Showing posts with label #anti-Sanatan. Show all posts
Showing posts with label #anti-Sanatan. Show all posts

‘सनातनियों की संगत से बचो’: कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने उगला जहर, बुद्ध-बसावा-अंबेडकर का नाम लेकर हिंदुओं को तोड़ने में जुटी कांग्रेस; खरगे परिवार कर रहा सनातन पर हमलों की अगुवाई

कांग्रेस का हिन्दू चेहरा अब सबके सामने आना शुरू हो चूका है फिर भी अगर हिन्दू कांग्रेस को उनसे बड़ा कोई धूर्त मिलना मुश्किल है। हकीकत यह है कि राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा अपने दादा फिरोज खान की औलाद हिन्दू हितैषी कैसे हो सकती है। 
गाँधी परिवार की गुलाम कांग्रेस को सनातन का विरोध करना इनकी मजबूरी है। मुस्लिम तुष्टिकरण में लिप्त कांग्रेस के राज में रोज़ों में इफ्तार पार्टियों की बहार होती थी जिसका अब लगभग अकाल पड़ने कांग्रेस को परेशान किये हुए है। हिन्दू धार्मिक स्थलों को विवादित बनाने वाली कांग्रेस ही है। कितने सालों तक अयोध्या में राममन्दिर को लटकाये रखा। दशहरे पर रामलीला मंचन स्थलों पर कांग्रेस को बुलाने वालों का बहिष्कार करना चाहिए। 
कर्नाटक की राजनीति में एक ऐसा तूफान उठा है, जो देखकर लगता है कि पुरानी घावों को फिर से कुरेदा जा रहा है। कल्पना कीजिए, एक मुख्यमंत्री मंच पर खड़े होकर कहता है- “सनातनियों की संगत से बचो, आरएसएस से दूर रहो।” ये बातें सुनकर दिल दहल जाता है न?

कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने शनिवार (18 अक्टूबर 2025) को मैसूर यूनिवर्सिटी के एक कार्यक्रम में यही कहा। उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि समाज के भले के लिए काम करने वालों के साथ रहो, न कि उन सनातनियों के साथ जो बदलाव का विरोध करते हैं।

ये सुनकर तो लगता है जैसे सनातन धर्म को ही दुश्मन बना दिया गया हो। लेकिन रुकिए, ये कोई अचानक की बात नहीं है। ये कांग्रेस पार्टी की पुरानी रणनीति का हिस्सा है – बसावा, बुद्ध और अंबेडकर जैसे महान व्यक्तियों के नामों की आड़ में सनातन हिंदू को निशाना बनाना।

हिंदू समाज को बाँटने की कोशिश में जुटी कांग्रेस 

हम यहाँ बसावा, बुद्ध या अंबेडकर पर कोई हमला नहीं कर रहे और न ही उन पर उंगली उठा रहे हैं। ये तीनों ही समाज सुधार के बड़े प्रतीक हैं। बसावा ने जातिवाद के खिलाफ आवाज उठाई, बुद्ध ने करुणा और समानता का संदेश दिया और अंबेडकर ने संविधान देकर करोड़ों को अधिकार दिलाए। लेकिन आज की राजनीति में इन नामों का इस्तेमाल कुछ और हो गया है।

ये नाम अब हथियार बन गए हैं, जिनसे सनातन हिंदू को अलग-थलग करने की कोशिश हो रही है। मतलब साफ है – भारत बसावा, बुद्ध और अंबेडकर का देश बने, लेकिन सनातनियों का नहीं। ये स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म को बाहर कर रहा है।

खरगे साहब और उनके बेटे प्रियांक खरगे भी यही लाइन ले रहे हैं। वे कहते हैं कि समाज को असमानता से मुक्त करने के लिए बसावा, बुद्ध और अंबेडकर के विचारों को अपनाओ। लेकिन इसमें सनातन का नाम क्यों नहीं? क्यों लगातार सनातन को ‘रूढ़िवादी’ या ‘बदलाव विरोधी’ बताकर बदनाम किया जा रहा है? ये राजनीति का नंगा चेहरा है – इन नामों के पीछे छिपकर हिंदू समाज को बाँटना।

कर्नाटक में कांग्रेस लगातार सनातन हिंदुओं को बना रही निशाना

सिद्धारमैया का ये बयान कोई पहली बार नहीं है। अक्टूबर 2025 में मैसूर में अंबेडकर स्टडी सेंटर के 25 साल पूरे होने पर उन्होंने आरएसएस और संघ परिवार पर जमकर निशाना साधा। कहा कि संघ ने हमेशा अंबेडकर का विरोध किया, संविधान को चुनौती दी। फिर सनातनियों का नाम लेकर चेतावनी दी – “सनातनियों की संगत मत रखो, ये समाज को पीछे खींचते हैं।” उन्होंने हाल ही में चीफ जस्टिस बीआर गवई पर जूता फेंकने वाली घटना का हवाला भी दिया। कहा कि ये सनातनी कट्टरता का नतीजा है और समाज को इससे सावधान रहना चाहिए।

ये तो खुलेआम नफरत फैलाने जैसा है। सनातन को कट्टरता से जोड़ना, जबकि सनातन तो सहिष्णुता और विविधता का धर्म है। गंगा-जमुनी तहजीब यहीं से निकली है। लेकिन कांग्रेस की नजर में सनातन ही समस्या है।

बसावा, बुद्ध और अंबेडकर का नाम लेकर सनातन को बाँटने की कोशिश

अब देखिए, ये सब कैसे बसावा, बुद्ध और अंबेडकर के नामों की छत्रछाया में हो रहा है। सिद्धारमैया ने उसी स्पीच में कहा कि वे बुद्ध, बसावा और अंबेडकर से प्रेरणा लेते हैं। “विज्ञान और तर्क पर चलो, अंधविश्वास मत फैलाओ।” ये सुनने में तो अच्छा लगता है, लेकिन असल में ये सनातन की जड़ों पर प्रहार है। क्योंकि सनातन में भी तर्क और विज्ञान की जगह है – वेदों से लेकर उपनिषदों तक। लेकिन राजनीति में इन नामों का मतलब बदल गया है।

आज ये नाम एंटी-हिंदूइज्म का कोडवर्ड बन चुके हैं। बसावा का नाम लेकर लिंगायत समुदाय को हिंदू से अलग करने की कोशिश हो रही है। कुछ हफ्ते पहले ही अखिल भारतीय वीरशैव-लिंगायत महासभा ने अपील की कि कर्नाटक के जाति सर्वे में खुद को ‘वीरशैव-लिंगायत’ धर्म के तौर पर दर्ज कराओ, न कि हिंदू। ये सर्वे कांग्रेस सरकार ही करवा रही है, राहुल गाँधी के निर्देश पर।

अगर ये हो गया, तो हिंदू आबादी कम दिखेगी, जो बीजेपी का कोर वोट बैंक है। लिंगायत कर्नाटक में 17% तक हैं, लेकिन पिछले सर्वे में 11% दिखे। अब महासभा कह रही है – धर्म कॉलम में वीरशैव-लिंगायत लिखो। ये बसावा की विरासत का सम्मान लगता है, लेकिन असल में हिंदू समाज को तोड़ने का हथकंडा है।

वोटबैंक की राजनीति कर रही समाज को बर्बाद

कांग्रेस ये क्यों कर रही है? सरल जवाब – वोट बैंक। वे जानते हैं कि सनातन हिंदू को एकजुट करके निशाना बनाना मुश्किल है। इसलिए बाँटो और राज करो। बुद्ध और अंबेडकर का नाम तो पहले से ही दलित और पिछड़े वोटों को लुभाने के लिए इस्तेमाल होता रहा है। बुद्ध को विष्णु का अवतार मानने वाले हिंदू समाज को ही ‘रूढ़िवादी’ बता दो, तो बौद्ध विचारों को अलग कर लो। अंबेडकर को संविधान का पिता बताकर आरएसएस को दुश्मन ठहराओ।
और बसावा? ये नया एंगल है कर्नाटक में। लिंगायतों को अलग धर्म मान्यता दिलाकर हिंदू वोट बाँट दो। सिद्धारमैया खुद कहते हैं – “अंबेडकर जैसा दूसरा कभी नहीं होगा, लेकिन सबको उनके रास्ते पर चलना चाहिए।” लेकिन उसी स्पीच में सनातनियों को कोसना? ये दोहरा चरित्र है।

