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कल जिन कृषि कानूनों का वादा किया था, आज उसी का विरोध क्यों कर रही AAP?

केंद्र सरकार के नए कृषि कानूनों को लेकर आम आदमी पार्टी (AAP) का पहले कुछ और रुख था, वहीं अब यूटर्न के बाद उसका रुख कुछ और ही है। दिसंबर 17, 2020 को दिल्ली विधानसभा में ड्रामेबाजी हुई, जहाँ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने तीनों कृषि कानूनों की प्रतियाँ सदन में ही फाड़ डाली। साथ ही तीनों कृषि कानूनों को ख़त्म करने की माँग करते हुए प्रस्ताव भी पारित किया।

कृषि कानून को लेकर समस्त मोदी विरोधी अपने ही बुने जाल में फंस कर सांप और छछूंदर वाली स्थिति में हैं। किसी भी पार्टी का घोषणा-पत्र देख को, सब ने इन्हीं सब बातों को लागु करने की बात करते आ रहे हैं, फिर विरोध क्यों? विरोध केवल इसलिए हो रहा है कि नरेन्द्र मोदी ने लॉलीपॉप देने की बजाए कानून ही बना कर किसानों की समस्त अड़चनों को दूर करने से इन सबको परेशानी हो गयी। जबकि मोदी विरोधी केवल लॉलीपॉप देकर किसानों को बेवकूफ बनाते रहे। 2014 में सरकार बनने के बाद से मोदी सरकार ने जितने भी बिल पारित किये या फिर कानून बनाए, सभी मुद्दे सभी पार्टियों के घोषणा-पत्रों में होने के बावजूद आढ़तियों के दबाव में किसी ने कोई प्रयास नहीं किया गया। 

अभी बिहार में हुए चुनावों से आप क्यों दूर रही? इतना ही नहीं मुस्लिमों का दम भरने वाली यही आप अपने उम्मीदवारों को आज़ाद उम्मीदवार क्यों उतारा? कारण स्पष्ट है, क्योकि इस पार्टी ने दिल्ली की जो हालत है, फिर कोरोना में रोहिंग्यों को बचाने प्रवासी मजदूरों को दिल्ली छोड़ने को मजबूर करने के कारण चुनावों से दूर रखा और अब उत्तर प्रदेश से विधान सभा के सभी सीटों पर लड़ने की कवायत शुरू कर दी है, जहाँ पहले भी जमानत जब्त होती रही है और फिर जब्त होगी। वैसे जमानत जब्त होने में आम आदमी पार्टी का कोई सानी नहीं। दिल्ली और पंजाब के अलावा किसी राज्य में इस पार्टी को शायद ही कोई उम्मीदवार जमानत जब्त न करवा पाया हो, अन्यथा सभी की बुरी तरह से जमानत जब्त होती है। 

अरविंद केजरीवाल ने ऐसा करते हुए कहा कि वे दुःखी और उदास हैं। उन्होंने दावा किया कि वे ऐसा नहीं करना चाहते थे, लेकिन सड़क पर ठण्ड में ठिठुरते प्रदर्शनकारी किसानों को वे धोखा नहीं दे सकते। उन्होंने खुद को पहले एक भारतीय और फिर एक सीएम बताते हुए कहा कि दिल्ली विधानसभा तीनों कृषि कानूनों को नकारती है। लेकिन, दिल्ली सरकार के इस रुख से लगता है कि AAP लगातार यूटर्न पर यूटर्न लेने में माहिर है।

सच्चाई ये है कि दिल्ली सरकार ने इन कृषि कानूनों को नवंबर 2020 में ही प्रदेश में नोटिफाई कर दिया था और ‘दिल्ली राजपत्र’ के जरिए अधिसूचना जारी कर दी थी। दिल्ली की AAP सरकार ने अपने आदेश में स्पष्ट लिखा था कि कि ‘यह किसी भी राज्य की APMC अधिनियम या अन्य कानून के लागू होने के समय प्रवृत्त या प्रलेख के प्रभाव में आने वाले समय में लागू होगा।’ जब कैप्टन अमरिंदर सिंह ने इस मुद्दे को बताया तो केजरीवाल ने उन पर निशाना साधते हुए उन्हें केंद्र का साथी बता दिया।

अब केजरीवाल सरकार का एक और यूटर्न देखिए। 2017 में पंजाब में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान AAP ने अपने घोषणा-पत्र में इसी तरह के कृषि कानूनों को लागू करने की बात कही थी। पार्टी ने न सिर्फ APMC में संशोधन करने की बात कही थी, बल्कि कृषि बाजार में प्राइवेट कंपनियों की भागीदारी की वकालत की थी। AAP का दावा था कि इससे आईटी स्टार्टअप्स और इंडस्ट्रीज से किसानों को फायदा होगा। 2016 में AAP के एक एडवर्टाइजमेंट में हर जिले में भारी प्राइवेट निवेश के जरिए कृषि उत्पाद बेचने की व्यवस्था का वादा किया गया था।

अब पार्टी अपने ही वादों से पलट रही है, क्योंकि उसकी विरोधी पार्टी की सरकार ने किसानों के हित में इसे लागू कर दिया है। इससे पहले एंकर रुबिका लियाकत ने कृषि कानूनों को काला कानून बता रहे AAP नेता संजय सिंह से पूछा कि जब कृषि कानून किसान विरोधी है तो फिर दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने दिल्ली में नवंबर 23, 2020 को नोटिफाई कर लागू क्यों किया? ये सवाल सुनते ही AAP नेता संजय सिंह बौखला गए और टीवी एंकर को जवाब देने के बजाय आक्रामक हो गए और उल्टा सवाल पूछने लगे कि क्या आप मोदी की पैरवी में बैठी हैं?

रुबिका लियाकत ने फिर से सवाल किया कि अगर यह काला कानून था तो फिर आखिर आम आदमी पार्टी ने इसे नोटिफाई क्यों किया? इस पर संजय सिंह ने टीवी एंकर को धमकाते हुए मोदी और अडानी तक का नाम बहस के बीच लेने लगे और ABP न्यूज़ चैनल को बिकाऊ कहने लगे। संजय सिंह ने रुबिका लियाकत पर आरोप लगा दिया कि वो मोदी के लिए काम कर रही हैं, मोदी का चैनल चला रही हैं और अडानी के साथ मिली हुई हैं। रुबिका ने भी जवाब दिया कि आप जिनकी गुलामी कर रहे हैं उनकी बात करिए, मैं देश की गुलामी कर रही हूँ, हिंदुस्तान की गुलामी कर रही हूँ।

कृषि कानून को लेकर अपने बयान पर आप नेता संजय सिंह हो रहे हैं ट्रोल

कृषि कानून को लेकर अपने बयान के कारण आप नेता संजय सिंह ट्रोल हो रहे हैं। राज्यसभा सांसद संजय सिंह ने कृषि कानून को लेकर कहा, ‘पूरा देश इस वक्त किसानों के आंदोलन के साथ है। दिल्ली के मुख्यमंत्री ने कहा है कि हम सड़क से लेकर संसद तक किसानों के आंदोलन में उनका साथ देंगे। हमने इस बिल का सबसे पहले संसद के अंदर विरोध किया था।’ उन्होंने आगे कहा, ‘सरकार यह काला क़ानून अपने दो मालिकों के लिए लेकर आई है। एक का नाम है अडानी और दूसरे का नाम है अंबानी। यह क़ानून देश के किसानों के हित के लिए नहीं है।’

सोशल मीडिया पर इस बयान को लेकर संजय सिंह की किरकिरी हो रही है और यूजर्स लताड़ लगा रहे हैं।

जब जिसने बेशर्मी का चोला पहन रखा है, उससे क्या बात की जाए। दूसरे, जब लोग फिल्म देखने के लिए ब्लैकिये से टिकट खरीद उसको पैसे दे आगे बढ़ जाते हैं, उससे दोस्ती नहीं करते। वही स्थिति संजय सिंह के साथ अपनानी चाहिए, "आखिर संजय सिंह है तो टिकट ब्लैकिया।" और ब्लैकिया उस वक़्त ज्यादा परेशान होता है, जब जनता ब्लैक में टिकट खरीदने की बजाए घर वापस होती है। वास्तव में आम आदमी पार्टी ने ऐसे लोगों को पार्टी में रखकर यह प्रमाणित कर दिया है कि "आज समाज सेवा के नाम पर अपराधी राजनीति में राजशाही से रह रहे हैं। क्या सिनेमा पर टिकट ब्लैक करने वाले सम्मानित नागरिक कहा जाता है, क्योकि वह अपराधी होता है। उसकी मानसिकता अपराधी होती है।  

देखा जाए तो असली अपराधी अरविन्द केजरीवाल ही है, जो ऐसे अपराधी को राज्य सभा भेजा। क्या केजरीवाल को नहीं मालूम था कि संजय सिंह अपराधी है क्योकि टिकट ब्लैक करने वाला अपराधी होता है। उसकी बोली सम्मानित व्यक्ति की नहीं , एक अपराधी की होती है। जब अपराधी प्रवित्ति के लोग संसद एवं राज्य सभा में जाएंगे, विश्व में भारत की क्या छवि होगी, कभी सोंचा केजरीवाल ने? फिर वही बात आती है कि एक अराजक इतनी दूर की बात क्यों सोंचे?  

