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अहमदाबाद के ‘सेवेंथ डे स्कूल’ में पहले भी हो चुके हैं कई विवाद; विदेशी चर्च से कनेक्शन, धर्मांतरण, मीट खिलाने का आरोप और अब हिंदू छात्र की हत्या…

                                      अहमदाबाद के 'सेवेंथ डे स्कूल' की तस्वीर (फोटो साभार : The Hindu)
अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल में 19 अगस्त 2025 को एक बड़ा हादसा हुआ है। स्कूल में 10वीं कक्षा के एक हिंदू छात्र की चाकू मारकर हत्या कर दी गई। आरोप है कि हत्या एक मुस्लिम छात्र ने की। हमले के बाद घायल छात्र को अस्पताल ले जाया गया, जहाँ उसे मृत घोषित कर दिया गया। पुलिस ने आरोपित छात्र को हिरासत में ले लिया है। उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है।

घटना के बाद, 20 अगस्त 2025 को स्थानीय हिंदू समुदाय के लोग स्कूल में जमा हुए और उन्होंने विरोध प्रदर्शन किया। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों ने स्कूल प्रशासन पर सवाल उठाए हैं। लोगों का कहना है कि स्कूल में सुरक्षा को लेकर लापरवाही हुई। मामले की जाँच जारी है और पुलिस स्थिति पर नजर रख रही है।

घटना के बाद स्कूल प्रशासन पर कई गंभीर आरोप लगे हैं। पीड़ित परिवार और स्थानीय लोगों का कहना है कि स्कूल ने घायल छात्र की मदद नहीं की और छात्र को समय पर अस्पताल नहीं ले जाया गया। यह भी कहा गया है कि स्कूल ने हादसे के तुरंत बाद सफाई शुरू कर दी।

स्कूल प्रशासन ने पानी का टैंकर मँगवाया और स्कूल परिसर की धुलाई करवाई। लोगों का आरोप है कि इससे सबूत मिटाने की कोशिश की गई। अब पुलिस इन आरोपों की जाँच कर रही है। मामला सबूत छिपाने की दिशा में भी देखा जा रहा है।

पहले भी विवादों में रहा है स्कूल

जिस स्कूल में हिंदू छात्र की हत्या हुई, वह पहले भी विवादों में घिर चुका है। 2016 में एक घटना सामने आई थी। उस समय स्कूल के एक शिक्षक ने कक्षा 4 के एक बच्चे की पिटाई कर दी थी। बच्चे की गलती सिर्फ इतनी थी कि उसने मौखिक परीक्षा के दौरान किसी से बात कर ली थी।

इस बात से गुस्साए शिक्षक ने बच्चे के बाल पकड़कर मारपीट की। आरोप है कि शिक्षक ने चेहरे पर घूंसा मारा, जिससे बच्चे के खून बहने लगा। इस घटना को लेकर भी स्कूल की काफी आलोचना हुई थी।

इस घटना के बाद कई अभिभावक स्कूल पहुँच गए। उन्होंने स्कूल परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। अभिभावकों के दबाव के बाद स्कूल प्रशासन ने शिक्षक को निलंबित कर दिया। निलंबित शिक्षक का नाम ‘मोसेस अदला‘ था।

स्थानीय लोगों का आरोप है कि यह शिक्षक पहले भी चार बच्चों की पिटाई कर चुका है। अभिभावकों ने इस मामले की शिकायत खोखरा थाने में की थी। पुलिस ने केस दर्ज कर शिक्षक के खिलाफ कार्रवाई की थी।

यह स्कूल अक्टूबर 2024 में भी विवादों में आया था। उस समय स्कूल का स्टाफ 200 छात्रों को मेहसाणा के एक वॉटर पार्क में लेकर गया थे। इस यात्रा के लिए जिला शिक्षा कार्यालय से कोई अनुमति नहीं ली गई थी, जो कि सरकारी नियमों का उल्लंघन थी।

घटना सामने आने के बाद जिला शिक्षा अधिकारियों ने इसका संज्ञान लिया। उन्होंने स्कूल प्रशासन को बकायदा नोटिस भेजा था। साथ ही, पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई गई थी।

स्कूल प्रशासन पर और भी गंभीर आरोप

हिंदू छात्र की हत्या के बाद स्कूल प्रशासन पर कई सवाल उठे हैं। स्थानीय लोगों ने स्कूल की भूमिका पर शक जताया है। मृतक छात्र के दादा ने ऑपइंडिया से बातचीत में बड़ा दावा किया। घटना वाले दिन कुछ मुस्लिम छात्रों ने चेहरे ढक रखे थे। उन्होंने पीड़ित छात्र पर चाकू से हमला कर दिया। मृतक के दादा ने कहा कि घटना से दो महीने पहले ही स्कूल में शिकायत दी गई थी। शिकायत में कहा गया था कि मुस्लिम छात्र हिंदू छात्रों को परेशान कर रहे हैं। लेकिन स्कूल ने कोई कार्रवाई नहीं की।

इसके अलावा, दादा ने बताया कि उनका पूरा परिवार शाकाहारी है। उन्होंने आरोप लगाया कि मुस्लिम छात्र स्कूल में मटन लाते थे। उनके पोते को पनीर बताकर मटन खिलाया जाता था।

इतना ही नहीं, स्कूल कैब के मालिक ने भी आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि इससे पहले भी मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्रों पर हमले किए हैं। अब इन आरोपों की पुलिस जाँच कर रही है।

पीड़ित छात्र के दादा ने बताया कि उन्होंने कई बार वीडियो बनाकर स्कूल को सबूत दिए। उन्होंने लगातार शिकायतें कीं, लेकिन स्कूल ने कोई कदम नहीं उठाया। उन्होंने धर्मांतरण का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि पहले हिंदू छात्रों पर ईसाई या मुस्लिम बनने का दबाव डाला जाता था।

अन्य अभिभावकों और स्थानीय लोगों ने भी यही आरोप लगाए। उनका कहना है कि मुस्लिम छात्र लगातार हिंदू छात्रों को परेशान करते थे। इन घटनाओं की स्कूल में शिकायत की गई, लेकिन फिर भी कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके अलावा एक और गंभीर आरोप सामने आया है। कहा गया कि स्कूल में नैतिक शिक्षा के नाम पर ईसाई मजहब का प्रचार किया जा रहा है। सिलेबस के जरिए छात्रों को ईसाई मजहब की ओर आकर्षित करने की कोशिश हो रही है।

इसके अलावा, एक महिला ने बड़ा दावा किया है। उसने कहा कि स्कूल संचालक अभिभावकों से ₹2 लाख माँग रहे थे। साथ ही, छात्रों से कहा जा रहा था कि वे बिना बोर्ड परीक्षा दिए पास हो जाएँगे। इन आरोपों की भी अब जाँच की जा रही है।

चर्च के जरिए चलता स्कूल

जाँच में पता चला कि यह स्कूल ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च‘ नाम का एक विदेशी संगठन चलाता है। इस संगठन का मुख्यालय अमेरिका में है। अहमदाबाद में यह स्कूल एक स्थानीय ट्रस्ट, ‘एश्लॉक ट्रस्ट’ के जरिए चलाया जाता है। यह ट्रस्ट भी उसी चर्च का हिस्सा है। पूरी दुनिया में, यह चर्च संगठन 7,804 स्कूल और कॉलेज चलाता है।

स्कूल के मूल्य और नियम ईसाई मजहब के अनुसार बनाए गए हैं। चर्च के स्कूल अधिकतर चर्च के नियमों के अनुसार चलते हैं। दुनिया भर में, ‘सेवेंथ डे एडवेंटिस्ट चर्च संगठन’ सभी स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालय के नियम बनाता है और फिर उन पर लागू करवाता है।

स्कूल का प्रिंसिपल जी इमैनुएल

अहमदाबाद के सेवेंथ डे स्कूल के प्रिंसिपल का नाम जी इमैनुएल है। जी इमैनुएल ईसाई मजहब को मानते हैं और पूरे स्कूल का प्रबंधन संभालते हैं। हत्या से पहले, स्थानीय लोग और अभिभावक प्रिंसिपल से कई बार शिकायत कर चुके थे। लेकिन प्रिंसिपल ने इन शिकायतों पर ध्यान नहीं दिया और कोई कदम नहीं उठाया।

यह स्कूल ‘काउंसिल फॉर द इंडियन स्कूल सर्टिफिकेट एग्जामिनेशन’ (CISCE) से जुड़ा है। यह एक गैर-सरकारी संगठन है। यह संस्था 1990 से स्कूल की पढ़ाई की देखरेख करती है। खास बात यह है कि प्रिंसिपल जी इमैनुएल खुद इस संस्था का अध्यक्ष है।

सेवेंथ डे स्कूल CISCE और गुजरात बोर्ड दोनों से जुड़ा हुआ है। चूंकि स्कूल के प्रिंसिपल खुद CISCE के अध्यक्ष हैं, इसलिए कई आरोप लग रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर परिषद का अध्यक्ष ही स्कूल का प्रिंसिपल है, तो स्कूल के खिलाफ कौन कार्रवाई करेगा?