खरगे परिवार कर रहा सनातन पर हमलों की अगुवाई

अब खरगे परिवार की बात। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे भी यही लाइन चलाते हैं। वे कहते हैं – “बुद्ध, बसावा और अंबेडकर समानता के वैश्विक आइकॉन हैं।” मई 2025 में उन्होंने कहा कि अंबेडकर सिर्फ दलितों के नहीं, सबके नेता हैं। लेकिन इसमें सनातन का जिक्र क्यों शून्य? वे देश को इन तीनों का देश बनाना चाहते हैं, लेकिन सनातन को बाहर रखकर।
कर्नाटक के मंत्री और मल्लिकार्जुन के बेटे प्रियांक खरगे ने तो हद पार कर दी। 12 अक्टूबर 2025 को उन्होंने सिद्धारमैया को चिट्ठी लिखी – “सरकारी स्कूलों, कॉलेजों, पार्कों और मंदिरों में आरएसएस की शाखाओं पर बैन लगा दो।” कहा कि आरएसएस नफरत फैलाती है, बच्चों में गलत विचार डालती है। ये चिट्ठी सीएमओ ने ही पब्लिक की।
प्रियांक ने कहा – “संविधान हमें एकता और समानता के लिए विभाजनकारी ताकतों को रोकने का अधिकार देता है।” लेकिन ये कौन-सी एकता? सनातन को ‘विभाजनकारी’ बताकर? कांग्रेस ने पहले भी आरएसएस पर तीन बार बैन लगाया – गाँधी हत्या के बाद, इमरजेंसी में और बाबरी विध्वंस के बाद। लेकिन अब फिर वही पुरानी किताब?
कर्नाटक में ये राजनीति क्यों तेज हो रही है? क्योंकि 2028 के चुनाव नजदीक हैं। कांग्रेस को लगता है कि हिंदू वोट बाँटकर वे सत्ता टिका लेंगे। लिंगायत सर्वे से हिंदू संख्या घटेगी, दलित-मुस्लिम गठजोड़ मजबूत होगा। लेकिन ये समाज को कितना नुकसान पहुँचाएगा? हिंदू समाज सदियों से एकजुट रहा है – रामायण से लेकर महाभारत तक। सनातन ने बुद्ध को अपनाया, अंबेडकर को सम्मान दिया। लेकिन अब इन नामों की राजनीति से समाज टूट रहा है। युवा कन्फ्यूज हो रहे हैं – क्या सनातन बुरा है? क्या आरएसएस दुश्मन है?
देखिए, सिद्धारमैया ने उसी कार्यक्रम में शिक्षा को बराबरी का हथियार बताया। कहा – “शिक्षा किसी का पैतृक संपत्ति नहीं, अवसर दो तो कोई भी विद्वान बन सकता है।” ये सही है। लेकिन फिर सनातन को ‘अंधविश्वास’ क्यों कहें? सनातन में भी ज्ञान की परंपरा है – आर्यभट्ट से लेकर चंद्रगुप्त तक। ये दोहरा मापदंड क्यों?
साफ है कि ये सब कुछ सियासत का काला खेल है। कांग्रेस दिवाली के त्योहार के आसपास बसावा, बुद्ध, अंबेडकर के नाम से सनातन को निशाना बना रही है। लेकिन हिंदू समाज जागेगा। हमें इन नामों का सम्मान करना है, और राजनीति के जाल में नहीं फँसना। सनातन सहिष्णुता सिखाता है – सबको अपनाओ, किसी को न ठुकराओ। कर्नाटक से ये संदेश पूरे देश को जाना चाहिए। वरना ये बँटवारा और गहरा हो जाएगा। ऐसे में जरूरत है कि हम सभी सनातनी एकजुट रहें, इन विभाजनकारी शक्तियों को अपने मकसद में सफल न होने दें

केरल : Pinarayi Vijayan के राज में आरएसएस-भाजपा कार्यकर्ताओं की बर्बर हत्या का दौर जारी, सनातन विरोधी राजनीतिक षड्यंत्र


एक तरफ जहाँ RSS अपनी स्थापना के 100 साल मना रहा है, लेकिन इन वर्षों में केरल राज्य में RSS-BJP कार्यकर्ताओं पर हत्याओं का दौर नहीं थम रहा। जबकि प्राप्त जानकारी के अनुसार संघ ने अन्य राज्यों के मुकाबले केरल में बहुत काम किया है उसके बावजूद जनता का समर्थन नहीं मिलना चिंता की बात है। अगर यही स्थिति बीजेपी शासित राज्यों में हो रही होती सारा विपक्ष विधवा विलाप करता नज़र आ रहा होता। क्या केरल की जनता वामपंथियों के दबाव में रहती है? शायद यही वजह है कि बीजेपी कहीं मुकाबले में नज़र नहीं आती, जबकि जिन राज्यों में संघ ने काम किया है बीजेपी ने अपने विरोधियों को टक्कर दी है। केरल की जनता कब संघ के कार्यों की कदरदान होकर वामपंथियों को नाकों चबाने को मजबूर करेगी?      

बीते कई दशकों से वामपंथियों का गढ़ रहे केरल में राजनीति का आधार ही नफरत की बुनियाद पर टिका है। केरल में आए दिन बीजेपी-आरएसएस कार्यकर्ताओं पर राजनीतिक दुश्मनी के चलते अत्याचार किए जा रहे हैं। यहां तक कि लेफ्ट लिबरल गैंग द्वारा उन्हें मौत का घाट भी उतारा जा रहा है। लेकिन पी.विजयन की वामपंथी सरकार मौन होकर सारा तमाशा देख रही है। बल्कि अगर यह कहा जाए कि वह हत्यारों को प्रोत्साहित कर रही है, तो कोई अतिश्योक्ति ना होगी। वामपंथियों की इस ‘हेट थ्योरी‘ के तहत माताओं-बहनों और मासूम बच्चों तक को नहीं बख्शा जा रहा है। इतना ही नहीं हर साल लगभग 2-3 हजार लड़कियों को जबरन इस्लाम कुबूल करवाया जा रहा है। इस तरह ऐसी लड़कियों की संख्या हजारों में पहुंच गई है। बर्बर हिंसा और धर्मांतरण के बावजूद राज्य मानवाधिकार आयोग, ओबीसी आयोग एससी-एसटी आयोग, न्यायालय अब तक चुप क्यों है? आखिर हेट थ्योरी की बुनियाद पर खड़ी केरल की राजनीतिक विरासत को इसकी सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए?

