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दिल्ली : मिलावटी और घटिया दारू… वो भी महँगी: AAP वाली केजरीवाल सरकार ने ‘1 पर 1 फ्री’ पिलाकर लूटा

                                                                                                                                      साभार: HT
दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने मंगलवार (25 फरवरी) को अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (AAP) की सरकार के खिलाफ CAG रिपोर्ट को सदन में पेश किया। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि AAP सरकार की शराब नीति में कई गड़बड़ियाँ थीं। इसमें ना ही मूल्यों को तय किया गया और ना ही शराब की गुणवत्ता पर ध्यान दिया गया। इन गड़बड़ियों के कारण सरकार को 2002.68 करोड़ रुपए का नुकसान हुआ।

CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि आबकारी विभाग राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली के कर राजस्व का एक प्रमुख स्रोत है। इस विभाग से कुल राजस्व का अकेले 14 प्रतिशत कर के रूप में हासिल होता है। इतना बड़ा स्रोत होने के बावजूद AAP सरकार ने इसमें भारी गड़बड़ी की। इसमें लाइसेंस का उल्लंघन, पारदर्शिता की कमी, कमजोर निगरानी आदि शामिल हैं।

शराब के मूल्य निर्धारण में पारदर्शिता की कमी

भाजपा सरकार द्वारा सदन में पेश की गई नियंत्रक एवं महालेखपरीक्षक (CAG) के मुताबिक, आबकारी विभाग ने एल1 लाइसेंसधारी (निर्माता और थोक विक्रेता) को एक निश्चित स्तर से अधिक कीमत वाली शराब के लिए अपनी EDP कीमत घोषित करने का अनुमति दी। इसके बाद निर्माण के बाद सभी मूल्य घटकों को जोड़ा गया, जिसमें निर्माता का लाभ भी शामिल था।

इसमें CAG ने एक ही शराब निर्माता द्वारा विभिन्न राज्यों में अलग-अलग EDP (एक्स-डिस्टिलरी मूल्य) पर शराब की आपूर्ति पाई गई है। इतना ही नहीं, खुद EDP घोषित करने की अनुमति ने शराब निर्माताओं और थोक विक्रेताओं को शराब की कीमतों में अपने फायदे के लिए हेरफेर करने की अनुमति दी। इससे शराब की बिक्री में गिरावट आई और सरकार को भारी नुकसान हुआ।

दरअसल, शराब के उचित मूल्य के निर्धारण के लिए भी निर्माताओं से लागत विवरण नहीं माँगा गया था। इसलिए एल1 लाइसेंसधारी को बढ़ी हुई EDP में छिपे मुनाफे से मुआवजा मिलने का जोखिम था। CAG का कहना है कि आबकारी विभाग को मूल्य के निर्धारण को विनियमित करना चाहिए, ताकि मूल्य के कारण बिक्री पर पड़ने वाले प्रभाव का विश्लेषण करके उत्पाद शुल्क राजस्व को अनुकूलित किया जा सके।

गुणवत्ता निर्धारण में भारी कमी

दिल्ली में शराब की गुणवत्ता का निर्धारण भी आबकारी विभाग ही करता है। मौजूदा नियमों में प्रावधान है कि थोक लाइसेंसधारियों (एल1) के लिए लाइसेंस जारी करते समय भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के प्रावधानों के अनुसार विभिन्न परीक्षण रिपोर्ट प्रस्तुत करना अनिवार्य बनाता है। आबकारी आयुक्त ने इसके लिए अलग से गुणवत्ता निर्देश नहीं दिए हैं।

CAG ने अपनी रिपोर्ट में पाया कि ऐसे अनेक मामले पाए गए, जिसमें परीक्षण रिपोर्ट BIS के मानकों के अनुरूप नहीं थे। AAP सरकार में आबकारी विभाग ने बड़ी कमियों के बावजूद लाइसेंस जारी किए थे। विभिन्न ब्रांडों के लिए जल की गुणवत्ता, हानिकारक तत्व, भारी धातुओं, मिथाइल अल्कोहल, सूक्ष्मजीव परीक्षण रिपोर्ट आदि प्रस्तुत ही नहीं किए गए।