किसान आंदोलन : ‘…केजरीवाल अपनी आत्मा तक बेच देंगे’: अमरिंदर सिंह, पंजाब मुख्यमंत्री

केंद्र सरकार के तीनों कृषि कानूनों को लेकर चल रहे ‘किसान आंदोलन’ का क्रेडिट लेने के लिए आम आदमी पार्टी (AAP) और कांग्रेस में होड़ मची हुई है। दिल्ली और पंजाब, दोनों ही राज्यों के मुख्यमंत्री आपस में लड़ रहे हैं। दिसंबर 14, 2020 को अरविंद केजरीवाल ने किसान संगठनों के ऐलान का समर्थन करते हुए अपनी पार्टी के नेताओं के साथ उपवास रखा। पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने उन पर निशाना साधा।

पंजाब मुख्यमंत्री ने कहा कि पूरा पंजाब जानता है कि वो प्रवर्तन निदेशालय (ED) या किसी भी अन्य एजेंसियों के केस से डरने वाले नहीं हैं। वहीं, उन्होंने कहा कि अरविंद केजरीवाल तो अपनी आत्मा तक बेच देंगे, अगर इससे उनके राजनीतिक स्वार्थ की पूर्ति होती हो। उन्होंने दिल्ली मुख्यमंत्री से कहा कि अगर आपको लगता है कि आपके ‘ड्रामे’ से किसान आपके पक्ष में जाएँगे, तो ये आपकी ग़लतफ़हमी ही है।

अमरिंदर ने जो केजरीवाल पर "आत्मा तक बेच देंगे" का आरोप लगाया है, केवल आरोप नहीं सच्चाई है। ज्ञात हो, पहली पर मुख्यमंत्री बनने पर केजरीवाल ने कहा था कि 'अपने बच्चों की कसम खाकर कहा था कांग्रेस से समर्थन नहीं लूंगा', लेकिन ले लिया कांग्रेस का समर्थन। यानि जो अपने ही बच्चों का नहीं हुआ, किसी अन्य का क्या होगा? दूसरे, पंजाब के मुख्यमंत्री ने स्पष्ट रूप से केंद्र के बिलों को मानने से मना कर दिया था, परन्तु केजरीवाल ने लागू कर दिया, तथाकथित किसानों की सहानुभूति बटोरने आंदोलन को समर्थन देना, क्या सिद्ध करता है, केजरीवाल का दोहरा चरित्र एवं चाल? 

कैप्टेन अमरिंदर सिंह ने ट्विटर पर दिल्ली की AAP सरकार को याद दिलाया कि उसने नवंबर 23, 2020 को ही केंद्र सरकार के कृषि कानूनों को दिल्ली गैजेट के माध्यम से अधिसूचित कर दिया था। साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि पूरे पंजाब को पता है कि केजरीवाल ने किसानों के हित को बेच दिया है। उन्होंने केजरीवाल से पूछा कि आप पर मोदी सरकार का कौन सा दबाव था, जो आपने ऐसा किया? हालाँकि, इसके बाद केजरीवाल ने भी उन पर पलटवार किया।

अरविन्द केजरीवाल और अमरिंदर सिंह की ट्विटर लड़ाई में दोनों के अहंकार पर जनता भी प्रहार करने से नहीं चूक रही, एक ट्विटर ने तो इन दोनों के झगडे को सास-बहु के झगडे का नाम दे दिया :- 

AAP के मुखिया ने कहा कि रिकार्ड्स ये कहते हैं कि कैप्टेन अमरिंदर सिंह भी उस समिति का हिस्सा थे, जिसने इन कृषि कानूनों का मसौदा तैयार किया था। उन्होंने दावा किया कि अमरिंदर सिंह के पास इन कानूनों को रोकने की शक्ति थी। साथ ही उन्होंने पूछा कि जब इन कानूनों को लेकर केंद्र तैयारियाँ कर रहा था, तब आप मोदी सरकार के साथ क्यों थे? केजरीवाल ने इसे पूंजीपतियों का कानून बताते हुए दावा किया कि इससे महँगाई दोगुनी हो जाएगी।

कभी-कभी सच्चाई भी स्वतः जबान पर आ ही जाती है, आप नेता संजय सिंह भी अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार कर रहे हैं कि इस लड़ाई में जीत भारत के लाल की ही होगी, क्योकि किसानों के नाम पर इस जमावड़े में किसान कम और दलाल एवं अराजक तत्वों की भरमार है। क्या इससे पूर्व हुए किसान आंदोलनों में क्या जिम, मसाज, मेवा, पिज़ा एवं अन्य स्वादिष्ट भोजन की व्यवस्था नहीं देखी गयी?  

इसके बाद कैप्टन अमरिंदर सिंह ने दावा कि समिति की किसी भी बैठक में इन कृषि कानूनों को लेकर विचार-विमर्श हुआ ही नहीं था। उन्होंने दिल्ली CM पर लगातार झूठ बोलने का आरोप लगाते हुए कहा कि केजरीवाल का भाजपा के साथ गठजोड़ है। उन्होंने कहा कि भाजपा उन पर आरोप नहीं लगा सकती, क्योंकि उसे आपके साथ गठजोड़ को छिपाना है। वहीं केजरीवाल ने इन कानूनों को ‘जनता को कैप्टेन का गिफ्ट’ करार दिया।

ये पहली बार नहीं है, जब सोशल मीडिया पर दोनों के बीच झड़प हुई हो। किसान आंदोलन को लेकर दोनों पहले भी लड़ चुके हैं। जब अमरिंदर सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की थी, तब भी AAP उन पर हमलावर हो गई थी और ‘दिल्ली दरबार में हाजिरी’ लगाने का आरोप मढ़ा था। कॉन्ग्रेस की परेशानी ये है कि दिल्ली सरकार प्रदर्शनकारियों को जो सुविधा दे रही है, ऐसे में उसकी मेहनत बेकार न चली जाए।

पंजाब में राजनीति चमकाने की इच्छा रखने वाले केजरीवाल वहाँ के मामलों में हस्तक्षेप करते रहते हैं। जुलाई-अगस्त 2020 में जब जहरीली शराब के कारण हूच में 100 से अधिक लोग मारे गए थे, जिसके बाद केजरीवाल ने इस काण्ड की सीबीआई जाँच की माँग की थी। अरविंद केजरीवाल को आड़े हाथों लेते हुए अमरिंदर सिंह ने एक बयान में आरोप लगाया कि, इतने सारे लोग मारे गए हैं और अरविंद केजरीवाल को इस घटना से राजनीतिक मुद्दा बनाने में दिलचस्पी है। उन्होंने केजरीवाल को अपने काम से काम रखने की भी सलाह दी थी।

क्या इस किसान आंदोलन के पीछे हनी ट्रैप है? कौन-कौन इस हनी ट्रैप में लिप्त है?

