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इंदिरा से राजीव-राहुल और अमेरिकी सांसद राइली मूर तक विदेशी फंडिंग कनेक्शन, बहुत खतरनाक है विदेशी एजेंडा!

भारत में मोदी सरकार द्वारा ‘FCRA (संशोधन) विधेयक 2026’ लाने से विपक्ष से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधियों में हड़कंप मचना साबित करता है कि विपक्ष इन भारत विरोधियों के हाथ की कठपुतली बन शोर मचा कर जनता को गुमराह कर रहे हैं। विपक्ष देश को जवाब दे "आखिर क्यों इस विधेयक का विरोध किया जा रहा है? क्या देश में CAA विरोध से लेकर अब जंतर मंतर पर हुए कॉकरोचों के आंदोलन क्या विदेशी फंड से आयोजित किए गए थे? इन आंदोलनों में खाना-पीना किसके द्वारा किसके फण्ड से किया गया था? लेकिन झाड़खंड में छात्रों द्वारा हो रहे आंदोलन में कोई उन छात्रों को भोजन देने क्यों नहीं जा रहे? वजह साफ है कि झाड़खंड छात्र आंदोलन उचित मांगों को लेकर है किसी द्वारा फंडिंग पर नहीं।       

मोदी सरकार के ‘FCRA (संशोधन) विधेयक 2026’ से कांग्रेस समेत विपक्षी दलों से लेकर वाशिंगटन तक में बेचैनी यूं ही नहीं है। दरअसल, विदेशी फंडिंग के पीछे आज का नहीं बल्कि दशकों पुराना खतरनाक विदेशी एजेंडा है। इस विदेशी फंडिंग से  धर्मांतरण के साथ ही भारत को आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिशों के प्रयास भी होते रहे हैं। अमेरिकी में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के सांसद राइली मूर ने इसे भारत में ईसाइयों पर हमला बताते हुए भारत-अमेरिका संबंधों तक को प्रभावित करने की चेतावनी दे डाली। पहले यह सवाल उठ रहे थे कि आखिर अमेरिका को इससे क्या आपत्ति हो सकती है, लेकिन जब मूर की पोस्ट पर विदेशी प्रतिक्रियाएं सामने आईं तो सारे एजेंडे का पर्दाफाश हो गया। दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग से इंदिरा गांधी, राजीव-सोनिया और राहुल गांधी के कनेक्शन ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस वही भाषा क्यों बोल रही है,  जो हजारों किलोमीटर दूर बैठे कुछ पश्चिमी समूह व्यक्त कर रहे हैं। सवाल यह है कि विदेशी चंदे की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाले कानून से आखिर इतनी घबराहट क्यों है और किसे है? यह वास्तव में धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि असल वजह अनधिकृत विदेशी फंडिंग पर रोक है, जो अभी तक विदेशी नेटवर्कों से बिना पर्याप्त निगरानी के मिल रही थी।

साभार : सोशल मीडिया 
राइली मूर का बयान संयोग नहीं, एक सुनियोजित नैरेटिव
राइली मूर का बयान अपने आप में असामान्य है, लेकिन उससे भी अधिक दिलचस्प घटनाक्रम उसके बाद देखने को मिला। आयरलैंड से संचालित ‘कैथोलिक एरेना’ जैसे मंचों ने उनके बयान को तुरंत आगे बढ़ाया और भारत के खिलाफ उसी नैरेटिव को दोहराना शुरू कर दिया कि भारत सरकार चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना चाहती है। यह प्रतिक्रिया किसी स्वतःस्फूर्त चिंता से अधिक जानबूझकर बनाए गए एक नैरेटिव जैसी प्रतीत होती है। जैसे ही भारत विदेशी फंडिंग के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करता है, कुछ अंतरराष्ट्रीय समूह इसे धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार या लोकतंत्र के संकट के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। यह रणनीति नई नहीं है; भारत के अनेक आंतरिक विषयों पर भी इसी प्रकार का अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने का प्रयास पहले भी देखा जा चुका है।

दुनिया भर के कई देशों में हैं विदेशी चंदे पर कठोर कानून
भारत को लेकर एक बड़ा विरोधाभास यह भी है कि जिन देशों के नेता FCRA पर सवाल उठा रहे हैं, उनके अपने देशों में विदेशी फंडिंग के कहीं अधिक कठोर कानून लागू हैं। अमेरिका में Foreign Agents Registration Act (FARA) के तहत विदेशी प्रभाव से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं पर व्यापक निगरानी रखी जाती है। ऑस्ट्रेलिया ने Foreign Influence Transparency Scheme लागू की है। ब्रिटेन, कनाडा और इजराइल ने भी विदेशी धन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग कानूनी ढांचे विकसित किए हैं। इन देशों में इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक संप्रभुता की रक्षा का साधन माना जाता है। फिर भारत जब अपने लिए वही सख्त कानून लागू कर रहा है तो इसे लोकतंत्र विरोधी कैसे कहा जा सकता है?

करोड़ों रुपये के विदेशी अंशदान के बारे में पारदर्शिता जरूरी
यह शीशे की तरह साफ है कि विधेयक का मूल उद्देश्य विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार का यह तर्क बिल्कुल ठीक है कि यदि विदेश से आने वाला धन सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य या जनकल्याण के लिए है, तो उसके उपयोग का स्पष्ट लेखा-जोखा भी होना चाहिए। यदि किसी संगठन के पास करोड़ों रुपये का विदेशी अंशदान आता है, तो यह जानना भी आवश्यक है कि वह धन किस उद्देश्य से आया, कहां खर्च हुआ और उसका वास्तविक लाभार्थी कौन-कौन है? यह भारत ही नहीं हर लोकतांत्रिक देश की सामान्य प्रशासनिक आवश्यकता है। कई देशों में इससे मिला-जुला कानून पहले से ही लागू है। खासकर अमेरिका में तो यह कानून सबसे पुराना है, जहां सबसे ज्यादा हायतौबा मच रही है।

पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने भी संबंधों को लेकर डराया
दिलचस्प बात यह है कि राइली मूर अकेले अमेरिकी सांसद नहीं हैं, जिन्होंने भारत के FCRA संशोधन विधेयक को लेकर आपत्ति जताई है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मई 2026 की भारत यात्रा से पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी का FCRA लाइसेंस निलंबित किए जाने का मुद्दा भारत के सामने उठाने की अपील की थी। भय का माहौल बनाते हुए स्मिथ ने दावा किया था कि यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो ‘सभी चर्चों और डायोसीज की संपत्तियां भारत के कब्जे में जा सकती हैं।’ राइली मूर की तरह स्मिथ ने भी चेतावनी दी थी कि यदि इस विधेयक को रोका नहीं गया, तो इससे भारत-अमेरिका संबंधों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। सिर्फ विदेशी राजनेता ही नहीं, बल्कि भारत के कुछ लेफ्ट लिबरल गैंग और संस्थान भी इस विधेयक को धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिकों पर हमले के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

ईसाई मिशनरी के लिए अमेरिकी कर रहे FCRA का विरोध
अब प्रश्न उठता है कि अमेरिका भारत के FCRA संशोधन विधेयक का विरोध क्यों कर रहा है और भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुंचने की चेतावनी क्यों दे रहा है? इसका उत्तर भूराजनीतिक हितों और धार्मिक महत्वाकांक्षाओं में छिपा है। अमेरिकी मिशनरी नेटवर्क, World Vision, USAID और FCRA संशोधन विधेयक का विरोध अपने स्वार्थ के लिए कर रहे हैं। दरअसल, दशकों से अमेरिका स्थित अनेक मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, विशेषकर जनजातीय और दलितों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने तथा उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India समेत कई विदेशी ईसाई संगठन आज भी भारत में सक्रिय हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ अपने मूल देशों के रणनीतिक हितों को भी आगे बढ़ाने का काम करते हैं। वर्ल्ड विजन नाम के इस ईसाई NGO को अब बंद हो चुकी अमेरिकी एजेंसी USAID से भी फंडिंग मिलती रही, जिस पर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देने के आरोप लगते रहे हैं।

इंदिरा की अनुमति से नागालैंड में फंडिंग-धर्मांतरण अभियानों को बल मिला
अमेरिका स्थित वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल की गतिविधि संदिग्ध रही है। वास्तविकता में यह कट्टर ईसाई मिशनरी संगठन है। पिछले लगभग सात दशकों से इसने अन्य मिशनरी समूहों के साथ मिलकर विदेशी फंडिंग का लालच देकर हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए अभियान चलाए। सबसे हैरतअंगेज तथ्य यह है कि वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने World Vision से जुड़े बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति दी थी। उस समय राज्य में अस्थिरता के कारण विदेशियों को जाने की अनुमति भी नहीं दी जाती थी। इसके बाद World Vision ने नागालैंड और दूसरे क्षेत्रों में अपने धर्मांतरण अभियानों को आगे बढ़ाया। वर्ष 2024 में मोदी सरकार ने World Vision का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया, जिससे भारत में उसकी गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। दरअसल, World Council of Churches, World Evangelical Alliance और World Vision जैसे विदेशी ईसाई संगठन भारत के धर्मांतरण-रोधी कानूनों का लगातार विरोध करते रहे हैं।

राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन और विदेशों से मिली फंडिंग
FCRA संशोधन विधेयक से विदेशी फंडिंग के उन स्रोतों पर प्रभाव पड़ने वाला है, जिनका उपयोग धार्मिक धर्मांतरण, राजनीतिक सक्रियता और भारत-विरोधी अभियानों के लिए किया जाता रहा है। यही कारण है कि विदेशी राजनीतिक नेता और मिशनरी संगठन इस कानून के विरुद्ध सक्रिय अभियान चला रहे हैं। जहां तक भारत की बात है तो कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। दिलचस्प विरोधाभास यह भी है कि कांग्रेस इस विधेयक के विरोध का नेतृत्व कर रही है, जबकि उसका अपना इतिहास विदेशी फंड प्राप्त संस्थाओं से जुड़ा रहा है। राजीव गांधी फाउंडेशन का ही उदाहरण लें, इसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी और ट्रस्टी राहुल गांधी हैं। इस संस्था को चीन सहित विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त हुआ है। बाद में जांच के दौरान कथित अनियमितताएं सामने आई और उसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।

