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‘अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून जल्द हो लागू’: नॉर्थ-ईस्ट की जनजातियों की रैली से भड़के ईसाई, अपने ही घर में अल्पसंख्यक हो रहे ‘डोनी पोलो’ को पूजने वाले

                  अरुणाचल प्रदेश में APFRA 1978 लागू करने की माँग ( साभार- NT, CM facebook)

अरुणाचल प्रदेश के 27 जिलों, 26 प्रमुख जनजातियों और 100 उप-जनजातियों का प्रतिनिधित्व करने वाले हजारों मूल निवासियों ने धर्मांतरण विरोधी अधिनियम (APFRA 1978) को लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। शनिवार (20 अक्टूबर 2025) को पारंपरिक कपड़ों में इन लोगों ने ईटानगर तक मार्च किया। राज्य के ईसाई इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं।

धर्मांतरण को रोकने के लिए 48 साल पहले अरुणाचल प्रदेश फ्रीडम ऑफ रिलीजन एक्ट 1978 लागू हुआ था।

ईसाइयत के प्रचार- प्रसार की वजह से अरुणाचल के मूल निवासी यहाँ अल्पसंख्यक होते जा रहे हैं। ये लोग डोनी पोलो की पूजा करते हैं, जहाँ ‘डोनी’ का अर्थ है ‘सूर्य’ और ‘पोलो’ का अर्थ है ‘चंद्रमा’। ये वे सिंबल हैं, जिस पर अरुणाचल प्रदेश के लोगों की आस्था है।

                                                                                                                                 साभार- TOI

डोनी पोलो, ईसाई धर्म और हिंदू धर्म के अलावा, अरुणाचल प्रदेश में महायान और थेरवाद बौद्ध धर्म के अनुयायियों की भी अच्छी खासी तादाद है।

इंडिजिनस फेथ एंड कल्चरल सोसाइटी ऑफ अरुणाचल प्रदेश (IFCSAP) के अध्यक्ष एमी रूमी ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि स्वदेशी आस्था को मानने वालों ने राज्य के स्वदेशी विश्वास और परंपरा को बचाने के लिए अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम (एपीएफआरए) को पूरी तरह लागू करने की माँग को लेकर रैली निकाली। उन्होंने कहा कि इस कानून को 1978 में तत्कालीन राष्ट्रपति की मंजूरी भी मिल गई थी, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं किया गया है।

रूमी ने कहा, “अगर यह कानून लागू होता है, तो हमारी संस्कृति, परंपरा और धार्मिक पहचान की रक्षा हो पाती।”

                                                                                                                          साभार- इंडिया टुडे

प्रदर्शनकारियों को संबोधित करते हुए वकील आर.एस. लोडा ने कहा, “हम नहीं चाहते कि अरुणाचल प्रदेश मिजोरम या नागालैंड की तरह अपनी मूल पहचान खो दे, जहाँ विदेशी धर्म के प्रचार- प्रसार के कारण स्थानीय मान्यताएँ नष्ट हो गई हैं।”

अरुणाचल प्रदेश में धर्मांतरण विरोधी कानून लागू करने की माँग करने वालों का कहना है कि यह कानून किसी भी धर्म या संप्रदाय के खिलाफ नहीं है, बल्कि यह केवल ‘जनजातीय समुदाय को प्रलोभन या लालच देकर हो रहे धर्मांतरण से बचाता है’।

अरुणाचल प्रदेश के स्वदेशी आस्था और सांस्कृतिक समाज (IFCSAP) के एक प्रतिनिधिमंडल ने गृह मंत्री मामा नटुंग से मुलाकात की और अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम, 1978 (APFRA) को तत्काल लागू करने का आग्रह किया। उन्होंने राज्य की स्वदेशी आस्था, संस्कृति और आदिवासी पहचान की रक्षा के लिए इस अधिनियम को लागू करने पर जोर देते हुए एक ज्ञापन सौंपा।

इनका कहना है कि बाहरी प्रभावों से अरुणाचल की संस्कृति पर संकट मंडरा रहा है। इसे संरक्षित करने और जनजातीय विरासत को बचाने के लिए कानून का लागू करना जरूरी होता जा रहा है। गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों में राज्य में ईसाई आबादी और धर्मांतरण गतिविधियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है।

1971 की जनगणना के मुताबिक, अरुणाचल प्रदेश में ईसाई आबादी 0.79% थी, जो 2011 की जनगणना में 30.26% हो गई। 1971 में अन्य धर्मों और मतों (ORP) का हिस्सा 63.46% था, जबकि 2011 की जनगणना में यह 26.20% रह गया।

