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कार्तिक माह में ही क्यों मनाया जाता है भैया दूज : यमराज की क्रूरता, यमुना की निर्मलता और एक वरदान… जानें तिलक-भोज का महत्व; इसी दिन मृत्युलोक में सभी प्राणियों के पाप-पुण्य का लेखाजोखा रखने वाले कायस्थ समाज जनक श्री चित्रगुप्तजी महाराज की भी पूजा करने का प्रावधान है

                          कायस्थ समाज के जनक श्री चित्रगुप्तजी महाराज 
वर्ष भर मनाए जाने वाले त्यौहार उन सभी सनातन विरोधियों और पश्चिमी संस्कृति में डूबे लोगों पर एक जबरदस्त प्रहार है। हर त्यौहार केवल भारतीय संस्कृति को उजागर नहीं बहुत कुछ वर्णन करता है। हर त्यौहार हर ऋतु के आने का संकेत देते हैं जो विश्व के किसी अन्य मजहब में नहीं। होली गर्मी आने का संकेत देती है तो श्राद्ध शरत ऋतु के आने का संकेत देते हैं। जो दीपावली के बाद आने वाले गंगा स्नान से अपने चरम पर आने का।   
भारतीय संस्कृति में हर रिश्ते का अपना महत्व है और अगर बात अगर भाई-बहन के संबंध की हो तो परंपराए इस प्रकार से बनाई गई हैं कि ये समय-समय पर इस रिश्ते को और मजबूत करती हैं।

ऐसी ही एक परंपरा हमारे समाज में भैया दूज को मनाने की सदियों से चलती चली आई है। जीवन में तमाम व्यस्तता के बाद भी अगर आज इस त्योहार का लोग महत्व समझते हैं, इसे मनाने के लिए उत्सुक रहते हैं, तो यही इस परंपरा की जीत है।

भैया दूज हर वर्ष कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है। कहते हैं कि इस दिन भाई के माथे पर तिलक करके बहन अपने भाई की लंबी उम्र की कामना करती है, लेकिन सिर्फ तिलक से लंबी उम्र का क्या संबंध है ये कई लोग सोचते हैं तो चलिए आज एक पौराणिक कथा के जरिए इस तिलक के महत्व के बारे में जानते हैं और समझते हैं कि इसका संबंध कैसे भाई की दीर्घायु से जोड़ते हैं।

यम और यमुना से जुड़ी कथा

ये कथा है यमराज और उनकी बहन यमुना मैया की। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यमराज और यमुना मैया दोनों ही भगवान सूर्य की संताने हैं लेकिन सूर्य देव की तेज किरणों के कारण वो अपनी माता संज्ञा के साथ अलग रहे। बाद में यम देव ने अपनी यमपुरी बसाई जहाँ दुष्टों को उनके कर्मों के लिए दंड दिया जाता था।
यमुना मैया निर्मल स्वभाव की थीं। उनसे ज्यादा दिन ये सब देखा नहीं गया और आखिर में वह गोलोक चली गईं। समय बीता। एक दिन यमराज को अपनी बहन की बहुत याद आई। उन्होंने अपने दूतों को भेज कहा कि वो जाकर यमुना जी का पता लगाएँ। बहुत खोजने के बाद जब किसी को यमुना जी का पता नहीं चला, तब यम देव खुद गोलोक के लिए चले और इस तरह बहुत वर्ष बाद भाई-बहन की आपस में भेंट हुई।
यमुना जी अपने भाई को देख इतनी प्रसन्न थीं कि उन्होंने यम देव का तिलक कर उनका स्वागत किया और उन्हें स्वादिष्ट भोजन कराया। बहन का प्रेम देख यमराज भी भावुक हो गए। उन्होंने अपनी बहन से कहा कि वो उनसे कुछ भी वरदान माँग लें। इस पर यमुना मैया को यमपुरी में लोगों को दी जाने वाली यातनाओं की याद आई और उन्होंने कहा – “मुझे ये वर दें कि जो कोई मेरे जल में स्नान करे वो यमपुरी में न जाए।”
यमराज इस वरदान को सुन सोच में पड़ गए कि अगर ऐसा हुआ तो यमपुरी में आएगा ही कौन। तभी बहन यमुना ने फिर कहा कि आप चिंता न करें, मुझे यह वरदान दें कि जो लोग आज के दिन बहन से तिलक कराएँ और मेरे जल में स्नान करे वो कभी यमपुरी न जाए।
इसी वरदान के बाद द्वादशी तिथि को भाई दूज मनाने की परंपरा चली और हर बहन ने अपने भाई के माथे पर तिलक करके उनकी लंबी उम्र की कामना करनी शुरू की।
माना जाता है कि जो भाई इस दिन अपनी सगी बहन के हाथ से भोजन को स्नेहपूर्वक करता है, उसके उपहार देता है उसके बल में वृद्धि होती है। वह एक साल तक किसी कलह एवं शत्रु के भय का सामना नहीं करता। उसके धन, यश, धर्म, काम में बढोतरी होती है।

भगवान कृष्ण और सुभद्रा की कहानी

इस कथा के अलावा एक कथा और मशहूर है जिसका संबंध भगवान कृष्ण और उनकी बहन सुभद्रा से जुड़ा है। हिंदू धर्म की मान्यताओं के अनुसार, भगवान कृष्ण ने जब नरकासुर का वध किया तो उसके बाद वो अपनी बहन से मिलने गए।इसके बाद सुभद्रा ने उनका स्वागत तिलक करके और आरती करके किया। इस दौरान भगवान ने अपनी बहन को आशीर्वाद दिया कि वो हमेशा अपनी बहन की रक्षा करेंगे।

भाई दूज का भारत में महत्व

आज इस त्योहार को मनाने का तरीका जगह-जगह अलग हो सकता है लेकिन इस त्योहार को लेकर विश्वास सबका एक ही है। ये केवल एक भाई दूज केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है, बल्कि यह पारिवारिक बंधनों को मजबूत करने का अवसर भी प्रदान करता है। पूरे भारत में इसे विभिन्न नामों से मनाया जाता है। कहीं इसे भाई दूज कहते हैं तो कहीं पर भाई तीज कहा जाता है। विदेशों में भी धीरे-धीरे भारतीय संस्कृति के प्रति रूचि रखने वाले लोग इस उत्सव को मनाते हैं।
कायस्थों के जनक श्री श्री चित्रगुप्त जी की भी इसी दिन पूजा की जाती है
जानिए आखिर क्यों कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को ही क्यों मनाया जाता है, उसका मुख्य कारण यह है कि जब पुरुषोत्तम श्रीराम का बनवास उपरांत राजतिलक में किसी कारणवश श्री श्री चित्रगुप्त जी महाराज को निमंत्रण रह गया, जब प्रभु श्रीराम ने चित्रगुप्त जी महाराज दिखाई नहीं देने पर पूछताछ करने पर गुरु वशिष्ठ ने अपनी गलती बताते हुए निमंत्रण रह जाने का कारण बताया। लेकिन सबको राजतिलक में जाते देख स्वयं को अनदेखा किये जाने से नाराज होकर 3 दिन तक समस्त कार्य बाधित कर दिया। मृत्युलोक से जाने वालों की भीड़ लग गयी। लेकिन जब 3 दिन बाद ब्रह्मा, एवं महेश(शिव) ने चित्रगुप्त जी महाराज को गलती बताकर प्रभु श्री राम जी के माफ़ी सन्देश को बताने के बाद श्री श्री चित्रगुप्त जी महाराज ने अपने सहयोगियों को 24 घंटे काम करने का आदेश दिया और मृत्युलोक (पृथ्वी) से आये मृतकों की लगी भीड़ को समाप्त किया।  

श्री श्री चित्रगुप्तजी महाराज अपना क्रोध यह सुनकर आनंदित हो गए कि प्रभु ने यह भी कहा है कि 'जब कार्य सम्पूर्ण होने पर अपने परमधाम वापस आऊंगा तो सर्वप्रथम उन्ही से भेंट कर अपने धाम जाऊंगा।' यही कारण है कि कायस्थ समाज आज के दिन इनकी स्तुति करते कलम और दवात की भी पूजा करता है।        