राइली मूर का विरोध राहुल गांधी के विदेशी हस्तक्षेप का विस्तार
यदि पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो पता चलेगा कि राहुल गांधी कई अवसरों पर विदेशों में भारत के लोकतंत्र को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और विदेशी हस्तक्षेप की मांग जैसे बयान देते रहे हैं। FCRA संशोधन विधेयक के बीच इस माहौल में राइली मूर सहित अमेरिकी सांसदों द्वारा भारत की नीतियों की आलोचना उसी हस्तक्षेप की मांग के अभियान का विस्तार प्रतीत होती है। यह बिल्कुल स्पष्ट तथ्य है कि FCRA संशोधन विधेयक का मूल उद्देश्य चर्चों या धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग के उन नेटवर्क को नियंत्रित करना है, जिनका उपयोग धर्मांतरण, डेमोग्राफी के बदलाव, विरोध प्रदर्शनों, अराजक गतिविधियों या ऐसे सिस्टम को खड़ा करने के लिए किया जाता रहा है। इसलिए कहा जा सकता है कि अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित कई विदेशी राजनीतिक और धार्मिक संगठन इस विधेयक को ‘ईसाइयों पर हमले’ के रूप में दिखा कर धार्मिक भावनाएं भड़काने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

मनमोहन ने माना था विदेशी फंड प्राप्त संगठनों को देश के लिए खतरा
आज जो कांग्रेसी FCRA का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर लगातार चल रहे विरोध के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से विदेशी फंड प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उन्होंने फरवरी 2012 में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Science को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कई NGO, विशेषकर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त संगठन, भारत की विकास संबंधी चुनौतियों को समझने के बजाय देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। डॉ. सिंह ने कहा था, “कई NGO, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से धन मिलता है, हमारे देश की विकास संबंधी आवश्यकताओं को समझने के बजाय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और कृषि में जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे ऐसे NGO हैं, जो यह नहीं समझते कि भारत को अपनी ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।” यानी, उस समय स्वयं कॉन्ग्रेसी प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि विदेशी फंड प्राप्त संगठन भारत की रणनीतिक और विकास संबंधी परियोजनाओं को प्रभावित करते हैं।

कुडनकुलम परमाणु परियोजना: विदेशी फंडिंग और आंदोलन
विदेशी फंडिंग के प्रभाव का सबसे चर्चित उदाहरण कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (KKNPP) है, जिसे वर्षों तक वामपंथी दलों और विदेशी धन प्राप्त NGO के विरोध का सामना करना पड़ा। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित इस परियोजना की परिकल्पना भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के रूप में की गई थी, जिसकी कुल क्षमता 6,000 मेगावाट निर्धारित थी। इसका निर्माण 2002 में शुरू हुआ, लेकिन लगातार प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध के कारण यह परियोजना लंबे समय तक बाधित रही। इन विरोध प्रदर्शनों का चरम वर्ष 2011 में देखने को मिला, जब जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लोगों में भय का माहौल बनाया गया कि कुडनकुलम में भी वैसी ही त्रासदी हो सकती है। पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी (PMANE) के नेता एस. पी. उदयकुमार इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।

परमाणु परियोजना के विरोधी AAP उम्मीदवार बन गए
वर्ष 2012 में कई अंतरराष्ट्रीय ईसाई प्रकाशनों ने खुलकर लिखा था कि चर्च और कैथोलिक संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। इडिंथाकराई स्थित ‘लेडी ऑफ लूर्ड्स कैथोलिक चर्च‘ तथा दो कैथोलिक पादरी PMANE की समन्वय समिति का हिस्सा थे। बाद में परमाणु परियोजना का विरोध करने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ता, जिनमें एस.पी. उदयकुमार और जी.सुंदरराजन शामिल थे, आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ गए। एस.पी. उदयकुमार ने तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा। इसी प्रकार हाल में दिल्ली में हुए Cockroach Janta Party (CJP) के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दिपके भी अतीत में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। इस पूरे विवाद के दौरान भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा था कि कुडनकुलम परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है और लोगों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें विश्वस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है। फिर भी विरोध प्रदर्शन और न्यायालयों में याचिकाओं का सिलसिला वर्षों तक चलता रहा।

कई ईसाई संगठन और मीडिया संस्थानों के निशाने पर FCRA और सरकार
दरअसल, इन्हीं कारणों से भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठन इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं। इनमें Catholic Bishops’ Conference of India (CBCI), All India Christian Council तथा आर्चबिशप जोसेफ डी’सूज़ा का उल्लेख किया गया है। आर्चबिशप डी’सूज़ा ने FCRA संशोधन को ईसाई संस्थाओं की संपत्तियों की ‘लूट’ तक बताया है। भारत के बाहर भी National Hispanic Christian Leadership Conference सहित कई अमेरिकी ईसाई संगठनों ने इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है। इसके अलावा Christianity Today, International Christian Concern जैसी ईसाई पत्रिकाओं और पोर्टलों पर भी ऐसे लेख प्रकाशित हुए, जिनमें यह दावा किया गया कि भारत की ‘हिंदू राष्ट्रवादी सरकार’ ईसाइयों को निशाना बना रही है। हाल में दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन में कई कैथोलिक पादरी भी प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च करते दिखाई दिए। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने इस आंदोलन से जुड़े कुछ NGO और व्यक्तियों की भूमिका की जांच शुरू की है।

इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट और विदेशी फंडेड NGO का नेटवर्क
मानवाधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय, सरकारी जवाबदेही, शिक्षा के प्रसार और आदिवासी अधिकार जैसे आकर्षक नारों के साथ भारत में अनेक NGO विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं। लेकिन समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि इनमें से कई संगठनों का वास्तविक उद्देश्य विकास परियोजनाओं को रोकना, अराजकता फैलाना और भारत की आर्थिक प्रगति को बाधित करना रहा है। इसी संदर्भ में वर्ष 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें विदेशी फंड प्राप्त NGO के कामकाज और उनके तौर-तरीकों का विस्तृत उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड सहित कई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त भारतीय NGO ऐसे मुद्दों को चुनते थे, जिनके माध्यम से बड़े विकास कार्यों के विरुद्ध जनमत तैयार किया जा सके। IB रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे संगठन परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, यूरेनियम खदानों, कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों और अन्य औद्योगिक परियोजनाओं, नर्मदा और अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं तथा पूर्वोत्तर भारत में तेल और खनन गतिविधियों के विरुद्ध आंदोलन खड़े कर रहे थे। इन गतिविधियों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर प्रतिवर्ष 2 से 3 प्रतिशत GDP तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।

विदेशी संस्थाओं द्वारा भारतीय NGO का उपयोग भारत के ही खिलाफ
IB रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि विदेशी दानदाता अपने वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए मानवाधिकारों की रक्षा, विस्थापितों के पुनर्वास, आदिवासी आजीविका की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सुशासन जैसे विषयों के नाम पर धन उपलब्ध कराते थे। इसके बाद स्थानीय NGO उन विषयों पर रिपोर्ट तैयार करते थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और जो पश्चिमी देशों की विदेश नीति के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती थीं। रिपोर्ट में Greenpeace International और CORDAID जैसे संगठनों का विशेष उल्लेख किया गया, जिन पर ऐसे अभियानों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगाया गया। वहीं ActionAid और Amnesty International जैसे संगठनों के बारे में कहा गया कि वे अपनी कुल फंडिंग का एक हिस्सा इसी प्रकार की गतिविधियों में लगाते हैं। IB रिपोर्ट ने कुडनकुलम परमाणु परियोजना, प्रस्तावित कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं, GMO के विरोध, औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ अभियानों को उदाहरण के रूप में बताते हुए निष्कर्ष निकाला कि विदेशी संस्थाएं भारतीय NGO का उपयोग भारत की विकास परियोजनाओं को रोकने और उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए कर रही थीं।

यूएस का अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों को समर्थन- हसीना
इसके बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि United States Agency for International Development (USAID) भारत में कई विवादास्पद NGO को वित्तीय सहायता दे रही थी। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि USAID पर भारत और बांग्लादेश में शासन परिवर्तन (Regime Change) जैसे अभियानों को समर्थन देने के आरोप लगे। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अमेरिका बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों का समर्थन कर रहा है। इन सभी घटनाओं के आधार को देखते हुए FCRA कानून लाने और विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार की सतर्कता केवल प्रशासनिक या वित्तीय मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा विषय है।

ईसाईयत नैरेटिव और विदेशी फंडिंग पर नकेल है FCRA
भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठनों तथा उनके समर्थकों द्वारा प्रचारित “ईसाइयों पर हमले” का नैरेटिव वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास है। वास्तविक चिंता चर्चों या धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नहीं, बल्कि उन विदेशी फंडिंग नेटवर्क पर बढ़ती निगरानी को लेकर है, जिनका उपयोग वर्षों से धर्मांतरण और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है। दरअसल, मोदी सरकार ने न केवल धर्मांतरण के नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की है, बल्कि FCRA संशोधन विधेयक के माध्यम से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस रद्द हो चुका है, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रह जाए। वर्तमान व्यवस्था में यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, तब भी उसके पास विदेशी धन से खरीदी गई जमीन, भवन, अस्पताल, स्कूल और अन्य परिसंपत्तियां बनी रहती हैं। सरकार का प्रस्तावित संशोधन इस स्थिति को बदलने का प्रयास करता है। यदि किसी संस्था का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो उसकी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी की निगरानी में आ जाएंगी। इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन या निस्तारण किया जा सकेगा और उससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा होगी। 

भारत ही नहीं, दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस तरह के कानून हैं। इनकी खासियत और असर के बावजूद भारत में अनावश्यक विरोध हो रहा है…

भारत : Foreign Contribution Regulation Act (FCRA)
भारत का FCRA सबसे व्यापक विदेशी फंडिंग नियामक कानूनों में माना जाता है। इसकी खासियत है कि इसमें विदेशी फंड प्राप्त करने से पहले सरकारी पंजीकरण या पूर्व अनुमति (Prior Permission) अनिवार्य है। विदेशी धन केवल निर्दिष्ट बैंक खाते के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। गृह मंत्रालय पूरे सिस्टम की निगरानी करता है। इसमें वार्षिक ऑडिट और रिटर्न अनिवार्य है। इसके साथ ही नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस निलंबन या रद्द करने की शक्ति भी इसमें निहित है। 2026 संशोधन के बाद कुछ परिस्थितियों में विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियों के प्रबंधन हेतु सरकारी “Designated Authority” का प्रावधान भी जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ-साथ विदेशी प्रभाव पर नियंत्रण और आतंकवाद एवं मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम करना है।

