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ईटानगर में अवैध मस्जिदों के खिलाफ सड़कों पर उतरे युवा: APIYO अध्यक्ष ऑपइंडिया से बोले- ‘हर दिन 2000 तक मुस्लिम घुसपैठिए अरुणाचल में कर रहे प्रवेश’

                                                घुसपैठियों के खिलाफ अरुणाचल में प्रदर्शन
अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर में शुक्रवार (24 अक्टूबर 2025) को अरुणाचल प्रदेश इंडिजिनस यूथ ऑर्गेनाइजेशन (APIYO) के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में युवा सड़कों पर उतर आए। इनके हाथों में ‘बांग्लादेशी घुसपैठिए वापस जाओ’ और ‘अरुणाचल प्रदेश को बचाओ’ जैसे नारे लिखे पोस्टर थे।

दरअसल, म्यांमार से सटा अरुणाचल प्रदेश, ईसाई धर्मांतरण और इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ की दोहरी मार झेल रहा है। सड़कों पर उतरे ये युवा भी इन्हीं इस्लामी कट्टरपंथियों की घुसपैठ से परेशान हैं। इन युवाओं की माँग है कि राजधानी ईटानगर और नाहरलागुन (जिन्हें अरुणाचल प्रदेश की जुड़वाँ राजधानियाँ कहा जाता है) में मुस्लिमों ने जमीन पर कब्जा कर 15-20 मस्जिद व अन्य इस्लामी धार्मिक स्थल बना लिए हैं जिन्हें हटा दिया जाना चाहिए।

युवाओं का यह विरोध प्रदर्शन आकाशदीप से शुरू होकर आईजी पार्क के पास टेनिस कोर्ट तक पहुँचा जहाँ सैकड़ों युवाओं ने धरना दिया। इस प्रदर्शन में APIYO के साथ ऑल कैपिटल कॉम्प्लेक्स यूथ वेलफेयर एसोसिएशन और ऑल नाहरलागुन यूथ वेलफेयर एसोसिएशन भी शामिल थे।

हर दिन 1-2 हजार मुस्लिम राज्य में कर रहे प्रवेश: APIYO अध्यक्ष लियाक

इस प्रदर्शन को लेकर ऑपइंडिया ने APIYO के अध्यक्ष तारो सोनम लियाक से बातचीत की है। लियाक ने इस बातचीत में कई हैरान करने वाले दावे किए हैं। उन्होंने बताया है कि अरुणाचल प्रदेश में हर दिन अन्य राज्यों या देशों से एक हजार से दो हजार मुस्लिम व्यक्ति इनर लाइन परमिट (ILP) दिखाकर प्रवेश कर रहे हैं।

हालाँकि, उन्होंने इसके बाद जो बताया वो भी खतरनाक है। लियाक के मुताबिक, ये लोग ILP दिखाकर घुस जाते हैं लेकिन फिर भीड़ में गायब हो जाते हैं और वापस अपने मूल स्थान पर नहीं लौटते हैं।

लियाक का कहना है कि मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या डेमोग्राफी में बदलाव का मामला तो है ही। इसके अलावा राज्य की सांस्कृतिक और सामाजिक सुरक्षा पर भी इससे गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं।

लियाक ने आरोप लगाया कि बाहरी लोगों के बढ़ते ठिकानों के कारण ड्रग्स और नशे की समस्या भी तेजी से बढ़ रही है, जिससे स्थानीय युवाओं पर गहरा असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा, “अगर सरकार ने समय रहते कदम नहीं उठाए, तो अरुणाचल की सांस्कृतिक पहचान खतरे में पड़ जाएगी।”

APIYO ने राज्य के मुख्य सचिव को लिखा पत्र

APIYO ने इन घटनाओं को लेकर अरुणाचल प्रदेश के मुख्य सचिव को भी पत्र लिखा है। ऑपइंडिया के पास मौजूद दो पन्नों के इस पत्र में माँग की गई है कि जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर जामा मस्जिद/मदरसा के अवैध निर्माण को तत्काल रद्द किया जाए और जुड़वाँ राजधानी शहर ईटानगर और नाहरलागुन में अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को तत्काल हटाया जाए।

APIYO ने पत्र में लिखा है, “जुड़वाँ राजधानी शहर 13730 से अधिक मुस्लिम आबादी रह रही है लेकिन इसमें से 20% मुस्लिम आबादी बांग्लादेशी है, जो राज्य के हमारे मूल निवासियों के लिए एक बड़ा खतरा है।”

APIYO ने लिखा, “राज्य सरकार की जानकारी के बिना जुड़वाँ राजधानी परिसर के भीतर 10 से अधिक अवैध जामा मस्जिदें चल रही हैं, जो मूल निवासियों के लिए बहुत असुरक्षित है। इसलिए, जुड़वाँ राजधानी शहर के भीतर केवल 2 जामा मस्जिदों की अनुमति देना आवश्यक है और राज्य के मूल निवासियों के हित में अन्य को तुरंत हटा दिया जाना चाहिए।”

इसके अलावा संगठन ने राजधानी परिसर और उसके नजदीक दोईमुख, होलोंगी आदि जगहों पर साप्ताहिक बाजार पर प्रतिबंध लगाए जाने की माँग की है। पत्र में लिखा गया है, “राजधानी परिसर और उसके पड़ोसी क्षेत्रों जैसे दोईमुख और होलोंगी आदि में हर दिन साप्ताहिक बाजार लगता है, जहाँ बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी व्यापारिक उद्देश्य से बाहर से हमारे राज्य में आते हैं और राजधानी परिसर में किराए के कमरों में रहते हैं, जो हमारे स्थानीय स्वदेशी व्यापारिक समुदाय के लिए एक खतरा है।”

साथ ही, संगठन की चिंता है कि राज्य में बड़ी संख्या में अवैध प्रवासी प्रवेश कर रहे हैं और अगर इसे समय रहते नहीं रोका गया तो अपराध दर बढ़ने की बहुत संभावना है।

                                       मुख्य सचिव को APIYO का पत्र (साभार: तारो सोनम लियाक)

प्रशासन ने शुक्रवार(अक्टूबर 30) को प्रदर्शन के दौरान सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए और पूरा विरोध शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। हालाँकि, संगठनों ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने उनकी माँगों पर जल्द कार्रवाई नहीं की, तो आंदोलन को राज्यव्यापी स्तर पर तेज किया जाएगा।

हालाँकि, प्रशासन ने कार्रवाई का भरोसा दिया है और मस्जिदों की जाँच की है लेकिन संगठन के लोग इस जाँच से संतुष्ट नहीं हैं। लियाक का कहना है कि वह चाहते हैं कि सरकार 15 दिनों के भीतर-भीतर इस पर सही तरीके से कार्रवाई करे वरना वह इस विरोध को राज्य स्तर तक लेकर जाएँगे।

