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आतंकियों के लिए सुप्रीम कोर्ट आधी रात को खुल सकता है लेकिन बंगाल हिंसा के खिलाफ याचिका लिस्ट तक नहीं हो रही- इंडिक कलेक्टिव

पश्चिम बंगाल में चुनाव परिणाम आने के बाद से ही हिंसा जारी है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की पार्टी टीएमसी के गुंडे बीजेपी कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बना रहे हैं। राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति काफी खराब है। इसे लेकर 3 मई को ‘इंडिक कलेक्टिव’ नामक ट्रस्ट ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। इंडिक कलेक्टिव ने इसे सुनवाई के लिए तुरंत लिस्ट करने की मांग की, लेकिन सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री की ओर से पूछे गए सवालों के जवाब देने के बाद भी लिस्ट नहीं हो पाई।

इंडिक कलेक्टिव के अनुसार उसकी तरफ से सीनियर एडवोकेट पिंकी आनंद और जे साईं दीपक ने वकील सुविदत्त सुंदरम के साथ मिल कर जस्टिस यूयू ललित के समक्ष इस मामले को 6 मई 2021 को उठाने के लिए मौखिक रूप से आग्रह किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री द्वारा अस्वीकार कर दिया गया।

6 मई को ट्रस्ट के एक और पत्र को अस्वीकार कर दिया गया। इंडिक कलेक्टिव ने कहा है कि यह वास्तव में दुर्भाग्यपूर्ण है कि सजायाफ्ता आतंकियों के लिए माननीय सुप्रीम कोर्ट आधी रात को खुलता है, लेकिन पश्चिम बंगाल हिंसा के खिलाफ याचिका लिस्ट नहीं की जा रही है, जबकि अब भी जानें जा रही हैं। साफ है कुछ लोग औरों से ज्यादा बराबर हैं।

ट्र्स्ट ने आगे ट्वीट किया है कि 28 जून तक गर्मी छुट्टी से पहले आज सुप्रीम कोर्ट के कामकाज का अंतिम दिन है। हम एक बार फिर से वेकेशन बेंच के सामने याचिका की अर्जेन्ट लिस्टिंग के लिए आग्रह करने जा रहे हैं। हम अन्य विकल्पों पर भी विचार कर रहे हैं। इस बीच बंगाल हिंसा की कई तस्वीरें और वीडियो हमारी टीम को मिली हैं।

दरअसल पश्चिम बंगाल में टीएमसी के गुंडे सीएम ममता बनर्जी की जीत का खूनी जश्न मना रहे हैं। टीएमसी के गुंडे हिंसा, लूट, अग्निकांड और बलात्कार को अंजाम दे रहे हैं। बीजेपी नेता और समर्थकों के घरों, दुकानों, मंदिरों, बस्तियों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों को निशाना बनाया जा रहा है। हिंसा में एक दर्जन से अधिक लोगों की जान जा चुकी है। लेकिन इन सब मामलों में स्थानीय पुलिस-प्रशासन मूक दर्शक बन तमाशा देख रहा है। ऐसे में बीजेपी समर्थक राज्य से पलायन कर असम और अन्य राज्यों में शरण ले रहे हैं। देखिए कुछ ट्वीट-


बंगाल हिंसा : विदेश मंत्री (MoS) पर हमला: लुंगी पहने लोगों ने लगातार बरसाए डंडे-पत्थर

                                      विदेश मंत्री (MoS) वी मुरलीधरन के काफिले पर हमला
पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा अब भयावह रूप ले चुकी है। भाजपा समर्थक और आम जनता के बाद अब तृणमूल कॉन्ग्रेस के गुंडों ने केंद्रीय मंत्री वी मुरलीधरन पर भी हमला बोल दिया। मुरलीधरन ने अपने ट्विटर पर घटना की वीडिया जारी करके यह जानकारी दी।

वी मुरलीधरन ने अपने ट्वीट पर लिखा, “TMC गुंडों ने पश्चिम मिदनापुर में मेरे काफिले पर हमला किया, गाड़ी के शीशे तोड़े और पर्सनल स्टाफ को भी निशाना बनाया।”

58 सेकेंड की वीडियो में देख सकते हैं कि वी मुरलीधरन के काफिले पर लुंगी पहने लोगों ने लगातार डंडे-पत्थर बरसाए। ड्राइवर ने इस बीच गाड़ी पीछे की, लेकिन काफिले को चारों ओर से घिरा देख गाड़ी में बैठे सब लोगों को अपने बचाव में नीचे झुकना पड़ा। वीडियो में गाड़ी के काँच टूटने की आवाज और गाड़ी में पेड़ की मोटी छाल स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। 

                                                            घटना में क्षतिग्रस्त हुई गाड़ी
समाचार एजेंसी एएनआई ने भी इस घटना की वीडियो को शेयर किया है। पूरा मामला वेस्ट मिदनापुर के पंचखुड़ी का है, जहाँ स्थानीय लोगों ने केंद्रीय मंत्री के काफिले पर हमला बोला। जानकारी के अनुसार, यह घटना आज दोपहर 1 बजे के आसपास की है। विदेश राज्यमंत्री (Union Minister of State for External Affairs) वी मुरलीधरन के ड्राइवर राहुल सिन्हा को घटना में चोट आई है। इसके अलावा काफिले के साथ चल रहे 2 और लोगों के घायल होने की खबर है।

                                                            घटना के बाद की तस्वीरें
ये पहली दफा नहीं है जब किसी मंत्री या नेता पर इस तरह बंगाल में हमला बोला गया हो। पिछले वर्ष भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर हमला हुआ था। उस समय भी उपद्रवियों ने इसी प्रकार उनके काफिले पर डंडे पत्थर लेकर अटैक किया था। उस समय बाद में गृह मंत्रालय ने इसमें कार्रवाई करते हुए 3 अधिकारियों के विरुद्ध एक्शन लिया था।

चुनावी नतीजों के बाद बंगाल से लगातार आ रही हिंसा की खबरों के बीच केंद्रीय गृह मंत्रालय इस बार भी एक्शन में आ गया है। जाँच के लिए 4 सदस्यीय टीम बनाकर कोलकाता भेजी गई है। मंत्रालय ने इनसे रिपोर्ट तलब की है। ये टीम बंगाल में हिंसा की घटनाओं और ताजा परिस्थिति की जाँच करेगी। इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव को पत्र लिख कर कहा था कि अगर HMO को रिपोर्ट नहीं मिलती है तो इसे काफी गंभीरता से लिया जाएगा।

