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द सैटेनिक वर्सेस: फिर क्यों कहर बरपा रहे कट्टरपंथी मुस्लिम? दे रहे ‘बर्दाश्त नहीं’ करने की धमकी; रुश्दी से ज्यादा खतरनाक अली सीना और अनवर शेख की किताबों पर सबकी चुप्पी, क्यों?


भारतीय मूल के ब्रिटिश लेखक सलमान रुश्दी की किताब ‘द सैटेनिक वर्सेस’(The Satanic Verses) भारत में लौट आई है। यह किताब पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने बैन कर दी थी। इसे इस्लामी कट्टरपंथियों के विरोध के चलते बैन किया गया था। लगभग 40 वर्षों के बाद यह किताब भारत के पाठकों के लिए उपलब्ध हुई है। किताब के वापस लौटने का मुस्लिमों ने विरोध किया है। किताब दिल्ली हाई कोर्ट में हुई एक सुनवाई के चलते भारत लौट सकी है। मुस्लिम मौलानाओं ने माँग है कि किताब पर दोबारा से बैन लगा दिया जाए और इसे भारतीय बाजारों में उपलब्ध ना होने दिया जाए।
The Satanic Verses पर शोर मचाने वाले मुस्लिम
मौलानाओं की अली सीना(Understanding Mohammad And Muslims) और अनवर शेख की किताबों पर चुप्पी बहुत कुछ बयान करती है। लेकिन ना ही किसी में इनकी किताबों को बैन या इनके खिलाफ कोई फतवा देने की हिम्मत, क्यों? जबकि इनकी किताबों के आगे रुश्दी की किताब लगभग शून्य है। अली सीना ने तो अपनी किताब में दावा किया है कि किताब को पढ़ने के बाद मुस्लिम इस्लाम छोड़ रहे हैं। अनवर और अली के अलावा बहुत किताबें आसानी से उपलब्ध हैं। फिर रुश्दी ही निशाने पर क्यों? 
शायद अनवर और अली की किताबों को पढ़ ex-muslims की संख्या में बढ़ोतरी हो रही है। यही वजह है कि इन ex-muslims ने खतना आदि कई मुस्लिम रस्मों पर सवाल खड़े किए हैं। जिन्हे हर मुस्लिम इस्लामिक हक़(रिवाज़) मानता है। नूपुर शर्मा को जितना इन 
ex-muslims ने बचाव किया है किसी और ने नहीं। Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' आदि चैनलों पर चर्चाओं में इन ex-muslims के आगे मौलाना पसीने पोंछते नज़र आये। 

क्यों बैन हुई थी किताब?

सलमान रुश्दी की यह किताब 1988 में पहली बार प्रकाशित हुई थी। सलमान रुश्दी जन्मे भारत में थे लेकिन बाद में वह इंग्लैंड चले गए थे और यहीं उन्होंने यह किताब लिखी थी। इस्लामी कट्टरपंथियों का कहना है कि इस किताब का कथानक इस्लाम के विश्वासों का मजाक उड़ाता है और अपमान करता है। इस किताब में पैगम्बर मोहम्मद जैसे एक पात्र, उनकी 12 पत्नियों को लेकर भी लिखा गया है।
सलमान रुश्दी ने किताब में कहीं-कहीं ऐसा दिखाने की कोशिश की थी कि कुरान में पैगम्बर मुहम्मद द्वारा लिखी गई बातें उन्हें अल्लाह के फ़रिश्ते ने नहीं बताई बल्कि उन्होंने खुद लिखी थी। इसके अलावा उनकी 12 पत्नियों के नामों पर भी लिखा गया है। उन 12 पत्नियों के नाम इस किताब में 12 वेश्याएँ रख लेती हैं। इसके अलावा भी किताब में इस्लाम से जुड़ी बहुत सी धारणाओं से मिलती जुलती कहानी बनाकर उन पर प्रहार किया गया था।
इसके बाद सलमान रुश्दी के खिलाफ दुनिया भर में मुस्लिम गुस्सा हो गए थे। मुंबई में इस किताब को लेकर दंगे हुए थे जिसमे 12 लोगों की मौत हुई थी। जामिया के वाईस चांसलर मुशीरुल हसन को किताब के बैन की आलोचना के चलते निकाल दिया गया था और इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें बेरहमी से पीटा था।
कश्मीर में भी एक आदमी मारा गया था। यहाँ तक कि 1989 में ईरान के मुल्ला शासक आयतुल्लाह खुमैनी ने लेखक सलमान रुश्दी का सर कलम करने का आदेश दुनिया भर के मुस्लिमों को दिया था। इस किताब को बैन करने का आह्वान तत्कालीन कॉन्ग्रेस सांसद सैयद शहाबुद्दीन और खुर्शीद आलम खान (कॉन्ग्रेस नेता सलमान खुर्शीद के अब्बा) ने भारत में किया था।
शहाबुद्दीन ने किताब के खिलाफ याचिका दायर कर इस पुस्तक को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया था। इसके बाद राजीव गाँधी की सरकार ने 26 सितंबर 1988 को ब्रिटेन में पहली बार पब्लिश इस किताब पर 10 दिनों के भीतर बैन लगा दिया था। भारत इसे बैन करने वाला पहला देश था। इसे मुस्लिम बहुल बांग्लादेश में नवम्बर, 1988 में बैन किया गया था।
किताब के भारत में आयात पर रोक लगाई गई थी। इसके बाद राजीव गाँधी पर मुस्लिम तुष्टिकरण का आरोप लगा था। कॉन्ग्रेस सरकार ने बाद में इसके लेख सलमान रुश्दी के भारत आने पर भी रोक लगा दी थी। यह बैन अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटा दिया था।

कैसे हटा बैन, अब कहाँ मिल रही?