सीमावर्ती राज्य होने के कारण अरुणाचल प्रदेश में बाहरी राज्यों के लोगों को प्रवेश के लिए इनर लाइन परमिट (ILP) लेना अनिवार्य है। APIYO जैसे स्थानीय संगठनों का आरोप है कि इस व्यवस्था का दुरुपयोग कर बड़े पैमाने पर अवैध बसावट की जा रही है।

‘अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून जल्द हो लागू’: नॉर्थ-ईस्ट की जनजातियों की रैली से भड़के ईसाई, अपने ही घर में अल्पसंख्यक हो रहे ‘डोनी पोलो’ को पूजने वाले

                  अरुणाचल प्रदेश में APFRA 1978 लागू करने की माँग ( साभार- NT, CM facebook)

अरुणाचल प्रदेश के 27 जिलों, 26 प्रमुख जनजातियों और 100 उप-जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले हजारों मूल निवासियों ने धर्मांतरण विरोधी अधिनियम (APFRA 1978) को लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। शनिवार (20 अक्टूबर 2025) को पारंपरिक कपड़ों में इन लोगों ने ईटानगर तक मार्च किया। राज्य के ईसाई इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।

धर्मांतरण को रोकने के लिए 48 साल पहले अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 1978 लागू हुआ था।

ईसाइयत के प्रचार- प्रसार की वजह से अरुणाचल के मूल निवासी यहाँ अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। ये लोग डोनी पोलो की पूजा करते हैं, जहाँ ‘डोनी’ का अर्थ है ‘सूर्य’ और ‘पोलो’ का अर्थ है ‘चंद्रमा’। ये वे सिंबल हैं, जिस पर अरुणाचल प्रदेश के लोगों की आस्था है।

                                                                                                                                 साभार- TOI

डोनी पोलो, ईसाई धर्म और हिंदू धर्म के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में महायान और थेरवाद बौद्ध धर्म के अनुयायियों की भी अच्छी खासी तादाद है।

इंडिजिनस फेथ एंड कल्चरल सोसाइटी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (IFCSAP) के अध्यक्ष एमी रूमी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि स्वदेशी आस्था को मानने वालों ने राज्य के स्वदेशी विश्वास और परंपरा को बचाने के लिए अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम (एपीएफआरए) को पूरी तरह लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। उन्होंने कहा कि इस कानून को 1978 में तत्कालीन राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।

रूमी ने कहा, “अगर यह कानून लागू होता है, तो हमारी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान की रक्षा हो पाती।”

                                                                                                                          साभार- इंडिया टुडे

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए वकील आर.एस. लोडा ने कहा, “हम नहीं चाहते कि अरुणाचल प्रदेश मिजोरम या नागालैंड की तरह अपनी मूल पहचान खो दे, जहाँ विदेशी धर्म के प्रचार- प्रसार के कारण स्थानीय मान्यताएँ नष्ट हो गई हैं।”

अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू करने की माँग करने वालों का कहना है कि यह कानून किसी भी धर्म या संप्रदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह केवल ‘जनजातीय समुदाय को प्रलोभन या लालच देकर हो रहे धर्मांतरण से बचाता है’।

अरुणाचल प्रदेश के स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री मामा नटुंग से मुलाकात की और अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 1978 (APFRA) को तत्काल लागू करने का आग्रह किया। उन्होंने राज्य की स्वदेशी आस्था, संस्कृति और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए इस अधिनियम को लागू करने पर जोर देते हुए एक ज्ञापन सौंपा।

इनका कहना है कि बाहरी प्रभावों से अरुणाचल की संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है। इसे संरक्षित करने और जनजातीय विरासत को बचाने के लिए कानून का लागू करना जरूरी होता जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में ईसाई आबादी और धर्मांतरण गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

1971 की जनगणना के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी 0.79% थी, जो 2011 की जनगणना में 30.26% हो गई। 1971 में अन्य धर्मों और मतों (ORP) का हिस्सा 63.46% था, जबकि 2011 की जनगणना में यह 26.20% रह गया।

1971 में हिंदुओं की आबादी 22% थी और 2011 में यह 29.04% हो गई। 1971 की जनगणना में बौद्धों की आबादी लगभग 13% थी, लेकिन 2011 में यह घटकर 11.77% रह गई। वहीं, मुसलमानों की आबादी 1971 में 0.18% थी, जो बढ़कर 2011 की जनगणना में 1.95% हो गई।

ईसाई APFRA का कर रहे विरोध

अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) APFRA कानून का विरोध कर रहा है। फोरम के अध्यक्ष तारह ​​मिरी का तर्क है कि ‘धर्मांतरण विरोधी कानून धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है और ईसाइयों को निशाना बनाता है।” फरवरी 2025 में ACF ने धर्मांतरण विरोधी कानून के विरोध में 8 घंटे की भूख हड़ताल किया था।

नागा बैपटिस्ट चर्च काउंसिल के महासचिव रेव जेलहोउ कीहो ने जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री पेमा खांडू को एक पत्र लिखा था और दावा किया था कि APFRA का उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि ईसाइयों का दमन करना है।

पत्र में कीहो ने लिखा, “APFRA का असली उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उस समय के एक खास धार्मिक समूह का दमन करना था… इस आधार पर यह अधिनियम असंवैधानिक है। उस वक्त आपके लोग और क्षेत्र इस विधेयक का विरोध कर रहे थे, लेकिन देश के हालात बहुत बदल गए हैं। अब आपके लोगों, खासकर आपके राज्य के ईसाईयों का क्या होगा।”

पत्र में आगे कहा गया है, “हमें यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि देश के अन्य हिस्सों में ईसाइयों को बेवजह सताने के लिए इस कानून (धर्मांतरण विरोधी कानून) का कैसे दुरुपयोग किया जाता है। हमारी व्यावहारिक समझ हमें बताती है कि आपके शांतिप्रिय लोगों के साथ भी यही होगा, और यह पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा।”

मुख्यमंत्री खांडू ने परंपराओं के संरक्षण की बात कही

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने राज्य की स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और परंपराओं को संरक्षित करने की भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने इन्हें जनजातीय समुदायों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आत्मा बताया।
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि स्वदेशी आस्थाओं को संरक्षित करना क्यों आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रमुख धर्मों के विपरीत, स्वदेशी आस्थाएँ “किताबों से नहीं, बल्कि ज़मीन, स्मृति और जीवित परंपराओं से आती हैं। ये बाहर से थोपी नहीं जाती, बल्कि इसकी जड़ें हजारों सालों से जमी हुई हैं। ये हमारे लोगों, हमारे जंगलों, पहाड़ों, नदियों और पूर्वजों की आत्मा को संजोए हुए हैं।”
स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए, मुख्यमंत्री खांडू ने आदि, गालो, न्यीशी और तांगसा जनजातियों के लिए 6 स्वदेशी गुरुकुल, 3,000 से अधिक पंजीकृत पुजारियों के वेतन, सभी जिलों में जनजातीय सांस्कृतिक केंद्र और राज्य भर में 50 स्वदेशी केंद्रों की स्थापना की घोषणा की।
दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री खांड स्वदेशी मामलों के विभाग का नाम बदलकर स्वदेशी आस्था और संस्कृति कर दिया। उन्होंने इसे ‘स्वदेशी परंपराओं की समृद्ध विरासत के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा की प्रतिबद्धता की दिशा में एक कदम’ बताया।

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम क्या है?