1971 में हिंदुओं की आबादी 22% थी और 2011 में यह 29.04% हो गई। 1971 की जनगणना में बौद्धों की आबादी लगभग 13% थी, लेकिन 2011 में यह घटकर 11.77% रह गई। वहीं, मुसलमानों की आबादी 1971 में 0.18% थी, जो बढ़कर 2011 की जनगणना में 1.95% हो गई।

ईसाई APFRA का कर रहे विरोध

अरुणाचल क्रिश्चियन फोरम (ACF) APFRA कानून का विरोध कर रहा है। फोरम के अध्यक्ष तारह ​​मिरी का तर्क है कि ‘धर्मांतरण विरोधी कानून धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है और ईसाइयों को निशाना बनाता है।” फरवरी 2025 में ACF ने धर्मांतरण विरोधी कानून के विरोध में 8 घंटे की भूख हड़ताल किया था।

नागा बैपटिस्ट चर्च काउंसिल के महासचिव रेव जेलहोउ कीहो ने जनवरी 2025 में मुख्यमंत्री पेमा खांडू को एक पत्र लिखा था और दावा किया था कि APFRA का उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि ईसाइयों का दमन करना है।

पत्र में कीहो ने लिखा, “APFRA का असली उद्देश्य पारंपरिक धर्म का संरक्षण करना नहीं, बल्कि उस समय के एक खास धार्मिक समूह का दमन करना था… इस आधार पर यह अधिनियम असंवैधानिक है। उस वक्त आपके लोग और क्षेत्र इस विधेयक का विरोध कर रहे थे, लेकिन देश के हालात बहुत बदल गए हैं। अब आपके लोगों, खासकर आपके राज्य के ईसाईयों का क्या होगा।”

पत्र में आगे कहा गया है, “हमें यह बताने की ज़रूरत नहीं है कि देश के अन्य हिस्सों में ईसाइयों को बेवजह सताने के लिए इस कानून (धर्मांतरण विरोधी कानून) का कैसे दुरुपयोग किया जाता है। हमारी व्यावहारिक समझ हमें बताती है कि आपके शांतिप्रिय लोगों के साथ भी यही होगा, और यह पूरे क्षेत्र में फैल जाएगा।”

मुख्यमंत्री खांडू ने परंपराओं के संरक्षण की बात कही

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने राज्य की स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और परंपराओं को संरक्षित करने की भाजपा सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई। उन्होंने इन्हें जनजातीय समुदायों की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आत्मा बताया।
मुख्यमंत्री ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा किया। इसमें उन्होंने विस्तार से बताया कि स्वदेशी आस्थाओं को संरक्षित करना क्यों आवश्यक है। उन्होंने कहा कि प्रमुख धर्मों के विपरीत, स्वदेशी आस्थाएँ “किताबों से नहीं, बल्कि ज़मीन, स्मृति और जीवित परंपराओं से आती हैं। ये बाहर से थोपी नहीं जाती, बल्कि इसकी जड़ें हजारों सालों से जमी हुई हैं। ये हमारे लोगों, हमारे जंगलों, पहाड़ों, नदियों और पूर्वजों की आत्मा को संजोए हुए हैं।”
स्वदेशी आस्थाओं को बढ़ावा देने और संरक्षित करने के लिए, मुख्यमंत्री खांडू ने आदि, गालो, न्यीशी और तांगसा जनजातियों के लिए 6 स्वदेशी गुरुकुल, 3,000 से अधिक पंजीकृत पुजारियों के वेतन, सभी जिलों में जनजातीय सांस्कृतिक केंद्र और राज्य भर में 50 स्वदेशी केंद्रों की स्थापना की घोषणा की।
दिसंबर 2024 में मुख्यमंत्री खांड स्वदेशी मामलों के विभाग का नाम बदलकर स्वदेशी आस्था और संस्कृति कर दिया। उन्होंने इसे ‘स्वदेशी परंपराओं की समृद्ध विरासत के संरक्षण, संवर्धन और सुरक्षा की प्रतिबद्धता की दिशा में एक कदम’ बताया।

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम क्या है?

