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मोदी और अमित शाह नया नहीं नासिक का कार्पोरेट जिहाद, देशभर के KPO-BPO में निशाने पर हिंदू लड़कियाँ: पूर्व KPO कर्मी के तौर पर मैं बताऊँगा इस्लामी कट्टरपंथियों की मोडस ऑपरेंडी

                                                                                                                     प्रतीकात्मक चित्र (AI)

नौकरी चाहिए है? तो पहले नमाज पढ़ो… सैलरी हाइक या प्रमोशन चाहिए है? तो पहले बीफ खाओ… महाराष्ट्र के नासिक में मुस्लिम कट्टरपंथियों के ‘कॉरपोरेट जिहाद’ का शिकार बनी हिंदू युवतियों और महिलाओं ने ऐसे आरोप लगाए थे। आइए समझते हैं कि विवाद क्या था और इसी क्षेत्र में काम करते हुए मेरा क्या अनुभव रहा।

हाल ही में महाराष्ट्र के नासिक में ‘कॉरपोरेट जिहाद’ का मामला सामने आया है। टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) की एक BPO ऑफिस में हिंदू महिला कर्मचारियों को निशाना बनाकर उन्हें किस तरह इस्लामी जिहाद में फँसाया जा रहा था और इसको लेकर चर्चा हो रही है। सभी आरोपि मुस्लिम हैं और कंपनी में अच्छी और प्रभावशाली पोस्ट पर काम कर रहे थे। इस विवाद के सामने आने के बाद से BPO और KPO की कार्यप्रणाली को लेकर भी बहस शुरू हो गई है। ऐसे में इस क्षेत्र में काम करने का मेरा अनुभव भी शायद समाज के लिए उपयोगी हो सकता है।

मेरा अनुभव

जब पूरा शहर रात के अँधेरे में सो रहा होता है, तब इन चमकती हुई काँच की इमारतों में हजारों युवा जाग रहे होते हैं। आज मैं यह खुलासा करूँगा कि कॉर्पोरेट लाइफस्टाइल और आधुनिकता के नाम पर यहाँ क्या चल रहा है। आज ऑपइंडिया पर मैं अपना निजी अनुभव साझा कर रहा हूँ।
मैंने BPO और KPO सेक्टर में सालों तक काम किया है। मैंने वहाँ का माहौल देखा है, नेटवर्क देखा है और वहाँ की मानसिकता को करीब से अनुभव किया है। नासिक में महाराष्ट्र पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए गए 6 मुस्लिम टीम लीडर तो बस शुरुआत भर हैं। आज मैं इस बारे में बात करूँगा कि इन दफ्तरों के अंदर असली खेल कैसे खेला जाता है।

BPO-KPO सेक्टर के अंदर की सच्चाई

इस सेक्टर में नौकरी पाने के लिए आपको किसी बड़ी डिग्री की जरूरत नहीं होती। थोड़ी-बहुत अंग्रेजी जानने भर से ही आपको 20-30 हजार रुपए की नौकरी मिल जाती है। यहाँ मुख्य रूप से दो तरह के लोग काम करते हैं। एक तरफ वे लोग होते हैं जो बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे नहीं होते और एक ही जगह पर लंबे समय तक टिके रहना चाहते हैं। दूसरी तरफ कॉलेज जाने वाले हिंदू युवक-युवतियाँ होते हैं जो अपने खर्च निकालने के लिए रात में काम करते हैं।
मैं भी अपने कॉलेज के दिनों में अपने खर्च निकालने के लिए ऐसे ही एक BPO में रात की शिफ्ट में काम किया करता था। मैंने अपनी आँखों से देखा है कि जब कोई मुस्लिम व्यक्ति टीम लीडर (TL), ट्रेनर या HR जैसी किसी ऊँची पोस्ट पर पहुँच जाता है तो वह वहाँ के पूरे माहौल (ecosystem) को ही बदल देता है। वह बड़ी आसानी से अपने मजहब के युवाओं को इंटरव्यू पास करवाकर उन्हें इस सिस्टम के अंदर ले आता है।
हिंदू युवा आमतौर पर 2-3 साल में अपनी आगे की पढ़ाई पूरी करके दूसरे क्षेत्रों में चले जाते हैं। लेकिन ये लोग सालों तक एक ही जगह पर टिके रहते हैं, क्योंकि इन्हें आगे और पढ़ाई करने की जरूरत नहीं होती। इसका नतीजा यह होता है कि वे ट्रेनिंग से लेकर मैनेजमेंट तक की सभी अहम कुर्सियों पर काबिज हो जाते हैं और जब सत्ता उनके हाथों में आ जाती है तो उनका असली खेल शुरू होता है। और तब उनका असली निशाना होती हैं- नई-नई आई हुईं हिंदू लड़कियाँ।

सीक्रेट मुस्लिम वॉट्सऐप ग्रुप

नासिक के TCS केस में पुलिस जाँच में सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह हुआ कि इन जिहादियों ने ऑफिस के अंदर एक सीक्रेट मुस्लिम वॉट्सऐप ग्रुप बनाया हुआ था। इस ग्रुप में ऑफिस की हिंदू लड़कियों की तस्वीरें शेयर की जाती थीं। वहाँ इस तरह की चर्चाएँ होती थीं कि ‘आज किसका नंबर है?’, ‘कौन-सी लड़की कमजोर है जो जल्दी जाल में फँस जाएगी?’, ‘किसे किस तरह ब्लैकमेल करना है?’।
जो लड़की अपने टीम लीडर को अपना रक्षक मानती थी, वही टीम लीडर डिजिटल ग्रुप में उसी लड़की की बोली लगा रहा था। यह एक ‘डिजिटल मंडी’ थी, जहाँ हिंदू बेटियों की अस्मिता के सौदे हो रहे थे।

