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राजीव गाँधी ने भारत-पाकिस्तान में सुलह के लिए अमेरिका से माँगी थी मदद, राष्ट्रपति रीगन को लिखा था पत्र: भाजपा MP निशिकांत दुबे ने 1987 का पत्र दिखा पूछे सवाल

    राजीव गांधी-रोनाल्ड रीगन, तस्वीरें इंस्टाग्राम पर Rememberingrajiv और यूट्यूब पर रीगन लाइब्रेरी से ली गई हैं
2014 में मोदी सरकार बनने से पहले कांग्रेस पाकिस्तानी आतंकियों द्वारा हमला करने पर डोसियर-डोसियर खेलती थी। अमेरिका के आगे रोती थी की पाकिस्तान ने हमें मारा लेकिन मोदी सरकार सीधे पाकिस्तान की छाती पर बैठ मारती है। और आज वही पाकिस्तान अमेरिका के आगे रो रहा है "बचा लो मोदी से।" मोदी सरकार से पहले तक जो पब्लिक पाकिस्तान से डरी-डरी रहती थी लेकिन आज वही पाकिस्तान उसकी भाषा में जवाब मिलने पर डरा हुआ है।      

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने बुधवार (28 मई 2025) को कॉन्ग्रेस पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया है कि 1987 में भारत-पाकिस्तान के बीच शांति समझौता करने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने अमेरिका से मदद माँगी थी। निशिकांत दुबे ने यह दावा अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन द्वारा राजीव गांधी को लिखे एक पुराने पत्र के आधार पर किया है, जिसे अब सार्वजनिक कर दिया गया है।

निशिकांत दुबे ने दिखाया 1987 पत्र

निशिकांत दुबे का कहना है कि 1972 के शिमला समझौते के तहत यह तय हुआ था कि भारत और पाकिस्तान के बीच कोई भी विवाद सिर्फ दोनों देशों के बीच बातचीत से सुलझाया जाएगा, इसमें कोई तीसरा देश शामिल नहीं होगा। ऐसे में राजीव गाँधी का अमेरिकी मदद माँगना इस समझौते का उल्लँघन है।
दुबे ने 25 मार्च, 1987 को अमेरिकी राजदूत द्वारा राजीव गाँधी को भेजे गए एक कथित पत्र का हवाला दिया है। निशिकांत दुबे ने बताया कि इस पत्र में गाँधी ने सीमा पार से होने वाली नशीले पदार्थों की तस्करी पर भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिकी विशेषज्ञों की मदद माँगी थी ऐसा लिखा है। रीगन ने कहा था कि अगर भारत और पाकिस्तान की सरकारें मदद माँगती हैं तो उन्हें खुशी होगी।
हालाँकि, रीगन के इस पत्र में सीधे तौर पर 1987 के भारत-पाकिस्तान युद्धविराम में अमेरिका की दखलअंदाजी का कोई संकेत नहीं मिलता है। पत्र में सिर्फ भविष्य के तनाव को कम करने के लिए पूर्वी और पश्चिमी यूरोप के बीच प्रभावी तरीकों के बारे में कुछ जानकारी देने की बात कही गई है।
यह नया दावा ऐसे समय में आया है जब हाल ही में पहलगाम आतंकवादी हमले और भारत के जवाबी ऑपरेशन ‘सिंदूर’ के बाद भारत-पाकिस्तान संबंधों में तनाव बढ़ा हुआ है, और तीसरे पक्ष की भूमिका को लेकर राजनीतिक बहस जारी है।

इंदिरा गाँधी पर सवाल

भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने मंगलवार (27 मई 2025) को एक अमेरिकी खुफिया दस्तावेज़ शेयर किया। निशिकांत दुबे ने बताया कि यह दस्तावेज़ 1971 के बांग्लादेश युद्ध से जुड़ा है, जिसमें इंदिरा गाँधी ने संयुक्त राष्ट्र के युद्धविराम के प्रस्ताव को मान लिया था।
दुबे ने पूछा कि क्या भारत ने पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (POK) को वापस लेने और करतारपुर गुरुद्वारा जैसी जगहों को सुरक्षित करने के बजाय बांग्लादेश बनाने को ज़्यादा अहमियत दी। निशिकांत दुबे ने ‘X’ (पहले ट्विटर) पर लिखा कि इंदिरा गाँधी ने अमेरिकी दबाव में आकर 1971 का युद्ध रोक दिया था, जबकि उस समय के रक्षा मंत्री जगजीवन राम और सेना प्रमुख सैम मानेकशॉ इसके खिलाफ थे।

कॉन्ग्रेस का पलटवार

कॉन्ग्रेस नेता जयराम रमेश ने विदेश मंत्री एस. जयशंकर पर निशाना साधा है। जयराम रमेश ने कहा कि जब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत में अमेरिका की मदद और किसी ‘तटस्थ जगह’ पर बात करने की बात कही, तो जयशंकर चुप क्यों रहे।

हालाँकि, भारत ने अमेरिकी राष्ट्रपति के उन दावों को खारिज कर दिया है, जिनमें कहा गया था कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच शांति स्थापित करने में मदद की। भारत ने अपनी पुरानी नीति को दोहराते हुए साफ किया है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़ा कोई भी मुद्दा भारत और पाकिस्तान मिलकर ही सुलझाएँगे, इसमें किसी तीसरे देश की दखलअंदाजी नहीं होगी।
निशिकांत दुबे के इस दावे के बाद भारत द्वारा पूर्व में लिए गए इस फैसलों पर राजनीतिक बहस और तेज़ हो गई है।

द सैटेनिक वर्सेस: फिर क्यों कहर बरपा रहे कट्टरपंथी मुस्लिम? दे रहे ‘बर्दाश्त नहीं’ करने की धमकी; रुश्दी से ज्यादा खतरनाक अली सीना और अनवर शेख की किताबों पर सबकी चुप्पी, क्यों?


भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी की किताब ‘द सैटेनिक वर्सेस’(The Satanic Verses) भारत में लौट आई है। यह किताब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने बैन कर दी थी। इसे इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध के चलते बैन किया गया था। लगभग 40 वर्षों के बाद यह किताब भारत के पाठकों के लिए उपलब्ध हुई है। किताब के वापस लौटने का मुस्लिमों ने विरोध किया है। किताब दिल्ली हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई के चलते भारत लौट सकी है। मुस्लिम मौलानाओं ने माँग है कि किताब पर दोबारा से बैन लगा दिया जाए और इसे भारतीय बाजारों में उपलब्ध ना होने दिया जाए।
The Satanic Verses पर शोर मचाने वाले मुस्लिम
मौलानाओं की अली सीना(Understanding Mohammad And Muslims) और अनवर शेख की किताबों पर चुप्पी बहुत कुछ बयान करती है। लेकिन ना ही किसी में इनकी किताबों को बैन या इनके खिलाफ कोई फतवा देने की हिम्मत, क्यों? जबकि इनकी किताबों के आगे रुश्दी की किताब लगभग शून्य है। अली सीना ने तो अपनी किताब में दावा किया है कि किताब को पढ़ने के बाद मुस्लिम इस्लाम छोड़ रहे हैं। अनवर और अली के अलावा बहुत किताबें आसानी से उपलब्ध हैं। फिर रुश्दी ही निशाने पर क्यों? 
शायद अनवर और अली की किताबों को पढ़ ex-muslims की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। यही वजह है कि इन ex-muslims ने खतना आदि कई मुस्लिम रस्मों पर सवाल खड़े किए हैं। जिन्हे हर मुस्लिम इस्लामिक हक़(रिवाज़) मानता है। नूपुर शर्मा को जितना इन 
ex-muslims ने बचाव किया है किसी और ने नहीं। Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' आदि चैनलों पर चर्चाओं में इन ex-muslims के आगे मौलाना पसीने पोंछते नज़र आये। 

क्यों बैन हुई थी किताब?

सलमान रुश्दी की यह किताब 1988 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। सलमान रुश्दी जन्मे भारत में थे लेकिन बाद में वह इंग्लैंड चले गए थे और यहीं उन्होंने यह किताब लिखी थी। इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है कि इस किताब का कथानक इस्लाम के विश्वासों का मजाक उड़ाता है और अपमान करता है। इस किताब में पैगम्बर मोहम्मद जैसे एक पात्र, उनकी 12 पत्नियों को लेकर भी लिखा गया है।
सलमान रुश्दी ने किताब में कहीं-कहीं ऐसा दिखाने की कोशिश की थी कि कुरान में पैगम्बर मुहम्मद द्वारा लिखी गई बातें उन्हें अल्लाह के फ़रिश्ते ने नहीं बताई बल्कि उन्होंने खुद लिखी थी। इसके अलावा उनकी 12 पत्नियों के नामों पर भी लिखा गया है। उन 12 पत्नियों के नाम इस किताब में 12 वेश्याएँ रख लेती हैं। इसके अलावा भी किताब में इस्लाम से जुड़ी बहुत सी धारणाओं से मिलती जुलती कहानी बनाकर उन पर प्रहार किया गया था।
इसके बाद सलमान रुश्दी के खिलाफ दुनिया भर में मुस्लिम गुस्सा हो गए थे। मुंबई में इस किताब को लेकर दंगे हुए थे जिसमे 12 लोगों की मौत हुई थी। जामिया के वाईस चांसलर मुशीरुल हसन को किताब के बैन की आलोचना के चलते निकाल दिया गया था और इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें बेरहमी से पीटा था।
कश्मीर में भी एक आदमी मारा गया था। यहाँ तक कि 1989 में ईरान के मुल्ला शासक आयतुल्लाह खुमैनी ने लेखक सलमान रुश्दी का सर कलम करने का आदेश दुनिया भर के मुस्लिमों को दिया था। इस किताब को बैन करने का आह्वान तत्कालीन कॉन्ग्रेस सांसद सैयद शहाबुद्दीन और खुर्शीद आलम खान (कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के अब्बा) ने भारत में किया था।
शहाबुद्दीन ने किताब के खिलाफ याचिका दायर कर इस पुस्तक को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया था। इसके बाद राजीव गाँधी की सरकार ने 26 सितंबर 1988 को ब्रिटेन में पहली बार पब्लिश इस किताब पर 10 दिनों के भीतर बैन लगा दिया था। भारत इसे बैन करने वाला पहला देश था। इसे मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में नवम्बर, 1988 में बैन किया गया था।
किताब के भारत में आयात पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद राजीव गाँधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा था। कॉन्ग्रेस सरकार ने बाद में इसके लेख सलमान रुश्दी के भारत आने पर भी रोक लगा दी थी। यह बैन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटा दिया था।

कैसे हटा बैन, अब कहाँ मिल रही?