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम अक्टूबर 1978 में अस्तित्व में आया था। इसका उद्देश्य ‘ताकत, लालच या धोखा देकर होने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाना’ था। भारत के राष्ट्रपति ने इसे मंजूरी दे दी थी।

राज्य में कई ‘स्वदेशी आस्थाओं’ की पहचान की गई। इनमें बौद्ध धर्म (मोनपा, मेम्बा, शेरदुकपेन, खम्बा, खम्पती और सिंगफो द्वारा प्रचलित), वैष्णव धर्म (नोक्टेस द्वारा प्रचलित), आका और प्रकृति पूजक (दुन्यी-पोलो के उपासकों सहित) शामिल हैं।

अरुणाचल प्रदेश धर्म स्वतंत्रता अधिनियम की धारा 3 में स्पष्ट रूप से कहा गया है – “कोई भी व्यक्ति किसी व्यक्ति को बल प्रयोग, प्रलोभन या किसी कपटपूर्ण तरीके से, प्रत्यक्ष रूप से या अन्यथा, एक धार्मिक आस्था से दूसरी धार्मिक आस्था में परिवर्तित नहीं करेगा या परिवर्तित करने का प्रयास नहीं करेगा और न ही कोई व्यक्ति ऐसे किसी धर्मांतरण के लिए उकसाएगा।”

कानून में आगे कहा गया है कि धारा 3 का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति पर ₹10,000 तक का जुर्माना और अधिकतम 2 वर्ष तक की कैद की सजा हो सकती है।

यह अधिनियम किसी व्यक्ति के धर्मांतरण के बारे में संबंधित जिले (अरुणाचल प्रदेश में) के जिलाधिकारी को सूचित करने का भी आदेश देता है। ऐसा न करने पर 1 वर्ष तक की कैद और ₹1000 तक के जुर्माने का प्रावधान है।

कानून की धारा 6 में कहा गया है कि इस अधिनियम के तहत अपराध को संज्ञान में लिया जाएगा और पुलिस निरीक्षक से नीचे के अधिकारी इसकी जाँच नहीं करेंगे। अधिनियम के तहत अभियोजन के लिए पुलिस उपायुक्त की पूर्व अनुमति या अतिरिक्त सहायक आयुक्त से नीचे के पद के अधिकारी से सत्यापित कराने की आवश्यकता होती है।

धर्मांतरण विरोधी कानून के कार्यान्वयन के लिए अरुणाचल प्रदेश सरकार द्वारा नियम बनाने की माँग करते हुए गुवाहाटी हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका (पीआईएल) दायर की गई थी। इस मामले में बड़ी सफलता सितंबर 2024 में मिली।

न्यायमूर्ति कर्दक एटे और न्यायमूर्ति बुदी हाबुंग की खंडपीठ ने महाधिवक्ता आई. चौधरी के जवाब की जाँच के बाद जनहित याचिका को बंद कर दिया। सरकार ने कोर्ट को बताया है कि इसके नियमों को सूचीबद्ध करने के लिए 6 महीने का वक्त चाहिए।

गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने 30 सितंबर 2024 को अपने आदेश में कहा, “हम उम्मीद करते हैं कि संबंधित अधिकारी अपने दायित्वों के प्रति सचेत रहेंगे और मसौदा नियमों को आज से 6 (छह) महीने की अवधि के भीतर अंतिम रूप दे दिया जाएगा।”

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री खांडू पहले ही स्पष्ट कर चुके हैं कि गुवाहाटी उच्च न्यायालय के निर्देश के अनुसार, सरकार को छह महीने के भीतर मसौदा नियम तैयार करना है। यह समय सीमा अक्टूबर 2025 में समाप्त हो रही है।

यह अत्यंत आवश्यक है कि राज्य सरकार धार्मिक जनसांख्यिकी की रक्षा और स्वदेशी आस्थाओं एवं परंपराओं के संरक्षण के लिए एपीएफआरए या धर्मांतरण-विरोधी कानून लागू करे। हालाँकि ईसाई समूह इस कानून को अपनी धार्मिक पहचान पर हमले के रूप में देख रहे हैं। उन्हें ये समझने की जरूरत है कि एपीएफआरए अगर लागू होता है, तो यह ताकत से, प्रलोभन से या किसी झाँसे में आकर किए जा रहे धर्मांतरण के खिलाफ होगा।

मध्य प्रदेश : कांग्रेस की हिंदू विरोधी साजिश, उमंग सिंघार ने जनजातीय समुदाय को बताया हिंदुओं से अलग; सोनिया गाँधी को खुश करने के लिए ‘क्रॉस’ लटकाने का पाप

       कॉन्ग्रेस नेता उमंग सिंघार ने कहा कि जनजातीय समाज हिंदू नहीं है (साभार: Facebook-umang singhar)
मध्य प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस नेता उमंग सिंघार ने विवादित बयान दिया है। सिंघार ने कहा कि जनजातीय समाज हिंदू नहीं है। अब इस बयान पर राजनीतिक हलचल तेज हो गई। बीजेपी ने भी इस बयान पर कांग्रेस को घेरा है।