अमेरिका : Foreign Agents Registration Act (FARA)
अमेरिका में यह कानून दुनिया के सबसे पुराने विदेशी प्रभाव कानूनों में से एक है। इस कानून की मुख्य व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था, किसी विदेशी सरकार, विदेशी राजनीतिक दल या फिर विदेशी कंपनी की ओर से अमेरिका में लॉबिंग, जनमत निर्माण या राजनीतिक गतिविधि करती है, तो उसे न्याय विभाग के पास Foreign Agent के रूप में पंजीकरण कराना होता है। FARA विदेशी फंड लेने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। यह केवल Disclosure (खुलासा) को अनिवार्य करता है। पंजीकृत एजेंटों को हर छह महीने में अपनी गतिविधियों, प्राप्तियों और खर्चों का ब्योरा देना अनिवार्य है। विदेशी हितों के लिए बांटे जाने वाले प्रचार या सूचना सामग्रियों पर स्पष्ट रूप से लेबल लगाना होता है कि यह किस विदेशी प्रिंसिपल के लिए है।

ब्रिटेन : Foreign Influence Registration Scheme (FIRS)
ब्रिटेन की FIRS जुलाई 2025 से लागू हुई एक विधिक व्यवस्था है। नेशनल सिक्योरिटी एक्ट 2023 के तहत बनाई गई इस योजना का उद्देश्य ब्रिटेन की सुरक्षा और हितों की रक्षा करना है। इसके साथ ही देश की राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में गुप्त विदेशी हस्तक्षेप को रोकना तथा विदेशी शक्तियों के प्रभाव को पारदर्शी बनाना है। यह योजना मुख्य रूप से दो स्तरों पर काम करती है पहले, पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस के तहत किसी भी विदेशी देश (आयरलैंड गणराज्य को छोड़कर) के निर्देश पर ब्रिटेन में राजनीतिक निर्णयों, चुनावों, जनमत संग्रहों या पंजीकृत राजनीतिक दलों को प्रभावित करने के लिए की जाने वाली गतिविधियों को रजिस्टर करना अनिवार्य है। दूसरे, इन्हेंस्ड स्तर है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अधिक संवेदनशील माने जाने वाले चुनिंदा देशों (वर्तमान में रूस और ईरान तथा उनसे जुड़ी संस्थाओं) के निर्देशों पर ब्रिटेन में की जाने वाली व्यापक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए है।

ऑस्ट्रेलिया : Foreign Influence Transparency Scheme Act (FITSA)
ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए 2018 में यह कानून बनाया। इसमें प्रावधान किया गया कि यदि कोई विदेशी सरकार, विदेशी राजनीतिक दल और विदेशी सरकारी संस्था के लिए काम करता है, तो उसे सार्वजनिक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराना होगा। इसका उद्देश्य विदेशी प्रभाव पारदर्शी बनाना और देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा करना है। कानून के तहत कुछ क्षेत्रों को विशेष छूट दी गई है, जिन्हें पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती। इनमें मानवीय सहायता और राहत कार्य, पेशेवर कानूनी सलाह या अदालत में प्रतिनिधित्व, और राजनयिक (Diplomatic) और कांसुलर गतिविधियां शामिल हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर पंजीकरण कराने में विफल रहता है, झूठी जानकारी देता है या आवश्यक रिपोर्टिंग नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस पर गंभीर आपराधिक दंड और जुर्माने का प्रावधान है।

कनाडा : Foreign Influence Transparency and Accountability Act (FITAA)
कनाडा में यह कानून देश की राजनीतिक और सरकारी प्रक्रियाओं में विदेशी ताकतों के गुप्त प्रभाव को रोकने और सार्वजनिक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए एक नया पब्लिक रजिस्ट्री डेटाबेस बनाता है। इसे बिल C-70 (काउंटरिंग फॉरेन इंटरफेरेंस एक्ट) के तहत जून 2024 में पारित किया गया था। इसके तहत एक सार्वजनिक डेटाबेस बनाया गया है ताकि यह पता चल सके कि कौन से व्यक्ति या संगठन विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं। यह नियम चुनावों, जनमत संग्रह, विधायी प्रस्तावों (proposed legislation) और सरकारी नीतियों या अनुबंधों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर लागू होता है। इस कानून को लागू करने और इसकी देखरेख के लिए एक स्वतंत्र Foreign Influence Transparency Commissioner की नियुक्ति की गई है। नियमों का उल्लंघन करने या जानकारी छिपाने पर $250 से लेकर $1 मिलियन तक का जुर्माना लग सकता है।

जिस कांग्रेस ने बनाया FCRA, वही अब विदेशी फंडिंग को लेकर BJP सरकार को घेर रही: NGOs की अवैध फंडिंग रोकने पर क्यों मचा बवाल?

साभार 
कांग्रेस पार्टी इन दिनों मोदी सरकार पर विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम यानी FCRA के गलत इस्तेमाल का आरोप लगा रही है। कांग्रेस का कहना है कि सरकार FCRA के जरिए नागरिक समाज समूहों और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) पर दबाव बना रही है और राजनीतिक असहमति को रोकने की कोशिश कर रही है।

हालाँकि, FCRA का इतिहास काफी पुराना है। यह कानून पहली बार 1976 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार के दौरान लाया गया था। इसके बाद राजीव गाँधी सरकार ने 1980 के दशक में इसमें बड़े बदलाव किए। 2010 में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया, जिसने NGOs के विदेशी फंड पर निगरानी और सरकारी नियंत्रण को और बढ़ाया।

इंदिरा गाँधी के समय आया FCRA

FCRA की शुरुआत 1976 में हुई थी। उस समय देश में प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में आपातकाल लगा हुआ था। नागरिक स्वतंत्रताएं सीमित थीं, विपक्षी नेताओं को MISA यानी आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम के तहत जेल में रखा गया था और प्रेस पर भी कड़े प्रतिबंध थे।

इसी दौर में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 1976 संसद में लाया गया। इसका उद्देश्य देश में आने वाले विदेशी पैसे और उसके इस्तेमाल को नियंत्रित करना था।

1976 के कानून के तहत साफ तौर पर इन लोगों के लिए विदेशी मेहमाननवाजी और विदेशी चंदे पर रोक लगा दी गई थी:

(a) चुनाव लड़ने वाला उम्मीदवार,
(b) पंजीकृत अखबार का संवाददाता, कॉलम लिखने वाला, कार्टूनिस्ट, संपादक, मालिक, प्रिंटर या प्रकाशक,
(c) न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी या किसी निगम का कर्मचारी,
(d) किसी भी विधानमंडल का सदस्य,
(e) राजनीतिक दल या उसका कोई पदाधिकारी।

पत्रकारों को कानून के तहत इस प्रतिबंधित सूची में शामिल किया जाना इंदिरा गाँधी की मंशा को साफ तौर पर दिखाता है। इसका उद्देश्य राजनीतिक विरोधियों, व्यंग्य लिखने वालों, स्वतंत्र पत्रकारों और नागरिक अधिकार समूहों को विदेशों से आर्थिक मदद मिलने से रोकना था। इस तरह आपातकाल के दौरान उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि सार्वजनिक जीवन में आर्थिक रूप से टिके रहने के लिए सरकार का नियंत्रण बना रहे।

राजीव गाँधी सरकार ने बढ़ाया सरकारी नियंत्रण

आपातकाल खत्म होने और जनता पार्टी सरकार के कार्यकाल के बाद कान्ग्रेस फिर सत्ता में लौटी। प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के समय 1985 में FCRA में महत्वपूर्ण बदलाव किए गए।

इससे पहले संगठन कुछ परिस्थितियों में पूर्व सूचना या सामान्य अनुमति के आधार पर विदेशी योगदान ले सकते थे। लेकिन 1985 के संशोधन के बाद विदेशी फंड लेने वाले संगठनों के लिए गृह मंत्रालय (MHA) के साथ औपचारिक पंजीकरण जरूरी कर दिया गया।

इस बदलाव के बाद FCRA NGOs के लिए एक स्थायी और नौकरशाही आधारित निगरानी व्यवस्था बन गया। विदेशी फंड लेने वाले संगठनों को अब सरकार के सामने पंजीकरण और नियमों का पालन करना जरूरी था।

2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने बनाया नया FCRA

FCRA में सबसे बड़ा बदलाव 2010 में हुआ। प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली UPA सरकार और तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम के कार्यकाल में विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 लागू किया गया।

इस कानून ने 1976 के पुराने FCRA को पूरी तरह खत्म कर उसकी जगह नया कानून लागू किया। नए कानून में NGOs और दूसरे संगठनों को मिलने वाले विदेशी फंड पर सरकार का नियंत्रण और बढ़ गया।

1976 के कानून के तहत FCRA पंजीकरण एक बार मिलने के बाद तब तक जारी रहता था, जब तक उसे रद्द नहीं किया जाता। लेकिन 2010 के कानून में पंजीकरण की अवधि 5 साल कर दी गई।

इसका मतलब था कि NGOs को अपना FCRA पंजीकरण समय-समय पर नवीनीकृत कराना पड़ता था। इससे सरकार के पास पंजीकरण को रोकने, उसमें देरी करने या उसे मंजूर नहीं करने का अधिकार और प्रभाव बढ़ गया।

2010 के FCRA की धारा 5 में ‘राजनीतिक प्रकृति के संगठन’ नाम की एक नई श्रेणी जोड़ी गई। इसके तहत सरकार को ऐसे संगठनों को विदेशी फंड लेने से रोकने की शक्ति मिली, जिन्हें राजनीतिक प्रकृति का माना जाता था। इसमें उन समूहों पर भी असर पड़ सकता था जो सरकारी नीतियों, बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स या दूसरी सरकारी योजनाओं के खिलाफ प्रदर्शन करते थे।