कहनी है इक बात हमें “राम भक्त” दीवानों से, संभल के रहना अपने घर में, छुपे हुए मक्कारों से, रामोत्सव रोकने कोर्ट जाने वालों का सामाजिक बहिष्कार किया जाए

 सुभाष चन्द्र

राम विरोधियों को शायद नहीं मालूम कि नरेंद्र मोदी स्वयं एक तपस्वी हैं। याद करो, जब 7 नवंबर 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी की सरकार ने गौ हत्या का विरोध कर रहे पार्लियामेंट स्ट्रीट पर निहत्ते साधु-संतो पर गोलियां चलवाकर उनके खून की होली खेले जाने से पार्लियामेंट स्ट्रीट खून से लाल होने और साधु-संतों की बिछ रही लाशों पर, श्री कृपालु जी महाराज ने कहा था, "जिस तरह हम निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेली जा रही है, इंदिरा गाँधी देखना कांग्रेस को समाप्त करने हिमालय से आधुनिक वेश-भूषा में एक तपस्वी आएगा", प्रमाण सर्वविदित है कि 2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से जिस सनातन को पिछली सरकारों द्वारा कलंकित करने का प्रयास किया जा रहा था, अपने मूल अस्तित्व में आना शुरू हो चूका है, जिसकी चमक से सनातन विरोधियों की नींद, रोटी और पानी पीना कष्टमय हो रहा है। और जब केवल शंखनाथ होने पर सनातन विरोधियों का ये हाल है, कल्पना करिए इन विरोधियों का उस समय का क्या हाल होगा, जब शिशु सनातन अपने यौवन पर आएगा।    

इन सनातन विरोधियों को शायद नहीं मालूम कि अभी एक और तपस्वी का आना शेष है। जब इस तपस्वी का आगमन होगा, इन सनातन विरोधियों का क्या होगा, परमपिता कल्याण करे। दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के प्रमुख आशुतोष महाराज की गहन समाधि को दस वर्ष पूरे हो रहे हैं। संस्थान के अनुसार 29 जनवरी, 2014 को महाराज ने गहन समाधि ली थी। उसके बाद से संस्थान की तरफ से महाराज के शरीर को कड़ी सुरक्षा में रखा गया है। 

पंजाब के काले दौर में महाराज ने 1983 में जालंधर के नूरमहल में दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की नींव रखी थी। महाराज से प्रभावित होने वालों की संख्या लगातार बढ़ती रही और कुछ ही सालों में उनके लाखों अनुयायी हो गए। 1991 में उन्होंने संस्थान का आधिकारिक पंजीकरण दिव्य ज्योति जागृति संस्थान के नाम से करवाया। इसके बाद उनके रोजाना व साप्ताहिक तथा मासिक प्रवचनों को सुनने के लिए भीड़ उमडऩे लगी। उस दौर में पंजाब आतंकवाद से जूझ रहा था।

लेखक 
भारत ही नहीं जब विश्व भर में राम भक्त “महा दीपावली” पर्व मनाने की तैयारी कर रहे हैं, तब गाज़ियाबाद का एक सनकी भोला दास इलाहाबाद हाई कोर्ट जाता है दकियानूसी बातें और शंकराचार्यों के बेतुके बयानों को लेकर मांग करने के लिए कि श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा रोक  दो, मोदी योगी को उस समारोह में जाने का संवैधानिक अधिकार नहीं है। 

भोला दास की याचिका को दायर किया All India Lawyers Union (AILU) के अध्यक्ष नरोत्तम शुक्ला ने वह भी प्राण प्रतिष्ठा होने के 5 दिन पहले जबकि 22 जनवरी की तारीख कई महीने पहले अक्टूबर, 2023 में ही नियत कर दी गई थी जाहिर है यह याचिका एक Public Stunt से ज्यादा और कुछ नहीं थी जिसे दायर करने के लिए शंकराचार्यों के कंधों का सहारा भी लिया गया

जहां विपक्ष एक के बाद एक कुतर्क दे रहा है श्री राम मंदिर के विरोध में, वहां ऐसी याचिका दायर करना बताता है कि किस तरह “राम के दुश्मन” अपने घरों के झरोखों से झाँक रहे हैं और “राम भक्तो” को ऐसे “राम द्रोही” गद्दारों से संभल कर रहने की जरूरत है

अब बहुत हो गया, विपक्ष ने अपने मन की बहुत कर ली, मंदिर बहिष्कार का पूरा खेल खेल लिया और इसलिए अब समय आ गया है ऐसे दलों और उनके नेताओं का पूर्ण सामाजिक बहिष्कार किया जाए ऐसा बहिष्कार सबसे पहले याचिका दायर करने वाले भोला दास और उसके वकील नरोत्तम शुक्ला का होना चाहिए इलाहाबाद हाई कोर्ट बार को नरोत्तम शुक्ला को उसके बहिष्कार में पूरा सहयोग करना चाहिए

आज इलाहाबाद हाई कोर्ट के कार्यवाहक Chief Justice मनोज गुप्ता की पीठ ने भोला दास की याचिका पर तुरंत सुनवाई से इंकार कर दिया

शंकराचार्यों के प्राण प्रतिष्ठा को सनातन प्रक्रिया के खिलाफ कहने मात्र से प्राण प्रतिष्ठा कैसे रोक सकते हैं? शंकराचार्यों का यह कहना बेमानी है निर्माणाधीन मंदिर में मूर्तियों की प्राण प्रतिष्ठा नहीं हो सकती ऐसा विचार उनके मन में कभी सोमनाथ मंदिर में हुई प्राण प्रतिष्ठा के समय क्यों नहीं आया जबकि सोमनाथ मंदिर का निर्माण प्राण प्रतिष्ठा के 14 वर्ष बाद पूरा हुआ था क्या उस समय इसलिए नहीं बोले क्योंकि तब प्राण प्रतिष्ठा करने वाला प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी नहीं था और प्राण प्रतिष्ठा के विरोध में स्वयं तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू खड़ा था?

कल पूरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती ने कहा है कि मोदी से कोई द्वेष नहीं है, हम केवल शास्त्र की बात कर रहे हैं माननीय शंकराचार्य जी, मोदी से ही तो द्वेष है जो आप में सही और गलत समझने की शक्ति भी ख़त्म हो गई है एक विद्वान आप जैसा कुछ कहता है तो दूसरा विद्वान श्री श्री रविशंकर भी कह रहा है कि भगवान राम ने भी रामेश्वरम में शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा कर दी थी जबकि मंदिर तो वर्षों बाद बना था तो क्या आप शंकराचार्य जी भगवान राम पर भी दोष लगा देंगे श्री श्री रवि शंकर के अनुसार रामेश्वरम के अलावा मदुरै और तिरुपति बालाजी मंदिर में भी ऐसा ही हुआ था

अवलोकन करें:-

सनातन धर्म के गौरवशाली अमूल्य नौ रत्न जिन्हे कुर्सी के भूखे नेताओं ने पाठ्य पुस्तकों से वंचित

ऐसे में जब पूरा देश राममय है, तब राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के विरोध के बहाने बनाने वालों का समाज के लिए बहिष्कार करना कठिन कार्य नहीं है चाहे वो कांग्रेस हो या कोई भी दल हो या शंकराचार्य ही क्यों न हों कांग्रेस का सम्पूर्ण बहिष्कार अब समय की मांग है कांग्रेस के नेता गाते फिर रहे हैं कि राम सबके हैं, लेकिन क्या सोनिया गांधी कह सकती है कि भगवान राम उसके भी हैं।  

श्री राम मंदिर एक ही बार बनेगा, वो बन कर रहेगा, फिर इतने “नाराज़ फूफा” क्यों हैं?

