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जाकिर नाइक और चीन से मिले पैसों की डिटेल दो- राजीव गाँधी फाउंडेशन को नोटिस, राहुल गाँधी के भारत विरोधी बयान पर ओडिशा पुलिस ने बढ़ाया जाँच का दायरा: IG हिमांशु लाल ने दी जानकारी

                          राहुल गाँधी पर FIR की जाँच के तहत राजीव गाँधी फाउंडेशन को भेजा गया नोटिस
राहुल गाँधी अपनी उल्टी-पुल्टी बयानबाज़ी से जनता में जो अपनी जनछवि बनाने का ढोंग रच पागल बना रहे हैं, वही बयानबाज़ी के तीर उलटे राहुल और परिवार की ओर मुड़ गए हैं। आखिर बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी, एक दिन उसे भी शिकार होना है। ओडिशा पुलिस ने कांग्रेस और राहुल गाँधी की जिस नब्ज को पकड़ा है लोक/राज्य सभा में विपक्ष द्वारा हंगामा करने पर एनडीए को सदन में इन मद्दों को उठाना था।     

ओडिशा पुलिस ने राहुल गाँधी के ‘इंडियन स्टेट से लड़ रहे’ वाले बयान के खिलाफ दर्ज FIR में जाँच आगे बढ़ा दी है। पुलिस की जाँच अब राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) तक पहुँच गई है। फाउंडेशन को फाइनेंशियल रिकॉर्ड पेश करने का नोटिस भेजा गया है। इसमें इस्लामी कट्टरपंथी जाकिर नाइक और चीन से फंडिंग का ब्योरा माँगा गया है।

ओडिशा की झारसुगुडा पुलिस मामले की जाँच कर रही है। पुलिस ने 03 सितंबर 2025 को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS),2023 की धारा 94 के तहत RGF को नोटिस भेजा है। SDPO उमाशंकर सिंह द्वारा RGF के वित्त निदेशक संदीप आनंद को जारी किए गए नोटिस में माँग की:

  1. 1991 से विदेशी योगदान का पूरा रिकॉर्ड।
  2. बैंक खाता विवरण और अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता।
  3. लेखा परीक्षकों के नाम और संपर्क।
  4. FCRA लाइसेंस की कॉपी।
  5. जाकिर नाइक (2011) और चीन से 2005-6 के बीच ₹2.49 करोड़ के कथित दान पर स्पष्टीकरण।
  6. UPA शासन के दौरान PM राहत कोष के कथित दुरुपयोग पर स्पष्टीकरण।
                  ओडिशा पुलिस द्वारा राजीव गाँधी फाउंडेशन को जारी किए गए नोटिस के पहले पन्ने का स्क्रीनशॉट
RGF को 04 नवंबर 2025 तक इन सब जानकारियों के साथ दस्तावेज जमा करने होंगे। नोटिस का पालन न करने पर BNS की धारा 210 के तहत कार्रवाई करने की भी चेतावनी दी गई है।
मामले की जानकारी देते हुए IG संबलपुर हिमांशु लाल ने बताया, “जाँच अब उस चरण में पहुँच गई है जहाँ राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) जैसी संबंधित संस्थाओं को रिकॉर्ड प्रस्तुत करने होंगे। यह एक कानूनी प्रक्रिया है। कानून अपना काम करेगा।”
गौरतलब है कि राहुल गाँधी भी राजीव गाँधी फाउंडेशन के बोर्ड सदस्यों में से एक हैं। इस फाउंडेशन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी है। बोर्ड के अन्य सदस्यों में प्रियंका गाँधी वाड्रा, पी. चिदंबरम, सुमन दुबे, अशोक गांगुली, मोंटेक सिंह अहलूवालिया और विजय महाजन शामिल हैं।

राहुल गाँधी के खिलाफ FIR

यह नोटिस राहुल गाँधी पर जनवरी 2025 में दर्ज FIR से जुड़ा है। जब हिंदू संगठनों और BJP नेताओं ने राहुल गाँधी के ‘इंडियन स्टेट’ वाले विवादित बयान पर ओडिशा के झारसुगुडा में पुलिस से शिकायत की थी।
शिकायत में बताया गया कि राहुल गाँधी के बयान से भारत की एकता और अखंडता को खतरा है। शिकायतकर्ता राम हरि पुजारी ने कहा कि गाँधी ने ‘इंडियन स्टेट’ के खिलाफ युद्ध घोषित कर देशद्रोह भड़काया है।
मामले की जाँच के बाद IG हिमांशु लाल ने आरोपों को सही पाया और FIR दर्ज करने का निर्देश दिया था। यह मामला झारसुगुडा थाने में धारा 152 (भारत की एकता और संप्रभुता को खतरा) और धारा 197(1)(d) (झूठी या भ्रामक सूचना फैलाना) के तहत दर्ज हुआ।

राहुल गाँधी का देश-विरोधी बयान

यह पूरा विवाद राहुल गाँधी के 15 जनवरी 2025 को दिए गए बयान से शुरू हुआ। जब दिल्ली के कोटला रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय के उद्घाटन समारोह में राहुल गाँधी ने भाषण के दौरान देश-विरोधी बयान दिया। उन्होंने कहा था कि BJP और RSS ने देश के हर एक संस्थान पर कब्जा कर लिया है और कांग्रेस, BJP, RSS और ‘इंडियन स्टेट’ के खिलाफ संघर्ष कर रही है।
राहुल गाँधी ने कहा था, “मुझे नहीं लगता कि हम एक निष्पक्ष लड़ाई लड़ रहे हैं। इसमें कोई निष्पक्षता नहीं है। अगर आप मानते हैं कि हम BJP या RSS नामक किसी राजनीतिक संगठन से लड़ रहे हैं, तो आप समझ नहीं पाए हैं कि क्या हो रहा है। BJP और RSS ने हमारे देश की हर संस्था पर कब्ज़ा कर लिया है। अब हम BJP, RSS और इंडियन स्टेट से ही लड़ रहे हैं।”
इस बयान का हिंदू संगठनों और बीजेपी ने कड़ा विरोध किया। इसे भारतीय राज्य के खिलाफ और राष्ट्रीय एकता के लिए खतरा बताया।
जाँच में अब मामला गहराया गया है और राजीव गाँधी फाउंडेशन की फाइनेंसियल हिस्ट्री की भी पड़ताल की जा रही है। विदेशी और विवादित फंडिंग के आरोप साबित होने पर राजनीतिक और कानूनी गंभीर परिणाम हो सकते हैं। फाउंडेशन को नवंबर तक जरूरी दस्तावेज जमा करने के लिए कहा गया है।
अब यह मामला केवल भाषण नहीं, बल्कि गाँधी परिवार से जुड़े संस्थान की जाँच में बदल गया है।