टीम आउटिंग और ब्लैकमेलिंग की रणनीति

मुझे याद है कि जब मैं काम करता था, तब ये लोग ‘टीम आउटिंग’ या ‘टीम डिनर’ के नाम पर बहुत जोर देते थे। नासिक के मामले में भी कुछ ऐसा ही हुआ। ये जिहादी पूरी टीम को आउटिंग पर ले जाते, जहाँ हिंदू लड़कियों का शारीरिक शोषण किया जाता, उनके आपत्तिजनक फोटो और वीडियो बनाए जाते और फिर धर्मांतरण के लिए ब्लैकमेलिंग शुरू कर दी जाती।
नासिक के अंबड पुलिस स्टेशन में दर्ज शिकायत में ऐसी बातें सामने आई हैं जिन्हें सुनकर खून खौल उठता है। कंपनी के मुस्लिम टीम लीडर्स और मैनेजर्स ने जैसे एक नियम बना दिया था कि अगर सैलरी हाइक या प्रमोशन चाहिए तो नमाज पढ़नी होगी और गौमांस खाना होगा।

हिंदू पुरुष भी टारगेट

ये लोग सिर्फ लड़कियों को ही नहीं बल्कि हिंदू लड़कों को भी निशाना बनाते हैं। उन्हें नशे की आदत में धकेलना, उनकी आस्था को तोड़ना और धीरे-धीरे उन्हें इस्लामी विचारधारा की ओर मोड़ना, यह सब ऑफिस के AC केबिन में बैठकर किया जाता है।
रात के समय जब कोई निगरानी करने वाला नहीं होता, तब ये जिहादी ऑफिस को अपने प्रचार का केंद्र बना देते हैं। नाइट शिफ्ट का सबसे बड़ा फायदा इन्हें यह मिलता है कि रात में पूरी दुनिया सो रही होती है। ब्रेक के नाम पर लड़कियों को बाहर ले जाना, होटलों में जाना तो यह सब आम बात बना दी जाती है। CCTV भले ही ऑफिस के फ्लोर पर लगे होते हैं लेकिन पार्किंग या बाहर क्या हो रहा है, इसकी कोई परवाह नहीं करता।

पूरे देश में फैला है नेटवर्क

नासिक पुलिस की कार्रवाई से यह साफ होता है कि यह कोई एक-दो लोगों का मामला नहीं बल्कि एक सुनियोजित नेटवर्क का हिस्सा हो सकता है। महाराष्ट्र पुलिस ने फिलहाल 6 लोगों को पकड़ा है लेकिन क्या इतना ही काफी है? गुजरात से लेकर दिल्ली तक कई कंपनियों में ऐसे मामलों को लेकर सवाल उठते रहे हैं।
असल में ऐसी कंपनियों के HR और मैनेजमेंट की भी जाँच होनी चाहिए। हर कंपनी की Prevention of Sexual Harassment (POSH) कमेटी में संतुलित और जवाबदेह प्रतिनिधित्व होना चाहिए ताकि पीड़ित महिलाओं को सही न्याय मिल सके।
माता-पिता से भी अपील है कि वे इस बात पर ध्यान दें कि उनके बेटे-बेटियाँ किस कंपनी में काम कर रहे हैं, उनका टीम लीडर कौन है और कार्यस्थल का माहौल कैसा है। कॉर्पोरेट कल्चर के नाम पर किसी भी तरह के शोषण या दबाव को नजरअंदाज न करें। अगर किसी के पास ऐसी कोई जानकारी हो, तो संबंधित अधिकारियों तक जरूर पहुँचाएँ क्योंकि समय पर उठाई गई आवाज किसी की जिंदगी बचा सकती है।
(साभार :यह खबर मूल रूप से गुजराती में लिखी गई है ; લિંકન સોખડિયા
Young and enthusiastic journalist, having modern vision though bound with roots. Shares deep interests in subjects like Politics, history, literature, spititual science etc.)

जब तक तुष्टिकरण में डूबे राजनीतिक दल सत्ता के लालच में इस्लामी कट्टरपंथियों को संरक्षण देंगे, तब तक हिंदू त्योहारों पर पत्थर चलते रहेंगे

                          हर हिंदू त्योहार पर पत्थरबाजी करना कट्टरपंथियों का पेशा बन गया है (फोटो- AI)
नवरात्रि और दशहरा बीत गया है। एक बार फिर इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिंदू आस्था को अपने आतंक से डराने की पूरी कोशिश की। हर बार की तरह वही कहानी फिर दोहराई गई, श्रद्धा और शोभायात्राओं के बीच कट्टरपंथियों ने पत्थरों की बारिश शुरू कर दी। कहीं, काँच की बोतलें फेंकी गईं। हर बीतते साल के साथ हिंदू त्योहारों पर कट्टरपंथियों की हिंसा बढ़ती जा रही है।

किसने पत्थर फेंके ये तो हमने देख लिया लेकिन फिर एक सवाल सामने आता है कि पत्थर क्यों फेंके गए? हर बार निशाने पर सिर्फ हिंदू त्योहार ही क्यों आते हैं? क्या कभी किसी ने सुना कि हनुमान चालीसा पढ़ने गए लोगों ने किसी पर पथराव किया हो? नहीं सुना, क्योंकि यह असहिष्णुता एकतरफा है।