                                                                                                  साभार 
सुभाष चन्द्र

चाहे राम भक्त हों या राम मंदिर से विमुख बैठे “नाराज़ फूफा” हों, सबके लिए श्री राम मंदिर केवल एक बार ही बनेगा और वह तो बन कर रहेगा जिसमें भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा भी होकर रहेगी, फिर रंग में भंग डालने का क्या औचित्य है, यज्ञ में आहुति डालने की जगह यज्ञ विध्वंस करने का काम तो राक्षस प्रवत्ति के लोगों का होता है। जिस कारण भगवान विष्णु को राम रूप में धरती पर आना पड़ा। संभव है कि कलयुगी रक्षक इतने वर्षों से अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर का विरोध करते आ रहे हैं। श्रीराम विरोधियों को नहीं मालूम की रावण को भी अंतिम समय "श्रीराम" कहना पड़ा था। 

लेखक 

राम रावण युद्ध में अनेक प्रसंग हैं जिनमे देखा गया था जब रावण की सेना और लंकावासियों ने भगवान राम की सराहना की थी जब मेघनाथ का पार्थिव शरीर लंका भेजा गया था तो उसे भगवान राम ने अपने वस्त्र से ढक कर भेजा था और तब लंकावासियों ने कहा था राम कितने भले इंसान हैं उन्होंने युवराज के शव का भी आदर किया है, लेकिन आज की “लंकिनी” की सेना में एक भी ऐसा नहीं है जिसे श्री मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा में कुछ भी अच्छा नज़र आ रहा हो, हर कोई यज्ञ में हड्डियां डालने को आतुर है

राजनीतिक दलों के लोगों की मति भी लगता है भगवान राम ने भ्रष्ट कर दी है उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा, जिसके मुंह में जो आ रहा है वह बोल रहा है उसके अलावा सबसे ज्यादा दुःख की बात है कि सभी शंकराचार्यों ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह में न जाने का फैसला किया है द्वारका के शंकराचार्य अविमुक्त आनन्द में स्वरूपानंद की आत्मा वास करती है लेकिन पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती कह रहे हैं कि मोदी पूजा करेगा तो वह कैसे ताली बजाएंगे, यह मंदिर विनाश लाएगा  

कोई इन शंकराचार्यों से पूछे कि श्री राम मंदिर बनाने के लिए आपने क्या योगदान किया है और आज तक हिन्दू समाज के लिए आपने क्या क्या पुण्य कार्य किये हैं जबकि आपके मठों में पैसे की कमी नहीं है कोई शंकराचार्य, कोई गुरु, कोई जाति, कोई नेता या कोई भी समाज भगवान राम से बड़ा नहीं हो सकता लेकिन आज समाज के ऐसे प्रबुद्ध लोग रामकाज में अड़ंगे डालने का प्रयास कर रहे हैं राजनेताओं का तो समझ आता है कि वह अपनी दुकान चलाए रखने की राजनीति के लिए विरोध कर रहे हैं लेकिन धर्माचार्यों का ऐसा आचरण समझ से परे है

चाहे नेता हो या धर्माचार्य, सबका मकसद बस मोदी विरोध है, बस मोदी को श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिए एक ढकोसला शुरू किया हुआ है कि राम तो सबके हैं, भाजपा अपना कार्यक्रम कैसे बना सकती है ठीक है भाई, राम सबके हैं, तो फिर विपक्ष बताए उसने मंदिर निर्माण के लिए क्या किया था और क्या भगवान राम को काल्पनिक नहीं कहा था आज वह काल्पनिक राम आपका हो सकता है, हमारे लिए तो सत्य सनातन श्री राम हमारे हैं

जो नेता भगवान राम का अपमान कर रहे हैं, सबसे पहले उनकी सुरक्षा हटा देनी चाहिए, उनकी सुरक्षा पर जनता का पैसा खर्च नहीं होना चाहिए वो लोग जब जन-जन के स्वामी भगवान राम का अपमान कर सकते हैं तो उन्हें भक्तो के बीच में खुला छोड़ देना चाहिए आप संयम नहीं रख सकते बोलते हुए तो भक्तों को भी संयम रखने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए

अभी तो श्री राम लला की प्राण प्रतिष्ठा हुई नहीं है लेकिन अभी से अयोध्या जी में श्रद्धालुओं का सैलाब दिखाई दे रहा है जिसमें विपक्ष की फैलाया हुआ जात पात का जहर दिखाई नहीं दे रहा।अपनी दुकान चलाने के लिए जात-पात इन्ही पाखंडियों द्वारा फैला हुआ है। मंदिर उद्घाटन के बाद जो प्रचंड सैलाब उमड़ेगा तब क्या होगा, विपक्ष को चिंता यह है क्योंकि वह मोदी को 400 पहुंचाने में मदद करेगा 

शंकराचार्यों को पुनर्विचार करना चाहिए वरना फिर हिन्दू समाज उन पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होगा शंकराचार्य समाज से से हैं, समाज उनसे नहीं है। यदि समय रहते शंकराचार्य नहीं चेते निश्चित रूप से वह दिन भी अधिक दुर नहीं होगा, जब सनातनी प्रेमियों द्वारा उनका उपहास होना उन्हें शून्य में ले आएगा। राजनेता तो किसी न किसी बहाने अपनी दुकान को चलाने के लिए कोई तिकड़म कर लेंगे, जिसका समस्त बीजेपी विरोधियों द्वारा I.N.D.I.गठबंधन एक उदाहरण है। इनको मालूँम है राममंदिर पालिका से लेकर लोक सभा चुनावों तक उनकी दुकान को भारी नुकसान होने वाला है।  

गिलहरी का रामसेतु बनाने में योगदान

आज अयोध्या में राम मंदिर के जीणोद्धार होने पर सनातन विरोधी नितरोज कुछ न कुछ जहर उगल रहे हैं। जो इस बात को स्पष्ट प्रमाणित कर रहा है कि ये लोग बुद्धिविहीन, शिक्षित होते हुए किसी अशिक्षित से कम नहीं। यदि समय रहते इन लोगों ने अपने विवेक का प्रयोग नहीं किया, निश्चितरूप से वह दिन भी बहुत दूर नहीं होगा, जब ये अस्तित्वविहीन हो जायेंगे। इतिहास साक्षी है कि सनातन विरोधियों का कोई नामलेवा नहीं। 
राम को मिथ्या और रामसेतु को काल्पनिक कहने वालों को जानना चाहिए कि गिलहरी पर कथ्थई निशान किसी और के नहीं पुरुषोत्तम श्रीराम के हाथ के हैं, जब रामसेतु निर्माण के दौरान रामसेतु निर्माण गिलहरी के असहाय योगदान से प्रसन्न हो राम ने अपने कोमल हाथ फेरते जो आशीर्वाद दिया था, उस समय से लेकर आज तक प्रभु श्रीराम के हाथों के निशान गिलहरी पर नज़र आते है, जबकि प्रभु राम ने आशीर्वाद दिया था त्रेता युग में और आज द्वापर युग के बाद चल रहा है कलयुग। 
उस मर्यादा पुरुषोत्तम की भूमि को अपवित्र करने से पहले दुश्मन के हाथ काँपने चाहिए थे, लेकिन इसका ठीकरा हम अपनी कायरता या हमारे एकजुट न रहने पर फोड़ें या फिर सामने वाले की क्रूरता पर - हम उस भूमि को बचा नहीं पाए।
आज हमने 500 वर्षों के संघर्ष के बाद वर्तमान न्यायिक व्यवस्था का सहारा लेकर फिर से अपने गौरव को स्थापित किया है, तो फिर हमारे ही देश के कुछ कीड़ों को इससे जलन हो रही है। जो राम को लेकर बुरे विचार रखे और हर उस व्यक्ति को दंड मिलना चाहिए जो राम के अस्तित्व पर सवाल खड़ा करे। ऐसा नहीं है कि राम आलोचना से परे हैं, बात ये है कि राम की आलोचना करने के लिए भी पूर्णरूपेण सनातनी होना प्रथम शर्त है। अगर आप सनातनी नहीं हैं, आपने शास्त्रों को पढ़ा नहीं है - तो आपको राम की आलोचना का भी अधिकार नहीं है। जो तुलसी-हनुमान की तरह भक्त है, उसे प्रभु से शिकायत का अधिकार है, वो कुछ भी कह सकता है। वर्तमान युग में ऐसा कोई नहीं, इसीलिए राम विरोधी सनातनी नहीं हो सकता।