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम अक्टूबर 1978 में अस्तित्व में आया था। इसका उद्देश्य ‘ताकत, लालच या धोखा देकर होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना’ था। भारत के राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी थी।

राज्य में कई ‘स्वदेशी आस्थाओं’ की पहचान की गई। इनमें बौद्ध धर्म (मोनपा, मेम्बा, शेरदुकपेन, खम्बा, खम्पती और सिंगफो द्वारा प्रचलित), वैष्णव धर्म (नोक्टेस द्वारा प्रचलित), आका और प्रकृति पूजक (दुन्यी-पोलो के उपासकों सहित) शामिल हैं।

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3 में स्पष्ट रूप से कहा गया है – “कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को बल प्रयोग, प्रलोभन या किसी कपटपूर्ण तरीके से, प्रत्यक्ष रूप से या अन्यथा, एक धार्मिक आस्था से दूसरी धार्मिक आस्था में परिवर्तित नहीं करेगा या परिवर्तित करने का प्रयास नहीं करेगा और न ही कोई व्यक्ति ऐसे किसी धर्मांतरण के लिए उकसाएगा।”

कानून में आगे कहा गया है कि धारा 3 का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर ₹10,000 तक का जुर्माना और अधिकतम 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।

यह अधिनियम किसी व्यक्ति के धर्मांतरण के बारे में संबंधित जिले (अरुणाचल प्रदेश में) के जिलाधिकारी को सूचित करने का भी आदेश देता है। ऐसा न करने पर 1 वर्ष तक की कैद और ₹1000 तक के जुर्माने का प्रावधान है।

कानून की धारा 6 में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत अपराध को संज्ञान में लिया जाएगा और पुलिस निरीक्षक से नीचे के अधिकारी इसकी जाँच नहीं करेंगे। अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए पुलिस उपायुक्त की पूर्व अनुमति या अतिरिक्त सहायक आयुक्त से नीचे के पद के अधिकारी से सत्यापित कराने की आवश्यकता होती है।

धर्मांतरण विरोधी कानून के कार्यान्वयन के लिए अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा नियम बनाने की माँग करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। इस मामले में बड़ी सफलता सितंबर 2024 में मिली।

न्यायमूर्ति कर्दक एटे और न्यायमूर्ति बुदी हाबुंग की खंडपीठ ने महाधिवक्ता आई. चौधरी के जवाब की जाँच के बाद जनहित याचिका को बंद कर दिया। सरकार ने कोर्ट को बताया है कि इसके नियमों को सूचीबद्ध करने के लिए 6 महीने का वक्त चाहिए।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2024 को अपने आदेश में कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि संबंधित अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहेंगे और मसौदा नियमों को आज से 6 (छह) महीने की अवधि के भीतर अंतिम रूप दे दिया जाएगा।”

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खांडू पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, सरकार को छह महीने के भीतर मसौदा नियम तैयार करना है। यह समय सीमा अक्टूबर 2025 में समाप्त हो रही है।

यह अत्यंत आवश्यक है कि राज्य सरकार धार्मिक जनसांख्यिकी की रक्षा और स्वदेशी आस्थाओं एवं परंपराओं के संरक्षण के लिए एपीएफआरए या धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करे। हालाँकि ईसाई समूह इस कानून को अपनी धार्मिक पहचान पर हमले के रूप में देख रहे हैं। उन्हें ये समझने की जरूरत है कि एपीएफआरए अगर लागू होता है, तो यह ताकत से, प्रलोभन से या किसी झाँसे में आकर किए जा रहे धर्मांतरण के खिलाफ होगा।

अरुणाचल प्रदेश : जबरन या लालच देकर धर्मांतरण करने वालों की अब खैर नहीं: लगभग 47 साल बाद राज्य सरकार लागू करेगी धार्मिक स्वतंत्रता कानून

                                                अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू 
अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने एक कार्यक्रम में बोलते हुए राज्य में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम को बहाल करने के संकेत दिए हैं। यह एक्ट साल 1978 में बना था, जो अब तक लागू नहीं किया गया था। यह कानून जबरन या लालच आदि देकर किए जाने वाले किसी भी तरह के धर्मान्तरण पर प्रभावी कार्रवाई के लिए बनाया गया था। उन्होंने कहा कि इस कानून को लागू करने से अरुणाचल प्रदेश की संस्कृति को सहेजने में मदद मिलेगी।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पेमा खांडू शुक्रवार (27 दिसंबर 2024) को ईटानगर में स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम को सम्बोधित कर रहे थे। अपने सम्बोधन में उन्होंने अरुणाचल प्रदेश के पहले मुख्यमंत्री पीके थुंगन को धन्यवाद किया, जिन्होंने साल 1978 में विधानसभा में धार्मिक स्वतंत्रता अधिनियम को पारित करवाया था।

जब अरुणाचल प्रदेश में यह कानून बना था, तब वहाँ ईसाई मिशनरियाँ काफी सक्रिय थीं। वहाँ बड़े पैमाने पर लोगों को ईसाई बनाने का षड्यंत्र चलता था। हालाँकि, विधानसभा में पारित होने के बावजूद इसे 47 सालों से लागू नहीं किया गया। साल 2018 में तो प्रेमा खांडू ने कैथोलिक एसोसिएशन के एक कार्यक्रम में यहाँ तक कह दिया था कि उनकी सरकार इस अधिनियम को निरस्त करने पर विचार कर रही है।

तब पेमा खांडू ने इस कानून को प्रदेश में भाईचारा कमजोर करने वाला और ईसाईयों को परेशान करने वाला करार दिया था। तब IFCSAP के पूर्व महासचिव ताम्बो तामिन ने इस कानून को लागू करने के लिए गुवाहाटी हाईकोर्ट की ईटानगर पीठ में याचिका दाखिल की थी। इस याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने सितंबर 2024 में राज्य सरकार को 6 महीने के अंदर नियमों को अंतिम रूप देने का आदेश दिया था।

‘2047 तक भारत के कई टुकड़े’: खालिस्तानी आतंकी पन्नू की नई धमकी, चीन को अरुणाचल पर हमले के लिए उकसाया; मुस्लिम कट्टरपंथी और आतंकवादियों के मंसूबे भी यही है