दिल्ली हाई कोर्ट में नवम्बर, 2024 में हुई एक सुनवाई में यह स्पष्ट हुआ था कि इस किताब के आयात पर रोक लगाने वाली अधिसूचना अब मौजूद ही नहीं है। कोर्ट ने तब कहा था, “अब हमारे पास यह मानने के अलावा कोई अन्य विकल्प नहीं है कि ऐसी कोई अधिसूचना मौजूद नहीं है। इसलिए हम इसकी वैधता की जाँच नहीं कर सकते।” इस अधिसूचना को साल 2019 में संदीपन खान नाम के व्यक्ति ने कोर्ट में चुनौती दी थी। उन्होंने न्यायालय को बताया कि वे पुस्तक पर प्रतिबंध होने के कारण इसे आयात नहीं कर पा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि अधिसूचना न तो किसी आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध है और न ही किसी प्राधिकरण के पास उपलब्ध है। संदीपन खान ने RTI के तहत केंद्रीय गृह मंत्रालय से इस संबंध में जवाब भी माँगा था। गृह मंत्रालय ने जवाब में कहा था कि ‘द सैटेनिक वर्सेज’ पर प्रतिबंध लगा है। गृह मंत्रालय ने आदेश के मुताबिक, सीमा शुल्क विभाग से भी याचिका का बचाव करने को कहा गया था। वहीं, केंद्रीय अप्रत्यक्ष कर एवं सीमा शुल्क के अधिकारी प्रतिबंध से संबंधित अधिसूचना कोर्ट में पेश नहीं कर पाए।
इसके बाद कोर्ट ने इसे अस्तित्वहीन मान लिया और खान को यह पुस्तक आयात करने की अनुमति दे दी। पीठ ने कहा, “याचिकाकर्ता उक्त पुस्तक के संबंध में कानून के अनुसार सभी कार्रवाई करने का हकदार होगा।” दिल्ली हाईकोर्ट के इस फैसले के बाद सैटेनिक वर्सेज के आयात पर 36 साल से लगा प्रतिबंध खत्म हो गया है। अब इसे कोई भी आयात कर सकता है। इसके बाद स्पष्ट हो गया था कि अब यह किताब भारत में आ सकती है। यह किताब अब दिल्ली के किताब विक्रेताओं के पास आ गई है। किताब का दाम 1999 रूपए है।

अब मुस्लिम फिर कर रहे विरोध

मुस्लिमों ने इस किताब की भारत में एंट्री को लेकर फिर से विरोध जताया है। जमीयत उलेमा-ए-हिन्द उत्तर प्रदेश के लीगल एडवाइजर मौलाना काब रशीदी ने कहा है कि इस किताब में ईशनिंदा की गई है और इसकी बिक्री मुस्लिमों को भड़काने का प्रयास है। उन्होंने कहा है कि मुस्लिम इसे बर्दाश्त नहीं करेंगे। रशीदी ने इस किताब को दोबारा बैन करने की माँग की है। एक और मौलाना शहाबुद्दीन रिजवी ने कहा है कि कोई भी मुस्लिम इस किताब को दुकानों में देख कर बर्दाश्त नहीं करेगा।

रोहिंग्या पर भिड़े AAP विधायक और प्रोपगेंडा पत्रकार : ‘तालिबानी! सलमान रुश्दी को चाकू मरवाने में तेरा हाथ तो नहीं’

                                                      नरेश बाल्यान और रिफत जावेद (फोटो साभार: फाइल फोटो/इंडिया टीवी)
प्रोपेगंडा पोर्टल ‘जनता का रिपोर्टर’ के संस्थापक रिफत जावेद ने रोहिंग्या मुस्लिमों को लेकर सवाल उठाने पर आम आदमी पार्टी के विधायक (AAP MLA) नरेश बाल्यान पर हमला बोला है। जावेद ने कहा कि आम आदमी पार्टी को वोट देने से बेहतर है कि दिल्ली में मुस्लिम भाजपा को जीतने दें।

जावेद के इस ट्वीट पर दिल्ली के उत्तम नगर से आम आदमी पार्टी के विधायक नरेश बाल्यान उखड़ हो गए जावेद को ‘तालिबानी’ बता दिया। उन्होंने रिफत जावेद से सवाल पूछ लिया कि प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी की हाल में अमेरिका पर हुए हमले में कहीं उनका हाथ तो नहीं।

और तालिबानी? तूम भी लंदन में और सलमान रसदी भी लंदन में, अमरीका में चाकू मरवाने में तुम्हारा तो हाथ नही कहीं?

— Naresh Balyan (@AAPNareshBalyan) August 17, 2022

दरअसल, ये मामला तब शुरू हुआ, जब रिफत जावेद ने बाल्यान के ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट को शेयर करते हुए उन्हें ‘संघी’ बता दिया। इसके साथ ही जावेद ने आम आदमी पार्टी को वोट देने के लिए मुस्लिमों को लताड़ा।

जावेद ने लिखा, “अगले चुनाव आओ। यह संघी मुस्लिमों से वोट माँगेगा, लेकिन इस्लामोफोब (मुस्लिमों से घृणा करने वाला) के इस घृणित ट्वीट को देखिए। दिल्ली के प्यारे मुस्लिमों, आप केजरीवाल के नेतृत्व में नफरत फैलाने वालों की सरकार के ही लायक हैं। आपके लिए कोई सहानुभूति नहीं।”

दरअसल, नरेश बाल्यान ने केंद्र सरकार को घेरने के लिए रोहिंग्या शरणार्थियों पर ट्वीट किए थे। बाल्यान के एक ट्वीट में लिखा है, “बीजेपी के भक्त कश्मीर फाइल्स के पोस्टर ही चिपकाते रह गए। उधर मोदी सरकार ने रोहिंग्या शरणार्थियों को 250 पक्के मकान, राशन और सिक्योरिटी भी दे दिया।” उन्होंने भाजपा पर हमला बोलते हुए पूछा कि इन फ्लैट्स में रहने वाले रोहिंग्या मुस्लिमों के घरों से कचरा कौन उठाएगा। उन्होंने तजिंदरपाल सिंह बग्गा और संबित पात्रा का नाम लेकर कटाक्ष किया।

वहीं, जावेद द्वारा बाल्यान ने एक अन्य ट्वीट में लिखा है, “केजरीवाल जी ने तो कम से कम अपने देश की जनता को रेवड़ी दी। ये भाजपाई तो रोहिंग्या को ही दिल्ली में 148 करोड़ रुपए का 250 फ्लैट कर दिया। कितने बड़े गद्दार हैं भाजपाई?” इसके बाद उन्होंने भाजपा पर सवाल उठाया।

