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मुस्लिमों के तुष्टिकरण को दूर करने का और विकसित भारत के लिए एक रामबाण उपाय; संविधान से भी छेड़छाड़ नहीं होगी; कोई कौम कितने प्रतिशत पर Minority है तय कर दो

सुभाष चन्द्र

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कहना कि ‘अब कांग्रेस अर्बन नक्सलों के कब्जे में चली गई है। कांग्रेस अब वामपंथियों के चंगुल में फंसी हुई है। कांग्रेस ने अपने मेनिफेस्टों में जो कहा है वो चिंताजनक और गंभीर है। कांग्रेस में तूफान आ गया। और कांग्रेस की सच्चाई सामने आने पर तूफान आना लाजमी है। उन्होंने कहा कि अगर कांग्रेस की सरकार बनेगी तो हरेक की प्रॉपर्टी का सर्वे किया जाएगा। हमारी बहनों के पास सोना कितना है, उसकी जांच की जाएगी। हमारे आदिवासी परिवारों में चांदी होती है, सिल्वर कितना है, उसका हिसाब लगाया जाएगा। इतना ही नहीं ये जो गोल्ड है, बहनों का और जो संपत्ति है वो सबको समान रूप से वितरित कर दी जाएगी। क्या ये आपको मंजूर है? क्या आपकी मेहनत करके कमाई हुई संपत्ति को सरकार को ऐंठने का अधिकार है क्या? हमारी माताओं-बहनों की जिंदगी में सोना सिर्फ शो करने के लिए नहीं होता है। उसके स्वाभिमान से जुड़ा हुआ है, उसका मंगलसूत्र, वो सोने का मु्ददा नहीं है। उसके जीवन के सपनों से जुड़ा हुआ है। तुम उसे छीनने की बात कर रहे हो, अपने मेनिफेस्टो में। गोल्ड ले लेंगे, सबको वितरित कर देंगे। 

और पहले जब उनकी सरकार थी तो उन्होंने कहा कि देश की संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। इसका मतलब ये संपत्ति इकट्ठी करके किसको बांटेंगे, जिसको ज्यादा बच्चे हैं, उसको बांटेंगे। घुसपैठियों को बांटेंगे। क्या आपकी मेहनत की कमाई का पैसा घुसपैठियों को दिया जाएगा। आपको मंजूर है ये? ये कांग्रेस के मेनिफेस्टो कह रहा है। वो माताओं-बहनों के सोने का हिसाब करेंगे, जानकारी लेंगे फिर और उसको बांटेंगे। जिनको मनमोहन सिंह जी की सरकार ने कहा था कि संपत्ति पर पहला अधिकार मुसलमानों का है। ये अर्बन नक्सल की सोच मेरी माताओं-बहनों आपका मंगलसूत्र भी बचने नहीं देंगे।’

इतना ही नहीं, मनमोहन सिंह सरकार पद्मनाभन मंदिर के कमरे में बंद स्वर्ण(सोना) को हथियाने कोर्ट तक पहुँच गयी थी, लेकिन मस्जिद और दरगाहों पर हो रही धन-वर्षा पर चुप्पी, क्यों? जब सरकार मंदिरों को आने वाले चढ़ावे पर गिद्ध नज़र रखती है, फिर मस्जिदों और दरगाहों की कमाई पर क्यों नहीं? 

लेखक 
प्रधानमंत्री मोदी ने यह भाषण पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण के आधार पर दिया है, जिसमें उन्होंने कहा था कि देश का संपत्ति पर पहला हक मुसलमानों का है। क्या तुष्टिकरण करना ही कांग्रेस के शब्दकोष में सेकुलरिज्म कहलाता है? क्या यह तुष्टिकरण नहीं? इसको लेकर कांग्रेस के ट्वीट का जवाब देते हुए बीजेपी ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक वीडियो शेयर किया है। इस वीडियो में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यह कहते सुनाई देते हैं कि ‘हमें यह सुनिश्चित करने के लिए इनोवेटिव योजनाएं बनानी होंगी जिससे अल्पसंख्यकों, विशेष रूप से मुस्लिम अल्पसंख्यकों को विकास का समान लाभ मिले। संसाधनों पर पहला हक उनके पास होना चाहिए।’
मुस्लिम तुष्टिकरण पर दिया गया यह बयान मौजूदा चुनाव में एक बड़ा मुद्दा बन गया है। लोगों का कहना है कि कांग्रेस इससे पहले से ही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति करने में लगी थी। सीनियर जर्नलिस्ट दिलीप मंडल ने कहा है कि ‘मुसलमानों का देश के संसाधनों पर पहला हक वाला मनमोहन सिंह का बयान अचानक नहीं आया था। ठीक इसी दौरान कोशिश हो रही थी कि शिड्यूल्ड कास्ट की लिस्ट में मुसलमानों को भी घुसाया जाए। मुसलमानों को सरकारी नौकरियों में अलग से 15 प्रतिशत आरक्षण दिया जाए। ओबीसी आरक्षण को धर्म के आधार पर बांट कर मुसलमानों को 6 प्रतिशत अलग दिया जाए। धर्म परिवर्तन करने पर भी एससी का दर्जा सुरक्षित रहे।’ उन्होंने एक्स पर लिखा है कि कांग्रेस सरकार रंगनाथ मिश्रा आयोग की रिपोर्ट के हवाले से दलितों का हक छीन कर मुस्लिमों को देना चाहती थी। उन्होंने यह भी लिखा है कि रंगनाथ मिश्रा धर्मांतरण का रास्ता साफ करने की कोशिश कर रहे थे और सरकार की शह उनको हासिल थी।

देश की आज़ादी के पहले से ही मुस्लिमों के अल्पसंख्यक होने का लाभ उठा कर गैर भाजपा दल उनके ही तुष्टिकरण में लगे रहे हैं। कांग्रेस ने मुस्लिमों के हितों को ध्यान में रखते हुए ऐसे ऐसे कानून बना दिए जिनकी वजह से आज मुस्लिम समुदाय हिंदू बहुल समुदाय को रौंदने से परहेज़ नहीं करता और सभी सेकुलर दल 80% हिंदुओं को गाजर मूली की तरह काटने को तैयार रहते हैं। 