                                                  खालिस्तानी आतंकी गुरपतवंत सिंह पन्नू
खालिस्तानी आतंकी और प्रतिबंधित संगठन ‘सिख्स फॉर जस्टिस’ (SFJ) के मुखिया गुरपतवंत सिंह पन्नू ने एक बार फिर भारत की अखंडता के खिलाफ़ गंभीर धमकी दी है। अमेरिका में बसे पन्नू ने एक वीडियो जारी कर भारत के कई राज्यों में अलगाववादी ताकतों को खड़ा करने की बात कही है। उसने 2047 तक भारत को कई टुकड़ों में बाँटने का हमेशा की तरह मुंगेरीलाल का सपना फिर से देखा है, जिसमें पन्नू ने दावा किया कि 2047 तक भारत का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा और इसका पूरा भूगोल बदल दिया जाएगा।

पन्नू की धमकी में और मुस्लिम कट्टरपंथी और आतंकवादियों की धमकी में कोई फर्क नहीं। देशप्रेमी विशेषकर हिन्दुओं को अपने दिमाग का सही इस्तेमाल करना होगा। याद करना होगा कि CAA विरोध के दिनों में हिन्दुओं की गैर-हाज़िरी में कहा जाता था कि 'जब तक हिन्दुस्तान गजवा-ए-हिन्द नहीं बन जाता तिरंगा संभालना है और भारत माता की जय बोलना है।' सोशल मीडिया पर यह बात खूब वायरल होने के साथ-साथ इस ब्लॉग पर भी लिखा था, लेकिन लालची और बेअक्ल इन देश विरोधी ताकतों के तलवे चाट रहे हैं।   

कनाडा के मंत्री के बयान पर भड़का पन्नू

यह वीडियो कनाडा के उप विदेश मंत्री डेविड मॉरिसन के एक बयान के बाद जारी किया गया। मॉरिसन ने हाल ही में एक सार्वजनिक सुनवाई के दौरान कहा था कि कनाडा की नीति स्पष्ट है – भारत की क्षेत्रीय अखंडता का सम्मान किया जाना चाहिए। उन्होंने जोर देकर कहा कि भारत एक एकीकृत राष्ट्र है और इसकी संप्रभुता को कोई खतरा नहीं होना चाहिए। इस बयान से पन्नू भड़क उठा और भारत के खिलाफ जमकर आग उगला।
पन्नू ने अपने वीडियो में मुंगेरीलाल के सपने की तरह SFJ का मिशन बताया है। पन्नू ने कहा, “SFJ का मिशन 2024 से 2047 तक भारत को खत्म करना है।” उसने यह भी कहा कि पंजाब के अलावा अब जम्मू-कश्मीर, असम, मणिपुर और नागालैंड में भी स्वतंत्रता आंदोलनों को भड़काने की योजना बनाई जा रही है। इन राज्यों में भी आंदोलन शुरू कर ‘भारत संघ को खंडित’ करने की धमकी दी गई है।

चीन को अरुणाचल पर हमले के लिए उकसाया

वीडियो में पन्नू ने केवल भारत के अंदरूनी मामलों में हस्तक्षेप करने की धमकी ही नहीं दी, बल्कि उसने चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग से भी समर्थन की अपील की। उसने चीनी सेना से कहा कि अरुणाचल प्रदेश को चीन का क्षेत्र मानते हुए इसे वापस लेने का समय आ गया है। पन्नू ने दावा किया कि चीन को भारत के खिलाफ अपने हितों की रक्षा के लिए कदम उठाना चाहिए।
पन्नू ने यह भी कहा कि वह और उसका संगठन SFJ भारत के खिलाफ अपने खतरनाक एजेंडे को आगे बढ़ाते रहेंगे। वह अमेरिका और कनाडा के कानूनी सुरक्षा और संरक्षण में रहकर भारत को कमजोर करने की योजना बना रहा है। उसने वीडियो में एक पोस्टर के सामने बैठकर कहा, जिस पर लिखा था “2047: नॉन इंडिया”, जिसका मतलब है कि 2047 तक भारत का कोई अस्तित्व नहीं रहेगा।

खालिस्तान के नाम जनमत संग्रह

SFJ लंबे समय से पंजाब को भारत से अलग कर खालिस्तान नाम का एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की माँग कर रहा है। इसके लिए SFJ ने एक अनौपचारिक वैश्विक जनमत संग्रह की पहल भी शुरू की है, जिसमें वह पंजाब को एक अलग देश बनाने के लिए समर्थन माँग रहा है। हालाँकि, इस जनमत संग्रह को पंजाब के अंदर कोई समर्थन नहीं मिला। साफ है कि पंजाब के लोग खालिस्तान के विचार को खारिज कर चुके हैं, लेकिन पन्नू और उसके समर्थक इसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उछालने की कोशिश कर रहे हैं।

भारत-कनाडा के तनाव का फायदा उठाने की कोशिश

भारत और कनाडा के बीच पिछले कुछ समय से रिश्तों में तनाव बना हुआ है, जिसका कारण कनाडा की धरती पर खालिस्तान समर्थक गतिविधियों का बढ़ना है। कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के समय-समय पर खालिस्तानियों के प्रति नरम रुख अपनाने से भारत सरकार ने भी नाराज़गी जताई थी। हालाँकि, डेविड मॉरिसन के हालिया बयान से ऐसा लगता है कि कनाडा ने भारत की अखंडता का समर्थन किया है, जिससे खालिस्तान समर्थक गुटों में हलचल मच गई है।
गुरपतवंत सिंह पन्नू की धमकियों के बावजूद एक बात तो साफ है कि वो लगातार सिर्फ चर्चा में बने रहने के लिए बड़ी-बड़ी बातें करता रहा है। उसकी तरफ से इस तरह की धमकियाँ पहले भी आती रही हैं। हालाँकि दिल्ली में वो पोस्टरबाजी करवाने जैसी हरकतों को अंजाम दे चुका है। बहरहाल, भारतीय सुरक्षा एजेंसियां पहले से ही पन्नू और उसके संगठन की गतिविधियों पर नजर रखे हुए हैं, और उसकी धमकियों को गंभीरता से लिया जा रहा है।

खड़गे साहब अरुणाचल प्रदेश पर बोलने से पहले अपने गिरेबान में झांको; कांग्रेस और “नेहरू” ने क्या किया? कांग्रेस ने तो देश के साथ “गद्दारी” की है

सुभाष चन्द्र

कल कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक बार फिर विदेश नीति पर अपना ज्ञान पेलने की कोशिश करते हुए कहा है कि “मोदी सरकार अरुणचल प्रदेश पर चीन के दावे का कड़े तरीके से खंडन करे। चीन के हास्यास्पद दावे जगजाहिर हैं और इसका माकूल जवाब देना जरूरी है। सरकार से माकूल जवाब की अपेक्षा रखते हुए यह भी कहा कि दलगत राजनीति से इतर भारत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा में हम साथ हैं”।