   क्या इस आंदोलन के पीछे हनी ट्रैप का खेल है? सोशल मीडिया पर वायरल फोटो 
प्रदर्शनकारी किसान जहां नए कृषि कानूनों को हर हाल में वापस लेने की मांग पर अड़े हैं, वहीं मोदी सरकार कानूनों को किसानों के हित में बताकर उन्हें समझाने की कोशिश कर रही है। सरकार की दलील है कि नए कानून के तहत किसान मंडियों की गुलामी से मुक्त हो सकेंगे और अपनी इच्छा के अनुसार अपनी कीमत पर अपना कृषि उत्पाद बेच सकेंगे। सरकार और किसानों के बीच कई दौर की वार्ता हो चुकी है, लेकिन अभी तक कोई नतीजा नहीं निकला है। दिल्ली की सीमाओं पर जमे आंदोलनकारी किसानों में बड़ी संख्या पंजाब के किसानों की है, जहां की मंडियों का कुल शुल्क सबसे ज्यादा है।

किसान आंदोलन से अधिक चर्चा इस गंभीर बात को लेकर हो रही है कि आखिर पंजाब मुख्यमंत्री किस आधार पर पाकिस्तानी डिफेंस पत्रकार के साथ लिवइन रिलेशन में हैं? इसके अलावा किस-किस पार्टी के कितने नेता हनी ट्रैप में लिप्त हैं? क्योकि नागरिकता संशोधक कानून विरोध से लेकर चल रहे किसान आंदोलन में वही सब मुद्दे यानि मांगें उठ रही हैं, जिन्हे लेकर पाकिस्तान भारत के विरुद्ध प्रचार करता रहता है। सरकार को इस हनी ट्रैप की गंभीरता से जाँच कर इस ट्रैप में लिप्त नेताओं पर नकेल डालनी पड़ेगी। 

किसानों की आशंकाओं को दूर करने के लिए सरकार कानून में आवश्यक संशोधन का आश्वासन दे रही है। इसके बावजूद किसान अपनी जिद पर अड़े हुए और हंगामा हर रोज बढ़ता जा रहा है, क्योंकि देश विरोधी ताकतें किसानों को बहकाने का कोई मौका नहीं चूक रहीं। ये ताकतें आंदोलन की आड़ में अपना हित साधने में लगी है। इसकी पुष्टि इस ‘आंदोलन’ में दिख रही उमर खालिद, शरजील इमाम, वरवरा राव जैसे लोगों की तस्वीरों से होती है।

मंडी लॉबी की मार का सबसे बड़ा भुक्तभोगी केंद्र सरकार

केंद्र सरकार को होता है बड़ा नुकसान जीएसटी से पहले एफसीआई अनाज खरीद के लिए जो मंडियों को विभिन्न लेवी का भुगतान करती थी, वह कई बार एमएसपी का औसतन 13 प्रतिशत तक होता था। पंजाब में तब यह 14.5 प्रतिशत तक था। मंडी लॉबी की इस मार का सबसे बड़ा भुक्तभोगी केंद्र सरकार ही रही है। मसलन, 2019-20 में केंद्र ने एफसीआई और दूसरी एजेंसियों के जरिए जो सिर्फ धान और गेहूं की खरीद की थी, उसकी एवज में उसे 7,600 करोड़ रुपये सिर्फ मंडी टैक्स और आढ़तियों के कमीशन के रूप में देने पड़ गए।

प्रदर्शन के दौरान भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) ने अपने स्टेज पर एक कार्यक्रम किया और इसमें उमर खालिद, शरजील इमाम, गौतम नवलखा, सुधा भारद्वाज, वरवरा राव और आनंद तेलतुंबडे जैसे लोगों के पोस्टर-बैनर नजर आए। ये कार्यक्रम टिकरी बॉर्डर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर हो रहा था। पोस्टर-बैनर के जरिए मांग की जा रही थी कि गिरफ्तार लोगों को रिहा किया जाए। गौरतलब है कि इनमें से कई लोगों पर संगीन मामलों के तहत केस दर्ज हैं। कुछ तो ऐसे हैं जिन पर UAPA के तहत केस दर्ज है। जिसमें उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे लोग शामिल हैं। 

इन पोस्टरों को देखकर लगता है कि किसानों को गुमराह कर जहां सियासी दल अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं, वहीं टुकड़े-टुकड़े गैंग अपने एजेंडे को लागू करने में लगा है। सरकार द्वारा कई मांगों को माने जाने के बावजूद किसान सरकार की सुनने को तैयार नहीं है। वह सिर्फ कानून को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। इससे पता चलता है कि इस प्रदर्शन के पीछे बड़ी साजिश है। टुकड़े-टुकड़े गैंग चाहता है कि नए कृषि कानूनों के रद्द होने पर सीएए को रद्द करने की मांग तेज की जाएगी।

जिस तरह से इस प्रदर्शन में देश विरोधी ताकतों की भूमिका बढ़ती जा रही है। उससे धीरे-धीरे यह प्रदर्शन राजनीति से प्रेरित लगने से ज्यादा खतरे की घंटी नजर आने लगा है। वही खतरे की घंटी जिसे शाहीन बाग के दौरान नजरअंदाज किया जाता रहा और अंत में उसका भीषण रूप उत्तर-पूर्वी दिल्ली में हुए हिंदू विरोधी दंगों के रूप में देखने को मिला। इसी तरह किसानों की आड़ में भी किसी बड़ी घटना को अंजाम दिया जा सकता है। 

उमर खालिद और शरजील इमाम के साथ गौतम नवलखा और वरवरा राव की तस्वीरें इस ओर इशारा करती है कि शाहीन बाग का वामपंथी-कट्टरपंथी गिरोह सक्रिय है। महिला किसानों के हाथों में इनके पोस्टर देखकर लोग सवाल उठा रहे हैं कि आखिर इनका किसानों के आंदोलन से क्या लेनादेना है। अब लोग आंदोलन की असल मंशा पर ही प्रश्न उठाने लगे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि उस शरजील इमाम को रिहा क्यों करवाना चाहेगी जो अपने भाषण में असम को भारत से काटने की बात कह रहा था? दिल्ली में दंगे करवाने के लिए गुपचुप ढंग से बैठकें करने वाले और जाकिर नाइक से मिलने वाले  उमर खालिद से आखिर किसान प्रदर्शन का क्या लेना-देना? अर्बन नक्सलियों से कृषि कानून का क्या संबंध ?

पंजाब की मुसीबतों के एजेंट आढ़तियों के शोषण से परेशान किसान कर रहे हैं आत्महत्या, लगाम लगाने में नाकाम रही है राज्य सरकार


पंजाब के कृषि संकट और किसानों के शोषण के लिए अगर सबसे अधिक कोई जिम्मेदार है, तो वह है आढ़तिया। आढ़तिया कमीशन एजेंट होते हैं, जो किसानों और उनकी उपज के खरीदारों के बीच की एक कड़ी का काम करते हैं। वे काटी गई फ़सल की नीलामी और ख़रीदारों को डिलीवरी की व्यवस्था करते हैं। वे लंबे समय से किसानों को पैसे उधार देने का काम भी कर रहे हैं। यही कारण है कि राज्य के किसानों पर उनका बहुत ज़्यादा नियंत्रण होता है। साथ ही ये राज्य की राजनीति में एक शक्तिशाली लॉबी के रूप में भी काम करते हैं।

कमीशन एजेंट (आढ़तिया) किसानों को दिए कर्ज पर मनमाना वसूली करते हैं। साथ ही समय पर कर्ज नहीं चुकाने वाले किसानों पर ये काफी जुल्म करते हैं। आपको मानसा जिले के टिब्बी जटाना गांव के 50 वर्षीय कुलदीप सिंह पर हुए जुल्म के बारे में बताते हैं। कुलदीप सिंह को गांव का ‘नंबरदार’ होने का गौरव प्राप्त था। वे अपने उपजाऊ खेत में कपास की खेती करते थे। पैसे की जरूरत पड़ने पर वे अक्सर आढ़तियों से कर्ज लेते थे। 

अमेरिकन बॉलवॉर्म के कारण कुलदीप सिंह के कपास की फसल कई बार बर्बाद हो गई, जिससे वे कर्ज चुकाने में नाकाम रहे और कर्ज पर ब्याज बढ़ता चला गया। आढ़तिया अपने आदमियों के साथ आया और उनके घर में रखा सारा गेहूं और ट्रैक्टर लेकर चला गया। कुलदीप आढ़तिया के इस अपमान को बर्दाश्त नहीं कर पाये और कीटनाशक का सेवन कर आत्महत्या कर ली। कुलदीप सिंह अपने पीछे माता-पिता और छोटे बच्चे छोड़ गए। कुलदीप सिंह की यह दुखद कहानी वर्ष 2000 की है, लेकिन पंजाब में इस तरह की घटनाएं लगातार हो रही हैं और किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो रहे हैं। आज भी पंजाब के किसान आढ़तियों के कर्ज के तले दबे रहते हैं।

