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ये चुनावी दिनों में ही क्यों घोटाले की जाँच सामने आती है? इतने सालों से चल रही जाँच लेकिन कोई सजा नहीं? ED ने गुरुग्राम की विवादित लैंड डील में रॉबर्ट वाड्रा, उनकी कंपनियों के खिलाफ दाखिल की चार्जशीट: 43 संपत्तियाँ हो चुकी हैं कुर्क

ये चुनावी मौसम में जो घोटालों की जाँच सामने आती है, शंका पैदा करती है कि 'क्या घोटाला हुआ था या नहीं, इतने सालों की जाँच में क्या पाया? किसी भी नेता का घोटाला हो चुनावी दिनों में सुनने को मिलते हैं। अगर यही घोटाले किसी सामान्य नागरिक ने किये होते कभी जाँच पूरी कर दोषी पाए जाने पर जेल हो गयी होती, लेकिन जहाँ सियासत हो तो ये सब ड्रामेबाज़ी। अगर घोटाला है जल्दी जाँच पूरी कर भेजो जेल।  
दूसरे, दिल्ली के भूतपूर्व मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल के खिलाफ कितने घोटालों पर शोर हुआ, जेल जाना और आना पर्यटन बन गया था। चुनाव होने के बाद सारे घोटाले क्या ठंठे बस्ते में चले गए हैं? क्या हुआ CAG रिपोर्ट्स का? क्या कार्यवाही हुई? या फिर यही समझा जाए कि जिस तरह केजरीवाल चुनावी रैलियों में तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित के घोटालों को दिखाकर जेल भेजने की बात करते थे शीला स्वर्ग सिधार गयी लेकिन कुछ नहीं किया, मतलब क्या वही दौर दोहराया जा रहा है? मसला सिर्फ केजरीवाल का ही नहीं, कई नेता हैं जिन पर किसी न किसी घोटाले में जो जमानत हुई मामला शांत हो गया। अगर यही घोटाले किसी आम नागरिक ने किये होते क्या उनके साथ भी सरकार से लेकर कोर्ट तक ऐसी ही नरमी बरतती? क्या नेताओं और आम नागरिक के अलग कानूनी प्रक्रिया होती है?

             
प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने हरियाणा के गुरुग्राम स्थित शिखोपुर लैंड डील मामले में कांग्रेस नेता प्रियंका गाँधी वाड्रा के पति रॉबर्ट वाड्रा सहित 11 लोगों और संस्थाओं के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की है। यह चार्जशीट गुरुवार (17 जुलाई 2025) को नई दिल्ली की राउज एवेन्यू स्थित विशेष PMLA कोर्ट में दाखिल की गई।

रिपोर्टस के अनुसार, यह मामला मनी लॉन्ड्रिंग और भ्रष्टाचार से जुड़ा है, जिसमें वाड्रा की कंपनी पर भारी मुनाफा कमाने और नियमों का उल्लंघन करने के गंभीर आरोप लगे हैं।

मामला वर्ष 2008 में गुरुग्राम के शिखोपुर गाँव (अब सेक्टर 83) की 3.53 एकड़ जमीन की खरीद से जुड़ा है। ED के अनुसार, रॉबर्ट वाड्रा की कंपनी स्काई लाइट हॉस्पिटैलिटी प्रा लि ने यह जमीन ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज से महज 7.5 करोड़ रुपये में खरीदी थी।

कुछ ही महीनों में हरियाणा सरकार ने इस जमीन पर व्यावसायिक कॉलोनी के लिए लाइसेंस दे दिया, जिससे जमीन की कीमत लगभग 700% बढ़ गई। इसके बाद सितंबर 2012 में इस जमीन को DLF को करीब 58 करोड़ रुपये में बेच दिया गया।

उस वक्त हरियाणा में कॉन्ग्रेस की भूपिंदर सिंह हुड्डा की सरकार थी। इस सौदे की जाँच तत्कालीन IAS अधिकारी अशोक खेमका ने शुरू की और म्यूटेशन रद्द कर दिया। उन्होंने इसे भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद का मामला बताया।

इसी के आधार पर 1 सितंबर 2018 को गुरुग्राम पुलिस ने FIR दर्ज की। इसके बाद ED ने मनी लॉन्ड्रिंग की जाँच शुरू की। कहना है कि इस सौदे से जो मुनाफा हुआ, उसे मनी लॉन्ड्रिंग के जरिए इधर-उधर घुमाया गया।

