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बिहार : ‘5 करोड़ रुपए अभी, 5 करोड़ रुपए नीतीश सरकार गिरने के बाद’: विश्वासमत के बाद तेजस्वी यादव के करीबी पर अपहरण का केस दर्ज

ED की विश्वसनीयता की अग्नि परीक्षा का समय है, जब वह बिहार में करोड़ों के लेन-देन की बात सामने आने पर इसकी जाँच करती है। आखिर यह धन कहाँ से आया और किसने दिया की जाँच जरुरी है?  

बिहार में नीतीश कुमार की सरकार ने 129 विधायकों के समर्थन के साथ बहुमत साबित कर दिया, जबकि राजद ने 2 दिनों से अपने विधायकों को पूर्व डिप्टी CM तेजस्वी यादव के आवास में रखा हुआ था। इसके बावजूद चेतन आनंद, नीलम देवी और प्रह्लाद यादव ने पाला बदल कर सत्ताधारी गठबंधन का साथ दिया। अब जदयू विधायक सुधांशु शेखर ने एक केस दर्ज कराया है, जिसके बाद नया विवाद पैदा हो गया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि जदयू विधायकों को तोड़ने के लिए 10-10 करोड़ रुपए के ऑफर दिए गए थे।

उनके द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत में कहा गया है कि जदयू विधायकों को ऑफर दिया गया था कि उन्हें 5 करोड़ पहले और बाकी के 5 करोड़ काम हो जाने के बाद दिए जाएँगे। बताया गया है कि तेजस्वी यादव के करीबी इंजीनियर सुनील की तरफ से ये ऑफर दिए गए थे। पूर्व मंत्री नागमणि का नाम भी इसमें सामने आया है, जिनके द्वारा कहा गया था कि अखिलेश नाम का एक शख्स आपसे बात करेगा। फिर खुद को राहुल गाँधी का करीबी बताते हुए अखिलेश ने इंटरनेट से कॉल किया।

शिकायत में कहा गया है कि कई विधायकों को इस तरह के ऑफर दिए गए थे। जदयू विधायकों से संपर्क करने वालों में शक्ति सिंह यादव का नाम भी सामने आया है। उधर जदयू अपने उन विधायकों पर सख्त कार्रवाई करने जा रही है, जिन्होंने विश्वासमत में धोखा किया। सुधांशु शेखर ने राजधानी पटना के कोतवाली थाने में मामला दर्ज कराया था। जिस सुनील पर अपहरण का आरोप लगाया गया है, वो ठेकेदार है और तेजस्वी यादव का करीबी माना जाता है।

जदयू विधायक बीमा भारती और दिलीप राय के अपहरण का मामला दर्ज कराया गया है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी भी कह चुके हैं कि खेला करने वाले विधायकों पर कार्रवाई की जाएगी। पूर्व उप-मुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी ने भी कहा है कि विधायकों की खरीद-फरोख्त से खेला करने की सारी जोड़-तोड़ को विफल कर दिया गया है। नीतीश कुमार भी कह चुके हैं कि वो इसकी जाँच कराएँगे कि राजद विधायकों को एक साथ रखा गया था उसका पैसा कहाँ से आया।

‘रात को लड़का-लड़की सोता है तो उसी में न जाता है पानी भी, पढ़ी-लिखी लड़की कहती है कि निकलने लगे तो बाहर फेंक दो’: नीतीश कुमार के बयान पर NCW बोली – माफ़ी माँगिए


मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा में सेक्स को लेकर कुछ ऐसा बयान दिया कि अब राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने संज्ञान लिया है। अब उन्होंने इसी तरह के बयान को विधान परिषद में भी दोहराया है। नीतीश कुमार ने कहा, “सबको अगर पढ़वाएँगे तभी न इसका होगा। अगर लड़की पढ़ जाएगी तो जानते हैं, लड़का-लड़की की जो होती है शादी, न लड़का रोज लड़की के साथ रात में सोता है न। सोता है तो उसी में न जाता है पानी भी, 35 में भी।”