नेपाल में भी दुर्गा विसर्जन के दौरान शोभायात्रा पर हमला किया गया। इससे साफ पता चलता है कि यह भारत की समस्या नहीं है बल्कि यह एक मानसिकता की समस्या है। यह मानसिकता क्या है? यह मानसिकता अपने मजहब को दूसरों की आस्था के ऊपर दिखाने की जिद है। यह मजहबी कट्टरता के साथ-साथ अपनी पहचान को आक्रामकता से दिखाने का सवाल भी है।

पहचान के संकट ने कट्टरपंथियों के अकीदे को हिंसा का हथियार बना दिया है। जब किसी समाज का एक हिस्सा अपनी जड़ों, अपनी संस्कृति और अपने भविष्य पर भरोसा खो देता है, तो वह अपनी असुरक्षा को आक्रामकता से ढकने की कोशिश करता है।

त्यौहारों पर झंडे लहराने वाले, पत्थर चलाने वाले और नारे लगाने वाले खुद को बहादुर समझते हैं जबकि असल में वे अपनी पहचान के संकट को चीख-चीखकर जाहिर कर रहे होते हैं।

भारत में यह प्रवृत्ति केवल सामाजिक नहीं रही, इसे राजनीतिक संरक्षण मिला है, जिससे यह और भी खतरनाक होती जा रही है। यह कट्टरपंथ राजनीति की गोद में पल रहा है। वोट बैंक की लालच में राजनीतिक दलों ने वर्षों से इस असहिष्णुता को ‘संवेदनशीलता’ का नाम दिया है।

देश में लगभग 15-16 प्रतिशत मुस्लिम मतदाता हैं, और यही संख्या कई राज्यों में जीत-हार तय कर सकती है। यही वजह है कि राहुल गाँधी हों या अखिलेश यादव, ममता बनर्जी हों या असदुद्दीन ओवैसी ये सब एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे हैं कि कौन खुद को बड़ा ‘मुस्लिम हितैषी’ दिखा सके।

बरेली में हाल में जो हुआ, वह इसका ताजा उदाहरण है। I Love Muhammad के नाम पर दंगाइयों ने उपद्रव किया। पुलिस पर गोली चलाई गईं, पत्थराव किया गया। जिसके बाद समाजवादी पार्टी का दल वहाँ दौड़ पड़ा, वो भी आरोपितों का पक्ष लेने के लिए। इन्हें दंगाई बेगुनाह नजर आते हैं और पुलिस-प्रशासन को ये अत्याचारी बताते हैं।

यह वही राजनीति है जिसने दंगाइयों को यह भरोसा दिला दिया है कि चाहे कुछ भी कर लो, ‘वोट बैंक’ के लिए कुछ दल तुम्हारे साथ खड़े हैं। तुम्हारे लिए वकील खड़े होंगे, तुम्हें बचाने वाले बयान आएँगे और मीडिया का एक हिस्सा तुम्हें पीड़ित दिखाने में जुट जाएगा।

यह सिलसिला नया नहीं है। दशकों से यही खेल चल रहा है। मजहब की आड़ में एक वर्ग ने आक्रामकता को सामान्य बना दिया है और यही सबसे खतरनाक है। क्योंकि जब समाज का कोई हिस्सा यह मान ले कि कानून से ऊपर उसकी मजहबी भावनाएँ हैं, तो फिर राज्य की सत्ता भी बेबस दिखने लगती है।

अब यह समझना होगा कि हर बार पत्थर चलने के बाद सिर्फ कुछ गिरफ्तारियाँ और बयान काफी नहीं हैं। यह मानसिकता तब तक नहीं बदलेगी जब तक समाज और राज्य मिलकर इसे वैचारिक स्तर पर चुनौती नहीं देंगे। यह कह देना कि ‘हर धर्म में कुछ कट्टर लोग होते हैं’ अब बहाना बन गया है।

क्योंकि यहाँ समस्या ‘कुछ’ की नहीं बल्कि एक मानसिकता की है जो हर उत्सव, हर धार्मिक पर्व पर आतंक का अपना चेहरा दिखाती है।

उत्तर प्रदेश : बरेली में साजिश के तहत भड़काई गई हिंसा : पत्थरों का ढेर, पेट्रोल वाली बोतलें और 5 दिनों की प्लानिंग

                                                   बरेली में हिंसा (फोटो साभार: दैनिक जागरण)
उत्तर प्रदेश के बरेली में जुमे की नमाज के बाद 26 सितंबर 2025 को ‘I Love Muhammad’ को लेकर प्रदर्शन के दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने हिंसा और पथराव किया है। इस हिंसा पर अब लगातार पुलिस अधिकारियों की और से बड़े खुलासे किए जा रहे हैं। पुलिस ने बताया कि यह हिंसा प्लान बनाकर की गई थी।

सत्ता के गलियारों में चर्चा है कि अक्सर मुस्लिम कट्टरपंथी और इनके समर्थक दंगाइयों को बचाने "बाहरी लोगों" द्वारा दंगा करने का बचाव करने वालों को बेनकाब करने tear gas के दो राउंड के बाद तीसरा राउंड जब तक blind firing का नहीं होगा दंगों पर अंकुश नहीं पाया जा सकता। दूसरे, blind firing में जख्मी होने वाले सभी स्थानीय ही मिलेंगे बाहरी नहीं। उसके बाद कोई किसी बच्चे या महिला को पत्थरबाज़ी करने आगे नहीं करेगा। 

सोशल मीडिया पर ज्योतिषों द्वारा यह भी चर्चा चल रही जो योग बन रहे हैं वह आंदोलन और दंगा जीवियों के लिए बहुत ही दर्दनाक होने वाला है। मानवाधिकार का शोर भी खूब मचेगा लेकिन सभी औंधे मुंह गिरेंगे।

     

कैसे शुरू हुई हिंसा ?