तीसरी बार वापसी आने पर मोदी सरकार को उर्दू आदि शब्दों का असली अर्थ बताना होगा। सुश्री नाज़िया खान का निम्न वीडियो इस पर रौशनी डाल रहा है। ऐसे अनेकों वीडियो है जो मुस्लिम समाज में चलन में कई शब्द हैं, लेकिन तुष्टिकरण करते कई उर्दू नही बल्कि अरबी और फ़ारसी के लब्जों को हिन्दी भाषा में चलन ला दिया। श्रीराम प्राण प्रतिष्ठा के दिनों में एक बुजुर्ग मौलाना अंसारी ने न्यूज़ 18 पर लखनऊ से लाइव प्रोग्राम 'भइया जी कहिन' में कहा था की नमाज़ संस्कृत का शब्द है किसी अरबी या फ़ारसी का नहीं। वही बात इस पुराने वीडियो में सुश्री नाज़िया खान कह रही हैं।   

 

कांग्रेस ने समय समय पर जो कानून बनाए मुस्लिमों के लिए, वे ये हैं -

Article 25, 28, 30 (1950)

HRCE (1951)

HCB MPL (1956)

Secularism (1975)

Minority Act (1992)

Places of worship Act (1991)

Wolf Act (1992)

Ram Setu affidavit (2007)

Saffron terrorism (2009)

ऐसा इसलिए किया जाता रहा है क्योंकि देश में आज तक यह तय नहीं किया गया है कि कौन सी कौम कितनी प्रतिशत आबादी होने पर Minority मानी जाएगी। आज मुस्लिम समुदाय 100 के करीब लोकसभा सीटों के चुनाव को प्रभावित कर सकता है, भला फिर ऐसा समुदाय Minority कैसे माना जा सकता है?

2011 की जनगणना के अनुसार देश में हिंदू और अन्य समुदायों की आबादी यह थी -

-हिंदू - (80%)

-मुस्लिम - (14.2%)

-ईसाई -(2.3%)

-सिख -(1.72%)

-बौद्ध - (0.7%)

-सरना (0.41%)

-जैन -(0.37%)

-गोंड धर्म - (0.08%)

-पारसी - (0.006%)

-अन्य धर्म - (0.16%)

-किसी को न मानने वाले -(0.24%)

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार मुस्लिमों की आबादी 17.22 करोड़ थी जो सरकार के अनुसार 2023 में 19.7 करोड़ हो गई।

वर्ष 2020-21 की MoSPI (Ministry of Statistics and Program Implementation, Government Of India.) की रिपोर्ट में बताया गया था कि 94.9% मुस्लिमों के अनुसार उन्हें बेहतर पीने के पानी की सुविधा मिली और 97.2% मुस्लिमों के अनुसार उन्हें बेहतर Toilet Facilities मिली। इसके अलावा 50.2% मुस्लिमों ने 31 मार्च, 2014 के बाद नए घर खरीदे या बनाए। यह तथ्य 2021 तक के हैं और उसके बाद उनके लिए और भी बेहतर हुआ होगा।

लेकिन फिर भी हर समय एक ही रोना कि हमारा अल्पसंख्यक होने की वजह से शोषण हो रहा है जबकि उपरोक्त सूचना से साबित होता है कि मोदी राज में मुस्लिमों का जीवन स्तर हर तरह से बेहतर हुआ है।

हर देश को अपनी आवश्यकताओं के अनुसार देश और समाज हित में कानून बनाने का अधिकार होता है। कांग्रेस 2005 से संसाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक़ बताती आई है जो बहुसंख्यक और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ अनाचार है।

इसलिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अनुरोध है कि वे अपने अगले कार्यकाल में यानी Modi 03 में संसद से कानून पास करा कर तय करें कि किसी समुदाय को तब ही अल्पसंख्यक (Minority)  का दर्जा मिलेगा जब उसकी आबादी 5% से कम होगी - 5% से ज्यादा आबादी होने पर Minorities को मिलने वाली सुविधाएं नहीं मिलेंगी।

इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में जरूर चुनौती दी जाएगी और अगर अदालत इसके खिलाफ फैसला देती है तो संसद से उस फैसले को भी निरस्त कराया जाए। 

यह कानून Minority-ism से जुड़ी सभी व्यवस्थाओं को ध्वस्त कर देगा बिना संविधान में कोई छेड़छाड़ किए हुए। इस पर नई सरकार बनने के तुरंत बाद कार्य शुरू होना चाहिए, जिससे देश के करोड़ों रुपए बचेंगे जो देश के विकास में काम आएंगे।

श्री राम मंदिर एक ही बार बनेगा, वो बन कर रहेगा, फिर इतने “नाराज़ फूफा” क्यों हैं?

                                                                                                  साभार 
सुभाष चन्द्र

चाहे राम भक्त हों या राम मंदिर से विमुख बैठे “नाराज़ फूफा” हों, सबके लिए श्री राम मंदिर केवल एक बार ही बनेगा और वह तो बन कर रहेगा जिसमें भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा भी होकर रहेगी, फिर रंग में भंग डालने का क्या औचित्य है, यज्ञ में आहुति डालने की जगह यज्ञ विध्वंस करने का काम तो राक्षस प्रवत्ति के लोगों का होता है। जिस कारण भगवान विष्णु को राम रूप में धरती पर आना पड़ा। संभव है कि कलयुगी रक्षक इतने वर्षों से अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर का विरोध करते आ रहे हैं। श्रीराम विरोधियों को नहीं मालूम की रावण को भी अंतिम समय "श्रीराम" कहना पड़ा था। 

लेखक 

राम रावण युद्ध में अनेक प्रसंग हैं जिनमे देखा गया था जब रावण की सेना और लंकावासियों ने भगवान राम की सराहना की थी। जब मेघनाथ का पार्थिव शरीर लंका भेजा गया था तो उसे भगवान राम ने अपने वस्त्र से ढक कर भेजा था और तब लंकावासियों ने कहा था राम कितने भले इंसान हैं उन्होंने युवराज के शव का भी आदर किया है, लेकिन आज की “लंकिनी” की सेना में एक भी ऐसा नहीं है जिसे श्री मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा में कुछ भी अच्छा नज़र आ रहा हो, हर कोई यज्ञ में हड्डियां डालने को आतुर है।