धिक्कार है उस स्वतंत्रता को जहाँ रामभक्तों का खून बहा, धिक्कार है उन नेताओं को जिन्होंने तुष्टिकरण के लिए राम को टेंट में रखा, धिक्कार है उस पीढ़ी को जिसने राम मंदिर की जगह कुछ और बनाए जाने की माँग की और धिक्कार है उन राक्षसों को जिन्होंने सब जानबूझकर भी मस्जिद के लिए जिद पकड़ी। धिक्कार है हर उस वोट को जिससे मुलायम सिंह यादव की सरकार बनी, धिक्कार है हर उस व्यक्ति को जिसने सेक्युलरिज्म की बातें कर के राम मंदिर का विरोध किया और धिक्कार है उन कालनेमियों को जिन्होंने अयोध्या में राम मंदिर के पुनर्निर्माण की महत्ता को नहीं समझा। अयोध्या राम की है, जन्मभूमि है। किष्किंधा राम का है, पंचवटी राम की है, रामेश्वरम राम का है, लंका राम की है, मिथिला राम का है। संपूर्ण भारत-भूमि राम की है। इस राष्ट्र के कण-कण में राम समाए हैं, उन्हें कोई अनदेखा नहीं कर सकता। अगर ये संभव होता, तो हम राम मन्दिर को मिटा दिए जाने के 5 शताब्दी बाद राममय न हो रहे होते। राम के दिव्यलोकगमन के हजारों वर्षों बाद राम-राम न रट रहे होते। जो पहले संभव नहीं था, आगे भी नहीं हो पाएगा। अब तक बार-बार साजिशों के बावजूद जो न हो पाया, आगे कैसे होगा? 2024 राम का वर्ष है, इसकी गंभीरता को समझिए। भगवान हमें दर्शन देने आ गए हैं।
हिंदुओं को अपने वोट की कीमत समझ नहीं होगी। वैसे पार्टी या व्यक्ति को अपना समर्थन दे जो हिंदू हित की बात करें।
कर्नाटक में श्री राम मंदिर आंदोलन से जुड़े 30 साल पुराने केस को फिर से खोला गया है और आंदोलनकारी की गिरफ्तारी की गई है क्योंकि वहां भाजपा की सरकार नहीं है।
इसलिए अपना वोट सोच समझ कर दें।
अब आते हैं मूल विषय पर:
माता सीता को वापस लाने के लिए रामसेतु बनाने का कार्य चल रहा था। भगवान राम को काफी देर तक एक ही दिशा में निहारते हुए देख लक्ष्मण जी ने पूछा भैया आप इतनी देर से क्या देख रहें हैं? भगवान राम ने इशारा करते हुए दिखाया कि वो देखो लक्ष्मण एक गिलहरी बार-बार समुद्र के किनारे जाती है और रेत पर लोटपोट करके रेत को अपने शरीर पर चिपका लेती है। जब रेत उसके शरीर पर चिपक जाता है फिर वह सेतु पर जाकर अपना सारा रेत सेतु पर झाड़ आती है। वह काफी देर से यही कार्य कर रही है।

लक्ष्मण जी बोले प्रभु वह समुन्द्र में क्रीड़ा का आनंद ले रही है और कुछ नहीं। भगवान राम ने कहा, नहीं लक्ष्मण तुम उस गिलहरी के भाव को समझने का प्रयास करो। चलो आओ उस गिलहरी से ही पूछ लेते हैं कि वह क्या कर रही है? दोनों भाई उस गिलहरी के निकट गए। भगवान राम ने गिलहरी से पूछा कि तुम क्या कर रही हो? गिलहरी ने जवाब दिया कि कुछ भी नहीं प्रभु बस इस पुण्य कार्य में थोड़ा बहुत योगदान दे रही हूँ। भगवान राम को उत्तर देकर गिलहरी फिर से अपने कार्य के लिए जाने लगी, तो भगवान राम ने उसे टोकते हुए कहा- तुम्हारे रेत के कुछ कण डालने से क्या होगा ?
गिलहरी बोली प्रभु आप सत्य कह रहे हैं। मै सृष्टि की इतनी लघु प्राणी होने के कारण इस महान कार्य हेतु कर भी क्या सकती हूँ? मेरे कार्य का मूल्यांकन भी क्या होगा? प्रभु में यह कार्य किसी आकांक्षा से नहीं कर रही। यह कार्य तो राष्ट्र कार्य है, धर्म की अधर्म पर जीत का कार्य है। राष्ट्र कार्य किसी एक व्यक्ति अथवा वर्ग का नहीं बल्कि योग्यता अनुसार सम्पूर्ण समाज का होता है। जितना कार्य वह कर सके नि:स्वार्थ भाव से समाज को राष्ट्र हित का कार्य करना चाहिए। मेरा यह कार्य आत्म संतुष्टि के लिए है प्रभु। हाँ मुझे इस बात का खेद अवश्य है कि मै सामर्थ्यवान एवं शक्तिशाली प्राणियों की भाँति सहयोग नहीं कर पा रही। भगवान राम गिलहरी की बात सुनकर भाव विभोर हो उठे। भगवान राम ने उस छोटी सी गिलहरी को अपनी हथेली पर बैठा लिया और उसके शरीर पर प्यार से हाथ फेरने लगे। भगवान राम का स्पर्श पाते ही गिलहरी का जीवन धन्य हो गया।

राम के पुत्र लव और कुश की वंशावली


राम के दो जुड़वा पुत्र लव और कुश थे। दोनों का ही वंश आगे चला। वर्तमान में दोनों के ही वंश के लोग बहुतायत में पाए जाते हैं। आओ जानते हैं कि कौन है लव और कुश के कुल के लोग जो भारत में आज भी निवास करते हैं।