रॉबर्ट वाड्रा को अप्रैल 2025 में तीन दिनों तक पूछताछ के लिए बुलाया गया था, जहाँ उनके बयान PMLA के तहत दर्ज किए गए। वाड्रा ने इन सभी आरोपों को राजनीति से प्रेरित बताया है और कहा है कि उन्होंने जाँच में पूरा सहयोग किया है और 23000 से ज्यादा पेज के दस्तावेज भी सौंपे हैं।

इस चार्जशीट में रॉबर्ट वाड्रा के अलावा उनकी कंपनियों, सत्यनंद याजी, केवल सिंह विर्क और ओंकारेश्वर प्रॉपर्टीज प्रा. लि. को आरोपित बनाया गया है। इसके अलावा बुधवार (16 जुलाई 2025) को ED ने वाड्रा और उनकी कंपनियों की कुल 43 अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क किया है, जिनकी कीमत लगभग 37.64 करोड़ रुपए बताई गई है।

फिलहाल कोर्ट ने इस चार्जशीट पर संज्ञान नहीं लिया है। अगली सुनवाई की तारीख तय की जा चुकी है, जिसके बाद यह तय होगा कि आरोपितों के खिलाफ मुकदमा चलेगा या नहीं।

‘अम्मी नाबालिग बच्चों की अभिभावक नहीं, बेवा को संपत्ति बेचने का अधिकार नहीं’: शरिया के आगे गोदरेज समूह बेबस, 227 करोड़ रूपए की लैंड डील फँसी

                                                                                                                                  साभार: HT
नागपुर में 227 करोड़ रूपए की एक जमीन को लेकर गोदरेज प्रॉपर्टीज और अग्रवाल परिवार के बीच चल रहे विवाद के बीच मुस्लिम पर्सनल लॉ फिर चर्चा में आ गया है। इस मामले में सामने आया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ एक विधवा को जमीन बेचने या उसे ट्रांसफर करने का अधिकार नहीं देता है। अब इस इस्लामी कानून का सहारा लेकर विधवा के वारिस करोड़ों रुपए बनाने का जुगाड़ लगा रहे हैं।

क्या है गोदरेज से जुड़ा जमीन विवाद और मुस्लिम पर्सनल लॉ का रोल

यह पूरा मामला 1988 का है। महाराष्ट्र के नागपुर के बेसा इलाके के घोगली गाँव में अब्दुल वहाब नाम के एक मुस्लिम व्यक्ति के पास 58 एकड़ भूमि थी। अब्दुल वहाब की मौत के बाद यह भूमि उसकी विधवा खैरुन्निसा ने अग्रवाल परिवार को बेच दिया। इस जमीन को कितने में बेचा गया, इसकी जानकारी नहीं आई है। बेची गई इस जमीन में खैरुन्निसा के 8 बच्चों का हिस्सा भी शामिल था।
जमीन की बिक्री के समय मधुकर पुरोहित नाम के एक आदमी को अब्दुल वहाब के बच्चों का देखरेख करने वाला नियुक्त किया गया था। पुरोहित ने ही बच्चों की तरफ से जमीन की बिक्री के कागजों पर हस्ताक्षर किया था। आगे चलकर वर्ष 2022 में इसी जमीन को अग्रवाल परिवार ने गोदरेज प्रॉपर्टीज को 227 करोड़ रूपए में बेच दी।
हालाँकि, इस जमीन के सौदे पर अब्दुल वहाब के एक बेटे अब्दुल बशीर ने प्रश्न खड़े करते हुए मुकदमा दायर कर दिया। अब्दुल बशीर ने दावा किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ कहता है कि शौहर की मौत के बाद उसकी विधवा उसके बच्चों की देखरेख के लिए वैध अभिभावक नहीं हो सकती। इसीलिए वह बच्चों का हिस्सा नहीं बेच सकती। ऐसे में जमीन की बिक्री अवैध है।
इस मामले में नागपुर के एक सिविल जज ने निर्णय दिया कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत उठाए गए इस प्रश्न को सही ठहराया। कोर्ट ने कहा कि मुस्लिम कानून के अंतर्गत पिता की मौत के बाद उसके बच्चों का सम्पत्ति में हिस्सा लेने का अधिकार तुरंत बन जाता है। इस जमीन को तभी बाँटा जा सकता है, जब कोई वारिस यह चाहे। इसके लिए कोर्ट में अर्जी दाखिल की जा सकती है।
इस मामले में कोर्ट ने कहा कि यह मुकदमा इसलिए भी जायज है, क्योंकि इस पर अधिकार रखने वाले लोग कभी इससे बाहर हुए ही नहीं। ऐसे में 34 वर्षों के बाद दायर किया गया मामला कोर्ट के अंदर सुना जा सकता है। अब ऐसे में आगे और मामलों की सुनवाई की जा सकेगी।