‘माँ काली और हनुमान की प्रतिमाओं को तोड़ा’: बंगाल में लेफ्ट भी हिंसा का शिकार

पश्चिम बंगाल में अब लेफ्ट ने भी टीएमसी पर लगाया हिंसा
का आरोप (साभार: @aishe_ghosh)
चुनाव जीतते ही बंगाल में शुरू हुई हिंसा का तांडव तृणमूल द्वारा किया जा रहा है, बीजेपी की हार माँ जश्न मनाने वाली समस्त पार्टियों को एकजुट होकर ममता बनर्जी की नयी सरकार को बर्खास्त करने के लिए आवाज़ बुलंद करनी होगी। जिस तरह से बंगाल की सड़कें और गलियों को खून से लाल किया जा रहा है, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को भी खुलकर सामने आना  होगा, क्योकि अधिकतर शिकार वही लोग हो रहे हैं, जो उनके समर्थन में सड़क पर आए थे। जनता ने भाजपा का साथ भी दिया, अगर ममता ने छठे राउंड की वोटिंग से पहले व्हीलचेयर को छोड़ दिया, परिणाम निश्चितरूप से विपरीत होते। ऐसे में ज्वलंत प्रश्न यह है कि 'क्या ममता विरोधी पांच सालों तक इसी तरह प्रताड़ित होते रहेंगे?' 

पश्चिम बंगाल में मई 2, 2021 को हुई मतगणना में TMC की जीत के साथ ही सत्ताधारी दल के गुंडों पर हिंसा के आरोप लग रहे हैं। भाजपा के दफ्तरों में आग लगाने, कार्यकर्ताओं की हत्या, उनके घरों को तहस-नहस करने की खबरें आ चुकी है। बीजेपी ने अपनी 2 महिला पोल एजेंट के साथ गैंगरेप का भी दावा किया है। ‘अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (ABVP)’ ने भी अपने दफ्तरों और कार्यकर्ताओं को निशाना बनाने के आरोप टीएमसी के गुंडों पर लगाए हैं।

आरोप है कि राजधानी कोलकाता में स्थित ABVP के दफ्तर में तृणमूल कार्यकर्ता घुस गए और उन्होंने वहाँ जम कर तोड़फोड़ मचाई। साथ ही वहाँ मौजूद कार्यकर्ताओं के साथ मारपीट भी हुई। ABVP ने ये भी आरोप लगाया है कि TMC के गुंडों ने जान-बूझकर माँ काली और भगवान हनुमान की प्रतिमाओं के साथ तोड़फोड़ की। ABVP की महामंत्री निधि त्रिपाठी ने कहा कि जिन्होंने भी ममता बनर्जी के खिलाफ बोला, उनका खून बहाया जा रहा है।

उनका कहना है कि कोलकाता में ABVP के प्रान्त कार्यालय में 150 की संख्या में TMC के गुंडे नारेबाजी और हूटिंग करते हुए आए, जिन्होंने जम कर उपद्रव किया। इसके बाद सोमवार को दोपहर में 15-20 गुंडे भीतर घुस गए और कार्यालय में मौजूद पदाधिकारियों के साथ गाली-गलौज व हाथापाई की। दफ्तर में मौजूद श्यामा प्रसाद मुखर्जी, सुभाष चंद्र बोस और रवीन्द्रनाथ टैगोर की तस्वीरों को तोड़ डाला गया।

निधि त्रिपाठी के अनुसार, माँ काली और भगवान हनुमान की प्रतिमाओं को नीचे गिरा कर उन्हें पैरों तले रौंदा भी गया। उन्होंने कहा कि 100 के करीब गुंडे ABVP के कार्यालय को घेर कर खड़े थे। उन्होंने बताया कि TMC के गुंडे ये कहते हुए हमला कर रहे थे कि जिन्होंने ममता दीदी के चेहरे पर कालिख लगाई है और उनके खिलाफ बोला है, उन्हें हम बंगाल में नहीं रहने देंगे। उन्होंने कहा कि बदला लेने पर उतारू तृणमूल वाले खून बहा रहे हैं।

अब सिर्फ भाजपा ही नहीं बल्कि वामपंथी नेता भी आरोप लगा रहे हैं कि उनके दफ्तरों पर हमले किए जा रहे हैं, कार्यकर्ताओं के साथ हिंसा हो रही है और आगजनी की जा रही है। JNU छात्र संघ की अध्यक्ष आइशी घोष ने कहा कि TMC को जनादेश स्वीकार करना चाहिए और ये जनादेश लोगों के लिए काम करने के लिए मिला है, हिंसा के लिए नहीं। उहोंने कहा कि ममता बनर्जी के कार्यकर्ता विपक्षी दलों के कार्यकर्ताओं के घरों पर हमले कर रहे हैं, जिसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।

CPI(M) के वरिष्ठ नेता सीताराम येचुरी ने भी कहा कि TMC जिस तरह हिंसा कर अपनी जीत का जश्न मना रही है, वो निंदनीय है। उन्होंने कहा कि ऐसी हिंसा का प्रतिकार किया जाएगा, ये स्वीकार्य नहीं है। येचुरी ने आरोप लगाया कि कोविड-19 महामारी से निपटने की बजाए ममता बनर्जी अराजकता फैलाने में लगी हैं। साथ ही उन्होंने कहा कि CPI(M) लोगों की मदद, सुरक्षा और राहत देने के लिए हमेशा मौजूद रहेगा।
शुभेंदु अधिकारी के विधानसभा क्षेत्र नंदीग्राम के केन्डमारी गाँव में तृणमूल के कार्यकर्ताओं ने भाजपा की महिला कार्यकर्ताओं को जमीन पर पटक-पटक कर पीटा, जिसका वीडियो वायरल होने के बाद लोग राज्य में महिला सुरक्षा पर भी सवाल उठा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने आरोप लगाया कि महिलाओं को पीटने वाले ‘TMC के मुस्लिम गुंडे’ हैं। अब तक करीब एक दर्जन लोगों की हत्या की बात कही जा रही है।
भाजपा कार्यकर्ता अभिजीत सरकार ने फेसबुक पर लाइव आकर तृणमूल की गुंडागर्दी के बारे में बताया था। इसके कुछ ही घंटों बाद उनकी हत्या कर दी गई। उनके पालतू कुत्तों के बच्चों को ही मार डाला गया। इस तरह की कई हत्याएँ हुई हैं। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा आज मृत कार्यकर्ताओं के परिजनों से मुलाकात करेंगे। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने बंगाल से रिपोर्ट रिपोर्ट तलब की है। राज्यपाल जगदीप धनखड़ ने DGP और कोलकाता के कमिश्नर को विशेष निर्देश दिए हैं।
ननूर से भाजपा की दो पोलिंग एजेंट्स के साथ गैंगरेप की खबर सामने आई है। ‘दैनिक जागरण’ की खबर के अनुसार, 9 भाजपा, 1 ISF और एक तृणमूल के कार्यकर्ता हिंसा की भेंट चढ़ गए हैं। नंदीग्राम में कई दुकानों में घुस कर लूटपाट व तोड़फोड़ हुई। कोलकाता के उल्टाडांगा में एक भाजपा कार्यकर्ता को पीट-पीट कर मार डाला गया। नॉर्थ 24 परगना के भाटपाड़ा में क्रूड बम बरामद हुआ। ममता बनर्जी ने हिंसा रोकने की अपील करते हुए कहा कि भाजपा और अर्धसैनिक बलों ने हमें काफी प्रताड़ित किया है।
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पश्चिम बंगाल में भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष ने आरोप लगाया है कि नतीजों के बाद उनकी पार्टी के करीब 100 दफ्तरों और कार्यकर्ताओं के घरों को तबाह कर दिया गया और कुछ को आग के हवाले कर दिया गया है। ममता बनर्जी ने ये कह कर पल्ला झाड़ लिया है कि जब तक वो शपथ नहीं ले लेतीं, कानून-व्यवस्था उनके हाथ में नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा पुरानी और राज्य के बाहर की तस्वीरें शेयर कर के अनर्गल आरोप लगा रही है।

