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हिंदी नहीं… हकीकत में उर्दू है बाहरी भाषा: उर्दू अरबी शब्द को हिंदी में क्या कहते हैं? वोटबैंक की लालच में हकीकत कब तक नजरअंदाज करेंगे कांग्रेस से जुड़े द्रविड़-कन्नड़-मराठा नेता, कब तक चलेगी गुंडागर्दी की राजनीति?

                                                                                                                                                                        फोटो साभार - ऑपइंडिया हिन्दी
अब राज ठाकरे की पार्टी और गुंडों में क्या फर्क है? चुनाव आयोग को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना की मान्यता पर विचार करना चाहिए। ग़नीमंत यह है इस गुंडा पार्टी का किसी भी सदन में कोई सदस्य नहीं अगर होता फिर तो गुंडागर्दी का आलम देखते ही बनता। लोग महाराष्ट्र छोड़ भाग रहे होते। 
भाषाई कट्टरता और हिंसक प्रवृत्ति एक बार फिर भारतीय सामाजिक और राजनीतिक दृश्य को तब कलंकित करती दिखी जब 29 जून 2025 को महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के कार्यकर्ताओं ने मुंबई के मीरा रोड उपनगर में एक मिठाई की दुकान के 48 वर्षीय मालिक बाबूलाल खिमजी चौधरी पर केवल इसलिए हमला कर दिया कि उन्होंने मराठी में बातचीत करने से इनकार कर दिया था।  

बाबूलाल खिमजी चौधरी की ‘जोधपुर स्वीट्स और नमकीन’ नाम की दुकान है। उन पर तब हमला हुआ जब मनसे के कार्यकर्ता करण कंडांगीरे (मनसे उप शहर प्रमुख), पामोद नीलेकट (वाहतुक सेना जिला आयोजक), अक्षय दलवी, सचिन सालुंखे और अमोल पाटिल समेत 7 लोग दुकान में आकर मराठी में लेनदेन की माँग करने लगे।

बातचीत जल्द ही बहस में तब्दील हो गई। ये टकराव तब और उग्र हो गया जब पीड़ित ने उनके उस झूठे दावे पर आपत्ति जताई कि महाराष्ट्र विधानसभा ने व्यवसायों में मराठी भाषा के प्रयोग और मराठी भाषी कर्मचारियों की नियुक्ति को अनिवार्य कर दिया है।

यह घटना न केवल भाषा के नाम पर की जा रही गुंडागर्दी को दिखाता है, बल्कि उन क्षेत्रीय दलों की रणनीति पर भी सवाल उठाता है, जो राजनीतिक गलियारों में चर्चा में बने रहने के लिए इस तरह से गुंडागर्दी का सहारा ले रहे हैं। इस तरह की घटनाएँ न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों को चोट पहुँचाती हैं, साथ ही यह पूरे राज्य में गुस्सा और समाज में आपसी झगड़े को भी बढ़ावा देती हैं।

भाषा की लड़ाई से राजनीति हुई फिर जिंदा

महाराष्ट्र में हाल ही में भाषा के नाम पर गैर-मराठी बोलने वालों को परेशान किया गया। एमएनएस के कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर जल्दी ही जमानत पर छोड़ दिया गया।

एमएनएस और शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट) जैसे दल लंबे समय से मराठी अस्मिता की बात करते आ रहे हैं, लेकिन यह ज्यादातर दूसरों को डराने और परेशान करने तक ही सीमित रहा है।

कुछ ही दिनों पहले, जब राज्य सरकार ने स्कूलों में हिंदी शुरू करने का फैसला वापस लिया, तो उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने ‘मराठी मानुष’ की एकता की बात की। इसके विरोध में उद्धव ठाकरे और संजय राउत ने सरकारी आदेश की प्रतियाँ जला दीं थी।