लव जिहाद में फंसाकर 32 हजार लड़कियों को इस्लाम में धकेला गया

सुरक्षा एजेंसी की एक जांच के अनुसार, 2009 से केरल और मैंगलोर की लगभग 32,000 हिंदू और ईसाई समुदायों की लड़कियों को लव जिहाद में फंसाया गया और फिर इस्लाम में परिवर्तित किया गया। पहले इन्हें लव जिहाद के ट्रैप में फंसाया गया, उसके बाद धर्मांतरण कर मुसलमान बना दिया गया। ये लड़कियां नर्स बनकर अपना जीवन सुखमय बिताना चाहती थीं लेकिन अब वह आतंकवादी बना दी गई हैं। वर्ष 2021 में सिट्टी मीडिया के साथ एक साक्षात्कार में ‘द केरल स्टोरी’ फिल्म के निर्देशक सुदीप्तो सेन ने कहा था कि केरल से 32,000 लड़कियों के गायब होने के ये आंकड़े उनके नहीं हैं। वह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री ओमन चांडी के साथ अपनी बातचीत के आधार पर केरल में हिंदू और ईसाई लड़कियों के 32,000 जबरन धर्मांतरण की संख्या तक पहुंचे। सेन के अनुसार, ओमन चांडी ने कहा था कि “हर साल लगभग 2,800 से 3,200 लड़कियों को जबरन इस्लाम कुबूल करवाया जा रहा है। इस तरह 10 साल में ये संख्या 32,000 तक पहुंच गई।
भाजपा और आरएसएस के कार्यकर्ताओं को बनाया जा रहा निशाना
बड़ा सवाल यह है कि क्या आरएसएस कार्यकर्ताओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया जाना किसी बड़े षड्यंत्र का हिस्सा है? बीजेपी-आरएसएस पर फासीवाद, हिटलरशाही, साम्प्रदायिक से लेकर असहिष्णुता तक के आरोप लगाने वाली लेफ्ट लिबरल गैंग, वामपंथी औप पीएफआई का इन हत्याओं पर मौन संघ के प्रति हिंसक हमलों का समर्थन है? क्या राष्ट्रवाद की विचारधारा के विस्तार और उसके बढ़ते प्रभाव से वामपंथी और कांग्रेसी बौखलाए हुए हैं? क्या तुष्टिकरण की राजनीति करने वाली सियासी जमात अब राष्ट्रवाद की विचारधारा को हिंसा से रोकने की कोशिश में लगी है? क्या राष्ट्रवादी अपनी बहनों को लव जिहाद के जाल में फंसते देख मौन रह सकते हैं, जिन्हें मुसलमान बनाने के बाद सीरिया, अफगानिस्तान के आतंकवादी संगठनों आईएसआईएस और हक्कानी जैसे आतंकवादी संगठनों के हवाले कर दिया है।
पिछले कुछ सालों में भाजपा और आरएसएस पर वामपंथी और अतिवादियों द्वारा ढहाए गए कहर
मंदिर के उत्सव में जाते RSS कार्यकर्ता पर हमला
केरल के कन्नूर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के एक कार्यकर्ता पर हमला करने के आरोप में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीआईएम) के दो कार्यकर्ताओं और छह अन्य के खिलाफ मामला दर्ज किया गया है। पुलिस की जानकारी के मुताबिक आरएसएस कार्यकर्ता, जिसकी पहचान शाजू के रूप में हुई है, पर एक मंदिर उत्सव में जाते समय हमला किया गया। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की धारा 189(2), 191(2), 191(3), 126(2), 118(1), 109(1), 351, 190 के तहत हत्या के प्रयास, चोट पहुँचाने, गैरकानूनी रूप से इकट्ठा होने, दंगा करने और घातक हथियार रखने सहित अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया है।
सौ सीपीएम कार्यकर्ताओं ने घेरकर किया हमला
कन्नूर ज़िले के पय्यान्नूर के पास करिवेल्लूर में छत्रपति शिवाजी के राज्याभिषेक दिवस (हिंदू साम्राज्य दिवस) समारोह के दौरान 100 से ज़्यादा सीपीएम कार्यकर्ताओं ने एक घर को घेर लिया । कार्यक्रम में आए भाजपा कार्यकर्ताओं पर हमला किया गया और दंगा भड़काने के लिए उनके वाहनों में तोड़फोड़ की गई। यह घटना 20 जून को शाम 7 बजे कुनियान में हुई। यह कार्यक्रम भाजपा मंडल समिति के सदस्य कुंदथिल बालन के घर पर आयोजित किया गया था और इसमें लगभग 20 लोग शामिल हुए थे। 100 से ज़्यादा सीपीएम कार्यकर्ताओं ने घर को घेर लिया और तीन घंटे तक धमकी भरे नारे लगाए। स्थानीय पुलिस ने हस्तक्षेप करके रात लगभग 10 बजे आरएसएस के कार्यक्रम में शामिल लोगों को बचाया।
पलक्कड़ में संघ कार्यकर्ता को घेरकर मार डाला
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता श्रीनिवासन की हत्या 16 अप्रैल 2022 को पलक्कड़ जिले में हुई थी। आरएसएस कार्यकर्ता (Palakkad Sreenivasan murder case) की हत्या मामले में 17 पीएफआई आरोपियों पर राज्य के विभिन्न हिस्सों में साम्प्रादायिक हिंसा भड़काने के भी आरोप लगे। बाद में हाईकोर्ट ने इनको बेहद सख्त शर्तों के साथ जमानत दी।
रैली के बाद शाखा मुख्य शिक्षक की हत्या कर दी
केरल के अलाप्पुझा के वायलार ग्राम पंचायत के नागमकुलंगरा में 22 वर्षीय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) शाखा मुख्य शिक्षक आर. नंदू उर्फ नंदू कृष्णा की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) के गुंडों ने हत्या कर दी थी। रिपोर्टों के अनुसार, एसडीपीआई ने केरल के अलप्पुझा जिले के वायलार क्षेत्र में एक रैली निकाली और भाजपा नेताओं के खिलाफ भड़काऊ नारे लगाए। इसके बाद दोनों समूहों के बीच झड़प हो गई। झड़प के दौरान, नंदू की हत्या कर दी गई। झड़प में छह अन्य घायल हो गए। भाजपा/आरएसएस ने 25 फरवरी को जिले भर में हड़ताल की।
भाजपा नेता रंजीत को बेरहमी से मार डाला
केरल में 2021 को भाजपा नेता रंजीत श्रीनिवासन की बेहरमी से हत्या कर दी गई थी। पीएफआई वर्कर्स ने श्रीनिवासन की पत्नी, मां और बच्चे के सामने ही उनके अलाप्पुड़ा स्थित घर में बेरहमी से मार दिया था। श्रीनिवास की जब हत्या की गई, तब वह बीजेपी के ओबीसी मोर्चा के राज्य सचिव भी थे। तीन साल बाद 2024 में केरल की एक अदालत ने बड़ा फैसला सुनाया है। PFI के 15 एक्टिविस्ट को सजा-ए- मौत की सजा दी है। पीएमआई कार्यकर्ताओं को मौत का यह सजा भाजपा नेता रंजीत श्रीनिवासन की हत्या के मामले में सुनाई गई है। रंजीत श्रीनिवासन आरएसएस से बीजेपी में आए थे और पेशे से वकील थे।
आरएसएस के मुख्य शिक्षक की बाइक को टक्कर मारी
कन्नूर के थालास्सेरी-कोट्टियूर मार्ग पर कन्नवम के पास कोमेरी में एक आरएसएस कार्यकर्ता की धारदार हथियार से हत्या कर दी गई। चित्तरिप्परम्बा निवासी और रवींद्रन के पुत्र, आरएसएस की 17वीं मील शाखा के मुख्य शिक्षक 24 वर्षीय श्यामा प्रसाद की कोमेरी स्थित बकरी फार्म के पास नकाबपोश कार में आए एक गिरोह ने हत्या कर दी। पुलिस ने बताया कि गिरोह ने बाइक चला रहे श्यामा का पीछा किया। कोमेरी में, कार ने उनकी बाइक को टक्कर मार दी और वह गिर पड़े। हमलावरों से बचने के लिए, वह सड़के किनारे एक घर में भागे, लेकिन हमलावरों ने घर के सामने ही उन्हें मार डाला।
कालेज से लौटते समय आरएसएस कार्यकर्ता की हत्या
त्रिशूर में बाइक से आईटीआई कॉलेज से लौटते समय आरएसएस कार्यकर्ता आनंदन की चार सीपीआईएम के कार्यकर्ताओं ने बेरहमी से पिटाई कर दी। इसमें आनंदन बेहद गंभीर रूप से घायल हो गए। पुलिस उसे अस्पताल ले गई, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। हमलावरों में एक की पहचान नेनमेनी के रूप में हुई। हत्या करने के बाद हमलावर फरार हो गए।
त्रिवेंद्रम में आरएसएस कार्यकर्ता को सरेआम मार डाला
केरल के त्रिवेंद्रम में एक हिस्ट्रीशीटर की अगुवाई वाले गिरोह ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक कार्यकर्ता राजेश की शनिवार की रात धारदार हथियार से हत्या कर दी। राजेश राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में कार्यवाह के पद पर था। पुलिस के मुताबिक राजेश शाखा से लौट रहा था। इस दौरान श्रीकरयम में 6 लोगों ने उसे घेर लिया। टू-व्हीलर पर सवार राजेश पर धारदार हथियार से हमले किए गए। जिसमें ई राजेश की बेरहमी से श्रीकरियम में सरेआम हत्या कर दी गई।
घर में ही चाकूओं से गोदकर कर दी हत्या
संतोष (कन्नूर) – 18 जनवरी, 2017 की रात घर में अकेला पाकर सीपीएम के गुंडों ने चाकूओं से गोदकर संतोष की हत्या कर दी। पुलिस को जानकारी मिलने पर अस्पताल ले जाया गया लेकिन अस्पताल पहुंचने से पहले संतोष की मौत हो गई।
पलक्कड़ में भाजपा कार्यकर्ता को जिंदा जलाया
सी. राधाकृष्णन (पलक्कड़) – 28 दिसंबर, 2016 को सीपीएम कार्यकर्ताओं ने कोझिकोड के पलक्कड़ में 44 वर्षीय भाजपा कार्यकर्ता सी. राधाकृष्णन को उनके ही घर में जिंदा जलाने की कोशिश हुई। उनके घर के सामने खड़ी उनकी बाइक में पहले आग लगाई। फिर घर में गैस का छिड़काव करके घर में आग लगा दी। इस आगजनी में सी राधाकृष्णन सहित दो परिजन और बुरी तरह से झुलस गए। त्रिस्सुर जुबली मिशन हॉस्पिटल में 6 जनवरी, 2017 को उपचार के दौरान सी. राधाकृष्णन की मौत हो गई।

हिन्दू नामों से चलते होटल और ढाबों का खुलासा होना शुरू; सूरत में आदिल सलीम नूरानी का चर्चित रेस्टोरेंट "कंसार थाल'; 'चेलिया मुस्लिमों द्वारा हिन्दू नामों से चलने वाले होटल, किसी हिन्दू को नौकरी पर नहीं रखते

सच परेशान हो सकता है, पराजित नहीं यानि कांवर यात्रा के रास्ते में पड़ने वाले होटलों के मालिकों को अपना नाम बताने पर हंगामा करना छद्दम सेक्युलरिस्ट्स को ही बेनकाब कर रहा है। हिन्दुओं को आंखें खोलनी होंगी कि सेकुलरिज्म के हिन्दुओं के साथ कितना बड़ा धोखा किया जा रहा है। क्या हिन्दुओं के विरुद्ध बहुत गहरा षड़यंत्र चल रहा है, जिसे चौपट करने क्या परमपिता परमेश्वर ने मोदी-योगी को भारतीय राजनीति में पदापर्ण करवाया है। हिन्दुओं को भी रेवड़ियों को त्याग कर इन छद्दम सेक्युलरिस्टों से दूरी बनानी चाहिए। एकतरफा धर्म-निपेक्षता चलाने वालों से होशियार और चौकन्ना रहना चाहिए। ये लोग कभी भी अपनी तिजोरी भरने के लिए हिन्दुओं को संकट में डाल सकते हैं। सनातन को अपमानित करने वालों को अभी संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में वोट देने से परहेज नहीं किया। हिन्दुओं को लालच त्यागना होगा।
केंद्र और राज्य सरकारों को नाम छुपाकर कोई भी व्यापार करने वालों के विरुद्ध कानून लाकर इसे घिनौना अपराध घोषित करना चाहिए। दिल्ली में जवाहर होटल, करीम होटल, नूरी मसाले आदि मुस्लिम नाम से चल रहे हैं, हिन्दू भी खूब खरीदारी करते हैं, लेकिन नाम छुपाकर हिन्दू नाम से व्यापार करना क्या अपराध नहीं।
सूरत में एक बहुत बड़ा गुजराती रेस्टोरेंट है, जिसका नाम है "कंसार थाल"!

2020 तक लोगों को यही पता था कि यह रेस्टोरेंट किसी हिंदू का है, क्योंकि प्रवेश द्वार पर बड़ी सी गणेश जी की पीतल की प्रतिमा रखी थी।
2020 में दो करोड़ के ड्रग्स के साथ आदिल सलीम नूरानी नाम का एक शांतिदूत पकड़ा गया... तब गुजरात के लोगों को पता चला कि अहमदाबाद सूरत और बड़ोदरा में जो "कंसार थाल" के नाम से जो यह बहुत प्रसिद्ध गुजराती रेस्टोरेंट है उसका मालिक ये आदिल सलीम नूरानी है और आप यह देखकर चौंक जाएंगे कि इसके हर रेस्टोरेंट में प्रवेश करते ही आपको गणेश जी की प्रतिमा नजर आएगी।
"कंसारा" गुजरात में हिंदुओं की एक जाति होती है जिसे शेष भारत के अलग अलग क्षेत्रों में "कसेरा" आदि उपनामों से भी जाना जाता है, जो कि पारंपरिक रूप से विभिन्न धातुओं को मिलाकर एक मिश्र धातु का निर्माण करती है जिसे "कांसा" कहते हैं, उस कांसे को हाथों से ही हथौड़े से पीट-पीटकर "थाली" या अन्य बर्तन बनाती है और उस "थाली" या कांसे के बर्तनों में भोजन करना स्वास्थ्य के लिए बहुत अच्छा माना जाता है क्योंकि शास्त्रों में भी "कंसार" अथवा "कसेरे" के द्वारा हाथों से बनाई गई मिश्र धातु "कांसे" की थाली में भोजन करना बहुत लाभप्रद बताया गया है।
"कंसार" एक तरह का पारंपरिक व्यंजन परोसने का पात्र होता है जिसे पारंपरिक रूप से सात्विक भोजन हेतु हिंदू प्रयोग में लाते हैं।
अब यह शांति धूर्त अपने रेस्टोरेंटस का नाम "कसाई थाल"या "हलाल थाल" इत्यादि न रखकर सात्विक सनातनी हिन्दुओं को भरमाने व धर्म भ्रष्ट करने के लिए अब हिंदुओं के नाम पर, हिंदू प्रतीक चिन्हों द्वारा बरगला कर हिंदू खान पान की सुचिता को भंग करने की भावना से अंधेरे में रखते हुए हिंदुओं से ही पैसा कमा रहे हैं।
लेकिन आश्चर्य इस बात का है कि यह शांति धूर्त वैसे तो मूर्ति पूजा के विरूद्ध होते हैं,
लेकिन जब धंधे की बात आती हो या हिंदुओं को धोखा देने की बात आती हो, तब यह अल तकिया अपनाकर एक छद्म आवरण पहन लेते हैं ताकि हिंदू इनके रेस्टोरेंट में खाना खाने धोखे से आ जाएं ...!!
और धोखा खाते भी है … अपनी पहचान को छुपाकर कोई काम वही करता है जो कुछ अपराध करना चाहता है ..या लोगों को ठगना भ्रमित करना ….
यह अपराध की श्रेणी में होना चाहिए
"चेलिया मुस्लिम" द्वारा हिन्दू नामों से चलने वाले होटल 