दिल्ली हाई कोर्ट में नवम्बर, 2024 में हुई एक सुनवाई में यह स्पष्ट हुआ था कि इस किताब के आयात पर रोक लगाने वाली अधिसूचना अब मौजूद ही नहीं है। कोर्ट ने तब कहा था, “अब हमारे पास यह मानने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है कि ऐसी कोई अधिसूचना मौजूद नहीं है। इसलिए हम इसकी वैधता की जाँच नहीं कर सकते।” इस अधिसूचना को साल 2019 में संदीपन खान नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने न्यायालय को बताया कि वे पुस्तक पर प्रतिबंध होने के कारण इसे आयात नहीं कर पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अधिसूचना न तो किसी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है और न ही किसी प्राधिकरण के पास उपलब्ध है। संदीपन खान ने RTI के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय से इस संबंध में जवाब भी माँगा था। गृह मंत्रालय ने जवाब में कहा था कि ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर प्रतिबंध लगा है। गृह मंत्रालय ने आदेश के मुताबिक, सीमा शुल्क विभाग से भी याचिका का बचाव करने को कहा गया था। वहीं, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क के अधिकारी प्रतिबंध से संबंधित अधिसूचना कोर्ट में पेश नहीं कर पाए।
इसके बाद कोर्ट ने इसे अस्तित्वहीन मान लिया और खान को यह पुस्तक आयात करने की अनुमति दे दी। पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता उक्त पुस्तक के संबंध में कानून के अनुसार सभी कार्रवाई करने का हकदार होगा।” दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सैटेनिक वर्सेज के आयात पर 36 साल से लगा प्रतिबंध खत्म हो गया है। अब इसे कोई भी आयात कर सकता है। इसके बाद स्पष्ट हो गया था कि अब यह किताब भारत में आ सकती है। यह किताब अब दिल्ली के किताब विक्रेताओं के पास आ गई है। किताब का दाम 1999 रूपए है।

अब मुस्लिम फिर कर रहे विरोध

मुस्लिमों ने इस किताब की भारत में एंट्री को लेकर फिर से विरोध जताया है। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के लीगल एडवाइजर मौलाना काब रशीदी ने कहा है कि इस किताब में ईशनिंदा की गई है और इसकी बिक्री मुस्लिमों को भड़काने का प्रयास है। उन्होंने कहा है कि मुस्लिम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। रशीदी ने इस किताब को दोबारा बैन करने की माँग की है। एक और मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने कहा है कि कोई भी मुस्लिम इस किताब को दुकानों में देख कर बर्दाश्त नहीं करेगा।

इंदिरा गाँधी की 100% प्रॉपर्टी अपने बच्चों को दिलवाने के लिए राजीव गाँधी सरकार ने खत्म करवाया था ‘विरासत कर’… वरना सरकारी खजाने में चला जाता पैसा

आखिर क्या कारण है कि राजीव गाँधी द्वारा ख़त्म किए ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ को कांग्रेस अपने मैनिफेस्टो में ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ क्यों लेकर आयी? इस मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पहले कांग्रेस को ही विरोध करना था। लेकिन दिक्कत यह है कि मोदी द्वारा मुद्दा उठाने पर मैनिफेस्टो पढ़े बिना चुनाव आयोग पहुँच गए। 'विरासत टैक्स' लाकर गाँधी परिवार को नुकसान नहीं होने वाला, क्योकि परिवार को मालूम है कि 2024 चुनाव के बाद उनकी संपत्ति कब ED, CBI द्वारा जब्त कर ली जाए। उनके पास बचेगा विदेश में जमा, जिस तक सरकार को काफी मशक्कत करनी पड़ेगी। अगर टैक्स को लाना था अपने कार्यकाल में लेकर क्यों नहीं आए? नहीं मालूम था कि कांग्रेस सत्ता से दूर होती जाएगी और परिवार की संपत्ति पर सरकार का कब्ज़ा भी हो सकता है। कालचक्र ऐसा घूमा जिस टैक्स को राजीव ख़त्म करते हैं, परिवार उसे ही वापस लाएगा। 

इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष और राहुल गाँधी के सलाहकार सैम पित्रोदा ने ‘विरासत कर (Inheritance Tax)’ का मुद्दा छेड़कर कांग्रेस की ही परेशानी बढ़ा दी है। अब लोकसभा चुनाव से पहले वो पुराने पन्ने भी खुल रहे हैं जिन पर इतने समय से चुप्पी थी। हर कोई कांग्रेस की मंशा पर सवाल खड़ा कर रहा है कि उनका मकसद देश के लोगों से उनकी कमाई संपत्ति छीनना है… लेकिन मालूम हो कि ‘विरासत कर’ देश के लिए नया टैक्स नहीं है। 40 साल पहले तक ये भारत में लागू था, जिसे 1985 में राजीव गाँधी सरकार ने ठीक उस समय खत्म किया जब इंदिरा गाँधी के संपत्ति के बँटवारे की बात आई।

मौजूदा जानकारी के अनुसार, यह ‘विरासत कर’ का कॉन्सेप्ट देश में तीन दशकों तक अस्तित्व में था। एस्टेट ड्यूटी एक्ट 1953 के तहत, व्यक्ति के मृत्यु के बाद उसकी विरासत का कर 85% तक जा सकता था। इसमें भी दरें निर्धारित थीं। जो प्रॉपर्टी 20 लाख रुपए से ऊपर थी उसमें 85% टैक्स लगता था जिसका मतलब है कि व्यक्ति की मौत के बाद अधिकांश जमीन पर अधिकार सरकार का हो जाता था। हालाँकि, ये कानून उस तरह से काम नहीं किया, जिस प्रकार से सोचा गया था।

इसके तहत नागरिकों को दो बार संपत्ति से जुड़ा कर भरना पड़ता था एक तो जीवन रहते (जिसे 2016 में मोदी सरकार ने बंद करवा दिया) और फिर उनके निधन पर भी। इसके अलावा जिस प्रकार से कांग्रेस ने इस कर को लागू करके धन जुटाने की सोची थी वो भी लक्ष्य पूरा नहीं हुआ क्योंकि जब देश में ऐसा कर आ गया तो फिर लोग बेनामी प्रॉपर्टी के मामले और संपत्ति छिपाने के मामले ज्यादा बढ़ गए। अंत में ये एक्ट 1985 में जाकर खत्म कर दिया गया।