अवलोकन करें:-

अहमदाबाद : सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्र की चाकू मारकर की हत्या, स्कूल प्रब
अहमदाबाद : सेवेंथ डे स्कूल में मुस्लिम छात्रों ने हिंदू छात्र की चाकू मारकर की हत्या, स्कूल प्रब
 

हालाँकि, प्रिंसिपल इमैनुएल की तरफ से अभी तक कोई बयान नहीं आया है। पुलिस फिलहाल मामले की जाँच कर रही है।

सीरिया : चर्च में घुसकर ISIS आतंकी द्वारा दमिश्क में आत्मघाती हमला, ताबड़तोड़ फायरिंग में 20 की मौत

                                          दमिश्क के चर्च में धमाके के बाद बिखड़े पड़े सामान(साभार NDTV) 
ईरान-इजरायल युद्ध के बीच सीरिया के दमिश्क से 20 जून को एक बड़े बम धमाके की खबर सामने आई है
। मिली जानकारी के अनुसार दमिश्क के एक चर्च में आत्मघाती हमला किया गया है। इस हमले में 20 लोगों की मौत हो गई है। जबकि 50 से अधिक लोग घायल बताए जा रहे हैं। स्थानीय मीडिया की रिपोर्ट के अनुसार, दमिश्क के सेंट एलियास ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च में एक सशस्त्र आत्मघाती हमलावर ने श्रद्धालुओं पर गोलीबारी की, जिसमें कई लोगों की मौत हो गई और फिर उसने विस्फोट कर दिया।

दमिश्क के पास सेंट एलियास चर्च में धमाका

एसएएनए की रिपोर्ट के अनुसार, सीरियाई सुरक्षा बलों ने इलाके की सुरक्षा के लिए सेंट एलियास चर्च के आसपास तैनाती की है। गोलीबारी और धमाके की सूचना पर स्थानीय प्रशासन और मेडिकल की टीम मौके पर पहुंच गई है।

सीरिया के गृह मंत्रालय के अनुसार इस्लामिक स्टेट(ISIS) के एक आतंकी ने इस घटना को अंजाम दिया। उसने मार एलियास ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च में घुसकर लोगों पर फायरिंग की और फिर खुद को उड़ा लिया। वहीं सुरक्षा सूत्रों का कहना है कि हमले में दो व्यक्ति शामिल थे, जिनमें से एक ने खुद को उड़ा लिया था।

दिसंबर में कट्टरपंथी इस्लामिक विद्रोहियों द्वारा बशर अल-असद को सत्ता से हटा दिया गया था। उनकी सत्ता समाप्त होने के बाद दमिश्क में पहली बार इस तरह का बड़ा आतंकी हमला हुआ है।

सीरिया के नागरिक सुरक्षा बलों द्वारा घटनास्थल से लाइवस्ट्रीम में चर्च के अंदर के दृश्य को दिखाए गया, जिसमें चर्च के अंदर खून फैला हुआ दिख रहा है। इस हमले पर ग्रीक के विदेश मंत्रालय ने कहा, “हम सीरिया के दमिश्क में मार एलियास ग्रीक ऑर्थोडॉक्स चर्च पर हुए घृणित आतंकवादी आत्मघाती बम विस्फोट की स्पष्ट रूप से निंदा करते हैं”।

जारी बयान में कहा गया है “हम माँग करते हैं कि सीरियाई अधिकारी तत्काल कार्रवाई करें, ताकि इसमें शामिल लोगों को जवाबदेह ठहराया जा सके और ईसाई समुदायों और सभी धार्मिक समूहों की सुरक्षा की गारंटी दी जाए , ताकि वे बिना किसी भय के रह सकें।”

सीरिया की राजधानी में धमाके के जरिए प्रशासन को बड़ी चुनौती

SANA की रिपोर्ट के अनुसार सीरियाई सुरक्षा बलों ने क्षेत्र की सुरक्षा के लिए सेंट एलियास चर्च के आसपास तैनाती कर दी है। राहत-बचाव कार्य शुरू कर दिया गया है। मालूम हो कि दमिश्क सीरिया की राजधानी है। ऐसे में राजधानी में बड़े हमले के लिए सीरिया प्रशासन को एक बड़ी चुनौती दी गई है।
सीरिया के चर्च में हुए धमाके की जानकारी मिलते ही वहां राहत-बचाव कार्य के लिए गैर सरकारी संगठन के कई कार्यकर्ता भी पहुंच चुके हैं. जिसकी तस्वीरें भी सामने आई है।

‘अकेले में लगाता था जबरन गले, गंदे ढंग से छूता था’: 22 साल की महिला ने पादरी बजिंदर पर लगाया यौन उत्पीड़न का आरोप

                                            पादरी बजिंदर सिंह (साभार: X/AskAnshul)
पंजाब के कपूरथला में 22 साल की एक महिला ने पादरी बजिंदर सिंह पर उसकी किशोरावस्था में यौन उत्पीड़न करने का आरोप लगाते हुए शिकायत दर्ज कराई है। पंजाब पुलिस ने शुक्रवार (28 फरवरी) को ईसाई प्रचारक बजिंदर के खिलाफ यौन उत्पीड़न, आपराधिक धमकी देने और पीछा करने का मामला दर्ज कर लिया है। पीड़िता दिसंबर 2017 से पादरी बजिंदर सिंह की मंडली में शामिल हो रही थी।

पीड़िता 2020 तक पादरी की ‘वर्शिप टीम’ का हिस्सा गई। बकौल पीड़िता, उसका फ़ोन नंबर लेकर पीड़िता उसे अश्लील मैसेज भेजना शुरू कर दिया। उस समय वह 17 की साल थी। FIR में लिखा है, “मैं उससे डरने लगी, लेकिन माता-पिता से बताने में कतराती थी। 2022 में उसने मुझे रविवार को अपने केबिन में बैठाने लगा। जब मैं अकेली होती तो वह मुझे जबरन गले लगाता और गंदे तरीके से छूता था।”

पीड़ित महिला ने बताया, “जब मैं कॉलेज जाती थी तो वह अपनी कार से मेरा पीछा करने लगा। वह मुझे धमकी देता था कि अगर मैंने उससे शादी नहीं की या इस बारे में अपने माता-पिता को बताया तो वह मेरे माता-पिता और भाई को मरवा देगा। इसके बाद मुझे घबराहट के दौरे पड़ने लगे।” पीड़िता ने बताया कि पादरी बजिंदर सिंह ने उससे शादी करना चाहता था, जबकि वह पहले से ही शादीशुदा था।

पीड़िता का कहना है कि पादरी की धमकियों और उत्पीड़न से उसे पैनिक अटैक आने लगे। इसके कारण उसे 3 अलग-अलग अस्पतालों में इलाज करवाना पड़ा। पीड़िता ने पुलिस को यह भी बताया कि मार्च 2023 में एक अन्य ईसाई प्रचारक राजा सिंह से शादी से पहले पादरी बजिंदर ने उसे धमकाया था। उसने अपने चर्च के अध्यक्ष से उसकी माँ से बात करवाकर चुप रहने के लिए धमकाया था।

पादरी बजिंदर सिंह ‘चर्च ऑफ ग्लोरी एंड विजडम’ चलाता है। इस पादरी को लोग ‘चमत्कारी उपचार’ के लिए भी जानते हैं, जो लोगों को ईसाई धर्म में लुभाने के लिए यह पादरी आजमाता है। पादरी बजिंदर को इससे पहले जुलाई 2018 में पंजाब के जीरकपुर में एक महिला से बलात्कार करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। उससे भी पहले वह हत्या के एक मामले में जेल में बंद था।

आंध्र प्रदेश : जिस चर्च में हर महीने होता था 3000 हिंदुओं का धर्मांतरण, उस पर चलेगा बुलडोजर: एशिया के दूसरे सबसे बड़े चर्च को लेकर सरकार का फैसला