दरअसल, नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने छिंदवाड़ा में मध्य प्रदेश जनजातीय समाज विकास परिषद की बैठक के दौरान यह बयान दिया। उन्होंने कहा, “मैं गर्व से कहता हूँ कि हम जनजातीय हैं, हिंदू नहीं। मैं यह बात कई सालों से कहता आ रहा हूँ।”

उमंग सिंघार ने आगे कहा, “शबरी, जिन्होंने भगवान राम को बचा हुआ बेर खिलाया था, वह भी जानजातीय समुदाय से थे। जो आदिकाल से वास कर रहे हैं, वही जनजातीय हैं। हमें हमारे समाज को अपनी पहचान दिलानी होगी। चाहे सरकार कोई भी हो, उसे जनजातीय समाज का मान-सम्मान बनाए रखना होगा।”

सीएम मोहन यादव ने कांग्रेस पर साधा निशाना

सिंघार के इस बयान पर प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने कहा कि कांग्रेस हमेशा हिंदू और हिंदुत्व के विरोध में ही काम करती है। मुख्यमंत्री ने कहा, “राहुल गाँधी ने हिंदुत्व का मजाक बनाया। अब उमंग सिंघार कह रहे हैं आदिवासियों में हिंदुत्व नहीं है।”

सीएम ने आगे कहा, “कमाल हो गया, शर्म आती है। ऐसा नहीं होना चाहिए। राजनीति जरूर करो लेकिन हिंदुत्व पर प्रश्न उठाना, ये जनता माफ नहीं करेगी।”

आदिवासियों के गले में क्रॉस लटकाने का पाप मत करो: BJP नेता

उमंग सिंघार के ‘जनजातीय समाज हिंदू नहीं’ वाले बयान को लेकर बीजेपी विधायक रामेश्वर शर्मा ने कहा, “जनजातीय समाज के गले में क्रॉस लटकाने और सोनिया गाँधी को खुश करने के लिए उमंग जी पाप मत करो। हिंदुस्तान आपसे नाराज हो जाएगा। जनजातीय हमारी सभ्यता के ध्वजवाहक हैं।”

बीजेपी विधायक ने आगे कहा, “आजादी की लड़ाई में लोहा लेने वाला आदिवासी समाज, जय जोहार का जयकारा लगाने वाला समाज, बड़े देव को पूजने वाला आदिवासी समाज हमारी आत्मा है।”

मध्य प्रदेश में जनजातीय समाज धर्मांतरण को मजबूर

मध्य प्रदेश में जनजातीय समाज धर्म परिवर्तन की समस्या से जूझ रहा है, जहाँ मुख्य रूप से ईसाई मिशनरी सामाजिक सेवाओं, शिक्षा और आर्थिक सहायता के बहाने धर्मांतरण को बढ़ावा देते हैं। ऐसे कई मामले अब तक सामने आए हैं।

दमोह जिले के हटा ब्लॉक के सूरजपुरा गाँव में ईसाई मिशनरियों ने गाँव के कई लोगों को बहकाकर धर्म परिवर्तन करवा दिया। यहाँ गाँव के कई परिवारों ने धर्म बदलकर ईसाई नाम रख लिए थे, जिसके बाद गाँव के अन्य लोगों ने इनका विरोध किया था।

इससे सटे छतरपुर जिले के भारतीपुरा गाँव में भी ऐसा ही मामला सामने आया था। यहाँ भील समाज के लोगों को पैसों का लालच देकर ईसाई धर्म में परिवर्तित किया गया। गाँव के 8 परिवारों ने धर्म परिवर्तन कर लिया।

गुना जिले में दो ईसाई दंपति रुठियाई क्षेत्र में प्रार्थना सभाएँ आयोजित कर लोगों का ब्रेनवॉश करते पकड़े गए। यहाँ लोगों को धर्म परिवर्तन का दबाव बनाया जा रहा था। हिंदू संगठन की पुलिस शिकायत के बाद मामला उजागर हुआ था।

राँची : ‘जिन्होंने बदला धर्म उनको ST से बाहर करो’: अब दिल्ली आने को तैयार हैं जनजातीय समाज के लोग, क्रिसमस से पहले हुआ था जुटान

डी लिस्टिंग की मांग को लेकर राँची में जुटे जनजातीय समाज के लोग (फोटो साभार: टीओआई)
डी लिस्टिंग यानी धर्मांतरण कर ईसाई अथवा मुस्लिम बनने वाले जनजातीय समाज के लोगों को अनुसूचित जनजाति (ST) के दायरे से बाहर करने को लेकर देशव्यापी आंदोलन चल रहा है। फरवरी 2024 में जनजातीय समाज के लोग अपनी माँगों के समर्थन में दिल्ली में जुट सकते हैं। क्रिसमस से ठीक पहले 24 दिसंबर 2023 को झारखंड की राजधानी राँची में जुटान कर वह अपना इरादा जता चुके हैं।

