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पंजाब में AAP राज में 6 पेपर लीक: भगवंत मान के झूठ और कुशासन की खुली पोल

पंजाब में ‘बदलाव’ का रंगीन सपना दिखाकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी (आप) की सरकार के साढ़े चार साल के कार्यकाल में राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर आ चुकी है। दिल्ली वाले अपने राजनीतिक आका अरविंद केजरीवाल के नक्शेकदम पर चलते हुए मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भी जनता को गुमराह करने और सफेद झूठ बोलने में महारत हासिल कर ली है। साढ़े चार साल में छह से अधिक बड़े पेपर लीक होने, संगठित परीक्षा माफिया के हावी होने और हाई कोर्ट की करारी फटकार के बावजूद सीएम भगवंत मान का यह दावा करना कि ‘पंजाब में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ’, न केवल हास्यास्पद है बल्कि पंजाब के लाखों मेहनती, योग्य और राष्ट्रभक्त युवाओं के भविष्य पर सीधा प्रहार है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पंजाब की जनता के साथ मुस्तैदी से खड़ी है और मान सरकार की इस नाकामी, झूठ की राजनीति तथा शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस के इस्तीफे की मांग को लेकर निर्णायक संग्राम लड़ रही है।

दिल्ली मॉडल का असली चेहरा: झूठ और छलावे पर टिकी आप सरकार
अरविंद केजरीवाल की तर्ज पर भगवंत मान ने भी पंजाब में भ्रम और झूठ की राजनीति को अपना मुख्य हथियार बना लिया है। जिस प्रकार दिल्ली में झूठे वादों का महल खड़ा किया गया, ठीक वही छलावा अब पंजाब की जनता के साथ किया जा रहा है। प्रशासनिक अनुभवहीनता और दृष्टि के अभाव में आम आदमी पार्टी ने पंजाब को पूरी तरह प्रशासनिक अराजकता में ढकेल दिया है।

मुख्यमंत्री का गैर-जिम्मेदाराना बयान: सफेद झूठ की पराकाष्ठा
26 जुलाई 2026 को दिए अपने बयान में मुख्यमंत्री भगवंत मान ने ढिंडोरा पीटा कि उनके साढ़े चार साल के शासन में राज्य में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। जब पूरा पंजाब परीक्षा घोटालों की आग में झुलस रहा है, तब मुख्यमंत्री का यह बयान केवल एक राजनीतिक दांव-पेच नहीं, बल्कि अपनी असफलताओं को छिपाने का एक ढीठ और गैर-जिम्मेदाराना प्रयास है।

कानून बनाने के बजाय इनकार की मुद्रा:  टालमटोल वाला रवैया
जब देश के अन्य राज्य और केंद्र की मोदी सरकार पेपर लीक रोकने के लिए सख्त से सख्त कानून बना रही है, तब पंजाब के मुख्यमंत्री यह स्वीकार करने को ही तैयार नहीं हैं कि समस्या मौजूद है। भगवंत मान को पंजाब की जनता को जवाब देना चाहिए कि वे माफिया पर नकेल कसने के लिए कड़ा कानून बनाने से पीछे क्यों हट रहे हैं?

नैतिक जवाबदेही से भागते शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस 
जब भी शासन-प्रशासन की साख पर धब्बा लगता है, तो नैतिक जवाबदेही तय होना पहला कदम होता है। लेकिन पंजाब के शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस कुर्सी से चिपके हुए हैं। एक के बाद एक 6 बड़े पेपर लीक होने के बावजूद शिक्षा मंत्री का चुप्पी साधे रखना और पद न छोड़ना यह साबित करता है कि आप सरकार में नैतिकता का पूरी तरह लोप हो चुका है।

अरविंद केजरीवाल के सफेद झूठ और ढोंग का पर्दाफाश
आम आदमी पार्टी के संयोजक अरविंद केजरीवाल, जो अन्य राज्यों में शिक्षा क्रांति की डींगें हांकते नहीं थकते, पंजाब के पेपर लीक मामले पर पूरी तरह बेनकाब हो चुके हैं। केजरीवाल खुद सार्वजनिक मंचों से यह झूठा दावा कर रहे थे कि ‘आज पंजाब शिक्षा के क्षेत्र में नंबर 1 पर है’ और आप सरकार के कार्यकाल में एक भी पेपर लीक नहीं हुआ। उन्होंने घोटालों पर लीपापोती करते हुए धोखाधड़ी की इतनी गंभीर घटनाओं को महज ‘डिजिटल पेन से नकल की छिटपुट कोशिश’ बताकर टालने का प्रयास किया। एक तरफ केजरीवाल केंद्र सरकार और अन्य राज्यों से इस्तीफे मांगते घूमते हैं, वहीं दूसरी तरफ पंजाब में साढ़े चार साल में 6 बड़े पेपर लीक होने के बावजूद अपने ही मुख्यमंत्री भगवंत मान और शिक्षा मंत्री हरजोत बैंस का बचाव कर रहे हैं। केजरीवाल का यह दोहरा चरित्र और झूठा प्रचार साबित करता है कि उन्हें पंजाब के युवाओं के भविष्य से कोई सरोकार नहीं है, बल्कि वे केवल अपनी पार्टी की धूमिल होती साख को बचाने में लगे हैं।