अब दिलचस्प बात ये है कि जिस समय पर ये कानून रद्द किया गया वो वही समय था जब पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की प्रॉपर्टी उनके पोते-पोतियों के नाम पर होनी थी। राजीव गाँधी सरकार ने इस काम से ठीक एक माह पहले एस्टेट ड्यूटी 1953 को खत्म किया, उस समय वीपी सिंह वित्त मंत्री हुआ करते थे। घोषणा हुई कि ये कानून 1 अप्रैल 1985 के बाद से लागू नहीं होगा। इसके बाद 2 मई 1985 को इंदिरा गाँधी की करीबन 21 लाख 50 हजार की संपत्ति उनके तीन पोते-पोतियों में हस्तांतरित हो गई। आज उस प्रॉपर्टी की कीमत करीब 4.2 करोड़ रुपए है।

यूनाइटेड प्रेस इंटरनेशनल (यूपीआई) की 2 मई 1985 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 1981 में हस्ताक्षरित वसीयत में इंदिरा गाँधी ने अपने बेटे राजीव गाँधी और उनकी पत्नी सोनिया गाँधी को वसीयत का निष्पादक (एग्जिक्यूटर) नियुक्त किया था, लेकिन बाद में उन्होंने उन्हें कुछ नहीं दिया। उन्होंने अपनी बहु मेनका गाँधी के लिए भी कुछ नहीं छोड़ा था। सारी संपत्ति तीनों पोते-पोतियों के नाम की गई थी।

राजीव गाँधी द्वारा ये वसीयत कोर्ट में दिखाए जाने के बाद इसे अखबार में भी पब्लिश किया गया था। इस विल के अनुसार इंदिरा गाँधी संपत्ति का बड़ा हिस्सा महरौली में निर्माणाधीन एक खेत और एक फार्महाउस था, जिसकी कीमत 98,000 डॉलर थी (आज के हिसाब से 81,72,171 रुपए)।

इसके अलावा तीनों बच्चों के नाम इंदिरा गाँधी और जवाहरलाल नेहरू द्वारा लिखित पुस्तकों के कॉपीराइट के साथ-साथ इकट्ठा हुए लगभग 75,000 डॉलर की नकदी, स्टॉक और बांड भी थे। वहीं इंदिरा गाँधी की प्राचीन वस्तुएँ और लगभग 2500 डॉलर की निजी आभूषण केवल प्रियंका गाँधी के लिए छोड़े गए थे। 1984 में तीनों वारिस नाबालिग थे इसलिए उस समय राजीव गाँधी और सोनिया गाँधी को उनके बड़े होने तक संपत्ति संभालने की जिम्मेदारी दी गई।

अवलोकन करें:-

हिन्दू विरोधी कांग्रेस manifesto : क्या कांग्रेस भारत में शरीयत लागु करने का जाल बिछा रही है? मुस्लिम

अब ये ध्यान देने वाली बात है कि जिस देश में 20 लाख से अधिक संपत्ति होने पर 85% प्रॉपर्टी सरकार को चली जाती थी, वो नियम राजीव गाँधी की सरकार में ठीक उस समय पलटा गया जब उनके बच्चों को उनकी दादी की विरासत मिलनी थी। यूपीआई की रिपोर्ट में भी कहा गया था, “1 अप्रैल से प्रभावी हुए एक वित्त विधेयक के तहत, भारत में सभी मृत्यु शुल्क समाप्त कर दिए गए हैं और गांधी संपत्ति पर कोई विरासत कर नहीं लगाया जाएगा।”

तेलंगाना : ‘राजीव गाँधी के साथ नाचते हुए इटली की बार डांसर सोनिया’ : कांग्रेस के कार्टून पर BRS का डायरेक्ट हमला

सोनिया गाँधी और राजीव गाँधी का पोस्टर बीआरएस ने किया जारी (फोटो साभार : X_BRS)
राजनीति भी क्या अजीबोगरीब है, जहाँ सात तालों में छुपी चीज भी बाहर आने से नहीं रुक सकती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में सब जानते हैं कि 'वह चाय बेचते थे', लेकिन सोनिया गाँधी के बारे में किसी ने यह बोलने का साहस नहीं किया कि 'वह शादी से पहले बार डांसर थी'। लेकिन आज इतने वर्षों बाद इस सच्चाई को उजागर करने की हिम्मत भारत राष्ट्र समिति ने की है। अब बीआरएस नशे में सोनिया और राजीव की फोटोओं को सार्वजनिक करने को आतुर हो चुकी है।  

तेलंगाना में कांग्रेस और भारत राष्ट्र समिति के बीच की तनातनी अब पर्सनल अटैक तक आ गई है। भारत राष्ट्र समिति यानी बीआरएस ने कांग्रेस के सोशल मीडिया पोस्ट के जवाब में न सिर्फ कांग्रेस की सबसे बड़ी नेता सोनिया गाँधी बल्कि उनके स्वर्गीय पति राजीव गाँधी को भी घसीट लिया है। यही नहीं, अब तक का सबसे बड़ा हमला करते हुए बीआरएस ने ऐसा पोस्टर जारी किया है, जैसा अब तक किसी पार्टी ने नहीं किया। इस पोस्टर में सोनिया गाँधी और राजीव गाँधी को डाँस करते दिखाया गया है, साथ ही धमकाया भी गया है कि अगर कांग्रेस नहीं सुधरी, तो राहुल गाँधी का वीडियो भी जारी किया जाएगा।