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिहार विधानसभा में सेक्स को लेकर कुछ ऐसा बयान दिया कि अब राष्ट्रीय महिला आयोग (NCW) ने संज्ञान लिया है। अब उन्होंने इसी तरह के बयान को विधान परिषद में भी दोहराया है। नीतीश कुमार ने कहा, “सबको अगर पढ़वाएँगे तभी न इसका होगा। अगर लड़की पढ़ जाएगी तो जानते हैं, लड़का-लड़की की जो होती है शादी, न लड़का रोज लड़की के साथ रात में सोता है न। सोता है तो उसी में न जाता है पानी भी, 35 में भी।”

नीतीश कुमार ने आगे कहा, “उसी समय लड़की भी जब पढ़ी-लिखी रहती है तो कहती है कि ठीक है, रात में करो लेकिन अपना जो तुमको निकलने लगे तो बाहर निकाल कर फेंक दो। यही कर के लड़की सब अब सबको समझा रही है। ज़रा जान लीजिए। लड़की सब सभी को समझाती है कि अपने पति को कंट्रोल में रखिए।” इसी दौरान उन्होंने जनसंख्या वृद्धि दर कम होने के आँकड़े भी गिनाए। इस दौरान एक विधायक ने उन्हें याद दिलाया कि वो मुख्यमंत्री हैं, इस तरह की भाषा का इस्तेमाल न करें।

इस पर उन्होंने विरोध करने वालों को बैठने के लिए कहा। अब NCW की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इन बयानों पर कहा है, “हम पूरे देश की महिलाओं की तरफ से मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से त्वरित और स्पष्ट माफ़ी माँगने की माँग करते हैं। महिलाओं को जो सम्मान और प्रतिष्ठा मिलनी चाहिए, विधानसभा में नीतीश कुमार के मूर्खतापूर्ण बयान इसका निरादर है। अपने भाषण के दौरान उन्होंने जिस अपमानजनक और और तुच्छ भाषा का इस्तेमाल किया है, वो समाज पर एक कलंक है।”

NCW अध्यक्ष ने आगे कहा कि एक लोकतंत्र में जब कोई नेता इस तरह का बयान खुले रूप से दे सकता है, हम सोच सकते हैं कि उसके शासन में राज्य में किस तरह की भयावहता होगी। रेखा शर्मा ने कहा कि हम इस तरह के व्यवहार के खिलाफ सख्ती से खड़े हैं और जिम्मेदारी तय करने की माँग करते हैं। बता दें कि इससे पहले नीतीश कुमार ने सोमवार (7 नवंबर, 2023) को ही विधानसभा में भी कुछ ऐसा ही बयान दिया था, जो आपत्ति का विषय बना।

इस बयान में उन्होंने कहा था, “अगर पढ़ लेगी लड़की और वो जब शादी होगा लड़का-लड़की में तो जो पुरुष है वो रोज रात में शादी के बाद करता है न। तो उसी में और पैदा हो जाता है। लेकिन, लड़की जब पढ़ लेती है तो उसको पता है कि करेगा। लेकिन, अंतिम में भीतर मत घुसाओ, उसको बाहर कर दो। करता तो है। तो उसी में आप समझ लीजिए, संख्या घट रही है। पहले 4.4 था, अब घटते-घटते पिछले साल के रिपोर्ट में ये 2.9 पर पहुँच गया है। बहुत जल्दी 2 के पास हम पहुँच जाएँगे।”

अवलोकन करें:-

बिहार : ‘पढ़ी-लिखी लड़की घुसाने देगी लेकिन बाहर निकाल देगी’: विधानसभा से विवाहित पुरुषों को नीतीश

नीतीश कुमार जनसंख्या वृद्धि दर की बात करते हुए ऐसा कह रहे थे। इस दौरान उन्होंने विधानसभा में कवरेज के लिए उपस्थित पत्रकारों को भी संबोधित करते हुए कहा कि वो उनके भाषण पर ध्यान दें। बिहार में सोमवार को ही जातिवार जनगणना के आँकड़े भी विधानसभा में टेबल पर रखे गए हैं। लेकिन, नीतीश कुमार के बयान और उस पर वहाँ लगे ठहाकों ने सब गुड़-गोबर कर दिया। इस दौरान उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव भी हँसते दिखे।

कर्नाटक विधानसभा चुनाव परिणाम : जितना JDS को नुकसान उतना ही कांग्रेस को फायदा, 1% भी नहीं घटा भाजपा का वोट शेयर