26 सितंबर 2025 को दोपहर 2 बजे आला हजरत मस्जिद में जुमे की नमाज के बाद कुछ लोग ‘I Love Muhammad’  लिखे पोस्टर लेकर बाहर आए। इसके बाद नौमहला मस्जिद में 3 बजे तक नमाज हुई। नमाज के बाद भीड़ इस्लामिया ग्राउंड की ओर बढ़ने लगी। पुलिस ने रोका तो पथराव शुरू हो गया।

धीरे-धीरे यह विवाद शहर के कई इलाकों में फैल गया, जिसमें नौमहला मस्जिद, शहर कोतवाली, नॉवेल्टी चौराहा, आजमनगर, जिला अस्पताल रोड, श्यामगंज मार्केट, बिहारीपुर शामिल है। इन इलाकों के साथ-साथ पूरे बरेली शहर के बाजार बंद करा दिए गए। माहौल इतना बिगड़ा कि शहर में अघोषित कर्फ्यू जैसे हालात हो गए।

प्लान बनाकर कट्टरपंथियों ने किया बवाल

घटना के बाद करीब 10 हजार पुलिसकर्मी, PAC और पैरामिलिट्री फोर्स बरेली में तैनात की गई। शहर के अलग-अलग हिस्सों में बैरिकेडिंग कर दी गई। माहौल बिगड़ने के बाद पुलिस ने हिंसा रोकने के लिए लाठीचार्ज और आँसू गैस के गोलों का इस्तेमाल किया।

DIG अजय कुमार साहनी ने बताया, “बाहर से भी कुछ लोग आए थे। अभी फोटो-वीडियो के आधार पर देखा जा रहा है कि कौन लोग थे और कहाँ से आए थे। निश्चित रूप से इसमें FIR दर्ज होगी। इसके पीछे जो भी जिम्मेदार लोग हैं, सबके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जाएगी। किसी भी प्रकार की कोई परमिशन नहीं थी।”

उन्होंने कहा, “सबको पहले ही बता दिया गया था कि यहाँ किसी तरह की धरना-प्रदर्शन की अनुमति नहीं है। 90 प्रतिशत लोगों ने इस बात को समझा और नमाज पढ़कर घर लौट गए। लेकिन, बाद में कुछ शरारती तत्व प्लान बनाकर आए और उन्होंने बवाल किया।”

DIG ने आगे कहा, “फायरिंग की घटनाओं में छर्रे लगे हैं। कुछ हथियार भी बरामद किए गए हैं। यह साफ है कि पहले से साजिश की गई थी। तभी अचानक इतने लोग सामने आए और पूरी तैयारी के साथ आए। ऐसे लोगों को चिह्नित किया गया है। मीडिया कर्मियों और प्रेस के लोगों को भी चोटें आई हैं। पथराव सबने देखा और वीडियो फुटेज की कवरेज भी की।”

इस हिंसा में 10 से ज्यादा पुलिसकर्मी घायल हुए हैं, जिनका इलाज जारी है। वहीं कई लोगों को हिरासत में लिया गया है, गिरफ्तारी की संख्या एकत्र की जा रही है। कुछ हथियार भी बरामद किए गए हैं, कुछ जगह फायरिंग के भी प्रमाण मिले हैं।

पुलिस को मिलीं खाली बोतलों से आ रही थी पेट्रोल की बदबू

कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में यहाँ तक भी दावा किया गया है कि बरेली में हिंसा की प्लानिंग पिछले करीब 5 दिनों से चल रही थी। साथ ही, इस प्रदर्शन के आयोजक के खिलाफ NSA लगाने की भी कार्रवाई पुलिस शुरू करने जा रही है। वहीं, पुलिस ने इस भीड़ को इकट्ठा करने वाले मौलाना तौकीर रजा को गिरफ्तार कर लिया है।

वहीं, पुलिस ने बताया कि घटनास्थल से पत्थरों का ढेर, कारतूस का खोखा, जिंदा कारतूस, एक तमंचा, लाठी-डंडा और खाली बोतल मिली हैं। इन खाली बोतलों से पेट्रोल की बदबू आ रही थी।

मोदी जी रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के साथ-साथ देश में कुकुरमुत्ते के तरह निकल रहे जेहादियों पर ब्रहमोस कब? मीडियाकर्मियों पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों के 13 मामले : दिल्ली… कर्नाटक… केरल… झारखंड या हो यूपी-उत्तराखंड, मुस्लिम भीड़ बनाती रही है हिंदू पत्रकारों को निशाना

