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ट्रंप प्रशासन में 'भारत विरोधी' सदस्य : एक खालिस्तानी, दूसरा पाकिस्तानी की पैदाइश: हरमीत ढिल्लो-उम्मेद मलिक; इनके ‘घुसपैठ’ से ही भारत को आँखें दिखा रहे डोनाल्ड ट्रंप

                  ट्रंप प्रशासन में 'भारत विरोधी' सदस्य ( साभार- Greenwich Economic Forum/CNN)
अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामांकित नहीं करने और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर करवाने के दावों को खारिज करने के बाद भारत-अमेरिकी संबंधों में खटास आ गई है।

रूस-यूक्रेन संघर्ष को ‘मोदी का युद्ध‘ बताना। भारत पर यूक्रेन युद्ध को आर्थिक सहायता देने का आरोप लगाना और रूसी तेल खरीदने पर भारत पर अतिरिक्त 25% (कुल 50%) टैरिफ लगाने का फैसला, भारत- अमेरिकी संबंधों में आई कड़वाहट की वजह बने हैं। जबकि बीजिंग द्वारा उसी तेल की खरीद का बेशर्मी से बचाव करना, ये दिखाता है कि ट्रंप के इरादे ठीक नहीं हैं।

भारत की दृढ़ता और संप्रभुता ने निश्चित रूप से ट्रंप के नाज़ुक अहंकार को चोट पहुँचाई है। हालाँकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उनकी धमकाने वाली चालों के आगे झुकने को तैयार नहीं दिखते। ट्रंप प्रशासन ने भारत-विरोधी लोगों को अपने प्रशासन में शामिल कर रही सही कसर पूरी कर दी है। खालिस्तान समर्थक हरमीत ढिल्लो और आधे पाकिस्तानी उम्मेद मलिक ऐसे ही दो व्यक्ति हैं, जो अमेरिकी राष्ट्रपति के करीबी हैं।

उम्मेद मलिक कौन हैं?

 46 वर्षीय उम्मेद मलिक ईरानी और पाकिस्तानी प्रवासियों के घर पैदा हुए थे। उनका पालन-पोषण न्यू जर्सी में हुआ। द फ्री प्रेस की रिपोर्ट के अनुसार, उनके माता-पिता डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए चंदा जमा करते थे। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति बराक हुसैन ओबामा को दो बार वोट दिया था। डेमोक्रेटिक हिलेरी क्लिंटन को चंदा दिया और न्यू जर्सी के दो डेमोक्रेट्स उम्मीदवारों के लिए काम किया।

‘ब्लैक लाइव्स मैटर’, ‘मी टू’ आंदोलन और दूसरे उदारवादी नीतियों की वजह से मलिक का पार्टी से मोहभंग हो गया। वह रिपब्लिकन के साथ आ गए। आज वह MAGA (मेक अमेरिका ग्रेट अगेन) के कट्टर समर्थक हैं और ट्रंप परिवार के करीबी भी।

डोनाल्ड ट्रंप जूनियर के साथ उनकी दोस्ती ने कथित तौर पर उन्हें ट्रम्प परिवार के वित्तीय मामलों से जोड़ दिया है। दोनों की मुलाकात 2019 की गर्मियों में हैम्पटन्स पार्टी में हुई थी। इसके बाद वे दोनों अक्सर मिलते थे। वह ट्रम्प जूनियर की उस वक्त की प्रेमिका किम्बर्ली गुइलफॉयल को 10 साल से जानते थे।

मलिक ने जो बाइडेन को 2,800 डॉलर देने के एक महीने बाद ही ट्रम्प को 5,600 डॉलर का अपना पहला दान दिया था। वर्तमान राष्ट्रपति के सबसे बड़े बेटे के ‘1789 कैपिटल’ में भी मलिक भागीदार है। इसके अलावा पत्रकार टकर कार्लसन की कंपनी का वह सबसे बड़ा निवेशक है। कार्लसन और मलिक 2015 से दोस्त थे।

अपने इजराइल विरोधी बयानों के लिए कुख्यात मलिक भारत के प्रति पूर्वाग्रह से ग्रसित रहा है। उसने ब्रिटिश साम्राज्य की तारीफ की थी। उन्होंने 2022 में तर्क दिया था, “मजबूत देश कमजोर देशों पर हावी होते हैं। यह चलन नहीं बदला है। जब अंग्रेज भारत से चले गए, तो वे अपने पीछे एक पूरी सभ्यता, एक भाषा, एक कानूनी व्यवस्था, स्कूल, चर्च और सार्वजनिक इमारतें छोड़ गए, जो आज भी उपयोग में हैं।” उसके बयान की जबरदस्त आलोचना हुई थी।

टकर कार्लसन नेटवर्क (टीसीएन) में अहम निवेशक मलिक की कई बार आलोचना भी हुई। लॉरा लूमर ने उन्हें कार्लसन नेटवर्क में इजराइल की आलोचना करने के पीछे का मास्टरमाइंड बताया था। पिछले साल कार्लसन ने एक ऐसे व्यक्ति का साक्षात्कार लिया था जिसने आरोप लगाया था कि एडॉल्फ हिटलर स्वर्ग में है।

बाद में, वही व्यक्ति तस्कर जेफरी एपस्टीन पर हुए एक कार्यक्रम में दिखा। कार्लसन ने उसे ‘संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे अच्छा और सबसे ईमानदार लोकप्रिय इतिहासकार’ बताया। जुलाई में उसने ईरानी राष्ट्रपति का इंटरव्यू लिया। हालाँकि MAGA और इजराइल-ईरान मुद्दे पर इस इंटरव्यू में विवाद हो गया।

मलिक का नाम एक एक्स पोस्ट में नेटवर्क का ‘प्रमुख समर्थक’ बताया गया था। 1789 कैपिटल अब कार्लसन की कंपनी में निवेशक के रूप में शामिल नहीं है।

ट्रंप प्रशासन के साथ उम्मेद मलिक के गहरे संबंध

मलिक काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के सदस्य रहे हैं। मलिक ने एक प्रमुख थिंक टैंक, मिल्केन इंस्टीट्यूट को धन दान किया था। वह इंस्टीट्यूट के बोर्ड में भी थे। यह एक ऐसी गैर लाभकारी विदेश नीति से जुड़ी संस्था है, जिसने कुख्यात जॉर्ज सोरोस सहित उदारवादी हस्तियों के सम्मान में वार्षिक समारोह आयोजित किए हैं।

मलिक ने 2018 में अपना व्यवसाय शुरू करने के लिए बैंक ऑफ अमेरिका छोड़ दिया। मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, बैंक ने उन पर कॉर्पोरेट मानकों की अनदेखी और अनुचित व्यवहार का आरोप लगाते हुए बर्खास्त कर दिया। इसके बाद मलिक ने बैंक ऑफ अमेरिका पर 100 मिलियन डॉलर से अधिक का मुकदमा दायर किया। बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हुआ और मलिक ने उस पैसे से अपनी निवेश कंपनी, फरवाहर पार्टनर्स शुरू की।