महाराष्ट्र एक ऐसा राज्य है जहाँ कई भाषाएँ बोलने वाले लोग रहते हैं। यहाँ बॉलीवुड जैसी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री भी है। आम मराठी लोग गैर-मराठी बोलने वालों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन MNS जैसी कुछ क्षेत्रीय पार्टियाँ भाषा के नाम पर झगड़े और डर का माहौल बना रही हैं।

राज्य की बीजेपी सरकार ने इसे लेकर साफ और सख्त रुख अपनाया है। शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि मराठी भाषा पर गर्व करना गलत नहीं है, लेकिन भाषा के नाम पर गुंडागर्दी बर्दाश्त नहीं की जाएगी। जो लोग भाषा के आधार पर मारपीट करेंगे, उनके खिलाफ कड़ी कार्रवाई होगी। उन्होंने यह भी कहा कि हमें सभी भारतीय भाषाओं का सम्मान करना चाहिए।

हिंदी को लेकर विवाद करना और अंग्रेजी को अपनाना समझ से बाहर है। कानून हाथ में लेने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाएगी। एक अहम बात यह भी है कि जहाँ हिंदी, गुजराती और दूसरी भाषाएँ बोलने वालों को निशाना बनाया जाता है, वहीं उर्दू भाषा को इस गुस्से से अछूता रखा गया है।

हिंदी और मराठी एक जैसी लिपि और जड़ों से जुड़ी हैं, फिर भी हिंदी को ‘उत्तर भारतीय थोपाव’ कहा जाता है, जबकि उर्दू पर कोई सवाल नहीं उठता।

देश के कई राज्यों में भाषा को लेकर भेदभाव और राजनीतिक विवाद बढ़ती जा रही है। तमिलनाडु में DMK सरकार ने नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) का यह कहकर विरोध किया कि यह तमिल भाषियों पर हिंदी थोपने का प्रयास है।

हालाँकि नीति में हिंदी अनिवार्य नहीं थी और छात्र इसके विकल्प के तौर पर अपनी पसंद की कोई भी भाषा चुन सकते थे। मार्च 2024 में महाराष्ट्र के पुणे के भूषण मंडलिक को तमिलनाडु में सिर्फ इसलिए पीटा गया क्योंकि वह तमिल नहीं बोल पाते थे।

इसी तरह कर्नाटक में एक ओड़िया रेस्टोरेंट को स्थानीय भाषा कन्नड़ के नाम पर अपनी ओड़िया नेमप्लेट हटाने के लिए मजबूर किया गया, जबकि पहले से कन्नड़ में नाम का बोर्ड लगा हुआ था।

झारखंड में 2022 में JMM सरकार ने भोजपुरी और मगही को क्षेत्रीय भाषाओं की सूची से बाहर कर दिया, जबकि उर्दू को बनाए रखा और हिंदी को किसी भी जिले में क्षेत्रीय भाषा का दर्जा नहीं दिया गया, जिससे भारी विरोध हुआ।

शिवसेना (UBT) ने भी मुस्लिम बहुल इलाकों में उर्दू में पोस्टर लगाकर उद्धव ठाकरे को ‘अली जनाब’ बताया, लेकिन हिंदी को अक्सर विरोध का सामना करना पड़ता है। पश्चिम बंगाल, तेलंगाना और उत्तर प्रदेश में भी उर्दू को बढ़ावा दिया जा रहा है जबकि हिंदी का विरोध किया जाता है।

यूपी में उर्दू अनुवाद की माँग पर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि इसका मकसद बच्चों को मौलवी बनाना है, वैज्ञानिक नहीं। इन सभी घटनाओं से साफ है कि कुछ राजनीतिक दल वोट बैंक की राजनीति के लिए भाषा को हथियार बना रहे हैं, जहाँ खासकर हिंदी को निशाना बनाया जा रहा है और उर्दू को विशेष छूट दी जा रही है।