                         सतीश कुमार और कैल्वरी टेंपल चर्च (साभार: calvary temple/Tripadvisor)
आज हर प्रदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मांग होती है उसका कारण है। योगी की तरह सख्त निर्णय लेना। योगी के बुलडोज़र से परेशान मुस्लिम कट्टरपंथी और सेकुलरिज्म के नाम पर गुमराह करने वाला गैंग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाता है। लेकिन बाबा का बुलडोज़र हर प्रदेश में पहुँच रहा है।  

आंध्र प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने गुंटूर जिले में स्थित कैल्वरी टेम्पल चर्च को गिराने के आदेश जारी किया है। यह चर्च पेडकाकनी मंडल के नम्बुरु गाँव में स्थित है। इस चर्च को अवैध रूप से संचालन किया जा रहा था। एक जाँच के बाद इसका खुलासा हुआ था। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, केवल उन संरचनाओं को ध्वस्त किया जाएगा जो बिना कानूनी अनुमति के चल रही हैं।

दरअसल, नवंबर 2024 में इस चर्च के खिलाफ प्रधानमंत्री कार्यालय को एक शिकायत दी गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इसका संचालन पंचायती राज, राजस्व, पुलिस और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे सरकारी विभागों से कानूनी अनुमति के बिना किया जा रहा है। इसमें ये भी कहा गया था कि पादरी डॉक्टर सतीश कुमार ने टैक्स का भुगतान किए बिना दान के जरिए लोगों को लूटा।

 शिकायत के बाद जाँच में पाया गया कि यह चर्च अवैध रूप से संचालित हो रहा था और गरीबों को किराने का सामान देकर तथा फर्जी दावे करके हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रहा था। अक्टूबर में बताया गया था कि हैदराबाद के पादरी डॉक्टर सतीश कुमार के नेतृत्व में कैल्वरी चर्च ने हर महीने लगभग 3,000 हिंदुओं को ईसाई धर्म में धर्मांतरित किया है।

पादरी सतीश कुमार ने विशेष रूप से दावा किया कि उन्होंने अब तक 3.5 लाख से अधिक हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया है। सतीश कुमार ने अगले 10 वर्षों में पूरे भारत में 40 ऐसे चर्च स्थापित करने की योजना बताई थी। CBN न्यूज़ (द क्रिश्चियन ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क इंक) का एक वीडियो 26 अक्टूबर 2024 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर वायरल हुआ।

इस वीडियो में कैल्वरी टेम्पल चर्च की धर्मांतरण गतिविधियों के बारे में बात की गई थी। बाद में 28 अक्टूबर 2024 को लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फ़ोरम (LRPF) ने X पर साझा किया कि काकीनाडा के जिला कलेक्टर के आदेश के बाद राजस्व अधिकारियों ने कैल्वरी टेम्पल चर्च को ज़ब्त कर लिया है। चर्च पर भूमि कब्जाने, संदिग्ध समझौतों के ज़रिए नए चर्च बनाने, कानून का उल्लंघन सहित कई आरोप हैं।

कैल्वरी टेंपल चर्च एशिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक है, जिसके सदस्यों की संख्या 4 लाख से अधिक है। वहीं, साप्ताहिक उपस्थिति 20,000 से अधिक होती है। चर्च के अलावा, सतीश कुमार का संगठन कैल्वरी बाइबल कॉलेज, कैल्वरी अस्पताल और कैल्वरी स्कूल चलाता है। पादरी सतीश कुमार का आंध्र प्रदेश और उसके बाहर राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में काफी प्रभाव माना जाता है।

इसके साथ ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ईसाई समुदायों में भी सतीश कुमार की तगड़ी पहुँच है। वह मिशनरी गतिविधियों के लिए अक्सर अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, कोरिया सहित विभिन्न देशों में आते-जाते रहते हैं। अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने साल 2018 में सतीश कुमार से मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया साइट X पर शेयर की थी और मुलाकात को प्रेरणादायक बताया था।

चर्च की स्थापना

कैल्वरी टेम्पल इंडिया की स्थापना 2005 में सतीश कुमार ने की थी। उन्हें अक्सर एक सम्मानित पादरी, लेखक और अंतरराष्ट्रीय वक्ता बताया जाता है। उन्हें दूरदर्शी नेतृत्व और ईमानदार बताया जाता है। हालाँकि, जाँच में उनके मिशनरी कामों का पता चला। पादरी सतीश ‘बाइबिल के मानकों’ पर जोर देते हैं, जो रणनीतिक रूप से उनके अनुयायियों को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया लगता है।
यह भारत में आक्रामक तरीके से धर्मांतरण को बढ़ावा देने के उनके लक्ष्य को दिखाता है। चर्च की वेबसाइट पर कैल्वरी के बारे में खूब प्रशंसा की गई है। इसमें चर्च के 400,000 सदस्य होने का दावा किया गया है। ये सब कुछ हिंदुओं को लक्षित करने के लिए धन जुटाने की रणनीति के तहत किया गया लगता है। कैल्वरी चर्च का यह भी दावा है कि चर्च का निर्माण केवल 52 दिनों में किया गया था।
जब कैल्वरी बाइबिल कॉलेज और कैल्वरी अस्पताल जैसी पहलों के साथ-साथ प्रदान किए जाने वाले मुफ़्त भोजन पर विचार किया जाता है, तो यह परोपकार के बारे में कम और धार्मिक साम्राज्य के निर्माण के बारे में अधिक प्रतीत होता है। पादरी सतीश कुमार अपनी कई गतिविधियों के कारण कुख्यात हो चुके हैं। हालाँकि, ईसाई उनकी गतिविधियों को समुदाय के लिए एक बड़ी सेवा मानते हैं।

तेलंगाना : हैदराबाद के कैल्वारी चर्च से चल रहा धर्मांतरण का खेल ; 3000 हिन्दू हर महीने बनते हैं ईसाई, 3.5 लाख अब तक हो भी चुके कन्वर्ट: ट्रैकिंग सिस्टम से जुटाए जाते हैं लोग; वीडियो

                                                                          कैल्वारी चर्च
अक्सर हिन्दुओं की घटती आबादी और मुसलमानों की बढ़ती आबादी पर बड़ी-बड़ी चर्चाएं होती है। लेकिन मीडिया से लेकर नेता और नेता से लेकर राज्य और केंद्र सरकारें आंखें बंद किये बैठी हैं। जिस दिन राज्य और केंद्र सरकारों ने हो रहे धर्मान्तरों, रोहिंग्यों, पाकिस्तान और बांग्लादेश के घुसपैठियों को कठोरतम कदम उठाकर देश से नहीं निकालती न ही देश की वास्तविक उन्नति और जनसँख्या का पता नहीं चलेगा।     

सोशल मीडिया पर पिछले दिनों सीबीएन न्यूज (The Christian Broadcasting Network Inc) की एक वीडियो सामने आई थी। इस वीडियो के वायरल होने के बाद हैदराबाद के कैल्वारी चर्च की चर्चा तेज हो गई।

दावा है कि ये चर्च हर माह 3000 हिंदुओं को ईसाई धर्म में लाता है और इसे चलाने वाले पादरी सतीश कुमार भी ये दावा करते हैं कि उन्होंने अभी तक 3.5 लाख हिंदुओं को धर्मांतरित किया है और उनका प्लान आने वाले समय में 40 कैल्वारी चर्चाों को देश भर में खोलने का है लेकिन भारत में आरएसएस उन्हें ऐसा करने से रोक रहा है।

चर्च परिसर को प्रशासन ने किया सील

वीडियो को सोशल मीडिया पर पत्रकार देविका ने साझा किया और उसके बाद लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फोरम ने भी इस पर संज्ञान लिया। उन्होंने अपडेट देते हुए अपने ट्वीट में बताया कि इस चर्च की डिजिटल ब्रांच को काकीनाडा के जिला कलेक्टर के आदेश के बाद सील कर दिया गया है। अब ये तो नहीं मालूम कि वीडियो वायरल होने के बाद इस चर्च को लेकर कोई शिकायत हुई या नहीं लेकिन ये पता चला है कि मुख्य चर्च के अलावा इस चर्च की 10 ब्रांच और चल रही हैं।