मलिक 2021 में फ्लोरिडा पहुँचे और वहाँ रिपब्लिकन से जुड़ गए। वह रूढ़िवादी संगठन रॉकब्रिज नेटवर्क में भी शामिल हो गए। इसकी स्थापना जेडी वेंस और क्रिस बुस्किर्क ने की थी। बुस्किर्क 1789 कैपिटल के सह-संस्थापक और दक्षिणपंथी वेबसाइट अमेरिकन ग्रेटनेस के प्रकाशक थे।

मलिक ने 2023 में बुस्किर्क और रिपब्लिकन मेगाडोनर रेबेका मर्सर के साथ मिलकर ‘1789 कैपिटल’ की स्थापना की। मलिक की कंपनी ने पहला निवेश कार्लसन के नेटवर्क में किया था।

मलिक अब सबसे प्रसिद्ध उद्यमियों में से एक बन गए हैं। वह फ्लोरिडा के पाम बीच स्थित मार-ए-लागो क्लब में काफी समय बिताते हैं। रिपब्लिकन उम्मीदवारों और चैरिटी संस्थाओं को एक बार में हजारों डॉलर के चेक भेजते हैं। स्कॉट बेसेंट को ट्रंप का वित्त मंत्री नियुक्त किए जाने से उन्होंने उनसे मुलाकात की थी। 10 साल पहले बेसेंट को 2015 में पहला ‘हेज फंड’ शुरू करने में उनकी मदद की थी।

बेसेंट ने हाल ही में राहुल गाँधी के अडानी-अंबानी वाले तंज को दोहराते हुए कहा था कि ‘सबसे अमीर भारतीय परिवार’ रूसी तेल से मुनाफा कमा रहे हैं।

मलिक वर्तमान प्रशासन के साथ जुड़े हुए हैं। ट्रंप जूनियर के साथ कई परियोजनाओं पर सहयोग कर रहे हैं। ये परियोजनाएँ लोकतंत्र-विरोधियों को बढ़ावा देने के लिए एक ‘समानांतर अर्थव्यवस्था’ की स्थापना के लिए चलाई जा रही हैं। साथ ही भारत, हिंदुओं और मोदी सरकार के खिलाफ भावना को बढ़ाने के लिए एक क्लब बनाया गया है।

खालिस्तान समर्थक हरमीत ढिल्लो को जानिए

डोनाल्ड ट्रंप ने अपने इस कार्यकाल में भारतीय-अमेरिकी हरमीत कौर ढिल्लन को अमेरिकी न्याय विभाग में नागरिक अधिकारों के लिए सहायक अटॉर्नी जनरल नियुक्त किया। उनका “द ढिल्लन लॉ ग्रुप” नामक एक कानूनी फर्म है। इसके पूरे देश में ऑफिस खुले हुए हैं। हालाँकि, ट्रंप प्रशासन में शामिल होने के बाद उन्हें 2025 में कंपनी छोड़नी पड़ी।

उनके विवादास्पद अतीत और खालिस्तान समर्थक रवैये को देखते हुए उनकी कड़ी आलोचना भी हुई।

ढिल्लो पर बार-बार अमेरिका में खालिस्तानियों का समर्थन करने के आरोप लगे। वह भारत विरोधी गुट की मुखर समर्थक रही हैं। उन्होंने नई दिल्ली पर अमेरिका और कनाडा में मारने के लिए लोगों को भेजने का आरोप लगाया है और यह भी कहा है कि आलोचकों की हत्या में प्रवासी भारतीय भी शामिल हैं।

ढिल्लो ने आरोप लगाया कि खालिस्तानी समर्थकों की हत्या के पीछे मोदी सरकार का हाथ है। उन्होंने दावा किया कि भारतीय अमेरिकी डेमोक्रेट्स ने इन हत्याओं पर अजीब चुप्पी साध ली है। उन्होंने अमेरिकी सरकार से पूछा कि देश के नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने क्या कदम उठाए हैं।

ढिल्लो ने कनाडा में विपक्ष के नेता पियरे पोलीव्रे का भी हवाला दिया, जिन्होंने प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो का समर्थन किया था। ट्रूडो ने हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप भारत पर लगाया था। उन्होंने अमेरिका में खालिस्तानी समर्थकों को ‘सिख नेता’ करार दिया। साथ ही खालिस्तानियों की कट्टरपंथी विचारधारा को कम करके आंका।

ढिल्लो ने भारत में मानवाधिकारों के कथित उल्लंघनों पर रॉयटर्स के एक लेख का भी ज़िक्र किया। उन्होंने कहा कि पंजाब में हाल ही में इंटरनेट पर लगे बैन से लोगों को काफी नुकसान झेलना पड़ा। उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि सिख कार्यकर्ताओं और पत्रकारों को निशाना बनाया गया है। दरअसल उन्होंने उस वक्त की बात की, जब पंजाब में खालिस्तानी प्रचारक और सांसद अमृतपाल सिंह पर कार्रवाई को लेकर झूठा प्रचार किया जा रहा था।

ढिल्लो पहले डेमोक्रेटिक नेता कमला हैरिस की समर्थक थीं। रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने सैन फ्रांसिस्को के जिला अटॉर्नी पद के लिए हैरिस के लिए काम किया था। हालाँकि कार्लसन शो के दौरान उन्हें हैरिस के खिलाफ जातिवादी टिप्पणी की।

ढिल्लो ने कमला हैरिस के उच्चारण पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह दूसरे अक्षर पर जोर देती हैं, जिससे यह कमाला बन जाता है, जबकि भारत में इसे कमला कहा जाता है। ढिल्लन ने कहा, “वह एक उच्च जाति ‘ब्राह्मण’ के परिवार से आती हैं। उनकी माँ एक ब्राह्मण हैं।”

ट्रम्प प्रशासन रूसी तेल खरीद को लेकर भारत पर अपने हास्यास्पद हमलों में भी इस निराधार ब्राह्मण-विशेषाधिकार कथा को जारी रखता है। व्हाइट हाउस के व्यापार सलाहकार पीटर नवारो ने जातिगत राजनीति का सहारा लेने की कोशिश की और ज़ोर देकर कहा कि ब्राह्मण ही इस व्यापार के असली लाभार्थी हैं।

ढिल्लो पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगे। जून 2023 में द गार्जियन में छपी एक खबर में खुलासा हुआ कि उनके नेतृत्व में एक गैर-लाभकारी संस्था में 10 लाख डॉलर से ज्यादा का निवेश किया गया।

रिपोर्ट में खुलासा किया गया है, “द गार्जियन ने पाया है कि सेंटर फॉर अमेरिकन लिबर्टी (CAL) से कम से कम 13.2 लाख डॉलर उनकी लॉ फर्म, ढिल्लो लॉ ग्रुप को हस्तांतरित किए गए हैं। इसके अलावा, राज्य और संघीय दस्तावेजों से पता चलता है कि ढिल्लो दो घंटे के साप्ताहिक कार्य के लिए CAL से 120,000 डॉलर का वेतन लेती हैं।”