- ब्रह्मा के कई पुत्र थे जिनमें से 10 प्रमुख हैं- मरीचि, अंगिरस्, अत्रि, भृगु, वशिष्ठ, नारद, पुलस्त्सय, ऋतु, दक्ष, स्वायंभुव मनु।
- मरीचि की पत्नि दक्ष- कन्या संभूति थी। इनकी दो और पत्निनयां थी- कला और उर्णा। कला से उन्हें कश्यप नामक एक पुत्र मिला। इन्होंने दक्ष की 13 पुत्रियों से विवाह किया था।
- कश्यप पत्नी अदिति से देवता और दिति से दैत्यों की उत्पत्ति हुई। अदिति के 10 पुत्र थे, विवस्वान्, इंद्र, धाता, भग, पूषा, मित्र, अर्यमा, त्वष्टा, अंशु, वरुण, सविता। कहीं कहीं पर यह नाम इस तरह पाए जाते हैं- विवस्वान्, अर्यमा, पूषा, त्वष्टा, सविता, भग, धाता, विधाता, वरुण, मित्र, इंद्र और त्रिविक्रम (भगवान वामन)।
- कश्यप के बड़े पुत्र विवस्वान् से वैवस्वत मनु का जन्म हुआ। वैवस्वत मनु के दस पुत्र थे- इल, इक्ष्वाकु, कुशनाम, अरिष्ट, धृष्ट, नरिष्यन्त, करुष, महाबली, शर्याति और पृषध। राम का जन्म इक्ष्वाकु के कुल में हुआ था। जैन धर्म के तीर्थंकर निमि भी इसी कुल के थे।
- वैवस्वत मनु के दूसरे पुत्र इक्ष्वाकु से विकुक्षि, निमि और दण्डक पुत्र उत्पन्न हुए। इस तरह से यह वंश परम्परा चलते-चलते हरिश्चन्द्र रोहित, वृष, बाहु और सगर तक पहुँची। इक्ष्वाकु प्राचीन कौशल देश के राजा थे और इनकी राजधानी अयोध्या थी। (पुत्री इला का विवाह बुध से हुआ जिसका पुत्र पुरुरवा चंद्रवंशी था)।
- रामायण के बालकांड में गुरु वशिष्ठजी द्वारा राम के कुल का वर्णन किया गया है जो इस प्रकार है:- ब्रह्माजी से मरीचि का जन्म हुआ। मरीचि के पुत्र कश्यप हुए। कश्यप के विवस्वान् और विवस्वान् के वैवस्वत मनु हुए। वैवस्वत मनु के समय जल प्रलय हुआ था। वैवस्वतमनु के दस पुत्रों में से एक का नाम इक्ष्वाकु था। इक्ष्वाकु ने अयोध्या को अपनी राजधानी बनाया और इस प्रकार इक्ष्वाकु कुल की स्थापना की।
- इक्ष्वाकु के पुत्र कुक्षि हुए। कुक्षि के पुत्र का नाम विकुक्षि था। विकुक्षि के पुत्र बाण और बाण के पुत्र अनरण्य हुए। अनरण्य से पृथु और पृथु और पृथु से त्रिशंकु का जन्म हुआ। त्रिशंकु के पुत्र धुंधुमार हुए। धुन्धुमार के पुत्र का नाम युवनाश्व था। युवनाश्व के पुत्र मान्धाता हुए और मान्धाता से सुसन्धि का जन्म हुआ। सुसन्धि के दो पुत्र हुए- ध्रुवसन्धि एवं प्रसेनजित। ध्रुवसन्धि के पुत्र भरत हुए।
- भरत के पुत्र असित हुए और असित के पुत्र सगर हुए। सगर अयोध्या के बहुत प्रतापी राजा थे। सगर के पुत्र का नाम असमंज था। असमंज के पुत्र अंशुमान तथा अंशुमान के पुत्र दिलीप हुए। दिलीप के पुत्र भगीरथ हुए। भगीरथ ने ही गंगा को पृथ्वी पर उतार था। भगीरथ के पुत्र ककुत्स्थ और ककुत्स्थ के पुत्र रघु हुए। रघु के अत्यंत तेजस्वी और पराक्रमी नरेश होने के कारण उनके बाद इस वंश का नाम रघुवंश हो गया। तब राम के कुल को रघुकुल भी कहा जाता है।
- रघु के पुत्र प्रवृद्ध हुए। प्रवृद्ध के पुत्र शंखण और शंखण के पुत्र सुदर्शन हुए। सुदर्शन के पुत्र का नाम अग्निवर्ण था। अग्निवर्ण के पुत्र शीघ्रग और शीघ्रग के पुत्र मरु हुए। मरु के पुत्र प्रशुश्रुक और प्रशुश्रुक के पुत्र अम्बरीष हुए। अम्बरीष के पुत्र का नाम नहुष था। नहुष के पुत्र ययाति और ययाति के पुत्र नाभाग हुए। नाभाग के पुत्र का नाम अज था। अज के पुत्र दशरथ हुए और दशरथ के ये चार पुत्र राम, भरत, लक्ष्मण तथा शत्रुघ्न हैं। वाल्मीकि रामायण- ॥1-59 से 72।।
नोट : कुश की निम्नलिखित वंशावली भी मिलती है जिसकी हम पुष्टि नहीं करते हैं, क्योंकि अलग अलग ग्रंथों में यह अलग अलग मिलती है। कारण यह कि कुश से राजा सवाई भवानी सिंह के बीच जिन राजाओं का उल्लेख मिलता है उनके भाई भी थे जिनके अन्य वंश चले हैं इस तरह संपूर्ण देश में राम के वंश का एक ऐसे नेटवर्क फैला है जिसकी संपूर्ण वंशावली को यहां देना असंभव है।
कुश की एक यह वंशावली मिलती है:-
राम के जुड़वा पुत्र लव और कुश हुए। कुश के अतिथि हुए, अतिधि के निषध हुए, निषध के नल हुए, नल के नभस, नभस के पुण्डरीक, पुण्डरीक के क्षेमधन्वा, क्षेमधन्वा के देवानीक, देवानीक के अहीनगर, अहीनर के रुरु, रुरु के पारियात्र, पारियात्रा के दल, दल के छल (शल), शल के उक्थ, उक्थ के वज्रनाभ, वज्रनाभ के शंखनाभ, शंखनाभ के व्यथिताश्व, व्यथिताश्व से विश्वसह, विश्वसह से हिरण्यनाभ, हिरण्यनाभ से पुष्य, पुष्य से ध्रुवसन्धि, ध्रुवसन्धि से सुदर्शन, सुदर्शन से अग्निवर्णा, अग्निवर्णा से शीघ्र, शीघ्र से मुरु, मरु से प्रसुश्रुत, प्रसुश्रुत से सुगवि, सुगवि से अमर्ष, अमर्ष से महास्वन, महास्वन से बृहदबल, बृहदबल से बृहत्क्षण (अभिमन्यु द्वारा मारा गया था), वृहत्क्षण से गुरुक्षेप, गुरक्षेप से वत्स, वत्स से वत्सव्यूह, वत्सव्यूह से प्रतिव्योम, प्रतिव्योम से दिवाकर, दिवाकर से सहदेव, सहदेव से बृहदश्व, वृहदश्व से भानुरथ, भानुरथ से सुप्रतीक, सुप्रतीक से मरुदेव, मरुदेव से सुनक्षत्र, सुनक्षत्र से किन्नर, किन्नर से अंतरिक्ष, अंतरिक्ष से सुवर्ण, सुवर्ण से अमित्रजित्, अमित्रजित् से वृहद्राज, वृहद्राज से धर्मी, धर्मी से कृतन्जय, कृतन्जय से रणन्जय, रणन्जय से संजय, संजय से शुद्धोदन, शुद्धोदन से शाक्य, शाक्य (गौतम बुद्ध) से राहुल, राहुल से प्रसेनजित, प्रसेनजित् से क्षुद्रक, क्षुद्रक से कुंडक, कुंडक से सुरथ, सुरथ से सुमित्र, सुमित्र के भाई कुरुम से कुरुम से कच्छ, कच्छ से बुधसेन।
बुधसेन से क्रमश: धर्मसेन, भजसेन, लोकसेन, लक्ष्मीसेन, रजसेन, रविसेन, करमसेन, कीर्तिसेन, महासेन, धर्मसेन, अमरसेन, अजसेन, अमृतसेन, इंद्रसेन, रजसेन, बिजयमई, स्योमई, देवमई, रिधिमई, रेवमई, सिद्धिमई, त्रिशंकुमई, श्याममई, महीमई, धर्ममई, कर्ममई, राममई, सूरतमई, शीशमई, सुरमई, शंकरमई, किशनमई, जसमई, गोतम, नल, ढोली, लछमनराम, राजाभाण, वजधाम (वज्रदानम), मधुब्रह्म, मंगलराम, क्रिमराम, मूलदेव, अनंगपाल, श्रीपाल (सूर्यपाल), सावन्तपाल, भीमपाल, गंगपाल, महंतपाल, महेंद्रपाल, राजपाल, पद्मपाल, आनन्दपाल, वंशपाल, विजयपाल, कामपाल, दीर्घपाल (ब्रह्मापल), विशनपाल, धुंधपाल, किशनपाल, निहंगपाल, भीमपाल, अजयपाल, स्वपाल (अश्वपाल), श्यामपाल, अंगपाल, पुहूपपाल, वसन्तपाल, हस्तिपाल, कामपाल, चंद्रपाल, गोविन्दपाल, उदयपाल, चंगपाल, रंगपाल, पुष्पपाल, हरिपाल, अमरपाल, छत्रपाल, महीपाल, धोरपाल, मुंगवपाल, पद्मपाल, रुद्रपाल, विशनपाल, विनयपाल, अच्छपाल (अक्षयपाल), भैंरूपाल, सहजपा,, देवपाल, त्रिलोचनपाल (बिलोचनपाल), विरोचनपाल, रसिकपाल, श्रीपाल (सरसपाल), सुरतपाल, सगुणपाल, अतिपाल, गजपाल (जनपाल), जोगेद्रपाल, भौजपाल (मजुपाल), रतनपाल, श्यामपा,, हरिचंदपाल, किशनपाल, बीरचन्दपाल, तिलोकपाल, धनपाल, मुनिकपाल, नखपाल (नयपाल), प्रतापपाल, धर्मपाल, भूपाल, देशपाल (पृथ्वीपाल), परमपाल, इंद्रपाल, गिरिपाल, रेवन्तपाल, मेहपाल (महिपाल), करणपाल, सुरंगपाल (श्रंगपाल), उग्रपाल, स्योपाल (शिवपाल), मानपाल, परशुपाल (विष्णुपाल), विरचिपाल (रतनपाल), गुणपाल, किशोरपाल (बुद्धपाल), सुरपाल, गंभीरपाल, तेजपाल, सिद्धिपाल (सिंहपाल), गुणपाल, ज्ञानपाल (तक गढ़ ग्यारियर राज किया), काहिनदेव, देवानीक, इसैसिंह (तक बांस बरेली में राज फिर ढूंढाड़ में आए), सोढ़देव, दूलहराय, काकिल, हणू (आमेर के टीकै बैठ्या), जान्हड़देव, पंजबन, मलेसी, बीजलदेव, राजदेव, कील्हणदेव, कुंतल, जीणसी (बाद में जोड़े गए), उदयकरण, नरसिंह, वणबीर, उद्धरण, चंद्रसेन, पृथ्वीराज सिंह (इस बीच पूणमल, भीम, आसकरण और राजसिंह भी गद्दी पर बैठे), भारमल, भगवन्तदास, मानसिंह, जगतसिंह (कंवर), महासिंह (आमेर में राजा नहीं हुए), भावसिंह गद्दी पर बैठे, महासिंह (मिर्जा राजा), रामसिंह प्रथम, किशनसिंह (कंवर, राजा नहीं हुए), कुंअर, विशनसिंह, सवाई जयसिंह, सवाई ईश्वरसिंह, सवाई मोधोसिंह, सवाई पृथ्वीसिंह, सवाई प्रतापसिंह, सवाई जगतसिंह, सवाई जयसिंह, सवाई जयसिंह तृतीय, सवाई रामसिंह द्वितीय, सवाई माधोसिंह द्वितीय, सवाई मानसिंह द्वितीय, सवाई भवानी सिंह (वर्तमान में गद्दी पर विराजमान हैं)
अन्य तथ्य:
राजा लव से राघव राजपूतों का जन्म हुआ जिनमें बर्गुजर, जयास और सिकरवारों का वंश चला। इसकी दूसरी शाखा थी सिसोदिया राजपूत वंश की जिनमें बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) वंश के राजा हुए। कुश से कुशवाह (कछवाह) राजपूतों का वंश चला।
राम के दोनों पुत्रों में कुश का वंश आगे बढ़ा तो कुश से अतिथि और अतिथि से, निषधन से, नभ से, पुण्डरीक से, क्षेमन्धवा से, देवानीक से, अहीनक से, रुरु से, पारियात्र से, दल से, छल से, उक्थ से, वज्रनाभ से, गण से, व्युषिताश्व से, विश्वसह से, हिरण्यनाभ से, पुष्य से, ध्रुवसंधि से, सुदर्शन से, अग्रिवर्ण से, पद्मवर्ण से, शीघ्र से, मरु से, प्रयुश्रुत से, उदावसु से, नंदिवर्धन से, सकेतु से, देवरात से, बृहदुक्थ से, महावीर्य से, सुधृति से, धृष्टकेतु से, हर्यव से, मरु से, प्रतीन्धक से, कुतिरथ से, देवमीढ़ से, विबुध से, महाधृति से, कीर्तिरात से, महारोमा से, स्वर्णरोमा से और ह्रस्वरोमा से सीरध्वज का जन्म हुआ।
कुश वंश के राजा सीरध्वज को सीता नाम की एक पुत्री हुई। सूर्यवंश इसके आगे भी बढ़ा जिसमें कृति नामक राजा का पुत्र जनक हुआ जिसने योग मार्ग का रास्ता अपनाया था। कुश वंश से ही कुशवाह, मौर्य, सैनी, शाक्य संप्रदाय की स्थापना मानी जाती है। एक शोधानुसार लव और कुश की 50वीं पीढ़ी में शल्य हुए, जो महाभारत युद्ध में कौरवों की ओर से लड़े थे। यह इसकी गणना की जाए तो लव और कुश महाभारतकाल के 2500 वर्ष पूर्व से 3000 वर्ष पूर्व हुए थे अर्थात आज से 6,500 से 7,000 वर्ष पूर्व।
इसके अलावा शल्य के बाद बहत्क्षय, ऊरुक्षय, बत्सद्रोह, प्रतिव्योम, दिवाकर, सहदेव, ध्रुवाश्च, भानुरथ, प्रतीताश्व, सुप्रतीप, मरुदेव, सुनक्षत्र, किन्नराश्रव, अन्तरिक्ष, सुषेण, सुमित्र, बृहद्रज, धर्म, कृतज्जय, व्रात, रणज्जय, संजय, शाक्य, शुद्धोधन, सिद्धार्थ, राहुल, प्रसेनजित, क्षुद्रक, कुलक, सुरथ, सुमित्र हुए। माना जाता है कि जो लोग खुद को शाक्यवंशी कहते हैं वे भी श्रीराम के वंशज हैं।
तो यह सिद्ध हुआ कि वर्तमान में जो सिसोदिया, कुशवाह (कछवाह), मौर्य, शाक्य, बैछला (बैसला) और गैहलोत (गुहिल) आदि जो राजपूत वंश हैं वे सभी भगवान प्रभु श्रीराम के वंशज है। जयपूर राजघराने की महारानी पद्मिनी और उनके परिवार के लोग की राम के पुत्र कुश के वंशज है। महारानी पद्मिनी ने एक अंग्रेजी चैनल को दिए में कहा था कि उनके पति भवानी सिंह कुश के 309वें वंशज थे।
इस घराने के इतिहास की बात करें तो 21 अगस्त 1921 को जन्में महाराज मानसिंह ने तीन शादियां की थी। मानसिंह की पहली पत्नी मरुधर कंवर, दूसरी पत्नी का नाम किशोर कंवर था और माननसिंह ने तीसरी शादी गायत्री देवी से की थी। महाराजा मानसिंह और उनकी पहली पत्नी से जन्में पुत्र का नाम भवानी सिंह था। भवानी सिंह का विवाह राजकुमारी पद्मिनी से हुआ। लेकिन दोनों का कोई बेटा नहीं है एक बेटी है जिसका नाम दीया है और जिसका विवाह नरेंद्र सिंह के साथ हुआ है। दीया के बड़े बेटे का नाम पद्मनाभ सिंह और छोटे बेटे का नाम लक्ष्यराज सिंह है।
मुसलमान भी राम के वंशज हैं?
हालांकि ऐसे कई राजा और महाराजा हैं जिनके पूर्वज श्रीराम थे। राजस्थान में कुछ मुस्लिम समूह कुशवाह वंश से ताल्लुक रखते हैं। मुगल काल में इन सभी को धर्म परिवर्तन करना पड़ा लेकिन ये सभी आज भी खुद को प्रभु श्रीराम का वंशज ही मानते हैं।
इसी तरह मेवात में दहंगल गोत्र के लोग भगवान राम के वंशज हैं और छिरकलोत गोत्र के मुस्लिम यदुवंशी माने जाते हैं। राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, दिल्ली आदि जगहों पर ऐसे कई मुस्लिम गांव या समूह हैं जो राम के वंश से संबंध रखते हैं। डीएनए शोधाधुसार उत्तर प्रदेश के 65 प्रतिशत मुस्लिम ब्राह्मण बाकी राजपूत, कायस्थ, खत्री, वैश्य और दलित वंश से ताल्लुक रखते हैं। लखनऊ के एसजीपीजीआई के वैज्ञानिकों ने फ्लोरिडा और स्पेन के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर किए गए अनुवांशिकी शोध के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला था। 