राजनीतिक दलों के लोगों की मति भी लगता है भगवान राम ने भ्रष्ट कर दी है उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा, जिसके मुंह में जो आ रहा है वह बोल रहा है। उसके अलावा सबसे ज्यादा दुःख की बात है कि सभी शंकराचार्यों ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह में न जाने का फैसला किया है। द्वारका के शंकराचार्य अविमुक्त आनन्द में स्वरूपानंद की आत्मा वास करती है लेकिन पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती कह रहे हैं कि मोदी पूजा करेगा तो वह कैसे ताली बजाएंगे, यह मंदिर विनाश लाएगा।  

कोई इन शंकराचार्यों से पूछे कि श्री राम मंदिर बनाने के लिए आपने क्या योगदान किया है और आज तक हिन्दू समाज के लिए आपने क्या क्या पुण्य कार्य किये हैं जबकि आपके मठों में पैसे की कमी नहीं है। कोई शंकराचार्य, कोई गुरु, कोई जाति, कोई नेता या कोई भी समाज भगवान राम से बड़ा नहीं हो सकता लेकिन आज समाज के ऐसे प्रबुद्ध लोग रामकाज में अड़ंगे डालने का प्रयास कर रहे हैं। राजनेताओं का तो समझ आता है कि वह अपनी दुकान चलाए रखने की राजनीति के लिए विरोध कर रहे हैं लेकिन धर्माचार्यों का ऐसा आचरण समझ से परे है।

चाहे नेता हो या धर्माचार्य, सबका मकसद बस मोदी विरोध है, बस मोदी को श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिए। एक ढकोसला शुरू किया हुआ है कि राम तो सबके हैं, भाजपा अपना कार्यक्रम कैसे बना सकती है। ठीक है भाई, राम सबके हैं, तो फिर विपक्ष बताए उसने मंदिर निर्माण के लिए क्या किया था और क्या भगवान राम को काल्पनिक नहीं कहा था। आज वह काल्पनिक राम आपका हो सकता है, हमारे लिए तो सत्य सनातन श्री राम हमारे हैं।

जो नेता भगवान राम का अपमान कर रहे हैं, सबसे पहले उनकी सुरक्षा हटा देनी चाहिए, उनकी सुरक्षा पर जनता का पैसा खर्च नहीं होना चाहिए। वो लोग जब जन-जन के स्वामी भगवान राम का अपमान कर सकते हैं तो उन्हें भक्तो के बीच में खुला छोड़ देना चाहिए। आप संयम नहीं रख सकते बोलते हुए तो भक्तों को भी संयम रखने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए।

अभी तो श्री राम लला की प्राण प्रतिष्ठा हुई नहीं है लेकिन अभी से अयोध्या जी में श्रद्धालुओं का सैलाब दिखाई दे रहा है जिसमें विपक्ष की फैलाया हुआ जात पात का जहर दिखाई नहीं दे रहा।अपनी दुकान चलाने के लिए जात-पात इन्ही पाखंडियों द्वारा फैला हुआ है। मंदिर उद्घाटन के बाद जो प्रचंड सैलाब उमड़ेगा तब क्या होगा, विपक्ष को चिंता यह है क्योंकि वह मोदी को 400 पहुंचाने में मदद करेगा। 

शंकराचार्यों को पुनर्विचार करना चाहिए वरना फिर हिन्दू समाज उन पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होगा। शंकराचार्य समाज से से हैं, समाज उनसे नहीं है। यदि समय रहते शंकराचार्य नहीं चेते निश्चित रूप से वह दिन भी अधिक दुर नहीं होगा, जब सनातनी प्रेमियों द्वारा उनका उपहास होना उन्हें शून्य में ले आएगा। राजनेता तो किसी न किसी बहाने अपनी दुकान को चलाने के लिए कोई तिकड़म कर लेंगे, जिसका समस्त बीजेपी विरोधियों द्वारा I.N.D.I.गठबंधन एक उदाहरण है। इनको मालूँम है राममंदिर पालिका से लेकर लोक सभा चुनावों तक उनकी दुकान को भारी नुकसान होने वाला है।  

रक्षाबंधन के नाम पर सेक्युलर घोटाला


डॉ विवेक आर्य, उगता भारत 

बचपन में हमें अपने पाठयक्रम में पढ़ाया जाता रहा है कि रक्षाबंधन के त्योहार पर बहने अपने भाई को राखी बांध कर उनकी लम्बी आयु की कामना करती है। रक्षा बंधन का सबसे प्रचलित उदहारण चित्तोड़ की रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ का दिया जाता है। कहा जाता है कि जब गुजरात के शासक बहादुर शाह ने चित्तोड़ पर हमला किया तब  चित्तोड़ की रानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूँ को पत्र लिख कर सहायता करने का निवेदन किया। पत्र के साथ रानी ने भाई समझ कर राखी भी भेजी थी। हुमायूँ रानी की रक्षा के लिए आया मगर तब तक देर हो चुकी थी। रानी ने जौहर कर आत्महत्या कर ली थी। इस इतिहास को हिन्दू-मुस्लिम एकता  तोर पर पढ़ाया जाता हैं।

अब सेक्युलर घोटाला पढ़िए

हमारे देश का इतिहास सेक्युलर इतिहासकारों ने लिखा है। भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अब्दुल कलाम थे। जिन्हें साम्यवादी विचारधारा के नेहरू ने सख्त हिदायत देकर यह कहा था कि जो भी इतिहास पाठयक्रम में शामिल किया जाये।  उस इतिहास में यह न पढ़ाया जाये कि मुस्लिम हमलावरों ने हिन्दू मंदिरों को तोड़ा, हिन्दुओं को जबरन धर्मान्तरित किया, उन पर अनेक अत्याचार किये। मौलाना ने नेहरू की सलाह को मानते हुए न केवल सत्य इतिहास को छुपाया अपितु उसे विकृत भी कर दिया।

रानी कर्णावती और मुगल बादशाह हुमायूँ के किस्से के साथ भी यही अत्याचार हुआ। जब रानी को पता चला की बहादुर शाह उस पर हमला करने वाला है तो उसने हुमायूँ को पत्र तो लिखा। मगर हुमायूँ को पत्र लिखे जाने का बहादुर खान को पता चल गया। बहादुर खान ने हुमायूँ को पत्र लिख कर इस्लाम की दुहाई दी और एक काफिर की सहायता करने से रोका।