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रहा है बहुत अच्छी बात है। पाकिस्तान में आतंकियों के अड्डों का पता लगाया जा सकता है लेकिन देश कुकुरमुत्ते की तरह उग रहे जेहादियों या कहा जाये कि भारत में ही पल रहे आतंकियों पर क्यों नहीं होती कार्यवाही? देश में ही पल रहे ये जेहादी पाकिस्तान में पल रहे आतंकियों से ज्यादा खतरनाक है। अगर इन पर कार्यवाही नहीं की गयी पाकिस्तान की बजाये भारत में जगह-जगह बने पाकिस्तान से लड़ना पड़ेगा। इन जेहादियों पर कार्यवाही करने के साथ-साथ इनके समर्थकों और आकाओं पर भी कार्यवाही होनी चाहिए। Victim Card खेलने वालों-बच्चों से लेकर महिलाओं तक-पर और भी सख्ती से पेश आनी की जरुरत है जो कुछ रुपयों की खातिर हमले कर माहौल ख़राब कर रहे हैं। इन जेहादियों के आगे तो कई बार तो पुलिस भी बेबस हो जाती है। पुलिस वालों का भी अपना परिवार होता है। भारत में जितने भी संवेदनशील इलाके हैं सभी में टियर गैस और blind firing के आर्डर के पुलिस को तैनात करना चाहिए। ताकि कोई जेहादी समर्थक यह न कहने पर कि बाहरी लोग थे।    
दिल्ली के सीमापुरी इलाके की बंगाली बस्ती में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) को ऑल इंडिया न्यूज़ की पत्रकार सुप्रिया पाठक और कैमरामैन श्याम पर इस्लामी कट्टरपंथियों की भीड़ ने जानलेवा हमला किया। बुर्का पहने महिलाओं ने न सिर्फ सुप्रिया को पीटा बल्कि उनके बाल भी खींचे।

मुस्लिम भीड़ द्वारा हिंदू पत्रकारों पर हमले की ये घटना ना तो पहली बार हुई है, ना ही इसमें कोई बात ऐसी है, जिसके चलते इसे नई घटना का दर्जा दिया जा सकता हो। यूँ तो अनगिनत घटनाएँ ऐसी रही हैं, लेकिन आइए उदाहरण के तौर पर उनमें से 14 घटनाओं पर विस्तार से चर्चा करते हैं।

सीमापुरी में All India News की पत्रकार सुप्रिया और कैमरामैन श्याम पर मुस्लिम भीड़ का हमला

दिल्ली के सीमापुरी इलाके की बंगाली बस्ती में शुक्रवार (4 जुलाई 2025) की शाम ऑल इंडिया न्यूज़ की पत्रकार सुप्रिया पाठक और उनके कैमरामैन श्याम पर मुस्लिमों की भीड़ ने जानलेवा हमला किया। यह हमला उस समय हुआ जब सरकारी जमीन पर अवैध अतिक्रमण और झुग्गी-झोपड़ी के मुद्दे पर सुप्रिया रिपोर्टिंग करने के लिए तैयार थी और उनके कैमरामैन श्याम बंगाली मार्केट के पास एक मस्जिद के सामने कैमरा लेकर खड़े थे।

मुस्लिम महिलाओं ने सुप्रिया के बाल खींचे, भीड़ ने दोनों को पत्थर और बेल्ट से मारा। इस हमले में सुप्रिया का एक पैर भी टूट गया। हमलावरों ने उनके कैमरा और माइक के साथ-साथ उनका फोन और पर्स भी छीन लिया।

दिल्ली में मुस्लिम भीड़ का हिंदू महिला पत्रकार पर हमला

दिल्ली में बुधवार (2 जुलाई 2025) को एक हिंदू महिला पत्रकार अवैध रुप से रह रहे कुछ मुस्लिमों से बात करने पहुँची थी। इसी बीच मुस्लिमों की भीड़ ने उसे घेर लिया और मारना शुरू कर दिया। कट्टरपंथियों ने महिला पत्रकार पर पत्थरों से हमला किया, जबकि वो केवल रिपोर्टिंग कर रही थी। जब उसने उनके वहाँ अवैध रुप से रहने पर सवाल उठाया तो भीड़ उसे चाकू दिखाकर डराने लगी।

जयपुर में मुस्लिमों के क्षेत्र में रिपोर्टिंग कर रही थी महिला, मुस्लिमों ने सरेआम दी धमकी

राजस्थान के जयपुर में 28 अप्रैल 2025 को एक महिला पत्रकार रिपोर्टिंग करने उस इलाके में पहुँची, जहाँ मुस्लिमों की संख्या हिंदूओं की अपेक्षा अधिक थी। इसी बीच मुस्लिम भीड़ ने महिला पत्रकार को कैमरा बंद करने के लिए कहा, जब उसने ऐसा करने से इंकार किया तो वे उसे धमकी देकर इलाके से भगाने लगे।

दिल्ली में वक्फ प्रदर्शन कर रही भीड़ का सुदर्शन न्यूज के पत्रकारों पर हमला

दिल्ली में 17 मार्च 2025 को मुस्लिम प्रदर्शनकारी वक्फ के विरोध में धरनारत थे। अन्य मीडियाकर्मियों की तरह ही सुदर्शन न्यूज के पत्रकारों ने भी वहाँ इकट्ठा हुए मुस्लिमों से इस बारे में सवाल किया। क्योंकि मुस्लिम जवाब ही नही दे पा रहे थे, इसलिए उन्हें पलट कर पत्रकारों पर ही हमला करना ठीक लगा। और तिलमिलाए कट्टरपंथियों ने सुदर्शन न्यूज के जर्नलिस्ट्स पर हमला कर दिया।

नैनीताल के हल्द्वानी में मुस्लिम भीड़ का अमर उजाला के पत्रकार पर हमला

नैनीताल के हल्द्वानी में 8 फरवरी 2024 को बनभूलपुरा में बने अवैध मस्जिद और मदरसों को गिराने के उद्देश्य से प्रशासनिक टीम पहुँची हुई थी। इस दौरान यहाँ मीडियाकर्मी भी मौजूद थे। अवैध होने के बावजूद मस्जिद को ढहाने के फैसले से नाखुश मुस्लिमों ने न सिर्फ प्रशासनिक समूहों से मारपीट की बल्कि पत्रकारों को भी पीटा।

