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पैरों में बाबासाहेब की तस्वीर पर लालू यादव को नोटिस, SC-ST कमीशन ने माँगा 15 दिन में जवाब

                                                                                              साभार 
आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आजकल चर्चा में हैं। उनकी मुश्किलें बढ़ गई हैं। बाबा साहेब के अपमान के एक मामले में राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने उन्हें नोटिस भेजा है। आयोग ने लालू यादव से 15 दिनों के भीतर स्पष्टीकरण मांगा है। उनसे पूछा गया है कि उनके खिलाफ क्यों न अनुसूचित जाति-जनजाति अत्याचार अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया जाए। यह नोटिस लालू यादव को उनके जन्मदिन पर बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की तस्वीर के कथित अपमान के लिए भेजा गया है। इस घटना के बाद से राजनीतिक माहौल गरमा गया है।

डॉक्टर भीमराव अम्बेडकर का अपमान करने के मामले में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की मुश्किलें बढ़ गई हैं। उनके जन्मदिन का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमे बाबासाहेब की एक तस्वीर उनके पैरों में दिखाई दे रही है। इस पर बिहार राज्य अनुसूचित जाति आयोग ने उन्हें नोटिस जारी किया है।

आयोग ने लालू यादव से 15 दिन के भीतर स्पष्टीकरण माँगा है। साथ ही चेतावनी दी है कि अगर जवाब नहीं मिला तो उनके खिलाफ एससी-एसटी अत्याचार अधिनियम के तहत एफआईआर दर्ज करवाई जाएगी।

पूरा मामला बुधवार (11 जून 2025) लालू प्रसाद यादव के जन्मदिन से जुड़ा है। सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो में दिख रहा है कि एक व्यक्ति उन्हें बाबा साहेब आंबेडकर की तस्वीर भेंट करता है और लालू यादव के साथ फोटो खिंचवाता है। लेकिन इस दौरान वह तस्वीर लालू यादव के पैरों के पास रखी नजर आती है।

वीडियो के वायरल होते ही इस पर विवाद शुरू हो गया। बीजेपी ने इस मुद्दे पर लालू यादव को घेरा है, जबकि जेडीयू नेता अशोक चौधरी ने कहा कि जब लालू यादव की तबीयत ठीक नहीं है तो उन्हें इस तरह के आयोजनों से परहेज करना चाहिए। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब की तस्वीर का सम्मान होना चाहिए था।

अंधा कानून तो सुना था लेकिन असल में अंधे तो मीलॉर्ड हैं, लगता है “थूका और मुता” हुआ खाने की उन्हें आदत पड़ गई है; शरिया चलेगा सुप्रीम कोर्ट के Proxy Rule से

 सुभाष चन्द्र

मैं बहुत पहले से कह रहा हूं कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकीलों की सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मिलकर चांडाल चौकड़ी बनी हुई है जो मनमाने फैसले करा लेते हैं।  सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ऋषिकेश रॉय एंड जस्टिस SVN भट्टी ने सिंघवी की अर्जी पर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रुट पर दुकानदारों को नाम दर्शाने के आदेश पर बिना समय गवाएं रोक लगा कर उप्र, UKhand और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर दिया।

मीलॉर्ड में सिंघवी और याचिकाकर्ता से यह पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि नाम छुपाकर धंधा क्यों किया जा रहा है? यह जघन्न अपराध है, क्यों ऐसे अपराधी को बचाने आये हो? दूसरे, जब यूपीए सरकार ने इस कानून को बनाया था, तब क्यों नहीं लागु किया? ये कैसा सेकुलरिज्म है जो असली नाम बताने से खतरे में आ गया है?

मीलॉर्ड बड़े तमतमाए हुए थे योगी सरकार के आदेश पर और बोले कि “दोनों राज्यों के आदेश को लागू होने से नहीं रोका गया तो Secularism और संविधान” के प्रावधानों का उल्लंघन होगा
।

जजों ने कहा कि दुकानों को सिर्फ यह बताना होगा कि वह मांसाहार बेचते हैं या शाकाहारी खाना। 

लगता है सुप्रीम कोर्ट को Secularism ही खतरे में नहीं लगा बल्कि “इस्लाम भी खतरे में” दिखाई दे गया। आपने यह तो बताने को कहा कि मांसाहार बेचते है या शाकाहारी खाना लेकिन यह बताने के लिए नहीं कहा कि “भोजन में थूकते हैं या नहीं, या पेशाब मिलाते हैं या नहीं और जो फल सब्जियां ग्राहकों को परोसते हैं उन पर पेशाब का छिड़काव करते हैं या नहीं”।

मीलॉर्ड ये हम नहीं कह रहे, ये मुसलमान खुद कहते हैं कि थूक लगा कर काफिरों को खाना देना उनका मजहब कहता है। उसे देख कर ही मैं कहता हूं कि हो सकता है न्याय अंधा हो लेकिन असल में जज ही अंधे हैं जो देखते हुए भी आंखें बंद कर लेते हैं। यह बात उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में कबूल भी की है।