भारत दुनिया का एकमात्र देश है, और पंजाब भारत का एकमात्र राज्य है, जहां एक किसान को वर्तमान मूल्य पर खुले बाजार में अपनी उपज को  बेचने से रोक दिया जाता है। एपीएमसी एक्ट-1961 के तहत किसानों को सिर्फ आढ़तियों (कमीशन एजेंटों) को अपनी उपज बेचने की अनुमति दी गई है। इस कानून के तहत आढ़तियों को काफी शक्तियां दी गई हैं। वो किसानों की उत्पादक और गैर-उत्पादक जरूरतों को पूरा कर सकते हैं।

एपीएमसी एक्ट-1961 अंग्रेजी शासन के दौरान लागू Punjab Registration of Money Lenders Act, 1938 का दूसरा रूप है। इसके तहत कमीशन एजेंट एक सामंत की तरह किसानों का शोषण करते हैं। इस कानून में इतनी कमियां हैं कि जब अधिकारियों द्वारा छापेमारी की जाती है, तो शोषण के आरोपी कमीशन एजेंट रिश्वत देकर आरोपों से मुक्त हो जाते हैं। आढ़ितियों के खातों की जांच वर्ष में सिर्फ एक बार की जाती है।

इस दौरान कमीशन एजेंट (आढ़तिया) किसानों की उपज और उसकी बिक्री से होने वाली आय के संरक्षक के रूप में कार्य करना जारी रखते हैं, क्योंकि सभी खरीद उनके माध्यम से होती है और खरीद एजेंसियों से भुगतान भी उनके माध्यम से किसान तक पहुंचता है। भुगतान की इस अप्रत्यक्ष प्रणाली से सबसे अधिक नुकसान किसानों को उठाना पड़ता है, क्योंकि किसानों को उपज का पूरा लाभ नहीं मिल पाता है।

उपज की खरीद-बिक्री के साथ ही आढ़तिया किसानों को उधार देकर एक साहूकार के रूप में समानांतर व्यावसाय करते हैं। बुवाई और कटाई के बीच, किसी भी समय किसी किसान को पैसे की जरूरत होती है, तो आढ़तिया किसानों को कर्ज देते हैं। जब किसानों की फसल तैयार हो जाती है, तो आढ़तिया उपज के मूल्य का भुगतान करने से पहले दिए गए कर्ज और उसके ब्याज को काट कर भुगतान करते हैं। किसानों को जहां उपज का उचित दाम नहीं मिलता है, वहीं अधिक ब्याज के भुगतान से उनकी लागत के मुकाबले लाभ कम हो जाता है, जिससे किसानोंं को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है। जैसे-जैसे किसानों की इनपुट लागत बढ़ती है और सापेक्ष रिटर्न कम होता जाता है, वे अक्सर कर्ज की जरूरत में खुद को पाते हैं और कर्ज लेने का सिलसिला जारी रहता है।

आढ़तिया राजनीतिक रूप से काफी शक्तिशाली होते हैं। वे एक लॉबी के रूप में काम करते हैं, जिनके प्रभाव का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1961 में उनका कमीशन 1.5 प्रतिशत था, जिसे बढ़ाकर वर्तमान में 2.5 प्रतिशत कर दिया गया है। वर्ष 2013 के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले खरीद सीजन में 20,232 पंजीकृत आढ़तियां थे। अनुमान लगाया गया था कि प्रत्येक आढ़तिया प्रत्येक सीजन में लगभग 5.3 लाख कमाते थे।

पंजाब के बरनाला में 40 साल पहले लिए गए कर्ज ने एक परिवार की चार पीढ़ियों को लील लिया। सितंबर 2019 में इस परिवार की चौथी पीढ़ी के पांचवे शख्स 22 वर्षीय लवप्रीत ने विरासत में मिले कर्ज को नहीं चुका पाने के कारण आत्महत्या कर ली। लवप्रीत के परिवार में अब उनकी दादी, मां और एक बहन बची है। 50 साल पहले परिवार के पास 13 एकड़ जमीन थी, जो अब घटकर सिर्फ एक एकड़ रह गयी है।

आढ़तियों के जुल्म ने ले ली जान 

नवंबर 2017 में फतेहगढ़ साहिब के चनारथल कलां गांव किसानी के संकट से इस कदर घिरा कि एक ही परिवार से तीन तीन अर्थियां निकलीं। सबसे पहले बड़े लड़के ने आत्महत्या की फिर पिता और छोटे बेटे ने भी कर ली। घर में केवल एक ही बुजुर्ग बची हैं। परिवार के अनुसार तीनों ने कर्ज़ और आढ़तियों (कमीशन एजेंट्स) के जुल्मों से तंग आकर आत्महत्या की। इसके बाद पुलिस ने कमीशन एजेंट्स के ख़िलाफ़ आत्महत्या का मामला दर्ज़ किया।

कमीशन एजेंट ने झांसा देकर बेच दी जमीन 

घर की महिला बुजुर्ग जसपाल कौर ने कहा, “कुछ साल पहले, मेरा घर खुशियों से भरा था, लेकिन आज पूरी तरह से निराशा है।” उदासी और निराशा उनके चेहरे पर साफ़ दिखती है। वो कहती हैं, “गांव के कमीशन एजेंट्स ने झांसा देकर हमारी ज़मीनें किसी को बेच दी। चक्कर काटने के बाद भी पैसे नहीं दिए। इसी वजह से पहले मेरे पति ने और फिर छोटे बेटे ने जान दे दी।”

आढ़तियों से परेशान होकर किसान ने की आत्महत्या 

अमृतसर में अक्टूबर, 2020 में एक किसान ने आत्महत्या कर ली। वह कर्ज से परेशान बताया जा रहा था। फंदा लगाकर जान देने से पहले उसने एक वीडियो में एक आढ़ती समेत दो लोगों खिलाफ बयान दिया। अपनी मौत का जिम्मेदार बताते हुए कहा कि उसने इनसे कुछ पैसे लिए थे। लौटा भी दिए, मगर बावजूद इसके झूठे केस दर्ज करवाकर परेशान कर रहे थे। आए दिन धमकी देते थे। सूचना के बाद पुलिस ने मौके का मुआयना किया, जहां से एक कागज पर भी किसान ने अपनी मौत की वजह लिखी थी।

आढ़तियों के शोषण से दुखी होकर किसान कर रहे आत्महत्या 

आढ़तियों के शोषण और अत्याचार का नतीजा है कि पंजाब के किसान आत्महत्या के लिए मजबूर हो रहे हैं। दैनिक ट्रिब्यून की 13 नवंबर, 2013 की रिपोर्ट के मुताबिक पंजाब कृषि विश्वविद्यालय (पीएयू) के अनुमानों के मुताबिक पिछले 10 वर्षों में 5,000 किसानों ने आत्महत्या की थी। 2008-09 में संगरूर और बठिंडा में लगभग 3,000 किसानों को आत्महत्या करने का अनुमान लगाया गया था। 

MASR ने 1988 और 2010 के बीच पंजाब के 91 गांवों में 1,738 आत्महत्याएं दर्ज की थी। 2013 में MASR के अनुमान के मुताबिक पिछले दो दशकों में पंजाब में 50,000  किसानों ने आत्महत्याएं की थीं। हालांकि MASR की रिपोर्ट में बताया गया था कि पंजाब के सभी जिलों में आत्महत्या के मामले एक समान नहीं है। 2013 में भारतीय किसान यूनियन (आर) के अनुमान के मुताबिक 1990 और 2006 के बीच 90,000 किसानों ने आत्महत्याएं की थीं।

दिल्ली में ‘किसान आंदोलन’ के बीच हिंसा की आशंका, अमित शाह ने शीर्ष सुरक्षा अधिकारियों के साथ की बैठक