अनुसूचित जनजाति के लोगों का यह अभियान जनजाति सुरक्षा मंच (JSM) के बैनर तले चल रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार इस अभियान को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) और अन्य हिंदुवादी संगठनों का भी समर्थन हासिल है। इसी रिपोर्ट में देशभर के जनजातीय समाज के लोगों का दिल्ली में फरवरी में जुटान होने की बात कही गई है। हालाँकि इसकी तारीख अभी तय नहीं हुई है।

जनजातीय समाज के लोगों का कहना है कि धर्मांतरण करने वाले लोग ST का लाभ उठाकर उनके अधिकार को छीन रहे हैं। उनके अनुसार ईसाई बनने वाले ST बीते 75 साल से अनुसूचित जनजाति को मिलने वाले आरक्षण लाभ का 80 फीसदी फायदा उठा रहे हैं। जेएसएम का कहना है कि ईसाइयों अथवा मुस्लिमों का एसटी आरक्षण पर अधिकार नहीं हैं। लेकिन वे जनजातीय समाज के लोगों को मिले संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं।

इन्हीं माँगों के समर्थन में जनजातीय समाज के करीब 5000 लोगों का जुटान क्रिसमस से ठीक पहले 24 दिसंबर 2023 को राँची के मोरहाबादी मैदान में हुआ। उलगुलान आदिवासी डीलिस्टिंग नमक इस महारैली का आयोजन JSM की ओर से किया गया था। झारखंड के अलग-अलग हिस्सों से आए अनुसूचित जनजाति समाज के लोगों ने पारंपरिक पोशाकों और तीर-धनुष जैसे पारंपरिक हथियारों के साथ इस रैली में शिरकत की थी।

जनजातीय समाज के लोगों की डी-लिस्टिंग की डिमांड नई नहीं है। मुंडा ने बताया कि राँची की तरह ही नागपुर, नासिक, मुंबई जैसे कई जगहों पर इन्हीं माँगों को लेकर जनजातीय समाज के लोगों का जुटान हो चुका है। वहीं जेएसएम के राष्ट्रीय सह संयोजक राजकिशोर हांसदा ने कहा कि भारतीय संविधान के निर्माताओं ने देश के 700 से अधिक जनजातीय समूहों के अधिकारों की रक्षा के लिए बेहतरीन कोशिशें की थीं, लेकिन ये फायदा मुट्ठी भर उनलोगों को मिल रहा है जो धर्म बदल चुके हैं। जिन्हें चर्च का समर्थन हासिल है।

उम्र 3 महीने और नाम BAP(भारत आदिवासी पार्टी)… भाजपा की जीत के बीच 4 विधायक वाली पार्टी; जाति आधारित पार्टियों के लिए खतरे की घंटी

BAP के संस्थापक राजकुमार रोत जीत के बाद अपने समर्थकों के साथ
राजस्थान में हुए विधानसभा चुनाव में भाजपा ने बड़ी जीत दर्ज की। 200 सदस्यीय विधानसभा में अब जहाँ भाजपा के 115 विधायक होंगे, वहीं अब तक सत्ता में रही कांग्रेस 69 पर सिमट गई है। इसी तरह मध्य प्रदेश में भाजपा ने 163 सीटें जीत कर कांग्रेस को मात्र 66 पर समेट दिया। वहीं इस बीच एक तीसरी पार्टी BAP (भारत आदिवासी पार्टी) की भी सफलता के चर्चे हैं। BAP ने राजस्थान के चुनाव में 3 सीटें और मध्य प्रदेश में 1 सीट अपने नाम कर ली हैं।

इस पार्टी ने धरियावद, असपुर और चौरासी विधानसभा सीटें अपने नाम की हैं। इतनी सीटें बसपा या फिर RLD को भी नहीं मिली हैं जो वहाँ पहले से जमी-जमाई पार्टियाँ हैं। इस दल का गठन विधानसभा चुनाव से 3 महीने पहले ही हुआ था। दिल्ली और पंजाब में जिस AAP की सत्ता है, उसके पूरा जोर लगाए जाने के बावजूद उसका एक भी उम्मीदवार राजस्थान में नहीं जीता लेकिन BAP ने 3 सीटें अपने नाम कर लीं। हालाँकि, ऐसे दलों का उभरना भाजपा और कॉन्ग्रेस के लिए नुकसानदेह ही है, क्योंकि जनजातीय समाज के बीच आगे जाकर ये पैठ बना सकते हैं।