हिंदी से नफरत लेकिन वोट के लिए उर्दू और अंग्रेजी भाषा स्वीकार्य

देश में भाषाओं को लेकर विवाद लगातार बढ़ रहा है, लेकिन यह विवाद भाषा की असली चिंता से ज्यादा राजनीति से जुड़ा है। कुछ क्षेत्रीय और मुस्लिम-तुष्टिकरण करने वाली पार्टियाँ हिंदी का विरोध हमेशा से करती रही हैं और इसे थोपने का आरोप भी लगाती हैं।

जबकि उर्दू को बढ़ावा देने में उन्हें कोई आपत्ति नहीं होती तो सवाल ये है कि भाषा के साथ इस तरह का राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव आखिर क्यों हो रहा है। उत्तर प्रदेश में 1989 में कॉन्ग्रेस सरकार ने सिर्फ मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए उर्दू को दूसरी आधिकारिक भाषा बना दिया था।

यही हाल पश्चिम बंगाल, दिल्ली, बिहार और तेलंगाना जैसे राज्यों में भी देखा गया, जहाँ उर्दू को विशेष दर्जा मिला। लेकिन हिंदी, जो संस्कृत से निकली है और देश की जमीन से जुड़ी है, उसे ‘उत्तर भारतीय थोपाव’ कहकर बदनाम किया जाता है। उर्दू की उत्पत्ति इस्लामी आक्रमणों के समय हुई थी, जब विदेशी शासकों को स्थानीय जनता से संवाद के लिए एक मिली-जुली भाषा की जरूरत थी।

उर्दू में फारसी और अरबी के शब्द शामिल हैं, लेकिन इसकी व्याकरण हिंदी की है। मुगलों और उनके बाद कई शासकों ने इसे बढ़ावा दिया, जिससे यह शासन और प्रशासन की भाषा बनी। बॉलीवुड में भी उर्दू को खास बढ़ावा मिलात रहा है।

गीतकारों और लेखकों ने उर्दू के शब्दों और इस्लामिक शब्दावली (जैसे जन्नत, खुदा, काफिर आदि) को फिल्मों में खूब इस्तेमाल किया, जिससे हिंदी को कमतर और उर्दू को ज्यादा शिष्ट भाषा की तरह पेश किया गया।

इसने उर्दू की एक खास छवि बना दी और आम हिंदी को हाशिए पर डाल दिया। इसका नतीजा ये रहा कि आज भी कुछ राजनीतिक दल उर्दू को विशेष दर्जा देते हैं, उसके लिए फंड जारी करते हैं जबकि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को नजरअंदाज किया जाता है।

महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में हिंदी बोलने वाले आम लोगों को निशाना बनाया जाता है, जबकि उर्दू बोलने वाले मुसलमानों पर कोई सवाल नहीं उठाता। मुसलमानों से कोई यह नहीं पूछता कि वे मराठी या कन्नड़ में बात क्यों नहीं करते।

हाल ही में महाराष्ट्र में एमएनएस का एक कार्यकर्ता मुस्लिम इलाके में मराठी थोपने गया तो उसे माफी तक माँगनी पड़ी और वो भी हिंदी में। इसके बावजूद हिन्दी को सम्मान नहीं मिल पा रहा है, लोग उसी का विरोध कर रहे है।

अगर इसे ठीक तरह से समझने की कोशिश की जाए, तो ये भाषा की लड़ाई नहीं बल्कि एकतरफा राजनीति है जिसमें मुस्लिम समुदाय और उर्दू को छूने से सभी पार्टियाँ डरती हैं क्योंकि विरोध का डर होता है, जबकि हिंदुओं और हिंदी के खिलाफ बोलना ‘सुरक्षित’ माना जाता है। यही कारण है कि उर्दू, जो सच में एक बाहरी और थोपी गई भाषा थी, आज विशेष दर्जा पाती है और हिंदी को बदनाम किया जाता है।

भाषा पर गर्व करना गलत नहीं है और जो लोग किसी राज्य में रहते हैं, अगर वे वहाँ की भाषा सीखें तो यह एक अच्छा कदम है। लेकिन जबरदस्ती करना, डराना और दुकान या संस्थानों को अपनी मातृभाषा में बोर्ड न लगाने देना गलत है।