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने दिल्ली के शीर्ष सरकारी अधिकारियों से मुलाकात की। इनमें सुरक्षा विभाग और पुलिस के वरिष्ठ अधिकारी शामिल थे। मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि दिल्ली में चल रहे ‘किसान आंदोलन’ के हिंसक होने की आशंका है। ऐसे में केंद्र सरकार पहले से ही सुरक्षा व्यवस्था को चाक-चौबंद रखते हुए अधिकारियों को सतर्क रखना चाहती है। किसी भी प्रकार की हिंसा की वारदात को टालने की योजना बनाई जा रही है।

‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों के बीच कुछ कट्टरपंथी तत्व घुस गए हैं और वो न सिर्फ इस विरोध-प्रदर्शन को लम्बे समय तक चलाना चाहते हैं, बल्कि हिंसा को भी बढ़ावा देना चाहते हैं। उनका मकसद है कि इससे पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव होगा और अराजकता की स्थिति बनेगी। ख़ुफ़िया रिपोर्ट्स के हवाले से बताया गया है कि कम से कम ऐसे 10 संगठन इस आंदोलन में घुस चुके हैं।

किसान संगठनों ने अब पूरी तरह तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने की माँग रख दी है, जबकि केंद्र सरकार MSP और APMC पर लिखित में आश्वासन देने के अलावा उनके सुझाव अनुसार संशोधनों के लिए भी तैयार है। सरकार अभी भी बातचीत के लिए तैयार है। केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र सिंह तोमर, पीयूष गोयल और अमित शाह के साथ बातचीत के बावजूद किसान नहीं माने। दिसंबर 12, 2020 को देश भर में प्रदर्शन के साथ-साथ दिल्ली-जयपुर हाइवे को जाम किया जा रहा है।

किसान संगठनों ने धमकाया है कि दिसंबर 14 को इससे भी बड़ा विरोध-प्रदर्शन किया जा सकता है। ये भी जानने लायक बात है कि इन्होंने ‘जेल में बंद बुद्धिजीवियों, लोकतांत्रिक अधिकारों के लिए लड़ने वाले एक्टिविस्ट्स और छात्र नेताओं’ की रिहाई की माँग भी रखी हुई है। हिंसा की संभावना को देखते हुए गुरुग्राम में 3500 और फरीदाबाद में 2000 पुलिसकर्मियों को लगाया गया है। हरियाणा के इन दोनों क्षेत्रों की सीमाएँ दिल्ली से लगती हैं।

दिसंबर 11 को भारतीय किसान यूनियन (BKU) ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर तीनों कानूनों को एकपक्षीय बताया। कई याचिकाओं के दायर होने के बाद सुप्रीम कोर्ट पहले ही केंद्र को नोटिस जारी कर चुका है। अगले कुछ दिनों में भाजपा इन कानूनों के फायदे जन-जन तक पहुँचाने के लिए 100 अलग-अलग जगहों पर प्रेस कॉन्फ्रेंस करेगी और किसानों के साथ 700 बैठकों के माध्यम से उन्हें भ्रामक अभियान के विरुद्ध सजग करेगी।

हालांकि किसानों ने कट्टर वामपंथियों द्वारा उनके आंदोलन को हाइजैक किए जाने की खबरों को नकार दिया है। ‘कृति किसान संगठन’ का कहना है कि वो सरकार के इस दावे को नकारते हैं। उसने कहा कि उन्हें कोई भी प्रभावित नहीं कर सकता है। इन संगठनों ने दावा किया है कि सभी निर्णय ‘संयुक्त किसान यूनियन’ द्वारा ही लिए जा रहे हैं। पीएम मोदी कई बार तीनों कानूनों को लेकर फैलाए जा रहे भ्रम को दूर कर चुके हैं। 

लेकिन इस बात पर चुप्पी साधे रहते हैं, जब इसी जमघट में इंदिरा गाँधी की तरह वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ठोकने की बात कही जाती है। क्या मोदी के ठोकने से उनकी समस्या का समाधान हो जाएगा, विपरीत इसके दुनियां को अपना दुश्मन बना लेंगे? उनकी मांगों और नागरिकता संशोधक कानून के आड़ में हिन्दू विरोधी दंगे के आरोपियों को रिहा करने की मांग का क्या सम्बन्ध?

उधर किसानों ने टोल नाकों को फ्री करने के अपने अभियान के तहत अम्बाला के शम्भू टोल प्लाजा के पास हिंसा की। उन्होंने इसे बंद करवा दिया। वहीं कांग्रेस और आम आदमी पार्टी ने भी दिसंबर 14 को होने वाले विरोध-प्रदर्शनों में पूर्णरूपेण भागीदारी की बात की है। उप राष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने भी कहा है कि सार्थक बातचीत के जरिए हर समस्या को सुलझाया जा सकता है। इन सबके बावजूद किसान लगातार अड़े हुए हैं।

विभिन्न रिपोर्ट्स में पता चल रहा है कि किसान प्रदर्शनों पर अब वामपंथी अतिवादी अपना कब्जा जमा चुके हैं। खुफिया सूत्रों का कहना है कि अतिवादी संगठन किसानों को भड़का कर हिंसा, आगजनी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाने की योजना बना रहे हैं। सोशल मीडिया के जरिए किसानों के प्रदर्शन को खालिस्तानियों के समर्थन की बात भी सामने आई है।

किसानों के खून से रंगे हैं कांग्रेस, आप और कम्युनिस्टों के हाथ

जैसाकि अब जगजाहिर हो चूका है कि किसान आंदोलन के नाम पर ये जमावड़ा उन आढ़तियों का है, जो अब तक किसानों का शोषण कर रहे थे, लेकिन ये लोग जिन लोगों के हाथ खेल रहे हैं, वह आंदोलन शुरू पर ही सामने आ गया। 
फिर जिन पार्टियों कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और कम्युनिस्टों के हाथ पहले ही किसानों के खून में रंगे हैं, उनके कंधे बैठ देश में अराजकता फैलाना इनकी मंशा को भी स्पष्ट करता है। ज्ञात हो, जब दिल्ली के जंतर मंतर पर आम आदमी पार्टी के प्रदर्शन के दौरान, अप्रैल 2015 को अरविन्द केजरीवाल के भाषण के दौरान एक गजेंद्र सिंह नाम का किसान पेड़ पर लटक कर आत्महत्या कर रहा था,(देखिए चित्र) केजरीवाल ने अपना भाषण जारी रखा, जो यह भी सिद्ध करता है कि कांग्रेस और कम्युनिस्टों की तरह यह पार्टी भी हमदर्दी की नौटंकी कर रही है। 
नए कृषि कानून का कांग्रेस समेेत लेफ्ट पार्टियां भी विरोध कर रही हैं, साथ ही किसानों को सरकार के खिलाफ उकसाने के हरसंभव कोशिश भी कर रही हैं। इन पार्टियों का इतिहास किसानों पर अत्याचार करने का रहा है। 1998 में मध्य प्रदेश की कांग्रेसी दिग्विजय सिंह सरकार ने आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस फायरिंग का आदेश दिया था, जिसमें 22 किसानों की मौत हो गई थी तो 2006 में पश्चिम बंगाल के सिंगूर और नंदीग्राम में वामपंथी बुद्धदेव सरकार ने अपनी जमीन के लिए लड़ रहे किसानों पर गोली चलाने का आदेश दे दिया था, जिसमें 14 किसानों की मौत हो गई थी।

किसानों पर अत्याचार करने में कांग्रेस का कोई सानी नहीं है। यह 1998 की बात है, जब मध्य प्रदेश में कांग्रेस के कार्यकाल में मुलताई हत्याकांड को अंजाम दिया गया था, जिसमें पुलिस फायरिंग में 22 किसान मारे गए थे। फायरिंग का आदेश तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने ही दिया था।

मुलताई गोली कांड 

बैतूल जिले की मुलताई तहसील में 1998 में ओलावृष्टि और अतिवृष्टि से खराब हुए गेहूं की फसलों पर किसान 5000 रुपए प्रति एकड़ की दर से मुआवजा मांग रहे थे। यहां तीन साल से लगातार न तो कांग्रेस के एजेंडे में मुआवजा दिए जाने की बात थी और न ही दिग्विजय सिंह सरकार ने किसानों की मांग पर कोई गौर किया। इस वजह से प्रदेश में मुलताई ब्लॉक के लगभग 2500 किसानों ने मिलकर आंदोलन की चेतावनी दी।