इसके अलावा, कुछ लाइसेंसधारियों द्वारा दिए गए परीक्षण रिपोर्ट राष्ट्रीय परीक्षण एवं अंशांकन प्रयोगशाला प्रत्यायन बोर्ड (NABL) से मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला से नहीं थीं। भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) अधिनियम की दिशान-निर्देशों के अनुसार NABL की रिपोर्ट जमा करना जरूरी है। नमूना जाँच रिपोर्ट की जाँच के दौरान अपर्याप्त परीक्षण प्रमाण-पत्र भी पाए गए।

नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक में रिपोर्ट में कहा गया है कि विदेशी शराब से संबंधित 51 प्रतिशत मामलों में नमूना जाँच रिपोर्टों उपलब्ध नहीं कराई गईं। अगर रिपोर्ट दी भी गईं तो परीक्षण रिपोर्ट एक वर्ष से या उससे अधिक पुरानी थीं या फिर उस रिपोर्ट में तारीख का उल्लेख ही नहीं किया गय था। इस तरह ये पूरा मामला ही संदिग्ध बन जाता है।

300% महँगी खरीदी गई PPE किट, कोविड में जिस केरल मॉडल का ‘लिबरल’ करते थे बखान, उसका CAG ने किया भंडाफोड़: खास कंपनी को पहुँचाया गया फायदा

  केरल में पीपीई किटों की खरीदी में जमकर भ्रष्टाचार, तत्कालीन मंत्री केके शैलजा (फोटो साभार: India Today/TOI)
कोरोना महामारी के दौरान पूरे देश में केरल सरकार के ‘केरल मॉडल’ की खूब तारीफ की गई। केरल की तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की कार्यशैली को ‘लिबरल गैंग’ ने आदर्श माना। लेकिन अब नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने पिनराई विजयन सरकार के कोविड प्रबंधन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि महामारी के दौरान पर्सनल प्रोटेक्टिव इक्विपमेंट (PPE) किट की खरीदारी में बड़े पैमाने पर अनियमितताएँ हुईं और एक खास कंपनी को फायदा पहुँचाया गया।

CAG की रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2020 में सरकार ने केरल मेडिकल सर्विसेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (KMSCL) को PPE किट और अन्य स्वास्थ्य उपकरण खरीदने की विशेष अनुमति दी थी। सरकार ने उस समय PPE किट की अधिकतम दर 545 रूपए प्रति किट निर्धारित की थी, ताकि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण रखा जा सके। इसके बावजूद केरल में PPE किट को 1,550 रूपए प्रति किट की ऊँची दर पर खरीदा गया। यह दर सरकारी सीमा से लगभग 300% अधिक थी।

रिपोर्ट में दावा किया गया है कि इस खरीद प्रक्रिया में सन फार्मा (San Farma) नाम की कंपनी को विशेष लाभ दिया गया। इस कंपनी को 100% भुगतान एडवांस में दिया गया, जबकि अन्य कंपनियों ने कम दर पर किट देने की पेशकश की थी। CAG ने इस प्रक्रिया को गलत ठहराते हुए कहा कि इससे राज्य को 10.23 करोड़ रूपए का अतिरिक्त वित्तीय बोझ उठाना पड़ा।

रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च और अप्रैल 2020 के बीच ऊँची कीमत पर की गई खरीदारी ने राज्य के संसाधनों पर अनावश्यक दबाव डाला। जहाँ लाखों किट सस्ती दरों पर खरीदी जा सकती थीं, लेकिन महँगे दामों पर 15,000 किट की खरीदी गई। इसके अलावा राज्य में दवाइयों, मेडिकल सामानों का भारी अभाव रहा। केरल में डॉक्टरों की कमी, दवाइयों की कमी भी रही। सीएजी रिपोर्ट में साफ है कि सस्ते दाम पर पीपीई किट देने वाली कंपनियों को कम ऑर्डर दिया गया, जबकि महँगा पीपीई देने वाली कंपनी को एडवाँस में ज्यादा पैसों का भुगतान किया गया और ऑर्डर भी बड़ा दिया गया।