ये दोनों ट्वीट नरेश बाल्यान ने 17 अगस्त को किए। रिफत इन्हीं रोहिंग्या को फ्लैट देने की बात AAP विधायक द्वारा उठाने पर चिढ़ गए। इसी आधार पर उन्होंने मुस्लिमों को कोसते हुए आम आदमी पार्टी को वोट देने के लिए लताड़ा।

रिफत ने एक अन्य ट्वीट में लिखा, “दिल्ली के मेरे मुस्लिम दोस्तों ने अक्सर तर्क दिया कि अगर वे AAP को वोट नहीं देेते तो बीजेपी जीत जाती। मैंने तब उनसे कहा था और अब दोहरा रहा हूँ कि ‘AAP को वोट देने से बेहतर है कि बीजेपी को जीतने दिया जाए’।”

इस पर नरेश बाल्यान ने लिखा, “और तालिबानी? तूम भी लंदन में और सलमान रसदी भी लंदन में। अमरीका में चाकू मरवाने में तुम्हारा तो हाथ नही कहीं?”

आम आदमी पार्टी के नेता रोहिंग्या को लेकर भाजपा पर जो आरोप लगा रहे हैं, उसका केंद्रीय गृह मंत्रालय ने खंडन किया है। बुधवार (17 अगस्त 2022) को गृह मंत्रालय ने कहा कि उसने रोहिंग्या मुस्लिमों को फ्लैट देने का निर्देश नहीं दिया है। मंत्रालय का कहना है कि वापस भेजने तक रोहिंग्या को डिटेंशन सेंटर में ही रखा जाएगा।

ये वही रिफत जावेद हैं, जिन्होंने पिछले साल अक्टूबर में एक किस्सा सुनाया था। अपने किस्से में उन्होंने बताया था कि उनका राजेश नाम का एक दोस्त था, जिसका परिवार उन्हें अपने घर पर नमाज पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता था। जब वे नमाज पढ़ते थे तो वे देवी-देवताओं की मूर्तियों को ढंक देते थे।

रिफत ने बताया था कि वो पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में एक विश्वविद्यालय छात्र हुआ करते थे, तब वो अपने दोस्त राजेश के यहाँ अक्सर पढ़ने जाया करते थे, जिसका घर बड़ा बाजार में था। रिफत जावेद की मानें तो राजेश के दादाजी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का हिस्सा थे।

BBC के साथ 12 वर्षों तक काम कर चुके रिफत जावेद ने आगे लिखा था, “मेरे दोस्त राजेश का परिवार हमेशा मुझे अपने घर पर नमाज पढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता था। इसके लिए वो हिन्दू देवी-देवताओं की तस्वीरें ढक देते थे। अब ये नया भारत मुझे पहचान में ही नहीं आ रहा है।”

हालाँकि, रिफत ने आज तक ऐसी कोई स्टोरी नहीं बताई, जिसमें उन्होंने अपने किसी हिंदू दोस्त को अपने घर पर बुलाया हो और उसे वहाँ पूजा-पाठ करने के लिए प्रेरित किया हो। रिफत एकतरफा लिबर्टी चाहते हैं। शायद यही कारण है कि रोहिंग्या की बात उठाने पर वे नरेश बाल्यान ने खफा हो गए।

जिस ‘The Satanic Verses’ के लिए सलमान रुश्दी पर हमला हुआ उसी किताब की बिक्री में जबरदस्त उछाल

साभार: फ्री प्रेस जर्नल
न्यूयॉर्क में लेखक सलमान रुश्दी (Salman Rushdie) पर हुए जानलेवा हमले के बाद जहाँ कट्टरपंथी जश्न मनाने में जुटे रहे। वहीं दूसरी ओर रुश्दी की किताब ‘द सैटेनिक वर्सेज (The Satanic Verses)’ अमेजन पर तेजी से बिकने लगी। बताया जा रहा है कि रुश्दी की उस किताब को पढ़ने के लिए लोग इतने उत्सुक हैं कि अमेजन पर ये टॉप लिस्ट वाली किताबों में शामिल हो गई है।

कट्टरपंथी रुश्दी पर हमला कर जरूर खुश हो रहे हैं, लेकिन उसी किताब की अब बिक्री अपने उच्चतम स्तर पर पहुँच रही है। ठीक उसी प्रकार जितना नूपुर शर्मा विवाद को जिन्दा रखा जा रहा है, उतनी ही तेजी से सोशल मीडिया पर कुरान, हदीस और शरीयत पर इतनी खुली बहस हो रही, आज तक कभी नहीं देखा गया। परिणाम क्या हो रहा है ये कट्टरपंथी अनजान होने का ड्रामा कर रहे हैं, सोशल मीडिया और News Nation चैनल पर "इस्लाम क्या कहता है" पर बहस हो रही है, कोई मुस्लिम देश तक नहीं बोल रहा। इस्लाम छोड़ चुके मुसलमान ही कुरान, हदीस और शरीयत की आपत्तिजनक आयतों पर मौलानाओं से बहस कर रहे हैं, जिनका जवाब देने की बजाए अपना पसीना पोंछते नज़र आते हैं। पता नहीं कितने मुस्लिम नूपुर हिन्दू नूपुर नहीं, द्वारा जिस प्रकार खुलकर चर्चा हो रही वह इस्लाम के विरुद्ध जा रही है, इस कटु सच्चाई को हर मुसलमान को समझना होगा, जितने भी मौलाना और मौलवी हैं, सभी ने उसी तरह आंखे मुंदी हुई, जिस तरह लेखक अनवर शेख की पुस्तकों पर। यदि तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी द्वारा Calcutta High Court में दर्ज कुरान की 124 आयतों के खिलाफ मुक़दमे में आने वाले निर्णय में हस्तक्षेप नहीं किया होता और तीस हज़ारी कोर्ट द्वारा 24 आयतों के खिलाफ आये निर्णय को ठंठे बस्ते में डालने की बजाए लागु कर दिया होता आज कोई कट्टरपंथी सिर उठाने की हिम्मत नहीं करता।     