विदेशी ताकतों को भारतीय मामलों में हस्तक्षेप कराता है

साल 2020 में मिशनकली हैंडल से एक वीडियो भी सामने आई थी। इसमें बताया जा रहा था कि कैसे पादरी सतीष, सरकार के पडार में आने से बचने के लिए धर्मांतरण और जबरन धर्मांतरण जैसे शब्दों का प्रयोग नहीं करते बल्कि इसके अतिरिक्त वो ये कहते हैं कि सरकार उनसे खुश हैं क्योंकि वो नेक उद्देश्यों से गरीबों को भोजन देते हैं। वीडियो में दावा किया गया था कि उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान 700 टन खाना बाँटा था।
पुराने पोस्ट अगर देखें तो पता चलता है कि सतीश पूर्व अमेरीकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस जैसे विदेशी नेताओं से मिलकर भारत में धार्मिक आजादी के मुद्दों पर चर्चा करते हैं और उन्हें यहाँ के मामलों में दखल देने का मौका देते हैं। बाद में विदेशी प्लेटफॉर्मों पर वो रिपोर्ट आती हैं जहाँ भारत पर अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव का आरोप लगता है।
मालूम हो कि पीएम मोदी के सत्ता में आने के बाद यूनाइटेड स्टेट्स कमीशन ऑन इंटरनेशनल रिलीजियस फ़्रीडम (USCIRF) भारत पर वार्षिक रिपोर्ट प्रकाशित करता है जिसमें अक्सर हिंदुओं और मौजूदा सरकार को निशाना बनाया जाता है और अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव का आरोप लगाया जाता है।

कैल्वारी चर्च की स्थापना

कैल्वारी चर्च की स्थापना 2005 में डॉ. सतीश कुमार ने की थी। आज सतीश कुमार को दुनिया के सामने एक सम्मानित पादरी, लेखक और अंतर्राष्ट्रीय वक्ता के रूप में बताया जाता है, लेकिन उनकी मिशनरी गतिविधियों पर बात नहीं होती। भारत में उनकी मिशनरी गतिविधियों और आक्रामक धर्मांतरण रणनीति को लेकर चिंताएँ हैं। कैल्वारी चर्च का दावा है कि उसके पास 400,000 सदस्य हैं जो लगातार बढ़ रहे हैं। उनके लिए ये विस्तार एक उपलब्धि है लेकिन हिंदुओं के चिंता क्योंकि ये संख्या उन्हीं की मजबूरियों का फायदा उठाकर बढ़ाई जा रही है। चर्च को लेकर यह भी दावा है कि इसका निर्माण मात्र 52 दिनों में किया गया था।

हर महीने हो रहा 3000 हिंदुओं का धर्मांतरण

दिलचस्प बात ये है कि सीबीएन ने जो खबर कैल्वारी चर्च के समर्थन में चलाई उससे उस मिशनरी समूह की हकीकत उजागर हो गई। ये चर्च इतनी तादाद में जुड़ रहे लोगों और हर महीने 3000 हिंदुओं के होने ईसाई बनने को अपनी उपलब्धि बताता है लेकिन सामान्य नजरिए से देखें तो पता चलेगा कि किस तीव्रता से यहाँ धर्मांतरण का काम चल रहा है।

बड़ा कैंपस और उपस्थिति अनिवार्य

हैदराबाद के इस चर्च को देश का सबसे बड़ा चर्च कहा जाता है जिसका कैंपस बहुत बड़ा है। हर रविवार सैंकड़ों लोग सभा को अटेंड करने आते हैं। सुबह 4 बजे से भीड़ लगनी शुरू हो जाती है। चर्च के सदस्य भीड़ को नियंत्रित करते हैं। दिलचस्प ये है कि जरूरी नहीं ये भीड़ अपनी मर्जी से यहाँ आए। उनपर दबाव होता है कि वो चर्च आएँ ही आएँ। अगर कोई नहीं आता तो पूछा जाता है कि उशने ऐसा क्यों किया। दिन में करीबन पाँच सत्र रखे जाते हैं जहाँ पादरी लोगों को अपना ज्ञान देते हैं।

लालच देकर धर्मांतरण

कैल्वरी चर्च निर्धन हिंदुओं की गरीबी और आर्थिक अस्थिरता का फायदा उठाकर उन्हें धर्मांतरित करने का प्रयास करता है। यहाँ रविवार को सभा में आने वाले लोगों को तीन बार फ्री में खाने का लालच देकर बुलाया जाता है और दावा किया जाता है कि रविवार को यहाँ आने वाले लोगों की संख्या 50,000 तक पहुँच जाती है जिनके खाने की व्यवस्था महीने में दिए गए 2 लाख मुफ्त मील के बराबर है। इसके अलावा यहाँ मेडिकल सेवाएँ, विवाह व्यवस्था और अंतिम सस्कार के लिए सुविधा आदि देने की बात होती है। बाद में इन्हीं सेवाओं का हवाला देकर हिंदुओं को ईसाई धर्म की ओर आकर्षित करने के प्रयास होते हैं।

हिंदू मंदिरों में प्रथा पुरानी

ये सारी सेवाएँ वहीं हैं जिन्हें तमाम हिंदू मंदिर बिन किसी प्रचार के और बिन किसी को लालच दिए सालों से करते आए हैं। रही बात निशुल्क खाने की तो जगह-जगह मंदिरों में पवित्र ढंग से खाना बनाकर जरूरतमंदों को दिया जाता है और उसे भंडारा कहते हैं। बावजूद इतने प्रयासों लोग हिंदू मंदिरों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाते हैं और कैल्वारी चर्च जैसे मिशनरी एजेंडे को परोपकार का नाम देते हैं।

देश में और वैश्विक स्तर पर विस्तार की मंशा

मालूम हो कि ये चर्च पहले ही अपनी 11 ब्रांच खोल चुका है और 40 और बड़े चर्च खोलने के इरादे रखता है। पादरी की यह मंशा चिंताजनक इसलिए है क्योंकि इस विस्तार के जरिए वो हिंदू और अन्य समुदाय के लोगों से जुड़ेंगे और इसके अलावा विदेशी ईसाई संस्थाओं की घुसपैठ होगी। यह चर्च पहले ही भारतीय भाषाओं में टेलिविजन कार्यक्रम प्रसारित करता है तथा खाड़ी देशों में लाखों लोगों तक पहुँचाता है।

ट्रैकिंग सिस्टम में समस्या

हैरान करने वाली बात ये हैं कि इस चर्च से जुड़ने के बाद ये चर्च लोगों को ट्रैक करता है। जब हर रविवार भीड़ जुटती है तो उसकी एंट्री के लिए एक एक्सेस कार्ड की व्यवस्था होता है। चर्च का कहना है कि इससे ये अनुपस्थित लोगों के बारे में पता लगाते हैं मगर ये सोचने वाली बात ये है कि क्या किसी धार्मिक व्यवस्था में इस तरह की निगरानी रखा जाना कोई खतरा नहीं है।

भ्रामक दावे

कैल्वारी चर्च ये आरोप लगाता रहा है कि हिंदू संगठन ईसाइयों पर हमले करते हैं जबकि वो ऐसा सिर्फ इसलिए करते हैं क्योंकि हिंदू उन्हें अब लाचार लोगों को बरगलाने का मौका नहीं दे रहे या उनके चमत्कारों की पोल खोल रहे हैं।

फंडिग का अता-पता नहीं

कैल्वारी चर्च को फंडिंग कहाँ से मिलती है इसकी कोई जानकारी उपलब्ध नहीं है। हालाँकि हमारी जाँच से पता चलता है कि उन्हें दो मौकों पर ब्रिटेन स्थित क्रिश्चियन विजन से पर्याप्त फंडिंग मिली थी। 2020 में, उन्हें £74,467 मिले , और 2021 में, उन्हें क्रिश्चियन विजन से £727,394 मिले । ऑपइंडिया इस बात की पुष्टि नहीं कर सका कि कैल्वरी टेम्पल इंडिया के पास FCRA लाइसेंस है या नहीं।

धर्मांतरण पर बढ़ रही चिंताएँ

कैल्वारी चर्च अगर अपने मकसद पर आगे बढ़ता है तो ये भारत के लिए चिंताजनक बात होगी। सरकार को जल्द से जल्द धर्मांतरण कार्यक्रमों को रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए वरना ऐसे लोग गरीब, वंचित और शोषित लोगों को बरगलाकर धर्मांतरित कराते रहेंगे।

केरल के 6 चर्च पर होगा सरकार का कंट्रोल, हाई कोर्ट का आदेश: ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट गुट के बीच का विवाद