बीआरएस ने वो कर दिया, जो अब तक किसी ने भी नहीं किया था

बीआरएस ने कांग्रेस को सीधे तौर पर ‘बार डांसर पार्टी’ करार दे दिया। इस तस्वीर में सोनिया गाँधी और उनके स्वर्गीय पति पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी को दिखाया गया है। यही नहीं, बीआरएस ने सीधे तौर पर कहा है कि अगर कांग्रेस पार्टी नहीं सुधरी, तो वो भी पर्सनल अटैक जारी रखेगी।
बीआरएस ने अपने एक्स हैंडल पर लिखा, “केसीआर की तस्वीरों के साथ छेड़छाड़ बंद कर दिया जाए, जिन्होंने अपनी जान पर खेलकर तेलंगाना के लिए संघर्ष किया। अगर आप नहीं रुके, तो हम सोनिया और राहुल की और भी तस्वीरें मॉर्फ कर सकते हैं। वैसे, तुमने ये नहीं सुना होगा कि कुत्ते की दुम सीधी हो गई, वो टेढ़ी की टेढ़ी ही रहती है। वैसे, हमें ये बताने की जरूरत नहीं कि ‘बापति’ कौन है। सारी दुनिया जानती है कि वो (राजीव गाँधी) इटली के बार में डांस के चक्कर में नशे (शराब) की वजह से फंस गए। अगर ये सब जारी रहा, तो हम पूरा वीडियो भेजेंगे, जिसे वो लोग चबाकर निगल नहीं पाएँगे।”
इन विवाद की शुरुआत तब हुई, जब बीआरएस के कार्यकारी अध्यक्ष केटीआर ने तेलंगाना के कांग्रेस मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर आरोप लगाए। उन्होंने कहा कि रेवंत रेड्डी उन नौकरियों को अपना बता रहे हैं, जो केसीआर ने मुख्यमंत्री रहते तेलंगाना के युवाओं को दी। उन्हें शर्म आनी चाहिए।
इसके जवाब में तेलंगाना पार्टी ने एक मॉर्फ तस्वीर जारी की, जिसमें केसीआर, केटीआर, हरीश राव, कविता और संतोष राव को ‘चीप कार गैंग’ के तौर पर दिखाया गया, एक ऐसे गैंग के तौर पर, जो कार चोरी करते हैं। तेलंगाना कांग्रेस ने लिखा, “कलवाकुंतला गैंग सस्ते शब्दों की आड़ में कारों (वोटों) की चोरी करने में जुटी है। वो जो काम (नौकरियाँ दिलाने का) करते हैं, उसका क्रेडिट लें। अगर वो अच्छा काम करेंगे, तभी वो क्रेडिट ले सकते हैं। लेकिन इन्होंने लोगों का खून पिया है। सस्ते शब्दों और झूठे प्रचार से बचना चाहिए और अच्छे विपक्ष की भूमिका निभानी चाहिए। अन्यथा वो भूमिका भी छिन जाएगी। सुरक्षित रहें।”
तेलंगाना के निर्माण के लिए केसीआर ने लंबे समय तक लड़ाई लड़ी थी। तेलंगाना बनने के बाद वो दो बार मुख्यमंत्री रहे, लेकिन पिछले चुनाव में उनकी पार्टी को जबरदस्त हार का सामना करना पड़ा। अभी तेलंगाना में कांग्रेस की पूर्ण बहुमत की सरकार है। चूँकि लोकसभा चुनाव सिर पर है, ऐसे में दोनों पार्टियों में खूब तनातनी हो रही है। तेलंगाना में 17 लोकसभा सीटें हैं, जिन पर कब्जे की कड़ी लड़ाई है। पिछले लोकसभा चुनाव में बीआरएस ने 9 सीटें जीती थी, लेकिन इस बार मुकाबला काफी कड़ा है।

राजीव गाँधी के हत्यारों को SC द्वारा छोड़ने पर क्यों भड़की कांग्रेस जबकि 1991 में सोनिया, राहुल-प्रियंका कर चुके हैं माफ?

साभार: एशियानेट/न्यूज24
कांग्रेस हर चुनावी रैली और जलसों में राजीव गाँधी की 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक चुनावी रैली के दौरान हुई हत्या पर सहानुभूति बटोर सत्ता पाने की लालसा करती नज़र आती है, लेकिन सोनिया गाँधी और परिवार इस मुगालते है कि जनता सोनिया गाँधी द्वारा साल 1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन को पत्र लिखकर चारों दोषियों को माफी देने की अपील करने का जवाब मांग रही है। आखिर दुनिया में ऐसी कौन-सी पत्नी और संतान होगी जो अपने पति/पिता के हत्यारों को माफ़ करने की अपील करे। उस समय चर्चा यह भी थी कि राजीव हत्या के पीछे कोई षड़यंत्र था? राहुल और प्रियंका उस समय इतने वयस्क नहीं थे, लेकिन वयस्क होने पर अपने पिता के हत्यारों से जेल में मिलना किसी षड़यंत्र को गहराता नज़र आ रहा था। जिसने कांग्रेस बुद्धिजीवियों को भी हत्यारों से मिलने और उन पर रहम दिखाए जाने का रहस्य गुप्त बना हुआ है। जो कांग्रेस नेता सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से खुश नहीं हैं, उन्हें इस केस को पुनः खुलवाने के लिए आग्रह करना चाहिए, अन्यथा भविष्य में राजीव गाँधी की हत्या के नाम पर सहानुभूति लेना छोड़ देना चाहिए।  

पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी की हत्या मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 11 नवंबर 2022 सारे दोषियों को रिहा करने का निर्णय लिया है। कोर्ट ने मुख्य आरोपित की याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा कि अगर दोषियों पर किसी और मामले में आरोप न हों तो सारे दोषियों को रिहा किया जाता है। कोर्ट के इस निर्णय पर अब कॉन्ग्रेस ने सवाल खड़ा किया है।

कांग्रेस के कम्युनिकेशंस इंचार्ज और महासचिव जयराम रमेश ने कहा, “पूर्व पीएम राजीव गाँधी के हत्यारों को मुक्त करने का सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अस्वीकार्य और पूरी तरह से गलत है। पार्टी इसकी आलोचना करती है और इसे अक्षम्य मानती है। दुर्भाग्यपूर्ण है कि सुप्रीम कोर्ट ने भारत की भावना के अनुरूप काम नहीं किया।”

उधर, कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “इस मामले में जो केंद्र सरकार का स्टैंड है, वही पार्टी का है। पार्टी सोनिया गाँधी के विचार से सहमत नहीं है।” सिंघवी ने कहा कि पार्टी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ कानूनी विकल्प पर विचार करेगी। राजीव गाँधी की हत्या आम अपराध की तरह नहीं था। उन्होंने कहा कि वे अपने स्टैंड पर कायम रहे हैं। यह संस्थागत मामला है। एक पूर्व प्रधानमंत्री की हत्या देश की एकता, अखंडता और पहचान से जुड़ा ममला है।

दिवंगत राजीव गाँधी की पत्नी और कांग्रेस की तत्कालीन अध्यक्ष सोनिया गाँधी, बेटे राहुल गाँधी और बेटी प्रियंका गाँधी ने पूर्व प्रधानमंत्री के इन हत्यारों को माफ करने की बात कही थी। इनमें से एक आरोपित नलिनी को जब गिरफ्तार किया था, तब वह गर्भवती थी।

राजीव गाँधी की हत्या की एक महिला नलिनी श्रीहरण सहित चार दोषियों को अदालत ने फाँसी की सजा सुनाई थी। इसके बाद सोनिया गाँधी साल 1999 में तत्कालीन राष्ट्रपति केआर नारायणन को पत्र लिखकर चारों दोषियों को माफी देने की अपील की थी। इसके साथ ही उन्होंने अदालत से नलिनी के प्रति नरमी बरतने की अपील की थी। इसके बाद कोर्ट ने साल 2000 में नलिनी की फाँसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था।

इसके बाद साल 2008 में प्रियंका गाँधी अपने पिता की हत्यारिन नलिनी से तमिलनाडु के वेल्लोर स्थित जेल में मुलाकात की थी। रिपोर्ट के मुताबिक, प्रियंका गाँधी नलिनी को काफी देर तक देखती रही थीं। इसके बाद रोते हुए उससे पूछा था कि ‘मेरे पिता बहुत अच्छे इंसान थे। उन्हें तुमने क्यों मार दिया। अगर कोई दिक्कत थी, तो बातचीत से मामला सुलझा सकती थीं। लेकिन मारने की क्या जरूरत थी’। प्रियंका ने कहा था कि उन्होंने नलिनी को दिल से माफ कर दिया है।

ऐसी ही बात राहुल गाँधी ने भी कही थी। साल 2021 में राहुल गाँधी ने कहा था कि उनके पिता की हत्या से उन्हें गहरा आघात लगा और काफी दुख हुआ, लेकिन अब उनके मन में कोई गुस्सा या घृणा नहीं है। राहुल ने कहा था, “मुझे किसी के प्रति गुस्सा या नफरत नहीं है। बेशक, मैंने अपने पिता को खो दिया और मेरे लिए यह बहुत कठिन समय था। इसका मुझे बेहद दुख हुआ, लेकिन मुझे नफरत या कोई गुस्सा नहीं है। मैं क्षमा करता हूँ।”

सोनिया गाँधी की 2014 में 6 अन्य हत्यारों की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया था। तमिलनाडु की तत्कालीन मुख्यमंत्री जयललिता ने इन लोगों को रिहा कराने की कोशिशें शुरू कर दी थीं। सुप्रीम कोर्ट ने भी एजी पेरारिवेलन को इस साल रिहा कर दिया था। इसके बाद नलिनी ने अपनी और अन्य हत्यारों की रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दी थी।

राजीव गाँधी की हत्या 21 मई 1991 को तमिलनाडु के श्रीपेरंबुदूर में एक चुनावी रैली के दौरान धनु नाम के लिट्टे आत्मघाती हमलावर ने की थी। वह राजीव गाँधी को फूलों का हार पहनाने के बाद उनके पैर छूने के बहाने आगे आया और झुककर उसने कमर पर बंधे विस्फोटक को ब्लास्ट कर दिया। धमाके में राजीव गाँधी समेत कई लोगों की मौत हुई थी।

1999 में इस मामले में 26 लोगों को मृत्युदंड दिया गया। इनमें से 19 को पहले ही बरी कर दिया गया जबकि बाकी 7 सजा काटते रहे और इनकी सजा उम्रकैद कर दी गई। इनमें से नलिनी गर्भवती थीं जिन्हें सोनिया गाँधी ने ये कहकर माफ किया कि उनकी गलती की सजा उनके बच्चे को नहीं दी जा सकती जो अभी जन्मा ही नहीं है।

जिस राजीव गाँधी फाउंडेशन को मनमोहन सिंह देना चाहते थे 100 करोड़ रूपए उसका गृह मंत्रालय ने कर दिया FCRA लाइसेंस रद्द