लेखक 
चर्चित यूटूबर 

मीलॉर्ड मुसलमानों के वकील बन गए तो उनकी तरफ से आप और सिंघवी जैसे वकील ही बताएं कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर कहता है और उनके भगवानों को भी नहीं मानता और “गज़वा ए हिंद” बनाना चाहता है,तो फिर -

मोहम्मद अनुस का “वैष्णो ढाबा” कैसे - वह “इस्लाम का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद वसीम का “गणपति ढाबा” कैसे - “अल्लाह का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद आदिल का “ओम शिव वैष्णो” ढाबा क्यों - “आदिल का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद शमशेर का “लक्ष्मी शुद्ध वैष्णो” ढाबा क्यों - “रजिया बेगम का ढाबा” क्यों नहीं;

मोहम्मद इरफ़ान का “श्रीनाथ डोसा ढाबा” क्यों, “इरफ़ान का डोसा” क्यों नहीं-

केवल एक केरल के मुस्लिम और हिंदू के रेस्ट्रॉन्ट के बारे में बता कर जस्टिस भट्टी ये प्रमाणपत्र  देना चाहते है कि मुसलमान सफाई रखते है और हिंदू गंदगी रखने वाले बता कर हिंदुओं को बदनाम करना चाहते हैं। ऐसा कीजिए मीलॉर्ड अपने बंगले सरकार से मुस्लिम बस्तियों के नजदीक बनवा कर वहां रह कर देखिए वो कितनी सफाई पसंद हैं। आप आज देते हुए भूल गए कि ईद पर मुसलमान भी हिंदुओं से सामान न खरीदने की कॉल देते हैं लेकिन आपको उन्हीं पर तरस आ रहा है क्योंकि आप सनातन धर्म को ख़त्म करने के मिशन में “Secularists” के  साथ भागीदार हैं।

मीडिया के पत्रकार और अख़बार लगे हैं साबित करने में कि मुलायम सिंह ने 2006 में कोई आदेश नहीं दिया था और 2006 के FSSI एक्ट को तोड़मरोड़ कर बता रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मुलायम की हालत पतली थी जिसकी वजह से उसने 2007 के चुनाव से पहले हिंदुओं को रिझाने के लिए ये आदेश दिए थे। मीलॉर्ड ने FSSI को भी देखना जरूरी नहीं समझा।

मियां जावेद अख्तर कह रहे हैं ये हिटलर का नाजी आदेश है। मियां जी अगर हिटलर राज होता तो आपको इतनी बात कहने पर जेल में डाल दिया जाता।

मुसलमानों को गलत काम करने से रोका जा सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ऐसा चाहता ही नहीं और अभी उम्मीद है संविधान पीठ तलाकशुदा महिलाओं पर दिए गए फैसले को भी पलट देगी।

वाह सुप्रीम कोर्ट वाह ; एक तरफ़ा फैसला बना मजाक ;सुप्रीम कोर्ट ने दुकानदारों के नाम दर्शाने के आदेश पर रोक लगा दी है ; कोर्ट ने यूपीए सरकार द्वारा बनाए कानून का संज्ञान क्यों नहीं लिया?


सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रूट पर दुकानदारों के नाम दर्शाने वाले आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है। सुप्रीम कोर्ट ने इसी के साथ दोनों राज्यों को नोटिस जारी किए हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दुकानों को सिर्फ यह बताना होगा कि वह मांसाहार बेंचते हैं या शाकाहारी खाना।
मुजफ्फरनगर में दो दशक बाद संगम ढाबा सलीम भोजनालय बन गया।अनमोल फ्रूट आइसक्रीम ने अपने मालिक का नाम मोहम्मद कमर आलम बताया है। शीतल ढाबा बन गया अब्दुल ढाबा। मुजफ्फरनगर में चाय लवर पॉइंट का नाम बदलकर अब "वकील अहमद टी स्टॉल" कर दिया गया है। वही नीलम ढाबा अब अरशद ढाबा बन चुका है। मै खुद देहरादून, प्रयागराज के होटलों मे नाम के ठगी का शिकार हो चुका हूँ। और लोग कहते है नाम मे क्या रखा है....
सुप्रीम कोर्ट ने यह नहीं देखा कि हिन्दू देवी-देवताओं को अपमानित करने वाले किस तरह हिन्दुओं के देवी-देवताओं के नाम पर होटल या ढाबा खोले हुए हैं? दूसरे, कोर्ट को यूपीए सरकार द्वारा बनाए कानून का संज्ञान लेना चाहिए था। क्या यह कानून का अपमान नहीं?