                                                             चर्च (साभार: न्यू इंडियन एक्सप्रेस)
हाल ही में केरल हाई कोर्ट ने एर्नाकुलम और पलक्कड़ के जिला कलेक्टरों को मलंकारा ईसाई के 6 चर्चों को अपने कब्जे में लेने का निर्देश दिया है। दरअसल, मलंकारा ईसाई के दो गुटों- जैकोबाइट और ऑर्थोडॉक्स, के बीच इनको लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। हाई कोर्ट ने यह आदेश ऑर्थोडॉक्स गुट के दो पादरियों (याचिकाकर्ता) द्वारा दायर अवमानना ​​याचिका पर दी।

केरल हाई कोर्ट के जज वीजी अरुण ने न्यायालय के 2022 के निर्देशों की घोर अवज्ञा की आलोचना की। इन निर्देशों में मलंकारा ऑर्थोडॉक्स चर्च (ऑथोडॉक्स गुट) के सदस्यों को इन चर्चों में प्रवेश करने और उन्हें शांतिपूर्वक ढंग से प्रार्थना करने की अनुमति दी गई थी। जैकोबाइट ईसाइयों ने ऑर्थोडॉक्स ईसाइयों को चर्च में घुसने से रोक देते थे।

न्यायाधीश ने कहा कि उनके पास जिला कलेक्टरों को इन चर्चों का कब्ज़ा अपने हाथ में लेने को कहने के सिवाय कोई विकल्प नहीं है। अदालत ने कहा, “आधिकारिक प्रतिवादियों के अड़ियल रवैए और पार्टी प्रतिवादियों (जैकबाइट गुट) द्वारा निर्देशों की अवहेलना के कारण इस अदालत के पास अवमाननापूर्ण कृत्यों को रोकने के लिए निर्देश जारी करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है।”

राज्य सरकार ने कोर्ट को बताया कि बुजुर्ग पुरुषों, महिलाओं और बच्चों सहित जैकोबाइट गुट के ईसाइयों का एक बड़ा समूह चर्च में घुसने से रोकता है। सरकार ने कहा कि उसने कोर्ट के निर्देशों को लागू करने के लिए ईमानदारी से प्रयास किए थे। हालाँकि, जैकोबाइट्स के बड़े आंदोलन के कारण उसे पीछे हटना पड़ा। कोर्ट को बताया गया कि सरकार के हस्तक्षेप से जानमाल का नुकसान हो सकता है।

जैकोबाइट गुट के सदस्यों ने कोर्ट से कहा कि चर्च को ऑर्थोडॉक्स गुट को नहीं सौंपा जा सकता है। कोर्ट ने उनकी आपत्तियों को खारिज कर दिया और एर्नाकुलम के जिला कलेक्टर को तीन चर्चों- ओडक्कली स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च, पुलिंथानम स्थित सेंट जॉन्स बेस्फैज ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और मझुवन्नूर स्थित सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च का कब्जा अपने हाथ में लेने का आदेश दिया।

वहीं, पलक्कड़ के जिलाधिकारी को मंगलम डैम स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स चर्च, एरिकिनचिरा स्थित सेंट मैरी ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च और चेरुकुन्नम स्थित सेंट थॉमस ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च की कमान अपने हाथ में लेने को कहा। दोनों कलेक्टरों को 30 सितंबर 2024 तक इसकी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करने का आदेश दिया गया है। इसी दिन मामले की अगली सुनवाई होगी।

केरल हाई कोर्ट ने इस इन चर्चों को कब्जा में लेने के दौरान कानून-व्यवस्था को लेकर दोनों जिलों के पुलिस प्रमुखों को भी निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने इन दोनों जिलों के पुलिस प्रमुखों को कहा गया है कि वे अधिग्रहण में सहायता के लिए पर्याप्त संख्या में पुलिस बल तैनात करें, ताकि कोर्ट के आदेशों को बिना देरी के लागू किया जा सके।

क्या है ऑर्थोडॉक्स एवं जैकोबाइट गुट के बीच विवाद

दरअसल, ऑर्थोडॉक्स और जैकोबाइट गुट शुरू में एक ही चर्च का हिस्सा थे, लेकिन चर्च की निष्ठा को लेकर दोनों के बीच मतभेद हो गया और दोनों अलग हो गए। ऑर्थोडॉक्स गुट ने केरल के एक बिशप (मलंकरा मेट्रोपोलिटन) के प्रति अपनी निष्ठा की प्रतिज्ञा की, जबकि जैकोबाइट गुट एंटिओक के पैट्रिआर्क को अपना धार्मिक प्रमुख मानता है।
मतभेद के बाद दोनों गुटों में इस बात पर विवाद शुरू हो गया कि केरल में विभिन्न चर्चों का प्रशासन किस गुट को सौंपा जाना चाहिए। मतभेद आखिरकार विभाजन में बदल गया और यह विवाद अंततः सुप्रीम कोर्ट तक पहुँच गया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कुछ निर्देश भी दिए थे। यह केस के.एस. वर्गीस बनाम सेंट पीटर्स एंड पॉल्स सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च के नाम से जाना जाता है।
साल 2017 में के.एस. वर्गीस बनाम सेंट पीटर्स एंड पॉल्स सीरियन ऑर्थोडॉक्स चर्च एवं अन्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कई विवादित मुद्दों पर ऑर्थोडॉक्स चर्च के पक्ष में फैसला दिया था। इसके लिए सुप्रीम कोर्ट ने साल 1934 में तैयार किए गए एक दस्तावेज़ (1934 का संविधान) पर भरोसा किया और अपने फैसले का आधार इसे बनाया।
अपने फैसले में शीर्ष अदालत ने यह भी कहा था कि जैकोबाइट गुट द्वारा तैयार किए गए साल 2002 के दस्तावेज़ द्वारा चर्चों को चलाने की समानांतर प्रणाली स्थापित नहीं की जा सकती थी। हालाँकि, ऑर्थोडॉक्स गुट ने तब से सुप्रीम कोर्ट के साल 2017 के आदेश को लागू करने में विफलता की बार-बार शिकायत की।
ऐसी ही एक याचिका पर साल 2022 में केरल हाई कोर्ट के सिंगल बेंच जज ने पुलिस को निर्देश दिया कि वह याचिकाकर्ताओं (ऑर्थोडॉक्स गुट) को इन चर्चों में शांतिपूर्वक प्रवेश कराने और उनकी धार्मिक सेवाएँ संचालित करने के लिए जरूरी सहायता करे। इसके बावजूद जैकोबाइट गुट द्वार उन्हें चर्चों में नहीं घुसने दिया जा रहा था। इसलिए ऑर्थोडॉक्स याचिकाकर्ताओं ने हाई कोर्ट का रूख किया।

रूस : चर्च में फायरिंग, यहूदियों के धर्मस्थल को जलाया, पादरी का काटा गला: आतंकी हमले में 15 पुलिसकर्मियों की मौत, 6 आतंकवादी भी ढेर

                                                रूस में चर्च पर हमला (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
रूस में रविवार (23 जून 2024) को दक्षिणी प्रांत दागेस्तान के दो शहरों (माखचकाला और डर्बेंट) में आतंकी हमला हुए। घटना में 15 से ज्यादा पुलिसकर्मियों की मौत हो गई, पादरी का सिर कलम कर दिया गया और 25 से ज्यादा घायल बताए जा रहे हैं। जवाबी कार्रवाई में रूस के सुरक्षाबलों ने भी 6 बंदूकधारियों को मार गिराया है।

जानकारी के मुताबिक, रविवार को आतंकियों ने दो ऑर्थोडॉक्स चर्चों, एक यहूदी प्रार्थना घर और एक पुलिस चौकी पर हथियारों से लैस होकर हमला किया। अटैक में मरने वालों में ऑर्थोडॉक्स चर्च के पादरी भी थे। आतंकियों ने उन्हें अलग से गला काटकर मारा है। उनकी उम्र 66 साल थी। वह 40 साल से चर्च में सेवा दे रहे थे। इसके अलावा चर्च के बाहर तैनात सुरक्षा गार्ड को भी मौत के घाट उतार दिया गया।

वहीं रूसी यहूदी कॉन्ग्रेस ने इस संबंध में बताया है कि डर्बेंट और माखचकाला में एक-एक सिनेगॉग पर हमला किया गया है। डर्बेंट के सिनेगॉग में जब हमला किया गया, उसके 40 मिनट पहले प्रार्थना हो चुकी थी और वहाँ कोई मौजूद नहीं था। हमलावरों ने मोलोटोव कॉकटेल बम से सिनेगॉग (यहूदियों का धर्मस्थल) की बिल्डिंग में आग लगा दी। इस दौरान बाहर खड़े पुलिसकर्मी और सुरक्षा गार्ड हमले में मारे गए।