BAP ‘भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP)’ से निकली है। कुछ जनजातीय समाज के नेताओं ने BPP को तोड़ कर BAP का गठन किया। BTP भी ज़्यादा पुरानी पार्टी नहीं हैं, इसका गठन 6 वर्ष पूर्व ही हुआ था। राजस्थान-मध्य प्रदेश के जनजातीय समाज के प्रभाव वाले इलाकों में इन्होंने छाप छोड़ी और कांग्रेस-भाजपा को कड़ी टक्कर दी। इन दोनों राज्यों के अलावा गुजरात और महाराष्ट्र के भी कई कार्यकर्ता BAP में शामिल हुए हैं। पार्टी ने 27 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे।

राजस्थान के डूंगरपुर स्थित चौरासी विधानसभा क्षेत्र के विधायक राजकुमार रोत और वहीं के सागवाड़ा के विधायक रहे रामप्रसाद डिंडोर ने मिल कर इस पार्टी को शुरू किया था। रोत ने दावा किया कि BTP को कांग्रेस-भाजपा ने हाईजैक कर लिया था, इसीलिए उन्हें अलग होना पड़ा। BAP जनजातीय समाज को शिक्षा-स्वास्थ्य जैसी सुविधाएँ देने के अलावा प्रदूषण से लड़ने और ग्रीन एनर्जी को बढ़ावा देने के लिए भी आवाज़ उठाने का दावा करती है।

BAP खुद को पर्यावरण फ्रेंडली पार्टी बताती है। वो कहती है कि उसका लक्ष्य है जल, जंगल, जमीन, जनजातीय समाज और प्रकृति के लिए काम करना। BAP ने 12 राज्यों की 250 सीटों पर अपनी उपस्थिति बना ली है। 32 वर्षीय राजकुमार रोत युवा हैं और 2018 राजस्थान विधानसभा चुनाव में चुने जाने वाले सबसे युवा विधायक थे। इस बार उन्होंने 66,166 वोटों से बड़ी जीत दर्ज की है। वहीं रतलाम के सैलाना सीट से कमलेश्वर डोडियार ने जीत दर्ज की है।

उन्होंने कर्ज लेकर चुनाव लड़ा था। वो राजनीति में आने के लिए 2 बार सरकार नौकरी छोड़ चुके हैं। उन्होंने कोटा में मजदूरी तक की। चंदा लेकर चुनाव लड़ा। वो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा को प्रेरणा मानते हैं। उज्जैन के विक्रम विश्वविद्यालय से पढ़े कमलेश्वर डोडियार के जीवन में ऐसे हालात भी आए जब उन्हें माँग कर भोजन करना पड़ा। वो पेशे से वकील हैं और दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) से LLB भी कर रहे हैं। उन्होंने कांग्रेस के हर्ष विजय गहलोत को हराया है। उन पर बलात्कार का मामला भी है, जिसके लिए वो जेल जा चुके हैं।

हालाँकि, उनका कहना है कि ये कांग्रेस विधायक से जुड़े लोगों की साजिश थी जिसके तहत लड़की से उनकी सगाई तय हुई और फिर तोड़ दी गई। उन्होंने बताया कि उनकी राजनीति खत्म करने के लिए ये मामला दर्ज कराया गया था और नामांकन से 8 दिन पहले वो छूटे। उन्होंने कहा कि अगर भाजपा उन्हें मंत्री बनाती है तो लोकसभा चुनाव में जनजातीय समाज के क्षेत्रों में पार्टी के लिए काम करूँगा। उन्होंने कहा कि वो भाजपा नेतृत्व से मिल कर अपनी बात रखेंगे।

SC/ST-OBC के नाम पर हिंदुओं को तोड़ने को ‘जय भीम-जय मीम’ को PFI ने बनाया हथियार

PFI की जय भीम-जय मीम रणनीति (प्रतीकात्मक चित्र, साभार: Bhim_army_india_boys_and_girls, इंस्टाग्राम)
पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) को लेकर लंबे समय से जो बातें कही जा रही थीं, वे पटना पुलिस की छापेमारी में बरामद हुए दस्तावेजों को देखने के बाद सच साबित हो रही हैं। PFI ना सिर्फ देश को इस्लामिक मुल्क बनाना चाहता है, बल्कि इसके लिए वह हिंदू समाज में हर तरह से दरार पैदा करने की कोशिश भी करने की साजिश पर काम कर रहा था।