क्या ममता बनर्जी ने मंच से दी ‘बहन वाली गंदी गाली’?

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने एक बार फिर ये बताने की कोशिश की है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अच्छी हिंदी जानती है। हालाँकि, ये बात और है कि जनता के बीच हिंदी बोलने की उनकी कोशिश ने उनकी जगहँसाई करवा दी है। कुछ यूजर्स तो ये तक कह रहे हैं कि उन्होंने गंदी गाली दी है।

जी हाँ, सोशल मीडिया पर कुछ यूजर्स ने ममता बनर्जी की वायरल क्लिप देख कर दावा किया कि उन्होंने क्लिप में केम छो के बाद ‘बैं%&” कहा। इसे सुन कई लोगों ने चुटकी ली।

हमने भी सोशल मीडिया पर वायरल होती वीडियो को ध्यान से सुना। पड़ताल में पाया कि मुख्यमंत्री बनर्जी ने किसी तरह की कोई अभद्र बात नहीं कही है। मगर फिर भी वह लोगों के बीच हँसी का पात्र बन गई।

अपनी स्पीच में सीएम बनर्जी ने जताया कि वह गुजराती भाषा में भी पारंगत है। इसके बाद अपनी बात के सबूत देने के लिए वह कहने लगी, ‘केम छो? भाल छो।’ अब ये शब्द गुजराती के ही हैं। ‘केम छो’ का अर्थ होता है कि आप कैसे हो? जबकि भाल छो शब्द सुन कर लगता है कि उन्होंने खुद के गुजराती प्रवाह को साबित करने के लिए इसका प्रयोग किया।

बंगाली में भालो का अर्थ ‘बढ़िया’ होता है। तो, ‘आप कैसे हैं’ -सवाल का अर्थ बंगाली में ‘आमी भालो आछी’ कहकर ही दिया जाता है। जिसका अनुवाद होता है- ‘मैं बढ़िया हूँ’, ‘मैं अच्छे से हूँ’। गुजराती में इसी सवाल का अर्थ ‘माजामा’ होता है।

यानी ये तो स्पष्ट है कि जनता के सामने गुजराती भाषा में खुद को निपुण दिखाने के लिए सीएम ने बंगाली शब्द का प्रयोग गुजराती भाषा के साथ मिलाकर किया। शायद इसी कारण यूजर भी कन्फ्यूज हो गए और उस 2 मिनट 20 सेकेंड की वीडियो में 0.59 सेकेंड पर कहे गए शब्द पर हँसी उड़ाने लगे।

जनता के सामने खुद के भाषाई ज्ञान की जानकारी देते हुए सीएम बनर्जी ने पीएम मोदी पर कई बार निशाना साधा। उन्होंने कहा कि पीएम टेलीप्रॉम्पटर से पढ़कर स्पीच देते हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने पंजाबी भाषा के ज्ञान से भी जनता को अवगत कराया।

उन्होंने बताया कि वह बहुत समय पहले पंजाब गई थी। वहाँ वह मुश्किल से ही लोगों को पहचान पा रही थीं। उन्हें सब एक से लग रहे थे। मगर वहाँ गुरुद्वारे में उन्होंने हलवा माँग के खाया। अपनी जनता को समझाते हुए मुख्यमंत्री ने कहा कि जैसे बिहारियों के यहाँ लिट्टी मशहूर है, वैसे ही गुरुद्वारे में हलवा बहुत अच्छा मिलता है।

सबसे हास्यास्पद बात यह है कि ममता बनर्जी ने अपनी स्पीच में इतनी दफा हिंदी की गड़बड़ी की, लेकिन फिर भी आत्मविश्वास से वो शब्द दोहराती रहीं। उन्होंने एक जगह तो हिंदू धर्म में पूजनीय विष्णु भगवान के लिए माता शब्द का प्रयोग किया और कहा जय बिष्णु माता।

नेताओं के दोगलेपन में पिसती जनता


आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
आज नए कृषि कानूनों के विरोध में किसान सड़कों पर प्रदर्शन कर रहे हैं। इस प्रदर्शन की आड़ में राजनीतिक दोलों को अपनी सियासी रोटियां सेकेंने का मौका मिल गया है। एनडीए सरकार के विरोधी तमाम पार्टियां प्रदर्शनकारी किसनों को खुलकर समर्थन दे रही हैं। लेकिन ये पार्टियां खुद ऐसे कानून लागू करने की मांग कर चुकी हैं। यहां तक कि सरकार में रहते इसके लिए राज्य सरकारों को सुझाव भी दे चुकी हैं।