इनमें वे पत्रकार भी शामिल थे, जिन्होंने कभी इन्ही कट्टरपंथियों के समर्थन में खबरें छापी थी। इस हमले में अमर उजाला के पत्रकार राजेंद्र सिंह बिष्ट भी चोटिल हुए थे। यही नहीं मुस्लिमों ने पुलिस स्टेशनों और पेट्रोल पंप को भी जलाने के साथ-साथ एक पुलिसकर्मी को भी जिंदा जलाने की कोशिश की थी।

उत्तराखंड के हल्द्वानी में चुन-चुन कर हुआ था हिंदू पत्रकारों पर हमला

उत्तराखंड के हल्द्वानी में फरवरी 2024 की हिंसा में दंगा करने वाले मुस्लिमों ने पुलिस प्रशासन और वहाँ रिपोर्टिंग कर रहे हिंदू पत्रकारों की पहचान कर उनपर हमला किया था। समाचारपत्र अमृत विचार के पत्रकार संजय भी इसमें घायल हुए थे। उनकी हालत इतनी नाजुक थी कि कई दिनों तक वे ICU में भर्ती थे।

लखनऊ में मोनिस और एहसान ने काट दी थी पत्रकार की उंगलियाँ

उत्तर प्रदेश के लखनऊ में 29 अप्रैल 2025 को जाने-माने साहसी पत्रकार कवि तिवारी पर मोहम्मद मोनिस, मोहम्मद एहसान और उसके साथियों ने घात लगाकर हमला कर दिया। इन मुस्लिम हमलावरों ने कवि तिवारी पर उस वक्त हमला किया, जब वे मंदिर जा रहे थे।

अचानक हुए इस हमले में उन्हें गंभीर चोटें आई। हमलावरों ने उन पर चाकू से कई बार गंभीर वार किए, जिसके चलते उनकी उंगलियाँ ही नहीं मुँह भी बुरी तरह से कट गया।

झारखंड में मुस्लिमों ने घंटों तक रोके रखी महिला पत्रकार की कार

झारखंड के पाकुड़ में 18 अक्टूबर 2024 को महिला पत्रकार अर्चना अवैध रोहिंग्या और बांग्लादेशियों पर रिपोर्टिंग करने पहुँची थी। जिस समय उसकी कार पाकुड़ से गुजर रही थी। उसी समय मुस्लिमों ने अर्चना के पास पहुँचकर उन्हें धमकी दी। मुस्लिमों ने उनकी कार को रोककर काफी देर हंगामा किया। और उन्हें जाने से रोके रखा। वहाँ किसी तरह अर्चना ने खुद की जान बचाई और निकल पाई।

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में महिला पत्रकार के साथ मारपीट

उत्तर प्रदेश के गाजीपुर में 31 मार्च 2024 को मुख्तार अंसारी के निधन के बाद रिपोर्टिंग करने पहुँची महिला पत्रकार अर्चना तिवारी पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया था। यहाँ अर्चना को घेरने की कोशिश की गई। रिपोर्टिंग के दौरान महिला पत्रकार के साथ धक्का-मुक्की भी की गई। इस हमले में अर्चना को चोट भी आई।

दैनिक जागरण के पत्रकार पर मुस्लिम भीड़ का हमला

उत्तरप्रदेश के बुलंदशहर में 10 जुलाई 2024 को दैनिक जागरण के पत्रकार अमित पर मुस्लिम समुदाय के लोगों ने धारदार हथियार से हमला किया था। इसमें उन्हें गंभीर चोटें आई थी। बड़ी मुश्किल से अमित ने मुस्लिम भीड़ से अपनी जान बचाई थी।

रिपोर्टिंग कर रहे पत्रकार पर मुस्लिम भीड़ के इशारे के बाद हमला

सुदर्शन न्यूज का एक पत्रकार 31 अगस्त 2023 को रिपोर्टिंग कर रहा था। इसी बीच एक मुस्लिम व्यक्ति ने उन पर हमला कर दिया। इतना ही नहीं पत्रकार के ऊपर अपनी गाड़ी चढ़ाने की भी कोशिश की। जिसकी वजह से पत्रकार जमीन पर गिर गया था।

कर्नाटक में गोहत्या का खुलासा करने वाली महिला पत्रकार पर मुस्लिम भीड़ का हमला

कर्नाटक में हसन जिले के पेंशन मोहल्ले में 5 दिसंबर 2020 को अवैध रूप से गोहत्या करने वाले गिरोह की सच्चाई सामने लाने वाली एक महिला पत्रकार पर मुस्लिम भीड़ ने हमला कर दिया। भीड़ में शामिल बुर्काधारी महिलाओं ने महिला पत्रकार के साथ दुर्व्यवहार तो किया ही उन्हें जान से मारने की धमकी भी दी।

केरल में रिपब्लिक टीवी की पत्रकार पूजा प्रसन्ना पर मुस्लिम भीड़ का हमला

केरल के पतनमतिट्टा में 17 अक्टूबर 2018 को सबरीमाला मंदिर पर कवरेज के दौरान रिपब्लिक टीवी की पत्रकार पूजा प्रसन्ना पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया था। इस बीच इस्लामी कट्टरपंथियों ने पूजा प्रसन्ना की कार का शीशा तोड़ने की भी कोशिश की।