आज भारत में ‘जय भीम, जय मीम’ को जो नारा मुस्लिम नेताओं द्वारा बोले जा रहे हैं, इसकी पूरी पोल-पट्टी ने PFI के कार्यालय या कहें कि ट्रेनिंग सेंटर से बरामद हुए दस्तावेजों ने खोलकर रख दी है।

‘इंडिया विज़न 2047’ नाम के दस्तावेज़ में पीएफआई ने ‘कायर हिंदुओं’ पर पूरी तरह से हावी होने के लिए जो रूप-रेखा बनाई है, उसमें ST/ST/OBC के मन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रति नफरत भरकर उन्हें अपनी तरफ मिलाना शामिल है।

दस्तावेज़ में कहा गया है, “हमें यह दिखाकर आरएसएस और एससी/एसटी/ओबीसी के बीच एक विभाजन पैदा करने की जरूरत है कि आरएसएस केवल उच्च जाति के हिंदुओं के हित की बात करने वाला संगठन है।”

पीएफआई का कहना है कि पार्टी (PFI) को एससी/एसटी/ओबीसी समुदाय के साथ घनिष्ठ गठबंधन बनाना चाहिए और चुनाव में कम-से-कम कुछ सीटें जीतनी चाहिए। PFI जो गठबंधन बनाना चाहता है, उसमें 50% मुस्लिमों की हिस्सेदारी और 10% एससी/एसटी/ओबीसी की हिस्सेदारी होगी।

हिन्दुओं को जाति एवं वर्ग के आधार पर विभाजित करने का जो मुस्लिम कट्टरपंथियों द्वारा प्रयास किया जाता रहा है, किसी भी हिन्दू नेता, चाहे वह किसी भी पार्टी से हों, ने इन षडयंत्रकारियों से यह पूछने का साहस नहीं किया कि हिन्दुओं में अनेक जातियां होने के बावजूद एक ही मंदिर एवं शमशान में जाने की कोई रोकधाम नहीं, विपरीत इसके मुसलमानों में स्थिति एकदम भिन्न है; शिया, सुन्नी, वहाबी आदि अनेकों जातियां होने पर सिर्फ इस्लाम के नाम पर एकता है, लेकिन  कोई किसी दूसरे की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने, निकाह करने एवं एक ही कब्रिस्तान में मुर्दा दफ़न करने की इजाजत नहीं। ऐसा हिन्दू नेता इसलिए नहीं पूछ सकते क्योकि कुर्सी एवं अपनी तिजोरी भरने के लिए जाति आधारित पार्टियां बनाई हुई हैं, और इन कुर्सी के भूखे नेताओं के कारण हिन्दू विरोधी हिन्दुओं को जातियों आधार पर विभाजित करते रहते हैं और मुर्ख हिन्दू इन षडयंत्रकारियों के चक्रव्यू में फंस एक-दूसरे के दुश्मन बन रहे हैं।

     

PFI के बरामद दस्तावेज में कहा गया है, “पार्टी (PFI) को ‘राष्ट्रीय ध्वज’, ‘संविधान’ और ‘अंबेडकर’ जैसी अवधारणाओं का उपयोग इस्लामी शासन स्थापित करने के वास्तविक इरादे को ढाल के रूप में और अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/ओबीसी तक पहुँचने के लिए करना चाहिए।”

पीएफआई एक विशुद्ध मुस्लिम पार्टी की आवश्यकता को आगे बढ़ाने के लिए सभी ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों को बदनाम करने की बात करता है। उसका कहना है कि इससे मुस्लिमों और एससी/एसटी/ओबीसी की जरूरतें पूरा होंगी।

PFI का मकसद साफ है कि इस्लामी शासन स्थापित करने के लिए एससी/एसटी/ओबीसी का इस्तेमाल करना चाहिए। संगठन का कहना है कि 50% एससी/एसटी/ओबीसी का विश्वास भी हासिल करना चाहिए और उनके प्रतिनिधि के रूप में भी उभरना चाहिए। उसका मानना है कि अगर वह इस समर्थन को हासिल कर लेता है तो उसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर सत्ता हथियाना काफी आसान होगा।

डॉक्यूमेंट आगे कहता है, “जब हमारे पास पर्याप्त प्रशिक्षित कैडर और हथियारों का भंडार हो जाएगा तो हम इस्लामी सिद्धांतों पर आधारित एक नए संविधान की घोषणा करेंगे। इस समय बाहरी ताकतें भी हमारी मदद के लिए आ जाएँगी। हमारे विरोधियों का व्यवस्थित और व्यापक रूप से सफाया होगा और इस्लामी गौरव की वापसी होगी।”