हरमीत ढिल्लो का पार्टनर फर्म भी कट्टरपंथी

जॉन-पॉल-देओल ‘द ढिल्लो लॉ ग्रुप’ के पार्टनरों में एक हैं। वह एक ऑनलाइन ट्रोल की तरह काम करता है, जो नियमित रूप से हिंदुओं और हिंदू देवताओं का अपमान करता है। उसने 2023 में ‘द वायर’ के लेख में आतंकवादी जरनैल सिंह भिंडरावाले की निंदा करने वाले एक यूजर्स के पोस्ट पर प्रतिक्रिया स्वरूप भगवान शिव के लिए एक अपमानजनक ट्वीट भेजा था।

हालाँकि ट्वीट को हटा दिया गया, लेकिन उनका इतिहास उन हिंदुओं और सिखों पर हमला करने के लिए जातिवादी और नस्लीय शब्दों का इस्तेमाल करने का रहा है जो उनकी मान्यताओं से सहमत नहीं हैं। वह अक्सर “ब्राह्मणों” को निशाना बनाते हैं, हिंदुओं का “लिंडू” कहकर मजाक उड़ाते हैं और सबसे “पिछड़ी सभ्यता” कहते हैं।

अमेरिका में जाति-विरोधी हिंदू-विरोधी कानून के प्रबल समर्थक देओल ने भी वेदों को जाति से जोड़कर उनका अपमान किया।

दरअसल ट्रंप के आचरण से ज्यादा खतरनाक उनकी सोच है। उन्हें लगता है कि बाकी दुनिया पर अमेरिका का दबदबा है। वह गौतम अडानी और मुकेश अंबानी के मोदी सरकार से संबंधों को लेकर विपक्ष के प्रचार का इस्तेमाल कर रहे हैं। साथ ही जातिगत राजनीति के मुद्दे पर मतदाताओं को भड़का रहे हैं, ताकि नई दिल्ली को अपनी माँगें मनवाने के लिए धमकाया जा सके।

ट्रंप की हताशा और उनके आसपास मौजूद भारत विरोधी लोगों को देखते हुए उनके ‘भारत-विरोध’ को समझा जा सकता है। ‘खालिस्तानी आतंकवाद’ का महिमामंडन भी इसकी कड़ी है।

नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस सांसद राहुल गांधी की यह देश से ‘गद्दारी’ नहीं तो और क्या है?

लगता है जब तक कांग्रेस जहनुम में नहीं जाएगी, राहुल गाँधी अडानी अम्बानी का रोना रोते रहेगा। जिसको विपक्ष नेता की कीमत नहीं मालूम ऐसे सांसद को वोट देने वाले महामूर्ख है। दूसरे मीडिया भी काम दोषी नहीं। जिस तरह सोनिया और राहुल का देश विरोधी ताकतों और संगठनों से रिश्ते हैं अगर यही बीजेपी के होते, सारा मीडिया चील-कौए की तरह चिल्ला रही होती। आज मीडिया ने साबित कर दिया कि 'बिकने को तैयार हूँ, खरीद लो',जनता भी पागलों की कहती फिरती है गोदी मीडिया। आंखें खोलो और देखो मीडिया मोदी मीडिया है या विरोधियों की लाड़ली।     
लोकसभा से लेकर विधानसभाओं में हार-दर-हार झेल रहे कांग्रेस के ‘कर्ताधर्ता’ राहुल गांधी अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए कितने निचले स्तर तक गिर गए हैं! इसका खुलासा विदेशी मीडिया रिपोर्ट और भारत विरोधी संस्थानों के साथ उनसे संबंधों को लेकर हुआ है। राहुल गांधी अभी तक तो विदेशों में जाकर भारत और मोदी सरकार की बुराई करके देश को नीचा दिखाने के कोशिश किया करते थे। लेकिन अब उनपर साफ-साफ देश के साथ ‘गद्दारी’ करने के आरोप लगे हैं। दरअसल राहुल गांधी भारत विरोधी ‘कॉकस’ के त्रिकोण के केंद्र बिंदु बन गए हैं। इसमें एक तरफ संयुक्त राज्य अमेरिका में बैठे जॉर्ज सोरोस और अमेरिका की कुछ एजेंसियों के साथ उनके फाउंडेशन है, त्रिकोण के दूसरी तरफ नीदरलैंड की राजधानी एम्स्टर्डम से संचालित संगठित अपराध और भ्रष्टाचार रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (ओसीसीआरपी) नामक एक समाचार पोर्टल है और त्रिकोण के तीसरे कोने में सबसे महत्वपूर्ण खुद राहुल गांधी हैं। ये मिलकर महान भारत के साथ उच्चतम स्तर की गद्दारी को अंजाम देने की साजिशों में लगे हुए हैं। राहुल गांधी के गुर्गे कहें या मुख्य सलाहकार विजय महाजन और योगेंद्र यादव जैसे कई लोग हैं, जो इन नापाक साजिशों में उनसे साथ जुड़े हैं।

पीएम मोदी का तीसरा कार्यकाल और भारत की बढ़ती ताकत हजम नहीं हो रही
दरअसल प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लगातार तीसरी बार सत्ता में आना राहुल एंड कंपनी को हजम नहीं हो रहा है। उनके गले यह भी नहीं उतर रहा है कि पिछले एक दशक में भारत दुनिया में तेजी से एक शक्ति के तौर पर स्थापित हो रहा है। देश ने हर क्षेत्र में अपने प्रदर्शन में सुधारे हैं। पीएम मोदी के दूरदर्शी विजन से भारत की बढ़ती आर्थिक और सामरिक ताकत को रोकने के लिए समय-समय पर विदेशी साजिश होती रही है। देश की अर्थव्यवस्था को अस्थिर करने लिए विदेशी एजेंसी और संगठन सक्रिय रहे हैं। जॉर्ज सोरोस (George soros) जैसे लोगों की मदद से भारत की आर्थिक ताकत को कमजोर करने के लिए कई फर्जी और भ्रमित करने वाले रिपोर्ट जारी किए जाते हैं। अब इसका खुलासा हो रहा है कि राहुल गांधी भी सोरोस जैसे भारत विरोधी साजिशकर्ताओं और ओसीसीआरपी जैसे संगठनों के लिए टूल का काम कर रहे हैं। इतना ही नहीं इस संगठन की फर्जी रिपोर्टों के आधार पर राहुल गांधी देश में प्रेस कॉंन्फ्रेंस कर मोदी सरकार को घेरने की असफल कोशिशें करते हैं।

जॉर्ज सोरोस का भारत के विरोध से ये है कनेक्शन
• मीडिया पार्ट की रिपोर्ट के मुताबिक OCCRP की फंडिंग का बड़ा हिस्सा ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से आता है। यह फाउंडेशन भारत विरोध के लिए कांग्रेस को फंडिंग करता है।
• ओपन सोसाइटी फाउंडेशन जॉर्ज सोरोस का है. ऐसे में OCCRP को करीब 70 पर्सेंट फंड सोरोस से आता है।
• अमेरिकी अरबपति जॉर्ज सोरोस अपनी भारत और मोदी विरोधी बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं।