कर्नाटक में अवैध बूचड़खाने की रिपोर्टिंग करने पर इंडिया टूडे के पत्रकार पर हमला

कर्नाटक के रामनगर जिले के कोडिपल्या गाँव में 10 अगस्त 2018 को अवैध बूचड़खानों के खिलाफ छापेमारी के दौरान इंडिया टुडे के एक पत्रकार रिपोर्टिंग कर रहे थे इसी बीच मुस्लिम भीड़ ने बूचड़खाने के बाहर पत्रकार और पुलिस की टीम कर हमला कर दिया। यहाँ छापेमारी के बाद 71 बछड़ों को छुड़ाया गया था, वहीं 7 आरोपितों के खिलाफ FIR भी दर्ज की गई थी।
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सोचने वाली बात है कि आखिर इस्लामी कट्टरपंथियों की ऐसी कौन सी योजना है, जिसको छिपाने की कोशिश में ये इस निर्ममता पर उतर आते हैं। जब किसी अवैध निर्माण के लिए पत्रकार इनसे सवाल करते हैं और इन मुस्लिमों के पास जवाब नहीं होता, तो ये जानलेवा हमला कर अपने गलत मंसूबों की सच्चाई सामने आने से बचाने में जुट जाते हैं।

भारत ने बांग्लादेश को दिया 1200 करोड़+ रूपए का झटका: कपड़े, ड्रिंक्स और अब जूट… आयात पर लगाया प्रतिबन्ध, आदेश में कहा- जमीन के रास्ते नहीं घुसने देंगे

             भारत ने बांग्लादेश से आने वाले जूट पर प्रतिबन्ध लगा दिया है (फोटो साभार: Assam Tribune)
इस्लामिक कट्टरपंथी जिस जहरीली सोंच के साथ हिन्दुओं पर अत्याचार कर अपने इस्लाम को फ़ैलाने का जो काम करके अपने आपको सुरमा भोपाली समझ रहे, भूल रहे हैं कि आज का भारत 2014 से पहले का भारत नहीं है। जो सख्तियां पाकिस्तान और बांग्लादेश पर हो रही हैं, वह दिन भी ज्यादा दूर नहीं जब पत्थरबाजों और पेट्रोल बम फेंकने वालों और उनके समर्थकों की दुर्दशा होने वाली है। बहुत victim card, गरीब और मजलूम होने का खेला खेल लिया। 
बांग्लादेश में तख्ता पलट के बाद जिस तरह हिन्दुओं पर अत्याचार करने पर सोंच रहे हैं कि हिन्दू करेगा क्या? बिकाऊ जेहादी भूल रहे हैं कि अब तुम्हें वो चोट दी जा रही जिसे बिकाऊ और हुरदंगी समझ नहीं रहे। बांग्लादेश की पाकिस्तान से कहीं ज्यादा दुर्दशा होने वाली है। इन बिकाऊ कट्टरपंथियों ने कुछ ही महीनों में बांग्लादेश को 20 साल पीछे धकेल दिया है। आखिर मुस्लिम देश भी कब तक किस-किस को भीख देते रहेंगे?     

तख्तापलट के बाद बांग्लादेश की सत्ता में आई मोहम्मद यूनुस के पेंच मोदी सरकार ने कसने चालू कर दिए हैं। भारत विरोधी रवैया अपनाने वाले बांग्लादेश को भारत ने आर्थिक फ्रंट पर एक और झटका दिया है। भारत ने बांग्लादेश से जूट के आयात पर पर प्रतिबन्ध लगा दिया है। इससे बांग्लादेश के निर्यात बड़े स्तर पर प्रभावित होने की आशंका है। भारत इससे पहले भी भी बांग्लादेश से आने वाले कई उत्पादों के आयात पर प्रतिबन्ध लगा चुका है।

क्या है फैसला?

विदेशी व्यापार महानिदेशक (DGFT) के 27 जून, 2025 के एक आदेश के अनुसार, बांग्लादेश से आने वाले जूट और कई तरह के यार्न के भारत में निर्यात पर प्रतिबन्ध लगा दिया गया है। आदेश में कहा गया है कि बांग्लादेश और भारत की सीमा पर कहीं से भी यह उत्पाद भारत में नहीं आने दिए जाएँगे।
बांग्लादेश इन उत्पादों को किसी दूसरे रास्ते से भी भारतीय बाजारों में नहीं उतार सकता है, यह भी इस आदेश में स्पष्ट कर दिया गया है। इसमें लिखा गया है कि बांग्लादेश के जूट और यार्न को भूटान और नेपाल के रास्ते भारत में आने की अनुमति नहीं दी जाएगी।
                                               बांग्लादेश से जूट निर्यात को रोकने वाला आदेश
DGFT के आदेश हालाँकि यह छूट दी गई है कि बांग्लादेश मुंबई स्थित न्हावा शेवा बंदरगाह से यह उत्पाद भारत में भेज सके। इसके अलावा भारत ने यह छूट भी बांग्लादेश को दी है कि वह भारत के रास्ते अपने यह उत्पाद भूटान और नेपाल में भेज सके।
अगस्त, 2025 में प्रधानमंत्री शेख हसीना के तख्तापलट के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में खटास आई है। बांग्लादेश के लापरवाह क़दमों की वजह से भारत ने भी उनका जवाब देना चालू कर दिया है। भारत व्यापार के रास्ते बांग्लादेश के लिए अब बंद कर रहा है।

भारतीय जूट उद्योग हो रहा था प्रभावित

इकॉनोमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने वर्ष 2023-24 में बांग्लादेश से 144 मिलियन डॉलर (लगभग ₹1230 करोड़) का जूट आयात किया था। भारत ने इससे पहले यह आयात कम करने को कई बार प्रयास भी किए, पर बांग्लादेशी व्यापारियों की बेईमानी के चलते यह काम नहीं आया।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि बांग्लादेश का जूट भारत में ना आने देने के पीछे और भी कई कारण हैं। इस मामले से जुड़े लोगों ने बताया है कि बांग्लादेश जूट को भारत में डंप करने के लिए अपने यहाँ सब्सिडी देता है और भारत-बांग्लादेश के बीच मुक्त व्यापार समझौते का गलत लाभ उठाता है।