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (22 जुलाई, 2024) को जस्टिस ऋषिकेश रॉय और जस्टिस SVN भट्टी ने इस मामले की सुनवाई की। इस संबंध में कांग्रेस नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने याचिका दाखिल की थी। अभिषेक मनु सिंघवी ने दावा किया कि यात्रा के दौरान नाम दिखाने वाला यह आदेश अल्पसंख्यकों के बायकाट का जरिया बनेगा।

सिंघवी ने कोर्ट में यह भी दलील दी कि इस संबंध में स्पष्ट आदेश नहीं है बल्कि आदेश को अस्पष्ट भाषा में लिखा गया है। कोर्ट ने इस पर कहा कि अगर किसी को स्वेच्छा से अपना नाम दुकान पर बताने को कहा गया है कि तो इसमें क्या समस्या है। सिंघवी ने इस पर मामले को बढ़ा चढ़ा कर बताया।

कोर्ट ने कहा कि मामले को तूल देने की जरूरत नहीं है। कोर्ट में जस्टिस रॉय ने इस सुनवाई के दौरान कहा कि वह केरल में एक मुस्लिम द्वारा चलाए जाने वाले मुस्लिम रेस्टोरेंट में जाते थे जबकि हिन्दू द्वारा चलाए जाने वाले में जाने कतराते थे। उन्होंने इसके पीछे साफ़ सफाई का हवाला दिया।

 

 कोर्ट ने कहा कि दुकानों को शाकाहारी या मांसाहारी खाने का प्रकार और उसकी कैलोरी बतानी होंगी। इसके अलावा उन्हें अपना लाइसेंस भी प्रदर्शित करना होगा। कोर्ट ने इसके बाद कहा कि इस आदेश से यह बात पक्की नहीं हो जाएगी कि कांवड़ रूट पर शुद्ध खाना मिले।

कोर्ट ने कहा कि अगर दोनों राज्यों के इस आदेश को लागू होने से नहीं रोका गया तो इससे सेक्युलरिज्म और संविधान के प्रावधानों का उल्लंघन होगा। कोर्ट ने यह भी कहा प्रशासन कांवड़ रूट पर शुद्ध भोजन के लिए खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत आदेश जारी कर सकता है। कोर्ट ने इसी के साथ उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश को नोटिस जारी कर दिया और इन सरकारों के आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी।

सावन मास में कांवड़ रूट पर खाने की शुद्धता बनाए रखने और काँवड़ियों की सुविधा के लिए दुकानदारों के नाम दिखाने का आदेश उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश की सरकार ने दिया था। उत्तर प्रदेश में पहले इसे मुजफ्फरनगर और फिर पूरे प्रदेश में जारी किया गया था जबकि बाद में यह उत्तराखंड में भी लागू किया गया था।

उत्तराखंड पुलिस ने बताया था कि इससे पहले पहचान छुपाने के कारण कई बार विवाद हुए हैं इसलिए नाम दर्शाए जाने चाहिए। इसके बाद इस फैसले के खिलाफ सिंघवी और कुछ संस्थाएँ कोर्ट चली गई थीं, अब इस मामले में यह निर्णय आया है।

दिल्ली : योगी के राज्य में पेट्रोल पंप पर बाप-बेटे द्वारा गुंडई करने के बाद बेटे समेत फरार हुए AAP विधायक अमानतुल्लाह खान; घर पर पहुँची यूपी पुलिस तो गेट पर लगा मिला ताला,

अमानतुल्लाह खान के घर पहुँची यूपी पुलिस, कोई नहीं मिला
आम आदमी पार्टी विधायक अमानतुल्लाह खान ने योगी आदित्यनाथ की सीमा में पेट्रोल पंप पर यह समझ गुंडागर्दी तो कर ली, दिल्ली विधायक हूँ, कुछ नहीं होगा, लेकिन भूल गया कि क्षेत्र अरविन्द केजरीवाल का नहीं योगी का है, जो गुंडों के पर कतरना जानता है। 

उत्तर प्रदेश पुलिस ने दिल्ली के ओखला से AAP विधायक अमानतुल्लाह खान के घर पर दस्तक दी है। शनिवार (11 मई, 2024) को यूपी पुलिस ‘आम आदमी पार्टी’ (AAP) के MLA के बाटला हाउस स्थित आवास पर पहुँची। विधायक अपने बेटे के साथ ही कुछ दिनों से घर से गायब हैं। यूपी पुलिस ने कहा है कि अमानतुल्लाह खान और उनके बेटे जाँच में सहयोग नहीं कर रहे हैं। पेट्रोल पंप पर गुंडागर्दी को लेकर दोनों बाप-बेटे के खिलाफ नोएडा पुलिस ने FIR दर्ज कर रखी है।

नोएडा पुलिस जब अमानतुल्लाह खान के घर पहुँची तो वहाँ ताला लगा हुआ है। ऐसे में पुलिस घर पर नोटिस चस्पा कर लौट गई। आरोप है कि नोएडा के सेक्टर-95 स्थित विधायक का बेटा अनस पेट्रोल पंप पर अपनी कार लेकर पहुँचा था, जहाँ वहाँ उसने लाइन में आगे लगी गाड़ी को आगे बढ़ा कर अपनी गाड़ी में पहले तेल भरने की ज़िद की। सेल्समैन ने नियम का उल्लंघन करने से नकार दिया। इस दौरान अनस और कार में बैठे उसके साथियों ने मारपीट शुरू कर दी।