मुलताई थाने के रिकॉर्ड अनुसार इस घटना में 22 किसानों की मौत हुई और 150-200 घायल हो गए।सरकार का गफलतभरा बयान 

मुलताई गोलीकांड में भी पहले सरकार यह कहकर मुकर गई थी कि पुलिस ने गोली नहीं चलाई है। बाद में स्वीकारना पड़ा कि पुलिस फायरिंग हुई थी और आंदोलन में मौजूद किसानों की मौत हुई थी।

प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती ने घटना के बाद इसे जलियांवाला बाग कहते हुए तत्कालीन कलेक्टर और एसपी पर केस दर्ज करने की मांग की थी।

कांग्रेस सरकार की नीति 

 लगभग हफ्तेभर से चल रहे इस आंदोलन को लेकर कांग्रेस सरकार ने कोई गंभीरता नहीं बरती। किसानों ने 12 जनवरी 1998 को तहसील मुख्यालय घेरने की चेतावनी दी तो भारी पुलिस बल लगा दिया गया। आसपास के गांवों से किसानों को मुलताई नहीं पहुंचने देने के लिए रास्ते ब्लॉक कर दिए तो विवाद भड़क गया। पथराव शुरू होते ही पुलिस ने फायरिंग शुरू की।

जब कम्युनिस्टों ने रंगे किसानों के खून से हाथ 

2006 में पश्चिम बंगाल सरकार ने कार फैक्ट्री के लिए हुगली जिले के सिंगूर में 5 गांव से किसानों की जमीन लेने का फैसला लिया। 18 मई 2006 को टाटा ग्रुप ने ऐलान किया कि वह पश्चिम बंगाल के हुगली जिले के सिंगूर में करीब 997 एकड़ जमीन पर लखटकिया कार फैक्ट्री बनाएंगे। पश्चिम बंगाल में तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने सिंगूर के पांच गांव गोपालनगर, सिंघेरभेरी, बेराबेरी, खासेरभेरी और बाजेमेलिया के 9 हजार से अधिक किसानों से लगभग 997 एकड़ जमीन लेने की योजना तैयार की। 

राज्य सरकार ने इसके लिए 6 हजार किसानों को जमीन देने के लिए राजी कर लिया, लेकिन शेष किसानों ने जमीन देने से मना कर दिया। हालांकि, सरकार ने उनसे जबरन जमीन पर कब्जा ले लिया. जमीन अधिग्रहण के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान पुलिस फायरिंग में 14 किसान मारे गए।

नंदीग्राम : अधिकरण के नाम पर किसानों का संघर्ष 

सिंगूर के अलावा नंदीग्राम शहर भी किसानों के साथ हुई बर्बरता के लिए जाना जाता है। नवंबर 2007 में पश्चिम बंगाल के नंदीग्राम में इंडोनेशिया की एक कंपनी सालिम ग्रुप के स्पेशल इकॉनोमिक जोन के लिए जमीन अधिग्रहण के विवाद में पुलिस के साथ हुए संघर्ष में 14 किसानों की जान चली गई। 

किसान प्रदर्शन : खालिस्तान समर्थकों द्वारा 10 दिसंबर को कई देशों में भारतीय दूतावास बंद करने की धमकी

दिल्‍ली में चल रहे किसान आंदोलन के बीच लंदन में भारतीय उच्चायोग से बड़ी खबर आ रही है। यहाँ किसानों के नाम पर खालिस्तान समर्थकों ने 10 दिसंबर को प्रदर्शन की तैयारी की है। जो इस बात को फिर सिद्ध कर कर रहा है कि किसानों के नाम पर किया जा रहा उपद्रव पूर्णरूप से प्रायोजित साज़िश है, इन्हें किसानों से कोई मतलब नहीं, इनका उद्देश्य भारत में कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और अकाली दल के माध्यम से अराजकता फैलाना है। 

इस उपद्रव ने भारत के समस्त शांतिप्रिय--चाहे वह किसी भी धर्म, मजहब और जाति से हों--लोगों को सोंचने के लिए मजबूर कर दिया है कि भविष्य में इन पार्टियों को समर्थन एवं वोट दिया जाए अथवा नहीं? जो तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी को ठोके जाने की बात करने के साथ-साथ वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी ठोकने की बात खुलेआम कर रहे हों और किसी भी पार्टी द्वारा इस प्रदर्शन से अपना समर्थन वापस लेने एवं इन आपत्तिजनक बातों का विरोध भी नहीं करना, इन अराजक पार्टियों की मानसिकता को जगजाहिर कर रहा है कि जो पार्टी देश के प्रधानमंत्री की नहीं, जनता की क्या होगी? 

हैरानी इस प्रायोजित किसान आंदोलन में अकाली दल कांग्रेस के साथ खड़ा है। इसी अकाली दल की सरकार को गिराने के तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने संत भिंडरावाला का सहारा लिया था। और मतलब हल होने पर उसी संत को आतंकवादी घोषित कर दिया। दूसरे, यह कि विदेशी चंदे पर चल रहा खालिस्तान उस समय किस बिल में छुप गया था, जब इंदिरा गाँधी की हत्या के उपरांत बेगुनाह सिखों के खून की होली खेली जा रही थी, उन्हें जिन्दा जलाया जा रहा था, यानि आग लगाओ, तमाशा देखो और उस पर अपनी रोटियां सेंकने के साथ-साथ तिजोरियां भरो। यह आरोप नहीं, कटु सत्य है, 1984 इसका प्रमाण है। पूछो फिल्म निर्माता, वितरक और कृष्णा नगर दिल्ली में स्वर्ण सिनेमा के स्वामी बेगुनाह सरदार स्वर्ण सिंह के परिवार से, जहाँ एक दिन में 12/13 सुहागिन विधवा हो गयीं थीं।

प्रो-खालिस्तानी समूह सिख फॉर जस्टिस (एसएफजे) ने दिसंबर 7, 2020 को लंदन, बर्मिंघम, फ्रैंकफर्ट, वैंकूवर, टोरंटो, वाशिंगटन डीसी, सैन फ्रांसिस्को और न्यूयॉर्क में 10 दिसंबर को कार, ट्रैक्टर और ट्रक रैली के जरिए भारतीय वाणिज्य दूतावास को बंद करने की धमकी दी।

इससे पहले दिसंबर 6, 2020 को NIA की मोस्ट-वॉन्टेड लिस्ट में टॉप पर रहने वाले एसएफजे के कार्यवाहक परमजीत सिंह पम्मा को लंदन में ‘किसान रैली’ में देखा गया था। पम्मा को उनके समर्थकों के साथ रैली में देखा गया था। रैली में खालिस्तानी झंडे और भारत विरोधी नारे लगे।

यह दावा करते हुए कि ‘खालिस्तान पंजाब के किसानों की दुर्दशा का एकमात्र समाधान है’, एसएफजे, एस गुरुपतवंत सिंह पन्नू ने कहा कि उनके संगठन ने संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार दिवस पर भारतीय दूतावासों को बंद करने का आह्वान किया है।

भारत में एक नामित आतंकवादी पम्मा 1990 के दशक में पंजाब से भाग गया था और 2000 में ब्रिटेन में राजनीतिक शरण दिए जाने से पहले कथित तौर पर पाकिस्तान की यात्रा की थी। उसके बब्बर खालसा इंटरनेशनल और खालसा टाइगर फोर्स जैसे आतंकी संगठनों से संबंध हैं। इसके अलावा टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार उसका 2010 में पटियाला और अंबाला में हुए बम विस्फोट और 2009 में राष्ट्रीय सिख संगत के नेता रुलादार की हत्या से भी कनेक्शन है।

भारत के प्रत्यर्पण का अनुरोध करने के बाद पम्मा को 2015 में पुर्तगाल में गिरफ्तार किया गया था। हालाँकि, उनका प्रत्यर्पण नहीं हुआ, और वे यूनाइटेड किंगडम लौट आए।

