इंदिरा से राजीव-राहुल और अमेरिकी सांसद राइली मूर तक विदेशी फंडिंग कनेक्शन, बहुत खतरनाक है विदेशी एजेंडा!

भारत में मोदी सरकार द्वारा ‘FCRA (संशोधन) विधेयक 2026’ लाने से विपक्ष से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधियों में हड़कंप मचना साबित करता है कि विपक्ष इन भारत विरोधियों के हाथ की कठपुतली बन शोर मचा कर जनता को गुमराह कर रहे हैं। विपक्ष देश को जवाब दे "आखिर क्यों इस विधेयक का विरोध किया जा रहा है? क्या देश में CAA विरोध से लेकर अब जंतर मंतर पर हुए कॉकरोचों के आंदोलन क्या विदेशी फंड से आयोजित किए गए थे? इन आंदोलनों में खाना-पीना किसके द्वारा किसके फण्ड से किया गया था? लेकिन झाड़खंड में छात्रों द्वारा हो रहे आंदोलन में कोई उन छात्रों को भोजन देने क्यों नहीं जा रहे? वजह साफ है कि झाड़खंड छात्र आंदोलन उचित मांगों को लेकर है किसी द्वारा फंडिंग पर नहीं।       

मोदी सरकार के ‘FCRA (संशोधन) विधेयक 2026’ से कांग्रेस समेत विपक्षी दलों से लेकर वाशिंगटन तक में बेचैनी यूं ही नहीं है। दरअसल, विदेशी फंडिंग के पीछे आज का नहीं बल्कि दशकों पुराना खतरनाक विदेशी एजेंडा है। इस विदेशी फंडिंग से  धर्मांतरण के साथ ही भारत को आर्थिक रूप से कमजोर करने की साजिशों के प्रयास भी होते रहे हैं। अमेरिकी में डोनाल्ड ट्रंप की पार्टी के सांसद राइली मूर ने इसे भारत में ईसाइयों पर हमला बताते हुए भारत-अमेरिका संबंधों तक को प्रभावित करने की चेतावनी दे डाली। पहले यह सवाल उठ रहे थे कि आखिर अमेरिका को इससे क्या आपत्ति हो सकती है, लेकिन जब मूर की पोस्ट पर विदेशी प्रतिक्रियाएं सामने आईं तो सारे एजेंडे का पर्दाफाश हो गया। दूसरी ओर, विदेशी फंडिंग से इंदिरा गांधी, राजीव-सोनिया और राहुल गांधी के कनेक्शन ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस वही भाषा क्यों बोल रही है,  जो हजारों किलोमीटर दूर बैठे कुछ पश्चिमी समूह व्यक्त कर रहे हैं। सवाल यह है कि विदेशी चंदे की पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ाने वाले कानून से आखिर इतनी घबराहट क्यों है और किसे है? यह वास्तव में धार्मिक स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं, बल्कि असल वजह अनधिकृत विदेशी फंडिंग पर रोक है, जो अभी तक विदेशी नेटवर्कों से बिना पर्याप्त निगरानी के मिल रही थी।

साभार : सोशल मीडिया 
राइली मूर का बयान संयोग नहीं, एक सुनियोजित नैरेटिव
राइली मूर का बयान अपने आप में असामान्य है, लेकिन उससे भी अधिक दिलचस्प घटनाक्रम उसके बाद देखने को मिला। आयरलैंड से संचालित ‘कैथोलिक एरेना’ जैसे मंचों ने उनके बयान को तुरंत आगे बढ़ाया और भारत के खिलाफ उसी नैरेटिव को दोहराना शुरू कर दिया कि भारत सरकार चर्चों और धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना चाहती है। यह प्रतिक्रिया किसी स्वतःस्फूर्त चिंता से अधिक जानबूझकर बनाए गए एक नैरेटिव जैसी प्रतीत होती है। जैसे ही भारत विदेशी फंडिंग के उपयोग में पारदर्शिता और जवाबदेही की बात करता है, कुछ अंतरराष्ट्रीय समूह इसे धार्मिक स्वतंत्रता, मानवाधिकार या लोकतंत्र के संकट के रूप में प्रस्तुत करने लगते हैं। यह रणनीति नई नहीं है; भारत के अनेक आंतरिक विषयों पर भी इसी प्रकार का अंतर्राष्ट्रीय दबाव बनाने का प्रयास पहले भी देखा जा चुका है।