कांग्रेस के घोषणा-पत्र में शामिल थे नए कानून के प्रावधान 

कांग्रेस पार्टी आज नए कृषि सुधार कानूनों का मुखर विरोध कर रही है और किसानों को गुमराह कर रही है। उसी कांग्रेस पार्टी ने इस कानून को 2019 के घोषणापत्र में शामिल किया था। उनके घोषणापत्र में साफ-साफ लिखा था, “कांग्रेस Agricultural Produce Market Committees Act को निरस्त कर देगी और कृषि उत्पादों के व्यापार की व्यवस्था करेगी… जिसमें निर्यात और अंतर-राज्य व्यापार भी शामिल होगा, जो सभी प्रतिबंधों से मुक्त होगा।” उनका यह घोषणापत्र अब भी उनकी वेबसाइट पर देख सकते हैं। ये बातें उनके मेनिफेस्टो में पेज नंबर 17 के प्वॉइंट नंबर 11 में दर्ज है।


कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टो में वादा किया था कि वह Essential Commodities Act को खत्म कर उसकी जगह ECA 1955 के नाम से नया कानून लेकर आएगी। इसे भी उनके घोषणा पत्र के पेज नंबर 18 में देखा जा सकता है। 27 दिसंबर, 2013 को कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि कांग्रेस शासित राज्य APMC Act के तहत फलों और सब्जियों को delist कर देंगे, ताकि उनके दाम कम किए जा सकें। मगर आज जब हमारी सरकार ने ऐसा कर दिया तो किसानों को भड़काने में राहुल गांधी ही सबसे आगे हैं।

राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोहरा चरित्र 

कृषि सुधार बिल पर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी का दोगला चरित्र सामने आ गया है। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मुखिया शरद पवार जब यूपीए सरकार में देश के कृषि मंत्री थे, तब ये इन कृषि सुधारों को लागू करने के लिए पुरजोर कोशिश कर रहे थे, परंतु आज अपने ही फैसले से यू टर्न लेकर केंद्र सरकार को नसीहत दे रहे हैं।

इसके लिए पूर्व कृषि मंत्री शरद पवार ने अगस्त 2010 और नवंबर 2011 के बीच सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों को पत्र लिखा था। उन्होंने बार-बार Model APMC एक्ट को लागू करने और State APMC Acts में संशोधन के लिए कहा था। उन्होंने मार्केटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर में निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने पर जोर दिया था, ताकि किसानों को प्रतिस्पर्धा के लिए वैकल्पिक माध्यम मिल सके। उन्होंने कहा था कि इससे किसानों को बेहतर दाम मिल सकेगा।

अगस्त 2010 में लिखी चिट्ठी में शरद पवार जी ने इस बात पर जोर दिया था कि भारत के ग्रामीण इलाकों में कृषि क्षेत्रों के संपूर्ण विकास, रोजगार और आर्थिक प्रगति के लिए बेहतर मार्केट की जरूरत है और इस जरूरत को Model APMC एक्ट पूरा करता है। वहीं नवंबर 2011 में लिखी चिट्ठी में उन्होंने फिर से यही बात दोहराई और निजी तौर पर सभी मुख्यमंत्रियों से अपील की कि किसानों की बेहतरी के लिए बिना देरी करे राज्य सरकारें कदम उठाए।

मई 2012 में तत्कालीन कृषि मंत्री शरद पवार का राज्यसभा में एक औपचारिक जवाब दर्ज है। इसमें उन्होंने खुलकर Agriculture Marketing Reforms का समर्थन किया था। उन्होंने एक सवाल के जवाब में कहा था कि “कुछ सिफारिशें पहले ही स्वीकार की जा चुकी हैं, जैसे Agri-procurement के उदारीकरण का प्रस्ताव… हमने सभी राज्यों के सहकारिता मंत्रियों से APMC एक्ट में संशोधन करने का अनुरोध किया है।” लेकिन वही शरद पवार आज इन कृषि सुधारों का न केवल विरोध कर रहे हैं, बल्कि किसानों को इसके लिए भड़का भी रहे हैं।

शिव सेना ने भी पहले अध्यादेश को लागु कर, दबाव में वापस लिया 

10 अगस्त, 2020 को महाराष्ट्र की उद्धव सरकार ने केंद्र सरकार द्वारा लाए गए किसान बिल के तीनों अध्यादेशों को सख्ती से लागू करने के आदेश दिए थे। महाराष्ट्र उन शुरुआती राज्यो में था, जो किसान बिल के तीनों अध्यादेश को तत्काल और सख्ती से लागू करने के आदेश दिया था। दो पेज पेज के इस ऑर्डिनेंस को 10 अगस्त, 2020 के दिन मार्केटिंग के स्टेट डायरेक्टर सतीश सोनी ने सभी बाजार समिति को सख्ती से लागू करने को कहा था। लेकिन बाद में कांग्रेस और एनसीपी के दबाव के बाद उद्धव सरकार ने अपने 10 अगस्त के विवादास्पद आदेश पर रोक लगा दी। अब शिवसेना भी किसानों के आंदोलन और भारत बंद को पूरा समर्थन दे रही है।

डीएमके ने भी बिचौलियों से मुक्ति का वायदा किया था   

डीएमके आज मोदी सरकार के कृषि सुधार कानूनों का विरोध कर रही है। और इस मुद्दे पर भारत बंद का भी समर्थन कर रही है, लेकिन यही डीएमके 2016 के विधानसभा चुनाव में कृषि सुधार बिल को अपने घोषणापत्र में शामिल कर चुकी है। डीएमके ने उस समय अपने मेनिफोस्टो में वादा किया था कि सरकार में आने पर वो किसानों को राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बाजार उपलब्ध कराने के लिए एपीएमसी एक्ट में संशोधन करेगी, ताकि किसान बिना किसी बिचौलिए के अपनी उपज को अधिक से अधिक दाम पर बेच सकें। यही नहीं, इसके लिए उसने Comprehensive Agriculture Produce Marketing Exchange बनाने का भी वादा किया था।

केजरीवाल ने भी अध्यादेश को लागु करने के बावजूद विरोध 

किसानों के आंदोलन से आज दिल्ली वाले ही सबसे ज्यादा परेशान हैं। लेकिन दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी का दोहरा रवैया जगजाहिर हो चुका है। खास बात ये है कि किसानों को भड़काने में और भारत बंद का आगे बढ़कर समर्थन करने वाले केजरीवाल की कथनी और करनी में बड़ा अंतर है। एक तरफ तो आम आदमी पार्टी नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही है और दूसरी तरफ उसने इस कानून को 23 नवंबर को ही लागू भी कर दिया। और इसकी अधिसूचना भी जारी कर दी।