इस पूरे हमले पर अभी किसी संगठन ने जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन TASS ने बताया कि हमलावर एक अंतरराष्ट्रीय आतंकवादी संगठन के सदस्य थे। वहीं रूस ने हमलों के पीछे पीछे यूक्रेन और NATO देशों को जिम्मेदार ठहराया है। दागिस्तान के नेता अब्दुलखाकिम गडजियेव ने टेलीग्राम पर लिखा, “इसमें कोई शक नहीं है कि ये आतंकी हमले किसी न किसी तरह से यूक्रेन और NATO देशों की खुफिया सेवाओं से जुड़े हैं।”

इससे पहले रूस में मार्च में आतंकी हमला हुआ था। उस हमले में 143 लोगों की मौत हो गई थी। हमले की जिम्मेदारी ISIS-K ने ली थी। हालाँकि, रूस ने इसमें यूक्रेन की मिलीभगत होने के आरोप लगाए थे। इस बार अभी तक किसी संगठन ने इस हमले की जिम्मेदारी नहीं ली है, लेकिन ये सामने आया है कि दागेस्तान रूस का एक बड़ी मुस्लिम आबादी वाला प्रांत है, जो चेचन्या के पड़ोस में है। क्षेत्र में 14, 25, 26 जून को तीन दिनों के लिए शोक रखा गया है।

कब-कहाँ-कैसे करें सेक्स, चर्च में शादी के बाद थमाया नोट: महिला की आपबीती सुन हाई कोर्ट भी हैरान

2012 में केरल के एक चर्च में उसकी शादी हुई। पहली ही रात ससुरालवालों ने उसे एक नोट थमाया। इसमें बताया गया था कि वह कब, कहाँ और कैसे सेक्स करे, जिससे वह एक ‘संस्कारी बच्चा’ पैदा कर सके। इस महिला की आपबीती सुनकर केरल हाई कोर्ट के जस्टिस भी हैरान रह गए।

हाई कोर्ट में याचिका दायर कर पीड़ित महिला ने ससुराल वालों पर कार्रवाई की माँग की है। उसका कहना है कि ससुराल के लोग उसे लड़का पैदा करने के लिए अलग-अलग तरीके बताते थे। इसके लिए नोट देते थे। एक पाउडर भी दिया गया था।

केरल का है मामला

39 वर्षीय पीड़ित महिला केरल के कोल्लम जिले की रहने वाली है। उसने न्याय पाने के लिए केरल हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। महिला ने बताया है कि उसकी 12 अप्रैल 2012 को मुवात्तुपूजा के होली मैगी चर्च में शादी हुई थी। शादी की रात पति ने उसे एक नोट दिया। इस नोट में इस बात को लेकर जानकारी दी गई थी कि वह कैसे एक लड़के को जन्म देने के लिए गर्भधारण कर सकती है।
इस नोट में बताया गया था कि किस समय, किस जगह और किस तरीके से संभोग करने पर 95% संभावना एक अच्छे, गोरे और बुद्धिमान लड़के को पैदा करने की है। महिला ने बताया कि उसके ससुराल वालों ने दावा किया यही विधि अमेरिका में रहने वाले उनके एक रिश्तेदार भी आजमा चुके हैं।
महिला ने बताया कि उसकी सास ने उसे कुछ पाउडर खिलाए और कहा कि इससे गोरा लड़का पैदा होगा। जो नोट महिला को दिया गया था, उसमें उससे गर्भ के दौरान महान व्यक्तित्वों के विषय में सोचने को कहा गया था। जब महिला ने सास से इस विषय में पूछा तो उनका जवाब सन्न करने वाला था। महिला से उसकी सास ने कहा कि ‘लड़कियाँ आर्थिक बोझ’ होती हैं, इसलिए वह अपने घर में लड़की नहीं पैदा होते देखना चाहती। महिला का कहना था कि लड़कियाँ पैसे ले जाती हैं, जबकि लड़के पैसे लाते हैं। महिला ने कहा है कि यह बहुत ही अपमानजनक था।
महिला ने बताया कि वह 2014 में अपने पति के साथ ब्रिटेन चली गई थी। यहाँ जब वह गर्भवती हो गई तो उसके पति ने उसके साथ बदसलूकी की। उसके पति ने आरोप लगाया कि वह गलत समय पर गर्भवती हुई है। पति ने उसके साथ अत्याचार करते हुए तीन माह बाद उसे घर भेज दिया, जहाँ कुछ समय बाद उसने एक लड़की को जन्म दिया।
महिला ने बताया कि बेटी के पैदा होने के बाद पति उससे और भी खिन्न हो गया। वह बेटी और उससे मिलने भी नहीं आता था और ना ही बेटी के लालन-पालन में कोई रूचि दिखाता था। महिला ने बताया कि वह अपनी बेटी को लेकर इस दौरान एक माह के लिए ब्रिटेन भी गई। लेकिन एक माह तक उसका पति अपनी बच्ची को देखने भी नहीं आया।

तलाक के बाद भी पीड़ा

महिला ने बताया कि वह इन सब चीजों से परेशान हो गई थी। बीते कुछ समय से तलाक की कार्यवाही चल रही थी। इसके अंतर्गत 2022 में अदालत ने निर्णय दिया कि उसके पति को हर महीने भरण-पोषण की धनराशि देनी होगी। इसके विरुद्ध भी उसके पति ने एक याचिका डाल दी। महिला ने बताया कि इसके बाद उसने कानूनी बारीकियों के विषय में जानकारी इकट्ठा की और अपने पति तथा ससुराल पक्ष के विरुद्ध मुकदमा दायर करने का निर्णय लिया।
महिला ने गर्भधारण पूर्व और प्रसवपूर्व निदान तकनीक अधिनियम, 1994 के तहत अपने ससुराल पक्ष के विरुद्ध मुकदमा दायर किया है। यह किसी महिला के गर्भधारण के दौरान बच्चे के लिंग की जाँच या निर्धारण सम्बन्धी कार्यों पर रोक लगाता है। यह क़ानून देश में बच्चियों को कोख में ही मार दिए जाने से रोकने के लिए लाया गया था। केरल हाई कोर्ट ने इस मामले में महिला के पति और उसके परिजनों से जवाब माँगा है। अगली सुनवाई 29 फरवरी को है।

वायनाड में चर्च ने जमीन कब्जाया, सरकार ने 100 रूपए प्रति एकड़ पर दे दिया पट्टा: केरल HC ने रद्द किया आवंटन

                                                                   पिनराई विजयन (साभार: TFIPost & Vidhuraj M.T.)
केरल उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार द्वारा कल्लोदी सेंट जॉर्ज फोरेन चर्च को सिर्फ 100 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से 5.5358 हेक्टेयर (लगभग 13.7 एकड़) भूमि के आवंटन को रद्द कर दिया है। केरल सरकार ने यह आवंटन साल 2015 में किया था। चर्च ने उस भूमि पर अतिक्रमण कर लिया था। इसके बाद राज्य सरकार ने उस सरकारी भूमि को चर्च को आवंटित कर दिया था।

जस्टिस पीवी कुन्हिकृष्णन ने कहा कि सरकार का यह निर्णय जनजातीय समुदायों के लोगों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है, क्योंकि जिले में सैकड़ों भूमिहीन जनजातीय समुदाय के लोग कृषि तथा आवासीय भूखंडों की प्रतीक्षा कर रहे थे। कोर्ट ने कहा कि सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने वाले किसी लाभ के हकदार नहीं हैं। अतिक्रमण वाली संपत्ति आवंटित करने में कोई सार्वजनिक हित नहीं है।

कोर्ट ने कहा, “गरीब भूमिहीन जनजातीय समुदाय को लोग अपनी आजीविका और कृषि के लिए भूमि पाने के लिए आंदोलन कर रहे हैं… ऐसी स्थिति में एक्सटेंशन पी 5 (सरकारी आदेश) के तहत भूमि असाइनमेंट की शक्तियों का उपयोग करते हुए 5वें प्रतिवादी (चर्च) को बड़ी सरकारी भूमि सौंपी जाती है।”

