, कोई नहीं बोलता। चुनाव आएंगे, तब सभी नगर निगम में फैले भ्रष्टाचार पर लम्बे-चौड़े भाषण देते नज़र आएंगे। लेकिन किसी भी मतदाता ने यह पूछ लिया, "जब सदन में तुम्हारी पार्टी विराजमान थी, क्यों नहीं आवाज़ उठाई? क्यों नहीं धरने या प्रदर्शन किये?" तुरन्त उस मतदाता पर विरोधी पक्ष का होने का आरोप लगाकर बदनाम कर देंगे।  
ढाबा मालिक से रिश्वत मांगने पर DDA के दो अफसरों को चार-चार साल का सश्रम कारावास
उत्तर पश्चिम दिल्ली में एक व्यक्ति को ढाबा अवैध रूप से चलाने की अनुमति के बदले हर महीने 6 हजार रुपये की रिश्वत मांगने पर दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के दो अधिकारियों को एक अदालत ने चार - चार साल के सश्रम कारावास की सजा सुनाई है.  विशेष न्यायाधीश आशुतोष कुमार ने डीडीए के अधिकारियों मुकेश चंद्र और सत्यवीर सिंह को एक व्यक्ति से मासिक रिश्वत मांगने पर जेल की सजा सुनाई. अवैध रूप से ढाबा चलाने पर इस व्यक्ति को अधिकारियों से एक नोटिस मिला था.
न्यायाधीश ने कहा कि यह तार्किक संदेह से परे साबित हुआ है कि डीडीए में ‘ खलासी ’ (सरकारी कर्मचारी) आरोपी मुकेश ने यह सुनिश्चित करने के लिए शिकायतकर्ता से छह हजार रुपये प्रति माह की रिश्वत मांगी कि उनके आवासीय परिसर के बाहर शिकायतकर्ता और उसके पिता द्वारा संचालित ‘ ढाबे ’ के खिलाफ कारण बताओ नोटिस पर कोई कार्रवाई नहीं होगी. न्यायाधीश ने कहा कि यह भी साबित हुआ है कि मुकेश और (सरकारी कर्मचारी) सत्यवीर सिंह ने साजिश रची. 
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जिस दिन इस क्षेत्र से अतिक्रमण समाप्त हो गया,
यही क्षेत्र खुला और सुन्दर नज़र आएगा,
लेकिन जय बोलो तुष्टिकरण की 
अजय कुमार ने 29 सितंबर 2016 को दर्ज शिकायत में कहा कि वह 16 साल से नरेला में ढाबा चला रहे हैं और ढाबा बंद करने के लिए डीडीए द्वारा नोटिस प्राप्त होने के बाद वह डीडीए कार्यालय गए जहां उसके अधिकारियों ने कारोबार जारी रखने के बदले हर महीने छह हजार रुपये की रिश्वत की मांग की. सीबीआई की एक टीम ने जाल बिछाकर मुकेश और सत्यवीर को शिकायतकर्ता से नकदी लेते हुए रंगे हाथों पकड़ा. 
जहाँ तक डीडीए अधिकारीयों को भ्रष्टाचार के आरोप में सजा सुनाई गयी है, अच्छी बात है। लेकिन दिल्ली में अनेकों ऐसे इलाके हैं जहाँ डीडीए, नगर निगम, पुलिस और तो और बिजली विभाग भी रिश्वत में पीछे नहीं। कोई उच्च अधिकारी इस सच्चाई के मुँह मोड़ नहीं सकता। सबको मालूम है कि इन क्षेत्रों में चाहे जायज काम हो अथवा नाजायज बिना रिश्वत के कोई काम नहीं हो सकता। यहाँ किसी भी ट्रक के अन्दर आने पर 400 रूपए और विक्रम गाड़ी के प्रवेश पर 100 रूपए। कौन वसूलता है? सबको मालूम है।  
मजे की बात यह है कि देश में इतने अधिक भ्रष्टाचार विरोधी दस्ते और संस्थायें होने के बाबजूद इतने व्यापक स्तर पर भ्रष्टाचार होने का यही अभिप्राय निकाला जा सकता है कि सबने अपनी रोज़ी-रोटी के साधन बनाए हुए हैं। 
स्मरण हो, कुछ वर्ष पूर्व खुले घी, तेल, और अन्य खाद्य पदार्थों में मिलावट का खेल खिला। लेकिन सील बंद में भी मिलावट। एक मशहूर तेल की बोतल निरीक्षण में फेल हो गयी, मामला कोर्ट तक पहुँच गया, क्या हुआ? अब सब इतिहास बन गया है। मिलावट वहीँ की वहीँ।