यह भी बताया गया है कि बांग्लादेश के व्यापारी कई कानूनी लूपहोल्स का फायदा उठाते हैं और भारतीय बाजार को प्रभावित करते हैं। इसके चलते भारत में जूट का बाजार और उसका उत्पादन प्रभावित होता है आया है। इसका सीधा असर भारत और विशेष कर पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा के ग्रामीण इलाकों में पड़ा है, जहाँ जूट बड़ी आबादी की आय का स्रोत है।

रिपोर्ट्स बताती हैं कि बांग्लादेश के भारत में अनियंत्रित तरीके से जूट भेजने के चलते यहाँ जूट मिल्स भी ढंग से नहीं चल पा रही हैं। जूट उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले भारतीय जूट मिल्स एसोसिएशन ने वर्ष 2024 में इस मामले में केन्द्र सरकार से सहायता भी माँगी थी।

 जूट मिल्स एसोसिएशन ने कहा था कि 2024 में जूट की बम्पर फसल के बावजूद बांग्लादेश से बड़ी मात्रा में जूट का आयात किया गया क्योंकि उसके दामों में अंतर था। जूट मिल्स एसोसिएशन ने कहा था कि भारतीय मिलें इसके चलते भुगतान नहीं कर पर रहीं हैं। अब इस फैसले से भारतीय उत्पादकों और मिलों को कुछ राहत मिलने की संभावना है।

पहले ही लग चुके कई प्रतिबन्ध

यह कोई पहला मौक़ा नहीं है जब भारत ने बांग्लादेश पर व्यापारिक प्रतिबन्ध लगाए हों। बांग्लादेश ने इसकी शुरुआत की थी। बांग्लादेश ने अप्रैल, 2025 में भारत मछली, कपड़े समेत कई उत्पादों के आयात पर रोक लगा दी थी। उसने अपने रास्ते का इस्तेमाल करने देने के लिए भी भारत से 1.8 टका प्रति टन का शुल्क लेना चालू कर दिया था।

बांग्लादेश ने यहाँ तक कि दूध के पाउडर तक के भारत से आयात पर रोक लगा दी थी। इसके जवाब में भारत ने मई, 2025 में बांग्लादेश से आने वाले रेडिमेड कपड़ों, प्रोसेस्ड फ़ूड और फ्रूट ड्रिंक्स आदि पर प्रतिबन्ध लगा दिया था। भारत ने बांग्लादेश से आने वाले प्लास्टिक और लकड़ी के सामान पर भी कई तरह के प्रतिबन्ध लगाए थे।

भारत ने कहा था कि वह अब बांग्लादेश से आने वाले कार्बोनेटेड ड्रिंक्स, बेक्ड सामान, स्नैक्स, चिप्स और कन्फेक्शनरी, कपास और कॉटन याम अपशिष्ट, प्लास्टिक और पीवीसी से तैयार सामान और लकड़ी के फर्नीचर के सामान को असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम और पश्चिम बंगाल में किसी भी जमीनी पोर्ट के माध्यम से घुसने नहीं देगा।

भारत द्वारा लगाए इन प्रतिबन्धों के चलते बांग्लादेश को वार्षिक तौर 770 मिलियन डॉलर (₹6500 करोड़+) का नुकसान होने का अनुमान लगाया गया था। यह बांग्लादेश के भारत को कुल निर्यातों का लगभग 42% बनता है। भारत व्यापार के मामले में बांग्लादेश का दूसरा सबसे बड़ा पार्टनर है।

मोहम्मद यूनुस की सरकार ने बनाया है द्वेष का माहौल

अगस्त, 2024 में शेख हसीना की सरकार को इस्लामी कट्टरपंथियों ने सत्ता से हटा दिया था। इसके कुछ दिनों बाद मोहम्मद यूनुस को अंतरिम सरकार के मुख्य सलाहकार के तौर पर देश का मुखिया बनाया गया था। मोहम्मद यूनुस की सरकार लगातार भारत विरोधी कदम उठा रही है।

उसने भारत की अपेक्षा पाकिस्तान से रिश्ते मजबूत किए और यहाँ तक कि पाकिस्तान के फौजी जनरलों को भी बुलाया। मोहम्मद यूनुस ने चीन में जाकर भी भारत के उत्तरपूर्वी हिस्से को लेकर एक विवादित बयान दिया था। इसके अलावा मोहम्मद यूनुस की सरकार आने के बाद बांग्लादेश में लगातार हिन्दुओं पर हमले हो रहे हैं।

बांग्लादेश की मोहम्मद यूनुस की सरकार हिन्दुओं पर हमले रोकने के बजाय उन्हें मानने तक से इनकार करती आई है। इसके चलते भी दोनों देशों के रिश्तों में खटास है। हाल ही में बांग्लादेश में अवैध बता कर एक हिन्दू मंदिर को फौजी बुलाकर गिरा दिया गया था। भारतीय विदेश मंत्रालय ने इसकी कड़ी आलोचना की थी।

बांग्लादेश भारत ने शेख हसीना को शरण दिए जाने को लेकर भी प्रलाप करता आया है। हालाँकि, भारत ने अब तक बांग्लादेश के क़दमों पर नरमी ही बरती है।