खड़गे साहब एक तरफ आप सरकार के साथ होने का दावा करते हैं और दूसरी तरफ आप उसी चीन की communist party के साथ MOU साइन करके उसके साथ खड़े रहते हों और हर मामले में सरकार का विरोध करते हो
लेखक 
। ये जो बयान आपने दिया उसके साथ आपने गलवान में सरकार की आलोचना भी कर दी और 20 जवानों के बलिदान पर मोदी को दोष देते हुए यह भी कह दिया कि मोदी ने चीन को उसके लिए clean chit दी थी जबकि मोदी ने ऐसा कुछ नहीं कहा और कांग्रेस ने उनके बयान को आधा अधूरा पेश किया। मोदी ने कहा था भारतीय क्षेत्र में कोई विदेश नहीं है जिसका मतलब था चीनी सैनिको को पछाड़ कर भगा दिया है हमारे सैनिको ने। 

खड़गे साहब को याद होना चाहिए कि मनमोहन सिंह ने अपनी अरुणाचल प्रदेश की यात्रा पर चीन के विरोध के बाद एक बार कुछ समय के लिए स्थगित कर दी थी। उसके बाद फिर जाने का कार्यक्रम बनाया था। कांग्रेस शासन में चीन अरुणाचल के लोगों को Stappled Visa देता था। कांग्रेस के रक्षा मंत्री अंटोनी ने संसद में कहा था कि चीन से लगते बॉर्डर पर हम सड़कें नहीं बनाते क्योंकि उन सड़कों पर चल कर ही चीनी सैनिक घुसपैठ करेंगे।

आज मोदी सरकार ने चीन से लगे पूरे बॉर्डर पर सड़कों का जाल बिछाया है और infrastucture का निर्माण किया है जिसमे हाल ही निर्मित 13000 feet की ऊंचाई पर Sela Tunnel भी शामिल है। क्या कभी कांग्रेस ने ऐसा करने की जरूरत समझी और खड़गे जी बात करते हैं चीन के दावे का “कड़े तरीके से खंडन” करने की। मनमोहन सिंह की यात्रा के बाद भी चीन के एतराज के बाद कांग्रेस सरकार ने इतना ही खंडन किया था कि अरुणाचल प्रदेश भारत का अभिन्न अंग है। अगर इतना खंडन काफी था तो आज कैसा खंडन चाहते हो क्योंकि इससे ज्यादा तो मोदी सरकार कर चुकी है।

आज़ादी से पहले के छोड़िए, आज़ादी के बाद “नेहरू कालखंड” में जो भी चीन को “उपहार” में दे दिया गया और 4000 से जयादा सैनिक मरवा दिए गए, उस पर भी कभी बात किया करें खड़गे और कांग्रेस के नेता - क्या क्या दिया गया ये भी सुनो खड़गे साहब -

-चीन को UN की veto दे दी;

-ढोकलाम 1958;

-लोंगजू 1959;

-अक्साई चिन 1962;

-गलवान 1962;

-हॉट स्प्रिंग 1962;

-काराकोरम पास 1963;

“नेहरू कालखंड’ के बाद -

-कोको आइलैंड 1994;

-Tia Pangnak 2008 (मनमोहन सरकार में);

-Chabji Valley 2008 (मनमोहन सरकार में);

-Doom Valley 2009 (मनमोहन सरकार में);

-Demzok 2012 (मनमोहन सरकार में);

-Raki Nalla 2013 (मनमोहन सरकार में);

-Depsang Bulge (मनमोहन सरकार में);

इनके बारे में कभी कुछ नहीं बोलते और मोदी को पढ़ा रहे हो “कड़े तरीके से खंडन” करना क्या होता है? मनमोहन सिंह सरकार में जो भी चीन ने कब्जाया वह Congress-CPC के MOU के बाद हुआ। कांग्रेस ने तो देश के साथ “गद्दारी” की है।

अरुणाचल प्रदेश : बिना मतदान के ही खुल गया BJP का खाता, 5 लोगों ने निर्विरोध जीता चुनाव: विजेताओं में CM पेमा खांडू भी

मोदी के साथ अरुणाचल CM पेमा खांडू 
अरुणाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव का मतदान होने से पहले ही भाजपा के पाँच प्रत्याशी विजयी हो गए हैं। इनके विरुद्ध कॉन्ग्रेस समेत किसी राजनीतिक दल ने प्रत्याशी ही नहीं उतारे। निर्विरोध विजयी होने वालो में अरुणाचल प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री पेमा खांडू भी शामिल हैं।

अरुणाचल प्रदेश में लोकसभा चुनावों के साथ ही विधानसभा के भी चुनाव भी प्रस्तावित हैं। इनके लिए मतदान 19 अप्रैल, 2024 को होने वाला है। इन विधानसभा चुनावों के लिए बुधवार (27 मार्च, 2024) तक नामांकन भरे जाने थे। हालाँकि, शाम तक अरुणाचल की पाँच सीटों पर मात्र एक ही नामांकन प्राप्त हुआ जो कि भाजपा के उम्मीदवारों का था।

ऐसे में नामांकन ना प्राप्त होने की दशा में यह उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो रहे हैं। राज्य के मुख्यमंत्री पेमा खांडू के विरुद्ध भी कोई नामांकन नहीं हुआ। वह अरुणाचल के तवांग जिले की मुक्तो सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। वह इस सीट से चौथी बार निर्वाचित हो रहे हैं। इनमें से तीन बार वह निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं।

मुख्यमंत्री खांडू के अलावा ताली से जिक्के ताको, सागाली से रातू तेची, तलिहा से न्यातो डुकोम, और रोइंग विधानसभा सीट से से मुच्चू मीठी के विरोध में भी कोई प्रत्याशी नहीं खड़ा हुआ। ऐसे में मुख्यमंत्री खांडू के साथ ही यह भी निर्विरोध विधायक निर्वाचित होंगे। अभी चुनाव आयोग ने इस सम्बन्ध में औपचारिक घोषणा नहीं की है। गौरतलब है कि इसमें से न्यातो डुकम उस सीट से निर्विरोध जीते हैं जो राज्य के पूर्व कॉन्ग्रेसी मुख्यमंत्री नबाम तुकी की सीट रही है।

निर्विरोध निर्वाचित होने को लेकर पेमा खांडू ने कहा, “पांच विधानसभा क्षेत्रों में केवल एक नामांकन पत्र भरा गया है। हमें आशा है कि नाम वापसी के आखिरी दिन तक कुछ और सीटें इसमें जुड़ जाएँगी।” अरुणाचल में 30 मार्च, 2024 नामांकन वापस लेने की अंतिम तारीख है।

राज्य विधानसभा चुनावों के लिए भाजपा ने जहाँ सभी 60 प्रत्याशियों की घोषणा नामांकन से कुछ दिन पहले ही कर दी थी, वहीं कॉन्ग्रेस और NPP इस मामले में पिछड़ गईं। कॉन्ग्रेस ने राज्य में 60 विधानसभा सीटों में से मात्र 34 विधानसभा सीटों पर ही अपने प्रत्याशी घोषित किए। कॉन्ग्रेस ने अपने प्रत्याशियों की एक ही सूची जारी की और उसके बाद नामांकन की समय सीमा समाप्त हो गई।