2010 के कानून की धारा 8 में विदेशी फंड के प्रशासनिक खर्च पर भी सीमा लगाई गई। इसके तहत किसी संगठन को मिले विदेशी योगदान का अधिकतम 50 प्रतिशत ही प्रशासनिक खर्च में इस्तेमाल किया जा सकता था। इसमें संगठन के संचालन, वेतन और रिसर्च जैसे खर्च शामिल थे। इस तरह सरकार ने NGOs के विदेशी फंड के इस्तेमाल पर एक और वित्तीय सीमा तय कर दी।

कुडनकुलम विवाद में FCRA का इस्तेमाल

2011 से 2013 के बीच तमिलनाडु में कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा संयंत्र और आनुवंशिक रूप से संशोधित यानी (जीएम) फसलों के फील्ड ट्रायल जैसे मुद्दों को लेकर विरोध प्रदर्शन हुए।

कुडनकुलम में पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी यानी (PMANE) के नेतृत्व में बड़े स्तर पर परमाणु विरोधी आंदोलन हुआ। इन प्रदर्शनों के कारण रूस की मदद से बनाए जा रहे परमाणु रिएक्टरों को शुरू करने में देरी हुई।

उस समय UPA सरकार के कई वरिष्ठ अधिकारियों ने इन प्रदर्शनों के पीछे विदेशी फंडिंग को जिम्मेदार बताया।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने एक इंटरव्यू में कहा था कि कुडनकुलम में हो रहे विरोध प्रदर्शनों में विदेशी NGOs की भूमिका थी। उन्होंने कहा था कि इनमें से कई NGOs अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से फंड प्राप्त करते हैं और भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरी तरह नहीं समझते।

करीब 4000 NGOs पर कार्रवाई

कुडनकुलम आंदोलन के दौरान गृह मंत्रालय ने करीब 4,000 NGOs के FCRA पंजीकरण रद्द किए थे। कुडनकुलम आंदोलन को फंड देने वाले बताए गए कुछ संगठनों के बैंक खाते फ्रीज किए गए और उनके वित्तीय रिकॉर्ड की जाँच भी कराई गई।

पर्यावरण से जुड़े कुछ विदेशी नागरिकों को भारत से बाहर भेजा गया या उन्हें वीजा देने से इनकार किया गया। सरकार का कहना था कि इन लोगों ने स्थानीय विकास विरोधी प्रदर्शनों में हिस्सा लेकर अपने वीजा नियमों का उल्लंघन किया था।

तत्कालीन गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी कुडनकुलम आंदोलन के दौरान विदेशी फंड के इस्तेमाल को लेकर कार्रवाई की बात कही थी। उन्होंने कहा था कि जाँच में धन के गलत इस्तेमाल की जानकारी सामने आई है और इसलिए FCRA के तहत मामले दर्ज करने का फैसला लिया गया।

आज कांग्रेस के विरोध के बीच पुराना इतिहास

आज कांग्रेस मोदी सरकार पर FCRA का इस्तेमाल NGOs और नागरिक समाज संगठनों को दबाने के लिए करने का आरोप लगा रही है। कान्ग्रेस FCRA संशोधन विधेयक का विरोध कर रही है और उसका कहना है कि इससे नागरिक संगठनों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

लेकिन FCRA का इतिहास बताता है कि विदेशी फंड पर सरकारी निगरानी किसी एक सरकार तक सीमित नहीं रही है। इसकी शुरुआत 1976 में इंदिरा गांधी सरकार के दौरान हुई। 1985 में राजीव गांधी सरकार ने इसमें महत्वपूर्ण बदलाव किए और 2010 में मनमोहन सिंह सरकार ने नया FCRA कानून लागू किया।

इसके बाद भाजपा सरकार के समय भी FCRA में बड़े बदलाव किए गए। इनमें 2020 और 2026 के महत्वपूर्ण संशोधन शामिल हैं। इन बदलावों का मुख्य उद्देश्य विदेशी सरकारों और संगठनों से मिलने वाले पैसे के जरिए भारत की घरेलू राजनीति, नीतिगत फैसलों या सामाजिक आंदोलनों को प्रभावित करने की संभावना को रोकना बताया गया है।

FCRA की निगरानी का एक तर्क यह भी है कि विदेशी फंड का इस्तेमाल देश में अस्थिरता पैदा करने वाली गतिविधियों, उग्रवाद, अवैध धार्मिक धर्मांतरण या कट्टरपंथी संगठनों को आर्थिक मदद देने के लिए न हो।

इस पूरे विवाद में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि FCRA को लेकर सरकारी नियंत्रण की व्यवस्था अचानक मोदी सरकार के समय शुरू नहीं हुई। यह कानून करीब 5 दशकों से अलग-अलग सरकारों के कार्यकाल में लगातार बदलता और मजबूत होता रहा है। ऐसे में आज कांग्रेस द्वारा FCRA को लेकर उठाए जा रहे सवालों के साथ इस कानून के पुराने इतिहास को भी देखना जरूरी है।

‘धार्मिक गतिविधि’ के नाम पर धर्मांतरण कराने वालों की विदेशी फंडिंग पर मोदी सरकार ने किया प्रहार, बदल डाले FCRA के नियम

     धर्मांतरण को ‘धार्मिक गतिविधि’ बताकर अब नहीं मिलेगी विदेशी फंडिंग (प्रतीकात्मक तस्वीर साभार: AI-Dall-e)
केंद्र की मोदी सरकार ने विदेशी फंडिंग को लेकर लागू विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम (FCRA) नियमों में बड़ा बदलाव किया है। नए संशोधनों के तहत धर्मांतरण (proselytisation) को अब आस्था-आधारित गतिविधियों का हिस्सा नहीं माना जाएगा। सरकार के इस कदम का सीधा असर उन गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), धार्मिक संस्थाओं और चैरिटेबल संगठनों पर पड़ेगा जो विदेशी फंडिंग के जरिए धर्म परिवर्तन की साजिश रचते हैं।

सोमवार (22 जून 202) को गृह मंत्रालय द्वारा जारिए किए अधिसूचना में बताया गया कि नए नियमों में धार्मिक शिक्षा, पूजा-पाठ, प्रार्थना सभा, आध्यात्मिक कार्यक्रम, धार्मिक साहित्य का ज्ञान देना या समुदाय आधारित धार्मिक सेवाएँ तो आस्था-आधारित गतिविधियों की श्रेणी में रहेंगी, लेकिन किसी व्यक्ति को धर्म परिवर्तन के लिए दबाव बनाना, प्रभावित करना या धर्म बदलने के लिए अभियान चलाना अब इस श्रेणी से बाहर माना जाएगा।

नए नियमों के अनुसार, रजिस्ट्रेशन के लिए आवेदन करने या सालाना रिटर्न दाखिल करने वाले संगठनों को अब अपनी आधिकारिक वेबसाइट और सोशल मीडिया अकाउंट की जानकारी देनी होगी। इन नियमों का मकसद ज़्यादा पारदर्शिता लाना भी है, खासकर तब जब पैसा ‘डोनर एड्वाइज़्ड फंड’ या पैसे भेजने के किसी दूसरे जरिए से आता है। ऐसे मामलों में, संगठन को असली दान देने वाले की पहचान, पता और ईमेल की जानकारी के साथ-साथ मिली हुई रकम की भी जानकारी देनी होगी।

नियमों में हुए इस बदलाव का मतलब यह है कि यदि कोई संस्था विदेशी फंड का उपयोग धर्म प्रचार या धर्म परिवर्तन से जुड़ी गतिविधियों में करती पाई जाती है, तो उसके खिलाफ FCRA के तहत कार्रवाई की जा सकती है। ऐसे मामलों में फंड के उपयोग की जाँच, लाइसेंस संबंधी कार्रवाई या अन्य कानूनी कदम उठाए जा सकते हैं।

सरकार ने कहा था कि विदेशी फंड का इस्तेमाल सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य और वास्तविक धार्मिक गतिविधियों के लिए किया जा सकता है, लेकिन धर्म परिवर्तन को बढ़ावा देने के लिए नहीं। इसी वजह से धर्मांतरण को आस्था-आधारित गतिविधियों की परिभाषा से अलग कर दिया गया है।

गृह मंत्रालय लंबे समय से यह कहता रहा है कि विदेशी धन का उपयोग जबरन, प्रलोभन या अन्य माध्यमों से धार्मिक परिवर्तन के लिए नहीं होना चाहिए। इसी संदर्भ में पहले भी FCRA नियमों को सख्त किया गया था। 2019 में भी सरकार ने नियमों में संशोधन करते हुए NGOs के प्रमुख पदाधिकारियों से यह घोषणा लेना अनिवार्य किया था कि वे धर्म परिवर्तन या सांप्रदायिक तनाव फैलाने जैसी गतिविधियों में शामिल नहीं रहे हैं।

हाल के FCRA संशोधन और संसद में हुई चर्चा के दौरान भी सरकार ने साफ संकेत दिए कि विदेशी फंड के कथित दुरुपयोग और धार्मिक परिवर्तन से जुड़े मामलों पर सख्त नजर रखी जाएगी। संसद में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा था कि सरकार विदेशी फंडिंग के दुरुपयोग और जबरन धार्मिक परिवर्तन जैसी गतिविधियों को बर्दाश्त नहीं करेगी।

वहीं नए नियमों में बदलावों के लागू होने से ठीक 10 दिन पहले अमेरिकी सांसदों ने हाल ही में भारत सरकार द्वारा FCRA नियमों में किए गए बदलावों पर चिंता जताई थी। सीनेट की विदेश संबंध समिति के प्रमुख जेम्स रिष ने एक बयान में कहा था कि FCRA में प्रस्तावित बदलावों का ‘सिविल सोसाइटी समूहों’ पर बुरा असर पड़ सकता है, जिनमें ईसाई संगठन भी शामिल हैं। उन्होंने इन बदलावों को ‘बेहद चिंताजनक’ बताया था।

कांग्रेस का ‘देश विरोधियों’ से प्यार क्यों नही होता खत्म? जिस बैश्लेट ने CAA, मुस्लिमों पर हमले से लेकर J&K तक पर भारत का किया ‘अपमान’, उसी को दिया इंदिरा गाँधी सम्मान