इसके बाद खुद विधायक अमानतुल्लाह खान वहाँ पहुँचे और उन्होंने पेट्रोल पंप के मैनेजर को धमकाया। दोनों ही घटनाओं का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया। इसी क्रम में ACP अरविन्द कुमार के नेतृत्व में 25 पुलिसकर्मियों की टीम अमानतुल्लाह खान के घर पहुँची। कोतवाली फेज वन और कोतवाली सेक्टर-24 के प्रभारी निरीक्षक ने भी दिल्ली के जामिया मिलिया थाने में उपस्थिति दर्ज कराई। एक एसीपी और 3 थाना प्रभारी 25 सदस्यीय पुलिस दल का नेतृत्व कर रहे थे।

अमानतुल्लाह खान के घर पर नोटिस रिसीव करने के लिए भी कोई नहीं था। इसे चस्पा कर पुलिस वापस लौट आई। नोएडा पुलिस पता लगा रही है कि अमानतुल्लाह खान का किन-किन चुनावी कार्यक्रमों में जाना है। वो तय चुनावी कार्यक्रमों में भी नहीं पहुँच रहे हैं। जाँच के लिए बाप-बेटे से संपर्क नहीं हो पा रहा है, फोन पर भी वो अनुपलब्ध हैं। पुलिस ने मारपीट व धमकी के गवाह जुटा लिए हैं, CCTV फुटेज भी खँगाल लिए गए हैं। FIR में धाराएँ बढ़ाई जा सकती हैं, पुलिस की कई टीमें उनकी खोज में लगी हुई हैं।


जिस कानून के नियम को लेकर घिरे बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण, सुप्रीम कोर्ट में उसी पर उठा सवाल; ‘पतंजलि’ केस में अब IMA ही फँस गया

अवैध विज्ञापन के मामले में ‘पतंजलि आयुर्वेद’ और ‘दिव्य फार्मेसी’ की तरफ से मंगलवार (7 मई, 2024) को सुप्रीम कोर्ट में उन अख़बारों को पेश किया गया, जिनमें बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की कंपनियों की तरफ से माफ़ीनामा जारी किया गया था। इस दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वो राज्यों की लाइसेंसिंग ऑथोरिटीज और केंद्र सरकार द्वारा भ्रामक विज्ञापनों से निपटने के संबंध में उठाए जा रहे क़दमों का विश्लेषण करेगी। सुप्रीम कोर्ट इस दौरान अख़बार के उन पन्नों को देख कर संतुष्ट हुआ, जिनके माध्यम से माफ़ीनामा जारी किया गया था।

 इससे पहले कई बार बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण को व्यक्तिगत पेशी के दौरान फटकार लगाया गया था। इस दौरान ‘पतंजलि’ की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि उन्होंने IMA (इंडियन मेडिकल एसोसिएशन) के अध्यक्ष के बयान को लेकर अप्लीकेशन (IA) दायर कर दिया है। उन्होंने इसे हानि पहुँचाने के उद्देश्य से की गई अपमानजनक टिप्पणी करार दिया। IMA अध्यक्ष ने सुप्रीम कोर्ट द्वारा एलोपैथिक डॉक्टरों पर टिप्पणी पर सवाल उठाए थे।

मुकुल रोहतगी ने इसे गंभीर मामला बताया, जिस पर सुप्रीम कोर्ट के जज अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने कहा कि अगर IMA आरोपों पर जवाब नहीं देता है तो उसे नोटिस जारी किया जाएगा। वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने ध्यान दिलाया कि ये बयान सुनवाई से 1 दिन पहले दिया गया था, ऐसे में ये नहीं कहा जा सकता कि अनजान/बेखबर होने के कारण ये टिप्पणी की गई। वहीं भारत सरकार की तरफ से ASG केएम नटराज ने बात रखी। उन्होंने बताया कि ‘ड्रग्स एन्ड कॉस्मेटिक्स रूल्स’ के नियम संख्या 170 को कई उच्च न्यायालयों में चुनौती दी गई है।

उन्होंने बताया कि 2018 में नियम संख्या 170 की अधिसूचना जारी की गई थी। उन्होंने बताया कि इसके खिलाफ 8-9 याचिकाएँ दायर हैं। उन्होंने बताया कि दिल्ली हाईकोर्ट ने इस नियम के तहत कोई कड़ी कार्रवाई न करने का निर्देश दिया था, बाद में केरल हाईकोर्ट और बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी इसे दोहराया। उन्होंने इस दौरान दिल्ली उच्च न्यायालय का वो आदेश भी पढ़ कर सुनाया, जिसमें इस कानून के नियम-170 पर पुनर्विचार के लिए केंद्र सरकार को कहा गया था।