मिरात-ए-सिकंदरी में गुजरात विषय से पृष्ठ संख्या 382 पर लिखा मिलता है-

सुल्तान के पत्र का हुमायूँ पर बुरा प्रभाव हुआ। वह आगरे से चित्तोड़ के लिए निकल गया था। अभी वह गवालियर ही पहुंचा था। उसे विचार आया, "सुलतान चित्तोड़ पर हमला करने जा रहा है। अगर मैंने चित्तोड़ की मदद की तो मैं एक प्रकार से एक काफिर की मदद करूँगा। इस्लाम के अनुसार काफिर की मदद करना हराम है। इसलिए देरी करना सबसे सही रहेगा। " यह विचार कर हुमायूँ गवालियर में ही रुक गया और आगे नहीं सरका।

इधर बहादुर शाह ने जब चित्तोड़ को घेर लिया।  रानी ने पूरी वीरता से उसका सामना किया। हुमायूँ का कोई नामोनिशान नहीं था। अंत में जौहर करने का फैसला हुआ। किले के दरवाजे खोल दिए गए। केसरिया बाना पहनकर पुरुष युद्ध के लिए उतर गए। पीछे से राजपूत औरतें जौहर की आग में कूद गई। रानी कर्णावती 13000 स्त्रियों के साथ जौहर में कूद गई। 3000 छोटे बच्चों को कुँए और खाई में फेंक दिया गया।  ताकि वे मुसलमानों के हाथ न लगे। कुल मिलकर 32000 निर्दोष लोगों को अपने प्राणों से हाथ धोना पड़ा।

बहादुर शाह किले में लूटपाट कर वापिस चला गया। हुमायूँ चित्तोड़ आया। मगर पुरे एक वर्ष के बाद आया।परन्तु किसलिए आया? अपने वार्षिक लगान को इकठ्ठा करने आया। ध्यान दीजिये यही हुमायूँ जब शेरशाह सूरी के डर से रेगिस्तान की धूल छानता फिर रहा था। तब उमरकोट सिंध के हिन्दू राजपूत राणा ने हुमायूँ को आश्रय दिया था। यही उमरकोट में अकबर का जन्म हुआ था। एक काफ़िर का आश्रय लेते हुमायूँ को कभी इस्लाम याद नहीं आया। और धिक्कार है ऐसे राणा पर जिसने अपने हिन्दू राजपूत रियासत चित्तोड़ से दगा करने वाले हुमायूँ को आश्रय दिया। अगर हुमायूँ यही रेगिस्तान में मर जाता। तो भारत से मुग़लों का अंत तभी हो जाता। न आगे चलकर अकबर से लेकर औरंगज़ेब के अत्याचार हिन्दुओं को सहने पड़ते। 

इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर सरीखे इतिहासकारों ने इतिहास का केवल विकृतिकरण ही नहीं किया अपितु उसका पूरा बलात्कार ही कर दिया। हुमायूँ द्वारा इस्लाम के नाम पर की गई दगाबाजी को हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे और रक्षाबंधन का नाम दे दिया। हमारे पाठयक्रम में पढ़ा पढ़ा कर हिन्दू बच्चों को इतना भ्रमित  किया गया कि उन्हें कभी सत्य का ज्ञान ही न हो। इसीलिए आज हिन्दुओं के बच्चे दिल्ली में हुमायूँ के मकबरे के दर्शन करने जाते हैं। जहाँ पर गाइड उन्हें हुमायूँ को हिन्दूमुस्लिम भाईचारे के प्रतीक के रूप में बताते हैं।

त्यौहार और मुहूर्त

सोशल मीडिया के कुछ फायदे हैं तो नुकसान भी हैं। ऐसा ही एक बड़ा नुकसान पिछले कुछ वर्षों में देखने को मिला कि हमारे हर त्यौहार को मुहूर्त के नाम पर छोटा कर रहे हैं।

हम बचपन में पूरा दिन राखी दिवाली और होली मनाते थे। ना कोई मुहूर्त की बात करता था ना ही समय देखकर कोई त्यौहार मनाते थे।

पिछले कुछ वर्षों में अजीब सा चलन चला है -इतने समय से इतने समय तक शुभ मुहूर्त है मतलब आप के त्यौहार को एक डेढ़ घंटे का कर दिया।

30 अगस्त को राखी रात्रि 9 बजे के बाद या 31 अगस्त को सुबह 7 बजे से पहले कितनी बहने भाई को राखी बांधने जा सकेंगी?

न जाने इसके पीछे किसका हाथ है, जो हमारे त्योहारों को समयनुसार समेटते जा रहे हैं

क्या आपने कभी किसी और धर्म के त्योहारों पर इस प्रकार का संदेश देखा है?

इस राखी पर भी एक संदेश चल रहा है कि राखी इतने समय से इतने समय तक 

 अरे भैया क्या यह संभव है कि देश की सभी बहने एक ही मुहूर्त में अपने भाई को राखी बांधे।

क्या भाई बहन के प्रेम के बीच में मुहूर्त आ सकता है? दोस्तों दिल खोलकर राखी मनाईये  सुबह से लेकर रात तक 

ईश्वर का दिया हुआ हर क्षण शुभ होता है। 

उत्तर प्रदेश : योगी आदित्यनाथ ने क्यों खोली 43 साल पुरानी मुरादाबाद के दंगों की फाइल ?