कोर्ट ने आगे कहा, “मेरी राय है कि यह न केवल अवैध है, बल्कि याचिकाकर्ताओं (जनजातीय समुदाय को लोगों) सहित जनजातीय समुदाय के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन करता है। यह वायनाड में हमेशा मुस्कुराते रहने वाले मासूम जनजातीय लोगों के दिलों पर चाकू से वार करने के अलावा और कुछ नहीं है।” बता दें कि वायनाड में जनजातीय समुदाय के लोगों की आबादी लगभग 20 प्रतिशत है।

न्यायालय ने कहा, “किसी भी व्यक्ति को सरकारी भूमि की रजिस्ट्री पर असाइनमेंट का दावा करने का कोई अधिकार नहीं है। सरकारी भूमि पर अतिक्रमण करने और उस पर अवैध निर्माण करने से अतिक्रमणकारियों को कोई अधिकार नहीं मिलेगा। सरकारी भूमि को वंचितों को आवंटित किया जाना चाहिए, न कि अमीर और शक्तिशाली लोगों को।”

कोर्ट ने यह भी कहा कि चर्च को वर्तमान बाजार मूल्य पर संपत्ति खरीदने का अवसर दिया जाना चाहिए। यदि चर्च सहमत नहीं है तो सरकार को भूमि वापस ले लेनी चाहिए और इसे पात्र व्यक्तियों में वितरित करना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि यदि चर्च जमीन खरीदता है तो उसकी बिक्री से प्राप्त पूरी राशि का उपयोग वायनाड में जनजातीय समुदाय के कल्याण के लिए किया जाना चाहिए।

दरअसल, कोर्ट का यह फैसला वायनाड में भूमिहीन जनजातीय समुदाय से आने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह द्वारा दायर याचिका पर दिया गया था। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि जुलाई-अगस्त 2001 में 32 जनजातीय लोगों की भूख से मौत हो गई थी। विरोध प्रदर्शन के बाद राज्य सरकार के साथ सात सूत्री समझौता हुआ था। इसमें उन्हें पाँच एकड़ जमीन देने की बात कही गई थी।

कोर्ट को यह बताया गया कि चर्च ने 1962 के बाद से वायनाड जिले के मननथावडी तालुक में 5.5358 हेक्टेयर भूमि पर अवैध रूप से अतिक्रमण किया था। चर्च ने उस भूमि का पट्टाया (भूमि दस्तावेज) प्राप्त करने के लिए कई जगहों पर आवेदन किया, लेकिन वह खारिज हो गया। इसके बाद राज्य सरकार ने ₹100 प्रति एकड़ की दर से भूमि सौंपने के लिए एक सरकारी आदेश जारी किया गया था।

केरल : केक खिलाया, पोर्न दिखाया…फिर किया 13 साल के नाबालिग का यौन उत्पीड़न

प्रतीकात्मक तस्वीर
केरल के तिरुवनंतपुरम में एक पादरी ने नाबालिग बच्चे का यौन शोषण कर इंसानियत को शर्मसार कर दिया। केरल पुलिस ने शुक्रवार (19 जनवरी,2024) को कट्टक्कडा के पेंटेकोस्टल चर्च के इस पादरी को कोर्ट में पेश किया। यहाँ से आरोपित को न्यायायिक हिरासत में भेज दिया।

इस पादरी के खिलाफ POCSO (यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण) अधिनियम के तहत केस दर्ज किया गया है। पुलिस के मुताबिक, 59 साल के इस पादरी की पहचान रविन्द्रनाथ के तौर पर की गई। रविन्द्रनाथ ने 13 साल के बच्चे को पहले अपनी बातों से फुसलाया। इसके बाद उसका यौन शोषण किया।

ये घटना आरोपित को हिरासत में लेने से दो दिन पहले 17 जनवरी 2024 की है। बताते चलें कि इस लड़के को इसकी माँ छोड़ कर चली गई है। वो अपनी अपनी दादी के साथ रहता है।

घटना के दिन बच्चे की दादी अस्पताल गई थीं। इसी का फायदा उठाकर पादरी ने बच्चे को बहकाया- फुसलाया और अपने घर ले गया। घर ले जाकर पादरी ने उसे केक खिलाया। उसने कथित तौर पर उसे टैबलेट पर अश्लील फोटो दिखाईं और फिर उसका यौन उत्पीड़न किया।

दक्षिण भारत में पादरियों के बच्चों और औरतों के यौन शोषण करने का ये पहला मामला नहीं है। इससे पहले बीते साल तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में एक महिला ने नींद की 40 गोलियाँ निगल आत्महत्या की कोशिश की थी। महिला ने पादरी के यौन शोषण से तंग थी।

आरोपित पादरी 39 साल जगन था। उसका महिला से पहचाना चर्च में प्रार्थना के लिए आने-जाने के दौरान हुआ था। इससे पहले मार्च 2023 में तमिलनाडु के कन्याकुमारी में एक पादरी नर्सिंग छात्रा के यौन शोषण के आरोप में गिरफ्तार किया गया था।

अमेरिका : पादरी के पास मिलीं 600 बच्चों की नंगी तस्वीरें: स्विट्जरलैंड में पादरियों ने 1000+ का किया यौन शोषण, 74% नाबालिग

                                    चर्च जहाँ अमेरिकी पादरी काम करता था (चित्र साभार: लॉस एंजिल्स टाइम्स)
अमेरिका के शहर लॉस एंजिल्स में एक पादरी के पास बच्चों की 600 से अधिक आपत्तिजनक फोटो फोटो बरामद हुई हैं। यह पादरी लॉस एंजिल्स के इलाके लॉन्ग बीच के एक चर्च में कार्यरत था। आरोपित को महीनों की जाँच के बाद गिरफ्तार कर लिया गया है।

अमेरिका: पादरी के पास बच्चों की नंगी तस्वीरें

अमेरिकी समाचार वेबसाइट ‘लॉस एंजिल्स टाइम्स‘ के अनुसार, शहर के लॉन्ग बीच इलाके के कैथोलिक पादरी रोडोल्फो मार्टिनेज ग्वेरा (38) को गिरफ्तार किया गया जो कि चर्च व्यवस्था में काफी वरिष्ठ था। उसके खिलाफ कई रिपोर्ट बच्चों के गुमशुदगी विभाग में भेजी गईं। पादरी के खिलाफ अप्रैल में जाँच चालू की गई थी।
जाँच में पाया गया कि पादरी के पास 600 से अधिक बच्चों के यौन शोषण की तस्वीरें थी। इसमें अधिकांश तस्वीरें 12 वर्ष के कम आयु के बच्चों की थी। मामले में शामिल होने वाले वकीलों का कहना है कि जिस पादरी पर यह आरोप हैं वह काफी शक्तिशाली है। मामले में शामिल वकील एरिक नासरेंको ने कहा, “आरोपित के अपराध विश्वास घटाते हैं और इनमें बड़ी संख्या में बालकों के यौन शोषण की तस्वीरें हैं।”
ग्वेरा को बुधवार (13 सितंबर, 2023) को कोर्ट के सामने पेश किया जाएगा। अभी वह पुलिस की हिरासत में है।

स्विट्जरलैंड: पादरियों ने 1002 का किया यौन शोषण

इस मामले के अलावा स्विट्ज़रलैंड से भी एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है। यहाँ एक रिसर्च में पाया गया है कि वर्ष 1950 से लेकर अब तक चर्च के पादरियों एवं अन्य कर्मचारियों ने 1000 से अधिक यौन शोषण किए हैं।
ज्यूरिख विश्वविद्यालय द्वारा की गई एक रिसर्च में सामने आया है कि स्विस कैथोलिक पादरियों एवं कर्मचारियों द्वारा 1000 से अधिक यौन शोषण किए गए जिसमें से 74% पीड़ित नाबालिग थे। इस रिसर्च के लिए पीड़ितों से बात की गई और पुराने मामलों को खंगाला गया। हैरान करने वाली बात यह है कि अधिक शोषण पुरुषों का हुआ है। रिसर्च में बताया गया है कि पीड़ितों में 56% पुरुष थे जबकि 39% महिलाएँ थीं, 5% के विषय में जानकारी जुटाई नहीं जा सकी। रिसर्च करने वालों ने यह भी कहा है कि यह सभी अपराधों का छोटा सा नमूना है और असल संख्या कहीं अधिक हो सकती है।

उत्तर प्रदेश : महादेव की नगरी में ईसाई धर्मांतरण के लिए 50000 रूपए का लालच ; बाहर से ‘सत्संग भवन’, अंदर से चर्च