द इंडिपेंडेंट की खबर के अनुसार, सलमान रुश्दी का यह उपन्यास 15 अगस्त 2022 को अमेजन के समकालीन साहित्य और कथा वाले चार्ट (Contemporary Literature and Fiction Chart) में सबसे ऊपर रहा। वहीं सेंसरशिप और पॉलिटिक्स वाले चार्ट में भी ये किताब दूसरे स्थान पर थी।

कुल मिलाकर बताएँ तो ई-कॉमर्स साइट पर 15 अगस्त 2022 को ये 18वीं बेस्ट सेलिंग किताब थी। इसके अलावा इस किताब का किंडल ई-बुक वर्जन भी धड़ाधड़ पढ़ा जा रहा है। अमेजन के चाट में किंडल बेस्टसेलर्स में यह किताब 23वें नंबर पर रही।

अमेजन का बेस्टसेलर चार्ट हर घंटे अपडेट होता है। इसी से लोग किताबों की बिक्री का स्पष्ट अंदाजा लगा पाते हैं। लेकिन इसके अलावा जो सामान्य बुकस्टोर वाले हैं वो भी कह रहे हैं कि घटना के बाद लोग सलमान रुश्दी की किताबों को पढ़ रहे हैं। न्यूयॉर्क के स्ट्रैंड बुकस्टोर ने बताया कि उन्होंने रुश्दी की किताबों की बिक्री में अचानक उछाल देखा है।

कट्टरपंथी हमले के बाद लोगों ने न केवल सैटेनिक वर्सेज को पढ़ने में उत्साह दिखाया, बल्कि रुश्दी के अन्य उपन्यास जैसे मिडनाइट चिल्ड्रन आदि भी पढ़ने शुरू किए। जोसेफ एंटोन जैसा उनके संस्मरण , जिसमें उन्होंने बताया था कि कैसे उन्होंने अपने जीवन का एक दशक पुलिस सुरक्षा में गुजारा, वो भी धार्मिक अहिष्णुता और उत्पीड़न सूची (Religious Intolerance And Persecution List) में टॉप 4 पर है।

1988 में लिखी गई थी ‘द सैटेनिक वर्सेज’

उल्लेखनीय है कि सलमान रुश्दी ने द सैटेनिक वर्सेज को 1988 में लिखा था। कथिततौर पर ये किताब पैगंबर मोहम्मद के बारे में थी। इसके बाजार में आने के बाद कट्टरपंथी भड़क गए थे। ईरान के सुप्रीम लीडर अयोतुल्लाह खमनेई ने उनके खिलाफ फतवा जारी किया था और रुश्दी का सिर कलम करके लाने वाले को 3 मिलियन डॉलर ईनाम देने को कहा था। इसके बाद रुश्दी बच-बच कर विदेशों में ही रहे। लेकिन 33 साल बाद जब शुक्रवार को उन पर हमला हुआ तो कट्टरपंथियों खूब जश्न मनाते दिखे। वे लोग यहाँ तक पूछ रहे थे, “कमीना जिंदा है अब तक या मर गया?”

भारत में ‘द सैटेनिक वर्सेज’ की हुई थी रिकॉर्ड बिक्री: आरिफ मोहम्मद खान

इस किताब का विश्व भर के कट्टरपंथियों ने विरोध किया था। भारत में यह सबसे पहले बैन हुई थी। इस संबंध में केरल राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने जानकारी भी दी थी। उन्होंने बताया था कि कैसे भारत ने इस किताब को बैन किया और उसके बाद पाकिस्तान जैसे देशों में इसका विरोध हुआ, लेकिन तीन महीने बाद उन्हें बताया गया कि भारत में किताब बैन के बावजूद एक किताब जब्त नहीं हुई थी, उलटा इसकी रिकॉर्ड बिक्री दर्ज की गई थी।

सलमान रुश्दी की किताब पर सबसे पहले भारत ने ही लगाया था बैन, मुस्लिम तुष्टिकरण में अव्वल थी राजीव गाँधी सरकार: आज तक भड़क रही वो आग


प्रसिद्ध लेखक सलमान रुश्दी पर शुक्रवार (13 अगस्त, 2022) पर न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम से पहले हमला कर दिया गया। हादी मतार नाम के संदिग्ध ने कई बार चाकू मार कर रुश्दी को गंभीर रूप से घायल कर दिया। फरवरी 1989 में ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने उनकी पुस्तक ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को लेकर उनके खिलाफ फतवा जारी किया था। ये भी जानने लायक है कि रुश्दी की किताब को बैन करने वाला पहला देश ईरान, नहीं बल्कि भारत था। अक्टूबर 1988 में सबसे पहले भारत ने इस किताब को बैन कर दिया था।

रुश्दी पर हुए हमले के बाद से एक बार फिर से किताब ‘द सेटेनिक वर्सेज सुर्खियों में आ गई है। यही वो किताब है, जिसके कारण रुश्दी की जान पर 3 दशक से खतरा मँडरा रहा है। ईरान के अयातुल्ला खुमैनी ने 14 फरवरी, 1989 को उनके खिलाफ फतवा जारी किया था। भारत की राजीव गाँधी सरकार ने इसे सबसे पहले बैन कर के अपने ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ वाला रवैया दिखाया।

उस समय के भारत के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने 1985 में शाह बानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलट कर पहले ही जता दिया था कि उनकी सरकार इस्लामी कट्टरपंथियों के सामने झुकी हुई है। उन दिनों यह भी चर्चा थी कि राजीव गाँधी ने Calcutta High Court में दर्ज कुरान की 124 आयतों के विरुद्ध दर्ज मुकदमे में आने वाले निर्णय को बदलने के लिए जज पर दबाव बनाया था। इसके बाद मुस्लिम तुष्टिकरण की मिसाल 31 जुलाई 1986 को दिल्ली की तीस हज़ारी कोर्ट (Z.S. Lohat, Metropolitan Magistrate) द्वारा हौज़ काजी थाने में दर्ज कुरान की 24 आयतों के खिलाफ निर्णय को लागु नहीं होने दिया। वैसे इस निर्णय के विरुद्ध किसी ने कोई अपील भी दर्ज नहीं की गयी, क्योकि कांग्रेस सरकार ही बेदम हुए मौलवियों को ग्लूकोस और ऑक्सीजन देने का काम कर रही थी। लाल कुआँ के दो हिन्दू लड़कों ने दंगों की जड़ इन आयतों के विरुद्ध दिल्ली में पोस्टर लगाकर इन आयतों को बैन करने की अपील नहीं की। इसके बाद ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को बैन करके उन्होंने इस्लामवादियों के सामने अपनी गर्दन फिर झुका ली। 