राजीव गांधी फाउंडेशन की तरह पियरे ट्रूडो फाउंडेशन को चीन ने की भारी फंडिंग

चीन ने दान दे-देकर पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल को बर्बाद करने के बाद कनाडा को बर्बाद करने कमर कस चुका है। भारत में इसका उदाहरण कांग्रेस पार्टी है, राजीव गाँधी फाउंडेशन को फण्ड देने के बाद जिस तरह राहुल गाँधी चीन की बोली बोल कांग्रेस को तबाही के रास्ते निकले हुए हैं। चीन से और देशों को मिलने वाला दान तो सामने आ रहे हैं, लेकिन राजीव गाँधी फाउंडेशन को मिला दान आज तक सामने नहीं आ पाया। जिसका परिवार को छोड़ कांग्रेस के किसी नेता को भी नहीं मालूम होगा।  
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत पर बेबुनियाद आरोप लगाकर घिर गए हैं। अब उनके स्वर बदलने लगे हैं। पहले उन्होंने कनाडा की संसद में कहा कि भारत के खिलाफ Credible Allegations है। वहीं अब वह कह रहे हैं कि भारत के खिलाफ Credible Reasons हैं। जस्टिन ट्रूडो के बयान के बाद भारत ने भी साफ कर दिया था कि उनके बयान motivated हैं। भारत ने साफ शब्दों में कहा था- कनाडा में हिंसा के किसी भी काम में भारत सरकार की भागीदारी के आरोप बेतुके और प्रेरित हैं। कनाडा के पास तो सबूत नहीं हैं लेकिन भारत ने पिछले वर्षों में खालिस्तानी आतंकवादी से जुड़े कई दस्तावेज कनाडा को सौंपे हैं जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। वहीं ट्रूडो के बयान का सच सामने आया है। दरअसल भारत विरोधी ताकतों ने भारत को अस्थिर करने और विकास की रफ्तार को रोकने के लिए यह चाल चली है और ट्रूडो को मोहरा बनाया है।

चीन ने दिया पियरे ट्रूडो फाउंडेशन को 2 लाख डॉलर दान
जस्टिन ट्रूडो के पिता के नाम पर बने पियरे इलियट ट्रूडो फाउंडेशन को 2016 में चीन से 200,000 डॉलर दान दिया गया था। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि चीन के एक व्यवसायी झांग बिन ने 2016 में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के पिता के नाम पर बने फाउंडेशन को 200,000 डॉलर दान करने का वादा किया था। बाद में यह उजागर हुआ कि झांग बिन चीनी सरकार से जुड़ा व्यक्ति है। कनाडा में यह विवाद बढ़ने के बाद फाउंडेशन ने कहा था कि उसे 140,000 का दान मिला है जिसे वह वापस कर देगा। यह विवाद इतना बढ़ा कि फाउंडेशन के सभी बोर्ड आफ डायरेक्टर ने इस्तीफा दे दिया। क्या यही वजह है कि जस्टिन ट्रूडो ने चीन के कहने पर भारत को बदनाम की सुपारी ली है।

राजीव गांधी फाउंडेशन को भी मिला था चीन का चंदा
भारत में भी शिक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सपने को पूरा करने के लिए 21 जून 1991 को सोनिया गांधी ने राजीव गांधी फाउंडेशन की शुरुआत की थी। 2005 से 2007 के बीच राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से 1 करोड़ 35 लाख रुपए चंदा में मिले थे। फांउडेशन की एनुअल रिपोर्ट के आधार पर यह दावा किया गया। 2005-06 की एनुअल रिपोर्ट में फाउंडेशन को डोनेशन देने वालों की लिस्ट में चीन का भी नाम है। क्या यही वजह है कि राहुल गांधी भी चीन का अहसान जताने के लिए चीन की प्रशंसा करते रहते हैं और भारत को नीचा दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते।

शह और मात के खेल में ट्रूडो शतरंज के प्यादे
शह और मात के इस खेल में ट्रूडो महज शतरंज के प्यादे हैं। ट्रूडो के भारत पर आरोप लगाने से कुछ दिन पहले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ खालिस्तानी आतंकवादियों की कनाडा में मीटिंग हुई थी। वहीं चीन ने राजीव गांधी फाउंडेशन की तरह ही जस्टिन ट्रूडो के पिता के नाम पर बनाए गए पियरे ट्रूडो फाउंडेशन को भारी फंडिंग की है। जस्टिन ट्रूडो को चुनाव जिताने में भी चीन का हाथ रहा है। यानि ये सारा बखेड़ा 2024 चुनाव को लेकर हो रहा है। ये उन विदेशी ताकतों की चाल है तो भारत को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने का सपना देख रहे हैं।

भारत के तेज विकास से विदेशी ताकतें चिंता में
भारत ने जिस तरह से बेहद सफल जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की उससे विदेशी ताकतें अचंभित हैं और अपने लिए भारत को खतरा समझने लगी हैं। इसीलिए भारत की प्रतिष्ठा को झटका देने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे जा रहे हैं। ऐसे समय में जब मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की ओर है और दुनियाभर की कंपनियां भारत में अपने आफिस खोल रही हैं, इससे विदेशी ताकतें विचलित हैं। भारत को बदनाम करने से सबसे ज्यादा फायदा उसके प्रतिद्वंद्वी चीन को है।

इस विवाद से चीन को सबसे ज्यादा फायदा
कनाडा के अखबार नेशनल पोस्ट ने दावा किया है कि दोनों देशों के तनाव के बीच चीन एक ऐसा देश है जिसे सबसे ज्यादा इसका फायदा मिल सकता है। अखबार के मुताबिक, बीते एक साल से अधिक समय से ट्रूडो कनाडाई चुनावों में चीन के सत्ताधारी दल चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) द्वारा विदेशी हस्तक्षेप को लेकर बचाव की मुद्रा में हैं। अब तक वह इस मामले में कोई ठोस जवाब नहीं दे सके हैं। ऐसे में यह विवाद उनकी चीन के साथ संदिग्ध साझेदारी को उजागर करता है।

ट्रूडो पर चीन से सांठगांठ के आरोप
खुफिया दस्तावेजों के जरिए कनाडाई अखबार ग्लोब एन्ड मेल ने दावा किया था कि चीनी राजनयिक 2021 में ट्रूडो की लिबरल पार्टी को दोबारा सत्ता में लाने के लिए काम कर रहे थे। इसके साथ ही चीन कंजर्वेटिव उम्मीदवारों को हराने के लिए काम कर रह था, जिन्हें वह अपने प्रति मित्रवत नहीं मानता था। कहा तो यहां तक जाता है कि चीन ने कनाडा में 2021 ही नहीं 2019 के चुनावों में भी जस्टिन ट्रूडो को जीतने में मदद की थी।

चीन से सांठगांठ पर ट्रूडो ने दिया गोलमोल जवाब
चीन के साथ इस तरह की सांठगांठ पर जस्टिन ट्रूडो अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दे पाए हैं। उन्होंने दावा किया कि कनाडा की राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी से लीक हुए दस्तावेजों में कई अशुद्धियां हैं। यहां दिलचस्प तो यह था कि ट्रूडो ने यह नहीं बताया कि वास्तव में क्या गलत था। उस समय ट्रूडो ने बस इतना कहा कि यह मुद्दा उन्हें बहुत चिंतित करता है और एजेंसियां इससे निपटेंगी।

पाकिस्तान आग में घी डाल रहा है
कनाडा में हो रहे भारत विरोधी प्रदर्शनों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने की बात सामने आ रही है। आईएसआई कनाडा में होने वाले इस तरह के प्रदर्शनों के लिए बैनर-पोस्टर तैयार कर रही है। इस तरह के प्रदर्शनों के लिए बसों का भी इंतजाम आईएसआई की ओर से किया जा रहा है। यहां तक कि कनाडा में रह रहे पाकिस्तान मूल के लोगों को पहचान छुपाकर प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए कहा जा रहा है। इसके साथ ही कई खालिस्तानी आंतकियों की आईएसआई द्वारा आर्थिक मदद की खबरें भी अक्सर आती रहती हैं।

कनाडा में आईएसआई और खालिस्तानी आतंकवादी के बीच हुई बैठक
हालिया विवाद के बाद हिन्दुओं को कनाडा छोड़ने की धमकी देने वाले गुरपतवंत सिंह पन्नू और आईएसआई के बीच बैठक होने की भी खबरें हैं। जस्टिन ट्रूडो के भारत के खिलाफ बयान देने के कुछ दिन पहले ही ISI के एजेंट्स ने कनाडा में खालिस्तानी आतंकियों के साथ एक गुप्त बैठक की थी। यह बैठक कनाडा के वैंकूवर में हुई। बैठक में गुरपतवंत सिंह पन्नू के साथ दूसरे खालिस्तानी संगठनों के प्रमुख भी मौजूद थे।

कनाडा में खालिस्तानी और पाक ISI का प्लान-K
जानकारी के मुताबिक इस वक्त कनाडा में 20 से ज्यादा खालिस्तानी और गैंगस्टर छुपे हुये हैं। जिसको लेकर NIA और देश की दूसरी एजेंसियों ने कई बार कनाडा को MLATs (MUTUAL LEGAL ASSISTANCE TREATIES) भेजा पर कनाडा की जांच एजेंसी ने कोई जवाब दिया और न ही कोई जांच में सहयोग किया।

ट्रूडो की चाल हुई नाकाम, फायदा की जगह हुआ नुकसान
भारत-कनाडा विवाद से प्रधानमंत्री ट्रूडो को भी तात्कालिक फायदा हुआ है। गर्मियों में सर्वे के बाद उनकी पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी से पीछे थी। ट्रूडो ने संसद में बयान देकर एजेंडा बदल दिया और आम लोगों की जरूरत से जुड़े मुद्दों पर घिरी ट्रूडो सरकार ने सारी चर्चा दूसरी ओर मोड़ दी। जबकि विपक्ष मुद्रास्फीति और आवासन के मुद्दे पर विरोध की योजना बना रहा था। हालांकि यह विवाद जिस तरह से आगे बढ़ा उसकी कल्पना शायद ट्रूडो ने भी नहीं की होगी। और अब ट्रूडो की अपने ही देश में किरकिरी हो रही है।

कनाडा की इंडो-पैसिफिक रणनीति प्रभावित
यह संकट कनाडा की इंडो-पैसिफिक रणनीति को भी प्रभावित करता है, जिसकी शुरुआत नवंबर 2022 में हुई थी। इसमें चीनी नीतियों की आलोचना की गई थी और भारत के साथ मजबूत संबंध बनाने की मांग की गई थी। हालांकि, ताजा विवाद से कनाडा की यह नीति ठंडी पड़ गई।

ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर ने भी कहा- भारत की संलिप्तता के सबूत नहीं
खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को 18 जून 2023 को कनाडा के प्रांत ब्रिटिश कोलंबिया के सरी स्थित गुरुनानक सिख गुरुद्वारा के पास दो अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार दी। निज्जर खालिस्तान टाइगर फोर्स का प्रमुख था और भारत में एक घोषित आतंकवादी था। उसी ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के प्रीमियर डेविड एबी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हरदीप निज्जर की हत्या में भारत की संलिप्तता के संबंध में उन्हें जो जानकारी दी गई है, वह सभी ‘ओपन सोर्स जानकारी’ है, जो इंटरनेट पर उपलब्ध है। इससे साफ होता है कि कनाडा के पास कोई सबूत नहीं है और जस्टिन ट्रूडो ने भारत को बदनाम करने के लिए भारत पर आरोप लगा दिया।

पेंटागन के पूर्व अधिकारी ने कहा- अमेरिका दो दोस्तों में भारत को चुनेगा
कनाडा के आरोपों पर, पेंटागन के पूर्व अधिकारी और अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल रुबिन कहते हैं, “…मूर्ख मत बनाइए, हरदीप सिंह निज्जर केवल एक प्लंबर नहीं थे, जिस तरह ओसामा बिन लादेन को भी एक कंस्ट्रक्शन इंजीनियर कहा जा रहा था। कई हमलों में उसका हाथ खून से सना था। हम अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के बारे में बात कर रहे हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका ने कासिम सुलेमानी के साथ क्या किया और संयुक्त राज्य अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के साथ क्या किया। वास्तव में भारत पर जो आरोप लगाया गया है ये मामले उससे अलग नहीं हैं।” उन्होंने ये भी कहा कि अगर अमेरिका को दो दोस्तों में से किसी एक को चुनना हो तो वह भारत को चुनेगा।

मोदी सरकार के कनाडा पर सख्त फैसले की 5 प्रमुख वजह

 हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बेबुनियाद आरोप

कनाडाई पीएम ने सबसे बड़ी गलती तो ये कर दी कि उन्होंने बिना कोई सबूत पेश किए भारत पर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बेबुनियाद आरोप गढ़ दिए। उनसे पूरी दुनिया ने बार-बार सबूतों की मांग की, लेकिन वो बात को टालते रहे। अंत में उन्होंने सबूत पेश करने से इनकार भी कर दिया। इससे ये तो साफ हो गया कि ट्रूडो अपनी बेबसी और राजनीतिक करियर की नाकामी का ठीकड़ा किसी और के सिर पर फोड़ना चाहते हैं, लेकिन वो भूल गए कि वो जिस भारत की ओर आंख उठाकर देख रहे हैं, वो आज ग्लोबल लीडरशिप की कमान संभालने की रेस में टॉप उम्मीदवारों में अपना नाम लिखवा चुका है।

बिना सोचे भारत के राजनयिक को निकाला
ट्रूडो ने दूसरी सबसे बड़ी गलती ये कर दी कि उसने बिना सोचे समझे भारत के राजनयिक को निष्कासित कर दिया। बिना सबूतों के आधार पर लिए गए इस फैसले का भारत ने भी करारा जवाब दिया और सीनियर कनाडाई राजदूत को निष्कासित करते हुए उन्हें 5 दिनों के अंदर देश छोड़ने का आदेश भी सुना दिया।

कनाडा खालिस्तानी आतंकियों का बना पनाहगाह
ट्रूडो ने अपने पिता पियरे ट्रूडो की तरह एक बार फिर दुनिया को दिखा दिया कि कनाडा आधिकारिक रूप से खालिस्तानी आतंकियों का पनाहगाह है। उनके पिता ने भी साल 1982 में खालिस्तानी आतंकी तलविंदर सिंह परमार को भारत को सौंपने से इनकार कर दिया था। परमार खालिस्तानी आतंकी संगठन बब्बर खालसा का मुखिया था। बाद में साल 1985 में संगठन ने आयरलैंड के तट पर कनिष्क नामक एयर इंडिया के विमान पर बीच आसमान में बमबारी की थी। इस हमले में कुल 329 लोग मारे गए, जिनमें से 268 कनाडाई नागरिक थे।

खालिस्तानी आतंकियों के प्रत्यर्पण की अपील पर सहयोग नहीं
जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को सौंपने से इनकार कर दिया था। इसके बाद जब उसकी गैंगवॉर के कारण हत्या हुई तो ट्रूडो उसका भी आरोप भारत के सिर पर मढ़ने की कोशिश करने लगे। ऐसा ही उनके पिता ने भी परमार के मामले में किया था। बॉम्बिंग के बाद परमार को आरोपी तो बनाया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में उसे रिहा भी कर दिया गया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से जानकारी मिली थी कि जिस वक्त परमार जेल से छूटा था, उस वक्त जस्टिन ट्रूडो ने सत्ता संभाल ली थी। इससे ये साफ हो गया था कि ये भी खालिस्तानियों को बचाने के अपने पिता की विरासत को आगे ले जाना चाहते हैं।

खालिस्तानी आतंकियों के पीछे पाकिस्तान
पंजाब का 62 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में है, लेकिन ट्रूडो खालिस्तानी आतंकियों के लिए पाकिस्तान पर आरोप नहीं लगा रहे हैं। इसका मतलब उन्हें पहले से पता है कि पाकिस्तान भी उनकी तरह खालिस्तानी आतंकियों का पनाहगाह है। साल 1992 में जब परमार मारा गया था तो वो भी पाकिस्तान के रास्ते से ही पंजाब में दाखिल हुआ था।

कांग्रेस ने चीन से फंड लेकर देश की संप्रभुता को गिरवी रख दिया; राजीव गांधी फाउंडेशन को क्यों फंड कर रहा था चीन?


भारत-चीन के बीच तनाव का दौर जारी है। दोनों देशों के बीच 1962 में एक बार जंग हो चुकी है। वहीं 1965 और 1975 में भी दोनों देशों के बीच हिंसक झड़पें हुई हैं। इन तारीख़ों के बाद एक बार फिर से अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर में चीनी घुसपैठ के बाद दोनों देशों के बीच तनाव के हालात हैं। ऐसे वक्त में जब सभी राजनीतिक दलों को एकजुट होकर चीन से मुकाबला करना चाहिए। लेकिन कांग्रेस पार्टी भारत की सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमलावर है। संसद का सत्र भी चल रहा है और विपक्ष की तरफ से चीनी घुसपैठ पर जबरदस्त हंगामा भी देखने को मिल रहा है। गृह मंत्री अमित शाह ने चीन के मुद्दे को लेकर एक बयान दिया और अपने बयान में राजीव गांधी फाउंडेशन के बारे में जानकारी दी कि उसने चीन से फंडिंग हासिल की। केंद्र सरकार ने राजीव गांधी फाउंडेशन का एफसीआरए लाइसेंस वर्ष 2020 में रद्द कर दिया था। राजीव गांधी फाउंडेशन गांधी परिवार से जुड़ा एक NGO है। गृह मंत्रालय ने फाउंडेशन का फॉरेन कंट्रीब्यूशन रेग्युलेटिंग एक्ट (FCRA) लाइसेंस रद्द कर दिया। संगठन पर विदेशी फंडिंग कानून का उल्लंघन करने का आरोप लगा है। यहां सवाल यह उठता है कि जो चीन हमारे देश की भूमि पर बुरी नजर रखता है आखिर उससे राजीव गांधी फाउंडेशन को फंडिंग लेने की मजबूरी क्या है। चीन ने फंडिंग क्यों की होगी इसकी तह में जाएं तो पता चलता है कि चीन ने फंडिंग इसलिए की थी ताकि भारत सरकार चीन के रास्ते में बिछे कांटे हटा दे और चीन के लिए भारत में अपना धंधा चमकाना आसान हो जाए। ध्यान देने वाली बात यह है कि इस धंधे की आड़ में चीन ने अपने कौन से जहरीले इरादे कामयाब किये और उसके लिए उसने कब कितनी रिश्वत किसको खिलाई, ये सब बातें जांच का विषय है। अभी न जाने ऐसे कितने और गड़े मुर्दे उखड़ने बाकी हैं जो ये बताएंगे कि भारत में जयचंद पहले भी थे और आज भी हैं। फिलहाल देश की जनता ये जानना चाहती है कि देश को इतने सस्ते में क्यों बेचा जा रहा था?

अमित शाह ने उठाया राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से मिले चंदे का मुद्दा

गृह मंत्री शाह ने कहा कि आज कांग्रेस का सदन में चीन को लेकर दोहरा रवैया दिखाई दिया। हंगामा कर सदन को नहीं चलने दिया गया। उन्होंने कहा कि आज संसद में सीमा पर हुई घटना को लेकर हंगामे की वजह से लोकसभा नहीं चल सकी। बाद में पता चला कि उसके पीछे कांग्रेस की क्या मंशा थी। पांचवें नंबर पर राजीव गांधी फाउंडेशन के बारे में एक सवाल था। सवाल कांग्रेस के ही सांसद ने पूछा था कि राजीव गांधी फाउंडेशन संस्था क्यों रद्द कर दी गई। अमित शाह ने आगे कहा कि चीन से 2005-2006 और 2006-2007 के बीच राजीव गांधी फाउंडेशन ने एक करोड़ 35 लाख रुपए लिए। फाउंडेशन का कहना है कि वह सामाजिक और रिसर्च वर्क के लिए पैसे देते थे, लेकिन इन पैसों का इस्तेमाल भारत-चीन संबंधों को मजबूत करने में किया गया, अगर कोई रिसर्च हुआ होता तो उसके रिपोर्ट दी गई होती। गृह मंत्री ने कहा कि सीआरएनए में पाया गया कि गलत तरीके से चीन के पैसे का मिस यूज किया गया। जाकिर नाइक के इस्लामिक संगठन से भी राजीव गांधी फाउंडेशन ने चंदा लिया। राजीव गांधी फाउंडेशन को रद्द करने की यही वजह थी।

रद्द किया राजीव गांधी फाउंडेशन का एफसीआरए लाइसेंस

केंद्र सरकार ने गांधी परिवार से जुड़े एक एनजीओ पर बड़ी कार्रवाई कर दी है। गृह मंत्रालय ने राजीव गांधी फाउंडेशन का लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह कार्रवाई फोरेन कन्ट्रीब्यूशन ‘रेगुलेशन‘ एक्ट के तहत की है। संगठन पर विदेशी फंडिंग कानून के कथित उल्लंघन का आरोप है। गृह मंत्रालय ने जुलाई 2020 में एक जांच कमेटी बनाई थी। उसकी रिपोर्ट के आधार पर ये फैसला लिया गया है। इस जांच कमेटी में ईडी, सीबीआई और इनकम टैक्स के अधिकारी शामिल थे। एफसीआरए लाइसेंस कैंसिल करने का नोटिस राजीव गांधी फाउंडेशन के ऑफिस बियरर को भेज दिया गया है। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी आरजीएफ की अध्यक्ष हैं।

महिलाओं और बच्चों के हित में काम करने के लिए बनाया गया था फाउंडेशन

आरजीएफ की वेबसाइट के अनुसार, उसे 1991 में स्थापित किया गया। वेबसाइट में कहा गया है कि आरजीएफ ने 1991 से 2009 तक महिलाओं, बच्चों और अक्षम लोगों को मदद देने के अलावा स्वास्थ्य, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और शिक्षा क्षेत्र सहित कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में काम किया। पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी इस फाउंडेशन की अध्यक्ष हैं। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम और राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा ट्रस्टियों के रूप में शामिल हैं। राजीव गांधी की वेबसाइट के मुताबिक इस संगठन को 1991 में स्थापित किया गया था।

फाउंडेशन को लेकर 2020 में भी उठा था चीन से फंडिंग का मामला

दरअसल, जून 2020 में उस समय के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ने कहा था कि इस फाउंडेशन को फंडिंग चीन से हुई है। उन्होंने कहा था कि एक कानून है जिसके तहत कोई भी पार्टी बिना सरकार की अनुमति के विदेश से पैसा नहीं ले सकती। कांग्रेस स्पष्ट करे कि इस डोनेशन के लिए क्या सरकार से मंजूरी ली गई थी। उन्होंने दावा किया था कि राजीव गांधी फाउंडेशन के लिए 2005-06 की डोनर की सूची है। इसमें चीन दूतावास ने डोनेट किया। फाउंडेशन को चीन की ओर से 90 लाख रुपए की फंडिंग करने का आरोप है। कानून मंत्री ने कांग्रेस से प्रश्न किया है कि वह कारण बताए कि कैसे चीन से गांधी परिवार का और चीन का गांधी परिवार की पार्टी से ये प्रेम बढ़ गया कि इनके कार्यकाल में ही चीन ने भारत की जमीन पर कब्जा किया।

चीन के साथ ही प्रधानमंत्री राहत कोष से भी राजीव गांधी फाउंडेशन को मिला पैसा

कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सुरजेवाला ने कहा कि राजीव गांधी फाउंडेशन को 2005 में चीनी दूतावास से 1 करोड़ 45 लाख रुपए दान में मिले। यह राशि विकलांग लोगों की मदद और भारत-चीन संबंधों पर रिसर्च के लिए दिया गया था। सुरजेवाला के मुताबिक पूर्व निर्धारित मद में ही इस रकम को खर्च किया गया और आरजीएफ के खातों का विधिवत ऑडिट कर FCRA कानून के तहत रिटर्न जमा भी किया गया। प्रधानमंत्री राहत कोष से राजीव गांधी फाउंडेशन को पैसे मिलने के आरोप पर सुरजेवाला ने कहा कि 2004 के अंत में आई सुनामी के बाद वित्तीय वर्ष 2005 में प्रधानमंत्री राहत कोष से आरजीएफ को 20 लाख की रकम मिली थी जिसे अंडमान निकोबार में राहत कार्यों के लिए खर्च किया गया।

2020 में हुआ था विदेशी फंडिंग में उल्लंघन का खुलासा

फाउंडेशन को यूपीए सरकार के दौरान भारत स्थित चीनी दूतावास, चीन सरकार, जाकिर हुसैन, प्रधानमंत्री राष्ट्रीय राहत कोष (PMNRF), मंत्रालय, सार्वजनिक उपक्रमों के साथ-साथ मेहुल चोकसी ने भी चंदा दिया था। चीन सरकार की पीपुल्स लिबरेशन आर्मी की वित्त पोषित चाइना एसोसिएशन फॉर इंटरनेशनल फ्रेंडली कॉन्टैक्ट (CAIFC) ने भी फाउंडेशन को फंड दिया था। जाकिर नाइक ने भी इस्लामिक रिसर्च फाउंडेशन के जरिए 2011 में फाउंडेशन को 50 लाख रुपए दिए थे। हालांकि, कांग्रेस ने बाद में रकम लौटा दी थी।

कांग्रेस ने चीन से फंड लेकर देश की संप्रभुता को गिरवी रख दिया

फाउंडेशन ने धन के लिए ही चीन से भी मेलजोल बढ़ाया, जो फाउंडेशन तक ही सीमित नहीं था। वह मेलजोल भारत की आर्थिक नीति को प्रभावित करने लगा। काफी हद तक किया भी। मौजूदा समय में चीन का जो पैर भारत में पसरा, वह राजीव गांधी फाउंडेशन की ही देन है। जैसा खबरों में आ चुका है कि 2005, 2006, 2007 और 2008 में फाउंडेशन को चीन से पैसा मिला। चीन के पैसे का फाउंडेशन ऐसा आदी बन गया कि उसने देश की संप्रभुता को गिरवी रखने का मन बना लिया। यदि इसमें किसी को संदेह हो तो उसे फाउंडेशन के उस अध्ययन पर गौर करना चाहिए, जो चीन और भारत के बीच व्यापार को बढ़ाने के लिए हुआ था। उससे जाहिर होता है कि फाउंडेशन किस एजेडे पर काम कर रहा था।

एक्शन ऐड भी रहा फाउंडेशन का साझीदार, एक्शन ऐड के हर्ष मंदर ने किया था मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार

पैसे के इस खेल में फाउंडेशन ने एक्शन ऐड इंडिया को साझीदार बनाया। हर्ष मंदर कभी इसके मुखिया हुआ करते थे। तब एक्शन ऐड के साथ मिलकर हर्ष मंदर ने गुजरात में अपना खूब चलाया था। वे प्रशासनिक सेवा में थे। 2002 के दंगे में इनको राजनीति करने का मौका मिल गया। नौकरी छोड़ दी और मोदी सरकार के खिलाफ अभियान चलाने लगे। हर घटना को सांप्रदायिक चश्मे से देखने और दिखाने लगे। गुजरात दंगों की बात न भी करें तो इशरत जहां वाला मामला भूला नहीं जा सकता। इसे लेकर जिस तरह अभियान चलाया गया, जाहिर तौर पर वह गांधी परिवार की सह पर रहा होगा। हर्ष और उनकी संस्था आलाकमान के करीब थी ही। चुनी हुई सरकार को पलटने के लिए अभियान चलने लगा। उसमें एक्शन ऐड से जुड़े लोग थे और हर्ष तो सबके अगुवा थे। उन्होंने तो नरेन्द्र मोदी के खिलाफ दुष्प्रचार करने का ठेका ही ले लिया था।

देश विरोधी तत्वों व विनाश की पटकथा लिखने वालों से फंड क्यों
राजीव गांधी फाउंडेशन में विनाश की पटकथा लिखने वालों के साथ ही उन लोगों से धन लिया जा रहा है जो भारत के बैरी हैं। उन लोगों से भी पैसे लिए जाते रहे जो दुनिया भर में उपद्रव फैलाने के लिए पहचाने जाते हैं। इसमें जाकिर नाईक भी शामिल है। वही नाईक जो अपने भाषण से देश में नफरत और हिंसा की खेती कर रहा है और कांग्रेस उसकी पैरोकार बनी है। क्यों बनी है? यह रहस्य भी खुल गया है। सबको पता चल चुका है कि जाकिर नाईक पैसे देता था। इस वजह से कांग्रेसी उसके पक्ष में खड़े हैं। यही वजह है कि जाकिर के नाम पर कांग्रेस में उबाल आ जाता है। रहमान साहब जाकिर के लिए पत्र लिख देते हैं। हालांकि जाकिर नाईक अकेला शख्स नहीं, जो नफरत की खेती भारत में करता है और फाउंडेशन उससे फंड लेता है। यह संस्था इस तरह के कई और संस्थान और सरकार से पैसा लेती है।
लोकतंत्र की हत्या करने वाली संस्थाओं से फाउंडेशन को क्यों मिलता था फंड
ओपन सोसाइटी ऐसी ही एक संस्था है। जार्ज सोरोस उसके कर्ताधर्ता हैं। जार्ज वैसे तो उद्योगपति हैं, लेकिन इस संस्था के जरिए वे दुनिया भर के विभिन्न देशों में अपना दखल रखते हैं। वह दखल राजनीतिक होता है। उसमें सत्ता परिवर्तन के लिए षडयंत्र रचा जाता है ताकि पिठ्ठू सरकार बैठाई जा सके। पूर्वी यूरोप और अफ्रीकी देशों में यह संस्था ऐसा खेल कर चुकी है। ओपन सोसाइटी लोकतंत्र की हत्या के लिए काम करती है। ऐसी संस्था के साथ राजीव गांधी फाउंडेशन काम करता है। उससे पैसे लेता है। पैसा तो यह संस्थान मेलिंडा एंड बिल गेट्स फाउंडेशन से भी लेता है। इसका भी बहुत स्याह इतिहास है। इनके मालिक पर ‘द नेशन’ ने एक लंबी रिपोर्ट लिखी है। वह रिपोर्ट काले कारनामों की कहानी है। कोरोना में इनकी भूमिका जगजाहिर है। डब्लूएचओ के साथ मिलकर कैसे दुनिया को नचाया यह किसी से छुपा नहीं है। इनका फाउंडेशन तो अफ्रीका को दवाओं के ट्रायल की प्रयोगशाला बनाने के लिए जाना जाता हैं। उससे राजीव गांधी फाउंडेशन ने पैसे लिए। दावा किया जा रहा है कि उत्तर प्रदेश के रायबरेली और बाराबंकी के पुस्तकालयों में किताबें मुहैया कराने और दूसरी सुविधाएं बढ़ाने के लिए मेलिंडा फाउंडेशन से 2013 में राजीव गांधी फाउंडेशन को एक लाख डॉलर (63 लाख रुपये) मिले थे। लेकिन इस फंड में हेराफेरी की गई। रिपोर्ट के अनुसार बाराबंकी के पुस्तकालय को कोई फंड नहीं मिला है। वहीं रायबरेली स्थित पुस्तकालय को महज एक लाख रुपये मिले।
फोर्ड फाउंडेशन से भी रहा है राजीव गांधी फाउंडेशन का संबंध
फोर्ड फाउंडेशन अमेरिकी हितों एवं पश्चिमी एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए काम करता है। जिसे अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए ने खड़ा किया है। फोर्ड फाउंडेशन सांस्कृतिक साम्राज्यवाद को फैलाने का काम करता है। एक्शन इंडिया जैसे संगठन उस मुहिम का हिस्सा है। इनसे, राजीव गांधी फाउंडेशन का संबंध है। कहने का मतलब यह है कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से फाउंडेशन अमेरिकी संस्कृति को भारत में फैला रहा है। जो उसमें बाधा बन रहा है, उसे सांप्रदायिक बता दिया जाता है। इस तरह का खेल फोर्ड ने खूब किया भी है। तीस्ता सीतलवाड के सबरंग ट्रस्ट को फोर्ड ने गुजरात में उपद्रव फैलाने के लिए बहुत फंड किया था। तीस्सा सीतलवाड़ ने अपने एनजीओ के जरिए अराजकता फैलाई भी थी। यह बात किसी से छुपी नहीं है। उनकी संस्था पर जो आरोप लगे हैं, उसका जवाब वे दे नहीं पाई हैं, सिवाय इसके कि हमें पीड़ित किया जा रहा है। कांग्रेस उनकी पैरोकार बनी है।

राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन, सोरोस और जाकिर नाइक की संस्था क्यों करती थी फंडिंग?

भारत के स्वतंत्र होने से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक देश ने अनेकों धरने और प्रदर्शन देखे। पहले किसी भी चीज (खाद्य पदार्थ अथवा पेट्रोल) पर चवन्नी बढ़ने पर धरने एवं प्रदर्शन होते थे, उनसे विपक्ष मजबूत होता था लेकिन निर्भय कांड से लेकर किसान आंदोलन तक जितने भी धरने हुए या हो रहे हैं, विपक्ष कमजोर हो रहा है, लेकिन उतनी तेजी से नहीं, जिस तेजी से होना चाहिए। देखिए कैसे:

CAA विरोध में शामिल हिन्दुओ हिन्दुत्व 
के विरोध ऐसे बैनर पर तुम्हारी आत्मा कहाँ मर गयी थी
?
अभी कुछ दिन पहले एक अजीबोगरीब फैसला आया कि 13 वर्षीय एक अपराधी को नाबालिग को कोर्ट 33 साल लेती है, फिर जेल से रिहा करने पर 10 साल। परन्तु निर्भय केस में क्या हुआ, एक आरोपी को नाबालिग होने पर रिहा कर दिया जाता है और उसको दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल सिलाई मशीन देकर सम्मानित करते हैं, इसे सम्मान ही कहा जाएगा। क्योकि वह मुसलमान था। चलो अब हाल के CAA विरोध प्रदर्शन को लें। जहां हिन्दुओं की गैर-उपस्थिति में जब तक देश इस्लामिक मुल्क न बन जाए तब तक हाथ तिरंगा और सेकुलरिज्म को बुलंद करना होगा और हिन्दुओं की गैर-हाज़िरी में अपने मकसद में काम करना है और इस आंदोलन को समस्त भाजपा विरोधियों का समर्थन था। इसी ब्लॉग पर इस विषय पर लिखे लेख शीर्षक सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार, आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार को 1 लाख से अधिक पाठक पढ़ चुके हैं। किसी ने खंडन नहीं किया। हिन्दुत्व को कितने अपमानित शब्द बोले गए, यदि वही शब्द किसी अन्य धर्म के विरुद्ध बोले जाते, CAA विरोध किसी गुप्त स्थान में लुप्त होकर, देश में आग लग गयी होती। नूपुर शर्मा जीवित उदाहरण है। जबकि नूपुर ने वही बोला जो इस्लामिक किताबों में लिखा है, अपने मन से नहीं बोला था। एक एंकर ने तो समस्त इमामों, मुफ्तियों और इस्लामिक विद्वानों को अपने शो में खुला चैलेन्च दिया था कि 'नूपुर ने क्या गलत बोला है?' लेकिन बेशर्म हिन्दू पागलों की तरह मोदी-योगी विरोध की अंधी दौड़ में शामिल थे। 

दूसरा, भाजपा विरोधी पार्टियों द्वारा किसान आंदोलन को समर्थन था, क्या नारेबाजी हुई थी, क्या वह देशहित में थी? जो यह सिद्ध करता है कि ये आंदोलन भारत विरोधियों द्वारा प्रायोजित है, जिस पर प्रकाश डाल रही है न्यूज़ पोर्टल पर प्रकाशित निम्न रपट। फिर भी जनता इन पार्टियों को वोट देती हैं, इनकी महिमा का गुणगान करती है।  