इस पर जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि भारत सरकार को इस सलाह का फायदा मिला। वहीं जस्टिस अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने पूछा कि केंद्र सरकार को इस पर निर्णय लेने के लिए कहा गया था, फिर भी ये नियम यहाँ पर है। उन्होंने पूछा कि बिना कोई निर्णय लिए बिना आप कड़ी कार्रवाई न करने को कैसे कह सकते हैं? वहीं जस्टिस हिमा कोहली ने कहा कि ये एक अच्छा कानून है, जब तक इसे हटाया नहीं जाता, ये लागू है। केंद्र सरकार ने राज्यों को पत्र भेज इसके तहत एक्शन न लेने को कहा था। ASG ने इस कानून पर पुनर्विचार के लिए समय माँगा।


उत्तर प्रदेश : मुजफ्फरनगर के 1 दर्जन मदरसों को शिक्षा विभाग का नोटिस : ‘फ़ौरन लगाओ ताला, वरना रोज भरो 10000 रूपए का जुर्माना’

                                                                                                         प्रतीकात्मक चित्र साभार: Bing AI
उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर जिले में गैर मान्यता प्राप्त मदरसों को बंद करने के लिए प्रशासन द्वारा नोटिस भेजी जा रही है। इन नोटिसों में अवैध मदरसों को फ़ौरन बंद करने की हिदायत दी गई है। नोटिस में आदेश का पालन न करने वाले मदरसा संचालकों पर 10,000 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माने का प्रावधान है। अनुमान के मुताबिक, जिले में अवैध मदरसों की तादाद लगभग 100 है। शुरुआती चरण में अब तक 12 मदरसों को चिह्नित कर के नोटिस भेजी गई है। ‘जमीयत उलेमा ए हिन्द’ ने इस आदेश की आलोचना की है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, उत्तर प्रदेश सरकार ने विदेशी फंडिंग से चल रहे मदरसों की लिस्ट तैयार करने के लिए एक विशेष जाँच दल (SIT) का गठन किया है। इसी क्रम में मुजफ्फरनगर जिले में भी बिना पंजीकरण के चल रहे मदरसों का डाटा जिले के अधिकारी तैयार कर रहे हैं। जिले में अब तक लगभग 100 ऐसे मदरसे ऐसे चिह्नित हुए है जिनके कागजात सरकारी मानकों के अनुरूप नहीं हैं। इसमें से प्रशासन द्वारा 12 मदरसा संचालकों को नोटिस भेज कर कहा गया है कि अगर उन्होंने मदरसा फ़ौरन बंद नहीं किया तो उन पर 10,000 रुपए प्रतिदिन के हिसाब से जुर्माना लगाया जाएगा।

सोमवार (23 अक्टूबर, 2023) को मुजफ्फरनगर जिले के बेसिक शिक्षा अधिकारी शुभम शुक्ला ने मीडिया से बातचीत के दौरान इस कार्रवाई की पुष्टि की है। उन्होंने बताया कि जुर्माने वाली नोटिस ब्लॉक शिक्षा अधिकारी की तरफ से जारी किए गए हैं। उन्होंने मुजफ्फरनगर जिला अल्पसंख्यक विभाग की तरफ से मिली जानकारी का हवाला देते हुए बताया कि जिले में गैर-पंजीकृत पाए गए 100 मदरसों के बारे में जरूरी कार्रवाई की जा रही है।

हालाँकि, ‘उत्तर प्रदेश मदरसा एजुकेशन बोर्ड’ इस नोटिस का विरोध कर रहा है। मदरसा बोर्ड साल 1995 में उत्तर प्रदेश सरकार के उस प्रावधान का जिक्र कर रहा है जिसमें मदरसों को स्कूलों की बनाई नियमावली से अलग कर दिया गया था। बोर्ड के अध्यक्ष इफ्तिखार अहमद जावेद के मुताबिक मदरसा मामलों में शिक्षा विभाग समेत किसी को भी हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने मदरसों को आम स्कूल न समझने की बात कहते उन्हें अल्पसंख्यक विभाग के अधीनस्थ बताया।

मदरसों को मिली नोटिस के मामले में जमीयत उलेमा ए हिन्द ने भी अपने विरोध के सुर बुलंद करने शुरू कर दिए हैं। जमीयत के जिला महासचिव कारी जाकिर हुसैन ने इस मामले पर एक बैठक बुला ली। इस बैठक में उन्होंने कहा कि प्रशासन के इस आदेश को संविधान द्वारा मिली धार्मिक स्वतंत्रता का हनन बताया। उन्होंने कहा कि जिन मदरसों को नोटिस मिली है उनमे मज़हबी शिक्षा फ्री में दी जाती है और वहाँ क्लास नहीं चलते। मदरसा बोर्ड की तरह जमीयत भी इन मदरसों को शिक्षा विभाग के अधिकार क्षेत्र से बाहर मानता है।

दिल्ली : बंगाली मार्केट और ITO की तकिया बब्बर शाह मस्जिद को रेलवे का नोटिस, कहा- 15 दिन में खाली करो जमीन, नहीं तो होगा एक्शन