इससे पहले 2019 के राज्य विधानसभा चुनाव में भाजपा ने प्रचंड बहुमत से जीत कर सरकार बनाई थी। तब राज्य की 60 सीटों में से भाजपा को 41 सीटें मिली थी। कॉन्ग्रेस ने इस चुनाव में भी मात्र 46 प्रत्याशी ही उतारे थे। कॉन्ग्रेस को यहाँ मात्र 4 सीटों पर विजय मिली थी। जदयू के भी राज्य में 15 में से 7 उम्मीदवार जीते थे जिन्होंने बाद में भाजपा का दामन थाम लिया था।

राज्य की अन्य पार्टी NPP ने विधानसभा चुनाव लड़ने और लोकसभा में भाजपा के उम्मीदवारों का समर्थन करने का निर्णय लिया है। मेघालय की सत्ता में काबिज NPP ने राज्य में 29 उम्मीदवार उतारे हैं। राज्य में दो लोकसभा की भी सीट हैं। इन दोनों सीटों पर भाजपा ने अपने प्रत्याशी रिपीट किए हैं। अरुणाचल प्रदेश पूर्वी से तापिर गाओ जबकि पश्चिमी सीट से केन्द्रीय मंत्री करें रिजीजू को फिर से उतारा गया है।

कॉन्ग्रेस ने भी इन दोनों सीट से अपने लोकसभा उमीदवार घोषित किए हैं। अरुणाचल प्रदेश पश्चिमी से पूर्व मुख्यमंत्री नबाम तुकी जबकि पूर्वी सीट से बोसिराम सीरम को उतारा गया है। राज्य इस बार भी भाजपा की सरकार बनने के कयास लग रहे हैं।


तड़पते चीन को पता होना चाहिए सामने अब नेहरू नहीं मोदी है, सेला सुरंग और दिव्यास्त्र का साफ़ संदेश समझो ; “पंगा मत लो”

 सुभाष चन्द्र

आज समाचार था कि शनिवार 9 मार्च को हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अरुणाचल प्रदेश के दौरे से जिनपिंग का चीन भड़क रहा है और विरोध जताते हुए चीन के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनबिन ने कहा है कि “जेंगनान (अरुणाचल प्रदेश) चीन का क्षेत्र है, भारत वहां की स्तिथि में बदलाव न करे, इससे सीमा का मसला और ज्यादा जटिल हो जाएगा”।

जिनपिंग अपने साथ MOU साइन की हुई कांग्रेस के साथ मिलकर जितना मर्जी षड़यंत्र रच ले लेकिन उसे एक बात समझ लेनी चाहिए कि सामने अब न नेहरू है और न तुमसे खौफ खाने वाली मनमोहन सिंह की सरकार है बल्कि तुमसे आंख में आंख डाल कर बात करने वाला मोदी है। अरुणाचल प्रदेश किसी के बाप की जागीर नहीं है जो हलवा समझ कर खा लोगे।

कांग्रेस समय के रक्षा मंत्री ए के अंटोनी ने संसद में कहा था कि हम चीन की सीमा पर सड़कें जानबूझकर नहीं बनाते क्योंकि उससे डर है कि चीनी सेना उन सड़कों से ही भारत में घुस सकती है, यह बेवजह का खौफ नहीं था बल्कि लगता है CPC-Congress के बीच 2008 में साइन हुए MOU की शर्त रही होगी कि चीन की सीमा पर भारत कोई Infrastructure का निर्माण  नहीं करेगा।

लेकिन पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार ने चीन की सीमा पर सड़कों का जाल बिछा दिया और हर क्षेत्र को भारतीय सेना की पहुंच में खड़ा कर दिया गया, किसी भी क्षेत्र में सेना की रसद भेजी जा सकती है, संवेदनशील क्षेत्रों में जिनमे गलवान भी शामिल है हर तरह सेना को मजबूत किया गया है जिसकी वजह से चीन आज आंख उठाने की हिम्मत नहीं करता, उसी अरुणाचल में शनिवार को भारत द्वारा चीन की सीमा से लगते हुए इलाके में 13000 फ़ीट ऊंचाई पर 825 करोड़ की लागत से बनाई गई “सेला सुरंग” को प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्र को समर्पित किया है जबकि कांग्रेस सरकार एक सड़क भी नहीं बनाती थी। 

यह सेला टनल असम के तेजपुर जिले को अरुणाचल प्रदेश के पश्चिमी कामेंग जिले से जोड़ती है जिससे पूरे वर्ष आवागमन जारी रहेगा और सेना की वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) तक पहुंच कायम रहेगी। यह चीन के लिए एक बड़ी चेतावनी है और शायद इसलिए कांग्रेस ने इस टनल बनने पर सरकार को बधाई नहीं दी है।

अभी 3 दिन पहले भारत ने चीन की छाती पर टनल बना कर शंखनाद किया था और कल DRDO ने अग्नि-5 का सफल परीक्षण कर चीन समेत दुनिया के सभी शक्तिशाली देशों को अपनी क्षमताओं का परिचय दे दिया। इस मिसाइल का नाम ही “दिव्यास्त्र” रखा गया है जिसका मतलब समझ आने से ही चीन को चेतावनी मिल जाएगी। 

इस मिसाइल के सफल परीक्षण से भारत अब अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, चीन और रूस जैसे देशों के बाद छठा देश बन गया जिसके पास एमआईआरवी तकनीक (मल्टीपल इंडेपेंडेंटली टार्गेटेबल री-एंट्री व्हीकल) पर आधारित मिसाइल सिस्टम है। इस मिसाइल से दुश्मन के कई ठिकानों को एक साथ निशाना बनाया जा सकता है। यूरोप के कुछ देशों समेत पूरा एशिया अग्नि-5 की जद में होगा यानी पूरा चीन भी। यह मिसाइल बड़ी बड़ी एंटी बैलिस्टिक मिसाइल सिस्टम को भी चकमा दे सकती है।

ये मोदी के 10 वर्षों की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है जो चीन और पाकिस्तान जैसे शत्रु देशों के लिए खतरे की घंटी है और कांग्रेस इन दोनों देशों की “मित्र पार्टी” है यानी भारत की शत्रु कांग्रेस भी है क्योंकि शत्रु का मित्र शत्रु ही होता है।

अरुणाचल प्रदेश : जहाँ से राहुल गाँधी ने शुरू की यात्रा, वहीं से कांग्रेस के आधे विधायक BJP में शामिल

                 न्याय यात्रा के बाद आधी कॉन्ग्रेस बीजेपी में हो गई शामिल (फोटो साभार : X_PemaKhanduBJP)
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी अपनी पार्टी को मजबूती देने के लिए भारत जोड़ो यात्रा के बाद अब भारत जोड़ो न्याय यात्रा निकाल रहे हैं। ये अलग बात है कि उनकी ‘न्याय’ यात्रा जिस राज्य में पहुँचती है, या जिस राज्य से गुजरती है, वहाँ पर न सिर्फ कांग्रेस बल्कि पूरे इंडी गठबंधन के लिए दिक्कतें शुरू हो जाती हैं। राहुल की यात्रा पूर्वोत्तर में जिस अरुणाचल प्रदेश से होकर गुजरी थी, महज एक दिन की यात्रा का असर ऐसा हुआ कि कांग्रेस पार्टी के आधे विधायक ही टूटकर पार्टी से अलग हो गए और बीजेपी में शामिल हो गए।