 इस खुलासे के बाद विपक्ष ने सत्तारूढ़ लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (LDF) सरकार पर हमला बोला है। कॉन्ग्रेस के नेता वी.डी. सतीशन ने सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि “कोविड महामारी को लोगों की जान बचाने के बजाय सरकार ने अपनी जेबें भरने का अवसर बना लिया।” उन्होंने यह भी कहा कि यह भ्रष्टाचार मुख्यमंत्री पिनराई विजयन और पूर्व स्वास्थ्य मंत्री केके शैलजा की जानकारी में हुआ।

केके शैलजा ने इन आरोपों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि उन्होंने CAG रिपोर्ट अभी तक नहीं पढ़ी है, लेकिन उस समय की परिस्थितियों को देखते हुए PPE किट की खरीदारी जरूरी थी। उन्होंने कहा कि “महामारी के दौरान PPE किट की भारी कमी थी। कुछ किट महँगे दाम पर खरीदने पड़े, लेकिन लाखों किट सस्ते दामों पर खरीदी गईं।”

उन्होंने यह भी दावा किया कि जब यह मामला विधानसभा में उठाया गया था, तब इसका स्पष्ट उत्तर दिया गया था। उन्होंने कहा, “सिर्फ 15,000 किट ऊँची कीमत पर खरीदी गई थीं, और यह उस समय की परिस्थितियों की वजह से हुआ। विपक्ष इस मुद्दे को बार-बार उठाकर लोगों को गुमराह कर रहा है।”

CAG रिपोर्ट ने राज्य के कोविड प्रबंधन के दौरान हुए वित्तीय दुरुपयोग को उजागर करते हुए इसे ‘गैर-जरूरी खर्च’ बताया है। रिपोर्ट ने संकेत दिया कि खरीदारी के दौरान पारदर्शिता की कमी थी और कुछ कंपनियों को गलत तरीके से लाभ दिया गया।

इस बीच, राज्य सरकार ने CAG रिपोर्ट पर विस्तार से जवाब देने की बात कही है। मुख्यमंत्री पिनराई विजयन ने कहा है कि “रिपोर्ट का गहन अध्ययन किया जाएगा, और जरूरत पड़ी तो सरकार उचित जवाब देगी।” वहीं, विपक्ष ने इस मुद्दे को आगे बढ़ाने की योजना बनाई है और इसे विधानसभा में फिर से उठाने का इरादा जाहिर किया है। फिरलहाल, CAG रिपोर्ट के इस खुलासे ने न केवल केरल सरकार के कोविड प्रबंधन पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि उन प्रशंसाओं और पुरस्कारों पर भी प्रश्नचिह्न लगा दिया है जो महामारी के दौरान राज्य सरकार को मिले थे।

दारू घोटाले से दिल्ली को हुआ 2026 करोड़ रूपए का नुकसान: CAG रिपोर्ट में खुलासा; मुख्यमंत्री आतिशी उपराज्यपाल के कहने के बावजूद क्यों नहीं CAG रिपोर्ट विधान सभा में प्रस्तुत की?

आम आदमी पार्टी झूठों, मक्कारों और घोटालेबाज़ों का गैंग है। अरविन्द केजरीवाल के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के बाद आतिशी के मुख्यमंत्री बनने पर उपराज्यपाल वी के सक्सेना ने मुख्यमंत्री कार्यालय में रखी CAG रिपोर्ट्स को विधानसभा में रखने के कहने के बावजूद टेबल नहीं कर दिल्ली वालों को गुमराह किया। आतिशी अच्छी तरह जानती है कि CAG रिपोर्ट्स को विधानसभा में रखते ही सरकार ही नहीं आम आदमी पार्टी की बड़ी तेजी के साथ उलटी गिनती शुरू हो जाएगी, कोई पार्टी को भी नहीं बचा पाएगा। आधी से ज्यादा पार्टी तिहाड़ में चली जाएगी।