इससे भाषाओं का सम्मान नहीं होता, बल्कि नफरत और दूरी बढ़ती है। सच तो ये है कि यह पूरा भाषा विवाद कुछ नेताओं द्वारा केवल मोदी सरकार का विरोध करने और क्षेत्रीय गर्व के नाम पर राजनीतिक फायदा उठाने का एक तरीका है, न कि भाषाओं को बचाने या बढ़ाने की कोई सच्ची कोशिश।

सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार : ‘राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त की रेवड़ियाँ अर्थव्यवस्था के लिए घातक’

सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव प्रचार के दौरान राजनीतिक दलों द्वारा मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटे जाने के सम्बन्ध में एक शीर्ष संस्था के गठन की आवश्यकता जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस संस्था में नीति आयोग, RBI, सत्ताधारी एवं विपक्षी पार्टियाँ और अन्य हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिए। राजनीतिक दल अक्सर चुनाव प्रचार के दौरान मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटते हैं या फिर ऐसे वादे करते हैं। इसे नियंत्रित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली गई थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार, चुनाव आयोग और वरिष्ठ अधिवक्ता व राज्यसभा सांसद कपिल सिब्बल के अलावा अन्य याचिकाकर्ताओं से एक विशेषज्ञ समिति के गठन को लेकर सुझाव माँगा, जो मुफ्त की रेवड़ियों के सम्बन्ध में सुझाव दे सके। मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि मुफ्त की रेवड़ियों के फायदे-नुकसान का अध्ययन करने के लिए एक समिति की आवश्यकता है, क्योंकि अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ता है। 

साभार सोशल मीडिया 
जब सुप्रीम कोर्ट ने राजनीतिक पार्टियों द्वारा मुफ्त की रेवड़ियों के फायदे-नुकसान पर चिंता व्यक्त की है, इसी भांति निर्वाचित नेताओं को मिलने वाली पेंशन और सुविधाओं पर भी अंकुश लगाना जरुरी है। जिस पर हर माह करोड़ों खर्च हो रहे हैं। जिस दिन इस पर अंकुश लग गया, संभव है शायद कोई नया टैक्स लगाने की नौबत न आए। यह भी संभव है कि उसका प्रभाव महंगाई पर भी पडे। अनुमान गलत भी हो सकता है।  

ये संस्था इसका अध्ययन कर के केंद्र सरकार, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को अपनी रिपोर्ट सौंपेगी। वहीं सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मुफ्त की बाँटी जाने वाली रेवड़ियाँ आर्थिक आपदा लेकर आएगी। वहीं कपिल सिब्बल की राय है कि इस सम्बन्ध में संसद में बहस के बाद कानून बनाया जाना चाहिए। CJI रमना ने इस पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि कोई भी राजनीतिक दल इसके विरुद्ध नहीं जाएगा, क्योंकि सभी Freebies बाँटना चाहते हैं।

अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट से ये निर्देश देने की अपील की कि सभी राजनीतिक दलों को चुनाव से पहले सार्वजनिक फंड से मुफ्त की रेवड़ियाँ बाँटने या इसके लिए वादे करने से रोका जाए। उन्होंने ऐसी पार्टियों का पंजीकरण रद्द कर के उनका चुनाव चिह्न वापस लिए जाने के निर्देश देने की माँग की। इस साल जनवरी में ही सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नोटिस जारी करते हुए कहा था कि मुफ्त की रेवड़ियों के बदले वोट जुटाना एक गंभीर मुद्दा है।