प्रो-खालिस्तानी SFJ सदस्यों ने लंदन में ‘किसान रैली’ में भाग लिया

एसएफजे नेता पन्नू ने आगे कहा कि कनाडा के पीएम जस्टिन ट्रूडो, ब्रिटिश संसद सदस्यों और संयुक्त राष्ट्र महासचिव के एक प्रतिनिधि द्वारा किसानों के विरोध का समर्थन करने के लिए संगठन का उत्साह बढ़ाया गया। सिख संगठनों के संघ के कुलदीप सिंह चेरू नाम के एक अन्य खालिस्तान समर्थक को भी लंदन के विरोध प्रदर्शन में देखा गया था। प्रेस और सूचना मंत्री, विश्वेश नेगी ने कहा कि विरोध भारत विरोधी अलगाववादी ताकतों द्वारा किया गया था।

नेगी ने कहा, “महामारी के दौरान सोशल डिस्टेंसिंग को धता बताते हुए उच्चायोग के सामने 3,500 से 4,000 से अधिक लोग एकत्र हुए। हमेशा कि तरह यह जल्द ही स्पष्ट हो गया कि इस सभा का नेतृत्व भारत विरोधी अलगाववादियों ने किया था, जिन्होंने भारत में किसान विरोध का समर्थन करने के नाम पर अपने स्वयं के एजेंडे को आगे बढ़ाने का काम किया।”

SFJ का भारत में किसानों के विरोध प्रदर्शन से लिंक

‘किसानों’ के विरोध प्रदर्शन में खालिस्तानी तत्वों की बड़ी भागीदारी देखी गई। खालिस्तान का समर्थन करते हुए कई ‘किसानों’ ने हिंसा और चिंताजनक नारों का सहारा लिया। खालिस्तान समर्थक और भारत विरोधी नारे लगाने के साथ हरियाणा-पंजाब सीमा पर ‘किसान विरोध’ के दौरान, पंजाब के किसानों को सरकार के विरोध में उकसाने के लिए एसएफजे की कथित संलिप्तता पर भी सवाल उठाए जा रहे थे।

पाकिस्तान द्वारा वित्त पोषित खालिस्तान संगठन एसएफजे ने पहले खालिस्तान के समर्थन के बदले पंजाब और हरियाणा में किसानों के लिए $ 1 मिलियन का अनुदान घोषित किया था।

गाजियाबाद: ‘भारत बंद’ में हिस्सा लेने पहुँचे भीम आर्मी के नेताओं को किसानों ने खदेड़ा, लाठियाँ भी चटकाई गईं

जहाँ सभी राजनीतिक संगठन ‘किसान आंदोलन’ के बहाने अपना उल्लू सीधा करना चाह रहे हैं, वहीं जातिवाद, मजहबी कट्टरता और खालिस्तानी एजेंडे को बढ़ावा देने वाले लोग भी इससे जुड़ते देखे जा रहे हैं। ऐसा ही एक दल है ‘भीम आर्मी’, जो उत्तर प्रदेश में दलितों की राजनीति करने का दावा करता है। बताया जा रहा है कि चंद्रशेखर आजाद उर्फ़ ‘रावण’ की अगुआई वाले इस संगठन के लोगों को गाजियाबाद में किसानों ने मार-मार कर भगा दिया।

‘आज तक’ की खबर के अनुसार, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को आयोजित भारत बंद के दौरान भीम आर्मी के नेता-कार्यकर्ता किसानों के आंदोलन में उन्हें समर्थन देने पहुँचे और उनके साथ विरोध प्रदर्शन के इरादे से बाहर निकले। लेकिन, वहाँ उन्हें किसानों के भारी विरोध का सामना करना पड़ा। यूपी गेट पर किसानों के धरने में पहुँचे भीम आर्मी के नेताओं को किसानों ने भगा दिया।

 किसानों ने आरोप लगाया कि भीम आर्मी के लोग इस आंदोलन को भड़काने की कोशिश में लगे हुए थे, इसीलिए उन्हें इसमें शामिल नहीं होने दिया गया। खबर के अनुसार, किसानों की शिकायत के बाद पुलिस ने भी लाठियाँ चटकाईं और भीम आर्मी के लोगों को किसानों ने खदेड़ दिया। उत्तर प्रदेश सरकार पहले ही कह चुकी है कि विरोध प्रदर्शन के दौरान जोर-जबरदस्ती नहीं चलेगी। दुकानों को जबरन बंद नहीं कराया जा सकता है।

वहीं भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर आजाद ने आरोप लगाया है कि विरोध प्रदर्शन में शामिल होने जाते समय उन्हें हिरासत में लेकर नजरबंद कर लिया गया है। उधर दिल्ली में भी सब्जी मंडी के व्यापारियों ने अपनी-अपनी दुकानें खोल रखी थीं, लेकिन यहाँ सुबह तक मंडियों को बंद रखने के लिए AAP नेता द्वारा दबाव बनाया जा रहा था। दिल्ली में  APMC के अध्यक्ष आदिल अहमद खान हैं। ऐसे में AAP पर कई सवाल उठ रहे हैं।

नेताओं के दोगलेपन में पिसती जनता


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रदर्शन की आड़ में राजनीतिक दोलों को अपनी सियासी रोटियां सेकेंने का मौका मिल गया है। एनडीए सरकार के विरोधी तमाम पार्टियां प्रदर्शनकारी किसनों को खुलकर समर्थन दे रही हैं। लेकिन ये पार्टियां खुद ऐसे कानून लागू करने की मांग कर चुकी हैं। यहां तक कि सरकार में रहते इसके लिए राज्य सरकारों को सुझाव भी दे चुकी हैं।

कांग्रेस के घोषणा-पत्र में शामिल थे नए कानून के प्रावधान 

कांग्रेस पार्टी आज नए कृषि सुधार कानूनों का मुखर विरोध कर रही है और किसानों को गुमराह कर रही है। उसी कांग्रेस पार्टी ने इस कानून को 2019 के घोषणापत्र में शामिल किया था। उनके घोषणापत्र में साफ-साफ लिखा था, “कांग्रेस Agricultural Produce Market Committees Act को निरस्त कर देगी और कृषि उत्पादों के व्यापार की व्यवस्था करेगी… जिसमें निर्यात और अंतर-राज्य व्यापार भी शामिल होगा, जो सभी प्रतिबंधों से मुक्त होगा।” उनका यह घोषणापत्र अब भी उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं। ये बातें उनके मेनिफेस्टो में पेज नंबर 17 के प्वॉइंट नंबर 11 में दर्ज है।


कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में वादा किया था कि वह Essential Commodities Act को खत्म कर उसकी जगह ECA 1955 के नाम से नया कानून लेकर आएगी। इसे भी उनके घोषणा पत्र के पेज नंबर 18 में देखा जा सकता है। 27 दिसंबर, 2013 को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि कांग्रेस शासित राज्य APMC Act के तहत फलों और सब्जियों को delist कर देंगे, ताकि उनके दाम कम किए जा सकें। मगर आज जब हमारी सरकार ने ऐसा कर दिया तो किसानों को भड़काने में राहुल गांधी ही सबसे आगे हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र 

कृषि सुधार बिल पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोगला चरित्र सामने आ गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जब यूपीए सरकार में देश के कृषि मंत्री थे, तब ये इन कृषि सुधारों को लागू करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे थे, परंतु आज अपने ही फैसले से यू टर्न लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दे रहे हैं।

इसके लिए पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने अगस्त 2010 और नवंबर 2011 के बीच सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था। उन्होंने बार-बार Model APMC एक्ट को लागू करने और State APMC Acts में संशोधन के लिए कहा था। उन्होंने मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया था, ताकि किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए वैकल्पिक माध्यम मिल सके। उन्होंने कहा था कि इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा।

अगस्त 2010 में लिखी चिट्ठी में शरद पवार जी ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्रों के संपूर्ण विकास, रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए बेहतर मार्केट की जरूरत है और इस जरूरत को Model APMC एक्ट पूरा करता है। वहीं नवंबर 2011 में लिखी चिट्ठी में उन्होंने फिर से यही बात दोहराई और निजी तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों से अपील की कि किसानों की बेहतरी के लिए बिना देरी करे राज्य सरकारें कदम उठाए।