नीदरलैंड की OCCRP, भारत विरोधी जॉर्ज सोरेस और राहुल का कनेक्शन
इस तरह की एक साजिश का खुलासा एक फ्रेंच पब्लिकेशन ने किया है। उसने अपनी खोजी रिपोर्ट के आधार पर बताया है कि ऑर्गेनाइज्ड क्राईम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) किस तरह से भारत विरोधी गतिविधियों में संलग्न है। इस रिपोर्ट में दावा किया गया है कि OCCRP को अमेरिका से फॉरेन फंडिंग मिलती है और इसका सीधा कनेक्शन भारत विरोधी अमेरिकी अरबपति कारोबारी जॉर्ज सोरोस के साथ है। OCCRP की स्थापना पत्रकार ड्रू सुलिवन और पॉल राडू ने 2006-07 में की थी। सुलिवन सेंटर फॉर इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग (CIR) के संपादक के रूप में कार्यरत थे और राडू ने शुरुआती रोमानियाई केंद्र के साथ काम किया था।

अवलोकन करें:-

जॉर्ज सोरोस से लिंक पर घिरीं सोनिया गाँधी, जिस फाउंडेशन की को-चेयरपर्सन वह ‘आजाद कश्मीर’ की पैर

क्या है OCCRP और कैसे, किसकी फंडिंग से करता है काम
• कहने के लिए तो आर्गनाइज्ड क्राइम ऐंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट पर काम करता है।
• OCCRP का दावा है कि दुनिया भर में उसके पास पत्रकारों का नेटवर्क है, जो उसके लिए मनचाहा काम करते हैं।
• OCCRP खुद को स्वतंत्र संगठन बताता है, लेकिन वह चलता कैसे है, इसको लेकर वह विवादों में रहा है।
• यह सर्वविदित है कि अमेरिकी सरकार और अमेरिकी एजेंसियों से उसे भारी फंड मिलता है। अब इसको लेकर वह सवालों के घेरे में है।
• फ्रेंच अखबार मीडिया पार्ट ने 2 दिसंबर को एक खोजी आर्टिकल में संगठन की पोल खोली है।
• इस आर्टिकल में OCCRP के बारे में कहा गया है कि उसके और अमेरिकी एजेंसियों के बीच गुप्त संबंध हैं। OCCRP के नीति नियंता अमेरिकी एजेंसियों के इशारे पर चलते हैं।
• फ्रांसीसी अखबार ने खुलासा किया कि अमेरिकी सरकार ने OCCRP को ‘वेनेजुएला में भ्रष्टाचार का खुलासा करने और उससे लड़ने’ के लिए 1,73,324 डॉलर दिए। वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो की अमेरिकी सरकार से दुश्मनी जगजाहिर है।

ओसीसीआरपी में भारत की वैक्सीन के खिलाफ लेख, राहुल ने की प्रेस कांफ्रेंस
कांग्रेस सांसद राहुल गांधी किस तरह जॉर्ज सोरोस और ओसीसीआरपी के आदेश का पालन करते हैं, इसके एक नहीं कई उदाहरण हैं। मिसाल के तौर पर “जुलाई 2021 में, जब कोविड का प्रभाव विश्व स्तर पर देखा जा रहा था, तब ओसीसीआरपी ने एक लेख प्रकाशित किया कि ब्राजील ने भारत के कोवैक्सिन कोविड-19 वैक्सीन के लिए 324 मिलियन डॉलर के अनुबंध से हाथ खींच लिया। भारत उस समय कई देशों को वैक्सीन दे रहा था। इस तरह की रिपोर्ट भारत और उसकी वैक्सीन की इमेज खराब करने की अंतर्राष्ट्रीय साजिश का हिस्सा थी। दिलचस्प तथ्य यह है कि ब्राजील में वैक्सीन रद्द होने की बात एक महीने से अधिक समय से सार्वजनिक होने के बावजूद OCCRP ने जुलाई, 2021 को अपनी रिपोर्ट प्रकाशित की और अगले ही दिन राहुल गांधी ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की। दरअसल, ओसीसीआरपी आदेश देती है और राहुल गांधी उसका पालन करते हैं।” इस रिपोर्ट के तुरंत बाद और इसे आधार बनाते हुए राहुल और कांग्रेस पार्टी ने भारत सरकार के साथ-साथ वैक्सीन पर भी हमला बोला था।

OCCRP के माध्यम से राहुल गांधी और जॉर्ज सोरोस को कठपुतली

यहां इस बात का प्रमाण दिया गया है कि यह विदेशी समर्थित नेटवर्क किस प्रकार भारत के हितों को कमजोर कर रहा है। कड़ी से कड़ी जोड़ने पर साफ पता चलता है कि राहुल गांधी कैसे देश के खिलाफ विदेशी साजिशकर्ताओं के हाथ की कठपुतली बने हुए हैं। यह स्पष्ट पैटर्न दिखाता है कि कैसे राहुल गांधी न केवल राष्ट्रीय हितों को खतरे में डाल रहे हैं, बल्कि उन ताकतों के साथ भी सहयोग कर रहे हैं जो अपने राजनीतिक लाभ के लिए भारत की संप्रभुता को अस्थिर करना चाहते हैं। राहुल के विदेशी कनेक्शन के कुछ उदाहरण…

  • सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन द्वारा भारी वित्त पोषित OCCRP, विश्व स्तर पर भारत विरोधी कहानियों को आगे बढ़ाता है।
  • सोरोस फाउंडेशन के वीपी सलिल शेट्टी ने राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में हिस्सा लिया था। इस पर राहुल के विदेशी संबंधों पर सवाल भी उठे थे।
  • ओसीसीआरपी से सीधे संबंध रखने वाले एक प्रमुख कांग्रेस फंडराइज़र, आनंद मैग्नाले ने शारजील इमाम (दिल्ली दंगों के आरोपी) को चीनी फंड दिया।
  • राहुल गांधी की बार-बार की जाने वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस आसानी से भारत पर हमला करने वाली ओसीसीआरपी की रिपोर्टों के अनुरूप हो जाती हैं।
  • पेगासस स्पाइवेयर: OCCRP 18 जुलाई, 2021 को प्रकाशित हुआ, राहुल 19 जुलाई को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस की।
  • नेशनल हेराल्ड: ओसीसीआरपी ने वैध जांच को खारिज कर दिया, राहुल को निर्दोष बताया और भारत की न्यायिक प्रक्रियाओं को कमजोर किया।
  • राहुल गांधी ओसीसीआरपी के भारत विरोधी एजेंडे का समर्थन करना जारी रखते हैं, जिससे भारत की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंच रहा है।
सोरोस-OCCRP की दोस्ती पर फ्रेंच अखबार ने रिपोर्ट में किया खुलासा
फ्रेंच मीडिया पार्ट की एक हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि अरबपति सोरोस ने डू सुलिवन द्वारा स्थापित ओसीसीआरपी को वित्त पोषित किया। “2023 में OCCRP पत्रकारों को भेजे गए एक ईमेल में, सुलिवन ने स्वीकार किया कि यह “ज्यादातर सच” था कि उनके एनजीओ ने अमेरिका के खिलाफ स्टोरी नहीं बनाई। क्योंकि इसके सभी बजट का भुगतान वाशिंगटन और जॉर्ज सोरोस द्वारा स्थापित ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन द्वारा किया गया था। ड्रू सुलिवन (OCCRP के को-फाउंडर) ने लिखा: ‘जॉन (गोएट्स, जर्मन टेलीविजन NDR के रिपोर्टर) यह प्रचार कर रहे हैं कि OCCRP के किसी कर्मचारी या सदस्य ने उन्हें बताया कि OCCRP अमेरिका पर स्टोरी नहीं करता। यह आपकी राय है और ठीक है और शुरुआत के वर्षों में यह ज्यादातर सही था। क्योंकि हम अमेरिकी सरकार या सोरोस के पैसे का इस्तेमाल अमेरिका पर स्टोरीज के लिए नहीं कर सकते थे।
हिंडनबर्ग की रिपोर्ट पर संसद में सुधांशु त्रिवेदी ने उठाए सवाल
भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता और सांसद सुधांशु त्रिवेदी ने कहा कि पिछले 3 साल में संसद का सत्र शुरू होते ही भारत के सामरिक, आर्थिक और सामाजिक हित के खिलाफ रिपोर्ट जारी की जाती रही है। संबित पात्रा ने गुरुवार को विपक्ष के नेता राहुल गांधी को “उच्चतम दर्जे का गद्दार” बताते हुए विपक्ष पर तीखा हमला बोला। हिंडनबर्ग की भ्रामक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए बीजेपी सांसद ने कहा कि 22 जुलाई से 9 अगस्त के बीच संसद का मानसून सत्र हुआ और 10 अगस्त को हिडनबर्ग की रिपोर्ट आई। 25 नवंबर से वर्तमान सत्र शुरू हुआ और 20 नवंबर को एक अमेरिकी कोर्ट में अटॉर्नी की रिपोर्ट जारी हुई। क्या यह एक महज संयोग है? बीजेपी सांसद ने कहा कि 20 जुलाई 2023 को संसद का सत्र की शुरुआत होने वाली थी और 19 जुलाई को मणिपुर का वीडियो सामने आया। क्या यह सब महज एक संयोग ही था। बीजेपी सांसद ने एक के बाद कई रिपोर्ट का जिक्र कर भारत को अस्थिर करने की साजिश का जिक्र किया।
सुधांशु त्रिवेदी ने पूछा यह संयोग है या प्रयोग?
बीजेपी सांसद ने कहा कि किसानों को लेकर रिपोर्ट आयी 3 फरवरी 2021 को और बजट सत्र की शुरुआत हुई थी 29 जनवरी 2021 से।
• पेगासस रिपोर्ट आती है 18 जुलाई 2021 को और मानसून की शुरुआत होती है 19 जुलाई 2021 से।
• 31 जनवरी 2023 से भारत का बजट सत्र शुरू होता है और 24 जनवरी 2023 को हिडंनबर्ग की रिपोर्ट सामने आयी।
• जनवरी 2023 में संसद के सत्र की शुरुआत होती है और 17 जनवरी 2023 को बीबीसी की तरफ से डॉक्यूमेंट्री लायी जाती है।
• 20 जुलाई 2023 को भारत के सांसद का सत्र शुरू होता है और मणिपुर हिंसा का वीडियो 19 जुलाई को सामने आता है। सत्र शुरू होने के ठीक एक दिन पहले।
• 10 मई 2024 को कोविड वैक्सीन को लेकर एक रिपोर्ट छपती है. जिस समय भारत में आम चुनाव हो रहे होते हैं।
• वर्तमान सत्र 25 नवंबर से शुरू होता है और 20 नवंबर को अमेरिकन कोर्ट के अटॉर्नी की भारत के एक बिजनेस हाउस के संदर्भ में रिपोर्ट आती है।
देश तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं ‘देशद्रोही’ राहुल गांधी- पात्रा
कांग्रेस पार्टी लगातार संसद में अडानी के मुद्दे को लेकर अवरोध डालने में लगी हुई है। इसी बीच बीजेपी के प्रवक्ता संबित पात्रा ने भी राहुल गांधी पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा है कि आप सब देख रहे हैं कि संसद में क्या हो रहा है। देश की अर्थव्यवस्था को खराब करने की कोशिश की जा रही है। भारत के शोयर मार्कट को टारगेट किया जा रहा है। भारत के उघोगपति को टारगेट किया जा रहा है। कुछ ताकतें भारत को तोड़ने की कोशिश में लगी हुई है। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी संसद के सदस्य है। एलओपी राहुल गांधी देशदोही हैं। जॉर्ज सोरोस ओपेन सोसाइटी को फंडिंग करते है। ये देश के खिलाफ प्रोपगेंडा फैलाते हैं। यह मुद्दा गंभीर हैं। देश की एकता और संप्रभुता का मुद्दा है। कुछ ताकतें भारत को तोड़ना चाहती हैं। फ्रेंच न्यूज पेपर मीडिया ने इसका खुलासा किया है। राहुल गांधी भी जॉर्ज सोरोस से मिलें हुए हैं।
उपरोक्त फोटो में दिखाई दे रहा शख्स कांग्रेस राजनीति में सबसे शक्तिशाली लोगों में से एक है। लेकिन इसको बहुत कम लोग जानते हैं कि वह कौन है! इस इन्वेस्टिगेटिव थ्रेड में बहुत बड़ा खुलासा होने वाला है। इसका नाम विजय महाजन है।
यह राहुल गांधी का मुख्य सलाहकार और गांधी परिवार के निजी एनजीओ राजीव गांधी फाउंडेशन का सीईओ है। यह राहुल गांधी की मेकओवर पीआर यात्रा भारत जोड़ो यात्रा के पीछे का मास्टरमाइंड भी है। योगेन्द्र यादव इसका दाहिना हाथ है।
किसानों के विरोध प्रदर्शन की सत्ता परिवर्तन योजना के पीछे योगेन्द्र यादव और विजय महाजन भी हैं। आज भारत जोड़ो अभियान के महासचिव नदीम खान का फेसबुक पोस्ट पढ़िए, जो उसने बांग्लादेश में यूनुस के सत्ता परिवर्तन के बाद पोस्ट किया था।
जी हां, ये वही नदीम खान है, जिसको दो दिन पहले दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार किया था और इस्लामवादी और कम्युनिस्ट उसको मानवाधिकार रक्षक बताकर उसका समर्थन कर रहे हैं। वह इस्लामवादी और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम के साथ बहुत करीबी से काम करता है।
विजय महाजन और मोहम्मद यूनुस पर वापस आते हैं। वे दोनों फोर्ड फाउंडेशन के उत्पाद हैं। जब विजय महाजन के ‘फोर्ड भाई’ मोहम्मद यूनुस को बांग्लादेश में कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा, तो विजय महाजन और फोर्ड फाउंडेशन के पूर्व ट्रस्टी नारायण मूर्ति ने उनका समर्थन करने के लिए एक पत्र पर हस्ताक्षर किए।
दिलचस्प बात यह है कि विजय महाजन और डॉ. जी.के. जयराम (इन्फोसिस के पहले अध्यक्ष) ने अप्रैल 2010 में कांग्रेस नेतृत्व के लिए एक प्रशिक्षण संस्थान, जवाहरलाल नेहरू लीडरशिप इंस्टीट्यूट (जेएनएलआई) शुरू किया था।
आईपीएसएमएफ, जो जुबैर से लेकर आरफा और द कारवां से लेकर आर्टिकल 14 तक को फंड करता है, इंफोसिस के मालिक और उसके दोस्तों द्वारा फंड किया जाता है। इसमें सबसे दिलचस्प बात यह है कि रुक्मिणी बनर्जी, आईपीएसएमएफ के संस्थापक ट्रस्टियों में से एक, विजय महाजन के फोर्ड-वित्त पोषित एनजीओ की उपाध्यक्ष भी हैं!
1982 में, फोर्ड फाउंडेशन के एक अधिकारी दीप जोशी ने एक अन्य सह-संस्थापक, विजय महाजन के साथ एक प्रशिक्षण एनजीओ, PRADAN की सह-स्थापना की थी। उन्हें सीआईए-संबद्ध फोर्ड फाउंडेशन और अन्य अमेरिकी कंपनियों द्वारा अपने एनजीओ के माध्यम से लगातार वित्त पोषित किया जाता है। बता दें कि इस वित्त पोषण की रकम करोड़ों में है!
विजय महाजन ने एक और कंपनी, BASIX की स्थापना की। काबिलेगौर तथ्य यह है कि यह न केवल फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित है, बल्कि इसके साथ भागीदार भी है।
विजय महाजन जैसे लोग किसानों को भड़काते हैं, लेकिन छिपाते हैं कि वे बायर जैसी विदेशी एग्रोकेमिकल कंपनियों के लिए काम करते हैं। विजय महाजन और योगेन्द्र यादव बहुत करीब से काम करते हैं और उनका दावा है कि वे अपने एनजीओ के माध्यम से किसानों के लिए काम करते हैं। लेकिन क्या किसानों को पता है कि कृषि रसायन और बीज की दिग्गज कंपनी मोनसेंटो भी विजय महाजन के एनजीओ को फंड देती है?
विजय महाजन के बच्चे स्विट्जरलैंड जैसे देशों में अपनी जिंदगी का आनंद लेते हैं, लेकिन वे आम किसानों को मरने के लिए सड़क पर फेंक देते हैं।फोर्ड फाउंडेशन अपने मनोवैज्ञानिक युद्ध को चलाने और अपने व्यावसायिक लाभों के लिए सीआईए की शाखा है।
यहाँ CIA का एक टॉप-सीक्रेट दस्तावेज लीक हुआ है। इसके मुताबिक, बीजेपी 2010 से ही अमेरिकी खुफिया एजेंसी की निगरानी में है। बड़ा सवाल उठता है कि कांग्रेस या अन्य राजनीतिक दल क्यो नहीं! जबकि उस समय तो भारत में कांग्रेस गठबंधन ही सत्ता में था। यदि आप इसकी और गहरे से पड़ताल करेंगे तो पाएंगे कि विजय महाजन के माध्यम से सीआईए-संबद्ध फोर्ड फाउंडेशन गांधी परिवार, उसके एनजीओ और कांग्रेस नेताओं के लिए उसके प्रशिक्षण केंद्र का प्रबंधन करता है।
इतना ही नहीं, वामपंथियों और इस्लामवादियों के पूरे शीर्ष नेतृत्व का प्रबंधन भी फोर्ड फाउंडेशन से जुड़े लोगों के एक ही समूह द्वारा किया जाता है। यह अकाट्य सत्य है कि कम्युनिस्टों और इस्लामवादियों के कैडरों को भी यह नहीं पता है कि फोर्ड फाउंडेशन अपने नेताओं को कैसे प्रबंधित करता है।फ्रांसीसी मीडिया ने आज ही उजागर किया है कि कैसे अमेरिका के डीट स्टेट ने मोदी सरकार और अडानी के खिलाफ ओसीसीआरपी को वित्त पोषित किया और हथियार बनाया। इनमें भी आपको वही नाम मिलेंगे, जैसे द फोर्ड फाउंडेशन, रॉकफेलर फाउंडेशन और ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, जो विजय महाजन के एनजीओ को भी फंड देते हैं!

