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सच उगलने तक कस्टडी में रखो’: TCS नासिक कांड में निदा खान को नहीं मिली बेल, प्रेग्नेंसी के नाम पर माँग रही थी राहत

                                      निदा खान की जमानत याचिका खारिज (साभार : Dall-E)
नासिक की एक अदालत ने 2 मई को TCS धर्मांतरण मामले की आरोपित निदा एजाज खान को अग्रिम 
जमानत देने से मना कर दिया है। कोर्ट का कहना है कि अब तक की जाँच से साफ है कि निदा एक सोची-समझी साजिश में शामिल थी, जिसका मकसद पीड़िता को बहला-फुसलाकर उसका धर्म बदलवाना था

जज केजी जोशी ने अपने आदेश में कहा कि यह मामला काफी गंभीर है, इसलिए सच्चाई का पता लगाने के लिए निदा को पुलिस हिरासत में लेकर पूछताछ करना बहुत जरूरी है। निदा के खिलाफ देवलाली पुलिस स्टेशन में अलग-अलग धाराओं और SC/ST एक्ट के तहत केस दर्ज है।

कोर्ट में निदा खान की सफाई: क्या थीं बचाव पक्ष की दलीलें?

निदा खान के वकील ने कोर्ट में सफाई देते हुए कहा कि निदा और पीड़िता बस साथ में काम करने वाले सहकर्मी थे और एक-दूसरे को जानते थे। उन्होंने निदा पर लगे सभी आरोपों को गलत बताते हुए कहा कि उन्हें जानबूझकर फँसाया गया है, जबकि मुख्य आरोप तो दानिश और तौसीफ पर हैं। वकील का यह भी कहना था कि ऐसा कोई सबूत नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि निदा ने सबके सामने जाति को लेकर पीड़िता का अपमान किया हो।

आगे दलील दी गई कि महाराष्ट्र में धर्म बदलने को लेकर कोई अलग कानून नहीं है और जिस धारा (BNS 299) का जिक्र हो रहा है, वह धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के लिए है, न कि धर्म परिवर्तन के लिए। वकील के मुताबिक, धर्म पर सामान्य चर्चा करना कोई अपराध नहीं है और इसमें केवल जमानत मिलने वाली धाराएँ ही लगनी चाहिए। साथ ही, निदा के गर्भवती होने का हवाला देते हुए कहा गया कि इस हालत में गिरफ्तारी उनके होने वाले बच्चे की सेहत के लिए बहुत खतरनाक हो सकती है।

अभियोजन पक्ष का कड़ा रुख: ‘निदा खान सिर्फ मूकदर्शक नहीं, बल्कि मुख्य साजिशकर्ता’

अभियोजन पक्ष ने निदा खान की अग्रिम जमानत का पुरजोर विरोध किया। कोर्ट को बताया गया कि जुलाई 2023 से 2026 के बीच निदा खान और अन्य आरोपितों ने मिलकर पीड़िता पर धर्मांतरण के लिए दबाव बनाया। सरकारी वकील ने दलील दी कि निदा ने न केवल पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई, बल्कि FIR में भी उसके नाम और भूमिका का स्पष्ट जिक्र है। जाँच से यह संकेत मिले हैं कि सभी आरोपितों ने आपस में संपर्क कर इस पूरी साजिश को अंजाम दिया है।

कोर्ट को सूचित किया गया कि निदा खान इस मामले में कोई मामूली भूमिका में नहीं थी। वह ऑफिस में ब्रेक के दौरान पीड़िता से बात करती थी और इस्लाम कबूलने के लिए उसका ब्रेनवॉश करती थी। आरोप है कि उसने पीड़िता को खास मजहबी प्रथाओं का पालन करने के लिए मजबूर करने में अहम भूमिका निभाई। अभियोजन पक्ष ने अपनी दलीलों के समर्थन में पीड़िता, उसकी माँ और भाई के बयानों को आधार बनाया।

जाँच अधिकारी ने कोर्ट को बताया कि निदा खान ने ही पीड़िता को बुर्का और इस्लाम से जुड़ी किताबें मुहैया कराई थीं। पीड़िता के फोन में एक ऐसा ऐप भी मिला, जिसे धर्मांतरण के इरादे से इंस्टॉल करवाया गया था। इसके अलावा, निदा उसे यूट्यूब और इंस्टाग्राम के ऐसे लिंक भेजती थी जिनमें मजहबी उपदेश होते थे। पुलिस का कहना है कि इन सामग्रियों के सोर्स (Source) और निदा के बाहरी संपर्कों की गहराई से जाँच करना जरूरी है।

सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह था कि निदा खान पीड़िता के घर भी जाती थी। वहाँ उसने पीड़िता को नमाज पढ़ने की ट्रेनिंग दी और उसे हिजाब व बुर्का पहनने के निर्देश दिए। अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता का नाम बदलकर ‘हानिया’ रखने की योजना थी। यही नहीं, उसे मलेशिया भेजने की भी तैयारी थी और इसके लिए ‘मालेगाँव पार्टी’ की मदद से दस्तावेज बनवाए जाने थे। इन तमाम विदेशी कड़ियों और बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए कोर्ट से आरोपित की कस्टडी (हिरासत) की माँग की गई।