इस चुनाव में अगर कांग्रेस आक्रामक हो केजरीवाल पर हमला करती है, केजरीवाल सरकार एक इतिहास ही नहीं बनेगी बल्कि कांग्रेस को ही नई जान मिलेगी। पंजाब में आप सरकार की उलटी गिनती शुरू हो जाएगी वो कांग्रेस की दूसरी सबसे जीत होगी। पंजाब में सरकार गिरते ही केजरीवाल पार्टी इतिहास बन जाएगी, जिसे एक-दो चुनाव के बाद जनता भी भूल जाएगी बशर्ते न कांग्रेस और न बीजेपी इस पार्टी के किसी भी तथाकथित नेता को अपनी पार्टी में शामिल करे। दूसरे, अगर कांग्रेस 10 सीटें भी जीत जाती है केजरीवाल कम से कम 20/22 सीटों का नुकसान होगा। जो कांग्रेस की बहुत बड़ी जीत होगी। बीजेपी का भी 30 से 32 सीटें जीतने की संभावनाएं की जा रही है। लेकिन कांग्रेस बीजेपी को सत्ता से बाहर रखने के किसी भी कीमत पर 2013 वाली भयंकर गलती कर केजरीवाल को समर्थन न दे, जो कांग्रेस के लिए आत्मघाती कदम होगा। अगर उस समय कांग्रेस ने समर्थन नहीं दिया होता एक विपक्ष के रूप में उभर कर आती।        

दिल्ली सरकार की शराब नीति को लेकर नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने बड़ा खुलासा किया है। रिपोर्ट के अनुसार, अरविंद केजरीवाल सरकार की इस शराब नीति के कारण दिल्ली सरकार को 2026 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ। यह नीति नवंबर 2021 में लागू की गई थी और इसका उद्देश्य शराब की बिक्री के माध्यम से राजस्व बढ़ाना और व्यवस्था में सुधार लाना था। हालाँकि, रिपोर्ट में इसे भ्रष्टाचार, अनियमितताओं और कमीशनखोरी से भरा बताया गया है। इस चक्कर में मनीष सिसोदिया, अरविंद केजरीवाल समेत कई बड़े नेताओं को जेल की हवा भी खानी पड़ी थी, क्योंकि शराब घोटाले से जमा किए पैसों की मनी लॉन्ड्रिंग का भी मामला सामने आ गया था।

कथित तौर पर लीक हुई CAG की रिपोर्ट में कहा गया है कि शराब की दुकानों के लाइसेंस जारी करने में नियमों का उल्लंघन किया गया। कई ऐसी कंपनियों को लाइसेंस दिए गए, जो घाटे में थीं या जिनके खिलाफ शिकायतें थीं। नियम तोड़ने वालों को सज़ा देने की बजाय उन्हें छूट दी गई। रिपोर्ट में कहा गया कि शराब नीति के कई अहम फैसले बिना कैबिनेट और उपराज्यपाल की मंजूरी के लिए गए।

यही नहीं, दिल्ली शराब नीति घोटाले के दौरान एक्सपर्ट पैनल की सिफारिशों को नजरअंदाज कर मनमाने तरीके से फैसले लिए गए। लाइसेंसधारकों और थोक विक्रेताओं के बीच अनुचित समझौते हुए। सरकार ने कोविड-19 के नाम पर 144 करोड़ रुपये की लाइसेंस फीस माफ कर दी, जबकि ऐसा करने की कोई जरूरत नहीं थी।

CAG ने अपने विश्लेषण में बताया कि शराब नीति के तहत कई मोर्चों पर नुकसान हुआ। इसमें-