श्री रामचरित मानस में नवधा भक्ति ,शबरी जीवात्मा और राम परब्रह्म संवाद


रामचरित मानस के सर्व श्रेष्ठ प्रसंगों में से एक है,। भगवान राम का शबरी को भक्ति के नौ सोपान(सीढ़ीयों) का उपदेश।
जंगल में रहनेवाली शबरी भील जाति की स्त्री जीवात्मा का प्रतीक है। जिसे सांसारिक माया मोह और प्रपंच से क्रमशः ऊपर उठते हुए जीवन्मुक्त परमहंस अवस्था तक पहुँचाने का मार्ग स्वयं प्रभु श्री राम अपने श्रीमुख से बता रहे हैं।
वैसे तो सभी स्वयं को प्रभु श्री राम का भक्त मानते हैं परन्तु वास्तविक रूप में भक्ति की इस कसौटी से पता चलता है कि वे किस स्तर के भक्त हैं। यदि हम सच्चे अर्थों में राम भक्त हैं तो हमें स्वयं अपना मूल्यांकन कर भक्ति के मार्ग पर अग्रसर होना चाहिए।
भक्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं माता शबरी। रामचरितमानस के अरण्यकाण्ड में बाबा तुलसी ने इस प्रसंग का बहुत ज्ञानवर्धक वरना किया,आप भी आनंद ले!
श्री रामजी कबंध नामक राक्षस को गति ( मोक्ष) देकर शबरीजी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्री रामचंद्रजी को घर में आए देखा, तब मुनि मतंगजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया॥
सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला॥
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई॥