दिलचस्प बात ये है कि भारत ने कभी भी पुस्तक पर एकमुश्त प्रतिबंध नहीं लगाया, इसकी बजाए, ‘सीमा शुल्क अधिनियम’ के तहत पुस्तक के आयात पर बैन लगाते हुए, वित्त मंत्रालय के माध्यम से किताब को प्रतिबंधित कर दिया गया।

इतना ही नहीं, कांग्रेस सरकार ने रुश्दी के भारत आने पर भी रोक लगा दी। हालाँकि, इस फैसले को 11 साल बाद 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने हटा दिया।

‘द सेटेनिक वर्सेज’ किताब को पहली बार 26 सितंबर, 1988 को ब्रिटेन में प्रकाशित किया गया था। भारत ने इसके आयात पर 10 दिनों के अंदर बैन लगा दिया था। इसके बाद भी किताब की कुछ प्रतियाँ भारत पहुँच चुकी थीं, लेकिन हाल के दिनों में नूपुर शर्मा के समर्थकों का हश्र देखने के बाद हम समझ सकते हैं कि उस समय कोई सामने आकर अपने पास इस किताब की प्रति होने की बात क्यों नहीं स्वीकार रहा था।

इस किताब को बैन करने का आह्वान उस समय कांग्रेस के सांसद सैयद शहाबुद्दीन और खुर्शीद आलम खान (सलमान खुर्शीद के अब्बा) ने किया था। शहाबुद्दीन ने किताब के खिलाफ एक याचिका दायर की थी। याचिका में इस पुस्तक को सार्वजनिक व्यवस्था के लिए खतरा बताया गया था। जिसके बाद इस किताब पर बैन लगा दिया गया था। CNN के फरीद जकारिया के अब्बा रफीक जकारिया भी इस किताब को बैन करने के अभियान में सबसे आगे थे।

राजीव गाँधी जैसे कमजोर प्रधानमंत्री ने वही किया, जो उनसे अपेक्षित था। अपनी पार्टी के मुस्लिम सांसदों के दबाव में आकर उन्होंने किताब पर प्रतिबंध लगा दिया। इससे वो आग लगी, जो आज तक जल रही है। भारत में किताब बैन होने के बाद सूडान, बांग्लादेश, श्रीलंका और दक्षिण अफ्रीका में भी इस किताब पर प्रतिबंध लगा दिया गया।

ब्रिटेन, जहाँ ये किताब पहली बार प्रकाशित हुई थी, वहाँ इसके खिलाफ बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुआ था। किताब की प्रतियों में आग लगा दी गई थी। इसके बावजूद तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर की सरकार ने इस किताब को बैन करने से इनकार कर दिया था। ये विरोध जल्द ही पाकिस्तान और उसके बाद अमेरिका में भी फैला।

जब ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खुमैनी ने देखा कि विश्व स्तर पर इस पुस्तक का जबरदस्त विरोध हो रहा है तो वो भी इस विवाद में कूद पड़े। उन्होंने इसके लेखक और प्रकाशकों के खिलाफ फतवा जारी कर दिया। इसके बाद ईरान ने रुश्दी के सिर पर 6 मिलियन डॉलर (अब के 47.77 करोड़ भारतीय रुपए) के इनाम घोषित कर दिया।

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जब सलमान रुश्दी को गलत बताना था तो ‘नास्तिक’ थे जावेद अख्तर, हमले के बाद मजहबी कट्टरपंथ का जिक्र

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जब सलमान रुश्दी को गलत बताना था तो ‘नास्तिक’ थे जावेद अख्तर, हमले के बाद मजहबी कट्टरपंथ का जिक्र

फतवे का कोई ‘एक्सपायरी डेट’ तो था नहीं, इसलिए वो आज तक मान्य है। हो सकता है कि इस फतवे ने ही हमलावर हादी मतार को रुश्दी पर हमले के लिए प्रेरित किया हो। अक्टूबर 1988 में राजीव गाँधी ने ‘द सेटेनिक वर्सेज’ को बैन करके जो चिंगारी धधकाई थी, वही आज भी असहिष्णुता की आग को भी भड़का रही है।

अब क्या ‘अगला नंबर हैरी पॉटर की लेखिका जेके रॉलिंग का है?

      हैरी पॉटर की लेखिका जेके रॉलिंग (बाएँ) को मीर आसिफ (दाएँ) से मिली कत्ल की धमकी (चित्र साभार-                                                                                                                                              @jk_rowling)
‘हैरी पॉटर’ की लेखिका और स्कॉटलैंड निवासी जेके रॉलिंग को ट्विटर पर जान से मारने की धमकी मिली है। यह धमकी ईरान समर्थक एक कट्टरपंथी द्वारा दिए जाने का दावा किया जा रहा है। धमकी देने वाले का ट्विटर एकाउंट मीर आसिफ़ अज़ीज़ नाम से है। धमकी देने वाला आसिफ़ सलमान रुश्दी को चाकू मारने वाले आरोपित का समर्थन कर रहा था। रॉलिंग को यह धमकी 13 अगस्त 2022 (शनिवार) को दी गई है।

जेके रॉलिंग ने सलमान रुश्दी पर हुए हमले के बाद शुक्रवार को अपने ट्विटर हैंडल पर लिखा, “भयावह खबर, मैं बहुत कमजोर महसूस कर रही हूँ। वो जल्दी ही ठीक हो जाएँ।” इस ट्वीट पर खुद को कार्यकर्ता, छात्र और रिसर्चर लिखने वाले मीर आसिफ़ ने लिखा, “चिंता मत करो। अगला नंबर तुम्हारा है।” आसिफ ने इस से पहले रुश्दी पर हमला करने वाले हाडी मतार को एक ‘शिया क्रांतिकारी’ के तौर पर बताते हुए उसे मृत अयातुल्लाह खुमैनी के फतवा का पालन करने वाला बताया था।