आपको राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात के हाइवे पर तमाम ऐसे होटल मिलेंगे जिनका नाम भाग्योदय, तुलसी, बनास, डिनरवेल, अरुणोदय, आदि हिन्दू नाम वाला होगा | और राज्य में भी होगे चैन बहुत गहरी हैं  इन होटलों की चेन जिसमे हजारो होटल है उन्हें गुजरात के बनासकांठा के रहने वाले "चेलिया मुस्लिम" चलाते है ।

.इन होटलों में एक भी हिन्दू को नौकरी नही दी जाती..और इन के रखरखाव से भी पता नहीं लगता कि इनका संचालन किसी मुस्लिम द्वारा किया जा रहा है। चेलिया ग्रुप ऑफ़ होटल्स का हेड ऑफिस अहमदाबाद में है । इनका पूरा खरीद सेंट्रलाइज्ड होता है। ये डाइरेक्ट कोल्डड्रिंक, नमकीन आदि बनाने वाली कम्पनीज के साथ बल्क में डील करते है,.. फिर उसे हर एक होटल में सप्लाई करते है। जहाँ तक सम्भव हो ये खरीदारी मुस्लिम से ही करते है। इनके होटल्स में इनवर्टर, बैटरी, आरओ आदि सप्लाई करने वाला भी मुस्लिम ही होता है। चूँकि ये अपने होटलों का नाम हिन्दू नाम जैसा रखते है और "ओनली वेज" लिखते है। और इनके होटल साफ सुथरे दिखते है .. इसलिए हिन्दू इनके होटलों के तरफ आकर्षित होते है। इनका ये मानना है की हिन्दुओ से पैसा निकालो और उसे मुस्लिमो के बीच लाओ।

इनका पूरा बिजनस फ्रेंचाइजी माडल पर आधारित होता है। इनकी एक सहकारी कमेटी है जो अल्पसंख्यक आयोग में अल्पसंख्यक कमेटी के रूप में रजिस्टर्ड है .. इस कमेटी में देश विदेश के लाखो चेलिया मुस्लिम मेम्बर है और सब अपना अपना योगदान देते है। फिर ये हाइवे पर कोई अच्छा जगह देखकर उसे काफी ऊँची कीमत देकर खरीद लेते है। फिर उस होटल का एक खरीदी बिक्री का एकाउंट बनाते है.. और उस होटल को किसी चेलिया मुस्लिम को चलाने के लिए सौप देते है।

पुरे विश्व के चेलिया मुस्लिम सिर्फ मुहर्रम में अपने गाँव में इकठ्ठे होते है। फिर हर एक होटल के लाभ हानि का हिसाब करते है। इसलिए मुहर्रम के दौरान करीब 20 दिनों तक गुजरात, महाराष्ट्र, राजस्थान के हाइवे पर के 90% होटल्स बंद रहते है।

ये बसों के स्टाफ को मुफ्त खाना और बेहद महंगे गिफ्ट देते है ताकि ड्राइवर इनके ही होटल पर बस रोके। और सवारियों से खाने का मोटा पैसा वसूलते हैं। 

.अहमदाबाद के सरखेज में इनका बहुत बड़ा सेंट्रलाइज्ड परचेज डिपो है। खुद का आलू प्याज आदि रखने के लिए कोल्ड स्टोरेज है। ये सीजन पर सीधे किसानो से बेहद सस्ते दाम पर आलू, प्याज और अदरक आदि खरीद लेते है।

."इकोनोमिक्स टाइम्स अहमदाबाद" में छपे एक रिपोर्ट में इस चेलिया होटल्स की कुल पूंजी इस समय करीब 3000 करोड़ रूपये पहुंच चुकी है। और इनकी कुल परिसम्पत्तियों की कीमत इस समय 10,000 करोड़ रूपये होगी।

.हिन्दुओ के जेब से पैसा निकालकर उसे मुसलमानों में बांटने का ये चेलिया ग्रुप्स ऑफ़ होटल्स बेहद खतरनाक मोडल है।

.दुःख इस बात का है की अभी तक हिन्दू चेलिया मुस्लिमो के इस गंदे खेल को नही समझ सके और इनके होटलों में खाना खाकर इन्हें आर्थिक रूप से मजबूत करते है...या समझिए किसी का ध्यान ही नहीं गया था। और फिर इनका ये पैसा आतंकियों को जाता है। गजवा ऐ हिंद के लिए जाता है‌। इससे बड़ा खतरनाक ये है की इन की मार्केट इतनी मजबूत बन चुकी है। ये किसी हिन्दू के होटल को चलने ही नही देते।

भाजपा सनातन को अपमानित करने वालों पर क्यों नहीं कानूनी कार्यवाही करती? क्यों नहीं BPLमें फ्री का राशन लेने वालों का आर्थिक सर्वे किया जाता? 'सर तन से जुदा' गैंग पर कब प्रहार होगा?

रमाकांत साहू 

भाजपा को यह बात समझनी होगी कि अल्पसंख्यकों के कल्याण के लिए चाहे जितना भी योजनाएं बना ले परंतु यह कभी भाजपा को वोट देते हैं और देने वाले नहीं है। जबकि कांग्रेस और विपक्षी दल की सरकार अपना वोट बैंक पक्का करने के लिए केवल अल्पसंख्यक वर्ग लाभ पहुंचने के लिए खुलेआम योजना बनाती हैं और इनका संरक्षण करते है। परिणाम स्वरूप अल्पसंख्यकों को खुश करने के चक्कर में भाजपा अपने बहुसंख्यक  वोट बैंक की उपेक्षा कर देती है। अगर भाजपा का यही व्यवहार रहा तो आने वाले चुनाव में वह अपना बहुसंख्यक समाज का वोट बैंक भी खो देगी। 

BPL में फ्री का राशन लेने वालों के घरों पर BPL स्टीकर लगाने के साथ-साथ उनके परिवार की आर्थिक स्थिति का सर्वे किया जाता? सरकार द्वारा निश्चित सीमा से अधिक आय मिलने वालों पर क्यों नहीं कार्यवाही की जाती? ब्याज सहित उनसे वसूली की जाए। 

हैरानी की बात है कि भाजपा का अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और 
आरएसएस का मुस्लिम मंच भी जब  भाजपा को वोट नहीं देता, क्यों इस पर पैसा बर्बाद किया जा रहा है? हिन्दुओं से अधिक पार्टी का लाभ अल्पसंख्यक उठा रहा है। शीर्ष नेतृत्व को आंखें खोलनी होंगी। धरातल पर काम करना होगा। जो लगभग शून्य है। जनसंघ के समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं को दरकिनार किया जा चुका है। जबकि कांग्रेस अपने पुराने से पुराने कार्यकर्ता का पूरा ध्यान रखती है। 
दिल्ली भाजपा अधिकतर मंडल केवल मोदी-योगी पर ही निर्भर हैं। भाजपा ग्रुप में फोटो डाल शीर्ष नेतृत्व को गुमराह किया जा रहा है। लेकिन किस से शिकायत की जाए, चोर चोर मसोरे भाई। 

अब तक कन्हैया का गला रेतने वालों को क्यों जेल में रख पाला जा रहा है? क्यों नहीं सनातन विरोधियों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही की जाती? क्यों नहीं 'सर तन से जुदा' गैंग और उनके समर्थकों पर कार्यवाही की जाती? नूपुर शर्मा क्या गलत कहा था, जो उसको गुमनामी ज़िंदगी जीनी पड़ रही है? जिसके गलत वीडियो की वजह से उपद्रव हुआ वो आज़ाद घूम रहा है। क्यों नहीं उसी वक़्त प्रेस कांफ्रेंस कर एडिटेड और असली वीडियो को दिखाया गया?   