केंद्र सरकार का भी मानना है कि इसके विपरीत परिणाम आते हैं। SG ने अश्विनी उपाध्याय की याचिका का समर्थन करते हुए ECI को इस पर नजर डालने की सलाह दी। उन्होंने कहा कि ये वैसा ही है, जैसे उनके दाहिने वाले पॉकेट में कुछ डाला जा रहा हो और फिर बाएँ पॉकेट से निकाल लिया जा रहा हो। उपाध्याय ने याचिका में उदाहरण दिया कि कैसे AAP ने महिलाओं को 1000 रुपए के मासिक भत्ते का लालच दिया था, अकाली दल ने 2000 रुपए देने का वादा किया था और कॉन्ग्रेस ने यूपी में छात्राओं को स्कूटी का लालच दिया।

‘मुफ्त का लालच देने वाले दलों का रजिस्ट्रेशन रद्द हो, चुनाव चिह्न वापस लिए जाएँ’: केंद्र और चुनाव आयोग को सुप्रीम कोर्ट का नोटिस

सुप्रीम कोर्ट ने 25 जनवरी, 2022 को राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को रिझाने के लिए सरकारी कोष का दुरुपयोग करने पर केंद्र और निर्वाचन आयोग को नोटिस जारी कर जवाब माँगा है। दरअसल, शीर्ष न्यायालय में एक जनहित याचिका दायर कर उन राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द करने और उनके चुनाव चिन्ह जब्त करने की माँग की गई है, जो मतदाताओं को मुफ्त में सुविधाएँ देने के वादे कर रहे हैं।

अगले महीने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, मणिपुर, गोवा और पंजाब में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान होगा। ऐसे में कई राजनीतिक दल सरकारी कोष से अतार्किक मुफ्त ‘उपहारों’ का मतदाताओं को लालच दे रहे हैं। इस दलों में अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (AAP) और समाजवादी (SP) पार्टी शीर्ष पर हैं। आम आदमी पार्टी ने गोवा और पंजाब के आम वोटरों को बिजली व अन्य सुविधाएँ मुफ्त में देने का वादा किया है। वहीं, किसानों की कर्जमाफी को वे चुनावों में बड़ा मुद्दा बना रहा हैं।

गोवा में दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) ने कई चुनावी घोषणाएं की थीं। अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि अगर गोवा में हमारी सरकार बनती है तो यहाँ की सभी महिलाओं के लिए गृह आधार योजना के तहत 1500 रुपए से बढ़ाकर 2500 रुपए प्रति माह किया जाएगा। 18 वर्ष से अधिक उम्र की प्रत्येक महिला को 1000 रुपए प्रति माह दिए जाएँगे। इसके अलावा केजरीवाल ने कहा था कि गोवा में हमारी सरकार बनी तो दिल्ली की तरह यहाँके लोगों को भी बिजली मुफ्त में देंगे। युवाओं को रोजगार देंगे और जब तक उन्हें रोजगार नहीं मिलता, तब तक बेरोजगारी भत्ता देंगे।

इसी तरह अरविंद केजरीवाल के पद चिन्हों पर चलते हुए समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने यूपी चुनाव ((UP Assembly Election 2022) से पहले बड़ा ऐलान करते हुए घरेलू बिजली उपभोक्ताओं को 300 यूनिट बिजली मुफ्त देने का वादा किया था। इसके अलावा कहा था कि किसानों को सिंचाई के लिए बिजली मुफ्त मिलेगी।

सुप्रीम कोर्ट से दंडित राजनीतिक दलों की मान्यता की जाए समाप्त : राष्ट्र निर्माण पार्टी