कर्नाटक विधानसभा चुनाव के परिणाम लगभग साफ़ हो गए हैं और कांग्रेस पार्टी ने पूर्ण बहुमत प्राप्त कर के सत्ता में वापसी की है। भले ही अति-उत्साह में पार्टी के समर्थक ये दावा कर रहे हों कि 2024 के लोकसभा चुनाव पर इसका असर पड़ेगा, लेकिन इतिहास देख कर ऐसा लगता नहीं है। 2018 विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस मध्य प्रदेश में सबसे बड़ी पार्टी बनी थी। कर्नाटक, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसने सरकार बनाई थी।

लेकिन, 2019 लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बदतर ही रहा। 2023 विधानसभा चुनाव में कर्नाटक चुनाव परिणाम की बात करें तो जहाँ कांग्रेस को 135 सीटें मिलती हुई दिख रही है, वहीं भाजपा 65 और JDS 20 सीटें प्राप्त करती हुई दिख रही है। वोट प्रतिशत की बात करें तो कांग्रेस को 43.1%, वहीं भाजपा को 35.6% वोट मिले हैं। जेडीएस का वोट शेयर 13.3% है। आइए, 2018 विधानसभा चुनाव परिणाम से इसकी तुलना कर के देखते हैं।

उस चुनाव में भाजपा 104 सीटें पा कर सबसे बड़े दल में उभरी थी, वहीं दूसरे नंबर पर आई कांग्रेस को 80 सीटें मिली थीं। वहीं जेडीएस के 37 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी। इस तरह से देखें तो इस बार भाजपा को 39 सीटों का और JDS को 17 सीटों का नुकसान हुआ है। वोट प्रतिशत की बात करें तो 5 साल पहले हुए चुनाव में भाजपा के खाते में जहाँ 36.35% वोट आए थे, वहीं कांग्रेस को 38.14% और जेडीएस को 18.3% वोट मिले थे।

देखते हैं कि कर्नाटक में किसे कितना नुकसान और फायदा हुआ है, मत प्रतिशत के मामले में। कांग्रेस का वोट प्रतिशत लगभग 5% बढ़ा है, वहीं जेडीएस को 5% वोटों का नुकसान झेलना पड़ा है। यानी, जेडीएस का जितना नुकसान हुआ है कांग्रेस को उतना ही फायदा मिला है। भाजपा के वोट शेयर में कोई ऐसी गिरावट नहीं दर्ज की गई है, जिससे इसे सत्ता विरोधी लहर कहा जा सके। भाजपा का वोट शेयर 1% भी नहीं घटा है। दूसरे, भाजपा की हार का मुख्य कारण था कर्नाटक भाजपा में बढ़ता भ्रष्टाचार, जिसे पार्टी के ही एक नेता ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि 'कर्नाटक में 40%कमीशन का राज है।' वही भाजपा की हार का मुख्या कारण भी रहा।  

कर्नाटक चुनाव: क्या बहुमत में आने के बावजूद कांग्रेस टूटेगी?


रिकॉर्ड मतदान (73.19%)। जहरीला साँप से लेकर बजरंग बली की जय वाला चुनाव प्रचार। 10 एग्जिट पोल में से 4 में कांग्रेस को बहुमत। 1 में बीजेपी की सरकार। 4 में त्रिशंकु विधानसभा। 2018 के चुनाव में सबसे सटीक आकलन करने वाले का बीजेपी को बढ़त देना। सबके अपने-अपने जीत के दावे। किंगमेकर बनने की आस लिए बैठी एक पारिवारिक पार्टी (JDS)। जी, मैं बात कर रहा हूँ कर्नाटक विधानसभा चुनावों (Karnataka Assembly election, 2023) की।