पश्चिम बंगाल का उदाहरण देखिए। वहां अल्पसंख्यक समाज का वोट एक मुश्त टीएमसी को पडता है बदले में टीएमसी सरकार, ममता बनर्जी रोहिंग्या मुसलमानों, बांग्लादेश अवैध घुसपैठियों आदि का खुलेआम संरक्षण करती है और लाभ पहुंचाती है जिसके परिणाम स्वरूप कांग्रेस और वामपंथी दल जो बंगाल में मजबूत पार्टियां समझी जाती थी उनको एक भी सीट नहीं मिली। भारतीय जनता पार्टी समस्त बहुसंख्यक समाज को विश्वास में लेने में कामयाब नहीं हुई जिससे कई जिलों में मतों का विभाजन हुआ और टीएमसी चुनाव जीत गई। चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद टीएमसी के समर्थकों ने भाजपा समर्थकों पर खुलेआम हमले किये, दरिंदगी की, काफी लोगों को मौत के घाट उतार दिया फिर भी आरोपियों के खिलाफ टीएमसी सरकार ने कोई कार्यवाही नहीं की। 

भाजपा की स्थानीय बंगाल इकाई ने तो सरकार के खिलाफ फिर भी कुछ धरना प्रदर्शन किया परंतु भाजपा की केंद्र सरकार अपने समर्थकों को सुरक्षा देने  में पूर्णतया नाकाम रही जिससे कि बहुसंख्यक समाज और डर गया और ना चाहते हुए भी भाजपा के समर्थन से दूरी बना सकता है। बहुसंख्यक समाज मैं विश्वास पैदा करने के लिए भाजपा को उनकी पूर्ण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक नीतियां बनानी चाहिए जिससे कि अधिक बहुसंख्यक समाज के अधिक से अधिक वोट भाजपा के खाते में जाएं और उनका विभाजन ना हो। इस दिशा में भाजपा को अति शीघ्र निम्न कानून बनाने चाहिए।

एक देश एक कानून लागू  हो और चार शादी और 40 बच्चों पर तुरंत प्रतिबंध लगे।

अवैध बांग्लादेशी घुसपैठियों और रोहिंग्या को देश से बाहर करें।

राष्ट्रविरोधी गतिविधियो में शामिल लोगों पर कठोर कार्रवाई हो।

झूठा दुष्प्रचार करके देश की छवि बिगाड़ने वालों पर कड़ी कार्रवाई हो ।

सरकारी प्रशासनिक दफ्तरों में काम करने वालों के लिए सेना में 3 साल की सर्विस अनिवार्य हो।

मस्जिदों और मदरसों का लगातार ऑडिट हो।

जुडिशरी में प्रत्येक मुकदमे की सुनवाई करके फैसला देने के लिए एक समय सीमा तय हो।

राम मंदिर और देश के छद्दम कालनेमि बन रहे राजनीतिज्ञ

लेखक 
संपादक उगता भारत

 डॉ राकेश कुमार आर्य

श्रीरामचन्द्र जी और कृष्णा भगवान के चरित्रों का अध्ययन करने पर एक बात प्रमुखता से सामने आती है कि अपने जीवनकाल में इस दोनों को ही अनेक बार जनता ने ही अपमानित किया। लेकिन उनका अंत किस तरह हुआ, उससे हमें शिक्षा लेनी चाहिए। रावण, कंस और हिरणकश्यप अपवाद को छोड़, क्योकि इनका अंत जगत के पालनहार विष्णु के हाथों ही लिखा था। खैर, हमारे पालनहार कहते हैं संयम रखो, अब कोई सत, त्रेता या द्वापर युग नहीं, कलयुग है, इनका भी ऐसा ही अंत होगा कि इनकी भावी पीढ़ियां इनको स्वीकार नहीं करेंगी। सनातन विरोधियों का समय भी निकट आ रहा है। क्योकि इन सनातन विरोधियों को राजनीति नहीं सियासत आती है। राजनीति  और सियासत में उतना अंतर है जितना धरती और आकाश में। जिस दिन इस गूढ़ रहस्य को समझ जाएगें स्वतः आभास होगा कि क्या अनर्थ कर रहे थे। 4 अरब वर्षों पुराने सनातन का विनाश करने कितने आये और गए सनातन आज भी अमर है और रहेगा। लेकिन सनातन विरोधियों का नामोनिशान नहीं रहेगा। ध्यान रखो 'बुझता दीया हमेशा टिमटिमाता है' ठीक वही स्थिति सनातन विरोधियों, चाहे वह नेता है या इनके समर्थक, की है चाहे वह किसी धर्म या मजहब से हो। सत्य विचलित हो सकता है पराजित नहीं। 

केवल एक उदाहरण शेष अपने आप सोंचिये। याद करिए 7 नवम्बर 1966, जब गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेलते, पार्लियामेंट स्ट्रीट, नई दिल्ली लाल हो गयी थी, तब श्रद्धये कृपालु जी महाराज ने कहा था "इंदिरा जिस तरह गोपाष्टमी के दिन हम निहत्ते साधु-संतों से खून की होली खेली गयी है, तेरी भी गोपाष्ठमी के दिन मृत्यु होगी और हुआ भी वही, 31 अक्टूबर 1984 को गोपाष्ठमी थी।       