दुनिया भर के कई देशों में हैं विदेशी चंदे पर कठोर कानून
भारत को लेकर एक बड़ा विरोधाभास यह भी है कि जिन देशों के नेता FCRA पर सवाल उठा रहे हैं, उनके अपने देशों में विदेशी फंडिंग के कहीं अधिक कठोर कानून लागू हैं। अमेरिका में Foreign Agents Registration Act (FARA) के तहत विदेशी प्रभाव से जुड़े व्यक्तियों और संस्थाओं पर व्यापक निगरानी रखी जाती है। ऑस्ट्रेलिया ने Foreign Influence Transparency Scheme लागू की है। ब्रिटेन, कनाडा और इजराइल ने भी विदेशी धन के राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए अलग-अलग कानूनी ढांचे विकसित किए हैं। इन देशों में इन्हें राष्ट्रीय सुरक्षा और लोकतांत्रिक संप्रभुता की रक्षा का साधन माना जाता है। फिर भारत जब अपने लिए वही सख्त कानून लागू कर रहा है तो इसे लोकतंत्र विरोधी कैसे कहा जा सकता है?

करोड़ों रुपये के विदेशी अंशदान के बारे में पारदर्शिता जरूरी
यह शीशे की तरह साफ है कि विधेयक का मूल उद्देश्य विदेशी धन प्राप्त करने वाले संगठनों को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है। सरकार का यह तर्क बिल्कुल ठीक है कि यदि विदेश से आने वाला धन सामाजिक सेवा, शिक्षा, स्वास्थ्य या जनकल्याण के लिए है, तो उसके उपयोग का स्पष्ट लेखा-जोखा भी होना चाहिए। यदि किसी संगठन के पास करोड़ों रुपये का विदेशी अंशदान आता है, तो यह जानना भी आवश्यक है कि वह धन किस उद्देश्य से आया, कहां खर्च हुआ और उसका वास्तविक लाभार्थी कौन-कौन है? यह भारत ही नहीं हर लोकतांत्रिक देश की सामान्य प्रशासनिक आवश्यकता है। कई देशों में इससे मिला-जुला कानून पहले से ही लागू है। खासकर अमेरिका में तो यह कानून सबसे पुराना है, जहां सबसे ज्यादा हायतौबा मच रही है।

पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने भी संबंधों को लेकर डराया
दिलचस्प बात यह है कि राइली मूर अकेले अमेरिकी सांसद नहीं हैं, जिन्होंने भारत के FCRA संशोधन विधेयक को लेकर आपत्ति जताई है। इससे पहले अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो की मई 2026 की भारत यात्रा से पूर्व अमेरिकी सांसद क्रिस स्मिथ ने मदर टेरेसा की मिशनरीज ऑफ चैरिटी का FCRA लाइसेंस निलंबित किए जाने का मुद्दा भारत के सामने उठाने की अपील की थी। भय का माहौल बनाते हुए स्मिथ ने दावा किया था कि यदि यह विधेयक पारित हो गया, तो ‘सभी चर्चों और डायोसीज की संपत्तियां भारत के कब्जे में जा सकती हैं।’ राइली मूर की तरह स्मिथ ने भी चेतावनी दी थी कि यदि इस विधेयक को रोका नहीं गया, तो इससे भारत-अमेरिका संबंधों को दीर्घकालिक नुकसान हो सकता है। सिर्फ विदेशी राजनेता ही नहीं, बल्कि भारत के कुछ लेफ्ट लिबरल गैंग और संस्थान भी इस विधेयक को धार्मिक अल्पसंख्यकों और नागरिकों पर हमले के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं।