               सोनिया गाँधी ने मिशेल बैश्लेट दिया 'इंदिरा गाँधी पुरस्कार' (फोटो: X/@NasirHussainINC)
एक कहावत है, ‘चोर चोरी से जाए, हेरा फेरी से न जाए’ यानी बुरी आदतों को कितना ही दबा-छिपा लिया जाए लेकिन वो बार-बार सामने आ ही जाती हैं। कांग्रेस से जुड़े इंदिरा गाँधी मेमोरियल ट्रस्ट द्वारा चिली की पूर्व राष्ट्रपति और पूर्व संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख मिशेल बैश्लेट को ‘इंदिरा गाँधी शांति, निरस्त्रीकरण और विकास पुरस्कार’ देने का फैसला इसी कहावत को चरितार्थ करता दिखता है।

कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गाँधी ने बुधवार(19 नवंबर 2025) को उन्हें खुद यह पुरस्कार दिया। इस दौरान सोनिया गाँधी ने मिशेल बैश्लेट के ‘विश्व शांति’ के लिए किए गए कामों को भी याद किया है। सोनिया ने उनकी तारीफ में खूब कशीदे पढ़े और देश को नया रूप देने के लिए उनकी जमकर तारीफ भी की। हालाँकि, असल कहानी इससे आगे है।

बैश्लेट को सोनिया बेशक दुनिया की शांति का मसीहा बना रही हो लेकिन भारत के लिए उनकी सोच हमेशा से विरोधियों वाली ही रही है। चिली के लिए बेशक उन्होंने कुछ भी किया हो लेकिन भारत की छवि को वैश्विक पटल पर खराब करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है। अब पश्चिमी जगत और चीन की तारीफ में कसीदे पढ़ने वाले राहुल गाँधी को हो सकता है कि भारत विरोधी मानसिकता वाली बैश्लेट में ही क्रांति का मसीहा नजर आ रहा हो।

जम्मू-कश्मीर पर विवादित टिप्पणियाँ

बैश्लेट ने जम्मू-कश्मीर के बहाने भारत पर हमला करने का कोई मौका नहीं छोड़ा, उन्होंने खूब कोशिश की कि किसी भी तरह भारत को दुनिया के सामने एक तानाशाह देश के रुप में पेश किया जा सके।

सितंबर 2020 में मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए उन्होंने भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा था, “भारत के कब्जे वाले कश्मीर में आम लोगों के खिलाफ मिलिट्री और पुलिस की हिंसा की घटनाएँ जारी हैं, जिसमें पेलेट गन का इस्तेमाल और मिलिटेंसी से जुड़ी घटनाएँ शामिल हैं। पॉलिटिकल बहस और पब्लिक पार्टिसिपेशन की जगह बहुत कम हो गई है।”

जिस भारत ने अनुच्छेद 370 जैसा बड़ा फैसला लेने के बाद भी जम्मू-कश्मीर में हिंसा नहीं होने दी, उसे लेकर इस तरह अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर बयानबाजी करना जाहिर तौर पर भारत के खिलाफ प्रोपेगेंडा का ही हिस्सा था।

सितंबर 2021 में एक बार फिर बैश्लेट ने भारत विरोधी मानवाधिकार काउंसिल में बोलते हुए भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाया। उन्होंने कहा, “जम्मू और कश्मीर में आम सभाओं पर अधिकारियों की रोक और समय-समय पर कम्युनिकेशन ब्लैकआउट जारी हैं जबकि सैकड़ों लोग अपनी बात कहने की आज़ादी के अधिकार का इस्तेमाल करने के लिए हिरासत में हैं। पत्रकारों पर दबाव है और UAPA का गलत इस्तेमाल हो रहा है।” भारत ने तब भी बैश्लेट के इस प्रोपेगेंडा की जमकर आलोचना की थी।

बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार के चैंपियन असल में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के हटाए जाने से तड़प रहे थे और चाहते थे कि किसी भी तरह यह साबित किया जा सके कि भारत अपने राज्यों को नहीं संभाल पा रहा है। हालाँकि, उनकी यह मेहनत रंग नहीं लाई और भारत ने पूरी मजबूती के साथ जम्मू-कश्मीर को मुख्यधारा के साथ पूरी तरह से जोड़ने का काम कर दिखाया।

FCRA पर अलापा अपना राग

भारत ने जब देश में एमनेस्टी इंटरनैशनल पर विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (FCRA) के उल्लंघन को लेकर कार्रवाई की तो बैश्लेट को इसमें भी दिक्कतें नजर आई थीं। उन्होंने FCRA को ही गड़बड़ बता दिया। यानी उन्होंने भारत को ये नसीहत देने की कोशिश की कि उन्हें किस तरह अपने नियम बनाने चाहिए। भारत के आंतरिक मामलों में मानवाधिकार प्रमुख का दखल देना क्या खुद में एक बड़ा सवाल नहीं है?

भारत ने बैश्लेट की बयानबाजी को खारिज कर दिया और बताया कि भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था है। भारत ने जोरदार विरोध दर्ज कराते हुए कहा, “कानून बनाने का अधिकार हमारा अपना है और मानवाधिकारों के नाम पर कानून के उल्लंघन को माफ नहीं किया जा सकता।”

CAA के खिलाफ कोर्ट में दी थी याचिका

भारत ने पड़ोसी देशों में प्रताड़ित अल्पसंख्यकों को भारत की नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन विधेयक (CAA) लाई लेकिन इसके खिलाफ देशभर में खूब प्रदर्शन हुए। लोगों को झूठ फैलाकर खूब बरगलाया गया कि भारत में मुस्लिमों की नागिरकता इससे छिन जाएगी। लोगों को बरगाने वालों में बैश्लेट जैसे लोग शामिल थे।

मार्च 2020 में बैश्लेट ने अपने अधिकारियों के जरिए CAA के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका तक डलवा दी थी। यह बैश्लेट जैसे कथित मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की देश के आंतरिक मामलों में दखल देने की कोशिश ही थी। भारत ने तब भी बैश्लेट पर कड़ा पलटवार किया था। भारत ने कहा था, “CAA भारत का आंतरिक मामला है और भारतीय संसद के कानून बनाने के संप्रभु अधिकार से संबंधित है। हमारा विश्वास है कि भारत की संप्रभुता से जुड़े मुद्दों पर किसी भी विदेशी पक्ष का कोई अधिकार नहीं है।”

किसान आंदोलन के दौरान भी आग में डाला घी

बैश्लेट ने तीन कृषि कानूनों के खिलाफ किसानों के प्रदर्शन के दौरान भी आग में घी डालने का काम किया था। आंदोलन को भड़काने की कोशिश के दौरान जब कथित एक्टिविस्ट के खिलाफ कार्रवाई हुई तो बैश्लेट ने भी अपने प्रोपेगेंडा शुरू कर दिया था। बैश्लेट ने भारत की कार्रवाई को मानवाधिकार के सिद्धांतों के खिलाफ बताया था।

किसान आंदोलन की आड़ में जब 26 जनवरी पर हिंसा की कोशिश की जा रही थी, किसान आंदोलन की आड़ में कुछ दंगाई देश को हिंसा की आग में झोंकना चाहते थे और भारत ने उस पर कार्रवाई की तो बैश्लेट जैसे लोगों को दर्द शुरू हो गया। भारत ने तब भी उनकी कड़ी आलोचना की थी।

मुस्लिमों पर हमले को लेकर फैलाया अंतर्राष्ट्रीय प्रोपेगेंडा

दुनिया का एक वर्ग में मुस्लिमों का हितेषी बनने और उन्हें भारत में पीड़ित दिखाने की चाह में मुस्लिमों पर कथित आक्रमण का एक झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है। ना केवल मुस्लिमों बल्कि बैश्लेट ने तो एक कदम आगे जाकर दलित और आदिवासियों पर हमलों का भी आरोप भारत में लगाया था।

बैश्लेट के ऐसे इन सबके अलावा भी कई उदाहरण आपको मिल जाएँगे। साफ है कि बैश्लेट का विरोध सराकर या संस्था से आगे बढ़कर भारत को निशाने पर लेने के लिए था। चूँकि यही सब मुद्दे या इनसे जुड़े मुद्दे ही कांग्रेस को भी भाते हैं तो उन्होंने बैश्लेट में अपना नया दोस्त नजर आया होगा।

कांग्रेस का ‘देश विरोधियों’ से प्यार क्यों नही होता खत्म?

भारत विरोधी मानसिकता रखने वाली मिशेल बैश्लेट के साथ कांग्रेस का इस तरह खुलकर खड़ा होना केवल एक संयोग नहीं बल्कि एक सुनियोजित राजनीतिक प्रयोग जैसा लगता है। कांग्रेस के लिए बैश्लेट कोई मानवाधिकारों की मसीहा नहीं हैं बल्कि वह एक ऐसा अंतरराष्ट्रीय चेहरा हैं जिनकी भारत-विरोधी टिप्पणियाँ मोदी सरकार को घेरने के लिए बार-बार इस्तेमाल की जाती रही हैं।

बैश्लेट को मंच देने का अर्थ यह भी है कि कांग्रेस अपनी राजनीतिक लड़ाई के लिए उन अंतरराष्ट्रीय आवाजों पर भरोसा करती है जिन्हें भारत विरोधी रुख के लिए जाना जाता है। कांग्रेस जिस बैश्लेट को शांति और निरस्त्रीकरण का सम्मान दे रही है, वही बैश्लेट भारत के आंतरिक और संवेदनशील मुद्दों को लेकर हमेशा एकतरफा टिप्पणियाँ करती रही हैं।

दिलचस्प यह है कि उनकी हर टिप्पणी ठीक उसी वक्त आई जब कांग्रेस और उसके सहयोगी दल मोदी सरकार पर हमला कर रहे थे। चाहे अनुच्छेद 370 हटाने की बात हो, CAA का विरोध हो या किसान आंदोलन की आग को भड़काने का दौर, मौके पर बैश्लेट ने वही कहा जो भारत के विपक्षी दल अंतरराष्ट्रीय मंचों से सुनना चाहते थे। जब कांग्रेस उन्हें सम्मानित करती है, तो उपलब्धियों के लिए नहीं बल्कि मोदी सरकार की नीतियों और भारत पर हमला करने वालों को पुरस्कार देने जैसा लगता है।

यह वही राजनीति है जिसमें देश की छवि से बढ़कर अपना ‘नैरेटिव’ दिखाई देता है। असल बात यह है कि कांग्रेस को बैश्लेट में वह ‘आवाज’ दिखती है जो उनकी विचारधारा के अनुरूप भारत को कमजोर, विभाजित और हमेशा लड़ता हुआ दिखाने की कोशिश करती है।

बैश्लेट की टिप्पणी, चाहे वे कितनी भी झूठी या आधी-अधूरी क्यों न हों, वो कांग्रेस के नैरेटिव को अंतरराष्ट्रीय वैधता प्रदान करती हैं। इसलिए उनका प्यार बैश्लेट जैसे भारत विरोधियों से कभी कम नहीं होता है।

विदेशी चंदा, करोड़ों की हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग के गंभीर आरोप: सरकार से पारदर्शिता की माँग करने वाले सोनम वांगचुक खुद कितने साफ?