यद्यपि विदेशी इतिहासकारों और देश के भीतर बैठे गद्दार इतिहासकारों ने एक षड्यंत्र के अंतर्गत  रामचंद्र जी और श्री कृष्ण जी जैसे महापुरुषों को भारत में कल्पनिक  माना है और अपने इस  षडयंत्रपूर्ण कुचक्र को सिरे चढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास किया है कि भारत का प्राचीन गौरव किसी भी  रूप में स्थापित ना होने पाए, परंतु अब यह पूर्णतया सिद्ध हो चुका है कि श्री रामचंद्र जी महाराज और श्री कृष्ण जी महाराज जैसे  महापुरुष काल्पनिक ना होकर  हमारे इतिहास नायक और इस  देश की वैदिक संस्कृति के  महानतम नक्षत्र हैं। श्री राम का जन्म अयोध्या में हुआ था और उनके जन्मस्थान पर  कभी  एक भव्य मन्दिर विराजमान था । जिसे  1528 ई0 में मुगल आक्रमणकारी बाबर ने तोड़कर वहाँ एक मस्जिद बना दी थी । हिंदू पक्ष की दृष्टि में इस अनधिकृत ,अवैध और भारतीय इतिहास को कलंकित करने वाली मस्जिद को हटाने के लिए और वहां पर श्री रामचंद्र जी का भव्य मंदिर पुनः स्थापित करने के लिए भारत में 1528 ई0 से लेकर 1947 तक अनेक युद्ध लड़े गए और हिंदू समाज ने अनेक युद्धों में लाखों की संख्या में अपने बलिदान दिए । इसका कारण केवल यही था कि श्री रामचंद्र जी को भारत के लोग जिस श्रद्धा भाव से देखते थे उसके अनुरूप वह उन्हें उनके जन्म स्थल पर बने भव्य मंदिर में विराजमान भी देखना चाहते थे।
देश जब स्वतंत्र हुआ तो सरदार पटेल जी के सक्षम और कुशल नेतृत्व के कारण सोमनाथ के मंदिर का जीर्णोद्धार हुआ। तब यह आशा बलवती हुई थी कि सरदार पटेल की दृष्टि श्री राम जन्म भूमि की ओर भी जाएगी और वह इसका जीर्णोद्धार भी सोमनाथ मंदिर की भांति कराएंगे , परंतु सरदार पटेल को देश के एकीकरण की चिंता उस समय सबसे अधिक थी। दूसरे स्वतंत्रता के पश्चात वह अधिक देर स्वस्थ नहीं रह पाए। यही कारण रहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के लगभग ढाई वर्ष पश्चात ही उनका देहावसान भी हो गया । उसके पश्चात उनके जीवनकाल में ही हिंदू महासभा के एक कर्मठ नेता  विशारद जी ने श्री राम जन्मभूमि पर पूजा पाठ कराने की प्रार्थना के साथ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।अखिल भारत हिंदू महासभा की ओर से  प्रारंभ किए गए  इस वाद ने कालांतर में जाकर नया मोड़ लिया  और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई में इस स्थान को मुक्त करने एवं वहाँ एक नया मन्दिर बनाने के लिये एक लम्बा आन्दोलन चला। 6 दिसम्बर सन् 1992 को यह विवादित ढ़ांचा गिरा दिया गया और वहाँ श्री राम का एक अस्थायी मन्दिर निर्मित कर दिया गया।
श्री राम जन्मभूमि   का संक्षिप्त इतिहास  यहां जानना  आवश्यक होगा । अब अनेक  ऐतिहासिक प्रमाणों से यह सिद्ध हो चुका है कि 1528 में राम जन्म भूमि पर मस्जिद बनाई गई थी। हिन्दुओं के पौराणिक ग्रन्थ रामायण और रामचरित मानस के अनुसार यहां भगवान राम का जन्म हुआ था। इसके अतिरिक्त प्राचीन भारत के अन्य अनेकों ग्रंथों से भी ऐसे साक्ष्य मिलते हैं कि श्री राम जन्म भूमि ही वह स्थल है जहां दशरथ नंदन श्री राम का जन्म हुआ था ।1853 में हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच इस भूमि को लेकर पहली बार विवाद हुआ।1859 में अंग्रेजों ने विवाद को ध्यान में रखते हुए पूजा व नमाज के लिए मुसलमानों को अन्दर का हिस्सा और हिन्दुओं को बाहर का हिस्सा उपयोग में लाने को कहा। वास्तव अंग्रेजों ने उस समय कूटनीति से काम लिया था ।उन्होंने स्पष्ट यह न कहकर कि यह जन्मभूमि हिंदुओं की है और इस पर उन्हें अपनी पूजा पाठ करने का पूरा अधिकार है , इसको मुसलमानों को भी देकर यह सिद्ध करने का प्रयास किया कि वह  मुसलमानों के भी शुभचिंतक हैं। यदि अंग्रेज उसी समय इसका निस्तारण कर हिंदुओं को यह स्थान सौंप देते तो फिर उन्हें मुसलमानों को हिंदुओं के विरुद्ध प्रयोग करने की स्वतंत्रता न मिल पाती। 1949 में अन्दर के हिस्से में भगवान राम की मूर्ति रखी गई। तनाव को बढ़ता देख सरकार ने इसके गेट में ताला लगा दिया।सन् 1986 में जिला न्यायाधीश ने विवादित स्थल को हिंदुओं की पूजा के लिए खोलने का आदेश दिया।
मुस्लिम समुदाय ने इसके विरोध में बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी गठित की। यह कांग्रेस के प्रधानमंत्री राजीव गांधी के शासन काल का वह समय था , जिस समय सरकार शाहबानो प्रकरण में मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सामने झुक गई थी ।उसी समय बाबरी एक्शन कमेटी का अस्तित्व में आना यह दिखाता है कि मुसलमानों ने बाबरी एक्शन कमेटी का गठन भी इसीलिए किया था कि सरकार को देर सवेर उसी प्रकार झुका लिया जाएगा जिस प्रकार वह शाहबानो वाले प्रकरण में झुक गई थी।1989 में विश्व हिन्दू परिषद ने विवादित स्थल से सटी भूमि पर राम मंदिर के निर्माण का आन्दोलन आरंभ किया ।6 दिसम्बर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिराई गई। उस समय उत्तर प्रदेश में भाजपा की कल्याण सिंह के नेतृत्व वाली सरकार काम कर रही थी। परिणामस्वरूप देशव्यापी दंगों में करीब दो हजार लोगों की जानें गईं।
उस समय की राजनीति मंडल और कमंडल के चक्रव्यूह में फंसी हुई थी , परंतु राम मंदिर के प्रकरण ने जिस प्रकार देश की जनता को झकझोर कर रख दिया था , उससे लगता था कि भाजपा और अन्य हिंदूवादी दल श्री राम के मंदिर निर्माण के प्रति हृदय से आस्थावान हैं और यदि भविष्य में उसकी सरकार केंद्र में आती है तो वह निश्चय ही श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम का मंदिर बनाने की ऐतिहासिक पहल करेंगी ।राम जन्मभूमि पर खड़ी बाबरी मस्जिद के विध्वंस के  दस दिन बाद 16 दिसम्बर 1992 को लिब्रहान आयोग गठित किया गया। आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के सेवानिवृत मुख्य न्यायाधीश एम.एस. लिब्रहान को आयोग का अध्यक्ष बनाया गया।लिब्रहान आयोग को 16 मार्च 1993 को अर्थात तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा गया था, लेकिन आयोग ने रिपोर्ट देने में 17 वर्ष  लगाए। 30 जून 2009 को लिब्रहान आयोग ने चार भागों में 700 पन्नों की रिपोर्ट प्रधानमंत्री डॉ॰ मनमोहन सिंह और गृह मंत्री पी. चिदम्बरम को सौंपी। सरकार ने इस जांच आयोग का कार्यकाल 48 बार बढ़ाया था।
यह कहना कठिन है कि आयोग को अपने निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए वास्तव में इतने समय की आवश्यकता थी या फिर यह किसी सुनियोजित षड्यंत्र के अंतर्गत बार-बार अपनी रिपोर्ट सौंपने में असफल हो रहा था। 31 मार्च 2009 को समाप्त हुए लिब्रहान आयोग का कार्यकाल को अंतिम बार तीन महीने अर्थात् 30 जून तक के लिए बढ़ा गया।2010 में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने निर्णय सुनाया जिसमें विवादित भूमि को रामजन्मभूमि घोषित किया गया। न्यायालय ने बहुमत से निर्णय दिया कि विवादित भूमि जिसे रामजन्मभूमि माना जाता रहा है, उसे हिंदू गुटों को दे दिया जाए। न्यायालय ने यह भी कहा कि वहाँ से रामलला की प्रतिमा को नहीं हटाया जाएगा। न्यायालय ने यह भी पाया कि चूंकि सीता रसोई और राम चबूतरा आदि कुछ भागों पर निर्मोही अखाड़े का भी कब्ज़ा रहा है इसलिए यह भाग निर्मोही अखाड़े के पास ही रहेगा। दो न्यायाधीधों ने यह निर्णय भी दिया कि इस भूमि के कुछ भागों पर मुसलमान प्रार्थना करते रहे हैं इसलिए विवादित भूमि का एक तिहाई भाग मुसलमान गुटों को दे दिया जाए। लेकिन हिंदू और मुस्लिम दोनों ही पक्षों ने इस निर्णय को अस्वीकार करते हुए सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया। वास्तव में न्यायालय ने अपने निर्णय में ऐतिहासिक तथ्यों की उपेक्षा की । जिनसे यह स्पष्ट हो रहा था कि यहां पर श्री राम का भव्य मंदिर रहा है ।
इससे हिंदू पक्ष को यह कहने का अवसर मिला कि न्यायालय ने तुष्टीकरण का सहारा लेते हुए मुस्लिम पक्ष को उक्त भूमि का एक तिहाई भाग दिया है।उच्चतम न्यायालय ने 7 वर्ष पश्चात निर्णय लिया कि 11 अगस्त 2017 से तीन न्यायाधीशों की पीठ इस विवाद की सुनवाई प्रतिदिन करेगी। सुनवाई से ठीक पहले शिया वक्फ बोर्ड ने न्यायालय में याचिका लगाकर विवाद में पक्षकार होने का दावा किया और 70 वर्ष बाद 30 मार्च 1946 के ट्रायल कोर्ट के फैसले को चुनौती दी जिसमें मस्जिद को सुन्नी वक्फ बोर्ड की सम्पत्ति घोषित अर दिया गया था।अब इस प्रकरण को लेकर हम देश में राजनीति को एक बार फिर   गरमाती देख रहे हैं ।भाजपा ने प्रारंभ से ही श्री राम जन्मभूमि पर श्री राम का भव्य मंदिर बनाने को अपने चुनावी घोषणा पत्र में स्थान दिया है और भाजपा के नेताओं ने मंचों से भी जनता को यह आश्वासन और विश्वास दिलाने में कभी कमी नहीं छोड़ी  कि यदि वह सत्ता में आए तो वे राम मंदिर अवश्य बनाएंगे । श्री राम के नाम को उन्होंने राजनीति में इस प्रकार प्रयोग किया कि भारत की राजनीति राममय हो गई ।
जनता और विशेषत: देश के हिंदू मतदाताओं ने भाजपा को सत्ता इस आशा और अपेक्षा के साथ सौंपी कि आप सत्ता में बैठिये  और श्री राम मंदिर का निर्माण कीजिए । यह दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भाजपा ने जनमानस की मानसिकता को समझने में चूक की और वह जब भी सत्ता में पहुंची तो सत्ता में जाकर वह अपने वादों से भटक गई ।यही कारण रहा कि उसने राम मंदिर निर्माण के संकल्प को चुनावों तक सीमित करके देखना ही उचित समझा।अब जबकि भाजपा  की मोदी सरकार सत्ता में है तो 2014 से ही देश के लोगों को इस सरकार से यह विशेष अपेक्षा थी कि श्री मोदी के नेतृत्व वाली यह सरकार राम जन्मभूमि पर श्री राम जी का भव्य मंदिर अवश्य बनायेगी। परंतु देश के लोगों ने देखा कि इस बार भी भाजपा राम मंदिर निर्माण के विषय में कोई गंभीर और सकारात्मक कदम नहीं उठा पा रही थी ।तब देश के लोगों ने अपने असंतोष को किसी न किसी प्रकार सरकार तक पहुंचा दिया । इतना ही नहीं देश के संत भी नरेंद्र मोदी की कार्यशैली से अप्रसन्न अधिक दिखाई देने लगे। योग गुरु बाबा रामदेव जी ने भी अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते हुए सरकार पर दबाव बनाने का प्रयास किया कि वह अपने किए गए वादों को ध्यान में रखें।
अब केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने 67 एकड़ जमीन को हिंदू संगठनों को देकर राम मंदिर निर्माण की दिशा में पहला और ठोस कदम उठाने का सराहनीय कार्य किया है । विपक्षी राजनीतिक दल श्री मोदी के इस निर्णय को चुनावों के दृष्टिगत उठाया गया कदम बता कर इसकी आलोचना कर रहे हैं । उनकी आलोचना में बल हो सकता है ,परंतु उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि यदि वह श्री मोदी के और उनकी सरकार के इस कदम की आलोचना कर रहे हैं तो वह भी तो राजनीति ही कर रहे हैं । अपने राजनीतिक भविष्य को सुरक्षित रखने का जितना अधिकार विपक्षी दलों को है, उतना ही केंद्र की मोदी सरकार और उनकी भाजपा को भी है। अतः चाहे आलोचना हो रही है चाहे इस काम को आगे बढ़ाने की दिशा में कार्य हो रहा है – राजनीति तो दोनों ओर से हो रही है , परंतु राजनीति भी सही दिशा में  होने लगे तो वह भी देशहित में ही कही जाती है। अच्छा हो कि राजनीति में लगे ये लोग देश के लिए राजनीति करना सीखें। 
अब देश हित में यही उचित है कि पिछले 70 वर्ष से अधिक समय से चले आ रहे इस विवाद का निस्तारण करने में सभी दल अपनी – अपनी सहभागिता सुनिश्चित करें और सकारात्मक भूमिका निभाते हुए राष्ट्रहित में राम मंदिर का निर्माण होने दें। न्यायालयों में रोड़े अटका – अटका कर इस वाद को लंबा खींचने से अब कोई लाभ नहीं है। देश की जनता समझ चुकी है कि कौन रोड़े अटका रहा है और कौन रोड़े अटकाने वालों को और उनके रोड़ों को हटाने का काम कर रहा है ?  देश की जनता यह भी समझ रही है कि कौन सा निर्णय रोडे अटकाने वाला है और कौन सा रोड़े हटाने वाला है ? रोड़े अटकाने के इस खेल को बंद कर ‘ रोड़ों ‘ को ही श्री राम जी के मंदिर की नींव में रखकर सदा के लिए समाप्त कर देना समय की आवश्यकता है । अच्छा हो कि भारत के राजनीतिज्ञ पूर्ण सकारात्मकता से काम करते हुए देश के जनमानस को एक अच्छा संदेश दें।


कांग्रेस अध्यक्ष खरगे ने भी माना मोदी फिर बनेंगे प्रधानमंत्री, कहा 24 में बीजेपी 400 पार, वायरल वीडियो

कभी-कभी सच्चाई जिव्हा पर आ ही जाती है। पिछली लोक सभा में मुलायम सिंह ने भाजपा की जीत की भविष्यवाणी की थी, तो अब राज्य सभा में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने भाजपा को 400 पार की बात बोलना कोई हल्की बात नहीं। इसको कांग्रेस की हताशा ही कहा जा सकता है। बल्कि इस बात को दर्शा रहा है कि कांग्रेस भी अयोध्या में राम मन्दिर बनने और अन्य कामों से अपनी हार स्वीकार कर चुकी है। जबकि अन्य गैर-भाजपाई पार्टी के किसी भी अध्यक्ष ने ऐसा नहीं बोला। यानि कांग्रेस अध्यक्ष ने कांग्रेस अधिकारियों और कार्यकर्ताओं को हथियार डालने के लिए विवश करना है। दूसरे अर्थों में यह भी कहा जा सकता है कि लोक सभा चुनाव में कांग्रेस बीजेपी को हराने नहीं, सिर्फ अपने अस्तित्व को बचाने मैदान में उतरेगी। कांग्रेस अध्यक्ष ने यह भी साबित कर दिया है कि कांग्रेस अंदरखाने जरुरत से ज्यादा कमजोर है, बीजेपी के विरुद्ध इनके आरोप मात्र एक दिखावा एवं जनता को भ्रमित करने वाला है। ताकि कुछ वोट मिल सके और NOTA से वोट न मिलने पाए। 