                                                     RGF पर गृह मंत्रालय की कार्रवाई
बलिदान के नाम पर जनता को गुमराह करने और सरकारी खजाने पर ऐश करने वाले गाँधी परिवार पर नकेल पड़नी शुरू हो गयी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने गाँधी परिवार के गैर-सरकारी संगठन राजीव गाँधी फाउंडेशन (RGF) का FCRA (विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम) लाइसेंस रद्द कर दिया है। आरोप है कि ये ट्रस्ट विदेशी फंडिंग कानून का उल्लंघन करता पाया गया है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, साल 2020 के जुलाई में गृह मंत्रालय द्वारा गठित मंत्रालय की समिति की जाँच की रिपोर्ट पर यह निर्णय लिया गया है। समिति की जाँच मुख्य रूप से इस पर थी कि क्या संगठनों ने आयकर दाखिल करते वक्त दस्तावेजों के साथ छेड़छाड़ की या विदेशों से प्राप्त धन का शोधन किया। जाँच पूरी होने के बाद गृह मंत्रालय ने अपना निर्णय लिया।

राजीव गाँधी फाउंडेशन के साथ राजीव गाँधी चैरिटेबल ट्रस्ट का लाइसेंस भी कैंसिल कर दिया गया है। राजीव गाँधी फाउंडेशन का लाइसेंस रद्द करने की सूचना उनके पदाधिकारियों को भेज दी गई है। संगठन ने अभी इस मामले पर अपनी कोई टिप्पणी नहीं दी है।

चीन से मिला संगठन को फंड, गाँधी परिवार ने खुद डील की

साल 2020 में इसी संगठन को लेकर सामने आया था कि कैसे आरजीएफ को चीनी सरकार से 2006 और बाकी सालों में पैसे मिले। 2008 में कॉन्ग्रेस पार्टी और चीन की कन्युनिस्ट पार्टी के बीच मेमोरेंडम भी साइन हुआ ता कि वो हर विकास मुद्दे पर एक दूसरे की राय लेंगे। खास बात ये थी कि इसे राहुल गाँधी ने साइन किया था जो 2020 में चीन विवाद के बाद मोदी सरकार पर सवाल उठाते मिले थे।
इस संगठन की अध्यक्ष सोनिया गाँधी हैं। वहीं ट्रस्टियों में अशोक गांगुली, बंसी महता, पूर्व पीएम मनमोहन सिंह, पी चिदंबरम, और राहुल गाँधी और प्रियंका गाँधी का नाम शामिल है। राजीव गाँधी फाउंडेशन की शुरुआत साल 1991 में हुई थी। कथिततौर पर यह संगठन साल 1991 से 2009 तक स्वास्थ्य, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, महिलाओं और बच्चों, विकलांग सहायता आदि सहित कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर काम करने का दावा करता था।
हालाँकि कुछ समय पहले यह संगठन विवादों में आ गया। ये भी खुलासा हुआ था कि इस संगठन को 1991-1992 में कॉन्ग्रेस सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए मनमोहन सिंह ने 100 करोड़ रुपए बजट से देने की कोशिश की थी। मगर विपक्ष के हंगामे के बाद इस पैसे को फाउंडेशन को नहीं दिया जा सका।

वित्त मंत्री रहते हुए RGF को 100 करोड़ देना चाहते थे मनमोहन सिंह

1991-92 में भारतीय संसद की केंद्रीय बजट की चर्चा के संग्रहीत अभिलेख के एक सेक्शन में देखा जा सकता है कि जब तत्कालीन वित्त मंत्री मनमोहन सिंह ने राजीव गाँधी फाउंडेशन को 100 करोड़ रुपए की राशि आवंटित की थी, जिस पर विपक्षी दलों ने भारी हंगामा करते हुए सवाल खड़ा दिया था।
मनमोहन सिंह द्वारा बनाए गए 1991-92 के केंद्रीय बजट दस्तावेज में एक और प्रावधान भी था। इसमें कहा गया कि 5 साल की अवधि में राजीव गाँधी फाउंडेशन को 100 करोड़ रुपए की राशि दान की जाएगी। यह राशि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास, साक्षरता के प्रचार, पर्यावरण की सुरक्षा, सांप्रदायिक सौहार्द और राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने, दलितों के उत्थान के लिए विज्ञान और प्रौद्योगिकी के अनुप्रयोग से संबंधित अनुसंधान और कार्रवाई कार्यक्रमों की पहल करने, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों, प्रशासनिक सुधार और वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की भूमिका के लिए बताई गई थी।

मेहुल चोकसी ने दिया दान

इसके अलावा राजीव गॉंधी फाउंडेशन (RGF) को मिले दान को लेकर एक खुलासा ये हुआ था कि इसे दान देने वालों में एक नाम मेहुल चोकसी का भी था। मेहुल चोकसी वही शख्स है जो पंजाब नेशनल बैंक के हज़ारों करोड़ रुपए के घोटाले में अभियुक्त है। पीएनबी घोटाले के तहत नीरव मोदी और मेहुल चोकसी पर 13 हज़ार करोड़ रुपए के ग़बन का आरोप है।

सलमान रुश्दी की किताब पर सबसे पहले भारत ने ही लगाया था बैन, मुस्लिम तुष्टिकरण में अव्वल थी राजीव गाँधी सरकार: आज तक भड़क रही वो आग