स्वराज्य पार्टी के योगेंद्र यादव की नौटंकी 

किसान आंदोलन में घुसकर चेहरा चमकाने वाले और भारत बंद का ऐलान करने वाले योगेंद्र यादव बिन पेंदी का लोटा साबित हुए हैं। स्वराज पार्टी बनाने वाले योगेंद्र यादव कुछ समय पहले तक कृषि सुधारों के नाम पर हमारी सरकार को घेरते थे, आज वो कृषि सुधार किए जाने के बाद किसानों को न केवल भड़काने में जुटे हुए हैं, बल्कि भारत बंद के नाम पर आवश्यक वस्तुओं की सप्लाई को भी रोकने पर आमादा हैं। मोदी सरकार के तीन साल पूरे होने पर योगेंद्र यादव ने आरोप लगाया था कि सरकार एपीएमसी एक्ट को लेकर कुछ नहीं कर रही है। लेकिन आज वही योगेंद्र यादव यूटर्न लेकर इस पर राजनीति करने में जुट गए हैं।

अकाली दल द्वारा अध्यादेश का समर्थन, कानून का विरोध 

कृषि सुधार कानूनों पर अकाली दल का आज जो रवैया है, वो कुछ दिनों तक पहले तक नहीं था। 12 दिसंबर, 2019 को एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में अकाली दल के सांसदों के बोल कुछ अलग ही थे। उस दिन उन्होंने कहा था कि एपीएमसी भ्रष्टाचार और राजनीति का अड्डा बन चुकी है और वहां बिचौलियों और दलालों का बोलबाला रहता है। यही नहीं उन्होंने कहा था कि एपीएमसी किसानों के हित में नहीं है। इसके बाद 3 जून, 2020 को जब इस पर अध्यादेश लाया गया, तब भी अकाली दल सरकार के उस फैसले के साथ था। अकाली दल की मंत्री हरसिमरत कौर उस निर्णय का हिस्सा थी। उस समय अकाली दल ने कोई विरोध नहीं किया था। लेकिन आज अकाली दल के सुर एकदम अलग हैं।

मुलायम सिंह ने भी APMC का विरोध किया था 

समाजवादी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष और सांसद मुलायम सिंह यादव ने एग्रीकल्चर पर स्टैंडिंग कमेटी में की रिपोर्ट में 12 दिसंबर, 2019 को सुझाव दिया था कि APMC में भी भ्रष्टाचार और राजनीति है। बिचौलियों और दलालों का बोलबाला होने से किसानों को सही लाभ नहीं मिल रहा है। इसलिए APMC किसानों के हित में नहीं है। 

ममता पहले ही केंद्र से मिलता-जुलता कानून लागु कर चुकी हैं 

जहाँ एक तरफ पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी केंद्र के कृषि कानूनों का विरोध करते हुए किसानों के आंदोलन के समर्थन की बातें कर रही हैं, वहीं दूसरी तरफ उन्होंने अपने राज्य में इससे मिलता-जुलता एक कानून 2014 में ही पारित कर लिया था। ममता बनर्जी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में ‘एग्रीकल्चर मार्केटिंग बिल’ विधानसभा में पास कराया था। अब वो मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों का विरोध कर रही हैं।

ममता बनर्जी ने कहा है कि केंद्र की भाजपा सरकार को या तो कृषि कानूनों को वापस ले लेना चाहिए, या फिर इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्होंने डेरेक ओ ब्रायन सहित तृणमूल कॉन्ग्रेस के अपने कुछ वफादार नेताओं को सिंघु सीमा पर प्रदर्शन कर रहे किसानों के पास भेजा भी और प्रदर्शनकारी नेताओं से बातचीत की। इस दौरान योगेंद्र यादव भी देखे गए। मंगलवार (दिसंबर 8, 2020) को किसान संगठनों ने ‘भारत बंद’ का आह्वान कर रखा है जिसे कई राजनीतिक दलों ने भी समर्थन दिया है।

मोदी सरकार के नए कृषि कानूनों से किसानों को अपने उत्पाद कहीं भी भेजने की छूट मिलती है, साथ ही ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ की स्थिति में प्राइवेट कंपनियों की मनमानी पर भी लगाम लगती है। इसमें क्षति की स्थिति में खरीददार पर ही सारी जिम्मेदारी डाल दी गई है और किसान इन सबसे मुक्त है। रुपए के भुगतान के लिए समयसीमा भी दी गई है। बावजूद इसके भ्रम फैला कर किसानों को बरगलाया जा रहा है।

पश्चिम बंगाल सरकार ने 2014 में जो ‘एग्रीकल्चर प्रोड्यूस मार्केटिंग (रेगुलेशन) बिल’ पास कराया था, दावा किया गया था कि इससे किसानों को अपने उत्पादों के उचित दाम मिलेंगे। ममता बनर्जी सरकार ने कहा था कि बिचौलियों की गतिविधियों को रोकने के लिए ऐसा किया गया है। साथ ही कहा था कि बिचौलियों से निपटने के कड़े कदम उठाए जा रहे हैं और उनसे निपटने में ये कानून सहायक सिद्ध होगा।

आज जब मोदी सरकार यही कर रही है तो ममता बनर्जी सहित पूरे विपक्ष को दिक्कत है। पश्चिम बंगाल के उस कानून के अनुसार, इससे किसानों की पहुँच एक नए बाजार तक होगी और वो सीधे उपयोगकर्ताओं तक अपने उत्पाद बेच सकेंगे। ग्राहकों और किसानों, इसे दोनों के लिए सरकार ने लाभदायक बताया था। साथ ही कहा गया था कि दोनों को ज्यादा भरोसेमंद सिस्टम का हिस्सा बनाना राजकोष के लिए भी अच्छा होगा।

ठीक इसी तरह, NCP के संस्थापक-अध्यक्ष शरद पवार आज ‘किसानों’ के आंदोलन को समर्थन देते हुए कृषि कानूनों पर मोदी सरकार को घेर रहे हैं। शरद पवार यूपीए सरकार में लगातार 10 वर्षों तक केंद्रीय कृषि मंत्री थे और तब वो इन्हीं कृषि सुधारों की पैरवी कर रहे थे, जिनके विरोध में आज वो खड़े हैं। उन्होंने APMC सुधारों को लेकर मुख्यमंत्रियों को पत्र भी लिखा था। उन्होंने तब इन सबके लिए प्राइवेट सेक्टर की भागीदारी पर जोर दिया था, जबकि आज ये भ्रम फैलाया जा रहा है कि प्राइवेट सेक्टर किसानों की जमीनें ले लेंगे और उन्हें रुपए नहीं देंगे।