कांग्रेस ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी स्वीकार कर लिया है कि अयोध्या से लेकर मुस्लिम महिलाओं को लेकर मुस्लिम कट्टरपंथियों के आगे घुटने टेक जनता को भ्रमित या गुमराह कर वोट लेने का नाटक अब नहीं चलने वाला, सच्चाई सामने आने लगी है। केंद्र और अन्य राज्यों में भाजपा सरकारें होने के हिन्दुओं के किसी भी धार्मिक स्थल को विवादित बनाकर सच्चाई को छुपा नहीं जा सकता। मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक से अधिक होने वाले हलाला से अधिक चिंतित थीं। जितने अधिक तलाक और हलाला का चलन भारत में है अन्य किसी मुस्लिम देश में नहीं।  

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लोकसभा चुनाव 2024 के बाद एक बार फिर से देश के प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं। इसकी भविष्यवाणी खुद कांग्रेस अध्यक्ष ने की है। सोनिया गांधी और राहुल गांधी के करीबी कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने राज्यसभा में स्वीकार किया कि बीजेपी 400 पार जा रही है। प्रधानमंत्री मोदी की मौजूदगी में खरगे ने राज्यसभा में कहा कि आपका इतना बहुमत है, पहले 300- 334 थी, अब तो 400 पार हो रहा है।

खरगे का यह बयान जल्दी ही सोशल मीडिया पर वायरल होने लगा। लोग खरगे के बयान वाले वीडियो को जमकर शेयर कर रहे हैं। आप भी देखिए लोग वीडियो शेयर कर क्या कह रहे हैं-



युग परिवर्तन का समय चल रहा है : OIC और पाकिस्तान भारत की मुस्लिम कौम को न भड़काएं

सुभाष चन्द्र

कुछ दिन पहले हुई श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पर इस्लामिक देशों के संगठन OIC ने बवाल काटने की कोशिश की है और कहा है कि “भारतीय शहर अयोध्या में जिस जगह पर पहले बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, वहीँ राम मंदिर का निर्माण और इसकी प्राण प्रतिष्ठा गंभीर चिंता का विषय है”।

जिस तरह आज मुस्लिम देशों में किसी न किसी कारण उपद्रव हो रहे हैं, क्या उसी तर्ज पर इस्लामिक देशों के संगठन और पाकिस्तान वही स्थिति भारत में कर भारतीय मुसलमानों को बलि का बकरा बनाकर उनकी लाशों पर सियासत कर अपनी तिजोरियां भरने की तैयारियां कर रहे हैं? भारत सरकार के साथ-साथ भारतीय मुसलमानों को भी इस मुद्दे पर गंभीरता से सोंचना होगा।  

इसके साथ ही पाकिस्तान के राजदूत मुनीर आलम ने 27 जनवरी को UNO को पत्र लिख कर राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा पर आपत्ति जताते हुए कहा कि “मंदिर निर्माण से भारत के मुसलमानों के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक हितों पर चोट पहुंची है जिससे इस क्षेत्र में सौहार्द और शांति भंग हो सकती है और इसलिए UNO को भारत में Islamic Heritage sites की रक्षा के लिए दखल देना चाहिए। यह कोई अकेला मामला नहीं है क्योंकि इसके अलावा ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की मस्जिद पर भी टूटने का खतरा मंडरा रहा है”।

सरकार को फरवरी 2, 2024 को मुस्लिम पर्सनल बोर्ड में कानून की किताबों को आग लगाए जाने की बात का संज्ञान लेकर सख्ती से पेश आना चाहिए, अन्यथा इनकी भड़काऊ हरकतें रुकने का नाम नहीं लेंगी और देश को दंगों की आग में झोंक कर लाशों पर मालपुए खाने बैठ जायेंगे।  

लेखक 
इसका मुख्य कारण है, भारतीयों का भारत के वास्तविक गौरवशाली इतिहास से अज्ञान होना। जब तक पाठ्य पुस्तकों से भ्रमित इतिहास को दूर नहीं किया जाएगा, जनता को भड़काया जाता रहेगा। 2024 में वापस आने पर मोदी सरकार इस अति गंभीर मुद्दे पर काम करना होगा, गलत इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों पर कार्यवाही करनी होगी। उनको मिली समस्त सरकारी सुविधाओं को वापस लेना होगा, और इसका विरोध करने वालों पर कानूनी कार्यवाही करनी होगी। दूसरे, पत्थरबाजों पर blind firing और जिस स्थान से पत्थरों के जमावड़े के सबूत मिलते ही उस जगह पर बुलडोज़र चलवाकर उस स्थान को कुछ समय अपने अधिकार में लेकर नीलम कर पुलिस और अन्य सुरक्षा बल को लगाए जाने का खर्च की भरपाई करने का कानून बनाए।  

इसके अलावा भारत के कट्टरपंथी संगठनों ने आल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख डॉ उमर अहमद इलियासी के खिलाफ उनके प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने के खिलाफ “फतवा” जारी किया है। यानी इमामों के इमाम को भी बताया जा रहा है कि उन्हें इस्लाम की जानकारी नहीं है, कुछ समय पहले इलियासी साहब ने संघ प्रमुख को “राष्ट्रपिता” कह दिया था जिस पर भागवत जी ने उन्हें रोक दिया था कि ऐसा कहना ठीक नहीं है।

इलियासी साहब को मुस्लिमों ने फतवे में कहा कि “एक मुस्लिम को किसी अन्य धर्म के मंदिर में नहीं जाना चाहिए और इन संगठनों को लगा कि इलियासी का अयोध्या जाना इस्लाम के सिद्धांतो के खिलाफ है। यानी हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का नारा एक फ्रॉड है क्योंकि यह फतवा बता रहा है कि इस्लाम में दूसरे धर्मों के लिए कोई सहिष्णुता है ही नहीं। हिंदुओं का फिर मस्जिदों और दरगाहों पर जाना भी बंद करो।

इमाम इलियासी ने फतवे पर प्रतिक्रिया देते हुए साफ़ शब्दों में कहा कि जो लोग मेरे अयोध्या जाने से मुझसे नफरत करते हैं, वो पाकिस्तान चले जाएँ, मैंने प्यार का पैगाम दिया है और न मैं माफ़ी माँगूँगा और न इस्तीफा दूंगा।

OIC और पाकिस्तान और भारतीय मुस्लिम समुदाय को एक बात समझ आनी चाहिए कि हिंदू बहुल देश होते हुए भी हिन्दू समुदाय कानूनी तौर पर मुगलों द्वारा तोड़े गए मंदिरों को वापस लेने के कोशिश कर रहा है जबकि ऐसा इस्लामिक देश में सम्भव नहीं था। 

OIC और पाकिस्तान केवल भारत की केवल एक जबरन बनी हुई मस्जिद पर बने मंदिर की बात क्यों करते हैं जबकि वे कभी चीन में वामपंथी सरकार द्वारा तोड़ी गई 1500 मस्जिदों के लिए नहीं बोलते और कभी हाल के युद्ध में गाजा में ध्वस्त हुई 200 मस्जिदों की बात नहीं करते। OIC ने कभी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अन्य इस्लामिक देशों में तोड़े गए मंदिरों, गुरुद्वारों या बौद्ध प्रतिमाओं के लिए आवाज़ नहीं उठाई।

पाकिस्तान को भारत के मुसलमानों की चिंता छोड़ अपने घर को संभालना चाहिए। अपना मुल्क लेकर भी उस समय के मुसलमानों ने क्या पा लिया जो पूरा मुल्क आज कटोरा हाथ में लिए घूम रहा है। फिर भी यदि पाकिस्तान को भारत के मुसलमानों की चिंता है तो जितने मर्जी यहां से ले जाए, अपने मुल्क में रखने की हिम्मत भी होनी चाहिए। OIC पहले अपने इस्लामिक देशों के झगड़े तो सुलझा ले जहां हर मुल्क अपने तरह का इस्लाम चला रहा है।

आज समय बदल रहा है, आज के मुस्लिम समाज का मुगलों से किसी तरह का कोई लगाव रखने का कोई औचित्य नहीं है। मुस्लिम समाज को सच्चाई से रूबरू होकर अपने को बदलना चाहिए वरना समय उसे बदल देगा।

कांग्रेस “लंकिनी” और सुप्रीम कोर्ट के जजों की ढील, भगवान राम के अपमान के लिए जिम्मेदार; हदें पार करती DMK; चंद्रचूड़ जी, कभी राम अपमान पर भी Suo Moto संज्ञान लीजिए ; सनातन विरोधिओं पर नाज़िया खान के वीडियो

सुभाष चन्द्र

अपने 26 जनवरी के लेख में मैंने बताया था कि किस तरह सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने स्वामी प्रसाद मौर्य पर आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगाते हुए भगवान राम के अपमान को खुली छूट दी थी और जस्टिस संदीप मेहता ने भगवान के अपमान को Line of Thought कह कर समर्थन दे दिया था।  

उस लेख में मैंने यह भी लिखा था कि सुप्रीम कोर्ट के जजों का ऐसा आचरण अन्य लोगों को भगवान राम, रामचरितमानस, रामायण और महाभारत के अपमान के लिए प्रेरित करेगा।  दरअसल जितने लोग भी भगवान राम या सनातन धर्म के अपमान को अपना लक्ष्य बनाए हुए हैं उसके पीछे सोनिया गांधी और कांग्रेस की ही प्रेरणा काम कर रही है क्योंकि सोनिया गांधी या “मोहब्बत की दुकान” के गल्ले पर बैठा उसका बेटा राहुल “कालनेमि” एक शब्द नहीं बोलते फिर चाहे भगवान राम का अपमान करने वाले DMK के लोग हों या NCP, राजद, जदयू या सपा के नेता हों। 

लेखक 

इसे मैं सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस संदीप मेहता की ढील का परिणाम समझता हूं जो तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन की सहयोगी और स्टालिन परिवार द्वारा चलाए जाने वाले कलैनार सेथिगल में एंकर Uma Ilakkiya ने भगवान राम के लिए अशोभनीय टिप्पणियाँ करने में सारी हदें पार कर दी। जिसका संज्ञान लेकर मुकदमा चलना चाहिए। उसने कहा -

“राम महल में हजारों महिलाओं के साथ रहते थे और शराब भी पीते थे। क्या आप उन्हें अपने बच्चों के लिए एक उदाहरण के रूप में पेश करेंगे? उनमें जीने का साहस नहीं था, इसलिए उन्होंने सरयू में छलाँग लगा कर आत्महत्या कर ली। क्या आप अपने बच्चों को उनके उदाहरण के साथ पालेंगे-पोसेंगे? ये कैसी मूर्खता है? राम ने अपनी ही पत्नी पर शक किया और उन्हें जंगल भेज दिया, क्या आप लोग इसे उदाहरण की तरह दिखाएंगे?