आदिवासियों का काम करने के लिए भेजो खराब ऑफिसर: AAP सांसद राघव चड्ढा

अरविन्द केजरीवाल ने सियासत(राजनीति नहीं) में आने पर कहा था कि "हम राजनीति बदलने आये हैं", जो फ्री के लॉलीपॉप देकर सत्ता हथियाने में सफल जरूर हो गए, लेकिन ओछी मानसिकता की बुनियाद पर बनी आम आदमी पार्टी की समय-समय पर सामने आती रही है, जिसे खुले दिमाग से जनता को समझना होगा। जिसका कोई न कोई नेता राशन कार्ड(यौन शोषण), हवाला, हिन्दू विरोधी दंगों आदि आरोपों में लिप्त नज़र आ रहा है, परन्तु केजरीवाल उन पर कोई कार्यवाही करने का साहस नहीं कर पा रहे, हाँ अगर वही काम भाजपा शासित राज्य में होने पर सड़क पर उतर उस राज्य में पिकनिक मनाने पहुँच जाते हैं। 
अब इसी पार्टी आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा का जनजातीय समाज के प्रति घटिया सोच सामने आई है। दरअसल राघव चड्ढा का एक बयान सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। इसमें वह आदिवासी जनजाति के लिए अपमान भरे लहजे का इस्तेमाल करते हुए दिखाई दे रहे हैं। इसमें वह कह रहे हैं कि घटिया अफसरों को आदिवासी मंत्रालय भेजा जाए।

भाजपा अनुसूचित जनजाति मोर्चा ने इसका वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “यह देखिए आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद राघव चड्ढा की जनजातीय समाज के खिलाफ ओछी मानसिकता।”

इस वीडियो में राघव चड्ढा कहते हुए सुनाई दे रहे हैं, “आप किसी बाबू (अधिकारी) को नौकरी से तो निकाल नहीं सकते। ट्रांसफर-पोस्टिंग ही कर सकते हो। अगर कोई बहुत अच्छा काम कर रहा है तो उसे अच्छा विभाग दो… जैसे कि उसे स्वास्थ्य सचिव बनाओ, गृह सचिव बनाओ और जो खराब काम कर रहा है उसे भेजो जनजातीय विभाग में। ये पनिशमेंट पोस्टिंग है उसका। उसे या तो बागवानी या फिर पशुपालन विभाग में भेजो।”

इस पर लोगों ने तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ दी हैं। राघव चड्ढा के इस बयान पर लोग आपत्ति जता रहे हैं। एक यूजर ने लिखा, “आप आदिवासी को हीन भावना से क्यों देखते हो अरविंद केजरीवाल जी..!! आप उनसे नफरत क्यों करते हो..?? क्या बिगाड़ा है इन निर्दोष जनजातियों ने आपका।”

एक अन्य यूजर ने लिखा, “उनका बयान आदिवासी विभाग का अपमान है, जो कि बेहद महत्वपूर्ण विभाग है। उन्हें अपनी टिप्पणी के लिए माफी माँगनी चाहिए।”

एक यूजर ने इस पर हैरानी जताई कि आखिर राघव चड्ढा इस तरह से कैसे बोल सकते हैं।

AAP की प्रेस कॉन्फ्रेंस और ‘राघव चड्ढा चोर है’

पिछले दिनों पंजाब चुनाव से पहले AAP नेता टिकट बँटवारे को लेकर आपस में भिड़ गए थे। इस दौरान खूब लात-घूँसे चले थे। आम आदमी पार्टी में इस अंदरूनी बवाल से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर खूब शेयर किए गए थे। वायरल हो रहे वीडियो में पार्टी के नेताओं को जालंधर प्रेस क्लब में एक-दूसरे को धक्का देते और मारपीट करते देखा गया था।
दरअसल प्रेस क्लब में राघव चड्ढा की प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान कॉन्ग्रेस के पूर्व पार्षद दिनेश ढल को पार्टी में शामिल करवाया जाना था, लेकिन टिकट बँटवारे को लेकर विवाद हो गया। इस दौरान पंजाब के सह-प्रभारी के खिलाफ ‘राघव चड्ढा चोर है’ के नारे लगाए गए। बात यहीं तक रहती तो गनीमत होती, लेकिन मामला इतना बढ़ गया कि लोगों के बीच जमकर मारपीट भी हो गई। टिकट बँटवारे को लेकर करीब 45-50 मिनट हुए बवाल के बाद राघव चड्ढा को पिछले दरवाजे से बाहर भागना पड़ा था।