मई 2012 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार का राज्यसभा में एक औपचारिक जवाब दर्ज है। इसमें उन्होंने खुलकर Agriculture Marketing Reforms का समर्थन किया था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि “कुछ सिफारिशें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं, जैसे Agri-procurement के उदारीकरण का प्रस्ताव… हमने सभी राज्यों के सहकारिता मंत्रियों से APMC एक्ट में संशोधन करने का अनुरोध किया है।” लेकिन वही शरद पवार आज इन कृषि सुधारों का न केवल विरोध कर रहे हैं, बल्कि किसानों को इसके लिए भड़का भी रहे हैं।

शिव सेना ने भी पहले अध्यादेश को लागु कर, दबाव में वापस लिया 

10 अगस्त, 2020 को महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए किसान बिल के तीनों अध्यादेशों को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए थे। महाराष्ट्र उन शुरुआती राज्यो में था, जो किसान बिल के तीनों अध्यादेश को तत्काल और सख्ती से लागू करने के आदेश दिया था। दो पेज पेज के इस ऑर्डिनेंस को 10 अगस्त, 2020 के दिन मार्केटिंग के स्टेट डायरेक्टर सतीश सोनी ने सभी बाजार समिति को सख्ती से लागू करने को कहा था। लेकिन बाद में कांग्रेस और एनसीपी के दबाव के बाद उद्धव सरकार ने अपने 10 अगस्त के विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी। अब शिवसेना भी किसानों के आंदोलन और भारत बंद को पूरा समर्थन दे रही है।

डीएमके ने भी बिचौलियों से मुक्ति का वायदा किया था   

डीएमके आज मोदी सरकार के कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रही है। और इस मुद्दे पर भारत बंद का भी समर्थन कर रही है, लेकिन यही डीएमके 2016 के विधानसभा चुनाव में कृषि सुधार बिल को अपने घोषणापत्र में शामिल कर चुकी है। डीएमके ने उस समय अपने मेनिफोस्टो में वादा किया था कि सरकार में आने पर वो किसानों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाजार उपलब्ध कराने के लिए एपीएमसी एक्ट में संशोधन करेगी, ताकि किसान बिना किसी बिचौलिए के अपनी उपज को अधिक से अधिक दाम पर बेच सकें। यही नहीं, इसके लिए उसने Comprehensive Agriculture Produce Marketing Exchange बनाने का भी वादा किया था।

केजरीवाल ने भी अध्यादेश को लागु करने के बावजूद विरोध 

किसानों के आंदोलन से आज दिल्ली वाले ही सबसे ज्यादा परेशान हैं। लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी का दोहरा रवैया जगजाहिर हो चुका है। खास बात ये है कि किसानों को भड़काने में और भारत बंद का आगे बढ़कर समर्थन करने वाले केजरीवाल की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। एक तरफ तो आम आदमी पार्टी नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही है और दूसरी तरफ उसने इस कानून को 23 नवंबर को ही लागू भी कर दिया। और इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी।

स्वराज्य पार्टी के योगेंद्र यादव की नौटंकी 

किसान आंदोलन में घुसकर चेहरा चमकाने वाले और भारत बंद का ऐलान करने वाले योगेंद्र यादव बिन पेंदी का लोटा साबित हुए हैं। स्वराज पार्टी बनाने वाले योगेंद्र यादव कुछ समय पहले तक कृषि सुधारों के नाम पर हमारी सरकार को घेरते थे, आज वो कृषि सुधार किए जाने के बाद किसानों को न केवल भड़काने में जुटे हुए हैं, बल्कि भारत बंद के नाम पर आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई को भी रोकने पर आमादा हैं। मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया था कि सरकार एपीएमसी एक्ट को लेकर कुछ नहीं कर रही है। लेकिन आज वही योगेंद्र यादव यूटर्न लेकर इस पर राजनीति करने में जुट गए हैं।

अकाली दल द्वारा अध्यादेश का समर्थन, कानून का विरोध 

कृषि सुधार कानूनों पर अकाली दल का आज जो रवैया है, वो कुछ दिनों तक पहले तक नहीं था। 12 दिसंबर, 2019 को एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में अकाली दल के सांसदों के बोल कुछ अलग ही थे। उस दिन उन्होंने कहा था कि एपीएमसी भ्रष्टाचार और राजनीति का अड्डा बन चुकी है और वहां बिचौलियों और दलालों का बोलबाला रहता है। यही नहीं उन्होंने कहा था कि एपीएमसी किसानों के हित में नहीं है। इसके बाद 3 जून, 2020 को जब इस पर अध्यादेश लाया गया, तब भी अकाली दल सरकार के उस फैसले के साथ था। अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर उस निर्णय का हिस्सा थी। उस समय अकाली दल ने कोई विरोध नहीं किया था। लेकिन आज अकाली दल के सुर एकदम अलग हैं।

मुलायम सिंह ने भी APMC का विरोध किया था 

समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद मुलायम सिंह यादव ने एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी में की रिपोर्ट में 12 दिसंबर, 2019 को सुझाव दिया था कि APMC में भी भ्रष्टाचार और राजनीति है। बिचौलियों और दलालों का बोलबाला होने से किसानों को सही लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए APMC किसानों के हित में नहीं है। 

ममता पहले ही केंद्र से मिलता-जुलता कानून लागु कर चुकी हैं 

जहाँ एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध करते हुए किसानों के आंदोलन के समर्थन की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने अपने राज्य में इससे मिलता-जुलता एक कानून 2014 में ही पारित कर लिया था। ममता बनर्जी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में ‘एग्रीकल्चर मार्केटिंग बिल’ विधानसभा में पास कराया था। अब वो मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही हैं।

ममता बनर्जी ने कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार को या तो कृषि कानूनों को वापस ले लेना चाहिए, या फिर इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने डेरेक ओ ब्रायन सहित तृणमूल कॉन्ग्रेस के अपने कुछ वफादार नेताओं को सिंघु सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के पास भेजा भी और प्रदर्शनकारी नेताओं से बातचीत की। इस दौरान योगेंद्र यादव भी देखे गए। मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को किसान संगठनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रखा है जिसे कई राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया है।

मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों से किसानों को अपने उत्पाद कहीं भी भेजने की छूट मिलती है, साथ ही ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ की स्थिति में प्राइवेट कंपनियों की मनमानी पर भी लगाम लगती है। इसमें क्षति की स्थिति में खरीददार पर ही सारी जिम्मेदारी डाल दी गई है और किसान इन सबसे मुक्त है। रुपए के भुगतान के लिए समयसीमा भी दी गई है। बावजूद इसके भ्रम फैला कर किसानों को बरगलाया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2014 में जो ‘एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग (रेगुलेशन) बिल’ पास कराया था, दावा किया गया था कि इससे किसानों को अपने उत्पादों के उचित दाम मिलेंगे। ममता बनर्जी सरकार ने कहा था कि बिचौलियों की गतिविधियों को रोकने के लिए ऐसा किया गया है। साथ ही कहा था कि बिचौलियों से निपटने के कड़े कदम उठाए जा रहे हैं और उनसे निपटने में ये कानून सहायक सिद्ध होगा।

आज जब मोदी सरकार यही कर रही है तो ममता बनर्जी सहित पूरे विपक्ष को दिक्कत है। पश्चिम बंगाल के उस कानून के अनुसार, इससे किसानों की पहुँच एक नए बाजार तक होगी और वो सीधे उपयोगकर्ताओं तक अपने उत्पाद बेच सकेंगे। ग्राहकों और किसानों, इसे दोनों के लिए सरकार ने लाभदायक बताया था। साथ ही कहा गया था कि दोनों को ज्यादा भरोसेमंद सिस्टम का हिस्सा बनाना राजकोष के लिए भी अच्छा होगा।

ठीक इसी तरह, NCP के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार आज ‘किसानों’ के आंदोलन को समर्थन देते हुए कृषि कानूनों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। शरद पवार यूपीए सरकार में लगातार 10 वर्षों तक केंद्रीय कृषि मंत्री थे और तब वो इन्हीं कृषि सुधारों की पैरवी कर रहे थे, जिनके विरोध में आज वो खड़े हैं। उन्होंने APMC सुधारों को लेकर मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा था। उन्होंने तब इन सबके लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी पर जोर दिया था, जबकि आज ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर किसानों की जमीनें ले लेंगे और उन्हें रुपए नहीं देंगे।