गोदरेज को जमीन मिलने में एक और रोड़ा

इस मामले में अक्टूबर 2022 में एक और मुकदमा किया गया। यह मुकदमा अब्दुल वहाब के बेटे अब्दुल जब्बार की तरफ से मुनव्वरा बेगम ने दायर किया। अब्दुल जब्बार मानसिक रूप से स्थिर नहीं है। इस मामले में कहा गया कि जब्बार की अम्मी ने बिना कोई वैध अभिभावक नियुक्त किए उसका हिस्सा बेच दिया। ऐसे में उनके मानसिक स्वास्थ्य कानून का भी उल्लंघन किया है।
मामला इसलिए भी गंभीर है, क्योंकि अब्दुल वहाब की विधवा से जमीन खरीदने वाले अग्रवाल परिवार को इस जमीन से मोटा मुनाफा हुआ है। उन्होंने यह जमीन गोदरेज को 227 करोड़ रूपए में बेची है, जो कि उन्होंने 1988 में काफी कम दामों में खरीदी होगी। वहीं, साल 1988 में अब्दुल वहाब के वारिसों को छोटी-मोटी रकम मिली होगी।

मुस्लिम पर्सनल लॉ में कमियाँ और इसका दुरूपयोग

जहाँ एक ओर कोर्ट मुस्लिम पर्सनल लॉ के आधार पर मामले का निपटारा कर रहा है, वहीं इससे मुस्लिम पर्सनल लॉ की कमियाँ भी जाहिर हो रही हैं। यह मामला दिखाता कि धार्मिक कानून के जरिए कैसे एक विधवा महिला के अधिकारों को छीना जा रहा है। मुस्लिम महिला को उसके अधिकारों वंचित करने वाले ऐसे कई मामले सामने आ सकते हैं।
अब्दुल वहाब के वारिसों ने इस मामले में जहाँ दशकों तक कुछ नहीं किया, वहीं अब वह इस बड़ी डील को देखकर सक्रिय हो गए हैं। वे इस बड़ी बिजनेस डील को लटकाकर मोटा पैसा बनाना चाह रहे हैं। इस मामले से यह समस्या भी सामने आई है कि जो बड़े कॉर्पोरेट विकास के लिए जमीनें खरीदते हैं, वे बाद में जाकर कानूनी पचड़ों में फँस जाते हैं।
समस्या यह है कि भारत में अभी भी यूनिफॉर्म सिविल कोड नहीं है जो विवाह, तलाक, विरासत और गोद लेने जैसे मामलों में समान रूप से प्रभावी हों। ऐसे में मजहबी कानूनों को अपनी मनमर्जी से उपयोग करने की खुली छूट कई समस्याएँ पैदा करती हैं, जैसा कि इस मामले में देखा जा रहा है।

यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता

यदि देश में सभी लोगों पर एक समान यूनिफॉर्म सिविल कोड लागू होता तो ऐसे मामले में कानूनी पचड़ा नहीं फँसेगा। इस मामले में विधवा के अधिकार भी सुरक्षित रहेंगे। भारत को ऐसे मामले में कानून बनाने की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत है, जहाँ बिजनेस डील एवं सम्पत्ति से जुड़े मामले और विधवाओं के अधिकार सुरक्षित किए जा सकें।
कानूनी पचड़े में फँसी 227 करोड़ रूपए की यह गोदरेज की डील दिखाती है कि भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड की आवश्यकता क्यों है। तथ्य ये है कि 2022 में एक 34 वर्ष पुरानी जमीन की बिक्री को चुनौती दी गई है, वह भी मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत।