मैं बहुत पहले से कह रहा हूं कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी जैसे वकीलों की सुप्रीम कोर्ट के जजों के साथ मिलकर चांडाल चौकड़ी बनी हुई है जो मनमाने फैसले करा लेते हैं। सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस ऋषिकेश रॉय एंड जस्टिस SVN भट्टी ने सिंघवी की अर्जी पर उत्तरप्रदेश और उत्तराखंड के कांवड़ रुट पर दुकानदारों को नाम दर्शाने के आदेश पर बिना समय गवाएं रोक लगा कर उप्र, UKhand और मध्य प्रदेश सरकार को नोटिस जारी कर दिया।
मीलॉर्ड में सिंघवी और याचिकाकर्ता से यह पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि नाम छुपाकर धंधा क्यों किया जा रहा है? यह जघन्न अपराध है, क्यों ऐसे अपराधी को बचाने आये हो? दूसरे, जब यूपीए सरकार ने इस कानून को बनाया था, तब क्यों नहीं लागु किया? ये कैसा सेकुलरिज्म है जो असली नाम बताने से खतरे में आ गया है?
मीलॉर्ड बड़े तमतमाए हुए थे योगी सरकार के आदेश पर और बोले कि “दोनों राज्यों के आदेश को लागू होने से नहीं रोका गया तो Secularism और संविधान” के प्रावधानों का उल्लंघन होगा।जजों ने कहा कि दुकानों को सिर्फ यह बताना होगा कि वह मांसाहार बेचते हैं या शाकाहारी खाना।
लगता है सुप्रीम कोर्ट को Secularism ही खतरे में नहीं लगा बल्कि “इस्लाम भी खतरे में” दिखाई दे गया। आपने यह तो बताने को कहा कि मांसाहार बेचते है या शाकाहारी खाना लेकिन यह बताने के लिए नहीं कहा कि “भोजन में थूकते हैं या नहीं, या पेशाब मिलाते हैं या नहीं और जो फल सब्जियां ग्राहकों को परोसते हैं उन पर पेशाब का छिड़काव करते हैं या नहीं”।
मीलॉर्ड ये हम नहीं कह रहे, ये मुसलमान खुद कहते हैं कि थूक लगा कर काफिरों को खाना देना उनका मजहब कहता है। उसे देख कर ही मैं कहता हूं कि हो सकता है न्याय अंधा हो लेकिन असल में जज ही अंधे हैं जो देखते हुए भी आंखें बंद कर लेते हैं। यह बात उन्होंने मद्रास हाई कोर्ट में कबूल भी की है।
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| लेखक चर्चित यूटूबर |
मीलॉर्ड मुसलमानों के वकील बन गए तो उनकी तरफ से आप और सिंघवी जैसे वकील ही बताएं कि मुसलमान हिंदुओं को काफिर कहता है और उनके भगवानों को भी नहीं मानता और “गज़वा ए हिंद” बनाना चाहता है,तो फिर -
मोहम्मद अनुस का “वैष्णो ढाबा” कैसे - वह “इस्लाम का ढाबा” क्यों नहीं;
मोहम्मद वसीम का “गणपति ढाबा” कैसे - “अल्लाह का ढाबा” क्यों नहीं;
मोहम्मद आदिल का “ओम शिव वैष्णो” ढाबा क्यों - “आदिल का ढाबा” क्यों नहीं;
मोहम्मद शमशेर का “लक्ष्मी शुद्ध वैष्णो” ढाबा क्यों - “रजिया बेगम का ढाबा” क्यों नहीं;
मोहम्मद इरफ़ान का “श्रीनाथ डोसा ढाबा” क्यों, “इरफ़ान का डोसा” क्यों नहीं-केवल एक केरल के मुस्लिम और हिंदू के रेस्ट्रॉन्ट के बारे में बता कर जस्टिस भट्टी ये प्रमाणपत्र देना चाहते है कि मुसलमान सफाई रखते है और हिंदू गंदगी रखने वाले बता कर हिंदुओं को बदनाम करना चाहते हैं। ऐसा कीजिए मीलॉर्ड अपने बंगले सरकार से मुस्लिम बस्तियों के नजदीक बनवा कर वहां रह कर देखिए वो कितनी सफाई पसंद हैं। आप आज देते हुए भूल गए कि ईद पर मुसलमान भी हिंदुओं से सामान न खरीदने की कॉल देते हैं लेकिन आपको उन्हीं पर तरस आ रहा है क्योंकि आप सनातन धर्म को ख़त्म करने के मिशन में “Secularists” के साथ भागीदार हैं।
मीडिया के पत्रकार और अख़बार लगे हैं साबित करने में कि मुलायम सिंह ने 2006 में कोई आदेश नहीं दिया था और 2006 के FSSI एक्ट को तोड़मरोड़ कर बता रहे हैं। जबकि सच्चाई यह है कि मुलायम की हालत पतली थी जिसकी वजह से उसने 2007 के चुनाव से पहले हिंदुओं को रिझाने के लिए ये आदेश दिए थे। मीलॉर्ड ने FSSI को भी देखना जरूरी नहीं समझा।
मियां जावेद अख्तर कह रहे हैं ये हिटलर का नाजी आदेश है। मियां जी अगर हिटलर राज होता तो आपको इतनी बात कहने पर जेल में डाल दिया जाता।
मुसलमानों को गलत काम करने से रोका जा सकता है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ऐसा चाहता ही नहीं और अभी उम्मीद है संविधान पीठ तलाकशुदा महिलाओं पर दिए गए फैसले को भी पलट देगी।



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