                                    दो मस्जिदों को रेलवे का नोटिस (फोटो साभार: आज तक)
दिल्ली की दो बड़ी मस्जिदों को रेलवे ने नोटिस भेजा है। इनमें से एक मस्जिद दिल्ली की बंगाली मार्केट में है। दूसरी आईटीओ की तकिया बब्बर शाह मस्जिद है। उत्तर रेलवे ने 15 दिन के भीतर दोनों मस्जिद के प्रशासन से अतिक्रमण हटाने को कहा है। ऐसा नहीं होने पर एक्शन लेने की चेतावनी दी है।

अगर रेलवे गंभीरता से रेलवे जमीन पर हुए अतिक्रमण को सख्ती से हटाए, रेलवे के पास बहुत भूमि होगी, जिसका रेलवे के विकास में प्रयोग हो सकता है।  

22 जुलाई 2023 को उत्तर रेलवे प्रशासन की तरफ जारी नोटिस में कहा गया है, “सर्व साधारण को सूचित किया जाता है कि रेलवे भूमि को अनाधिकृत रूप से अतिक्रमित किया गया है। आप लोग अनाधिकृत रूप से रेलवे की जमीन पर बने अनाधिकृत भवन/मंदिर/ मस्जिद/मजार को इस सूचना के 15 दिन के अंदर स्वेच्छा से हटा दें। अन्यथा रेलवे प्रशासन एक्शन लेगा। रेलवे अधिनियम के प्रावधान के तहत अनाधिकृत कब्जे को हटा दिया जाएगा। इस प्रक्रिया में होने वाले नुकसान के लिए आप स्वयं जिम्मेदार होंगे। रेलवे प्रशासन जिम्मेदार नहीं होगा।”

आज तक की रिपोर्ट के अनुसार तकिया बब्बर शाह मस्जिद के बगल में स्थित एमसीडी के मलेरिया दफ्तर को भी खाली करने का नोटिस दिया गया है। यहाँ भी रेलवे का नोटिस चिपका दिया गया है। एक अन्य रिपोर्ट के अनुसार दिल्ली वक्फ बोर्ड का कहना है कि इन मस्जिदों को जमीन 1945 में कानूनी तौर पर एग्रीमेंट के जरिए ट्रांसफर की गई थी।

इससे पहले इसी साल अप्रैल में भूमि और विकास कार्यालय (L&DO), नई दिल्ली नगरपालिका परिषद (NDMC) और केंद्रीय लोक निर्माण विभाग (CPWD) ने एक संयुक्त अभियान में बंगाली मार्केट की मस्जिद के एक हिस्से को ध्वस्त कर दिया था। इस कार्रवाई के दौरान एक दीवार हटाई गई थी। अधिकारियों ने बताया था कि कुछ महीने पहले अतिक्रमण कर कंक्रीट की यह दीवार खड़ी की गई थी। वहीं मस्जिद के अधिकारियों का कहना था कि कार्रवाई से पहले उन्हें कोई सूचना नहीं दी गई थी।

वहीं 2 जुलाई 2023 को उत्तर-पूर्वी दिल्ली के भजनपुरा में एक सड़क को चौड़ा करने के लिए फुटपाथ पर बने दो धार्मिक स्थलों को हटाया गया था। लोक निर्माण विभाग (PWD) ने इस दौरान एक हनुमान मंदिर और एक दरगाह को हटाया था। अभियान के दौरान भारी संख्या में बलों की तैनाती की गई थी। साथ ही ड्रोन से पूरे इलाके की निगरानी हो रही थी।

एंटी डोपिंग एजेंसी का विनेश फोगाट को नोटिस, न पते पर मिली-न फोन पर; पति ने भी नहीं दिया जवाब

                                                                                                                         फोटो, साभार: SAI
नेशनल एंटी डोपिंग एजेंसी (NADA) ने पहलवान विनेश फोगाट (Vinesh Phogat) को नोटिस जारी किया है। जवाब देने के लिए उन्हें 14 दिनों का समय दिया गया है। एजेंसी के अधिकारी को वह न तो सोनीपत के अपने पते पर मिली और न उनसे फोन पर संपर्क हो सका। अधिकारी ने जब उनके पति सोमवीर राठी से संपर्क की कोशिश की तो उनकी तरफ से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।

पता को लेकर एजेंसी के नियमों का पालन नहीं करने को लेकर उन्हें नोटिस जारी किया गया है। द ट्रिब्यून की रिपोर्ट के अनुसार विनेश ने सोनीपत के प्रताप कॉलोनी का पता दे रखा है। 27 जून को एक डोप नियंत्रण अधिकारी (DCO) ने इस जगह का दौरा किया। लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो पाया। रिपोर्ट में कहा गया है, “डीसीओ ने उन तक (विनेश फोगाट) तक पहुँचने की कोशिश में 40 मिनट से अधिक समय लगाया। उनके पति सोमवीर राठी को भी फोन किया। लेकिन उनकी ओर से भी कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।”