                     विदेशी फंडिंग और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोप (फोटो साभार : Amar ujala & Canva)
CAA विरोध में बने शाहीन बागों से वाया बुर्का/हिजाब उपद्रव, तथाकथित आन्दोलनजीवी किसान और पहलवानों द्वारा धरना/प्रदर्शन करने पर हर कोई मोदी सरकार की खूब आलोचना कर रहा था, सच्चाई जाने बिना आलोचना बेमतलब होती है। दरअसल, बिकाऊ उपद्रवी ज्यादा कहीं टिक नहीं पाते। हकीकत में आज विपक्ष जो कुछ भी बोल या कर रहा है अपनी अक्ल से नहीं बल्कि भारत विरोधियों से मिले चंदे पर कर रहा है। नतीजा सबके सामने है कि मोदी विरोध में देश को ही आग में झोंकने की कोशिश कर रहे हैं। 
देश में आग लगाने की हर तरह से कोशिश की जा रही है। हिन्दुओं को जातियों में बांटने का दुस्साहस करने ईसाई और मुसलमानों को जातियों में बाँटने की हिम्मत नहीं। जिगरा चाहिए। ये वीडियो देखिए मुस्लिम कट्टरपंथियों को बेनकाब कर रही है:-

     
लद्दाख में अस्थिरता के बीच सोनम वांगचुक पर गंभीर आरोप, असली जन आंदोलन और राजनीतिक हेरफेर के बीच की रेखाएँ धुँधली होने का खतरा।

लद्दाख में जारी अशांति ने अब एक नया और चिंताजनक मोड़ ले लिया है। जिस समय यह क्षेत्र पहले से ही तनाव और हिंसक झड़पों के कारण अशांत है, उसी समय कुछ ऐसे आरोप सामने आए हैं, जो इसकी राजनीतिक और सामाजिक दिशा को बदल सकते हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनोवेटर और पर्यावरणविद् के रूप में पहचाने जाने वाले सोनम वांगचुक, जिन्हें लद्दाख के आंदोलनों का चेहरा माना जाता है, अब गंभीर वित्तीय अनियमितताओं के आरोपों के केंद्र में हैं।

आंदोलन की आड़ में भावनाओं से खिलवाड़- बीजेपी

भाजपा के शीर्ष सूत्रों द्वारा लगाए गए ये आरोप महज गड़बड़ी का मामला नहीं हैं, बल्कि यह संकेत देते हैं कि वांगचुक ने आंदोलन की आड़ में जनता की भावनाओं को भड़काकर निजी और संगठनात्मक हित साधने का प्रयास किया। सबसे बड़ा और ताज़ा घटनाक्रम गृह मंत्रालय का वह निर्णय है, जिसमें उसने सोनम वांगचुक द्वारा स्थापित स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की एफसीआरए (FCRA) रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया।

यह फैसला विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम (Foreign Contribution Regulation Act), 2010 के तहत कई गंभीर उल्लंघनों के बाद लिया गया। यह कोई साधारण प्रशासनिक कदम नहीं है- इसका सीधा असर SECMOL की विदेशी चंदा प्राप्त करने की वैधता पर पड़ा है। इसके अलावा, केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) ने भी जाँच शुरू कर दी है ताकि यह पता लगाया जा सके कि कहीं विदेशी चंदा का दुरुपयोग तो नहीं हुआ। जाँच से जो आँकड़े सामने आए हैं, वे चौंकाने वाले हैं।

संस्थाओं के फंडिंग में गड़बड़ी और नियम तोड़ना

सोनम वांगचुक की प्रमुख संस्था हिमालयन इंस्टीट्यूट ऑफ अल्टरनेटिव्स लद्दाख (HIAL) के फंडिंग में अचानक से होने वाली बढ़ोतरी देखी गई। वित्तीय वर्ष 2023-24 में जहाँ यह राशि 6 करोड़ रुपए थी, वहीं अगले वर्ष यह बढ़कर 15 करोड़ रुपए से अधिक हो गई। पहली नजर में इसे जनता के बढ़ते समर्थन का नतीजा माना जा सकता है, लेकिन जाँच एजेंसियों का दावा है कि यह वित्तीय प्रवाह पूरी तरह पारदर्शी नहीं है।
HIAL से जुड़े सात बैंक खातों में से चार खाते कथित रूप से घोषित नहीं किए गए। और भी गंभीर बात यह है कि इस संस्था ने 1.5 करोड़ रुपए से अधिक विदेशी पैसा बिना FCRA रजिस्ट्रेशन के प्राप्त की, जो कि कानून की धारा 11 का सीधा उल्लंघन है।

9 बैंक खातों में से 6 की अधिकारियों को जानकारी नहीं

गड़बड़ी यहीं तक सीमित नहीं है। SECMOL के पास कुल नौ बैंक खाते बताए जा रहे हैं, जिनमें से छह खातों को अधिकारियों से छिपाया गया। इससे यह संदेह और गहरा हो गया है कि कहीं सुनियोजित तरीके से वित्तीय लेन-देन को छुपाने का प्रयास तो नहीं हुआ।
इसके साथ ही एक निजी कंपनी शेष्योन इनोवेशंस प्राइवेट लिमिटेड (SIPL) भी जाँच के दायरे में आई है, जिसमें सोनम वांगचुक निदेशक के रूप में कार्यरत हैं। आरोप है कि HIAL से इस निजी कंपनी में 6.5 करोड़ रुपए ट्रांसफर किए गए। इससे हितों के टकराव (Conflict of Interest) और फंड के दुरुपयोग के सवाल खड़े हो गए हैं। इतना ही नहीं, इस कंपनी का शुद्ध लाभ (Net Profit) एक वर्ष में 6.13% से गिरकर सिर्फ 1.14% रह गया, जिससे संदेह और गहरा हो गया कि कहीं धनराशि को गलत तरीके से बाहर तो नहीं निकाला गया।
सबसे गंभीर आरोप सोनम वांगचुक की व्यक्तिगत वित्तीय स्थिति पर हैं।

सोनम वांगचुक ने ₹2.3 करोड़ विदेश भेजा

भाजपा सूत्रों का कहना है कि उनके पास कुल 9 व्यक्तिगत बैंक खाते हैं, जिनमें से 8 खातों का खुलासा नहीं किया गया। इन खातों में ज्यादा संख्या में विदेशी पैसा आने का दावा किया गया है। और भी चिंताजनक बात यह है कि 2021 से अब तक सोनम वांगचुक ने 2.3 करोड़ रुपए से अधिक की पैसा विदेश भेजी, जिनके प्राप्तकर्ताओं की पहचान ‘अज्ञात संस्थाओं’ के रूप में बताई जा रही है।
यह सीधे तौर पर मनी लॉन्ड्रिंग की आशंका पैदा करता है। विडंबना यह है कि सोनम वांगचुक अक्सर कॉरपोरेट जगत और सरकारों की आलोचना करते रहे हैं, लेकिन आरोप है कि उनकी संस्थाओं ने सरकारी उपक्रमों (PSUs) और निजी कंपनियों से बड़ी मात्रा में CSR (कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व) फंड प्राप्त किए हैं। यदि यह आरोप सही साबित होते हैं, तो यह उनके सार्वजनिक बयानों और निजी कार्यों के बीच भारी विरोधाभास को उजागर करेगा।
इन आरोपों के असर बहुत दूरगामी हो सकते हैं। अब तक लद्दाख के आंदोलन को एक जमीनी स्तर का संघर्ष माना जाता था, जो स्थानीय लोगों की स्वायत्तता (खुद निर्णय लेने वाले), पर्यावरण संरक्षण और सांस्कृतिक पहचान की माँगों पर आधारित था। लेकिन अगर ये वित्तीय अनियमितताएँ साबित हो जाती हैं, तो यह आंदोलन एक व्यक्ति के निजी लाभ और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का माध्यम बनकर रह जाएगा। इसका सीधा नुकसान लद्दाख के आम लोगों की वैध माँगों को होगा, जो कमजोर पड़ सकती हैं।
यह भी सच है कि आरोप और सच्चाई में फर्क होता है। सोनम वांगचुक का काम और योगदान, विशेषकर शिक्षा और सतत विकास के क्षेत्र में, अस्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन जब कोई व्यक्ति सरकार और उद्योगों से पारदर्शिता की माँग करता है, तो उसे स्वयं भी उतनी ही पारदर्शिता दिखानी चाहिए। CBI की जाँच के परिणाम दो कहानियों में से एक को सामने लाएँगे या तो यह एक दूरदर्शी नेता के खिलाफ राजनीतिक साजिश का मामला होगा, या फिर एक आंदोलनकारी नेता के मुखौटे के पीछे छिपे वित्तीय घोटाले का पर्दाफाश होगा।​ लद्दाख और देश की जनता को अब सत्य की प्रतीक्षा है, क्योंकि यही सच न केवल सोनम वांगचुक की छवि बल्कि लद्दाख के भविष्य को भी निर्धारित करेगा।

कांग्रेस MP गौरव गोगोई की अंग्रेज बीवी का ISI कनेक्शन? असम मुख्यमंत्री की पोस्ट से छिड़ी बहस, दावा- जो लेते हैं जॉर्ज सोरोस से पैसा उनसे भी जुड़ा है कांग्रेस सांसद का NGO

                             असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमाने बिना नाम लिए गौरव गोगोई पर प्रश्न उठाए 
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता गौरव गोगोई पर बड़ा हमला किया है। उन्होंने कांग्रेस सांसद का नाम लिए बिना उनकी पत्नी की नागरिकता और उनके ISI से सम्बन्धों के आरोप लेकर भी बात की है। उन्होंने इससे उठे प्रश्नों का जवाब माँगा है।