प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी पर शुक्रवार (13 अगस्त, 2022) पर न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम से पहले हमला कर दिया गया। हादी मतार नाम के संदिग्ध ने कई बार चाकू मार कर रुश्दी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। फरवरी 1989 में ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने उनकी पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को लेकर उनके खिलाफ फतवा जारी किया था। ये भी जानने लायक है कि रुश्दी की किताब को बैन करने वाला पहला देश ईरान, नहीं बल्कि भारत था। अक्टूबर 1988 में सबसे पहले भारत ने इस किताब को बैन कर दिया था।

रुश्दी पर हुए हमले के बाद से एक बार फिर से किताब ‘द सेटेनिक वर्सेज सुर्खियों में आ गई है। यही वो किताब है, जिसके कारण रुश्दी की जान पर 3 दशक से खतरा मँडरा रहा है। ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने 14 फरवरी, 1989 को उनके खिलाफ फतवा जारी किया था। भारत की राजीव गाँधी सरकार ने इसे सबसे पहले बैन कर के अपने ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ वाला रवैया दिखाया।

उस समय के भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट कर पहले ही जता दिया था कि उनकी सरकार इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने झुकी हुई है। उन दिनों यह भी चर्चा थी कि राजीव गाँधी ने Calcutta High Court में दर्ज कुरान की 124 आयतों के विरुद्ध दर्ज मुकदमे में आने वाले निर्णय को बदलने के लिए जज पर दबाव बनाया था। इसके बाद मुस्लिम तुष्टिकरण की मिसाल 31 जुलाई 1986 को दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट (Z.S. Lohat, Metropolitan Magistrate) द्वारा हौज़ काजी थाने में दर्ज कुरान की 24 आयतों के खिलाफ निर्णय को लागु नहीं होने दिया। वैसे इस निर्णय के विरुद्ध किसी ने कोई अपील भी दर्ज नहीं की गयी, क्योकि कांग्रेस सरकार ही बेदम हुए मौलवियों को ग्लूकोस और ऑक्सीजन देने का काम कर रही थी। लाल कुआँ के दो हिन्दू लड़कों ने दंगों की जड़ इन आयतों के विरुद्ध दिल्ली में पोस्टर लगाकर इन आयतों को बैन करने की अपील नहीं की। इसके बाद ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को बैन करके उन्होंने इस्लामवादियों के सामने अपनी गर्दन फिर झुका ली। 

दिलचस्प बात ये है कि भारत ने कभी भी पुस्तक पर एकमुश्त प्रतिबंध नहीं लगाया, इसकी बजाए, ‘सीमा शुल्क अधिनियम’ के तहत पुस्तक के आयात पर बैन लगाते हुए, वित्त मंत्रालय के माध्यम से किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया।

इतना ही नहीं, कांग्रेस सरकार ने रुश्दी के भारत आने पर भी रोक लगा दी। हालाँकि, इस फैसले को 11 साल बाद 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटा दिया।

‘द सेटेनिक वर्सेज’ किताब को पहली बार 26 सितंबर, 1988 को ब्रिटेन में प्रकाशित किया गया था। भारत ने इसके आयात पर 10 दिनों के अंदर बैन लगा दिया था। इसके बाद भी किताब की कुछ प्रतियाँ भारत पहुँच चुकी थीं, लेकिन हाल के दिनों में नूपुर शर्मा के समर्थकों का हश्र देखने के बाद हम समझ सकते हैं कि उस समय कोई सामने आकर अपने पास इस किताब की प्रति होने की बात क्यों नहीं स्वीकार रहा था।

इस किताब को बैन करने का आह्वान उस समय कांग्रेस के सांसद सैयद शहाबुद्दीन और खुर्शीद आलम खान (सलमान खुर्शीद के अब्बा) ने किया था। शहाबुद्दीन ने किताब के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। याचिका में इस पुस्तक को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया था। जिसके बाद इस किताब पर बैन लगा दिया गया था। CNN के फरीद जकारिया के अब्बा रफीक जकारिया भी इस किताब को बैन करने के अभियान में सबसे आगे थे।

राजीव गाँधी जैसे कमजोर प्रधानमंत्री ने वही किया, जो उनसे अपेक्षित था। अपनी पार्टी के मुस्लिम सांसदों के दबाव में आकर उन्होंने किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे वो आग लगी, जो आज तक जल रही है। भारत में किताब बैन होने के बाद सूडान, बांग्लादेश, श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका में भी इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

ब्रिटेन, जहाँ ये किताब पहली बार प्रकाशित हुई थी, वहाँ इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। किताब की प्रतियों में आग लगा दी गई थी। इसके बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की सरकार ने इस किताब को बैन करने से इनकार कर दिया था। ये विरोध जल्द ही पाकिस्तान और उसके बाद अमेरिका में भी फैला।

जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने देखा कि विश्व स्तर पर इस पुस्तक का जबरदस्त विरोध हो रहा है तो वो भी इस विवाद में कूद पड़े। उन्होंने इसके लेखक और प्रकाशकों के खिलाफ फतवा जारी कर दिया। इसके बाद ईरान ने रुश्दी के सिर पर 6 मिलियन डॉलर (अब के 47.77 करोड़ भारतीय रुपए) के इनाम घोषित कर दिया।

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जब सलमान रुश्दी को गलत बताना था तो ‘नास्तिक’ थे जावेद अख्तर, हमले के बाद मजहबी कट्टरपंथ का जिक्र

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फतवे का कोई ‘एक्सपायरी डेट’ तो था नहीं, इसलिए वो आज तक मान्य है। हो सकता है कि इस फतवे ने ही हमलावर हादी मतार को रुश्दी पर हमले के लिए प्रेरित किया हो। अक्टूबर 1988 में राजीव गाँधी ने ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को बैन करके जो चिंगारी धधकाई थी, वही आज भी असहिष्णुता की आग को भी भड़का रही है।