पीड़िता के वकील का दावा: पद का फायदा उठाकर बनाया धर्मांतरण का दबाव

सुनवाई के दौरान पीड़िता के वकील ने विस्तार से बताया कि कैसे निदा खान और अन्य आरोपितों ने मिलकर पीड़िता का ब्रेनवॉश किया। वकील ने आरोप लगाया कि निदा और बाकी आरोपितों ने कंपनी में अपने ऊँचे पदों का गलत इस्तेमाल किया ताकि पीड़िता पर दबाव बनाया जा सके। उन्हें न केवल इस्लाम का पालन करने के लिए मजबूर किया गया, बल्कि उनकी मर्जी के खिलाफ उन्हें मांसाहारी (Non-veg) खाना खाने के लिए भी विवश किया गया। इसके अलावा, कोर्ट को बताया गया कि आरोपित हिंदू देवी-देवताओं के खिलाफ अश्लील टिप्पणियाँ करते थे और ऑफिस में पीड़िता को उनकी जाति को लेकर अपमानित किया जाता था।

पीड़िता के पक्ष ने एक और गंभीर बात कोर्ट के सामने रखी। उन्होंने कहा कि निदा खान सिर्फ पीड़िता तक ही सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उसके परिवार को भी धर्मांतरण के लिए मजबूर करने की कोशिश की। इसके लिए बाकायदा धमकी भरे और डराने वाले तरीके अपनाए गए ताकि पूरे परिवार पर दबाव बनाया जा सके। इन दलीलों के जरिए कोर्ट को यह समझाने की कोशिश की गई कि यह मामला केवल आपसी बातचीत का नहीं, बल्कि एक गहरी और डरावनी साजिश का हिस्सा है।

कोर्ट का फैसला: ‘पहली नजर में आरोपित की भूमिका साफ दिखती है’

दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, कोर्ट ने सह-आरोपितों और निदा खान की भूमिकाओं के बीच एक स्पष्ट अंतर बताया। जज ने गौर किया कि जहाँ अन्य दो आरोपित पहली नजर में भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 69 और 75 के तहत अपराधों में शामिल थे, वहीं निदा खान की भूमिका धारा 299 और SC/ST एक्ट के प्रावधानों के तहत दिखाई दे रही है।

जज ने विशेष रूप से इस बात पर जोर दिया कि FIR में न केवल निदा खान का नाम शामिल है, बल्कि उसकी भूमिका का भी साफ जिक्र है। कोर्ट ने कहा कि उपलब्ध सबूतों से पता चलता है कि आरोपितों ने हिंदू देवी-देवताओं के बारे में ‘आपत्तिजनक कहानियाँ’ सुनाईं और पीड़िता की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई। कोर्ट के आदेश में यह भी दर्ज किया गया है कि निदा खान ने पीड़िता को बुर्का दिया था। इसके अलावा, आरोपितों ने उसे पैगंबर मोहम्मद के जीवन पर आधारित एक किताब दी और निदा खान खुद पीड़िता के घर जाकर उसे मजहबी ट्रेनिंग देती थी।

कोर्ट की टिप्पणी: ‘यह कोई साधारण बातचीत नहीं, बल्कि सुनियोजित साजिश’

कोर्ट ने अपनी बातों को और स्पष्ट करते हुए कहा कि पीड़िता और निदा खान के बीच धर्म पर हुई बातचीत कोई इत्तेफाक या साधारण चर्चा नहीं थी। रिकॉर्ड में मौजूद सबूत साफ दिखाते हैं कि पीड़िता को फँसाने के लिए बहुत ही सलीके से और योजना बनाकर काम किया गया था। जज ने इस बात को गंभीरता से रखा कि यह अपराध कोई छोटा-मोटा मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई गहरी परतें और एक बहुत बड़ी साजिश छिपी हुई है।

अदालत ने उन सबूतों पर भी कड़ी चिंता जताई, जिनसे पता चला कि आरोपित पीड़िता का नाम बदलना चाहते थे और उसे मलेशिया भेजने की तैयारी में थे। जज ने साफ कहा कि हमारा संविधान हर किसी को अपनी पसंद का धर्म और नाम चुनने की आजादी देता है, लेकिन किसी का ब्रेनवॉश करके या साजिश रचकर उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करना बिल्कुल गलत है। कोर्ट ने माना कि व्यक्ति के अधिकार अपनी जगह हैं, लेकिन किसी को धोखे का शिकार बनाकर उसका धर्म बदलवाना कानूनी रूप से अपराध है।

कोर्ट का फैसला: ‘सच उगलवाने के लिए पुलिस कस्टडी है जरूरी’

कोर्ट ने साफ कहा कि इस केस की पूरी सच्चाई सामने लाने के लिए आरोपित को पुलिस की गिरफ्त में रखना जरूरी है। कोर्ट का मानना है कि यह मामला काफी पेचीदा है, क्योंकि जाँच में ‘मालेगाँव पार्टी’ के साथ-साथ कई अन्य शहरों और विदेशों के नाम भी जुड़े मिले हैं। खासकर मलेशिया में बैठे ‘इमरान’ जैसे लोगों और इस अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क का पर्दाफाश करने के लिए हिरासत में पूछताछ करना बेहद आवश्यक है, ताकि इस पूरी साजिश की हर कड़ी को जोड़ा जा सके।

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प्रेग्नेंसी की दलील भी नहीं आई काम, कोर्ट ने ठुकराई राहत

निदा खान के वकील ने दलील दी कि वह गर्भवती है और गिरफ्तारी का उसके होने वाले बच्चे पर बुरा असर पड़ सकता है। लेकिन सरकारी वकील ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इतने गंभीर मामले में सिर्फ प्रेग्नेंसी के आधार पर कानून में कोई अलग छूट नहीं मिलती। कोर्त ने इस बात को सही माना और कहा कि अग्रिम जमानत जैसी बड़ी राहत केवल बहुत ही खास और मजबूरी वाले हालात में दी जाती है, जो इस केस में कहीं नहीं दिखते। इन्हीं वजहों से जज ने निदा खान की याचिका में कोई दम न पाते हुए उसकी जमानत की अर्जी को पूरी तरह खारिज कर दिया।