खास बात ये है कि अरुणाचल प्रदेश की विधानसभा में 60 सीटें हैं। इनमें से अब कांग्रेस के पास सिर्फ 2 विधायक ही बचे हैं और विपक्ष में कुल मिलाकर सिर्फ तीन विधायक। बाकी सभी विधायक सत्ता पक्ष में हैं, जिसमें से दो निर्दलीय विधायक भी हैं। नहीं समझे न? दरअसल, अरुणाचल प्रदेश में जब साल 2019 में विधानसभा चुनाव हुए थे, तो बीजेपी ने 41 सीटें जीती थी और दो तिहाई बहुमत से सरकार बनाई थी। इसके साथ ही जेडीयू ने 7 सीटें जीती थी। नेशनल पीपल्स पार्टी ने 5 विधानसभा सीटें जीती, तो कांग्रेस ने चार सीटें। वहीं, पीपल्स पार्टी ऑफ अरुणाचल ने भी एक सीट जीती थी। इसके अलावा 2 निर्दलीय विधायक थे।

इसके बाद अरुणाचल में जेडीयू के सभी विधायक बीजेपी में शामिल हो गए थे। पीपल्स पार्टी का विधायक भी बीजेपी में शामिल हो गया था। एनपीपी वैसे भी एनडीए का हिस्सा है। ऐसे में कांग्रेस के चार विधायक ही विपक्ष में बैठे थे। एक निर्दलीय विधायक बाद में टीएमसी में शामिल हो गए थे। कुल 5 विपक्षी विधायकों वाली अरुणाचल प्रदेश में अब कांग्रेस के दो ही विधायक बचे हैं, तो टीएमसी का एक। बाकी के दो निर्दलीय विधायक सरकार को समर्थन दे रहे हैं। इस तरह से राहुल गाँधी ने जिस अरुणाचल प्रदेश में अपनी न्याय यात्रा एक दिन निकाली, उस अरुणाचल प्रदेश में पार्टी के आधे विधायक ही बागी हो गए और वो बीजेपी में शामिल हो गए।

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रेमा खांडू ने खुद एक्स पर इस बात की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री निनॉन्ग एरिंग, जो पासीघाट पश्चिम सीट से कांग्रेस के विधायक हैं, वो अब बीजेपी में आ चुके हैं। उनके साथ ही बोरदुनिया-बोगापानी के कांग्रेस विधायक वांगलिन लोवांगडोंग ने भी बीजेपी की सदस्यता ले ली। इस दौरान एनपीपी के विधायक मुच्चू मीठी जो रोइंग सीट से विधायक हैं, और उनके साथी बसर सीट से विधायक गोकर बसर भी बीजेपी में शामिल हो गए। इस दौरान असम के मंत्री और अरुणाचल में बीजेपी के चुनाव प्रभारी अशोक सिंघल भी मौजूद रहे।

खैर, ये मामला सिर्फ अरुणाचल का ही नहीं है, बल्कि राहुल गाँधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा जिन राज्यों से गुजरी, या जिन राज्यों में पहुँची या पहुँचने वाली थी। यानी किसी भी तरह का जुड़ाव न्याय यात्रा से अगर था, तो वहाँ पार्टी ही नहीं, बल्कि इंडी गठबंधन को नुकसान ही हुआ है। अरुणाचल से लेकर असम तक विद्रोह हुआ, तो पश्चिम बंगाल में दीदी ममता ने आँखें दिखा दी। बिहार में इंडी गठबंधन के सूत्रधार ने ही इंडी गठबंधन को छोड़ दिया, तो उत्तर प्रदेश में जयंत चौधरी जैसे नेताओं ने भी राहुल गाँधी का हाथ झटक दिया। महाराष्ट्र में अशोक चौहान से लेकर बाबा सिद्दीकी तक ने झटका दिया, तो कांग्रेस को सहयोगी दलों के सामने भी घुटने टेकने पर मजबूर होना पड़ा है।

उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में उसे सपा की शर्तों पर लोकसभा चुनाव सिर्फ 17 सीटों पर लड़ना पड़ रहा है, तो पंजाब में इंडी गठबंधन में होने के बावजूद उसे आम आदमी पार्टी के खिलाफ अलग ही लड़ाई लड़नी पड़ रही है। वहीं, दिल्ली की सात में से 4 लोकसभा सीटें भी आप के लिए छोड़नी पड़ गई। ऐसे में समझ सकते हैं कि इंडी गठबंधन में कांग्रेस पार्टी को लगातार नुकसान पर नुकसान ही झेलना पड़ रहा है।

चीनी डील का डर! आखिर राहुल की ‘भारत न्याय यात्रा’ में अरुणाचल क्यों नहीं? क्या कांग्रेस अरुणाचल प्रदेश को देश का हिस्सा नहीं मानती?


2024 के आम चुनावों से पहले कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी एक और यात्रा पर निकलेंगे। इसका नाम ‘भारत न्याय यात्रा’ रखा गया है। 67 दिनों की यह यात्रा 14 राज्यों से गुजरेगी। उत्तर पूर्व के मणिपुर से शुरू होकर पश्चिम के मुंबई में खत्म होगी।

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी एक बार फिर यात्रा पर निकल रहे हैं। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी इस बार 14 जनवरी 2024 को भारत न्याय यात्रा शुरू कर रहे हैं। मणिपुर से मुंबई तक की करीब 6200 किलोमीटर लंबी इस यात्रा का समापन 20 मार्च को होगा। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के बेटे की यह यात्रा इस दौरान 14 राज्यों से गुजरेगी। कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल के अनुसार यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात से होकर महाराष्ट्र में खत्म होगी।

पूर्व से पश्चिम की दूरी नापने के इस क्रम में कांग्रेस की यह यात्रा अरुणाचल प्रदेश से नहीं गुजरेगी। अरुणाचल वह राज्य है जिसके हिस्सों पर चीन दावा ठोकता रहा है। यह भी दिलचस्प है कि कांग्रेस पर चीन के सुर में देश विरोधी प्रलाप करने के आरोप लगते रहे हैं।

27 दिसंबर 2023 को कांग्रेस महासचिव केसी वेणुगोपाल और जयराम रमेश ने मीडिया को भारत न्याय यात्रा के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि मणिपुर से मुंबई तक की करीब 6200 किलोमीटर की यह लंबी यात्रा 14 जनवरी 2024 को शुरू होगी। इसका समापन 20 मार्च को होगा। इस दौरान यात्रा 14 राज्यों से गुजरेगी।