भावार्थ:- कमल सदृश नेत्र और विशाल भुजाओं वाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किए हुए सुंदर, साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ीं॥
प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा॥
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे॥

भावार्थ:- वे प्रेम में मग्न हो गईं, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोए और फिर उन्हें सुंदर आसनों पर बैठाया॥
कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि॥

भावार्थ:- उन्होंने अत्यंत रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्री रामजी को दिए। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेम सहित खाया॥
पानि जोरि आगें भइ ठाढ़ी। प्रभुहि बिलोकि प्रीति अति बाढ़ी॥
केहि बिधि अस्तुति करौं तुम्हारी। अधम जाति मैं जड़मति भारी॥

भावार्थ:- फिर वे हाथ जोड़कर आगे खड़ी हो गईं। प्रभु को देखकर उनका प्रेम अत्यंत बढ़ गया। (उन्होंने कहा-) मैं किस प्रकार आपकी स्तुति करूँ? मैं नीच जाति की और अत्यंत मूढ़ बुद्धि हूँ॥
अधम ते अधम अधम अति नारी। तिन्ह महँ मैं मतिमंद अघारी॥
कह रघुपति सुनु भामिनि बाता। मानउँ एक भगति कर नाता॥

भावार्थ:- जो अधम से भी अधम हैं, स्त्रियाँ उनमें भी अत्यंत अधम हैं, और उनमें भी हे पापनाशन! मैं मंदबुद्धि हूँ। श्री रघुनाथजी ने कहा- हे भामिनि! मेरी बात सुन! मैं तो केवल एक भक्ति ही का संबंध मानता हूँ॥
जाति पाँति कुल धर्म बड़ाई। धन बल परिजन गुन चतुराई॥
भगति हीन नर सोहइ कैसा। बिनु जल बारिद देखिअ जैसा॥

भावार्थ:- जाति, पाँति, कुल, धर्म, बड़ाई, धन, बल, कुटुम्ब, गुण और चतुरता- इन सबके होने पर भी भक्ति से रहित मनुष्य कैसा लगता है, जैसे जलहीन बादल (शोभाहीन) दिखाई पड़ता है॥
नवधा भगति कहउँ तोहि पाहीं। सावधान सुनु धरु मन माहीं॥
प्रथम भगति संतन्ह कर संगा। दूसरि रति मम कथा प्रसंगा॥

भावार्थ:- मैं तुझसे अब अपनी नवधा भक्ति कहता हूँ। तू सावधान होकर सुन और मन में धारण कर। पहली भक्ति है संतों का सत्संग। दूसरी भक्ति है मेरे कथा प्रसंग में प्रेम॥
गुर पद पंकज सेवा तीसरि भगति अमान।
चौथि भगति मम गुन गन करइ कपट तजि गान॥

भावार्थ:- तीसरी भक्ति है अभिमानरहित होकर गुरु के चरण कमलों की सेवा और चौथी भक्ति यह है कि कपट छोड़कर मेरे गुण समूहों का गान करें॥
मंत्र जाप मम दृढ़ बिस्वासा। पंचम भजन सो बेद प्रकासा॥
छठ दम सील बिरति बहु करमा। निरत निरंतर सज्जन धरमा॥

भावार्थ:- मेरे (राम) मंत्र का जाप और मुझमें दृढ़ विश्वास- यह पाँचवीं भक्ति है, जो वेदों में प्रसिद्ध है। छठी भक्ति है इंद्रियों का निग्रह, शील (अच्छा स्वभाव या चरित्र), बहुत कार्यों से वैराग्य और निरंतर संत पुरुषों के धर्म (आचरण) में लगे रहना॥
सातवँ सम मोहि मय जग देखा। मोतें संत अधिक करि लेखा॥
आठवँ जथालाभ संतोषा। सपनेहुँ नहिं देखइ परदोषा॥

भावार्थ:- सातवीं भक्ति है जगत्‌ भर को समभाव से मुझमें ओतप्रोत (राममय) देखना और संतों को मुझसे भी अधिक करके मानना। आठवीं भक्ति है जो कुछ मिल जाए, उसी में संतोष करना और स्वप्न में भी पराए दोषों को न देखना॥
नवम सरल सब सन छलहीना। मम भरोस हियँ हरष न दीना॥
नव महुँ एकउ जिन्ह कें होई। नारि पुरुष सचराचर कोई॥

भावार्थ:- नवीं भक्ति है सरलता और सबके साथ कपटरहित बर्ताव करना, हृदय में मेरा भरोसा रखना और किसी भी अवस्था में हर्ष और दैन्य (विषाद) का न होना। इन नवों में से जिनके एक भी होती है, वह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन कोई भी हो-॥
सोइ अतिसय प्रिय भामिनि मोरें। सकल प्रकार भगति दृढ़ तोरें॥
जोगि बृंद दुरलभ गति जोई। तो कहुँ आजु सुलभ भइ सोई॥

भावार्थ:- हे भामिनि! मुझे वही अत्यंत प्रिय है। फिर तुझ में तो सभी प्रकार की भक्ति दृढ़ है। अतएव जो गति योगियों को भी दुर्लभ है, वही आज तेरे लिए सुलभ हो गई है॥
मम दरसन फल परम अनूपा। जीव पाव निज सहज सरूपा॥
जनकसुता कइ सुधि भामिनी। जानहि कहु करिबरगामिनी॥

भावार्थ:- मेरे दर्शन का परम अनुपम फल यह है कि जीव अपने सहज स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। हे भामिनि! अब यदि तू गजगामिनी जानकी की कुछ खबर जानती हो तो बता॥
पंपा सरहि जाहु रघुराई। तहँ होइहि सुग्रीव मिताई॥
सो सब कहिहि देव रघुबीरा। जानतहूँ पूछहु मतिधीरा॥

भावार्थ:- (शबरी ने कहा-) हे रघुनाथजी! आप पंपा नामक सरोवर को जाइए। वहाँ आपकी सुग्रीव से मित्रता होगी। हे देव! हे रघुवीर! वह सब हाल बतावेगा। हे धीरबुद्धि! आप सब जानते हुए भी मुझसे पूछते हैं!॥
बार बार प्रभु पद सिरु नाई। प्रेम सहित सब कथा सुनाई॥
भावार्थ:- बार-बार प्रभु के चरणों में सिर नवाकर, प्रेम सहित उसने सब कथा सुनाई॥
कहि कथा सकल बिलोकि हरि मुख हृदय पद पंकज धरे।
तजि जोग पावक देह परि पद लीन भइ जहँ नहिं फिरे॥
नर बिबिध कर्म अधर्म बहु मत सोकप्रद सब त्यागहू।
बिस्वास करि कह दास तुलसी राम पद अनुरागहू॥

भावार्थ:- सब कथा कहकर भगवान्‌ के मुख के दर्शन कर, उनके चरण कमलों को धारण कर लिया और योगाग्नि से देह को त्याग कर (जलाकर) वह उस दुर्लभ हरिपद में लीन हो गई, जहाँ से लौटना नहीं होता। तुलसीदासजी कहते हैं कि अनेकों प्रकार के कर्म, अधर्म और बहुत से मत- ये सब शोकप्रद हैं, हे मनुष्यों! इनका त्याग कर दो और विश्वास करके श्री रामजी के चरणों में प्रेम करो।
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि।
महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि॥36॥

भावार्थ:- जो नीच जाति की और पापों की जन्मभूमि थी, ऐसी स्त्री को भी जिन्होंने मुक्त कर दिया, अरे महादुर्बुद्धि मन! तू ऐसे प्रभु को भूलकर सुख चाहता है?॥
जब हम प्रभु की लीला कथाओं का श्रवण, मनन, चिंतन करते हैं। तो हमारा अज्ञान धीरे धीरे नष्ट होने लगता है। तभी हमें ईश्वर की , सत्य की अनुभूति होती है। और प्रभु चरणों में प्रेम दिनानुदिन बढ़ता जाता हैं।

माता शबरी के माध्यम से पुरुषोत्तम श्रीराम का विश्व को सन्देश


माता शबरी बोली- यदि रावण का अंत नहीं करना होता तो राम तुम यहाँ कहाँ से आते?"