केंद्र सरकार ने गांधी परिवार से जुड़े गैर सरकारी संगठन राजीव गांधी फाउंडेशन का विदेशी योगदान नियमन अधिनियम (FCRA) का लाइसेंस रद्द कर दिया है। यह कार्रवाई 2020 में गृह मंत्रालय द्वारा गठित एक अंतर-मंत्रालयी समिति द्वारा की गई जांच के बाद हुई है। अब राजीव गांधी फाउंडेशन को विदेश से किसी तरह की फंडिंग नहीं हो पाएगी। कानून के उल्‍लंघन पर गृह मंत्रालय ने यह कार्रवाई की है। पूर्व कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी फाउंडेशन की चेयरपर्सन हैं। राजीव गांधी फाउंडेशन के ट्रस्‍टीज में पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस सांसद राहुल गांधी, कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा और पूर्व वित्‍त मंत्री पी चिदंबरम शामिल हैं। 

राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए 1991 में की गई थी। अगस्‍त 2020 में राजीव गांधी फाउंडेशन की फंडिंग को लेकर सनसनीखेज दावे किए गए थे। आरोप था कि राजीव गांधी फाउंडेशन को PNB घोटाले के आरोपी मेहुल चोकसी की कंपनियों से डोनेशन मिलता रहा। फाउंडेशन को जाकिर नाईक, यस बैंक के राणा कपूर और जिग्‍नेश शाह से भी डोनेशन मिला। उसी के बाद गृह मंत्रालय ने जांच शुरू की। पीएमएलए (प्रीवेंशन ऑफ मनी लॉन्ड्रिंग ऐक्ट) की जांच चल ही रही थी। पहले भी राजीव गांधी फाउंडेशन को चीनी सरकार से मदद मिलने पर विवाद हो चुका है। फाउंडेशन की सालाना रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2005-06 में राजीव गांधी फाउंडेशन को पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना की सरकार और चीनी दूतावास से दो अलग-अलग दानकतार्ओं से दान मिला। चीनी दूतावास को सामान्य दाताओं की सूची में रखा गया

इस मुद्दे पर टि्वटर यूजर Agenda Buster ने एक ट्वीट की एक श्रृंखला प्रकाशित की है। उन्होंने लिखा है कि आज कई एनजीओ दुनिया भर में जमीनी स्तर पर बहुत अच्छा काम कर रहे हैं इसलिए लोग उनका सम्मान भी करते हैं लेकिन कोई इस बात से इनकार नहीं कर सकता कि उनका भी दुरुपयोग हुआ है। आधुनिक समय के लोकतांत्रिक युद्ध टैंकों, लड़ाकू विमानों और गोलियों से नहीं लड़े जाते हैं। वे एनजीओ, कार्यकर्ताओं और विदेशी फंडों द्वारा लड़े जाते हैं। मान लीजिए कि अमेरिका भारतीय सरकार पर दबाव बनाना चाहता है कि वह किसी मुद्दे पर उसका समर्थन करे या वे भारत में कुछ बुनियादी, क्षमता निर्माण या अंतरिक्ष कार्यक्रम को रोकना चाहते हैं तो उन्हें अपने जेट भारत भेजने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें बस भारत में काम करने वाले अपने एनजीओ को पैसा ट्रांसफर करने की जरूरत है और बाकी काम ये एनजीओ उनके कार्यकर्ता, वकील और मीडियाकर्मी करेंगे। इसलिए एनजीओ की फंडिंग के बारे में जानना बहुत जरूरी है।

राजीव गांधी फाउंडेशन की स्थापना भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की विरासत को आगे बढ़ाने के लिए 1991 में की गई थी। सोनिया गांधी के नेतृत्व में जुलाई 1991 में बैठक हुई और फाउंडेशन के लिए एक प्रस्ताव पारित किया गया था। राजीव गांधी फाउंडेशन का कहना है कि संगठन ने शिक्षा के साथही स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, महिलाओं और बच्चों, विकलांगता सहायता आदि सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम किया है।

भ्रष्ट कॉरपोरेट्स से फंडिंग

फाउंडेशन ने चेक नंबर 676400 के माध्यम से 29-8-2014 को नवराज एस्टेट प्राइवेट लिमिटेड से 10 लाख रुपये प्राप्त किए। नवराज एस्टेट गीतांजल इंडस्ट्रीज़ की सिस्टर फर्म है, जो भगोड़े मेहुल चौकसी के स्वामित्व में है, जिस पर मनी लॉन्ड्रिंग और पीएनबी धोखाधड़ी का आरोप है। उन्हें यस बैंक धोखाधड़ी के आरोपी राणा कपूर से 9.45 लाख रुपये मिले। वही राणा कपूर 2 करोड़ रुपये में प्रियंका वाड्रा से पेंटिंग लेकर आए थे जिसका भुगतान यस बैंक ने किया था। 27-10-2011 को जिग्नेश शाह से 50 लाख रुपये प्राप्त किए। वह नेशनल स्पॉट एक्सचेंज लिमिटेड घोटाले में आरोपी है।

फाउंडेशन को 8-7-2011 को Izl@mic Research Foundation से 50 लाख रुपये की फंडिंग मिली। इस संस्था का मालिक जाकिर नाइक है। वही जाकिर नाइक जो भगोड़ा है और कट्टरपंथ और मनी लॉन्ड्रिंग का आरोपी है। इस बात का खुलासा होने के बाद फाउंडेशन ने वह पैसा 12-7-2016 को लौटा दिया।

सत्ता का दुरुपयोग

गांधी परिवार की सत्तारूढ़ कांग्रेस सरकार ने नियमों में बदलाव किया और गांधी परिवार की कांग्रेस पार्टी को लुटियंस दिल्ली में 2 एकड़ महंगी जमीन दी। कांग्रेस पार्टी ने 1995 में वह जमीन गांधी परिवार के राजीव गांधी फाउंडेशन को मुफ्त में किराए पर दी थी।

2014 में उन्होंने फिर से नियम बदल दिए और राजीव गांधी फाउंडेशन ने उस जमीन को 4 अन्य संगठनों को किराए पर दे दिया। उन्होंने उमर खालिद और सिमी कार्यकर्ताओं को अपनी जमीन का इस्तेमाल करने दिया। मनमोहन सिंह सरकार ने पीएम राष्ट्रीय राहत कोष से फाउंडेशन को फंड दिया।

फाउंडेशन को चीनी दूतावास से मिला फंड

फाउंडेशन को 2006-09 के दौरान दो बार चीनी सरकार से फंड भी मिला, यही वह समय था जब कांग्रेस सरकार ने चीन के साथ गुप्त सौदा किया था।

अमेरिकी अरबपति सोरोस से फंडिंग

2020 में, अमेरिकी अरबपति n वामपंथी सोरोस ने कहा कि वह मोदी को हटा देंगे और अपने पिछले सूत्र में मैंने उनके n C1A के लिंक के बारे में भी बताया और कैसे C1A ने अमेरिकी आदेशों का पालन नहीं करने वाली सरकारों को हटाने के लिए विपक्षी दलों को फंड दिया। फाउंडेशन ने जर्मन एनजीओ फ्रेडरिक नौमन फाउंडेशन (Friedrich Nauman Foundation) से धन प्राप्त किया जो कि सोरोस (S0r0s) द्वारा वित्त पोषित किया गया। क्लिंटन फाउंडेशन ने भी राजीव गांधी चैरिटेबल ट्रस्ट को समर्थन दिया था और क्लिंटन फाउंडेशन को सोरोस (S0r0s) फंड करता है। राजीव गांधी फाउंडेशन 2007-08 में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क से जुड़ा था। सोरोस पर आरोप है कि वह कश्मीर में अलगाववादी आंदोलन, शहरी नक्सलियों को समर्थन, रोहिंग्याओं को समर्थन, देशद्रोह विरोधी कानून का समर्थन करने के लिए फंडिंग करता है।

राजीव गांधी फाउंडेशन ने अमन बिरादरी ट्रस्ट के साथ भागीदारी की, जिसके प्रमुख हर्ष मंदर हैं जो सोरोस ओपन सोसाइटी फाउंडेशन के सलाहकार बोर्ड में थे। हर्ष मंदर ने 2010 में सांप्रदायिक हिंसा बिल बनाया था और सीएए के विरोध में शामिल था।

FCRA क्‍या है? विदेशी चंदा पाने के नियम क्‍या हैं?