वेणुगोपाल ने बताया कि यह यात्रा मणिपुर, नागालैंड, असम, मेघालय, पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और महाराष्ट्र में होगी। इन राज्यों के 85 जिलों से यात्रा गुजरेगी। इस यात्रा को भारत जोड़ो यात्रा की अगली कड़ी बताया जा रहा है। लेकिन इस बार कई बदलाव भी दिखेंगे। मसलन यह पूरी तरह पद यात्रा नहीं होगी। राहुल गाँधी एक विशेष बस के जरिए सफर करेंगे। इसमें वह कहीं कहीं पैदल भी चलेंगे और लोगों से मुलाक़ात करेंगे।

इसी तरह इस यात्रा का एजेंडा भी भारत जोड़ो यात्रा से अलग होगा। जयराम रमेश ने बताया कि भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल गाँधी ने 3 मुद्दे उठाए थे। ये थे- आर्थिक विषमता, सामाजिक ध्रुवीकरण और राजनीतिक तानशाही। लेकिन भारत न्याय यात्रा का मुद्दा आर्थिक न्याय, सामाजिक न्याय और राजनीतिक न्याय होगा।

भारत न्याय यात्रा को हरी झंडी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खडगे दिखाएँगे। इस यात्रा का निर्णय 21 दिसंबर 2023 को कॉन्ग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक में लिया गया था। राहुल गाँधी ने कांग्रेस वर्किंग कमिटी की इच्छा के चलते यह यात्रा करने का निर्णय लिया है।

‘भारत जोड़ो यात्रा‘ सितम्बर 2022 में तमिलनाडु से शुरू होकर 30 जनवरी 2023 को कश्मीर में खत्म हुई थी। 4500 किलोमीटर लंबी इस यात्रा के काफी हिस्सा मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे चुनावी राज्यों से होकर गुजरा था। लेकिन हाल में इन राज्यों के जब चुनावी नतीजे आए तो पता चला कि यात्रा कांग्रेस की स्थिति में सुधार लाने में कामयाब नहीं रही। राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनावों में पार्टी को करारी शिकस्त झेलनी पड़ी है। राजस्थान और छत्तीसगढ़ में उसे सत्ता खोनी पड़ी है तो मध्य प्रदेश में उसका सूपड़ा साफ हो गया है।

कश्मीर-अरुणाचल भारत का हिस्सा नहीं, किसान आंदोलन में पैसे झोंक देश को अस्थिर करना, चीनी कंपनियों का बचाव

                 न्यूज़क्लिक के फाउंजर प्रबीर पुरकायस्थ (फोटो साभार: न्यूज़क्लिक फ़ेसबुक/ इंडिया टुडे)
चीन से फंड लेकर देश में अराजकता को बढ़ावा देने वालों का साथ देने वाले न्यूज पोर्टल न्यूजक्लिक को लेकर चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं। पोर्टल के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ पर दर्ज एफआईआर में कहा गया है कि संस्थान ने कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश को विवादित बताया। इसके अलावा, कोरोना के खिलाफ भारत के प्रयासों को बदनाम करने की कोशिश और किसान आंदोलन को फंडिंग भी की गई। इस मामले में दिल्ली पुलिस ने न्यूज़क्लिक पोर्टल के खिलाफ आतंकवाद विरोधी कानून UAPA के तहत FIR दर्ज की है। इसमें कहा गया है कि संस्थान के धन का एक बड़ा हिस्सा भारत की संप्रभुता को बाधित करने और बड़ी आपराधिक साजिश के हिस्से के तहत देश में असंतोष पैदा करने के लिए चीन से आया था। चीन से आई फंडिंग में वहाँ की टेलीकॉम कंपनी Xiaomi और Vivo का बचाव करना भी शामिल था।

FIR में कहा गया है कि 2018 से मेसर्स पीपीके न्यूज़क्लिक स्टूडियो प्राइवेट लिमिटेड को करोड़ों रुपए की धनराशि प्राप्त हुई थी। अमेरिका की मेसर्स वर्ल्डवाइड मीडिया होल्डिंग्स एलएलसी एवं अन्य संस्थानों से पाँच साल की इस अवधि में अवैध तरीकों से इन पैसों को भेजा गया। FIR में आगे कहा गया है, “चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के प्रचार विभाग के सक्रिय सदस्य नेविल रॉय सिंघम द्वारा कई संस्थाओं के जरिए विदेशी धन को भेजा।”

एफआईआर में कहा गया है कि पुरकायस्थ 1991 से कुख्यात नक्सल समर्थक गौतम नवलखा के साथ जुड़े हुए थे। नवलखा एल्गार परिषद के मामले में भी आरोपित हैं। नेविल सिंघम द्वारा भेजा गया पैसा पुरकायस्थ और उनके सहयोगियों को अवैध रूप से भेजा गया था। इस राशि को पुरकायस्थ ने नवलखा और तीस्ता सीतलवाड़ के सहयोगियों को वितरित की थी।

एफआईआर में यह भी कहा गया है कि गुप्त सूचनाओं से पता चला है कि पुरकायस्थ, सिंघम और सिंघम की शंघाई स्थित कंपनी स्टारस्ट्रीम के कुछ कर्मचारियों ने ईमेल का आदान-प्रदान किया था, जो यह दिखाने की कोशिश कर रहे थे कि कश्मीर और अरुणाचल प्रदेश भारत के हिस्से नहीं हैं।

इतना ही नहीं, केंद्र की मोदी सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि बिलों के खिलाफ कथित किसानों के आंदोलन को भी फंडिंग की गई। इस दौरान आवश्यक सेवाओं की आपूर्ति को बाधित करने और संपत्तियों को नुकसान पहुँचाने के साथ-साथ किसानों के आंदोलन को लम्बा खींचने की साजिश रची गई। दिल्ली पुलिस ने FIR में कहा, “आरोपित कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा करना चाहते थे। उन्होंने कोविड-19 को रोकने के प्रयासों को बदनाम करने के लिए झूठी कहानी फैलाईं।”

इन सब कामों के लिए विदेशों से फंड को अवैध रूप से हजारों शेल कंपनियों के जरिए भारत भेजा गया। इसमें आगे कहा गया है कि पुरकायस्थ, सिंघम, हरिहरन और गौतम भाटिया ने शाओमी और वीवो जैसी चीनी कंपनियों से लाभ के बदले में इनके पक्ष में अभियान चलाने और कानूनी मामलों में बचाने के लिए एक कानूनी नेटवर्क बनाने की साजिश रची।

न्यूजक्लिक के खिलाफ 17 अगस्त 2023 को एक प्राथमिकी दर्ज की थी और 3 अक्टूबर 2023 को राजधानी और सात अन्य राज्यों में कई जगहों पर छापेमारी की गई थी। उसी दिन, न्यूज़क्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ और मानव संसाधन प्रमुख अमित चक्रवर्ती को गिरफ्तार कर लिया गया। गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम की धारा 13, 16, 17, 18 और 22-सी और आईपीसी की 153-ए और 120-बी के तहत मामला दर्ज किया गया था।