राजीव गांधी फाउंडेशन की तरह पियरे ट्रूडो फाउंडेशन को चीन ने की भारी फंडिंग

चीन ने दान दे-देकर पाकिस्तान, श्रीलंका और नेपाल को बर्बाद करने के बाद कनाडा को बर्बाद करने कमर कस चुका है। भारत में इसका उदाहरण कांग्रेस पार्टी है, राजीव गाँधी फाउंडेशन को फण्ड देने के बाद जिस तरह राहुल गाँधी चीन की बोली बोल कांग्रेस को तबाही के रास्ते निकले हुए हैं। चीन से और देशों को मिलने वाला दान तो सामने आ रहे हैं, लेकिन राजीव गाँधी फाउंडेशन को मिला दान आज तक सामने नहीं आ पाया। जिसका परिवार को छोड़ कांग्रेस के किसी नेता को भी नहीं मालूम होगा।  
कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो भारत पर बेबुनियाद आरोप लगाकर घिर गए हैं। अब उनके स्वर बदलने लगे हैं। पहले उन्होंने कनाडा की संसद में कहा कि भारत के खिलाफ Credible Allegations है। वहीं अब वह कह रहे हैं कि भारत के खिलाफ Credible Reasons हैं। जस्टिन ट्रूडो के बयान के बाद भारत ने भी साफ कर दिया था कि उनके बयान motivated हैं। भारत ने साफ शब्दों में कहा था- कनाडा में हिंसा के किसी भी काम में भारत सरकार की भागीदारी के आरोप बेतुके और प्रेरित हैं। कनाडा के पास तो सबूत नहीं हैं लेकिन भारत ने पिछले वर्षों में खालिस्तानी आतंकवादी से जुड़े कई दस्तावेज कनाडा को सौंपे हैं जिस पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। वहीं ट्रूडो के बयान का सच सामने आया है। दरअसल भारत विरोधी ताकतों ने भारत को अस्थिर करने और विकास की रफ्तार को रोकने के लिए यह चाल चली है और ट्रूडो को मोहरा बनाया है।

चीन ने दिया पियरे ट्रूडो फाउंडेशन को 2 लाख डॉलर दान
जस्टिन ट्रूडो के पिता के नाम पर बने पियरे इलियट ट्रूडो फाउंडेशन को 2016 में चीन से 200,000 डॉलर दान दिया गया था। मीडिया रिपोर्ट में कहा गया कि चीन के एक व्यवसायी झांग बिन ने 2016 में प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के पिता के नाम पर बने फाउंडेशन को 200,000 डॉलर दान करने का वादा किया था। बाद में यह उजागर हुआ कि झांग बिन चीनी सरकार से जुड़ा व्यक्ति है। कनाडा में यह विवाद बढ़ने के बाद फाउंडेशन ने कहा था कि उसे 140,000 का दान मिला है जिसे वह वापस कर देगा। यह विवाद इतना बढ़ा कि फाउंडेशन के सभी बोर्ड आफ डायरेक्टर ने इस्तीफा दे दिया। क्या यही वजह है कि जस्टिन ट्रूडो ने चीन के कहने पर भारत को बदनाम की सुपारी ली है।