एक्स(पहले ट्विटर) पर असम मुख्यमंत्री ने लिखा, “ISI से संबंधों के आरोप, युवाओं के ब्रेनवॉश और उनको पाकिस्तानी दूतावास में कट्टरपंथी बनाने समेत पिछले 12 साल से भारतीय नागरिकता ना लेने पर उठे सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, धर्मांतरण कार्टेल से जुड़ा होना और देश की सुरक्षा को अस्थिर करने के लिए जॉर्ज सोरोस समेत पैसा लेना ऐसी चिंताएँ हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।”

जहाँ हिमंत बिस्वा सरमा ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन यह साफ है कि वह कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न के बारे में बात कर रहे थे। दोनों की शादी 2013 में हुई थी। 12 साल बाद भी कोलबर्न ने अपना ब्रिटिश पासपोर्ट बरकरार रखा है। उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी सवाल उठाया कि एक सांसद की पत्नी को इतने लंबे समय तक विदेशी नागरिकता बनाए रखने की अनुमति क्यों दी गई है? जबकि राजनयिकों के लिए एक अलग नियम है। उन्होंने IFS अधिकारियों की विदेशी नागरिक से शादी को लेकर नियम पर बात की। इसके तहत उन्हें अनुमति लेनी होती है और उनके साथी को 6 महीने में नागरिकता लेनी होती है।

गोगोई की पत्नी एलिजाबेथ वर्तमान में ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट के लिए काम कर रही हैं, जो जलवायु मुद्दों पर काम करता है। वह दिल्ली में क्लाइमेट एंड डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क (CDKN) में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर भी काम करती हैं।

असम के मुख्यमंत्री उन पर सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों का जिक्र कर रहे थे। इन आरोपों के अनुसार, एलिजाबेथ अली तौकीर शेख के जरिए ISI से जुड़ी हैं, जो CDKN के एशिया का डायरेक्टर है। उसने पाकिस्तान योजना आयोग में भी काम किया है। एलिजाबेथ ने पाकिस्तान में तौकीर शेख के साथ मिलकर काम किया।

गौरव गोगोई के NGO पर FCRA उल्लंघन का आरोप

इससे पहले गौरव गोगोई ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि मणिपुर में अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भाजपा जॉर्ज सोरोस और उनके ओपन सोसाइटी फाउंडेशन का मुद्दा उठा रही है। दिलचस्प बात यह है कि गौरव गोगोई के सोरोस से पैसे लेने वाले संगठनों से संबंध हैं।
गौरव गोगोई फार्म 2 फूड के नाम के NGO के संस्थापक हैं। जोरहाट में स्थित इस NGO का सहयोगी नेशनल फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया(NFI) है। यह संगठन जॉर्ज सोरोस और अन्य डीप स्टेट से पैसा लेता है। NFI ने जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क और रॉकफेलर फाउंडेशन को फंड देने वालों के रूप में बताया है।
ये सभी संगठन भारत सहित दुनिया भर में राष्ट्रवादी सरकारों के खिलाफ काम करने वाले डीप स्टेट के एसेट के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने कई भारत विरोधी अभियानों को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा, फार्म 2 फूड को FCRA लाइसेंस नहीं मिला हुआ है। ऐसे में यह विदेशी चन्दा नहीं ले सकता।
इसके बावजूद, यह NGO विदेशी संगठनों के साथ काम कर रहा है, जिससे सवाल उठता है कि क्या समूह FCRA कानूनों का प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है। फार्म 2 फूड ने स्विस रे फाउंडेशन को भी अपने सहयोगी के तौर पर दिखाया है। स्विस रे द्वारा संचालित फाउंडेशन जलवायु और स्वास्थ्य क्षेत्रों पर काम करता है।
इसकी वेबसाइट बताती है कि यह अन्य सहायता के अलावा अपने भागीदारों को फंड भी देता है। फार्म 2 फूड की 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इसे उस वर्ष ₹1 लाख 80 हजार का डोनेशन और 14 लाख 74 हजार रूपए का चन्दा मिला। हालाँकि, इसमें पैसा देने वालों का नाम नहीं है। इसलिए, यह पता नहीं लगाया जा सकता कि इसे सीधे तौर पर कोई विदेशी फंडिंग मिली है या नहीं।

10,000 करोड़ रूपए का घोटाला : 4500 चर्च पर जिसका नियंत्रण उसे अब नहीं मिलेगा विदेशी फंड, ईसाई संगठन का FCRA लाइसेंस रद्द

'                                        चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया' का FCRA लाइसेंस रद्द हो गया है (चित्र साभार: CWM)
केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने देश के बड़े ईसाई संगठन ‘चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया’ (CNI) एनजीओ का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया है। अब यह संगठन विदेशी चंदा नहीं ले सकेगा। यह ईसाई संगठन पिछले पाँच दशक से भारत में ईसाइयत को फैलाने का काम कर रहा है।

इस ईसाई संगठन को अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा समेत यूरोप और दुनिया के अन्य हिस्सों से भी बड़ी मात्रा में चंदा मिलता है। अब इस ‘चर्च ऑफ नार्थ इंडिया’ का विदेशी चंदा लेने का लाइसेंस केंद्रीय गृह मंत्रालय ने रद्द कर दिया है, यह खबर अंग्रेजी समाचार वेबसाइट ‘इकॉनोमिक टाइम्स‘ ने दी है। गृह मंत्रालय विदेशी चंदे के नियमों का उल्लंघन करने पर ये कार्रवाई करता है।

                                                                    CNI का एक पोस्टर

‘चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया’ को वर्ष 1970 में 6 अलग-अलग संगठनों को मिलाकर बनाया गया था। इसके अंतर्गत चर्च ऑफ़ इंडिया, पाकिस्तान, बर्मा (म्यांमार), सीलोन (श्रीलंका) के तथा कुछ अन्य ईसाई संगठनों को मिलाकर बनाया गया था। यह उत्तर भारत में चर्च का नियन्त्रण करने वाली संस्था है।

इस संस्था का दावा है कि 22 लाख लोग इसके सदस्य हैं। इसके अलावा यह भारत के 28 क्षेत्रों में अपने बिशप रखता है जो कि वहाँ के चर्च पर नियंत्रण रखते हैं। इसके अलावा ‘चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया’ का दावा है कि इसके पास 2200 से अधिक पादरी हैं और 4500 से अधिक चर्च इसके नियन्त्रण में हैं।

‘चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया’ के अंतर्गत 564 स्कूल और कॉलेज तथा 60 नर्सिंग एवं मेडिकल कॉलेज चलते हैं। ऐसा इसकी वेबसाइट बताती है। देश में प्रसिद्ध लखनऊ का लॉ मार्टिनियर कॉलेज भी इसी के अंतर्गत है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे प्रदेशों में स्थित कई मिशनरी स्कूल भी इसके अंतर्गत आते हैं।

CNI के कुछ पादरियों पर वर्ष 2019 में ₹10,000 करोड़ के जमीन घोटाले का आरोप लगा था। इस मामले में संगठन के कुछ पादरियों ने अपने ही साथियों पर आरोप लगाया था कि उन्होंने कागजों में गड़बड़ी करके सैकड़ों एकड़ जमीन बेच दी। बीते कुछ समय में ऐसे कई NGO के लाइसेंस रद्द किए गए हैं जो कि विदेशों से फंड लेकर यहाँ गड़बड़ियाँ फैला रहे थे। यह NGO विदेशों से लिए गए पैसों का स्पष्ट हिसाब भी नहीं रख रहे थे। इनमें ऑक्सफैम, सेंटर फॉर पालिसी रिसर्च और राजीव गाँधी फाउंडेशन जैसे कुछ NGO शामिल रहे हैं।

राज्यसभा में दिसम्बर 2022 में दी गई एक जानकारी के अनुसार, वर्ष 2018 से लेकर वर्ष 2022 के बीच में गृह मंत्रालय ने 6677 NGO के विदेशी चंदा लेने के लाइसेंस खत्म किए हैं। यह सभी विदेशी चंदा लेकर गड़बड़ी करने के दोषी पाए गए थे। ऑपइंडिया ने ‘चर्च ऑफ़ नॉर्थ इंडिया’ की वेबसाइट पर दिए गए नम्बर पर सम्पर्क किया तो जवाब आया कि उन्हें अभी इस विषय में कोई जानकारी नहीं है। वह मामले की जानकारी ले कर आगे बताएँगे।

राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन, सोरोस और जाकिर नाइक की संस्था क्यों करती थी फंडिंग?

भारत के स्वतंत्र होने से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक देश ने अनेकों धरने और प्रदर्शन देखे। पहले किसी भी चीज (खाद्य पदार्थ अथवा पेट्रोल) पर चवन्नी बढ़ने पर धरने एवं प्रदर्शन होते थे, उनसे विपक्ष मजबूत होता था लेकिन निर्भय कांड से लेकर किसान आंदोलन तक जितने भी धरने हुए या हो रहे हैं, विपक्ष कमजोर हो रहा है, लेकिन उतनी तेजी से नहीं, जिस तेजी से होना चाहिए। देखिए कैसे:

CAA विरोध में शामिल हिन्दुओ हिन्दुत्व 
के विरोध ऐसे बैनर पर तुम्हारी आत्मा कहाँ मर गयी थी
?
अभी कुछ दिन पहले एक अजीबोगरीब फैसला आया कि 13 वर्षीय एक अपराधी को नाबालिग को कोर्ट 33 साल लेती है, फिर जेल से रिहा करने पर 10 साल। परन्तु निर्भय केस में क्या हुआ, एक आरोपी को नाबालिग होने पर रिहा कर दिया जाता है और उसको दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल सिलाई मशीन देकर सम्मानित करते हैं, इसे सम्मान ही कहा जाएगा। क्योकि वह मुसलमान था। चलो अब हाल के CAA विरोध प्रदर्शन को लें। जहां हिन्दुओं की गैर-उपस्थिति में जब तक देश इस्लामिक मुल्क न बन जाए तब तक हाथ तिरंगा और सेकुलरिज्म को बुलंद करना होगा और हिन्दुओं की गैर-हाज़िरी में अपने मकसद में काम करना है और इस आंदोलन को समस्त भाजपा विरोधियों का समर्थन था। इसी ब्लॉग पर इस विषय पर लिखे लेख शीर्षक सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार, आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार को 1 लाख से अधिक पाठक पढ़ चुके हैं। किसी ने खंडन नहीं किया। हिन्दुत्व को कितने अपमानित शब्द बोले गए, यदि वही शब्द किसी अन्य धर्म के विरुद्ध बोले जाते, CAA विरोध किसी गुप्त स्थान में लुप्त होकर, देश में आग लग गयी होती। नूपुर शर्मा जीवित उदाहरण है। जबकि नूपुर ने वही बोला जो इस्लामिक किताबों में लिखा है, अपने मन से नहीं बोला था। एक एंकर ने तो समस्त इमामों, मुफ्तियों और इस्लामिक विद्वानों को अपने शो में खुला चैलेन्च दिया था कि 'नूपुर ने क्या गलत बोला है?' लेकिन बेशर्म हिन्दू पागलों की तरह मोदी-योगी विरोध की अंधी दौड़ में शामिल थे। 