आ रहे रुझानों में कांग्रेस बहुमत बनाये हुए है, लेकिन रुझानों में बहुमत मिलते देख, जीतने वाले उम्मीदवारों को बंगलोर पहुँचने के लिए चॉपर और हेलीकाप्टर आदि की व्यवस्था होने के साथ-साथ मुख्यमंत्री पर भी मंथन शुरू होने के अगले ही पल समाचार डी के शिवकुमार और सिद्धिरामैया के बारी-बारी से मुख्यमंत्री बनने पर चर्चा होने से बहुमत में आने के बावजूद कांग्रेस में विभाजन होने के स्पष्ट संकेत मिल गए हैं। कर्नाटक में जिस स्थिति में कांग्रेस पहुंची है, इसका श्रेय शिवकुमार की मेहनत को जाता है, किसी अन्य को नहीं। ऐसे में शिवकुमार खेमा किसी और को मुख्यमंत्री बर्दाश्त नहीं करेगा अटकलें जोर पकडे हुए हैं। और इस प्रश्न पर लगभग हर कांग्रेस प्रवक्ता बचता नज़र आ रहा है। वैसे भी चुनावों के दौरान शिवकुमार को यह भी कहते सुना गया था कि वह बीजेपी से हाथ मिला सकते हैं। 

13 मई 2023 की दोपहर होते-होते कर्नाटक की 224 सदस्यीय विधानसभा चुनाव की तस्वीर साफ हो जाएगी। लेकिन तमाम किंतु-परंतु के बीच कोई भी आँकड़ा अब तक उस दावे को पुख्ता नहीं कर रहा है जो कई महीने पहले से ही दिल्ली की मीडिया में तैर रही थी। यह दावा है कर्नाटक में जबर्दस्त सत्ता विरोधी लहर का। बीजेपी सरकार के कथित भ्रष्टाचार से आम लोगों में भारी नाराजगी का। प्रवीण नेट्टारू जैसों की इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा की गई हत्या के बाद से कोर वोटरों में निराशा होने का।

सत्ता विरोधी लहर का मतलब होता है विपक्ष को प्रचंड बहुमत मिलना। लेकिन एग्जिट पोल कांग्रेस के लिए ऐसा कोई अनुमान नहीं लगा रहे। एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे ने भले 10 मई की शाम को कांग्रेस को 140 सीटें मिलने तक का अनुमान लगाया था। लेकिन नतीजों से ठीक पहले इंडिया टुडे के न्यूज डायरेक्टर राहुल कंवल ने एक ट्वीट में कहा है कि 57 सीटें ऐसी हैं जो किसी भी तरफ झुक सकती हैं। इनमें 6 सीटें ऐसी हैं जिस पर बीजेपी की टक्कर कांग्रेस से न होकर जेडीएस से है। 4 सीटें तो ऐसी भी हैं जो निर्दलीय भी झटक सकते हैं। कंवल ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि 13 मई के अंतिम नतीजे इन्हीं 57 सीटों से तय होंगी। अमूमन जब सत्ता विरोधी लहर चल रही हो तो इतने बड़े पैमाने पर काँटे की टक्कर नहीं दिखती। विपक्ष को स्पष्ट तौर पर बढ़त दिखती है।

इस तथ्य को समझाने के लिए एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे के एग्जिट पोल का उदाहरण इसलिए दिया गया क्योंकि काॅन्ग्रेस के लिए सबसे बेहतर संभावना इसमें ही दिखाई गई है। दिल्ली की मीडिया में दूसरा बड़ा दावा कर्नाटक में करप्शन के सबसे बड़ा मुद्दा होने का किया जाता है। लेकिन प्रचार के दौरान कहीं भी ऐसा नहीं लगा कि कांग्रेस चुनाव को इस मुद्दे के इर्द-गिर्द सीमित करने में सफल रही है। उलटे जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आता गया कांग्रेस बैकफुट पर जाती दिखी। पहले उसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को विषधर साँप कहने पर सफाई देनी पड़ी। फिर बजरंग दल की तुलना पीएफआई से कर वह ऐसे फँसी कि उसे हर जिले में बजरंग बली का मंदिर बनाने का वादा करना पड़ा। पिछले कई चुनावों के नतीजों पर यदि गौर करेंगे तो उससे यह भी पता चलता है कि भ्रष्टाचार के आरोपों और साॅफ्ट हिंदुत्व से बीजेपी को पराजित करने में कांग्रेस को कहीं भी सफलता नहीं मिली है।