  • लाइसेंस वापस लिए गए, लेकिन उन्हें दोबारा टेंडर नहीं किया गया, जिससे ₹890 करोड़ का नुकसान हुआ।
  • ज़ोनल लाइसेंसधारकों को दी गई छूट से ₹941 करोड़ का घाटा हुआ।
  • कोविड-19 के नाम पर ₹144 करोड़ की माफी ने राजस्व को और कमजोर किया।
  • सुरक्षा जमा राशि सही से वसूलने में ₹27 करोड़ का नुकसान हुआ।
शराब की गुणवत्ता और जाँच पर ध्यान नहीं: नीति के तहत शराब की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए टेस्टिंग लैब और अन्य बुनियादी ढाँचे की योजना बनाई गई थी, लेकिन इसे लागू नहीं किया गया। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि शराब की दुकानों का वितरण समान रूप से नहीं किया गया, जिससे जनता को परेशानी हुई।
रिपोर्ट में कहा गया कि इस नीति से आप नेताओं को सीधा फायदा हुआ। उस समय आबकारी विभाग के प्रमुख मनीष सिसोदिया और उनके साथी मंत्रियों ने जानबूझकर नियमों का उल्लंघन किया। लाइसेंस जारी करने और शुल्क माफी जैसे फैसलों में पारदर्शिता की कमी रही।
CAG की यह रिपोर्ट ऐसे समय आई है जब दिल्ली चुनाव नजदीक हैं। भाजपा ने इसे बड़ा मुद्दा बना दिया है और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल से जवाब माँगा है। हालाँकि आम आदमी पार्टी ने इस रिपोर्ट को सिरे से खारिज किया है। पार्टी के नेता संजय सिंह ने कहा, “यह रिपोर्ट अभी दिल्ली विधानसभा में पेश नहीं हुई है। भाजपा इसे चुनावी मुद्दा बनाने के लिए गलत दावे कर रही है।” उन्होंने आरोप लगाया कि भाजपा इस रिपोर्ट का इस्तेमाल आम आदमी पार्टी की छवि खराब करने के लिए कर रही है।
दिल्ली शराब नीति घोटाले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया समेत आम आदमी पार्टी और दिल्ली सरकार के शीर्ष लोगों को जेल जाना पड़ा था। इस मामले में जाँच अभी जारी है। मनीष सिसोदिया को काफी समय बाद जेल से बेल मिली थी, तो अरविंद केजरीवाल को भी महीनों जेल में बिताना पड़ा, इसके बाद उन्हें मुख्यमंत्री पद से भी हटना पड़ा। हालाँकि जेल से बाहर आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने इस्तीफा दिया था।
बहरहाल, दिल्ली सरकार की शराब नीति को लेकर यह विवाद राजनीति के नए मोड़ ले सकता है। जनता यह जानना चाहती है कि 2026 करोड़ का नुकसान क्यों हुआ और इसके लिए जिम्मेदार कौन है। रिपोर्ट के बाद आम आदमी पार्टी पर जनता और विपक्ष का दबाव बढ़ गया है।

उत्तर प्रदेश : मौत, कुव्यवस्था, घपला… सपा के लिए यही था कुंभ, प्रबंधन की नई परिभाषा गढ़ रहे CM योगी: 10 करोड़ श्रद्धालुओं के लिए अखिलेश ने लगाए थे 5 गोताखोर और 1 आजम खान

    अखिलेश यादव के इस कुंभ मैनेजमेंट में CAG ने कई कमियाँ निकाली थी (साभार: Varatha Bharathi &                                                                                                                                              News18)
मकर संक्रांति (14 जनवरी, 2024) से प्रयागराज में महाकुंभ चालू हो रहा है। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार इसके लिए तैयारियों में जुटी हुई है। इन्फ्रास्ट्रक्चर से लेकर भीड़ प्रबन्धन तक के काम तेजी से चल रहे हैं। योगी सरकार का कहना है कि 2025 का महाकुंभ सबसे दिव्य होगा।

अब इस आयोजन से भी उत्तर विपक्ष को समस्या हो गई है। सपा से फैजाबाद के सांसद अवधेश कुमार ने कहा है कि महाकुंभ का आयोजन करना कोई नई बात नहीं है और उनकी सरकार में भी यह हुआ था। अवधेश कुमार ने दावा किया है कि इस बार के महाकुंभ में बंदरबाँट हो रही है।

उनके नेता अखिलेश यादव भी इस बीच महाकुंभ की तैयारियों पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। कहीं वह खम्भों की फोटो डालते हैं तो कहीं अधूरी पुलिस चौकी दिखाते हैं। उनका दावा होता है कि महाकुंभ का काम अधूरा है। हालाँकि, अखिलेश यादव और उनकी पार्टी के नेता यह भूल जाते हैं कि अब से ठीक 12 वर्ष पहले प्रयागराज में उन्हीं की सरकार में कुंभ का आयोजन हुआ था और उसके कुप्रबंधन की दुनिया भर में आलोचना हुई थी।

अखिलेश यादव आलोचना करने के बजाय अपने मुख्यमंत्री रहते हुए एक मॉडल सेट कर सकते थे लेकिन तब उन्होंने कुंभ में कोई रूचि नहीं दिखाई थी। महाकुंभ के दौरान हुई भगदड़ से लेकर पैसा ना खर्चने और भीड़ के प्रबन्धन तक में सैकड़ों गड़बड़ियाँ उनकी सरकार में हुई थीं। इसको लेकर CAG ने एक रिपोर्ट बनाई थी, जिसमें पूरी सच्चाई बाहर आई थी।