Uma Ilakkiya  का जहर उगलना यहीं बंद नहीं हुआ, उसने आगे कहा कि ““राम एक हत्यारा था। उन्होंने खुद को छिपाकर बाली को मार डाला और जब शम्बूक ध्यान कर रहा था तो उसने बिना कारण पूछे उसका सिर काट दिया। क्या इस तरह का व्यक्ति आपके बच्चों के लिए आदर्श है?”

भाजपा/RSS के खिलाफ विषवमन करना तो Uma Ilakkiya के लिए कोई बड़ी बात थी ही नहीं।  

यह वही DMK है जिसके मंत्री उदयनिधि स्टालिन ने सनातन धर्म को मलेरिया डेंगू और कोढ़ बता कर ख़तम करने की बात कही थी और सुप्रीम कोर्ट ने 22 सितंबर को उसे बहुत हीलाहवाली के बाद ऐसा नोटिस जारी किया था जिसका जवाब देने के लिए कोई समय सीमा तय नहीं की गई और जिसकी वजह से उसने आज तक नोटिस का जवाब नहीं दिया। 

यह वही DMK की सरकार है जिसने राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा के दिन 36 मंदिरों में पूजा पर रोक लगा दी थी और यह बात स्टालिन सरकार ने स्वयं सुप्रीम कोर्ट से कही है। 

यह वही DMK सरकार है जो RSS के पथ संचलन की अनुमति सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर देने के लिए मजबूर होती है। 

इस सन्दर्भ में श्रीमती नाज़िया इलाही खान के केवल तीन ही वीडियो जिसमें एक मुस्लिम होते हुए समस्त सनातन विरोधी और असदुद्दीन ओवैसी आदि की भड़काऊ सियासत को बेनकाब कर रही हैं:-

          

मेरा सीधा सवाल है CJI चंद्रचूड़ से है कि क्या वह हिंदू संस्कृति और सनातन के अपमान पर भी कभी Suo Moto संज्ञान लेने की हिम्मत करेंगे या हिंदुओं का अपमान सहते रहेंगे। वह मणिपुर हिंसा पर धमकी देते हैं कि सरकार कार्रवाई नहीं करेगी तो हम करेंगे और पत्रकारों को झूठी रिपोर्ट देने को भी उचित कहते हैं। यह Double Standard कब तक चलेगा। आप भगवा वस्त्र पहन कर द्वारिकाधीश मंदिर में जाते हैं और हिंदू आस्था पर कुठाराघात देखते रहते हैं, क्योंकि आपने सबरीमाला मंदिर को मलिन करने का भी अपराध किया था। 

अवलोकन करें:-

तमिलनाडु : राम शराबी थे, हजारों महिलाओं के साथ रहते थे… कर ली थी आत्महत्या: मुख्यमंत्री स्टालिन

तमिलनाडु : सनातन विरोधी DMK की सरकार ने फेक न्यूज के उस्ताद जेहादी मोहम्मद जुबैर को दिया अवाॅर्ड

     तमिलनाडु सरकार ने गणतंत्र दिवस के मौके पर मोहम्मद जुबैर को किया सम्मानित (फोटो साभार : X_mkstalin)
तमिलनाडु में सनातन विरोधी पार्टी DMK सत्ता में है। इसके एक मंत्री ने हाल ही में सनातन को मिटाने की बात की थी। अब तमिलनाडु सरकार ने हिंदुओं के खिलाफ प्रोपेगेंडा और फेक न्यूज फैलाने वाले मोहम्मद जुबैर को सम्मानित किया है। गणतंत्र दिवस पर ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ बढ़ाने और सांप्रदायिक वैमनस्यता को रोकने में मदद करने के नाम पर जुबैर को पुरस्कृत किया गया है।

जुबैर ‘सर तन से जुदा’ गैंग के लिए खाद-पानी का काम करता रहा है। इसके एडिटेड वीडियो से देश भर के कट्टरपंथी सड़कों पर उतर जाते हैं। भाजपा की पूर्व नेता नूपुर शर्मा के मामले में सारी दुनिया ये देख चुकी है कि तरह से वह एकतरफा प्रोपेगेंडा फैलाता है, जिसके कारण बड़े पैमाने पर हिंसा हो जाती है। जुबैर को सनातनियों की ऑनलाइन लिंचिंग करने वाले गिरोह का मुख्य सरगना कहा जाता है।

तमिलनाडु सरकार ने जुबैर को ‘कोट्टई अमीर सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार‘ प्रदान किया है। हालाँकि, ये कोई हैरान करने वाली खबर नहीं है, क्योंकि डीएमके के कई नेता-मंत्री भी सनातन विरोध में आगे रहे हैं। वहीं, मोहम्मद जुबैर इस्लामिक कट्टरपंथियों का साथ लेकर सनातनियों के खिलाफ माहौल तैयार करता रहता है।

तमिलनाडु सरकार से सम्मान मिलने पर जुबैर के फॉलोवर सोशल मीडिया पर भौकाल बना रहे हैं। उसके एक फॉलोवर ने X पर लिखा, “तमिलनाडु सरकार ने फैक्ट चेकर और ऑल्ट न्यूज़ के सह-संस्थापक मोहम्मद जुबैर को कोट्टई अमीर सांप्रदायिक सद्भाव पुरस्कार से सम्मानित किया है। बधाई!! आशा है कि ऑल्ट न्यूज़ सभी दलों के फर्जी समाचार फैलाने वालों के तथ्यों की जाँच जारी रखेगा!”

इसी तरह का एक और ट्वीट अरविंद गुनासेकर नाम के एक ‘पत्रकार’ ने साझा किया है। यह व्यक्ति जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) से जुड़ा रहा है। उसने अपने सोशल मीडिया हैंडल पर एक ऑफिशियल डॉक्यूमेंट्स शेयर है। इस डॉक्यूमेंट मोहम्मद जुबैर को दिए गए सम्मान का विवरण दिया गया है।

इसमें लिखा है, “जुबैर ने ऑल्ट न्यूज़ नाम से एक वेबसाइट बनाई है और वह सोशल मीडिया पर आने वाली खबरों की सत्यता का विश्लेषण करते रहे हैं और अपनी वेबसाइट पर केवल वास्तविक खबरें ही प्रकाशित करते हैं। उनका काम समाज में फर्जी खबरों के कारण होने वाली हिंसा की घटना को रोकने में मदद करता है।”

डॉक्यूमेंट में आगे लिखा है कि जुबैर ने मार्च 2023 में राज्य के खिलाफ फैलाए जा रहे झूठ को ‘पर्दाफाश’ करने में प्रमुख भूमिका निभाई थी। डॉक्यूमेंट में कहा गया है कि मार्च 2023 में सोशल मीडिया पर तेजी से प्रसार हुआ कि तमिलनाडु में प्रवासी श्रमिकों पर हमला किया जा रहा है, जिसका एक वीडियो फुटेज भी वायरल हुआ था।

इसमें आगे लिखा है, “वीडियो फुटेज की प्रामाणिकता की पुष्टि करने के बाद जुबैर ने अपनी वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ पर प्रकाशित किया कि जो वीडियो फुटेज पोस्ट किया गया था, वह घटना वास्तव में तमिलनाडु में नहीं हुई थी। उनकी रिपोर्ट ने तमिलनाडु के खिलाफ अफवाहों के प्रसार को रोक दिया और तमिलनाडु में जाति, धर्म, नस्ल और भाषा के कारण होने वाली हिंसा को रोकने के लिए काम किया।”

मार्च 2023 में कई मीडिया रिपोर्ट्स में कहा गया था कि तमिलनाडु में काम करने वाले बिहार के श्रमिकों के खिलाफ हिंसा की घटनाएँ हुई हैं। हालाँकि, जुबैर ने अपनी वेबसाइट पर एक लेख में बताया था कि तमिलनाडु में मजदूरों पर हमले के जो वीडियो शेयर किए जा रहे हैं, वो गलत हैं। हालाँकि उसने सही खबरों के बारे में कभी नहीं बताया।

इस दौरान तमिलनाडु में प्रवासियों के खिलाफ डीएमके नेताओं की बयानबाजी लगातार जारी रही। तमिलनाडु के कई मंत्रियों ने उत्तर भारतीय लोगों के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणियाँ कीं। उन्हें ‘वडक्कन’, ‘पानी पुरी वाला’ और ‘पानपराग वायाँ’ कहकर अपमानित किया गया। डीएमके नेताओं ने उत्तर भारतीयों के प्रति नफरत फैलाने वाली नस्लवादी भाषा का इस्तेमाल किया। मुख्यमंत्री स्टालिन के बेटे ने तो सनातन को मिटाने वाले बयान भी दिए।