राजीव गांधी फाउंडेशन को भी मिला था चीन का चंदा
भारत में भी शिक्षा और टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के सपने को पूरा करने के लिए 21 जून 1991 को सोनिया गांधी ने राजीव गांधी फाउंडेशन की शुरुआत की थी। 2005 से 2007 के बीच राजीव गांधी फाउंडेशन को चीन से 1 करोड़ 35 लाख रुपए चंदा में मिले थे। फांउडेशन की एनुअल रिपोर्ट के आधार पर यह दावा किया गया। 2005-06 की एनुअल रिपोर्ट में फाउंडेशन को डोनेशन देने वालों की लिस्ट में चीन का भी नाम है। क्या यही वजह है कि राहुल गांधी भी चीन का अहसान जताने के लिए चीन की प्रशंसा करते रहते हैं और भारत को नीचा दिखाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ते।

शह और मात के खेल में ट्रूडो शतरंज के प्यादे
शह और मात के इस खेल में ट्रूडो महज शतरंज के प्यादे हैं। ट्रूडो के भारत पर आरोप लगाने से कुछ दिन पहले पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई के साथ खालिस्तानी आतंकवादियों की कनाडा में मीटिंग हुई थी। वहीं चीन ने राजीव गांधी फाउंडेशन की तरह ही जस्टिन ट्रूडो के पिता के नाम पर बनाए गए पियरे ट्रूडो फाउंडेशन को भारी फंडिंग की है। जस्टिन ट्रूडो को चुनाव जिताने में भी चीन का हाथ रहा है। यानि ये सारा बखेड़ा 2024 चुनाव को लेकर हो रहा है। ये उन विदेशी ताकतों की चाल है तो भारत को आगे बढ़ता नहीं देखना चाहते और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने का सपना देख रहे हैं।

भारत के तेज विकास से विदेशी ताकतें चिंता में
भारत ने जिस तरह से बेहद सफल जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की उससे विदेशी ताकतें अचंभित हैं और अपने लिए भारत को खतरा समझने लगी हैं। इसीलिए भारत की प्रतिष्ठा को झटका देने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे जा रहे हैं। ऐसे समय में जब मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की ओर है और दुनियाभर की कंपनियां भारत में अपने आफिस खोल रही हैं, इससे विदेशी ताकतें विचलित हैं। भारत को बदनाम करने से सबसे ज्यादा फायदा उसके प्रतिद्वंद्वी चीन को है।

इस विवाद से चीन को सबसे ज्यादा फायदा
कनाडा के अखबार नेशनल पोस्ट ने दावा किया है कि दोनों देशों के तनाव के बीच चीन एक ऐसा देश है जिसे सबसे ज्यादा इसका फायदा मिल सकता है। अखबार के मुताबिक, बीते एक साल से अधिक समय से ट्रूडो कनाडाई चुनावों में चीन के सत्ताधारी दल चाइनीज कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) द्वारा विदेशी हस्तक्षेप को लेकर बचाव की मुद्रा में हैं। अब तक वह इस मामले में कोई ठोस जवाब नहीं दे सके हैं। ऐसे में यह विवाद उनकी चीन के साथ संदिग्ध साझेदारी को उजागर करता है।

ट्रूडो पर चीन से सांठगांठ के आरोप
खुफिया दस्तावेजों के जरिए कनाडाई अखबार ग्लोब एन्ड मेल ने दावा किया था कि चीनी राजनयिक 2021 में ट्रूडो की लिबरल पार्टी को दोबारा सत्ता में लाने के लिए काम कर रहे थे। इसके साथ ही चीन कंजर्वेटिव उम्मीदवारों को हराने के लिए काम कर रह था, जिन्हें वह अपने प्रति मित्रवत नहीं मानता था। कहा तो यहां तक जाता है कि चीन ने कनाडा में 2021 ही नहीं 2019 के चुनावों में भी जस्टिन ट्रूडो को जीतने में मदद की थी।

चीन से सांठगांठ पर ट्रूडो ने दिया गोलमोल जवाब
चीन के साथ इस तरह की सांठगांठ पर जस्टिन ट्रूडो अब तक कोई ठोस जवाब नहीं दे पाए हैं। उन्होंने दावा किया कि कनाडा की राष्ट्रीय खुफिया एजेंसी से लीक हुए दस्तावेजों में कई अशुद्धियां हैं। यहां दिलचस्प तो यह था कि ट्रूडो ने यह नहीं बताया कि वास्तव में क्या गलत था। उस समय ट्रूडो ने बस इतना कहा कि यह मुद्दा उन्हें बहुत चिंतित करता है और एजेंसियां इससे निपटेंगी।

पाकिस्तान आग में घी डाल रहा है
कनाडा में हो रहे भारत विरोधी प्रदर्शनों में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई का हाथ होने की बात सामने आ रही है। आईएसआई कनाडा में होने वाले इस तरह के प्रदर्शनों के लिए बैनर-पोस्टर तैयार कर रही है। इस तरह के प्रदर्शनों के लिए बसों का भी इंतजाम आईएसआई की ओर से किया जा रहा है। यहां तक कि कनाडा में रह रहे पाकिस्तान मूल के लोगों को पहचान छुपाकर प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए कहा जा रहा है। इसके साथ ही कई खालिस्तानी आंतकियों की आईएसआई द्वारा आर्थिक मदद की खबरें भी अक्सर आती रहती हैं।

कनाडा में आईएसआई और खालिस्तानी आतंकवादी के बीच हुई बैठक
हालिया विवाद के बाद हिन्दुओं को कनाडा छोड़ने की धमकी देने वाले गुरपतवंत सिंह पन्नू और आईएसआई के बीच बैठक होने की भी खबरें हैं। जस्टिन ट्रूडो के भारत के खिलाफ बयान देने के कुछ दिन पहले ही ISI के एजेंट्स ने कनाडा में खालिस्तानी आतंकियों के साथ एक गुप्त बैठक की थी। यह बैठक कनाडा के वैंकूवर में हुई। बैठक में गुरपतवंत सिंह पन्नू के साथ दूसरे खालिस्तानी संगठनों के प्रमुख भी मौजूद थे।

कनाडा में खालिस्तानी और पाक ISI का प्लान-K
जानकारी के मुताबिक इस वक्त कनाडा में 20 से ज्यादा खालिस्तानी और गैंगस्टर छुपे हुये हैं। जिसको लेकर NIA और देश की दूसरी एजेंसियों ने कई बार कनाडा को MLATs (MUTUAL LEGAL ASSISTANCE TREATIES) भेजा पर कनाडा की जांच एजेंसी ने कोई जवाब दिया और न ही कोई जांच में सहयोग किया।