आजम खान को मंत्री बनाया, 42 की भगदड़ में मौत

2013 के कुंभ के लिए अखिलेश यादव को आजम खान के अलावा और कोई शख्स नहीं मिल सका था। आजम खान को इस मेले की समिति का अध्यक्ष बनाया गया था। आजम खान को हिन्दुओं के सबसे बड़े जुटान कुंभ में संभवत: कोई रुचि नहीं थी और वह उस दौरान रामपुर में अपनी समानांतर सरकार चलाने और जौहर यूनिवर्सिटी बनाने में लगे हुए थे।
आजम खान के मंत्री रहते हुए इस कुंभ के दौरान प्रयागराज के रेलवे स्टेशन पर हुई भगदड़ में 42 लोग मारे गए थे। यह हादसा 10 फरवरी, 2013 को हुआ था। इस दिन मौनी अमावस्या थी और लाखों श्रद्धालु उस दिन प्रयागराज में गंगा में स्नान करने आए थे।
इस हादसे को लेकर रिपोर्ट भी बाद में सामने आई थी। इस हादसे के कारणों में से एक यह भी था कि राज्य सरकार ने पर्याप्त बसों की व्यवस्था नहीं की थी। इस हादसे के बाद आजम खान ने दिखावे के तौर पर अपने इस्तीफे की पेशकश की थी लेकिन अखिलेश यादव ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया था।
हादसे के 2 दिन बाद अखिलेश यादव प्रयागराज गए थे और गाड़ी लेकर अंदर घूम कर वापस चले गए थे। उन्होंने यहाँ स्नान करना तक जरूरी नहीं समझा था। वर्तमान में खम्भों पर तार ना लगने को लेकर राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहे अखिलेश यादव तब हादसे को लेकर राजनीति ना करने की अपील कर रहे थे।

कुंभ चालू, 60% काम अधूरा

गड़बड़ी सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं थी। इस कुम्भ को लेकर जब CAG ने ऑडिट किया तो असल सच्चाई खुली थी। CAG की रिपोर्ट में सामने आया था कि 2013 के कुंभ के लिए सारे काम पूरे करने की तिथि सबसे पहले 30 नवम्बर, 2012 रखी गई थी लेकिन इनमें से कई काम मेला चालू होने तक भी पूरे नहीं हुए। इनकी तिथि इस बीच तीन बार बढ़ाई गई।
CAG रिपोर्ट के अनुसार, अखिलेश यादव की सरकार मेले की शुरूआत यानी 14 जनवरी, 2013 तक इन्फ्रास्ट्रक्चर से जुड़े 59% काम नहीं पूरे पाई थी। यानी वर्तमान में खम्भों पर तार ना लगने को मुद्दा बना रहे अखिलेश यादव अपनी सरकार में मेला शुरू होने तक 60% काम नहीं पूरा करवा पाए थे।
यहाँ तक सड़क निर्माण से जुड़े 111 कामों में से 65 मेला खत्म होने के तक भी पूरे नहीं हुए थे। और तो और, ₹26 करोड़ के 4 प्रोजेक्ट जड़ से ही शुरू नहीं हो पाए थे। इन सब के बावजूद अखिलेश सरकार ने CAG को जनवरी, 2013 में यह सूचना दी थी कि सारे काम पूरे हो गए। इसको लेकर CAG ने सरकार को कठघरे में खड़ा किया था।
CAG ने अपनी जाँच में यह भी पाया कि कुंभ के ली लिए जिन दवाइयों, गाड़ियों समेत बाकी चीजों की सप्लाई की जानी थी, उसमें भी ₹2 करोड़ से ज्यादा का सामान मेला चालू होने तक भी नहीं पहुँचा था। कई ऐसे कामों को कुंभ के पैसे से करवा लिया गया था, जो उससे जुड़े थे ही नहीं।