FCRA यानी विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम। इस कानून के जरिए विदेशी चंदे का रेगुलेशन होता है। FCRA पहली बार 1976 में अस्तित्‍व में आया। 2010 में नियम बदले गए। भारत में मौजूद वे सारे एसोसिएशन, समूह और गैर-सरकारी संगठन (NGOs) जिन्‍हें विदेश से चंदा चाहिए, उन्‍हें FCRA की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है। ऐसे सभी NGOs के लिए FCRA रजिस्‍ट्रेशन अनिवार्य है। रजिस्‍ट्रेशन पांच सांल के लिए वैध होता है, उसके बाद इसे रिन्‍यू कराया जा सकता है। रजिस्‍टर्ड संस्‍थाओं को सामाजिक, शैक्षिक, धार्मिक, आर्थिक और सांस्कृतिक कारणों के लिए विदेशी चंदा लेने की अनुमति है। सभी को सालाना रिटर्न फाइल करने होते हैं।

गृह मंत्रालय की गाइडलाइंस

2015 में MHA ने नई गाइडलाइंस जारी कीं। सभी NGOs के लिए या तो सरकारी या प्राइवेट बैंक में खाते होना अनिवार्य है ताकि सुरक्षा एजेंसियों को रियल टाइम एक्‍सेस मिल सके। अब सारे NGOs को यह प्रमाण देना पड़ता है कि विदेशी फंडिंग से भारत की संप्रभुता और अखंडता खतरे में नहीं पड़ेगी। मित्र देशों संग रिश्‍तों पर नकरात्‍मक असर नहीं पड़ेगा। सांप्रदायिक सद्भाव को कमजोर नहीं करेगी।

जिस राजीव गाँधी फाउंडेशन को मनमोहन सिंह देना चाहते थे 100 करोड़ रूपए उसका गृह मंत्रालय ने कर दिया FCRA लाइसेंस रद्द

                                                     RGF पर गृह मंत्रालय की कार्रवाई
बलिदान के नाम पर जनता को गुमराह करने और सरकारी खजाने पर ऐश करने वाले गाँधी परिवार पर नकेल पड़नी शुरू हो गयी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गाँधी परिवार के गैर-सरकारी संगठन राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) का FCRA (विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम) लाइसेंस रद्द कर दिया है। आरोप है कि ये ट्रस्ट विदेशी फंडिंग कानून का उल्लंघन करता पाया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2020 के जुलाई में गृह मंत्रालय द्वारा गठित मंत्रालय की समिति की जाँच की रिपोर्ट पर यह निर्णय लिया गया है। समिति की जाँच मुख्य रूप से इस पर थी कि क्या संगठनों ने आयकर दाखिल करते वक्त दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की या विदेशों से प्राप्त धन का शोधन किया। जाँच पूरी होने के बाद गृह मंत्रालय ने अपना निर्णय लिया।

राजीव गाँधी फाउंडेशन के साथ राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट का लाइसेंस भी कैंसिल कर दिया गया है। राजीव गाँधी फाउंडेशन का लाइसेंस रद्द करने की सूचना उनके पदाधिकारियों को भेज दी गई है। संगठन ने अभी इस मामले पर अपनी कोई टिप्पणी नहीं दी है।

चीन से मिला संगठन को फंड, गाँधी परिवार ने खुद डील की

साल 2020 में इसी संगठन को लेकर सामने आया था कि कैसे आरजीएफ को चीनी सरकार से 2006 और बाकी सालों में पैसे मिले। 2008 में कॉन्ग्रेस पार्टी और चीन की कन्युनिस्ट पार्टी के बीच मेमोरेंडम भी साइन हुआ ता कि वो हर विकास मुद्दे पर एक दूसरे की राय लेंगे। खास बात ये थी कि इसे राहुल गाँधी ने साइन किया था जो 2020 में चीन विवाद के बाद मोदी सरकार पर सवाल उठाते मिले थे।
इस संगठन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी हैं। वहीं ट्रस्टियों में अशोक गांगुली, बंसी महता, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम, और राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का नाम शामिल है। राजीव गाँधी फाउंडेशन की शुरुआत साल 1991 में हुई थी। कथिततौर पर यह संगठन साल 1991 से 2009 तक स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, महिलाओं और बच्चों, विकलांग सहायता आदि सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम करने का दावा करता था।
हालाँकि कुछ समय पहले यह संगठन विवादों में आ गया। ये भी खुलासा हुआ था कि इस संगठन को 1991-1992 में कॉन्ग्रेस सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने 100 करोड़ रुपए बजट से देने की कोशिश की थी। मगर विपक्ष के हंगामे के बाद इस पैसे को फाउंडेशन को नहीं दिया जा सका।

वित्त मंत्री रहते हुए RGF को 100 करोड़ देना चाहते थे मनमोहन सिंह

1991-92 में भारतीय संसद की केंद्रीय बजट की चर्चा के संग्रहीत अभिलेख के एक सेक्शन में देखा जा सकता है कि जब तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने राजीव गाँधी फाउंडेशन को 100 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की थी, जिस पर विपक्षी दलों ने भारी हंगामा करते हुए सवाल खड़ा दिया था।
मनमोहन सिंह द्वारा बनाए गए 1991-92 के केंद्रीय बजट दस्तावेज में एक और प्रावधान भी था। इसमें कहा गया कि 5 साल की अवधि में राजीव गाँधी फाउंडेशन को 100 करोड़ रुपए की राशि दान की जाएगी। यह राशि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास, साक्षरता के प्रचार, पर्यावरण की सुरक्षा, सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने, दलितों के उत्थान के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से संबंधित अनुसंधान और कार्रवाई कार्यक्रमों की पहल करने, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों, प्रशासनिक सुधार और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका के लिए बताई गई थी।

मेहुल चोकसी ने दिया दान

इसके अलावा राजीव गॉंधी फाउंडेशन (RGF) को मिले दान को लेकर एक खुलासा ये हुआ था कि इसे दान देने वालों में एक नाम मेहुल चोकसी का भी था। मेहुल चोकसी वही शख्स है जो पंजाब नेशनल बैंक के हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले में अभियुक्त है। पीएनबी घोटाले के तहत नीरव मोदी और मेहुल चोकसी पर 13 हज़ार करोड़ रुपए के ग़बन का आरोप है।