पश्चिमी बंगाल : मंत्री पद से इस्तीफा देकर शुभेंदु अधिकारी ने ममता बनर्जी को लगभग तोड़ डाला

एक तरफ चुनावी मौसम विशेषज्ञ डूबते जहाज को छोड़ अपनी जीविका के अपने नए आश्रय की ओर कूच कर रहे हैं, लेकिन कुछ दल अभी भी अपनी विध्वंस और अराजक पृष्ठभूमि त्यागने को तैयार नहीं। 

नवंबर 28 को उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा हैदराबाद में ओवैसी के गढ़ को भगवामय करने के अलावा "आ गया आ गया शेर आ गया", "जय श्रीराम" आदि गगनचुम्बी नारों के बीच सिंह गर्जना करना, इस बात का संकेत दे रहा है कि अब जनता तुष्टिकरण की सियासत से ऊब चुकी है। तेलंगाना में अपने प्रवास के दौरान लगभग 4/5 चुनाव देखे, लेकिन ऐसा चुनावी माहौल नहीं देखा। ऐसा आभास होता है कि योगी ने चुनावी माहौल को जरुरत से ज्यादा गरमा दिया है। भले ही म्युनिसिपल में बहुमत नहीं आये, परन्तु टक्कर जबरदस्त दे दी है। 

लेकिन तब भी कुछ सियासतखोर देश में अराजकता का माहौल बनाकर अपने ही मार्ग में कांटे बिछा रहे हैं। बंगाल में भी इतनी अधिक तुष्टिकरण सियासत होने से सत्तारूढ़ में अपना अस्तित्व खतरे में देख पाला बदल ममता बनर्जी के लिए दिन-प्रतिदिन एक नयी मुसीबत खड़ी कर रहे हैं।    

पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के दिग्गज नेता शुभेंदु अधिकारी (Suvendu Adhikari) के मंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद भाजपा और कॉन्ग्रेस की स्थानीय यूनिट उन्हें अपने पाले में लेना चाहती है। भाजपा उनके गढ़ में पहले ही पैठ बना चुकी है। लेकिन, इन सबके बीच सबसे ज्यादा नुकसान TMC और ममता बनर्जी को होने वाला है। 35 विधानसभा सीटों पर प्रभाव रखने वाले अधिकारी परिवार ने अपने समर्थकों से एकजुट होने की अपील की है।

शुभेंदु अधिकारी ने अपने समर्थकों से कहा है कि वो सड़क पर उतरने के लिए गोलबंद हो जाएँ। उन्होंने अपने समर्थक विधायकों को भी जनता के बीच उतरने को कहा है। उन्होंने शनिवार (नवंबर 28, 2020) को अपने समर्थक TMC नेताओं को अपनी रणनीति समझाई। एक TMC नेता ने कहा कि पूरा अधिकारी समर्थक कैडर सड़क पर उतरने को तैयार है और अभी से चुनावी मोड में आ गया है। उन्हें इंतजार है तो सिर्फ अपने नेता की हरी झंडी का।

समर्थकों ने बताया कि इसके लिए पिछले 6 महीने से तैयारियाँ चल रही थीं। समर्थकों का कहना है कि वो 6 जिलों में पूरी तरह गोलबंद हैं और एक अलग संगठन के जरिए प्रचार मोड में हैं। ये सब तब हो रहा है, जब TMC सारे विकल्प खुले होने की बात करते हुए अभी भी अधिकारी को मनाने की कोशिश कर रहा है। पार्टी ने इसके लिए पूर्व केंद्रीय मंत्री सौगत रॉय को लगाया है, क्योंकि प्रशांत किशोर भी यहाँ फेल हो गए हैं।

 रॉय ने बताया कि शुभेंदु अधिकारी की माँ की तबीयत ख़राब होने के कारण बातचीत में समय लग रहा है। इसी बीच दिसंबर 7 को मेदिनीपुर में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की रैली भी है। ये वही क्षेत्र है, जो अधिकारी परिवार का गढ़ है। शुभेंदु ने कैबिनेट से इस्तीफा देने के साथ-साथ ‘हुगली रिवर ब्रिज कमीशन’ और ‘हल्दिया डेवलपमेंट अथॉरिटी’ के अध्यक्ष पद को भी छोड़ दिया है। पूर्व मेदिनीपुर में रविवार को स्वतंत्रता सेनानी रंजीत कुमार बॉयल की याद में एक समारोह है, जहाँ वो अपने पत्ते खोल सकते हैं।

वो इन 5 जिलों में अपने करीबी TMC विधायकों और नेताओं से लेकर अपने जमीनी समर्थकों से लगातार संपर्क में हैं। एक नेता ने बताया कि वो किसी पर निर्भर नहीं रहने वाले हैं और उनका अपना एक ‘मास बेस’ है, ऐसे में इन 5 जिलों में पूरी तैयारी है। हावड़ा, हुगली, कोलकाता, बीरभूम से लेकर झारग्राम और सिलीगुड़ी तक उनके पोस्टर्स लहराते हुए पाए गए।

यहाँ ये सवाल उठ सकता है कि आखिर वो ममता बनर्जी के लिए महत्वपूर्ण क्यों हैं? 6 जिलों या 35 विधानसभा सीटों पर प्रभाव को हटा भी दें, फिर भी वो क्यों TMC के एक स्तंभ थे? इसके लिए हमें 13 साल पीछे 2007 में जाना होगा, जब ममता बनर्जी साढ़े 3 दशक से बंगाल में सत्ता भोग रहे वामपंथियों को बाहर करने के लिए नंदीग्राम हड़ताल पर थीं। इसी कार्यक्रम ने राज्य में सत्ता हस्तानांतरण की स्क्रिप्ट लिख दी थी।

नंदीग्राम पूर्व मेदिनीपुर में ही स्थित है और उस हड़ताल के आयोजन में सबसे बड़ी भूमिका अधिकारी परिवार की ही थी। राज्य में सिंचाई, यातायात एवं जल मंत्रालय संभाल रहे शुभेंदु अधिकारी भी नंदीग्राम से ही विधायक हैं। अब स्थिति ये है कि इस हड़ताल की याद में जो समारोह हुआ, उसमें ममता बनर्जी की तस्वीर ही नहीं थी। जिस तरह से पिछले कुछ महीनों से उनके कार्यक्रम बिना TMC बैनर के हो रहे थे, स्पष्ट है कि इसकी तैयारी काफी पहले से चल रही थी।