इसके बाद नाडा के परियोजना अधिकारी अंकुश गुप्ता ने ‘एडीआर की ठिकाने आवश्यकताओं का पालन करने में विफलता’ पर विनेश गुप्ता से जवाब देने को कहा है। उल्लेखनीय है कि जो एथलीट रजिस्टर्ड टेस्टिंग पूल (RTP) का हिस्सा हैं, उन्हें हर तीन महीने पर अपने ठिकाने की जानकारी अपडेट करने के लिए एंटी-डोपिंग एडमिनिस्ट्रेशन मैनेजमेंट सिस्टम (ADAMS) का उपयोग करना पड़ता है। इसमें उन्हें अपना पता, ईमेल, फोन नंबर, कार्यसूची, प्रशिक्षण स्थल और कार्यक्रम का डिटेल देना होता है। दिसंबर 2022 से विनेश आरटीपी का हिस्सा हैं।

रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बीते 12 महीने में ऐसा पहली बार हुआ है कि विनेश ने नियमों का उल्लंघन किया है। 12 महीने में यदि तीन बार ठिकाने की पुष्टि नहीं हो तो वह नियमों का उल्लंघन माना जाता है। वैसी स्थिति में दो साल तक का निलंबन भी हो सकता है। वैसे इस तरह का नोटिस पाने वाली विनेश दूसरी भारतीय महिला पहलवान हैं। इससे पहले विश्व चैंपियनशिप की कांस्य पदक विजेता पूजा ढांडा को भी यह नोटिस मिल चुका है। ढांडा के पते की पुष्टि करने में नाडा लगातार तीन बार जुलाई, अक्टूबर और दिसंबर 2022 में असफल रहा था।

उल्लेखनीय है कि भारतीय कुश्ती महासंघ (WFI) के निवर्तमान अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह (Brij Bhushan Sharan Singh) पर यौन शोषण का आरोप लगाते हुए जिन पहलवानों दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाल रखा था, उनमें विनेश फोगाट प्रमुख थीं। हंगरी में आयोजित बुडापेस्ट रैंकिंग सीरीज से वे प्रतिस्पर्धी कुश्ती में वापसी करने जा रही हैं। इससे पहले टारगेट ओलंपिक पोडियम स्कीम (TOPS) के तहत विनेश और बजरंग पुनिया को विदेश में ट्रेनिंग के लिए खेल मंत्रालय से मंजूरी मिलने की खबर आई थी।

सरेआम हुई DM की मॉब लिंचिंग, फिर कैसे हो गई आनंद मोहन की रिहाई: सुप्रीम कोर्ट ने बिहार सरकार से माँगा जवाब

उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा माफियाओं पर कार्यवाही का विरोध का शोर मचाने का असली कारण यह है कि जो माफिया गैंग के आसरे अपनी कुर्सी पर बैठे हों, माफिया के खिलाफ कैसे जा सकते हैं? जनता का क्या मरने दो भेड़-बकरी की तरह। अपनी कुर्सी सलामत रहनी चाहिए। ऐसे नेता और उनकी पार्टियों द्वारा योगी विरोध करना कोई बड़ी बात नहीं।   
सुप्रीम कोर्ट ने दिवंगत आईएएस अधिकारी जी कृष्णैया की पत्नी उमा कृष्णैया की याचिका पर बिहार सरकार और अन्य को नोटिस जारी किया है। इस याचिका में बिहार के पूर्व बाहुबली सांसद आनंद मोहन को जेल से समय से पहले रिहाई को चुनौती दी गई है।

शीर्ष न्यायालय के फैसले पर दलित IAS ऑफिसर की पत्नी ने खुशी जाहिर की। उमा कृष्णैया ने प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कहा, “हम सुप्रीम कोर्ट के फैसले से खुश हैं कि उन्होंने बिहार सरकार और इस मामले में शामिल अन्य लोगों को नोटिस जारी ​किया है। यह केवल मेरा केस नहीं है, बल्कि यह पूरे भारत देश का मुद्दा है। हमें इंसाफ जरूर मिलेगा। मुझे उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में सभी लोगों के बारे में सोचकर जरूर अच्छा फैसला देगा।”

गैंगस्टर से नेता बने आनंद मोहन सिंह को अप्रैल 2023 में सहरसा जेल से रिहा कर दिया गया था। बिहार सरकार ने आनंद सिंह सहित 27 दोषियों की जल्द रिहाई की अनुमति देते हुए जेल नियमों में संशोधन किया था। बिहार सरकार द्वारा जेल मैनुअल के नियमों में संशोधन के बाद एक आधिकारिक अधिसूचना में कहा गया था कि 14 साल या 20 साल जेल की सजा काट चुके 27 कैदियों को रिहा करने का आदेश दिया गया है।

5 दिसंबर 1994 को बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में जिस भीड़ ने डीएम की पीट-पीट कर हत्या की थी, उस भीड़ का नेतृत्व आनंद मोहन कर रहे थे। एक दिन पहले मुजफ्फरपुर में आनंद मोहन की पार्टी के नेता रहे छोटन शुक्ला की हत्या हुई थी। इस भीड़ में शामिल लोग छोटन शुक्ला के शव के साथ प्रदर्शन कर रहे थे। इस दौरान मुजफ्फरपुर के रास्ते पटना से गोपालगंज जा रहे डीएम जी कृष्णैया पर भीड़ ने मुजफ्फरपुर के खबड़ा गाँव में हमला कर दिया था। मॉब लिंचिंग में डीएम की मौत हो गई थी।