ईसाई मिशनरी के लिए अमेरिकी कर रहे FCRA का विरोध
अब प्रश्न उठता है कि अमेरिका भारत के FCRA संशोधन विधेयक का विरोध क्यों कर रहा है और भारत-अमेरिका संबंधों को नुकसान पहुंचने की चेतावनी क्यों दे रहा है? इसका उत्तर भूराजनीतिक हितों और धार्मिक महत्वाकांक्षाओं में छिपा है। अमेरिकी मिशनरी नेटवर्क, World Vision, USAID और FCRA संशोधन विधेयक का विरोध अपने स्वार्थ के लिए कर रहे हैं। दरअसल, दशकों से अमेरिका स्थित अनेक मिशनरी नेटवर्क भारत में चर्च स्थापित करने, गरीबों, विशेषकर जनजातीय और दलितों के बीच धर्मांतरण अभियान चलाने तथा उससे जुड़ी गतिविधियों के लिए फंडिंग करते रहे हैं। Compassion International, World Vision India समेत कई विदेशी ईसाई संगठन आज भी भारत में सक्रिय हैं और धार्मिक गतिविधियों के साथ-साथ अपने मूल देशों के रणनीतिक हितों को भी आगे बढ़ाने का काम करते हैं। वर्ल्ड विजन नाम के इस ईसाई NGO को अब बंद हो चुकी अमेरिकी एजेंसी USAID से भी फंडिंग मिलती रही, जिस पर भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी संगठनों तथा व्यक्तियों को वित्तीय सहायता देने के आरोप लगते रहे हैं।

इंदिरा की अनुमति से नागालैंड में फंडिंग-धर्मांतरण अभियानों को बल मिला
अमेरिका स्थित वर्ल्ड विजन इंटरनेशनल की गतिविधि संदिग्ध रही है। वास्तविकता में यह कट्टर ईसाई मिशनरी संगठन है। पिछले लगभग सात दशकों से इसने अन्य मिशनरी समूहों के साथ मिलकर विदेशी फंडिंग का लालच देकर हिंदुओं का धर्मांतरण करने के लिए अभियान चलाए। सबसे हैरतअंगेज तथ्य यह है कि वर्ष 1972 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने World Vision से जुड़े बिली ग्राहम को नागालैंड जाने की अनुमति दी थी। उस समय राज्य में अस्थिरता के कारण विदेशियों को जाने की अनुमति भी नहीं दी जाती थी। इसके बाद World Vision ने नागालैंड और दूसरे क्षेत्रों में अपने धर्मांतरण अभियानों को आगे बढ़ाया। वर्ष 2024 में मोदी सरकार ने World Vision का FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया, जिससे भारत में उसकी गतिविधियों को बड़ा झटका लगा। दरअसल, World Council of Churches, World Evangelical Alliance और World Vision जैसे विदेशी ईसाई संगठन भारत के धर्मांतरण-रोधी कानूनों का लगातार विरोध करते रहे हैं।

राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन और विदेशों से मिली फंडिंग
FCRA संशोधन विधेयक से विदेशी फंडिंग के उन स्रोतों पर प्रभाव पड़ने वाला है, जिनका उपयोग धार्मिक धर्मांतरण, राजनीतिक सक्रियता और भारत-विरोधी अभियानों के लिए किया जाता रहा है। यही कारण है कि विदेशी राजनीतिक नेता और मिशनरी संगठन इस कानून के विरुद्ध सक्रिय अभियान चला रहे हैं। जहां तक भारत की बात है तो कांग्रेस समेत कुछ विपक्षी दल इसका विरोध कर रहे हैं। दिलचस्प विरोधाभास यह भी है कि कांग्रेस इस विधेयक के विरोध का नेतृत्व कर रही है, जबकि उसका अपना इतिहास विदेशी फंड प्राप्त संस्थाओं से जुड़ा रहा है। राजीव गांधी फाउंडेशन का ही उदाहरण लें, इसकी अध्यक्ष सोनिया गांधी और ट्रस्टी राहुल गांधी हैं। इस संस्था को चीन सहित विदेशी स्रोतों से धन प्राप्त हुआ है। बाद में जांच के दौरान कथित अनियमितताएं सामने आई और उसका FCRA लाइसेंस रद्द कर दिया गया।

राइली मूर का विरोध राहुल गांधी के विदेशी हस्तक्षेप का विस्तार
यदि पिछले कुछ वर्षों के घटनाक्रम पर नजर डालें तो पता चलेगा कि राहुल गांधी कई अवसरों पर विदेशों में भारत के लोकतंत्र को लेकर चिंता व्यक्त करते रहे हैं और विदेशी हस्तक्षेप की मांग जैसे बयान देते रहे हैं। FCRA संशोधन विधेयक के बीच इस माहौल में राइली मूर सहित अमेरिकी सांसदों द्वारा भारत की नीतियों की आलोचना उसी हस्तक्षेप की मांग के अभियान का विस्तार प्रतीत होती है। यह बिल्कुल स्पष्ट तथ्य है कि FCRA संशोधन विधेयक का मूल उद्देश्य चर्चों या धार्मिक संस्थाओं पर कब्जा करना नहीं, बल्कि विदेशी फंडिंग के उन नेटवर्क को नियंत्रित करना है, जिनका उपयोग धर्मांतरण, डेमोग्राफी के बदलाव, विरोध प्रदर्शनों, अराजक गतिविधियों या ऐसे सिस्टम को खड़ा करने के लिए किया जाता रहा है। इसलिए कहा जा सकता है कि अमेरिकी सांसद राइली मूर सहित कई विदेशी राजनीतिक और धार्मिक संगठन इस विधेयक को ‘ईसाइयों पर हमले’ के रूप में दिखा कर धार्मिक भावनाएं भड़काने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।

मनमोहन ने माना था विदेशी फंड प्राप्त संगठनों को देश के लिए खतरा
आज जो कांग्रेसी FCRA का विरोध कर रहे हैं, उन्हें पता होना चाहिए कि कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना को लेकर लगातार चल रहे विरोध के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने भी सार्वजनिक रूप से विदेशी फंड प्राप्त गैर-सरकारी संगठनों (NGO) की भूमिका पर सवाल उठाए थे। उन्होंने फरवरी 2012 में प्रतिष्ठित विज्ञान पत्रिका Science को दिए एक साक्षात्कार में कहा था कि कई NGO, विशेषकर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त संगठन, भारत की विकास संबंधी चुनौतियों को समझने के बजाय देश की प्रगति में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। डॉ. सिंह ने कहा था, “कई NGO, जिन्हें अक्सर अमेरिका और स्कैंडिनेवियाई देशों से धन मिलता है, हमारे देश की विकास संबंधी आवश्यकताओं को समझने के बजाय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम और कृषि में जेनेटिक इंजीनियरिंग जैसी परियोजनाओं का विरोध कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम को जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे ऐसे NGO हैं, जो यह नहीं समझते कि भारत को अपनी ऊर्जा क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है।” यानी, उस समय स्वयं कॉन्ग्रेसी प्रधानमंत्री ने स्वीकार किया था कि विदेशी फंड प्राप्त संगठन भारत की रणनीतिक और विकास संबंधी परियोजनाओं को प्रभावित करते हैं।

कुडनकुलम परमाणु परियोजना: विदेशी फंडिंग और आंदोलन
विदेशी फंडिंग के प्रभाव का सबसे चर्चित उदाहरण कुडनकुलम परमाणु ऊर्जा परियोजना (KKNPP) है, जिसे वर्षों तक वामपंथी दलों और विदेशी धन प्राप्त NGO के विरोध का सामना करना पड़ा। तमिलनाडु के तिरुनेलवेली जिले में स्थित इस परियोजना की परिकल्पना भारत के सबसे बड़े परमाणु ऊर्जा संयंत्र के रूप में की गई थी, जिसकी कुल क्षमता 6,000 मेगावाट निर्धारित थी। इसका निर्माण 2002 में शुरू हुआ, लेकिन लगातार प्रदर्शन और राजनीतिक विरोध के कारण यह परियोजना लंबे समय तक बाधित रही। इन विरोध प्रदर्शनों का चरम वर्ष 2011 में देखने को मिला, जब जापान के फुकुशिमा परमाणु हादसे के बाद लोगों में भय का माहौल बनाया गया कि कुडनकुलम में भी वैसी ही त्रासदी हो सकती है। पीपुल्स मूवमेंट अगेंस्ट न्यूक्लियर एनर्जी (PMANE) के नेता एस. पी. उदयकुमार इस आंदोलन का प्रमुख चेहरा बनकर उभरे।

परमाणु परियोजना के विरोधी AAP उम्मीदवार बन गए
वर्ष 2012 में कई अंतरराष्ट्रीय ईसाई प्रकाशनों ने खुलकर लिखा था कि चर्च और कैथोलिक संगठन इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। इडिंथाकराई स्थित ‘लेडी ऑफ लूर्ड्स कैथोलिक चर्च‘ तथा दो कैथोलिक पादरी PMANE की समन्वय समिति का हिस्सा थे। बाद में परमाणु परियोजना का विरोध करने वाले कई प्रमुख कार्यकर्ता, जिनमें एस.पी. उदयकुमार और जी.सुंदरराजन शामिल थे, आम आदमी पार्टी (AAP) से जुड़ गए। एस.पी. उदयकुमार ने तो वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में AAP के उम्मीदवार के रूप में चुनाव भी लड़ा। इसी प्रकार हाल में दिल्ली में हुए Cockroach Janta Party (CJP) के छात्र आंदोलन का नेतृत्व करने वाले अभिजीत दिपके भी अतीत में आम आदमी पार्टी से जुड़े रहे हैं। इस पूरे विवाद के दौरान भारत के पूर्व राष्ट्रपति और प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम ने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा था कि कुडनकुलम परियोजना पूरी तरह सुरक्षित है और लोगों को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें विश्वस्तरीय सुरक्षा व्यवस्था मौजूद है। फिर भी विरोध प्रदर्शन और न्यायालयों में याचिकाओं का सिलसिला वर्षों तक चलता रहा।

कई ईसाई संगठन और मीडिया संस्थानों के निशाने पर FCRA और सरकार
दरअसल, इन्हीं कारणों से भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठन इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं। इनमें Catholic Bishops’ Conference of India (CBCI), All India Christian Council तथा आर्चबिशप जोसेफ डी’सूज़ा का उल्लेख किया गया है। आर्चबिशप डी’सूज़ा ने FCRA संशोधन को ईसाई संस्थाओं की संपत्तियों की ‘लूट’ तक बताया है। भारत के बाहर भी National Hispanic Christian Leadership Conference सहित कई अमेरिकी ईसाई संगठनों ने इस विधेयक को वापस लेने की मांग की है। इसके अलावा Christianity Today, International Christian Concern जैसी ईसाई पत्रिकाओं और पोर्टलों पर भी ऐसे लेख प्रकाशित हुए, जिनमें यह दावा किया गया कि भारत की ‘हिंदू राष्ट्रवादी सरकार’ ईसाइयों को निशाना बना रही है। हाल में दिल्ली में हुए कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के आंदोलन में कई कैथोलिक पादरी भी प्रदर्शनकारियों के साथ मार्च करते दिखाई दिए। साथ ही यह भी उल्लेख किया गया है कि दिल्ली पुलिस ने इस आंदोलन से जुड़े कुछ NGO और व्यक्तियों की भूमिका की जांच शुरू की है।

इंटेलिजेंस ब्यूरो की रिपोर्ट और विदेशी फंडेड NGO का नेटवर्क
मानवाधिकार, लोकतांत्रिक स्वतंत्रता, आर्थिक न्याय, सरकारी जवाबदेही, शिक्षा के प्रसार और आदिवासी अधिकार जैसे आकर्षक नारों के साथ भारत में अनेक NGO विदेशी वित्तीय सहायता प्राप्त करते हैं। लेकिन समय-समय पर आरोप लगते रहे हैं कि इनमें से कई संगठनों का वास्तविक उद्देश्य विकास परियोजनाओं को रोकना, अराजकता फैलाना और भारत की आर्थिक प्रगति को बाधित करना रहा है। इसी संदर्भ में वर्ष 2014 में इंटेलिजेंस ब्यूरो (IB) की एक रिपोर्ट सामने आई थी, जिसमें विदेशी फंड प्राप्त NGO के कामकाज और उनके तौर-तरीकों का विस्तृत उल्लेख किया गया था। रिपोर्ट के अनुसार, ब्रिटेन, अमेरिका, जर्मनी, नीदरलैंड सहित कई देशों से वित्तीय सहायता प्राप्त भारतीय NGO ऐसे मुद्दों को चुनते थे, जिनके माध्यम से बड़े विकास कार्यों के विरुद्ध जनमत तैयार किया जा सके। IB रिपोर्ट में कहा गया था कि ऐसे संगठन परमाणु ऊर्जा संयंत्रों, यूरेनियम खदानों, कोयला आधारित ताप विद्युत परियोजनाओं, आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों और अन्य औद्योगिक परियोजनाओं, नर्मदा और अरुणाचल प्रदेश की जलविद्युत परियोजनाओं तथा पूर्वोत्तर भारत में तेल और खनन गतिविधियों के विरुद्ध आंदोलन खड़े कर रहे थे। इन गतिविधियों का भारत की आर्थिक वृद्धि पर प्रतिवर्ष 2 से 3 प्रतिशत GDP तक का नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता था।

विदेशी संस्थाओं द्वारा भारतीय NGO का उपयोग भारत के ही खिलाफ
IB रिपोर्ट में यह भी कहा गया था कि विदेशी दानदाता अपने वास्तविक उद्देश्य को छिपाने के लिए मानवाधिकारों की रक्षा, विस्थापितों के पुनर्वास, आदिवासी आजीविका की सुरक्षा, धार्मिक स्वतंत्रता और सुशासन जैसे विषयों के नाम पर धन उपलब्ध कराते थे। इसके बाद स्थानीय NGO उन विषयों पर रिपोर्ट तैयार करते थे, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के विरुद्ध इस्तेमाल किया जाता था और जो पश्चिमी देशों की विदेश नीति के रणनीतिक हितों को आगे बढ़ाने का माध्यम बनती थीं। रिपोर्ट में Greenpeace International और CORDAID जैसे संगठनों का विशेष उल्लेख किया गया, जिन पर ऐसे अभियानों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करने का आरोप लगाया गया। वहीं ActionAid और Amnesty International जैसे संगठनों के बारे में कहा गया कि वे अपनी कुल फंडिंग का एक हिस्सा इसी प्रकार की गतिविधियों में लगाते हैं। IB रिपोर्ट ने कुडनकुलम परमाणु परियोजना, प्रस्तावित कोयला आधारित बिजली परियोजनाओं, GMO के विरोध, औद्योगिक परियोजनाओं के खिलाफ अभियानों को उदाहरण के रूप में बताते हुए निष्कर्ष निकाला कि विदेशी संस्थाएं भारतीय NGO का उपयोग भारत की विकास परियोजनाओं को रोकने और उसकी अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने के लिए कर रही थीं।

यूएस का अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों को समर्थन- हसीना
इसके बाद के वर्षों में यह भी सामने आया कि United States Agency for International Development (USAID) भारत में कई विवादास्पद NGO को वित्तीय सहायता दे रही थी। मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि USAID पर भारत और बांग्लादेश में शासन परिवर्तन (Regime Change) जैसे अभियानों को समर्थन देने के आरोप लगे। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सार्वजनिक रूप से कहा था कि अमेरिका बांग्लादेश, म्यांमार और भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के कुछ हिस्सों को मिलाकर एक अलग ईसाई राष्ट्र बनाने की कोशिशों का समर्थन कर रहा है। इन सभी घटनाओं के आधार को देखते हुए FCRA कानून लाने और विदेशी फंडिंग को लेकर भारत सरकार की सतर्कता केवल प्रशासनिक या वित्तीय मामला नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा और संप्रभुता से जुड़ा विषय है।

ईसाईयत नैरेटिव और विदेशी फंडिंग पर नकेल है FCRA
भारत और विदेशों के अनेक ईसाई संगठनों तथा उनके समर्थकों द्वारा प्रचारित “ईसाइयों पर हमले” का नैरेटिव वास्तविक मुद्दे से ध्यान भटकाने का प्रयास है। वास्तविक चिंता चर्चों या धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर नहीं, बल्कि उन विदेशी फंडिंग नेटवर्क पर बढ़ती निगरानी को लेकर है, जिनका उपयोग वर्षों से धर्मांतरण और भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए किया जाता रहा है। दरअसल, मोदी सरकार ने न केवल धर्मांतरण के नेटवर्क पर कार्रवाई तेज की है, बल्कि FCRA संशोधन विधेयक के माध्यम से यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया है कि जिन संस्थाओं का FCRA लाइसेंस रद्द हो चुका है, उनके खिलाफ की गई कार्रवाई केवल कागजों तक सीमित न रह जाए। वर्तमान व्यवस्था में यदि किसी संस्था का FCRA लाइसेंस रद्द हो जाता है, तब भी उसके पास विदेशी धन से खरीदी गई जमीन, भवन, अस्पताल, स्कूल और अन्य परिसंपत्तियां बनी रहती हैं। सरकार का प्रस्तावित संशोधन इस स्थिति को बदलने का प्रयास करता है। यदि किसी संस्था का लाइसेंस रद्द हो जाता है, तो उसकी विदेशी धन से निर्मित परिसंपत्तियां सरकार द्वारा नियुक्त डिज़िग्नेटेड अथॉरिटी की निगरानी में आ जाएंगी। इन परिसंपत्तियों का प्रबंधन या निस्तारण किया जा सकेगा और उससे प्राप्त राशि भारत की संचित निधि में जमा होगी। 

भारत ही नहीं, दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में इस तरह के कानून हैं। इनकी खासियत और असर के बावजूद भारत में अनावश्यक विरोध हो रहा है…

भारत : Foreign Contribution Regulation Act (FCRA)
भारत का FCRA सबसे व्यापक विदेशी फंडिंग नियामक कानूनों में माना जाता है। इसकी खासियत है कि इसमें विदेशी फंड प्राप्त करने से पहले सरकारी पंजीकरण या पूर्व अनुमति (Prior Permission) अनिवार्य है। विदेशी धन केवल निर्दिष्ट बैंक खाते के माध्यम से प्राप्त किया जा सकता है। गृह मंत्रालय पूरे सिस्टम की निगरानी करता है। इसमें वार्षिक ऑडिट और रिटर्न अनिवार्य है। इसके साथ ही नियमों के उल्लंघन पर लाइसेंस निलंबन या रद्द करने की शक्ति भी इसमें निहित है। 2026 संशोधन के बाद कुछ परिस्थितियों में विदेशी अंशदान से निर्मित संपत्तियों के प्रबंधन हेतु सरकारी “Designated Authority” का प्रावधान भी जोड़ा गया है। इसका उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा और पारदर्शिता के साथ-साथ विदेशी प्रभाव पर नियंत्रण और आतंकवाद एवं मनी लॉन्ड्रिंग की रोकथाम करना है।

अमेरिका : Foreign Agents Registration Act (FARA)
अमेरिका में यह कानून दुनिया के सबसे पुराने विदेशी प्रभाव कानूनों में से एक है। इस कानून की मुख्य व्यवस्था है कि यदि कोई व्यक्ति या संस्था, किसी विदेशी सरकार, विदेशी राजनीतिक दल या फिर विदेशी कंपनी की ओर से अमेरिका में लॉबिंग, जनमत निर्माण या राजनीतिक गतिविधि करती है, तो उसे न्याय विभाग के पास Foreign Agent के रूप में पंजीकरण कराना होता है। FARA विदेशी फंड लेने पर प्रतिबंध नहीं लगाता। यह केवल Disclosure (खुलासा) को अनिवार्य करता है। पंजीकृत एजेंटों को हर छह महीने में अपनी गतिविधियों, प्राप्तियों और खर्चों का ब्योरा देना अनिवार्य है। विदेशी हितों के लिए बांटे जाने वाले प्रचार या सूचना सामग्रियों पर स्पष्ट रूप से लेबल लगाना होता है कि यह किस विदेशी प्रिंसिपल के लिए है।

ब्रिटेन : Foreign Influence Registration Scheme (FIRS)
ब्रिटेन की FIRS जुलाई 2025 से लागू हुई एक विधिक व्यवस्था है। नेशनल सिक्योरिटी एक्ट 2023 के तहत बनाई गई इस योजना का उद्देश्य ब्रिटेन की सुरक्षा और हितों की रक्षा करना है। इसके साथ ही देश की राजनीति और लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में गुप्त विदेशी हस्तक्षेप को रोकना तथा विदेशी शक्तियों के प्रभाव को पारदर्शी बनाना है। यह योजना मुख्य रूप से दो स्तरों पर काम करती है पहले, पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस के तहत किसी भी विदेशी देश (आयरलैंड गणराज्य को छोड़कर) के निर्देश पर ब्रिटेन में राजनीतिक निर्णयों, चुनावों, जनमत संग्रहों या पंजीकृत राजनीतिक दलों को प्रभावित करने के लिए की जाने वाली गतिविधियों को रजिस्टर करना अनिवार्य है। दूसरे, इन्हेंस्ड स्तर है। यह राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अधिक संवेदनशील माने जाने वाले चुनिंदा देशों (वर्तमान में रूस और ईरान तथा उनसे जुड़ी संस्थाओं) के निर्देशों पर ब्रिटेन में की जाने वाली व्यापक गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए है।

ऑस्ट्रेलिया : Foreign Influence Transparency Scheme Act (FITSA)
ऑस्ट्रेलिया ने विदेशी राजनीतिक हस्तक्षेप रोकने के लिए 2018 में यह कानून बनाया। इसमें प्रावधान किया गया कि यदि कोई विदेशी सरकार, विदेशी राजनीतिक दल और विदेशी सरकारी संस्था के लिए काम करता है, तो उसे सार्वजनिक रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराना होगा। इसका उद्देश्य विदेशी प्रभाव पारदर्शी बनाना और देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा करना है। कानून के तहत कुछ क्षेत्रों को विशेष छूट दी गई है, जिन्हें पंजीकरण की आवश्यकता नहीं होती। इनमें मानवीय सहायता और राहत कार्य, पेशेवर कानूनी सलाह या अदालत में प्रतिनिधित्व, और राजनयिक (Diplomatic) और कांसुलर गतिविधियां शामिल हैं। यदि कोई व्यक्ति जानबूझकर पंजीकरण कराने में विफल रहता है, झूठी जानकारी देता है या आवश्यक रिपोर्टिंग नियमों का उल्लंघन करता है, तो उस पर गंभीर आपराधिक दंड और जुर्माने का प्रावधान है।

कनाडा : Foreign Influence Transparency and Accountability Act (FITAA)
कनाडा में यह कानून देश की राजनीतिक और सरकारी प्रक्रियाओं में विदेशी ताकतों के गुप्त प्रभाव को रोकने और सार्वजनिक पारदर्शिता बढ़ाने के लिए एक नया पब्लिक रजिस्ट्री डेटाबेस बनाता है। इसे बिल C-70 (काउंटरिंग फॉरेन इंटरफेरेंस एक्ट) के तहत जून 2024 में पारित किया गया था। इसके तहत एक सार्वजनिक डेटाबेस बनाया गया है ताकि यह पता चल सके कि कौन से व्यक्ति या संगठन विदेशी ताकतों के इशारे पर काम कर रहे हैं। यह नियम चुनावों, जनमत संग्रह, विधायी प्रस्तावों (proposed legislation) और सरकारी नीतियों या अनुबंधों को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर लागू होता है। इस कानून को लागू करने और इसकी देखरेख के लिए एक स्वतंत्र Foreign Influence Transparency Commissioner की नियुक्ति की गई है। नियमों का उल्लंघन करने या जानकारी छिपाने पर $250 से लेकर $1 मिलियन तक का जुर्माना लग सकता है।

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