भारत ने स्वतन्त्रता पूर्व से और स्वतन्त्रता मिलने के बाद से आज तक साम्प्रदायिक दंगों से मुक्त नहीं हुआ। और न ही जनता दंगों के असली दोषियों को पहचान सकी और जिसने ऐसा साहस किया आरोपी उन्ही लोगों को सांप्रदायिक करार कर देते हैं और भ्रमित जनता भी आरोपियों को ही धर्म-निरपेक्ष और जन हितैषी मानती आई है। लेकिन मकड़जाल का भी उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पटापेक्ष करना शुरू कर दिया है। तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी को मुस्लिम विरोधी मानने वालों को चाहे वह किसी मजहब से हो, आंखें खोलनी चाहिए। खून चाहे हिन्दू का बहे या मुसलमान का बहता बेगुनाह का। योगी द्वारा मुरादाबाद दंगे की 43 वर्ष पूर्व हुए दंगे की फाइल खोलने से असली दंगाइयों को बेनकाब करने का कठोर कदम उठाया है। 
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी बृजलाल ने एक बयान जारी करके मुरादाबाद के दंगों की पूरी घटना से देश को अवगत करवाया है। पूर्व डीजीपी बृजलाल ने कहा कि 13 अगस्त 1980 में मुरादाबाद में ईद के दिन नमाज पढी जा रही थी। पुलिस सुरक्षा में लगी हुई थी। इसी दौरान दलित बस्ती से एक सुअर आकर नमाज में व्यवधान डालता है। इसके बाद पुलिस वालों और मुसलमानों के बीच में कहासुनी शुरू होती है जो बाद में एक दंगे का रूप ले लेती है।

लेकिन पूर्व डीजीपी बृजलाल ने एक अहम बात ये बताई कि मुरादाबाद के एसपी और डीएम के सामने ही एडीएम स्तर के एक प्रभारी को मुसलमानों की भीड़ ने ईंट पत्थरों से मार मार कर कुचल डाला, यानी लिंचिंग कर डाली। ये दंगा इसके बाद भी रुका नहीं, पुलिस पर पथराव किया गया, फोर्स की राइफलें लूट ली गईं और चौकी में आग लगा दी गई, दंगा पूरे 4 महीने तक चला।

पूर्व डीजीपी बृजलाल के बयान में एक अहम बात ये भी सामने आई कि दंगा का प्लैनर मुस्लिम लीग का एक प्रदेश पदाधिकारी था । ये वही जिन्ना की मुस्लिम लीग है  जिसने देश का बंटवारा करवाया था । ये एक और प्रमाण है कि गांधी और नेहरू देश से उन मुस्लिम लीग के लोगों को भी बाहर नहीं निकाल सके जो देश के बंटवारे में शामिल थे।

इस दंगे की जांच के लिए इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक जज जस्टिस सक्सेना को नियुक्त किया गया था। जस्टिस सक्सेना ने इस पर अपनी रिपोर्ट तैयार की थी लेकिन इस रिपोर्ट को ना तो कांग्रेस सरकार ने टेबल किया, ना ही एसपी सरकार ने टेबल किया और ना ही बीएसपी सरकार ने टेबल किया। लेकिन 43 सालों के बाद योगी आदित्यनाथ ने मुरादाबाद दंगों की फाइल को टेबल करने का फैसला किया है जिसके बाद यूपी की राजनीति में हड़कंप मच गया है।

अब सवाल ये उठता है कि आखिर योगी आदित्यनाथ ने इस रिपोर्ट को टेबल करने का फैसला क्यों किया? दरअसल इस दंगे की शुरुआत की मुख्य वजह दलित-मुस्लिम संघर्ष था। दरअसल मुरादाबाद के इसी इलाके के अंदर एक दलित लड़की का मुसलमानों ने किडनैप कर लिया था। बाद में उस लडकी को छुड़वाया गया और इसके बाद उसकी किसी दलित लड़के से शादी तय कर दी गई थी लेकिन जैसे ही बारात गांव के पास आई तो बारात पर मुसलमानों ने पत्थरबाजी कर दी। इस घटना से पहले ही तनाव की पृष्ठभूमि तैयार थी और जब नमाज के दौरान जानवर दलित बस्ती से आकर घुस गया तो ये भीषण दंगा हो गया।

यानी इस रिपोर्ट के बाहर आने से भीम मीम की बेबुनियाद और आधारहीन विचारधारा का पतन होगा। इसके साथ ही हिंदुत्व का एजेंडा सेट होगा। कांग्रेस पार्टी भी इसमें एक्सपोज होगी। 

सबसे बड़ी बात ये है कि इस मामले में आधिकारिक रूप से मरने वालों का आकंड़ा 400 के करीब था। लेकिन अनाधिकारिक रूप से कुछ स्रोत ये भी कहते हैं कि दंगे में करी 2500 लोग मारे गए थे। और इसमें कुछ लोग पीएससी की भी भूमिका होने का दावा करते हैं। उस वक्त यूपी में कांग्रेस पार्टी की सरकार थी और वी पी सिंह मुख्यमंत्री थे । ऐसी स्थिति में सबसे बड़ी बात ये है कि इस रिपोर्ट के जारी होने से पूरे देश के अंदर कांग्रेस की पोल खुलेगी औऱ उसको मुसलमानों के सामने भी जवाब देना पडेगा और ये स्थिति बीजेपी के लिए काफी लाभदायक बन जाएगी।

हिंदू विरोधी दिल्ली दंगों को लेकर अदालत ने ‘दंगाइयों’ के वकील महमूद प्राचा को फटकारा

दिल्ली की एक अदालत ने राजधानी में हिंदू विरोधी दंगो के आरोपितों के वकील महमूद प्राचा को फटकार लगाई है। यह फटकार महमूद प्राचा को इसलिए लगाई गई है, क्योंकि उसने अदालत में तर्क दिया था, “2020 के दिल्ली दंगों के दौरान केवल मुसलमानों को निशाना बनाया गया था और झूठे मामलों में उन्हें फँसाया गया था।” प्राचा ने यह भी कहा था कि दिल्ली के दंगे वास्तव में सांप्रदायिक दंगे नहीं थे।

आखिर कब तक गैर-मुस्लिमों को सेकुलरिज्म के नाम पर छला जाता रहेगा? 
जब कभी कहीं भी दंगे में मुस्लिम गिरफ्तार किए जाते हैं, इनके सरगना हमेशा मुस्लिम मजहब के नाम पर 
गरीब, मजलूम और नसमझ कहकर victim card खेलने लगते हैं। जब प्रदर्शनों में हिन्दुओं की गैर-मौजूदगी में भारत को इस्लामिक देश बनाने और fuck hindutva के नारे कोई गरीब, मजलूम और नासमझ लगा सकता है? इन साम्प्रदायिक नारे लगाए जाने के पीछे कौन सी सोंच थी? किन लोगों के कहने पर देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंकने का षड़यंत्र काम कर रहा था? क्यों नहीं इन साम्प्रदायिक नारों का विरोध किया गया? 
देखिए जनवरी 29, 2020 को लिखा सर्वाधिक पढ़ा गया लेख, जो उनको भी गंभीरता से पढ़ना चाहिए जो सेकुलरिज्म का राग अलापते रहते हैं, आखिर कब तक गैर-मुस्लिमों को सेकुलरिज्म के नाम पर छला जाता रहेगा? :-
सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार
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सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक, जब तक भारत में इस्लाम की हुकूमत नहीं ले आते : अरफ़ा खानुम, मुस्लिम पत्रकार

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश वीरेंद्र भट ने 11 नवंबर को आरोपित आरिफ की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए वकील महमूद प्राचा की जमकर खिंचाई की। उन्होंने कहा, “पुलिस ने अपना काम पूरी ईमानदारी से किया, सांप्रदायिक आधार पर नहीं। एक चश्मदीद गवाह को आरोपित द्वारा धमकाया जा सकता है। आपके तर्क बेबुनियाद हैं।” इसके बाद अदालत ने आरोपित आरिफ को जमानत देने से इनकार कर दिया।

यह मामला 25 फरवरी, 2020 को शिव विहार तिराहा के पास आलोक तिवारी की हत्या से संबंधित है, जिसे कई गंभीर चोटें आई थीं। पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट के अनुसार, मृतक को धारदार और नुकीले हथियारों से 13 चोटें आई थीं। दंगों के दौरान हुई हत्या के दो अलग-अलग मामलों में भी आरोपित आरिफ की जाँच चल रही है।

लिबरल गिरोह के वकील महमूद प्राचा दिल्ली दंगा में ‘पीड़ितों’ का केस मुफ्त में लड़ने का दावा करता है और भारत में अघोषित आपातकाल के नैरेटिव को आगे बढ़ाता है। न सिर्फ कोर्ट में, बल्कि सोशल मीडिया के माध्यम से भी वो इस्लामी प्रोपेगंडा फैलाने में दक्ष है।

 जमात उलेमा-ए-हिन्द ने महमूद प्राचा को कई आतंकवादियों का केस लड़ने के लिए हायर किया था। वकील महमूद प्राचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के दिल्ली ब्रांच का सदस्य भी है। साउथ एशिया माइनॉरिटी लॉयर्स एसोसिएशन का वो अध्यक्ष है। साथ ही जुलाई 2017 से वो अमेरिका के ‘ब्लैक लाइव्स मैटर्स’ की तर्ज पर भारत में ‘दलित, माइनॉरिटी एंड ट्राइबल लाइव्स मैटर्स’ नामक अभियान चला रहा है।

धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का पाखंड : केंद्र में बहुसंख्यकवाद और हिन्दू पीएम से परेशानी, लेकिन सिख, ईसाई, मुस्लिम बहुल राज्यों में ‘बहुसंख्यकवाद’ पर चुप्पी

                                                                                                    साभार 
देश में जिस तरह गांधी परिवार चुनाव आते ही अपना रूप बदलकर मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च और मस्जिद का दौरा शुरू कर देता है, उसी तरह धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भी अपने फायदे, स्थिति और स्थान के मुताबिक अपनी प्राथमिकताएं बदल लेते हैं। केंद्र स्तर पर ‘बहुसंख्यकवाद’ उन्हें शोषक के रूप में दिखाई देता है और इसका जमकर विरोध करते हैं। उन्हें बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक हिन्दू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से परेशानी होती है, लेकिन मुस्लिम, सिख, ईसाई बहुल राज्यों में उनका ‘बहुसंख्यकवाद’ का फॉर्मूला लागू नहीं होता है। केंद्र से राज्य में आते ही उनकी धर्मनिरपेक्षता, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद की थ्योरी पूरी तरह से बदल जाती है।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी को पंजाब के मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया गया तो उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि केवल सिख ही मुख्यमंत्री होना चाहिए। कांग्रेस मंथन के दौरान कई हिन्दू दावेदारों के भी नाम सामने आए, लेकिन आखिरकार दलित सिख लीडर चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। यहां पर किसी धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी ने सवाल नहीं उठाया कि पंजाब में सिर्फ सिख ही मुख्यमंत्री क्यों बनेगा ? क्या अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता ? 

दरअसल सेक्युलर बुद्धिजीवी यह धारणा बनाने में सफल रहे है कि पंजाब एक सिख बहुल राज्य है, इसलिए यहां पर सीएम अनिवार्य तौर पर सिख होना चाहिए। हालांकि राज्य की 39 प्रतिशत आबादी (2011 की जनगणना के मुताबिक) हिंदू है। यही नहीं, अनुच्छेद 370 हटने से पहले जम्मू और कश्मीर का मुख्यमंत्री भी अनिवार्य तौर पर मुस्लिम होता था, क्योंकि स्थानीय आबादी में मुस्लिमों का दबदबा है। वहीं नागालैंड और मिजोरम का मुख्यमंत्री ईसाई होना चाहिए क्योंकि दोनों राज्यों में ईसाईयों की आबादी ज्यादा है।

सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने कभी भी अपनी आवाज या कलम जम्मू और कश्मीर के अल्पसंख्यकों के लिए नहीं उठाई, जिनके लिए भेजा गया करोड़ों रुपया साल दर साल बहुसंख्यक मुस्लिम हड़पते रहे। अविभाजित पंजाब के दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) में बंटवारे के बाद राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री हिंदू, ईसाई, जैन या बौद्ध नहीं रहा है। 1966 में रामकिशन अविभाजित पंजाब के आखिरी हिंदू मुख्यमंत्री थे। उसके बाद से हर मुख्यमंत्री जट्ट सिख रहा है।

इसी तरह लक्ष्यद्वीप और बिहार के किशनगंज जैसे मुस्लिम बहुल जिले में मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। क्या इन मुस्लिम बहुल जिलों में धर्मनिरपेक्षता, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद की थ्योरी लागू नहीं होती ? क्या यहां पर किसी अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख और ईसाई की जीत के लिए धर्म और जाति से ऊपर उठकर अपील नहीं की जा सकती है। लेकिन देश के तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने ऐसा करने की कभी कोशिश नहीं की, क्योंकि उनकी धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ जाएगी। इन सेक्युलरों को यहां के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध दिखाई नहीं देते हैं। यहां पर इन्हें देश की एकता, अखण्डता और संप्रभुता को खतरा नजर नहीं आता है। 

इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के नाम पर विभाजन को बढ़ावा दिया है। जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों को बोलबाला था, तो विभिन्न समुदायों में अल्पसंख्यक बनने की होड़ मच गई थी। जिन वर्गों और समुदायों ने हजारों साल से इसी धरती पर सदभाव के साथ सह अस्तित्व की मिसाल पेश की वे खुद को अल्पसंख्यक घोषित कराने पर आमादा हो गए। 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। वे सभी जैन जो हिन्दू धर्म के अनुसार ही जीवन जीते रहे जिनके रोटी,बेटी के रिश्ते सनातनी लोगों से आज भी बरकरार है वे सभी अब अल्पसंख्यक हो गए। 

विवेकानंद ने पूरी दुनिया में सनातन धर्म का झंडा फहराया, उनके अनुयायी रामकृष्ण मठ भी खुद को ऐसा ही दर्जा मांगता रहता है, खालसा पंथ के लिए सनातन समाज जिसे हिन्दू भी कहते हैं, ने अपने लोगों को सहर्ष भेजा वह आज अलग धर्म बन गया। कर्नाटक का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने वहां की लिंगायत जाति को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। दरअसल अपने कुछ लोगों के लिए रियायतें और सुविधाएं हासिल करने की स्वार्थी सोच इस अल्पसंख्यक दर्जे की चाहत में छिपी है। धर्मनिरपेक्ष संविधान की आड़ लेकर ये बुद्धिजीवी बहुसंख्यक हिन्दुओं की सांस्कृतिक पहचान को ही खत्म करने की साजिश कर रहे हैं।

धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी अपनी सुविधा के मुताबिक ‘बहुसंख्यकवाद’ का विरोध करते हैं, ताकि हिन्दुओं को विभाजित कर अल्पसंख्यकवाद का इस्तेमाल कर सके। सच्चाई यह है कि ये धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवि देश में अल्पसंख्यकों का शासन स्थापित पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते हैं, क्योंकि ‘बहुसंख्यकवाद’ उनकी महत्वाकांक्षा पूरी करने में सबसे बड़ी बाधा है। ये हिन्दू समाज को विभाजित कर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए ये कभी आदिवासियों को बरगलाकर हिन्दू नहीं होने की आवाज बुलंद कराते हैं, तो कभी जय भीम को बढ़ावा देकर दलित समुदाय को भड़काते हैं।

बीजेपी ने धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के इस पाखंड को जनता के सामने रखा। 2014 में हिंदुत्व और विकास के प्रतीक बन चुके नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। इससे बीजेपी को प्रचंड जीत मिली। लेकिन पांच साल तक इन तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी अल्पसंख्यक असुरक्षा, असहिष्णुता, मॉब लिंचिंग का मुद्दा उठाया, तो कभी अवार्ड वापसी कर माहौल खराब करने की कोशिश की। इसके बावजूद बीजेपी सरकार 2019 में भारी बहुमत से सत्ता में आई और नरेन्द्र मोदी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। इन बुद्धिजीवियों को बहुत पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्पष्ट और निडर होकर बहुसंख्यक हिंदू हितों की रक्षा करते हैं। 

तेलंगाना : गोधरा पर सियापा करने वाले भैंसा पर खामोश क्यों? ‘2008 में मस्जिद में हिन्दू को काटा, 2020 में गणेश प्रतिमा पर पेशाब.....'

                                भैंसा दंगे में जलाए गए कई वाहन व घर (फोटो साभार: न्यू इंडियन एक्सप्रेस)
गोधरा दंगे पर नरेंद्र मोदी को कोसने वाले तेलंगाना में हुए दंगे पर क्यों खामोश हैं? यही लोग उत्तर प्रदेश में अखिलेश के कार्यकाल में मुज़फ्फर नगर पर खामोश थे, क्या इसी का नाम सेकुलरिज्म है? यदि इसी का नाम सेकुलरिज्म है, बंद होना चाहिए सेकुलरिज्म का ड्रामा। मीडिया भी खामोश है, क्योकि प्रहार हिन्दुओं पर हुआ है, मुसलमानों पर नहीं। मीडिया को बस बंगाल की चिंता है, ये वही मीडिया है जब 24 परगना पर हिन्दुओं के घर और मंदिरों को आग के हवाले किया जाता था, तब भी मीडिया ने परवाह नहीं की। 
दंगों की वजह से तेलंगाना का भैंसा कई दिनों से ख़बरों में है। इस महीने की शुरुआत में हुई हिंसा में 10 लोग घायल हुए, जिसमें कुछ पत्रकार भी शामिल थे। साथ ही कुछ घरों और गाड़ियों को भी फूँक दिया गया था। यहाँ सांप्रदायिक हिंसा नई बात नहीं है। जनवरी 2020 में इसी तरह के दंगे हुए थे। इन दंगों को कवर करने वाले मिस्टर सिद्धू नामक पत्रकार ने इसके पीछे असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM का हाथ बताया है।
 ‘2008 में मस्जिद में हिन्दू को काटा, 2020 में गणेश प्रतिमा पर पेशाब, 2021 में AIMIM की शह पर दंगा’: भैंसा पर पत्रकार का बड़ा खुलासा

हाल ही में ‘गोवा क्रॉनिकल’ ने सिद्धू से संपर्क कर इस पूरे प्रकरण के बारे में जाना। उन्होंने जनवरी 2020 से लेकर मार्च 2021 तक की घटनाओं को लेकर जानकारी दी। उन्होंने बताया कि जनवरी 2020 में हुआ दंगा रातोंरात हिंसक हो गया था और महाराष्ट्र-तेलंगाना सीमा पर स्थित कोरभा गली सबसे ज्यादा प्रभावित हुई थी। उस समय मुस्लिमों ने ‘इज्तिमा’ का आयोजन किया था। उसमें शामिल हुए करीब 50,000 लोगों ने ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ के साथ-साथ CAA और NRC विरोधी नारे लगाए थे।

सिद्धू ने बताया कि 12 जनवरी 2020 को रात 8 बजे एक हिन्दू व्यक्ति ने बाहर मच रहे शोर से तंग आकर मुस्लिम समाज से कहा कि वो तेज़ आवाज़ में कार्यक्रम कर लोगों को परेशान न करें। धीरे-धीरे बहस होने लगी और एक मुस्लिम व्यक्ति ने हिन्दू लड़के को थप्पड़ जड़ दिया। उसने भी बदले में एक थप्पड़ रसीद कर डाला। फिर आसपास के इलाकों से मुस्लिम वहाँ जुट गए। 1 घंटे के भीतर हिन्दुओं के घरों पर पेट्रोल बम फेंके जाने लगे।

सिद्धू ने बताया कि मुस्लिमों ने लगातार पाकिस्तान समर्थक नारे लगाते हुए हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया और यहाँ तक कि भगवान गणेश की प्रतिमा पर पेशाब भी कर डाला। मकर संक्रांति पर हिन्दू महिलाओं द्वारा बनाए गए प्रसाद व भोजन की वस्तुओं में पेशाब कर दिया गया। हिन्दू महिलाओं के साथ बदतमीजी हुई और उनके गहने छीन लिए गए। वे बच्चों को भी मारना चाहते थे। मिस्टर सिद्धू का कहना है कि तेलंगाना के गठन के बाद हुए इस पहले हिन्दू-मुस्लिम दंगे के बारे में KCR सरकार नहीं चाहती थी कि किसी को पता चले।

किसी भी पत्रकार को वहाँ नहीं जाने दिया जा रहा था और मीडिया को कवरेज से मना कर दिया गया था। सिद्धू ने बताया कि उन्होंने वहाँ जाकर कई वीडियो अपलोड किए, जिनसे पता चल रहा था कि हिन्दुओं के पास रहने को घर नहीं थे और उनके साधन जला दिए गए थे। उन्होंने बताया कि उन्हें मुख्यमंत्री KCR के आईटी सेल ने धमकियाँ दी और वीडियोज डिलीट करने को कहा। उन पर FIR दर्ज किए गए।

स्थानीय RSS यूनिट ने हिन्दुओं को उनका घर फिर से बनाने में मदद की। सिद्धू ने इस साल हुए दंगों की बात करते हुए कहा कि अभी भी ‘इज्तिमा’ चल रहा था। जुल्फिकार और भट्टी गलियों में दंगों का सबसे ज्यादा प्रभाव पड़ा और इस बार भी मीडिया को कवरेज से मना किया गया। उन्होंने बताया कि AIMIM के काउंसलर जाबिर अहमद के खिलाफ 19 मामले दर्ज हैं, लेकिन पुलिस ने उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

उसे ओवैसी भाइयों का करीबी भी माना जाता है। उन्होंने बताया कि NIA की एक टीम ने भैंसा आकर कुछ आतंकियों को गिरफ्तार किया था और उन्हें भी AIMIM के नेताओं और स्थानीय लोगों ने शरण दी हुई थी। सिद्धू का कहना है कि यहाँ के मस्जिदों में अक्सर असामाजिक तत्वों को पनाह मिलती है। मस्जिद के पास से गुजरने वाले हिन्दू जुलूसों पर पत्थरबाजी होती है। उन्होंने दावा किया कि 2008 में एक हिन्दू को मस्जिद में ले जाकर टुकड़े-टुकड़े काट डाला गया था, जिससे दंगे भड़के थे। सिद्धू ने बताया:

“हिन्दू उस इलाके में डर के साए में जीते हैं और उनकी जीवनशैली काफी कठिन हो गई है क्योंकि मौत का भय बना रहता है। भैंसा दूसरा कश्मीर बन रहा है। मुस्लिम जनसंख्या लगातार बढ़ती जा रही है। हिन्दुओं के लिए आवाज़ उठाने वालों के विरुद्ध कार्रवाई की जाती है। पत्रकारों पर तलवार से हमले हुए। एक पत्रकार जीवन और मौत से जूझ रहा है लेकिन TRS के डर से कोई आवाज़ नहीं उठाता। मीडिया का एक बड़ा वर्ग राज्य की सत्ताधारी पार्टी के इशारों पर नाच रहा है।”

उन्होंने बताया कि मुस्लिमों के प्रभाव वाले संवेदनशील क्षेत्र भैंसा में टीआरएस और AIMIM का मुस्लिम गुंडों को समर्थन मिलता है। उन्होंने कहा कि यहाँ हिन्दुओं को पलायन के लिए मजबूर करने का लक्ष्य लेकर चला जा रहा है और पुलिसकर्मियों पर भी राजनीतिक दबाव है। बकौल सिद्धू, स्थानीय स्तर पर मुस्लिम वोटों के ध्रुवीकरण और प्रभाव के हिसाब से डेमोग्राफी कुछ ऐसी बनाई गई है कि AIMIM की ही जीत हो।

उन्होंने ‘हिन्दू वाहिनी’ के बारे में बात करते हुए कहा कि हिन्दुओं की सुरक्षा के लिए और इस्लामी जिहादियों से लड़ने के लिए यही संगठन आगे आता है। साथ ही आरोप लगाया कि सरकार के इशारे पर ‘हिन्दू वाहिनी’ के युवाओं को जहाँ गिरफ्तार किया जाता है, वहीं मुस्लिम आरोपित खुला घूमते हैं। पुलिसकर्मियों ने हिन्दू कार्यकर्ताओं को धमकाया भी है। हिन्दुओं पर झूठे केस चला कर उन्हें फँसाने के आरोप भी लगे हैं।

हाल ही में वहाँ एक नाबालिग बच्ची के यौन शोषण का मामला भी सामने आया था। पीड़ित बच्ची और आरोपित अलग-अलग समुदाय से थे और लड़की की उम्र मात्र 4 वर्ष है। आरोप लगा था कि इसके बाद पुलिस ने पीड़ित परिजनों से बिना कोई हो-हल्ला मचाए अपने गाँव वापस लौट जाने को कहा। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बंदी संजय कुमार ने दावा किया था कि पुलिस ने पीड़ित परिजनों पर इस हैवानियत के बारे में किसी को कुछ न बताने का दबाव बनाया।