तीसरा दावा दिल्ली की मीडिया में प्रवीण नेट्टारू जैसों की हत्या से बीजेपी के कोर वोटरों में निराशा को लेकर किया जाता है। लेकिन चुनाव प्रचार के दौरान ही हमने नेट्टारू के परिजनों के लिए बने घर की तस्वीरें भी देखी हैं। हमने उनके परिजनों के वह बयान भी सुने हैं, जिनमें उन्होंने कहा है कि मुश्किल वक्त में बीजेपी ने उनका साथ कभी नहीं छोड़ा। कभी उनको अकेला महसूस नहीं होने दिया। ऐसे में यह समझ पाना मुश्किल है जिस नेतृत्व से पीड़ित परिवार ही निराश नहीं है, उनके साथ हुई घटना से कोर वोटरों के निराश होने की थ्योरी कहाँ से निकली होगी? या फिर किसी प्रोपेगेंडा के तहत दिल्ली की मीडिया में इसे प्लांट किया गया था?

जाहिर है कि बीजेपी रेस से बाहर नहीं है। न ही कर्नाटक में वह बेहद बुरा प्रदर्शन करने जा रही है। जब उसे इस राज्य में सबसे मजबूत स्थिति में माना गया था, तब भी वह साधारण बहुमत ही हासिल कर पाई थी। ऐसे में कर्नाटक से जुड़े कुछ तथ्यों पर गौर करना जरूरी हो जाता है। 1978 तक इस राज्य में हर विधानसभा चुनाव में काॅन्ग्रेस को जीत मिली। लेकिन, 1985 के बाद किसी भी चुनाव में सत्ताधारी दल को जीत नहीं मिली। पिछले नौ चुनावों के ट्रेंड यह भी बताते हैं कि बीजेपी यदि सत्ता में रही है तो उसका वोट प्रतिशत सुधरा है। इसके ठीक उलट कांग्रेस यदि सत्ता में रही है तो उसको औसतन चार फीसदी वोटों का नुकसान झेलना पड़ा है।

अगर इन तथ्यों को ही सच मान लें तो तीन बातें तय दिखती हैं। पहला, 38 साल का ट्रेंड बताता है कि बीजेपी सत्ता में वापसी लायक सीटें हासिल नहीं कर पाएगी। अधिकतर एग्जिट पोल इसका अनुमान लगा रहे हैं। दूसरा, कांग्रेस विपक्ष में है, इसलिए उसे वोटों का नुकसान नहीं होगा। तीसरा, बीजेपी सत्ता में है तो उसके वोट बढ़ेगे। क्या 2018 के चुनावों के मुकाबले मतदान में जो एक फीसद की वृद्धि हुई है, वह बीजेपी का बढ़ा वोट है? यदि ऐसा है तो यह किसी भी पोल में नहीं दिखा है और न ही किसी पोल पंडित ने ऐसा पाया है। कर्नाटक के पिछले कुछ चुनावों के तथ्य और ट्रेंड को इस बार भी अंतिम सत्य (बीजेपी की हार) मान लें तो भी यह कहीं से नहीं दिखता कि कोई सत्ता विरोधी लहर चल रही थी। करप्शन बड़ा मुद्दा था। कोर वोटर निराश थे।

ऐसा भी नहीं है कि जिस कर्नाटक को बीजेपी के लिए ‘दक्षिण का द्वार’ कहते हैं, उसकी कठिन डगर का एहसास पार्टी को नहीं था। जनवरी 2023 के मध्य में मुझे बीजेपी के दिल्ली मुख्यालय में इसका पहली बार एहसास हुआ। बंद कमरे में पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कुछ लोगों से बातचीत कर रहे थे। इस दौरान 2023 में होने वाले राज्यों के चुनाव पर बातचीत के दौरान उन्होंने माना कि कर्नाटक की सत्ता में वापसी आसान नहीं है।

संभवतः यही कारण है कि बीजेपी ने टिकट बँटवारे के दौरान सख्त फैसले लिए। बड़े पैमाने पर नए चेहरों को मौका दिया। पूर्व मुख्यमंत्री जगदीश शेट्टार जैसे नेताओं की नाराजगी की चिंता नहीं की। कई हेविवेट के टिकट काट दिए। राज्य के अपने सबसे बड़े नेता बीएस येदियुरप्पा को मोर्चे पर लगाया। एक्सिस माई इंडिया और इंडिया टुडे का एग्जिट पोल भी कहता है कि येदियुरप्पा जिस लिंगायत समुदाय से आते हैं उसका 64 फीसदी वोट बीजेपी को गया है। यानी लिंगायत समुदाय से आने वाले जगदीश शेट्टार भले बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में चले गए हैं, पर इस समुदाय का आम वोटर बीजेपी के ही साथ है।

यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि कर्नाटक में बीजेपी के उभरने की सबसे बड़ी वजह लिंगायतों का समर्थन ही माना जाता है। हाल के समय में कर्नाटक में बीजेपी ने सबसे बुरा प्रदर्शन 2013 में तब किया जब येदियुरप्पा उससे अलग हो गए थे। जन की बात के फाउंडर प्रदीप भंडारी ने भी ऑपइंडिया से बातचीत में कहा कि लिंगायत के बीच बीजेपी का आधार पहले की तरह ही बना हुआ है। गौरतलब है कि 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनावों का सबसे सटीक आकलन जन की बात ने ही किया था। इस बार अपने एग्जिट पोल में उसने बीजेपी के सबसे बड़ी पार्टी होने का अनुमान लगाया है।

प्रदीप भंडारी ने इस चुनाव के दौरान भी करीब-करीब पूरे कर्नाटक की यात्रा की है। उन्होंने करीब 50 दिन इस राज्य में बिताए हैं। उनका कहना है, “बुरी से बुरी स्थिति में बीजेपी को 90 सीटें मिलनी चाहिए। यदि मैं क्लोज मार्जिन की सभी सीटों पर कांग्रेस की जीत मान लूँ तब भी वह बहुमत हासिल नहीं करने जा रही है। मेरा स्पष्ट मानना है कि नतीजों से त्रिशंकु विधानसभा की तस्वीर उभरेंगी।”

ऑपइंडिया से बातचीत में ऐसे ही नतीजों का दावा कर्नाटक में 20 दिन बिताकर लौटे यूट्यूबर पत्रकार अभिषेक तिवारी भी करते हैं। उन्होंने बताया, “मुझे कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखी। बीजेपी का वोट शेयर 36 फीसदी से कम होने की भी कोई संभावना नहीं दिखती। मुझे लगता है कि सरकार किसकी बनेगी, यह जेडीएस और निर्दलीय तय करेंगे।”

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पोल पंडित 2020 के बिहार और 2018 के राजस्थान चुनावों की तरह ही कर्नाटक चुनाव की नब्ज पकड़ने में असफल रहे हैं? ध्यान रहे कि इन दोनों चुनावों में भी सत्ता विरोधी लहर चलने का शोर वैसा ही था, जैसा अभी कर्नाटक को लेकर है। लेकिन जब अंतिम नतीजे आए तो बिहार में सत्ताधारी गठबंधन ही आगे रहा। राजस्थान में कांग्रेस साधारण बहुमत ही हासिल कर पाई। प्रदीप भंडारी का भी मानना है कि सीटों का अनुमान लगाने में ज्यादातर लोग बिहार जैसी ही गलती कर रहे हैं।

वैसे यह रात पोल पंडितों के साथ काॅन्ग्रेस के लिए भी भारी है। आखिर उनके ‘युवराज’ ने भारत जोड़ो यात्रा के दौरान कर्नाटक में 27 दिन जो बिताए थे। इस राज्य के 7 जिलों से जो गुजरे थे।

झारखंड विधानसभा में नमाज के लिए कमरा: ‘कब्रिस्तान भी बनाओ’ की माँग सोशल मीडिया पर

                                    झारखंड विधानसभा में नमाज के लिए अलग से कमरा आवंटित
कांग्रेस कितनी सांप्रदायिक है, जिसे अब तक भारतीय जनमानस चाहे वह किसी भी धर्म अथवा जाति से हों, कोई नहीं समझ नहीं पाया विपरीत इसके कांग्रेस द्वारा फैलाये जहर को अमृत समझ भाजपा, विश्व हिन्दू परिषद्, बजरंग दल एवं हिन्दू महासभा को सांप्रदायिक करार बदनाम करती रही, हिन्दुओं के तीर्थों को विवादित बनाकर गन्दी सियासत करती रही, और अब वही गन्दी साम्प्रदायिकता झारखंड में खेल रही है। 