अजय आर्य, उगता भारत 

राष्ट्र निर्माण पार्टी ने सदैव ही उच्चतम न्यायालय के आदेशों को पूरी तरह माना है और उसका अनुसरण भी किया है, पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डा. आनंद कुमार ने बताया की 10 अगस्त 2021 को सुप्रीम कोर्ट द्वारा राजनैतिक क्षेत्र में बढ़ रहे अपराधीकरण को रोकने हेतु अनेक राजनैतिक पार्टियों को कोर्ट की अवमानना का दोषी मानते हुए उनके ऊपर एक लाख रुपए से लेकर पांच लाख रुपए तक का जुर्माना लगाया था। राष्ट्र निर्माण पार्टी ने चुनाव आयोग से मांग की है कि ऐसी दंडित पार्टियों की मान्यता समाप्त की जाए या उनका चुनाव चिन्ह जब्त किया जाए या ऐसे विजयी प्रत्याशी जिनके विरूद्ध आपराधिक प्रकरण थे तथा जिन्होंने माननीय उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का अनुपालन नहीं किया, उनका चुनाव निरस्त किया जाए। ध्यान रहे कि फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा यह निर्णय दिया गया था कि यदि राजनैतिक पार्टियां चुनावों में ऐसे व्यक्तियों को टिकट देती हैं जिनकें विरूद्ध आपराधिक प्रकरण हैं तो उसकी जानकारी टीवी व अखबारों के माध्यम से आम जनता को संबंधित पार्टियों द्वारा दी जाएगी। किंतु बिहार विधानसभा के चुनावों में राजनैतिक पार्टियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों की अवहेलना की गई जिस पर उपरोक्त दंडात्मक कार्यवाही माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा की गई है।

डा. कुमार ने कहा कि उनकी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने सर्वसम्मति से एक प्रस्ताव पारित कर उच्चतम न्यायालय का इस प्रकार के निर्णय के लिए धन्यवाद ज्ञापित किया है तथा आशा व्यक्त की है कि राजनीति के शुद्धिकरण में यह निर्णय बहुत महत्वपूर्ण सिद्ध होगा। राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, उत्तराखंड एवं दिल्ली के प्रतिनिधियों के अतिरिक्त पार्टी के संस्थापक अध्यक्ष ठाकुर विक्रम सिंह, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राकेश आर्य, राष्ट्रीय महासचिव मनोज गुलाटी, राष्ट्रीय सचिव राधाकांत शास्त्री, राष्ट्रीय कवि सारस्वत मोहन मनीषी आदि ने प्रमुख रूप से भाग लिया।
डा. कुमार ने आगे बताया कि उनकी पार्टी के घोषणा पत्र में प्रथम स्थान पर राजनैतिक अपराधीकरण को तथा दूसरे नंबर पर भ्रष्टाचार को समाप्त करने का संकल्प है तथा पार्टी इन दोनों मुद्दों पर निरंतर संघर्ष कर रही है तथा आगे भी करती रहेगी। यदि भारत चुनाव आयोग हमारी मांग पर अगले 15 दिन में कोई निर्णय नहीं लेता है तो पार्टी इस विषय पर चुनाव आयोग के कार्यालय पर धरना देगी। पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी ने निर्णय किया कि निकट भविष्य में उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश में होने वाले विधानसभा चुनावों व दिल्ली के नगर निगम चुनावों में राष्ट्र निर्माण पार्टी भाग लेगी। प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है एवं चुनावी रणनीति के संबंध में भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी में विचार विमर्श किया गया। प्रत्याशियों के चयन की प्रक्रिया में यह सुनिश्चित किया जाएगा कि कोई भी प्रत्याशी आपराधिक पृष्ठभूमि का न हो। दुर्भाग्य से राजनैतिक पार्टियों ने चुनावों को इतना महंगा बना दिया है कि सामान्य व्यक्ति चुनावों में खड़ा होने का साहस ही नहीं कर सकता। अतः पार्टी ने निश्चय किया राजनैतिक भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए आगामी चुनावों में सामान्य आर्थिक स्थिति के लोगों को पार्टी प्रत्याशी बनाएगी तथा चुनावों में कम से कम व्यय किया जाएगा, जिससे राजनैतिक भ्रष्टाचार के विरूद्ध भी संघर्ष तेज किया जा सके।