दूसरा, भाजपा विरोधी पार्टियों द्वारा किसान आंदोलन को समर्थन था, क्या नारेबाजी हुई थी, क्या वह देशहित में थी? जो यह सिद्ध करता है कि ये आंदोलन भारत विरोधियों द्वारा प्रायोजित है, जिस पर प्रकाश डाल रही है न्यूज़ पोर्टल पर प्रकाशित निम्न रपट। फिर भी जनता इन पार्टियों को वोट देती हैं, इनकी महिमा का गुणगान करती है।  

केंद्र सरकार ने गांधी परिवार से जुड़े गैर सरकारी संगठन राजीव गांधी फाउंडेशन का विदेशी योगदान नियमन अधिनियम (FCRA) का लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह कार्रवाई 2020 में गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक अंतर-मंत्रालयी समिति द्वारा की गई जांच के बाद हुई है। अब राजीव गांधी फाउंडेशन को विदेश से किसी तरह की फंडिंग नहीं हो पाएगी। कानून के उल्‍लंघन पर गृह मंत्रालय ने यह कार्रवाई की है। पूर्व कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं। राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्‍टीज में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और पूर्व वित्‍त मंत्री पी चिदंबरम शामिल हैं। 

राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए 1991 में की गई थी। अगस्‍त 2020 में राजीव गांधी फाउंडेशन की फंडिंग को लेकर सनसनीखेज दावे किए गए थे। आरोप था कि राजीव गांधी फाउंडेशन को PNB घोटाले के आरोपी मेहुल चोकसी की कंपनियों से डोनेशन मिलता रहा। फाउंडेशन को जाकिर नाईक, यस बैंक के राणा कपूर और जिग्‍नेश शाह से भी डोनेशन मिला। उसी के बाद गृह मंत्रालय ने जांच शुरू की। पीएमएलए (प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट) की जांच चल ही रही थी। पहले भी राजीव गांधी फाउंडेशन को चीनी सरकार से मदद मिलने पर विवाद हो चुका है। फाउंडेशन की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार और चीनी दूतावास से दो अलग-अलग दानकतार्ओं से दान मिला। चीनी दूतावास को सामान्य दाताओं की सूची में रखा गया

इस मुद्दे पर टि्वटर यूजर Agenda Buster ने एक ट्वीट की एक श्रृंखला प्रकाशित की है। उन्होंने लिखा है कि आज कई एनजीओ दुनिया भर में जमीनी स्तर पर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं इसलिए लोग उनका सम्मान भी करते हैं लेकिन कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि उनका भी दुरुपयोग हुआ है। आधुनिक समय के लोकतांत्रिक युद्ध टैंकों, लड़ाकू विमानों और गोलियों से नहीं लड़े जाते हैं। वे एनजीओ, कार्यकर्ताओं और विदेशी फंडों द्वारा लड़े जाते हैं। मान लीजिए कि अमेरिका भारतीय सरकार पर दबाव बनाना चाहता है कि वह किसी मुद्दे पर उसका समर्थन करे या वे भारत में कुछ बुनियादी, क्षमता निर्माण या अंतरिक्ष कार्यक्रम को रोकना चाहते हैं तो उन्हें अपने जेट भारत भेजने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें बस भारत में काम करने वाले अपने एनजीओ को पैसा ट्रांसफर करने की जरूरत है और बाकी काम ये एनजीओ उनके कार्यकर्ता, वकील और मीडियाकर्मी करेंगे। इसलिए एनजीओ की फंडिंग के बारे में जानना बहुत जरूरी है।

राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए 1991 में की गई थी। सोनिया गांधी के नेतृत्व में जुलाई 1991 में बैठक हुई और फाउंडेशन के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया था। राजीव गांधी फाउंडेशन का कहना है कि संगठन ने शिक्षा के साथही स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, महिलाओं और बच्चों, विकलांगता सहायता आदि सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम किया है।

भ्रष्ट कॉरपोरेट्स से फंडिंग

फाउंडेशन ने चेक नंबर 676400 के माध्यम से 29-8-2014 को नवराज एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड से 10 लाख रुपये प्राप्त किए। नवराज एस्टेट गीतांजल इंडस्ट्रीज़ की सिस्टर फर्म है, जो भगोड़े मेहुल चौकसी के स्वामित्व में है, जिस पर मनी लॉन्ड्रिंग और पीएनबी धोखाधड़ी का आरोप है। उन्हें यस बैंक धोखाधड़ी के आरोपी राणा कपूर से 9.45 लाख रुपये मिले। वही राणा कपूर 2 करोड़ रुपये में प्रियंका वाड्रा से पेंटिंग लेकर आए थे जिसका भुगतान यस बैंक ने किया था। 27-10-2011 को जिग्नेश शाह से 50 लाख रुपये प्राप्त किए। वह नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड घोटाले में आरोपी है।

फाउंडेशन को 8-7-2011 को Izl@mic Research Foundation से 50 लाख रुपये की फंडिंग मिली। इस संस्था का मालिक जाकिर नाइक है। वही जाकिर नाइक जो भगोड़ा है और कट्टरपंथ और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोपी है। इस बात का खुलासा होने के बाद फाउंडेशन ने वह पैसा 12-7-2016 को लौटा दिया।

सत्ता का दुरुपयोग

गांधी परिवार की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने नियमों में बदलाव किया और गांधी परिवार की कांग्रेस पार्टी को लुटियंस दिल्ली में 2 एकड़ महंगी जमीन दी। कांग्रेस पार्टी ने 1995 में वह जमीन गांधी परिवार के राजीव गांधी फाउंडेशन को मुफ्त में किराए पर दी थी।

2014 में उन्होंने फिर से नियम बदल दिए और राजीव गांधी फाउंडेशन ने उस जमीन को 4 अन्य संगठनों को किराए पर दे दिया। उन्होंने उमर खालिद और सिमी कार्यकर्ताओं को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने दिया। मनमोहन सिंह सरकार ने पीएम राष्ट्रीय राहत कोष से फाउंडेशन को फंड दिया।

फाउंडेशन को चीनी दूतावास से मिला फंड

फाउंडेशन को 2006-09 के दौरान दो बार चीनी सरकार से फंड भी मिला, यही वह समय था जब कांग्रेस सरकार ने चीन के साथ गुप्त सौदा किया था।

अमेरिकी अरबपति सोरोस से फंडिंग

2020 में, अमेरिकी अरबपति n वामपंथी सोरोस ने कहा कि वह मोदी को हटा देंगे और अपने पिछले सूत्र में मैंने उनके n C1A के लिंक के बारे में भी बताया और कैसे C1A ने अमेरिकी आदेशों का पालन नहीं करने वाली सरकारों को हटाने के लिए विपक्षी दलों को फंड दिया। फाउंडेशन ने जर्मन एनजीओ फ्रेडरिक नौमन फाउंडेशन (Friedrich Nauman Foundation) से धन प्राप्त किया जो कि सोरोस (S0r0s) द्वारा वित्त पोषित किया गया। क्लिंटन फाउंडेशन ने भी राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट को समर्थन दिया था और क्लिंटन फाउंडेशन को सोरोस (S0r0s) फंड करता है। राजीव गांधी फाउंडेशन 2007-08 में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क से जुड़ा था। सोरोस पर आरोप है कि वह कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन, शहरी नक्सलियों को समर्थन, रोहिंग्याओं को समर्थन, देशद्रोह विरोधी कानून का समर्थन करने के लिए फंडिंग करता है।

राजीव गांधी फाउंडेशन ने अमन बिरादरी ट्रस्ट के साथ भागीदारी की, जिसके प्रमुख हर्ष मंदर हैं जो सोरोस ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में थे। हर्ष मंदर ने 2010 में सांप्रदायिक हिंसा बिल बनाया था और सीएए के विरोध में शामिल था।

FCRA क्‍या है? विदेशी चंदा पाने के नियम क्‍या हैं?

FCRA यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम। इस कानून के जरिए विदेशी चंदे का रेगुलेशन होता है। FCRA पहली बार 1976 में अस्तित्‍व में आया। 2010 में नियम बदले गए। भारत में मौजूद वे सारे एसोसिएशन, समूह और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) जिन्‍हें विदेश से चंदा चाहिए, उन्‍हें FCRA की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। ऐसे सभी NGOs के लिए FCRA रजिस्‍ट्रेशन अनिवार्य है। रजिस्‍ट्रेशन पांच सांल के लिए वैध होता है, उसके बाद इसे रिन्‍यू कराया जा सकता है। रजिस्‍टर्ड संस्‍थाओं को सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों के लिए विदेशी चंदा लेने की अनुमति है। सभी को सालाना रिटर्न फाइल करने होते हैं।

गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस

2015 में MHA ने नई गाइडलाइंस जारी कीं। सभी NGOs के लिए या तो सरकारी या प्राइवेट बैंक में खाते होना अनिवार्य है ताकि सुरक्षा एजेंसियों को रियल टाइम एक्‍सेस मिल सके। अब सारे NGOs को यह प्रमाण देना पड़ता है कि विदेशी फंडिंग से भारत की संप्रभुता और अखंडता खतरे में नहीं पड़ेगी। मित्र देशों संग रिश्‍तों पर नकरात्‍मक असर नहीं पड़ेगा। सांप्रदायिक सद्भाव को कमजोर नहीं करेगी।