झारखंड सरकार का एक बार फिर से सांप्रदायिक चेहरा सामने आया है। अब राज्य के विधानसभा में भी ‘शांतिप्रिय’ समुदाय की सुविधा का विशेष ख्याल रखा जा रहा है। अब उनके लिए नमाज अदा करने के लिए अलग से कमरा आवंटित किया गया है। इस संबंध में विधानसभा अध्यक्ष की ओर से आदेश भी जारी कर दिया गया है।

इस आदेश पर 2 सिंतबर की तारीख है और नमाज कक्ष के रूप में कमरा संख्या TW348 बताया गया है। विधानसभा के उप सचिव नवीन कुमार के हस्ताक्षर से जारी आदेश में कहा गया है, “नए विधानसभा भवन में नमाज अदा करने के लिए नमाज कक्ष के रूप में कमरा संख्या TW-348 आवंटित किया जाता है।”

आदेश की प्रति वायरल होते ही तरह-तरह की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। झारखंड सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाया जा रहा है। बीजेपी विधायक अनंत ओझा ने इस पर सवाल उठाते हुए ट्वीट किया, “ये क्या स्पीकर साहब ,अब राज्य की सबसे बड़ी पंचायत भी तुष्टिकरण को पोषित करने की राह पर? झारखंड विधानसभा में नमाज़ अदा करने के लिए कक्ष। झारखंड की जनता सब देख रही है। सर्वधर्म समभाव की मूल आत्मा को कलंकित करने वाला निर्णय।”

                                                     आदेश की कॉपी (साभार: सोशल मीडिया)

 वहीं योगेंद्र प्रताप ने लिखा, “झारखंड विधानसभा में हेमंत सोरेन की जेएमएम सरकार द्वारा नमाज कक्ष आवंटित करने के बाद कॉन्ग्रेस के बयान बहादुर विधायक जनाब इरफान अंसारी साहब तालिबान के समर्थन में कसीदे पढ़ रहे हैं। काश रोजगार और जनहित के अन्य सवालों पर भी ये ऐसे ही संवेदनशील होते? आप खुद समझिए झारखंड सरकार तुष्टिकरण की कैसी राजनीति कर रही है?”

झारखंड बीजेपी प्रवक्ता प्रतुल शाह देव लिखते हैं, “जब चौतरफा असफलताओं से घिर जाओ तो ध्यान भटकाने की कोशिश करो। झारखंड के इतिहास में पहली बार विधानसभा भवन में नमाज अदा करने के लिए नमाज भवन बनाया गया। तुष्टीकरण की सारी सीमाएँ पार हो गईं। क्या विधानसभा में बहुसंख्यक समाज के लिए मंदिर या प्रार्थना कक्ष की व्यवस्था है?”

बीजेपी विधायक भानु प्रताप शाही ने लिखा, “बहुत चिंतित हूँ , झारखंड के भविष्य को ले कर एक तरफ कॉन्ग्रेस के विधायक खुलेआम तालिबान का समर्थन करते हैं! दूसरी तरफ विधानसभा में नमाज की कक्ष खोली जा रही और तीसरी हिंदी को हटा कर उर्दू को प्राथमिकता नियोजन नीति में दी जा रही? किस दिशा में जा रहा झारखंड आप भी सोचें…”

शशि शेखर सिंह लिखते हैं, “हेमंत सोरेन जी ने समाज को बाटने वाली अपनी गंदी राजनीति का फिर से उदाहरण पेश किया है। झारखंड विधानसभा भवन में नमाज कक्ष का आवंटन उनके तुष्टीकरण की राजनीति को उजागर करता है। ऐसी विभाजनकारी राजनीति से बचिए साहब, ये राज्य का भला नहीं करेंगी।”

राहुल दुबे ने लिखा, “कॉन्ग्रेस का बस चले तो वह भारत को ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ इंडिया’ बना दे, झारखंड विधानसभा में पहले नमाज होगी फिर कोई दूसरा काम।”

योगेंद्र प्रताप लिखते हैं, “जेएमएम और कॉन्ग्रेस को तो सिर्फ हिंदुओं से परेशानी है? जब झारखंड विधानसभा में नमाज कक्ष हो सकता है तो फिर हिंदुओं के लिए पूजा कक्ष क्यों नहीं? राज्य के मन्दिरों को लेकर भी सरकार का उदासीन रवैया किसी से छिपा नहीं है। यह तुष्टिकरण की पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है मुख्यमंत्री साहब?”