सबसे बड़ी परेशानी ये लग रही है कि तृणमूल कॉन्ग्रेस में अब ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक का हस्तक्षेप बढ़ गया है और वो पार्टी से जुड़े कई फैसले ले रहे हैं। उन्हें ममता की अगली पीढ़ी के नेतृत्व के रूप में तैयार किया जा रहा है। साथ ही प्रशांत किशोर को भाजपा को रोकने के लिए लगाया गया है, जिससे कई नेता नाराज हैं। मुर्शिदाबाद, झारग्राम, बीरभूम, मालदा, पुरुलिया और बाँकुरा- ये वो 6 जिले हैं, जहाँ शुभेंदु ने तृणमूल को कड़ी मेहनत कर के स्थापित किया।

शुभेंदु अधिकारी के पिता और उनके दोनों भाई उनके हर निर्णय को मानते आ रहे हैं और वो अब भी उनके ही साथ हैं। पश्चिम बंगाल भाजपा के अध्यक्ष दिलीप घोष ने कहा है कि TMC नेतृत्व अंततः शुभेंदु को भाजपा में ही भेजेगा। उन्होंने कहा कि उनके लिए भाजपा के रास्ते खुले हुए हैं। राज्य में लगभग मर चुकी कॉन्ग्रेस भी बेचैन है, लेकिन उसे कोई गंभीरता से लेता नहीं। ऐसे में उनके अगले कदम पर सबकी नजरें टिकी हैं।

हाल ही में सत्ताधारी तृणमूल कॉन्ग्रेस (TMC) के कूच विहार क्षेत्र से असंतुष्ट विधायक मिहिर गोस्वामी भाजपा में शामिल हो गए। दिल्ली में बीजेपी महासचिव और बंगाल के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय की मौजूदगी में गोस्वामी पार्टी में शामिल हुए। सिंगूर के विधायक रबीन्द्रनाथ भट्टाचार्जी भी टीएमसी से नाराज चल रहे हैं। उन्होंने भी पार्टी छोड़ने की धमकी दे रखी है। वे पार्टी के ब्लॉक अध्यक्ष पद से अपने करीबी को हटाए जाने से नाराज बताए जाते हैं।

चुनाव से पहले TMC में सिर फुटव्वल शुरू

पश्चिम बंगाल में अगले साल विधान सभा चुनाव होने हैं। बीजेपी ने अपनी तैयारियों को धार देना शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हर महीने राज्य का दौरा करेंगे। उधर तृणमूल कांग्रेस सरकार में सिर फुटव्वल तेज हो गई है। तृणमूल कांग्रेस में नंबर दो और ममता बनर्जी के खास कैबिनेट मंत्री शुभेंदु अधिकारी ने अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है। उन्होंने पार्टी को संदेश देते हुए कहा कि उनका न किसी ने चयन किया और न उन्हें नामित किया। वे अपनी मेहनत से मंत्री पद तक पहुंचे हैं।

शुभेंदु अधिकारी ने नवम्बर 18 को हल्दिया में एक सहकारी समिति की ओर से आयोजित कार्यक्रम में कहा कि ‘मैं कड़ी मेहनत से ऊंचाई तक पहुंचा हूं। मैं निर्वाचित नेता हूं। मैं चयनित या नामित नेता नहीं हूं।’ उनका यह बयान सहकारी समिति में अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद सामने आया। माना जा रहा है कि ऐसा करके शुभेंदु अधिकारी पार्टी के नीति निर्धारकों पर निशाना साधा है।

शुभेंदु अधिकारी के बयान के बाद पार्टी के अंदर ही विरोध शुरू हो चुका है। पार्टी के कई नेताओं ने उनके इस बयान को गलत बताया। साथ ही कहा कि उनका यह बयान तृणमूल के एक वरिष्ठ नेता और सांसद को लक्षित था। पूर्वी मिदनापुर के तृणमूल नेता अखिल गिरी ने कहा कि शुभेंदु अधिकारी को बताना चाहिए कि वह किसके बारे में बात कर रहे हैं।

इससे पहले नंदीग्राम में एक अलग रैली कर बगावत का बिगुल फूंकने वाले शुभेंदु अधिकारी ममता की कैबिनेट बैठक में नहीं पहुंचे। इसके साथ ही तीन और मंत्री राजीव बंद्योपाध्याय, गौतम देव और रवींद्रनाथ घोष भी बैठक में नहीं पहुंचे। यह भी खबर है कि शुभेंदु अधिकारी के तीनों करीबी नेताओं की सुरक्षा भी हटा दी गई है।

 शुभेंदु काफी वक्त से पार्टी में अपनी उपेक्षा से नाराज हैं। लेकिन पहली बार उन्होंने अपनी नाराजगी का सार्वजनिक तौर पर इजहार किया। पिछले एक महीने से शुभेंदु की हर रैली में जो पोस्टर लगाए जा रहे हैं उनमें ममता बनर्जी और टीएमसी दोनों का ही नामोनिशान नजर नहीं आ रहा।

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 5 नवंबर को बंगाल में दो दिवसीय दौरे पर गए थे और वहां उन्होंने बीजेपी की तैयारी के साथ ममता सरकार पर जबर्दस्त निशाना साधा था। शाह के लौटने के बाद बंगाल की राजनीति में अचानक गर्माहट बढ़ गई। उधर बीजेपी शुभेंदु को पार्टी जॉइन करने का पहले ही खुला ऑफर दे चुकी है। इससे अब ममता बनर्जी की मुश्किलें और बढ़ती नजर आ रही हैं।

शुभेंदु अधिकारी सत्तारूढ़ ममता सरकार में वरिष्ठ मंत्री हैं। राज्य के मिदनापुर और जनजातीय क्षेत्र जंगलमहल में तृणमूल के सबसे प्रभावशाली नेताओं में से एक हैं। जिस नंदीग्राम आंदोलन से ममता बनर्जी को बंगाल की सत्ता मिली थी, उस आंदोलन का आर्किटेक्ट शुभेंदु को माना जाता है। ममता बनर्जी के साथ शुरुआती दौर से ही जुड़े हैं। लेकिन पिछले कुछ समय से उनकी पार्टी के साथ नाराजगी की खबरें बाहर आ रही हैं। इसी के चलते वे तृणमूल कांग्रेस और राज्य मंत्रिमंडल से दूरी बनाकर चल रहे हैं।

बंगाल : ‘घुस के मारो सालों को’: मुस्लिम भीड़ ने राम की पूजा कर रहे हिंदुओं को बनाया निशाना; कहाँ है #not in my name, #intolerance गैंग?