इस धमकी के बाद जेके रॉलिंग ने आरोपित आसिफ के तमाम आपत्तिजनक स्क्रीनशॉट्स को लेकर ट्विटर सपोर्ट (@TwitterSupport) को ट्वीट किया। उन्होंने पूछा कि क्या उनकी तरफ से ऐसे ट्वीट पर कोई सपोर्ट मिल सकता है। उस पर ट्विटर का जवाब था, “हमने आपकी शिकायत की जाँच करके पाया कि उसमें (आसिफ के ट्वीट में) किसी भी प्रकार की कोई भी हिंसक बात नहीं कही गई है।”

ट्विटर के इस फैसले की जेके रॉलिंग के साथ कई अन्य लोगों द्वारा आलोचना की जा रही है। @WilliamGatesKF ने एक स्क्रीनशॉट शेयर करते हुए लिखा, “ट्विटर ने जिस मीर आसिफ के एकाउंट को नहीं बंद किया, उस कायर ने अपना एकाउंट खुद ही डिलीट कर दिया।”

थोड़ी देर बाद जेके रॉलिंग ने एक और ट्वीट करके जानकारी दी कि मामला पुलिस के संज्ञान में आ गया है और वो दी गई धमकियों पर कार्रवाई कर रही है। रॉलिंग ने आरोपित आसिफ का फोटो भी शेयर किया है।

शुक्रवार (12 अगस्त, 2022) को ‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक उपन्यासकार सलमान रुश्दी को न्यूयॉर्क में भाषण देने से पहले पर चाकू से हमला किया गया था। उन्हें 1980 के दशक में ही ईरान से जान से मारने की धमकी मिली थी। रुश्दी पर चाकू से गर्दन पर हमला किया गया था, जिसमें उनकी आँख और लीवर डैमेज हो गए हैं। उनका गंभीर अवस्था में इलाज करवाया जा रहा है। हमलावर को गिरफ्तार कर लिया गया है। रुश्दी पर हुए हमले का देश और दुनिया भर के कट्टरपंथी जश्न मना रहे हैं।

जब सलमान रुश्दी को गलत बताना था तो ‘नास्तिक’ थे जावेद अख्तर, हमले के बाद मजहबी कट्टरपंथ का जिक्र भी भूले

 

                                      जावेद अख्तर ने रुश्दी पर हमले की बचते-बचाते निंदा की
बॉलीवुड वाले पब्लिसिटी के इतने भूखे होते हैं, इस्लाम के खिलाफ कुछ होते ही ऐसे निकल आते हैं, जैसे गोश्त उछालने पर चील कौआ। लेकिन जब हिन्दू देवी-देवताओं के विरुद्ध कुछ होता है, बिल में घुस जाते हैं। न्यूयॉर्क में एक कार्यक्रम के दौरान लेखक सलमान रुश्दी पर चाकुओं से हुए हमले के बाद संगीतकार जावेद अख्तर ने बहुत बचते-बचाते इस हमले की निंदा की है। उन्होंने अपने ट्वीट में न तो उस इस्लामी कट्टरपंथी का नाम लिखा है जिसने भरे मंच पर रुश्दी की गर्दन में चाकू घोंपा और न ही उन धमकियों या फतवों का जिक्र किया है जो रुश्दी के खिलाफ पिछले 30 साल से जारी हो रहे हैं।

जावेद ने बस लिखा, “मैं सलमान रुश्दी पर हुए हमले की निंदा करता हूँ जो कि किसी चरमपंथी द्वारा किया गया। उम्मीद है कि न्यूयॉर्क पुलिस हमलावर के खिलाफ कड़ा एक्शन लेगी।”

2012 में रुश्दी की किताब की निंदा

जावेद का यह रवैया कोई हैरानी वाला नहीं है। साल 2012 में एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू के दौरान वह सलमान की किताब ‘द सैटैनिक वर्सेज’ पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए लेखक को गलत कह चुके हैं।

उन्होंने कहा था, “रुश्दी ने जो किया वह अच्छा नहीं है। मैं नास्तिक हूँ लेकिन जीवन में कुछ मर्यादा और बुनियादी शऊर है। वह इस्लाम के बारे में अपमानजनक बात नहीं कह सकते। उन्होंने एक नोवेल लिखी। कल्पना आधारित। उसमें उन्होंने ऐसे ऐतिहासिक लोगों को लिया जिन्हें अरबों लोगों द्वारा सम्मान दिया जाता है। आपने उनके बारे में अपमानजनक बातें कहीं। आखिर इससे आपको क्या मिलेगा? आप ऐसा क्यों कर रहे हैं। इससे आप उन्हें अधिक मजहबी और कट्टरपंथी बना देंगे।”

जावेद ने कहा, “मैं किसी मजहब को नहीं मानता है फिर भी मुझे लगता है कि वो किताब बेहद अपमानजनक है। आप ऐसा नहीं कर सकते हैं।” ‘राइट टू ऑफेंड’ की बात आने पर वह बोले, “क्या मैं अपने पड़ोसियों के बारे में कुछ भी कह सकता हूँ? क्या मैं कह सकता हूँ वो दलाल है, उसका घर वेश्यालय?”

इस्लाम के खिलाफ बोलने वालों पर गुस्सा जाहिर करने के बाद अपनी सेकुलर व नास्तिक छवि को बनाए रखने के लिए अख्तर ने ये भी कहा था कि उन्हें उनके मजहब की आलोचना से दिक्कत नहीं है, लेकिन वो विद्वत्तापूर्ण किया जाना चाहिए।

सलमान रुश्दी पर हुए हमले के बाद जावेद अख्तर के आए अब के ट्वीट और उनकी पुरानी बयानबाजी जोड़कर देखें तो पता चलता है कि कैसे खुद को नास्तिक और वामपंथी कहने वाले लोग ऐसी घटनाओं के समय आरोपित का नाम छिपाने में आगे रहते हैं और सिर्फ मगरमच्छ के आँसू बहाकर ऐसा दिखाते हैं कि उन्हें हमले का दुख है। जबकि, हकीकत ये होती है कि वो उन घटनाओं को रोकने का कोई प्रयास नहीं करते, बल्कि उसे और बढ़ावा देते हैं।