पहला पेपर लीक: पंजाब फार्मेसी भर्ती परीक्षा में हाई-टेक धांधली
19 जुलाई 2026 को बाबा फरीद यूनिवर्सिटी ऑफ हेल्थ साइंसेस (BFUHS) द्वारा आयोजित 454 फार्मेसी ऑफिसरों की भर्ती परीक्षा विवादों के घेरे में आ गई। परीक्षा शुरू होने के महज 15 मिनट बाद ही हाई-टेक डिवाइसेज से पर्चा बाहर पहुंच गया और 7,000 अभ्यर्थियों की मेहनत पर पानी फिर गया।

पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट का चाबुक: फार्मेसी भर्ती पर स्टे
फार्मेसी भर्ती परीक्षा में हुई धांधली इतनी उजागर हुई कि मामला हाई कोर्ट पहुंच गया। केशव कंबोज और अन्य अभ्यर्थियों की याचिका पर सुनवाई करते हुए पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने भर्ती प्रक्रिया पर अंतरिम रोक (स्टे) लगा दी है। कोर्ट के इस कड़े कदम ने मुख्यमंत्री के उस खोखले दावे की पोल खोल दी कि पंजाब में सब निष्पक्ष हो रहा है।

ब्लूटूथ पेन और गैंग का साम्राज्य: मान सरकार में प्रशासनिक विफलता
मुख्यमंत्री भले ही इसे सिर्फ एक साधारण ‘ब्लूटूथ चीटिंग’ बताकर पल्ला झाड़ने की कोशिश करें, लेकिन 35 अभ्यर्थियों का पकड़ा जाना और 11 सदस्यीय बाहरी गैंग की गिरफ्तारी यह साबित करती है कि पंजाब में परीक्षा माफिया का तंत्र कितना मजबूत हो चुका है।

दूसरा पेपर लीक: नायब तहसीलदार भर्ती परीक्षा घोटाला
आप सरकार के शुरुआती दौर में ही नायब तहसीलदार परीक्षा में ब्लूटूथ और इलेक्ट्रॉनिक्स गैजेट्स के माध्यम से नकल कराने का बड़ा मामला सामने आया था। इसमें जमकर धांधली हुई, जिससे पूरे राज्य की प्रशासनिक चयन प्रक्रिया पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग गया।

तीसरा पेपर लीक: पंजाब पुलिस सब-इंस्पेक्टर (SI) भर्ती धांधली


पंजाब के युवाओं का सपना पुलिस बल में शामिल होकर देश और राज्य की सेवा करना होता है। लेकिन आप सरकार ने पुलिस सब-इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा को भी घोटाले की भेंट चढ़ा दिया, जिससे आक्रोशित अभ्यर्थियों को सड़कों पर उतरने के लिए विवश होना पड़ा।

चौथा पेपर लीक: पटवारी और राजस्व विभाग परीक्षा में अनियमितताएं
राजस्व विभाग में पटवारी पदों के लिए हुई परीक्षा में भी पर्चा लीक होने और आंसर-शीट में हेरफेर की शिकायतें आईं। पारदर्शी व्यवस्था का ढोंग रचने वाली आप सरकार के राज में परीक्षा केंद्रों की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह ध्वस्त पाई गई।

पांचवां पेपर लीक: असिस्टेंट प्रोफेसर एवं लेक्चरर भर्ती घोटाला
उच्च शिक्षा क्षेत्र को भी भगवंत मान सरकार के कुप्रबंधन ने नहीं बख्शा। असिस्टेंट प्रोफेसरों की भर्ती में प्रश्नपत्र लीक होने और चहेतों को लाभ पहुंचाने के गंभीर आरोप लगे, जिसने पंजाब के शैक्षणिक स्तर और मेधावी युवाओं के भरोसे को करारा झटका दिया।

छठा पेपर लीक: पशुपालन और अन्य तकनीकी विभागों की भर्ती परीक्षाएं
पशुपालन विभाग एवं अन्य प्राविधिक (तकनीकी) पदों की भर्ती परीक्षाओं में भी पर्चा समय से पहले लीक हुआ और संगठित गिरोहों ने इसे हल किया। साढ़े चार साल में 6 भर्ती परीक्षाओं में सेंधमारी सरकार की असफलता का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

मनीष सिसोदिया का उलटा पड़ा दांव: केजरीवाल और मान के वादे की खुली हवा
आप नेता मनीष सिसोदिया ने खुद बयान दिया था कि अगर पंजाब में एक भी पेपर लीक होता है तो अरविंद केजरीवाल और भगवंत मान खुद पंजाब के शिक्षा मंत्री का इस्तीफा ले लेंगे। लेकिन आज लगातार 6 पेपर लीक होने और छात्रों के सड़कों पर उतरने के बावजूद न तो केजरीवाल ने इस्तीफा मांगा और न ही भगवंत मान ने कोई कदम उठाया। सिसोदिया का यह दावा अब आम आदमी पार्टी के दोहरे रवैये और राजनीतिक पाखंड का सबसे बड़ा सबूत बन गया है। 