कृष्णैया तब मात्र 35 वर्ष के थे। शव यात्रा में बीपीपी सुप्रीमो आनंद मोहन, उनकी पत्नी और वैशाली की पूर्व सांसद लवली आनंद, छोटन शुक्ला के भाई और विधायक मुन्ना शुक्ला, विक्रमगंज के पूर्व विधायक अखलाक अहमद, शशिशेखर और अरुण कुमार सिन्हा भी शामिल थे। इन लोगों पर डीएम की हत्या के लिए भीड़ को उकसाने का आरोप था। डीएम कृष्णैया की हत्या मामले में पटना की निचली अदालत ने आनंद मोहन को 2007 में फाँसी की सजा सुनाई थी। आनंद मोहन के साथ पूर्व मंत्री अखलाक अहमद और अरुण कमार को भी मौत की सजा सुनाई गई थी। एक साल बाद 2008 में पटना हाईकोर्ट ने आनंद मोहन की फाँसी की सजा को उम्र कैद में बदल दिया था।

क्या पाकिस्तान का पानी भी बंद करेगा भारत?

                                                                                                                      साभार: OneIndia
पाकिस्तान की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही। जब से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आतंकवाद मुद्दे पर घेरा है, आज पाकिस्तान की हालत सबके सामने हैं। बिजली, आटा, दाल और गैस आदि की कीमतें आसमान पर पहुँच चुकी हैं। लेकिन अब पाकिस्तान में पानी की भी किल्लत होने जा रही है।
साल 1960 में हुई सिंधु जल संधि (Indus Water Treaty) में संशोधन के लिए भारत ने पाकिस्तान (Pakistan) को नोटिस जारी किया है। भारत का कहना है कि पाकिस्तान की कार्रवाइयों ने संधि के प्रावधानों और उनके कार्यान्वयन का उल्लंघन किया है। इसलिए उसे नोटिस जारी करना पड़ा।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, सिंधु जल संधि को लेकर भारत सरकार ने पाकिस्तान को यह नोटिस बुधवार (25 जनवरी 2023) को भेजा है। इस नोटिस को लेकर भारत सरकार का कहना है कि भारत पाकिस्तान के साथ हुई जल संधि को लागू करने का समर्थक और जिम्मेदार सहयोगी रहा है। लेकिन, पाकिस्तान की गतिविधियों ने भारत को यह नोटिस भेजने के लिए मजबूर किया है।

सूत्रों के हवाले से कहा जा रहा है कि साल 2015 में पाकिस्तान ने भारत की किशनगंगा और रातले जलविद्युत परियोजनाओं (HEPs) पर अपनी तकनीकी आपत्तियों की जाँच के लिए एक तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति का अनुरोध किया था। हालाँकि, अगले ही साल यानी साल 2016 में पाकिस्तान ने एकतरफा कार्रवाई करते हुए इस अनुरोध को वापस ले लिया। साथ ही, कहा कि एक मध्यस्थ अदालत उसकी आपत्तियों पर फैसला सुनाए।

पाकिस्तान के लगातार कहने पर विश्व बैंक ने हाल ही में तटस्थ विशेषज्ञ और मध्यस्थ न्यायालय दोनों पर ही कार्रवाई शुरू की है। हालाँकि, एक ही मुद्दे पर इस तरह की दो प्रक्रियाएँ सिंधु जल संधि के किसी भी प्रावधान में नहीं है। इसके विरोधाभासी परिणाम सामने आ सकते हैं।

सूत्रों का कहना है कि सिंधु जल संधि को लेकर भारत चाहता है कि आपस में बातचीत से मामले का हल निकाला जाए। वहीं, पाकिस्तान इससे बचता रहा है। साल 2017 से 2022 तक स्थायी सिंधु आयोग की 5 बैठकें हुई हैं। सभी बैठकों में पाकिस्तान ने इस मुद्दे पर चर्चा करने से इनकार किया।

भारत ने पाकिस्तान को यह नोटिस सिंधु जल संधि के भौतिक उल्लंघन को सुधारने के लिए 90 दिनों के अंदर अंतर-सरकारी वार्ता में शामिल होने के लिए मौका देने के लिए किया है। इस प्रक्रिया के जरिए भारत बीते 62 सालों में पाकिस्तान की हरकतों से मिली सीख के साथ सिंधु जल संधि में कुछ अपडेट कराना चाहता है।

सिंधु जल संधि

भारत और पाकिस्तान ने 19 सितंबर 1960 को सिंधु जल संधि पर हस्ताक्षर किए थे। इस संधि के अनुसार सतलज, व्यास और रावी का पानी भारत को दिया गया था। वहीं सिंधु, झेलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान के हिस्से में गया था। बड़ी बात यह है कि इस संधि में भारत और पाकिस्तान के अलावा विश्व बैंक भी एक हस्ताक्षरकर्ता था।