ट्रूडो की चाल हुई नाकाम, फायदा की जगह हुआ नुकसान
भारत-कनाडा विवाद से प्रधानमंत्री ट्रूडो को भी तात्कालिक फायदा हुआ है। गर्मियों में सर्वे के बाद उनकी पार्टी कंजर्वेटिव पार्टी से पीछे थी। ट्रूडो ने संसद में बयान देकर एजेंडा बदल दिया और आम लोगों की जरूरत से जुड़े मुद्दों पर घिरी ट्रूडो सरकार ने सारी चर्चा दूसरी ओर मोड़ दी। जबकि विपक्ष मुद्रास्फीति और आवासन के मुद्दे पर विरोध की योजना बना रहा था। हालांकि यह विवाद जिस तरह से आगे बढ़ा उसकी कल्पना शायद ट्रूडो ने भी नहीं की होगी। और अब ट्रूडो की अपने ही देश में किरकिरी हो रही है।

कनाडा की इंडो-पैसिफिक रणनीति प्रभावित
यह संकट कनाडा की इंडो-पैसिफिक रणनीति को भी प्रभावित करता है, जिसकी शुरुआत नवंबर 2022 में हुई थी। इसमें चीनी नीतियों की आलोचना की गई थी और भारत के साथ मजबूत संबंध बनाने की मांग की गई थी। हालांकि, ताजा विवाद से कनाडा की यह नीति ठंडी पड़ गई।

ब्रिटिश कोलंबिया के प्रीमियर ने भी कहा- भारत की संलिप्तता के सबूत नहीं
खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को 18 जून 2023 को कनाडा के प्रांत ब्रिटिश कोलंबिया के सरी स्थित गुरुनानक सिख गुरुद्वारा के पास दो अज्ञात बंदूकधारियों ने गोली मार दी। निज्जर खालिस्तान टाइगर फोर्स का प्रमुख था और भारत में एक घोषित आतंकवादी था। उसी ब्रिटिश कोलंबिया प्रांत के प्रीमियर डेविड एबी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि हरदीप निज्जर की हत्या में भारत की संलिप्तता के संबंध में उन्हें जो जानकारी दी गई है, वह सभी ‘ओपन सोर्स जानकारी’ है, जो इंटरनेट पर उपलब्ध है। इससे साफ होता है कि कनाडा के पास कोई सबूत नहीं है और जस्टिन ट्रूडो ने भारत को बदनाम करने के लिए भारत पर आरोप लगा दिया।

पेंटागन के पूर्व अधिकारी ने कहा- अमेरिका दो दोस्तों में भारत को चुनेगा
कनाडा के आरोपों पर, पेंटागन के पूर्व अधिकारी और अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के सीनियर फेलो माइकल रुबिन कहते हैं, “…मूर्ख मत बनाइए, हरदीप सिंह निज्जर केवल एक प्लंबर नहीं थे, जिस तरह ओसामा बिन लादेन को भी एक कंस्ट्रक्शन इंजीनियर कहा जा रहा था। कई हमलों में उसका हाथ खून से सना था। हम अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के बारे में बात कर रहे हैं और संयुक्त राज्य अमेरिका ने कासिम सुलेमानी के साथ क्या किया और संयुक्त राज्य अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के साथ क्या किया। वास्तव में भारत पर जो आरोप लगाया गया है ये मामले उससे अलग नहीं हैं।” उन्होंने ये भी कहा कि अगर अमेरिका को दो दोस्तों में से किसी एक को चुनना हो तो वह भारत को चुनेगा।

मोदी सरकार के कनाडा पर सख्त फैसले की 5 प्रमुख वजह

 हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बेबुनियाद आरोप

कनाडाई पीएम ने सबसे बड़ी गलती तो ये कर दी कि उन्होंने बिना कोई सबूत पेश किए भारत पर हरदीप सिंह निज्जर की हत्या के बेबुनियाद आरोप गढ़ दिए। उनसे पूरी दुनिया ने बार-बार सबूतों की मांग की, लेकिन वो बात को टालते रहे। अंत में उन्होंने सबूत पेश करने से इनकार भी कर दिया। इससे ये तो साफ हो गया कि ट्रूडो अपनी बेबसी और राजनीतिक करियर की नाकामी का ठीकड़ा किसी और के सिर पर फोड़ना चाहते हैं, लेकिन वो भूल गए कि वो जिस भारत की ओर आंख उठाकर देख रहे हैं, वो आज ग्लोबल लीडरशिप की कमान संभालने की रेस में टॉप उम्मीदवारों में अपना नाम लिखवा चुका है।

बिना सोचे भारत के राजनयिक को निकाला
ट्रूडो ने दूसरी सबसे बड़ी गलती ये कर दी कि उसने बिना सोचे समझे भारत के राजनयिक को निष्कासित कर दिया। बिना सबूतों के आधार पर लिए गए इस फैसले का भारत ने भी करारा जवाब दिया और सीनियर कनाडाई राजदूत को निष्कासित करते हुए उन्हें 5 दिनों के अंदर देश छोड़ने का आदेश भी सुना दिया।

कनाडा खालिस्तानी आतंकियों का बना पनाहगाह
ट्रूडो ने अपने पिता पियरे ट्रूडो की तरह एक बार फिर दुनिया को दिखा दिया कि कनाडा आधिकारिक रूप से खालिस्तानी आतंकियों का पनाहगाह है। उनके पिता ने भी साल 1982 में खालिस्तानी आतंकी तलविंदर सिंह परमार को भारत को सौंपने से इनकार कर दिया था। परमार खालिस्तानी आतंकी संगठन बब्बर खालसा का मुखिया था। बाद में साल 1985 में संगठन ने आयरलैंड के तट पर कनिष्क नामक एयर इंडिया के विमान पर बीच आसमान में बमबारी की थी। इस हमले में कुल 329 लोग मारे गए, जिनमें से 268 कनाडाई नागरिक थे।

खालिस्तानी आतंकियों के प्रत्यर्पण की अपील पर सहयोग नहीं
जस्टिन ट्रूडो ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर को सौंपने से इनकार कर दिया था। इसके बाद जब उसकी गैंगवॉर के कारण हत्या हुई तो ट्रूडो उसका भी आरोप भारत के सिर पर मढ़ने की कोशिश करने लगे। ऐसा ही उनके पिता ने भी परमार के मामले में किया था। बॉम्बिंग के बाद परमार को आरोपी तो बनाया गया, लेकिन सबूतों के अभाव में उसे रिहा भी कर दिया गया। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स के हवाले से जानकारी मिली थी कि जिस वक्त परमार जेल से छूटा था, उस वक्त जस्टिन ट्रूडो ने सत्ता संभाल ली थी। इससे ये साफ हो गया था कि ये भी खालिस्तानियों को बचाने के अपने पिता की विरासत को आगे ले जाना चाहते हैं।

खालिस्तानी आतंकियों के पीछे पाकिस्तान
पंजाब का 62 प्रतिशत हिस्सा पाकिस्तान में है, लेकिन ट्रूडो खालिस्तानी आतंकियों के लिए पाकिस्तान पर आरोप नहीं लगा रहे हैं। इसका मतलब उन्हें पहले से पता है कि पाकिस्तान भी उनकी तरह खालिस्तानी आतंकियों का पनाहगाह है। साल 1992 में जब परमार मारा गया था तो वो भी पाकिस्तान के रास्ते से ही पंजाब में दाखिल हुआ था।