‘कट्टर ईमानदार’ होने का जुमला
खुद को ‘कट्टर ईमानदार’ बताने वाली आम आदमी पार्टी के शासन में लगातार 6 पेपर लीक होना यह सिद्ध करता है कि ईमानदारी का यह नारा केवल वोटों की ठगी के लिए गढ़ा गया एक राजनीतिक जुमला था।

दिल्ली : मिलावटी और घटिया दारू… वो भी महँगी: AAP वाली केजरीवाल सरकार ने ‘1 पर 1 फ्री’ पिलाकर लूटा

                                                                                                                                      साभार: HT
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार (25 फरवरी) को अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार के खिलाफ CAG रिपोर्ट को सदन में पेश किया। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि AAP सरकार की शराब नीति में कई गड़बड़ियाँ थीं। इसमें ना ही मूल्यों को तय किया गया और ना ही शराब की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया। इन गड़बड़ियों के कारण सरकार को 2002.68 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि आबकारी विभाग राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कर राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है। इस विभाग से कुल राजस्व का अकेले 14 प्रतिशत कर के रूप में हासिल होता है। इतना बड़ा स्रोत होने के बावजूद AAP सरकार ने इसमें भारी गड़बड़ी की। इसमें लाइसेंस का उल्लंघन, पारदर्शिता की कमी, कमजोर निगरानी आदि शामिल हैं।

शराब के मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की कमी

भाजपा सरकार द्वारा सदन में पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखपरीक्षक (CAG) के मुताबिक, आबकारी विभाग ने एल1 लाइसेंसधारी (निर्माता और थोक विक्रेता) को एक निश्चित स्तर से अधिक कीमत वाली शराब के लिए अपनी EDP कीमत घोषित करने का अनुमति दी। इसके बाद निर्माण के बाद सभी मूल्य घटकों को जोड़ा गया, जिसमें निर्माता का लाभ भी शामिल था।

इसमें CAG ने एक ही शराब निर्माता द्वारा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग EDP (एक्स-डिस्टिलरी मूल्य) पर शराब की आपूर्ति पाई गई है। इतना ही नहीं, खुद EDP घोषित करने की अनुमति ने शराब निर्माताओं और थोक विक्रेताओं को शराब की कीमतों में अपने फायदे के लिए हेरफेर करने की अनुमति दी। इससे शराब की बिक्री में गिरावट आई और सरकार को भारी नुकसान हुआ।

दरअसल, शराब के उचित मूल्य के निर्धारण के लिए भी निर्माताओं से लागत विवरण नहीं माँगा गया था। इसलिए एल1 लाइसेंसधारी को बढ़ी हुई EDP में छिपे मुनाफे से मुआवजा मिलने का जोखिम था। CAG का कहना है कि आबकारी विभाग को मूल्य के निर्धारण को विनियमित करना चाहिए, ताकि मूल्य के कारण बिक्री पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करके उत्पाद शुल्क राजस्व को अनुकूलित किया जा सके।

गुणवत्ता निर्धारण में भारी कमी

दिल्ली में शराब की गुणवत्ता का निर्धारण भी आबकारी विभाग ही करता है। मौजूदा नियमों में प्रावधान है कि थोक लाइसेंसधारियों (एल1) के लिए लाइसेंस जारी करते समय भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के प्रावधानों के अनुसार विभिन्न परीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाता है। आबकारी आयुक्त ने इसके लिए अलग से गुणवत्ता निर्देश नहीं दिए हैं।

CAG ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि ऐसे अनेक मामले पाए गए, जिसमें परीक्षण रिपोर्ट BIS के मानकों के अनुरूप नहीं थे। AAP सरकार में आबकारी विभाग ने बड़ी कमियों के बावजूद लाइसेंस जारी किए थे। विभिन्न ब्रांडों के लिए जल की गुणवत्ता, हानिकारक तत्व, भारी धातुओं, मिथाइल अल्कोहल, सूक्ष्मजीव परीक्षण रिपोर्ट आदि प्रस्तुत ही नहीं किए गए।

इसके अलावा, कुछ लाइसेंसधारियों द्वारा दिए गए परीक्षण रिपोर्ट राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (NABL) से मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से नहीं थीं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) अधिनियम की दिशान-निर्देशों के अनुसार NABL की रिपोर्ट जमा करना जरूरी है। नमूना जाँच रिपोर्ट की जाँच के दौरान अपर्याप्त परीक्षण प्रमाण-पत्र भी पाए गए।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक में रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी शराब से संबंधित 51 प्रतिशत मामलों में नमूना जाँच रिपोर्टों उपलब्ध नहीं कराई गईं। अगर रिपोर्ट दी भी गईं तो परीक्षण रिपोर्ट एक वर्ष से या उससे अधिक पुरानी थीं या फिर उस रिपोर्ट में तारीख का उल्लेख ही नहीं किया गय था। इस तरह ये पूरा मामला ही संदिग्ध बन जाता है।