आयुष झा नाम के एक ट्विटर यूजर ने लिखा, “केवल नमाज कक्ष ही क्यूँ? मेरी तो झारखंड सरकार से आग्रह है कि विधानसभा परिसर में एक कब्रिस्तान का निर्माण भी किया जाए, ताकि एक दिन उसी कब्र में इस तुष्टीकरण राजनीति करने वाली सरकार को भी दफनाया जा सके।”

कर्नाटक : विधानसभा में पोर्न देखते पाया गया कांग्रेस विधायक

                                                                                                                                 प्रतीकात्मक 
कर्नाटक विधानसभा में अब ‘पोर्नगेट 2.0’ सामने आया है, जिसके बाद वहाँ मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस की बड़ी फजीहत हुई है। शुक्रवार (जनवरी 29, 2021) को पार्टी नेता प्रकाश राठौड़ अपने मोबाइल फोन पर अश्लील वीडियो स्क्रॉल करते हुए पाए गए। कुछ मीडियाकर्मियों ने उनकी इस हरकत का फुटेज लिया था, जिसके आधार पर दावा किया गया कि वे में ही पोर्न वीडियो देख रहे थे।

हालाँकि, कांग्रेस नेता प्रकाश राठौड़ का कहना है कि वो उस वक़्त इंटरनेट नहीं चला रहे थे, बल्कि अपने मोबाइल फोन पर आए अवांछित मैसेजों को डिलीट करने के उपक्रम में लगे हुए थे। उन्होंने सफाई देते हुए कहा, “सामान्यतः हम विधानसभा में मोबाइल फोन लेकर नहीं जाते, लेकिन चूँकि मुझे सरकार से एक सवाल पूछना था, इसीलिए मैं अपने फोन में कुछ चीजें चेक कर रहा था। मेरा स्टोरेज भर गया था और मैं उसमें से अवांछित चीजें हटा रहा था।”

भाजपा ने इस घटना की कड़ी निंदा की है। पार्टी ने माँग करते हुए कहा कि राठौड़ को विधान परिषद की सदस्यता से इस्तीफा दे देना चाहिए। भाजपा ने कहा कि इसे उच्च-सदन कहा जाता है, ये वरिष्ठों का सदन है, इसके बावजूद इस तरह की हरकत निंदनीय है। पार्टी प्रवक्ता एस प्रकाश ने कहा कि पिछली बार जब ऐसा मामला सामने आया था, जब इसी कांग्रेस ने जम कर हंगामा किया था। उन्होंने कर्नाटक कांग्रेस के अध्यक्ष डीके शिवकुमार से अपने नेता पर कार्रवाई की माँग की।

कर्नाटक में ये इस तरह का पहला मामला नहीं है। इससे पहले 2012 में लक्ष्मण सवादी सहित 2 नेता विधानसभा में ही पोर्न देखते हुए पाए गए थे। सावदी फ़िलहाल राज्य के उप-मुख्यमंत्री होने के साथ-साथ परिवहन विभाग भी सँभालते हैं। इसी तरह अरविन्द लिम्बावली नामक नेता का भी वीडियो वायरल हो गया था। हाल ही में उन्हें भी येदियुरप्पा मंत्रिमंडल में शामिल किया गया है। मध्य प्रदेश में भाजपा के सरकार बनाने में उन्होंने भूमिका निभाई थी।

आजकल कर्नाटक में महाराष्ट्र से विवाद का मुद्दा छाया हुआ है, जिसे उद्धव ठाकरे ने अपने बयानों से हवा दी हुई है। कर्नाटक के नेताओं का कहना है कि कहना है कि कर्नाटक के लोग चाहते हैं कि मुंबई को कर्नाटक में शामिल कर लिया जाए। कर्नाटक के डिप्टी सीएम लक्ष्मण सावदी ने मीडियाकर्मियों से बात करते हुए कहा कि महाराष्ट्र की राजधानी मुंबई को केंद्र शासित प्रदेश घोषित कर देना चाहिए। मुंबई कर्नाटक का हिस्सा है।