बंगाल, राम, मुस्लिम
रज़ा बाजार में पूजा के विरोध में जुटे मुस्लिम 
5 अगस्त को अयोध्या में राम मंदिर का ऐतिहासिक भूमि पूजन हुआ। इस मौके पर भी पश्चिम बंगाल में हिंसा की घटनाएँ सामने आई। धीरे-धीरे कर इन हिंसक घटनाओं से जुड़ी कई जानकारी सामने आ रही है। ये घटनाएँ तब हुई जब राज्य सरकार ने 5 अगस्त को पूरे प्रदेश में लॉकडाउन लगा रखा था।
प्रदेश के खड़गपुर में अलग-अलग जगहों पर पूजा का आयोजन किया गया था। इन्हें पुलिस वालों ने जबरन रुकवाया था। ख़बरों के मुताबिक़ पुलिस ने मंदिरों में पूजा कर रहे लोगों को घसीटकर बाहर निकाला। लाठी चार्ज किया और मंदिरों को भी नुकसान पहुँचाया।
बंगाल और झारखण्ड में जिस तरह हिन्दुओं को पूजा करने से रोकने का तांडव किया गया है, किसी #not in my name, #intolerance, #right to worship, #award vapasi, #mob lynching और "गंगा-जमुना तहजीब" की बात करने गैंगस्टर क्यों मुंह में दही जमाए बैठे हैं? कहाँ है लोकतंत्र की दुहाई देने वाले? क्या भारत में मुग़ल वंशज की मनमानी चलेगी? क्या हिन्दू अपनी मर्यादा को स्थापित नहीं कर सकता? विरोध उनका नहीं किया जाता, जिन लोगों ने गलत भारतीय इतिहास को जनता को पढ़ाकर गुमराह किया? यदि तुष्टिकरण को त्याग देशहित में वास्तविक इतिहास पढ़ाया जाता, ये हिंसक वारदातें नहीं होती। इस सब विवाद के जन्मदाता तथाकथित इतिहासकार हैं, जिन्होंने चंद चांदी के टुकड़ों  लालच में अपने जमीर को बेच दिया। इन लालची इतिहासकारो से पूछो कि "कहां है मुग़ल आक्रांताओं से पूर्व हज़ारों वर्षों तक राज करने वाले हिन्दू सम्राटों का इतिहास?   
अब जो जानकारी सामने आ रही है उससे पता चलता है कि ऐसा केवल पुलिस ने ही नहीं किया। मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भी भारी संख्या में मंदिरों में घुस कर हिंदुओं को पूजा करने से रोका था। बीजेपी समेत कई हिंदू संगठनों ने कोलकाता में अलग-अलग जगहों पर पूजा का आयोजन किया था। इनमें से कई पूजा स्थलों पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया। इस काम में पुलिस भी उनका साथ दे रही थी। कोलकाता का रज़ा बाज़ार मुस्लिम बाहुल्य इलाका है। यहाँ मुस्लिम समुदाय के लोगों ने राम के नाम पर आयोजित की गई हर पूजा को निशाना बनाया।
 मुस्लिम समुदाय के लोगों ने भगवा झंडे पर भी गुस्सा जताया और हटाने की हरसंभव कोशिश की। वीडियो में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है एक हिंदू ने अपनी दुकान के सामने भगवा झंडा लगा रखा है। इस वजह से एक मुस्लिम उससे विवाद कर रहा है। वीडियो में मुस्लिम व्यक्ति का भगवा झंडे को लेकर घृणा साफ नजर आ रहा है। 


जवाब में जब हिंदू व्यक्ति ने कहा कि यह क्षेत्र किसी एक व्यक्ति का नहीं है, तब मुस्लिम ने धमकाते हुए कहा पूरा भारत मेरा है। इसके बाद उसने भगवा झंडा जलाने की धमकी तक दे डाली। इसके कुछ ही समय बाद मौके पर मुस्लिमों की भीड़ इकट्ठा हुई। इसकी वजह से दोनों समुदायों के बीच विवाद शुरू हुआ।
रज़ा बाज़ार इलाके के दूसरे वीडियो में देखा जा सकता है मुस्लिमों की भीड़ भगवा झंडे उतारने में जुट जाती है। वीडियो में बेहद साफ़ तौर पर यह भी सुनाई देता है, जब एक आदमी कहता है- उतारो-उतारो सब को (झंडे)। इसके बाद दूसरा व्यक्ति कहता है-घुस के मारो सालों को।


 
 रज़ा बाज़ार के नरकेलदंगा इलाके में भी मुस्लिम समुदाय द्वारा उपद्रव की घटनाएँ नज़र आई। मुस्लिम इस बात पर आपत्ति जताते हुए देखे जा सकते हैं कि हिंदू राम की पूजा कर रहे हैं और राम के नारे लगा रहे हैं। पूजा रोकने के लिए मुस्लिमों ने रास्ते तक जाम कर दिए थे। घटनास्थल पर दंगे जैसे हालात होने के पहले पुलिस आ गई और स्थिति को नियंत्रण में किया।



जहाँ एक तरफ हिंदुओं पर 5 अगस्त के दिन राम मंदिर के नाम पर पूजा करके लॉकडाउन की अनदेखी का आरोप लगा। वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समुदाय के लोग अलग-अलग जगहों पर भारी संख्या में नज़र आए।  


सोशल मीडिया पर एक और वीडियो खूब चर्चा में रहा। इसमें साफ़ देखा जा सकता है कि मुस्लिम समुदाय के लोग पूजा रोक रहे हैं। वह इतने पर थमते नहीं हैं बल्कि नज़र आने वाले हर भगवा झंडे को फेंकते हैं। 5 अगस्त के दिन ममता बनर्जी की सरकार ने पश्चिम बंगाल में लॉकडाउन का ऐलान किया था। 
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प्रतीकात्मक(साभार हिन्दू जागरण संघ) अयोध्या में राममंदिर का शिलान्यास जरूर हो गया है, लेकिन भारत में अभी भी पल रहे ....
भाजपा सरकार ने इस सम्बन्ध में पश्चिम बंगाल सरकार से निवेदन भी किया था कि 5 अगस्त का लॉकडाउन किसी दूसरे दिन रखा जाए। लेकिन ममता बनर्जी ने भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं के इस आग्रह को ठुकरा दिया था।