केंद्र सरकार से मिला पैसा डकार गए, अपना भी पूरा नहीं लगाया

2013 के महाकुम्भ के लिए ₹1152 करोड़ का बजट बना था और यह रिलीज किए गए थे। इस धनराशि में से ₹341 करोड़ केंद्र सरकार के दिए हुए थे। यह खर्च कुंभ के दौरान बनने वाले इन्फ्रास्ट्रक्चर और बाक़ी खरीद के लिए होना था। लेकिन यह पैसा पूरा खर्च तक नहीं किया गया। इस धनराशि में से ₹1017 करोड़ खर्च हुआ। यानी ₹134 करोड़ की धनराशि पड़ी रह गई।
इसके अलावा समाजवादी पार्टी को केंद्र सरकार ने ₹800 करोड़ अलग से कुंभ के लिए दिए थे। इस धनराशि में से एक पैसा अखिलेश यादव की सरकार ने कुंभ के कामों के लिए नहीं लगाया। इस पैसे को राज्य सरकार ने अपने काम में लगा लिया।
CAG की रिपोर्ट कहती है कि यदि इस हिसाब देखा जाए तो सपा सरकार ने मात्र ₹10 करोड़ या बजट का 1% ही अपने पास से लगाया। क्योंकि ₹1141 करोड़ तो केंद्र सरकार ही दे चुकी थी। इन सब के बाद भी जो पैसा खर्च भी हुआ, उसमे भी खूब गड़बड़ी हुई। गड़बड़ी का स्तर यह था कि बस और मोटरसाइकिल के नम्बर मेले में काम करने वाले ट्रैक्टर के लिए दिए गए थे।
CAG रिपोर्ट बताती है कि 30 मजदूरों को एक ही समय में दो जगह पर काम करते हुए दिखा दिया गया था। इनको पैसा भी दे दिया गया था। कहीं पुल के मरम्मत के नाम पर करोड़ों का फालतू खर्च किया गया तो कहीं बैरीकेडिंग में पैसा उड़ाया गया। कुल मिलाकर खूब भ्रष्टाचार भी हुआ।

12 करोड़ लोगों की सुरक्षा के लिए लगाए केवल 5 गोताखोर

अखिलेश सरकार ने केवल इन्फ्रा बनाने या पैसा खर्चने में ही कोताही 2013 कुंभ में नहीं बरती, बल्कि यहाँ श्रद्धालुओं के प्रबन्धन में भी भारी लापरवाही बरती थी। एक अनुमान के अनुसार, इस कुंभ में लगभग 12 करोड़ लोग देश विदेश से शामिल हुए थे। CAG की ही रिपोर्ट बताती है कि यहाँ इन 12 करोड़ श्रद्धालुओं को संभालने के लिए मात्र 5 गोताखोर की नियुक्ति हुई थी। इतने बड़े आयोजन में लोगों की सुरक्षा को गंभीरता से ना लेना कुंभ के प्रति अखिलेश सरकार की उदासीनता को दर्शाता है।

योगी सरकार आयोजित करने जा रही डिजिटल कुंभ

जहाँ 2013 का कुंभ अखिलेश यादव ने विफलताओं का स्मारक बना दिया था, वहीं 2025 के कुंभ को योगी सरकार ने डिजिटल कुंभ के तौर पर आयोजित करने की तैयारी कर ली है। इस महाकुंभ के लिए योगी सरकार ने विशेष एप बनाया है। यह एप 11 भाषाओं में चलेगा। महाकुंभ में हर सेवा के लिए QR कोड लगाए गए हैं।
महाकुंभ की सुरक्षा के लिए पूरे मेला क्षेत्र में हजारों कैमरा लगाए गए हैं। इनका एक इंटीग्रेटेड कमांड एंड कंट्रोल सिस्टम बनाया गया है। इस सिस्टम में AI का भरपूर उपयोग हुआ है। इसके अलावा ड्रोन भी निगरानी यहाँ की जाएगी। महाकुंभ मेला क्षेत्र को 25 कमांड सेंटर में बाँट दिया गया है।
महाकुंभ का मेला क्षेत्र कई किलोमीटर में विस्तृत होता है। इसके कारण श्रद्धालुओं को काफी पैदल चलना पड़ता था। अब यह स्थिति योगी सरकार बदल देगी। योगी सरकार ने इस महाकुंभ में मेला क्षेत्र के भीतर शटल बस, ई ऑटो और ई रिक्शा की व्यवस्था की है। यह श्रद्धालुओं की सहूलियत के 24 घंटे उपलब्ध रहेंगे। हजारों पुलिसकर्मियों की नियुक्ति भी की गई है।