राम गंभीर हुए। कहा, "भ्रम में न पड़ो अम्मा! राम क्या रावण का वध करने आया है? छी... अरे रावण का वध तो लक्ष्मण अपने पैर से वाण चला भी कर सकता है। राम हजारों कोस चल कर इस गहन वन में आया है तो केवल तुमसे मिलने आया है अम्मा, ताकि हजारों वर्षों बाद जब कोई पाखण्डी भारत के अस्तित्व पर प्रश्न खड़ा करे तो इतिहास चिल्ला कर उत्तर दे कि इस राष्ट्र को क्षत्रिय राम और उसकी भीलनी माँ ने मिल कर गढ़ा था !जब कोई कपटी भारत की परम्पराओं पर उँगली उठाये तो तो काल उसका गला पकड़ कर कहे कि नहीं ! यह एकमात्र ऐसी सभ्यता है जहाँ एक राजपुत्र वन में प्रतीक्षा करती एक दरिद्र वनवासिनी से भेंट करने के लिए चौदह वर्ष का वनवास स्वीकार करता है। राम वन में बस इसलिए आया है ताकि जब युगों का इतिहास लिखा जाय तो उसमें अंकित हो कि सत्ता जब पैदल चल कर समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुँचे तभी वह रामराज्य है। राम वन में इसलिए आया है ताकि भविष्य स्मरण रखे कि प्रतिक्षाएँ अवश्य पूरी होती हैं !!!
सबरी एकटक राम को निहारती रहीं। राम ने फिर कहा- " राम की वन यात्रा रावण युद्ध के लिए नहीं है माता! राम की यात्रा प्रारंभ हुई है भविष्य के लिए आदर्श की स्थापना के लिए। राम आया है ताकि भारत को बता सके कि अन्याय का अंत करना ही धर्म है l राम आया है ताकि युगों को सीख दे सके कि विदेश में बैठे शत्रु की समाप्ति के लिए आवश्यक है कि पहले देश में बैठी उसकी समर्थक सूर्पणखाओं की नाक काटी जाय, और खर-दूषणो का घमंड तोड़ा जाय। और राम आया है ताकि युगों को बता सके कि रावणों से युद्ध केवल राम की शक्ति से नहीं बल्कि वन में बैठी सबरी के आशीर्वाद से जीते जाते हैं।"
सबरी की आँखों में जल भर आया था। उसने बात बदलकर कहा- कन्द खाओगे राम?
राम मुस्कुराए, "बिना खाये जाऊंगा भी नहीं अम्मा..."
सबरी अपनी कुटिया से झपोली में कन्द ले कर आई और राम के समक्ष रख दिया। राम और लक्ष्मण खाने लगे तो कहा- मीठे हैं न प्रभु?
यहाँ आ कर मीठे और खट्टे का भेद भूल गया हूँ अम्मा! बस इतना समझ रहा हूँ कि यही अमृत है...
सबरी मुस्कुराईं, बोलीं- "सचमुच तुम मर्यादा पुरुषोत्तम हो राम! गुरुदेव ने ठीक कहा था..."

रामायण धारावाहिक : सबसे मुश्किल काम था, काकभुशंडी और शिशु राम के दृश्य फिल्माना


जब टीवी पर रामानन्द सागर निर्मित रामायण के प्रसारण के दौरान गलियों और सडकों पर होने सन्नाटे के पीछे क्या स्वयं पुरुषोत्तम श्रीराम का आशीर्वाद था। निर्माता-निर्देशक रामानन्द सागर ने जिस लगन और भक्ति भावना से इसे प्रस्तुत किये जाने का परिणाम था। निस्संदेह सागर के प्रयासों को देख, आभास होता है शायद पुरुषोत्तम श्रीराम स्वयं रामानन्द के शरीर में विराजमान होकर अनेकों कठिनाइयों को दूर कर रहे थे। 
मालूम हो कि जब भगवान शिव मां पार्वती को भगवान राम की कथा सुना रहे थे तो कागभुसुंडि जी चुपके से पीछे बैठकर सुन रहे थे। उन्हीं की वजह से ये कथा  धरती पर आई। उन्होंने इस कथा को पंछियों की महासभा में इसे सुनाया और इस तरह आगे बढ़ते-बढ़ते ये संत तुलसीदास तक पहुंच गई। 
रामायण में एक छोटा सा सीक्वेंस है कि एक बार दशरथ के महल में छोटा सा बालक जो कि विष्णु अवतार भगवान श्रीराम थे, वो बालक रोटी खाता हुआ रो रहा था और मां को पुकार रहा था। कागभुसुंडि जी ने जब देखा तो सोचा कि ये छोटा सा बालक भगवान हो सकता है जो अपनी रोटी नहीं बचा सकता? उन्हें लगा कि ये जरूर कोई ढोंगी है। मैं जाकर इसकी परीक्षा लेता हूँ।  कागभुसुंडि ने जाकर उस बालक की रोटी छीन ली। प्रेम सागर ने एक इंटरव्यू में बताया कि उनके पिता रामानंद सागर ने ये किस्सा सोच तो लिया लेकिन इसे शूट कैसे करना है ये उन्हें समझ नहीं आ रहा था। वो उस वक्त उमरगांव में शूटिंग कर रहे थे। जगह थी वृंदावन स्टूडियोइस जगह पर बहुत पेड़ थे और शाम को सूरज डूबते ही सारे कौवे चिल्लाने लगते थे 
रामायण धारावाहिक की शुटिंग के समय निर्देशक रामानंद सागर के लिये सबसे मुश्किल काम था, काकभुशंडी और शिशु राम के दृश्य फिल्माना। दोनो ही निर्देशक के आदेश का तो पालन करने से रहे।

यूनिट के सौ से अधिक सदस्यो और स्टूडियो के लोग कौए को पकड़ने में घंटों लगे रहे। पूरे दिन की कड़ी मेहनत के बाद वे चार कौओं को जाल में फँसाने में सफल हो गए। चारों को चेन से बाँध दिया गया, ताकि वे अगले दिन की शूट से पहले रात में उड़ न जाएँ। सुबह तक केवल एक ही बचा था और वह भी अल्युमीनियम की चेन को अपनी पैनी चोंच से काटकर उड़ जाने के लिए संघर्ष कर रहा था।
अगले दिन शॉट तैयार था। कमरे के बीच शिशु श्रीराम और उनके पास ही चेन से बँधा कौआ था। लाइट्स ऑन हो गई थीं। रामानंद सागर शांति से प्रार्थना कर रहे थे, जबकि कौआ छूटने के लिए हो-हल्ला कर रहा था। वे उस भयभीत कौए के पास गए और काकभुशुंडी के समक्ष हाथ जोड़ दिए,और फिर आत्मा से याचना की “काकभुशुंडीजी, रविवार को इस एपिसोड का प्रसारण होना है, मैं आपकी शरण में आया हूँ, कृपया मेरी सहायता कीजिए।" निस्तब्ध सन्नाटा छा गया, चंचल कौआ एकदम शांत हो गया ऐसा प्रतीत होता था, जैसे कि काकभुशुंडी स्वयं पृथ्वी पर उस बंधक कौए के शरीर में आ गए हों।
रामानंद सागर ने जोर से कहा, 'कैमरा' 'रोलिंग', कौए की चेन खोल दी गई और 10 मिनट तक कैमरा चालू रहा। रामानंद सागर निर्देश देते रहे, “काकभुशुंडीजी, शिशु राम के पास जाओ और रोटी छीन लो।” कौए ने निर्देशों का अक्षरश: पालन किया, काकभुशंडीजी ने रोटी छीनी और रोते हुए शिशु को वापस कर दी, उसे संशय से देखा, उसने प्रत्येक प्रतिक्रिया दर्शायी और दस मिनट के चित्रांकन के पश्चात् उड़ गया।
निस्संदेह वे काकभुशुंडी (कागराज) ही थे, जो रामानंद सागर का मिशन पूरा करने के लिए पृथ्वी पर उस कौए के शरीर में आए थे।
किताब रामानंद सागर के जीवन की अकथ कथाएँ!