उधर मौत से जूझ रहे सलमान रुश्दी, इधर भारत के इस्लामी कट्टरपंथियों में जश्न का माहौल

न्यूयॉर्क में सलमान रुश्दी पर हुए हमले के बाद दुनिया भर के बुद्धिजीवी इस घटना पर प्रतिक्रिया दे रहे हैं। इस बीच कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन पर हुए हमले का जश्न मनाना शुरू कर दिया है। वहीं कुछ को दुख है कि उन्होंने अब तक दम क्यों नहीं तोड़ा। 

कट्टरपंथियों द्वारा जश्न मनाने पर इस्लाम को शांति का मजहब बताने वालों ने क्यों चुप्पी साधी हुई है। क्या इसीका नाम शांति है? टीवी पर बोलना बहुत आसान है, लेकिन जमीनी स्तर पर साबित करना लोहे के चने चबाने से कम नहीं। क्या इन लोगों की चुप्पी यह भी साबित करती है कि कट्टरपंथियों को इन सभी का गुप्त समर्थन है? कथनी और करनी में बहुत अंतर होता है। अब इसे दोगलापन नहीं कहा जाये या कुछ और? भारत में जितने भी गंगा-जमुनी तहजीब का राग अलापने वाले और सेकुलरिज्म का पाठ पढ़ाने वाले कुछ बोलेंगे या मुंह में दही जमाकर बैठे रहेंगे? 

सोशल मीडिया पर जगह-जगह ट्वीट देखने को मिल रहे हैं जिनमें कहीं कट्टरपंथी इस हमले का स्वागत कर रहे हैं तो कहीं कह रहे हैं कि ये डर अच्छा है।

बीबीसी पर प्रकाशित एक रिपोर्ट, जिसमें बताया गया था कि सलमान ने रुश्दी ने कहा था कि उनका जीवन सामान्य चल रहा है। उसके नीचे शोएब अली ने लिखा, “हाँ अब जिंदगी डर में चलेगी।” वहीं सोहेल रजा ने कहा, “अभी है? कि…”

सलमान रुश्दी पर हुए हमले के वीडियो के नीचे भी इस्लामी कट्टरपंथियों की रुश्दी के विरुद्ध घृणा देखी जा सकती है। एक यूजर पूछता है, “मरा क्या कमीना?” तो आतिफ असलम नाम का मुस्लिम रुश्दी के जिंदा होने पर लिखता है, “कमीना जिंदा है अब तक।”

इसी तरह शीबा लिखती है, “बढ़िया है! मर जाता तो ठीक था।”

अब्दुल माजिद कहता है, “देर आए दुरुस्त आए”

शाहिद कहता है, “पहले तो ये लोग जानबूझ कर इस्लाम के खिलाफ बोलते है, गलियाँ देते है या अल्लाह और उसके रसूल की शान में गुस्ताखियाँ करते हैं, फिर कुछ होता है तो विक्टिम कार्ड खेलते हैं। ऐसे गुस्ताख लोग अपने ऊपर होने वाली हिंसा के लिए खुद जिम्मेदार है। अगर ये गुस्ताखी न करता तो ऐसा न होता।”

इरफानुल्ला कहता है, “खुदा की लाठी बड़ी बेआवाज होती है।”

रुश्दी पर हुए हमले के बाद वह अस्पताल में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। इस बीच ये हमला देख भारत में जहाँ नुपूर शर्मा को लेकर चिंताएँ बढ़ गई हैं। वहीं बांग्लादेश से भागीं लेखिका तस्लीमा नसरीन भी घबराई हुई हैं। उन्होंने ट्वीट में ध्यान दिलाया है कि कैसे इस्लाम की आलोचना करने वाले 7वीं सदी में भी मारे जाते थे और आज 21वीं सदी पर भी उन पर हमला हो रहा है।

अवलोकन करें:-

जुमे के दिन 32 साल बाद ‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुश्दी पर चाकू से गर्दन पर हमला

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जुमे के दिन 32 साल बाद ‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुश्दी पर चाकू से गर्दन पर हमला

तस्लीमा नसरीन ने आज ट्वीट किया, “इस्लाम के आलोचक पहली दफा 7वीं शताब्दी में मारे गए ते और 21वीं सदी में भी वह मारे जाते हैं। ये लोग तब तक मारे जाते रहेंगे जब तक इस्लाम सुधरता नहीं, उसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अनुमति नहीं मिलती, हिंसा की निंदा नहीं की जाती, कट्टरपंथियों के बनने की जमीं नहीं ध्वस्त होती और कोई किताब पाक मानी जानी बंद नहीं होती। “

जुमे के दिन 32 साल बाद ‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक सलमान रुश्दी पर चाकू से गर्दन पर हमला

'द सैटेनिक वर्सेज' के लेखक सलमान रुश्दी पर जुमे के दिन चाकू से हमला (तस्वीर-AP)
‘द सैटेनिक वर्सेज’ के लेखक उपन्यासकार सलमान रुश्दी को न्यूयॉर्क में भाषण देने से पहले पर चाकू से हमला किया गया है। सलमान रुश्दी को 1980 के दशक में ही ईरान से जान से मारने की धमकी मिली थी, वहीं आज शुक्रवार (12 अगस्त, 2022) को उन पर उस समय हमला किया गया जब वह पश्चिमी न्यूयॉर्क में एक व्याख्यान देने वाले थे।

एसोसिएटेड प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, एक व्यक्ति ने न्यूयॉर्क के चौटाउका (Chautauqua) संस्थान में मंच पर उस समय धावा बोल दिया और जब सलमान रुश्दी स्पीच देने वाले थे। रुश्दी पर चाकू से गर्दन पर हमला किया गया जिससे वह वहीं जमीन पर गिर गए। हमलावर को गिरफ्तार कर लिया गया है। रुश्दी को हेलीकॉप्टर से अस्पताल ले जाया गया है। स्टेट पुलिस ने बताया कि उन्हें हेड इंजरी भी आई है।

न्यूयॉर्क राज्य पुलिस के मेजर यूजीन स्टैनिज़ेव्स्की के अनुसार, हमलावर की पहचान न्यूजर्सी स्थित फेयरव्यू के 24 वर्षीय हादी मतार के रूप में की गई है। हालाँकि, वह किस देश से ताल्लुक रखता है, इसका अभी पता नहीं चला है।