                        उत्तर प्रदेश के वाराणसी में चर्च के अंदर धर्मान्तरण की शिकायत पर पहुँचे हिन्दू संगठन
उत्तर प्रदेश के वाराणसी एक एक चर्च में में धर्मान्तरण के प्रयास का एक नया मामला सामने आया है। आरोप है कि एक चर्च संचालक ने लोगों को धर्म परिवर्तन के लिए उकसाते हुए पैसे का लालच भी दिया था। ‘हिन्दू जागरण मंच’ के सदस्यों ने चर्च मे पहुँच कर कार्यक्रम को रोकने का दावा किया है। इसी के साथ उन्होंने थाने में तहरीर दे कर आरोपितों पर कार्रवाई की माँग की है। आरोपित पॉस्टर को हिन्दू संगठनों ने पुलिस को सौंप दिया है। पुलिस ने मामले में जाँच कर के कार्रवाई का भरोसा दिया है। घटना रविवार (16 अक्टूबर, 2022) की है।

घटना वाराणसी देहात के थानाक्षेत्र फूलपुर की है। आरोप है कि यहाँ के बावतपुर इलाके में छोटेलाल जायसवाल नाम का व्यक्ति चर्च चलाता था। चर्च का नाम ‘सर्व इंडिया मिनिस्ट्री’ है। इस चर्च पर ‘सत्संग भवन’ लिखा हुआ है। बाबतपुर क्षेत्र में ही वाराणसी का एयरपोर्ट भी है। छोटेलाल स्थानीय बाबतपुर क्षेत्र का ही रहने वाला है। हिंदू संगठनों द्वारा थाने में दी गई शिकायत के मुताबिक, आरोपित चर्च संचालक ने हिन्दू धर्म के लोगों को धर्म परिवर्तन करने पर 50 हजार रुपए प्रति व्यक्ति का वादा किया। आरोप यह भी लगाया गया है कि छोटेलाल ने इसके लिए 2-2 हजार रुपए एडवांस में भी दिए थे।

                                                                शिकायत कॉपी

जिन लोगों को धर्मान्तरण के लिए एडवांस पैसे दिए गए थे उनके नाम गौरव सिंह और वैभव सिंह हैं। ऑपइंडिया के पास शिकायत कॉपी मौजूद है। इस शिकायत कॉपी में आगे बताया गया है कि रविवार के दिन धर्मान्तरण की साजिश के तहत सभी को चर्च आने के लिए भी कहा गया था। इस घटना का एक वीडियो भी ऑपइंडिया के पास मौजूद है, जिसमें हिन्दू संगठन के लोग कार्यक्रम के बीच में पहुँच कर छोटेलाल को धर्मान्तरण रोकने के लिए कह रहे हैं। इसी वीडियो में कुछ महिलाएँ भी दिखाई दे रही हैं, जो हिन्दू संगठनों से बहस कर रही हैं।

हिन्दू संगठनों का आरोप है कि जब वो चर्च में पहुँचे तब वहाँ धर्मान्तरण करवाया जा रहा था। ‘धर्म जागरण मंच’ के सदस्यों के मुताबिक, मौके से सदस्यता फार्म और स्टील से बना ईसाई क्रॉस मिला है। फादर छोटेलाल को हिन्दू संगठनों ने पकड़ कर पुलिस के हवाले कर दिया है। घटना की जानकारी होने पर तमाम हिन्दू संगठनों और भाजपा नेताओं ने थाने पर पहुँच कर दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की है।

‘सेक्स करने को कहते हैं पादरी, करते हैं ब्लैकमेल’: ईसाई महिलाओं की याचिका सुनेगा सुप्रीम कोर्ट

                                                                                       प्रतीकात्मक 

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (जनवरी 8, 2021) को केरल की ईसाई महिलाओं की एक रिट याचिका को सुनवाई के लिए स्वीकार कर लिया, जिसमें मालंकारा ऑर्थोडॉक्स सीरियन चर्च में अनिवार्य कन्फेशन की परम्परा को चुनौती दी गई है। याचिका में इसे धर्म और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकारों के विरुद्ध करार दिया गया है। मुख्य याचिकाकर्ता को सुप्रीम कोर्ट ने याचिका में संशोधन कर और नए फैक्ट्स आलोक में लाने की अनुमति भी दे दी है।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस एसए बोबडे, जस्टिस एएस बोपन्ना और जस्टिस रमासुब्रमण्यन की पीठ इस मामले को सुनेगी। हालाँकि, इस दौरान पाँचों ईसाई महिलाओं के वकील मुकुल रोहतगी से सुप्रीम कोर्ट ने पूछा कि वो इस मामले में केरल हाईकोर्ट क्यों नहीं जा रहे हैं। इसके जवाब में रोहतगी ने कहा कि सबरीमाला जजमेंट में ऐसे सवाल उठ चुके हैं, जिस पर 9 सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही है, इसलिए हाईकोर्ट ऐसे विचाराधीन मामलों में फैसला नहीं सुना सकती। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि कन्फेशन के एवज में पादरी यौन फेवर माँगते हैं, सेक्स करने को कहते हैं।

इन महिलाओं का कहना था कि उन्हें अपने चुने हुए पादरी के समक्ष भी कन्फेशन करने दिया जाए। साथ ही ये भी कहा गया कि ईसाई महिलाओं के लिए कन्फेशन अनिवार्य करना असंवैधानिक है, क्योंकि पादरियों द्वारा इसे लेकर ब्लैकमेल करने की घटनाएँ सामने आई हैं। केरल और केंद्र की सरकारों को भी इस मामले में पक्ष बनाया गया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में भारत के अटॉर्नी जनरल केसी वेणुगोपाल से भी प्रतिक्रिया माँगी है। AG ने बताया कि ये मामला मालंकारा चर्च में जैकोबाइट-ऑर्थोडॉक्स गुटों के संघर्ष से उपज कर आया है।

ये संघर्ष भी सुप्रीम कोर्ट पहुँचा था, लेकिन तीन जजों की पीठ ने इस मामले की सुनवाई के बाद फैसला दे दिया था। मुकुल रोहतगी ने ध्यान दिलाया कि ऐसे मामले संवैधानिक अधिकारों के साथ-साथ ये भी देखना होगा कि क्या कन्फेशन एक अनिवार्य धार्मिक प्रक्रिया हुआ करती थी। किसी बिलिवर की ‘राइट टू प्राइवेसी’ का धार्मिक प्राधिकरण के आधार पर पादरी द्वारा उल्लंघन किया जा सकता है या नहीं, उन्होंने इस पर भी विचार करने की सलाह दी।

उन्होंने आरोप लगाया कि कुछ पादरी महिलाओं द्वारा किए गए कन्फेशन का गलत इस्तेमाल करते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामले व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर अलग-अलग हो सकते हैं, जिस पर रोहतगी ने कहा कि वो याचिका में संशोधन कर ऐसी घटनाओं को जोड़ेंगे। कन्फेशन को लेकर इससे पहले भी याचिकाएँ आ चुकी हैं। कन्फेशन के अंतर्गत लोग पादरी की उपस्थिति में अपने ‘पापों’ को लेकर प्रायश्चित करते हैं।

2018 में केरल हाईकोर्ट ने कन्फेशन को हटाने की याचिका को रद्द करते हुए कहा था कि जब कोई किसी खास धर्म को मानता है तो इसका अर्थ है कि वो इसके अंतर्गत आने वाले नियम-कानूनों को भी स्वीकार करता है। हाईकोर्ट ने कहा था कि ये प्रक्रिया ईसाई महजब का एक अंग रहा है और याचिककाकर्ता किसी धर्म की परम्पराओं से नाराज हैं तो वो उसे छोड़ सकते हैं। NCW भी यौन शोषण के आरोपों के कारण इस प्रक्रिया को बंद करने की सलाह दे चुका है।

केरल के एक नन ने अपनी आत्मकथा में आरोप लगाया था कि एक पादरी अपने कक्ष में ननों को बुला कर ‘सुरक्षित सेक्स’ का प्रैक्टिकल क्लास लगाता था। इस दौरान वह ननों के साथ यौन सम्बन्ध बनाता था। उसके ख़िलाफ़ लाख शिकायतें करने के बावजूद उसका कुछ नहीं बिगड़ा। उसके हाथों ननों पर अत्याचार का सिलसिला तभी थमा, जब वह रिटायर हुआ। सिस्टर लूसी ने लिखा था कि उनके कई साथी ननों ने अपने साथ हुई अलग-अलग घटनाओं का जिक्र किया और वो सभी भयावह हैं।