अपराधिक छवि वालों को क्यों दिया टिकट? : सुप्रीम कोर्ट

supreme court
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
राजनीति के अपराधीकरण को लेकर फरवरी 13 को सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया है। कोर्ट ने राजनीति के अपराधीकरण पर चिंता जताते हुए तमाम राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया है कि अपराधिक बैकग्राउंड वाले उम्‍मीदवारों को चिह्नित कर के 48 घंटों के भीतर उनकी पूरी प्रोफाइल पार्टी की वेबसाइट पर अपलोड करें।
कोर्ट ने कहा,’पिछले चार लोकसभा चुनावों में इसमें काफी वृद्धि हुई है। इस क्रम में सभी राजनीतिक पार्टियां अपराधिक पृष्ठभूमि के उम्मीदवार का नामांकन स्‍पष्‍ट होने के 48 घंटे के भीतर उम्मीदवार का अपराधिक रिकॉर्ड अपनी वेबसाइट पर प्रकाशित करें।‘ राजनीतिक क्षेत्र में बढ़ते अपराधीकरण को रोकने के प्रयास काफी समय पहले से किये जा रहे हैं।
अभी संपन्न हुए दिल्ली विधानसभा चुनाव में भी निर्वाचित सदस्यों में अपराधिक छवि का बोलबाला है। ऐसे में ज्वलंत प्रश्न यह है कि जब अपराधिक छवि वाले को कोई प्रतिष्ठित कंपनी तक नहीं नियुक्त करती, फिर किस आधार पर अपराधिक छवि वाले उन सदनों में जाते हैं, जहाँ कानून बनते हैं। सियासी पार्टियों से ज्यादा कसूरवार जनता भी है, जो इन्हे वोट देकर सदन में भेजते हैं। इन पर कोई कार्यवाही करने पर पुलिस और कोर्ट को भी नौकरी को ध्यान में रखना होता है। 

निर्वाचन आयोग को कोर्ट का निर्देश 
मीडिया के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को राजनीतिक पार्टियों को निर्देश दिया है कि अपराधिक पृष्‍ठभूमि वाले उम्‍मीदवारों के चयन का कारण अपनी वेबसाइटों पर अपलोड करें। साथ ही, कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को भी चेताया है कि इन निर्देशों का पालन नहीं किए जाने को अदालत की अवमानना माना जाएगा। ऐसे में यदि पार्टियों ने कोर्ट के निर्देश का पालन नहीं किया तो निर्वाचन आयोग इस मामले को कोर्ट तक ले आएगी।
राजनीतिक दलों को गाइडलाइन्स 
कोर्ट ने सियासी पार्टियों के लिए गाइडलाइन जारी की हैं। कोर्ट ने कहा है कि पिछले चार आम चुनावों से राजनीति में आपराधीकरण तेजी से बढ़ा है। इसके अनुसार, यदि राजनीतिक दलों द्वारा आपराधिक पृष्ठभूमि के व्यक्ति को टिकट दिया जाता है तो उसका आपराधिक विवरण पार्टी की वेबसाइट पर और सोशल मीडिया पर देना होगा। साथ ही, उन्‍हें यह भी बताना होगा कि किसी बेदाग को टिकट क्यों नहीं दिया गया।
सोशल मीडिया पर भी देनी होगा विवरण 
जस्टिस एफ नरीमन की अध्‍यक्षता वाली संवैधानिक पीठ ने राजनीतिक पार्टियों को यह भी निर्देश दिया है कि राजनीतिक पार्टियां ऐसे उम्‍मीदवारों के विवरण को फेसबुक और ट्विटर जैसे विभिन्न सोशल मीडिया प्‍लेटफार्म पर भी शेयर करें। इसके अलावा एक स्‍थानीय व एक राष्‍ट्रीय अखबार में भी इस विवरण को प्रकाशित किया जाए। शीर्ष कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे उम्‍मीदवारों के चयन के बाद 72 घंटों के भीतर उनके खिलाफ लंबित आपराधिक मामलों को लेकर राजनीतिक पार्टियों को इस बारे में चुनाव आयोग को सूचित करना होगा। 
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