रीटा लैंडमैन नाम की एंडोक्रिनोलॉजिस्ट ने कहा कि रुश्दी के दाहिने गले सहित कई घाव थे और वे खून से लथपथ होकर नीचे गिरे हुए थे। उस महिला डॉक्टर ने कहा कि वे अभी जीवित लग रहे हैं। इसके बाद कुछ लोगो ने उनकी नब्ज देखी और चिल्लाने लगे के यह चल रही है।

घटना के कुछ ही पल में पुलिस पहुँच गई और कुछ देर बाद उन्हें हेलिकॉप्टर से अस्पताल पहुँचाया गया, जहाँ उनके कई ऑपरेशन किए गए। पुलिस FBI और स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर हमलावर के उद्देश्य को जानने की कोशिश कर रही है। पुलिस इस बात की भी जाँच कर रही है कि हमलावर अकेला था या और भी लोग थे उसके साथ।

रुश्दी के एजेंट एंड्रयू वायली के अनुसार, मुंबई में जन्मे लेखक रुश्दी वेंटिलेटर पर हैं और वे बोल नहीं सकते हैं। न्यूयॉर्क टाइम्स को दिए एक बयान में उन्होंने कहा, “खबर अच्छी नहीं है। सलमान की एक आँख खोने की संभावना है। उनकी बाँह की नसें कट गई हैं और उनका लीवर खराब हो गया है।”

रुश्दी की किताब “द सैटेनिक वर्सेज” को ईरान में 1988 से प्रतिबंधित कर दिया गया था, क्योंकि कई मुस्लिम इसे ईशनिंदा मानते हैं। वहीं इस किताब के पब्लिश होने के एक साल बाद, ईरान के दिवंगत नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने एक फ़तवा जारी किया था, जिसमें रुश्दी की मौत की अपील की गई थी। ईरान ने रुश्दी को मारने वाले को 30 लाख डॉलर से अधिक का इनाम देने की भी घोषणा की थी।

ईरान की सरकार ने लंबे समय से चले आ रहे खुमैनी के फरमान से खुद को अलग कर लिया है, लेकिन रुश्दी विरोधी भावना बनी रही। वहीं 2012 में, एक अर्ध-आधिकारिक ईरानी मजहबी फाउंडेशन ने रुश्दी के लिए इनाम को 2.8 मिलियन डॉलर से बढ़ाकर 3.3 मिलियन डॉलर कर दिया था।

हालाँकि रिपोर्ट के अनुसार, यह कहा जाता है कि रुश्दी ने उस समय उस धमकी को खारिज करते हुए कहा था कि इनाम में लोगों की बिलकुल भी दिलचस्पी नहीं है। बता दें कि उस वर्ष, रुश्दी ने फतवे के बारे में एक संस्मरण, ‘जोसेफ एंटोन’ प्रकाशित किया।

मुस्लिमों पर मढ़ा जा सकता है दोष: अमेरिकी इस्लामी संस्था

अमेरिका के सबसे बड़े मुस्लिम नागरिक अधिकार समूह ‘काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस’ के प्रवक्ता इब्राहिम हूपर ने विक्टिम कार्ड खेलना अभी से शुरू कर दिया है। उन्होंने कहा कि उन्हें इस बात की चिंता है कि हमलावर की पहचान सामने आने से पहले ही लोग मुस्लिमों या इस्लाम को छुरा घोंपने के लिए दोषी ठहरा सकते हैं।

उन्होंने कहा, “सभी अमेरिकियों की तरह अमेरिकी मुस्लिम भी समाज में किसी को भी निशाना बनाने वाली हिंसा की निंदा करते हैं।” 14 उपन्यासों के लेखक और 2007 में नाइट की उपाधि से सम्मानित रुश्दी पर हमले को लेकर दुनिया भर में रोष है।

कट्टरपंथियों के निशाने पर थे रुश्दी

मुंबई के एक सफल मुस्लिम व्यवसायी के घर जन्मे रुश्दी ने एक किताब लिखकर दुनिया में सनसनी मचा दी थी। साल 1988 में लिखी गई उनकी पुस्तक ‘द सैटेनिक वर्सेज’ (The Satanic Verses) को लेकर ईरानी क्रांति के नेता अयातुल्ला रूहोल्लाह खुमैनी ने उनकी हत्या के लिए फतवा जारी करते हुए लगभग 28 करोड़ रुपए घोषणा की थी।

इस्लामवादियों का कहना था कि इस पुस्तक में इस्लाम के पैगंबर मुहम्मद का अपमान किया गया है। इसके बाद उन्हें दुनिया भर में कई जगहों से हत्या की धमकी मिली। उनकी किताब को भी कई देशों ने प्रतिबंधित कर दिया। इनमें से एक देश भारत भी है।

केवल एक ही किताब लिखने पर सलमान रुश्दी और तस्लीमा नसरीन पर फतवे आ गए, उनकी पुस्तकें प्रतिबंधित हो गयी, लेकिन एक ऐसा भी चमत्कारी लेखक अनवर शेख है जिसने इस्लाम के खिलाफ एक नहीं बल्कि 7/8 पुस्तकें लिखी, जिसके विरुद्ध फतवा देने एवं उनकी एक भी पुस्तक को प्रतिबंधित करने का साहस कोई नहीं कर पाया। मुस्लिम स्कॉलर्स आदि तक उनके विरुद्ध एक भी लब्ज बोलने की हिम्मत कर पाया। क्यों?

खतरे के देखते हुए अल्लाह में विश्वास नहीं करने वाले रुश्दी इसके बाद भूमिगत हो गए। भारत से वे ब्रिटेन चले गए। वहाँ उन्हें किस प्रकार से सुरक्षा दी गई। रुश्दी सार्वजनिक जीवन साल 1990 के अंत में आए, जब ईरान ने घोषणा की कि वह रुश्दी की हत्या का समर्थन नहीं करता। हालाँकि, उन पर खतरा बरकरार रहा और विवाद के 34 साल बाद उन पर जानलेवा हमला कर दिया गया।