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इजरायल की ताबड़तोड़ कार्रवाई से डरा ईरान! सेफ हाउस भेजे गए आयतुल्ला अली खामेनेई: हिज्बुल्लाह चीफ से पहले हमास प्रमुख का भी ऐसे ही किया था खात्मा

                              ईरान के सुप्रीम लीडर अयातोल्लाह अली खामेनेई (फोटो साभार: इंडिया टुडे)
ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई को हिज्बुल्लाह प्रमुख हसन नसरल्लाह की मौत के बाद सुरक्षा कारणों से सुरक्षित स्थान पर भेजा गया है। इजरायल के हवाई हमले में नसरल्लाह के मारे जाने की खबर के बाद, क्षेत्र में तनाव चरम पर है। ईरान हिज्बुल्लाह और अन्य सहयोगियों के साथ निकट संपर्क में है और इजरायल के खिलाफ रणनीति तैयार कर रहा है।

ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह अली खामेनेई ने इजरायल की क्रूरता की निंदा करते हुए कहा कि वह(ईरान) लेबनान के साथ खड़ा है। ईरान ने मुस्लिम देशों को इजरायल के खिलाफ एकजुट होने की अपील की है। फिलहाल उन्हें सुरक्षित जगह पर भेजा जा चुका है। बता दें कि इजरायल ने ईरान की राजधानी में अपने सबसे बड़े दुश्मनों से एक हमास के चीफ इस्माइल हानिया को ढेर कर दिया था। ऐसे में ईरान को डर है कि कहीं इजरायल वैसा ही कदम न उठा ले। इस बीच, इजरायल में भी हाई अलर्ट जारी किया जा चुका है।

हिज्बुल्लाह प्रमुख की मौत के बाद लेबनान के प्रधानमंत्री नजीब मिकाती ने एक आपातकालीन बैठक बुलाई है। इस बैठक में क्षेत्रीय सुरक्षा, इजरायल के बढ़ते हमले और हिज्बुल्लाह के भविष्य को लेकर विचार-विमर्श हो रहा है। मिकाती ने कहा कि यह बैठक लेबनान की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए बेहद जरूरी है।

ईरान और हिज्बुल्लाह के बीच संपर्क और भी गहरा हो गया है। ईरान ने हिज्बुल्लाह को सैन्य और रणनीतिक समर्थन देने की पुष्टि की है और पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ाने वाली इजरायली गतिविधियों की आलोचना की है। नसरल्लाह की मौत के बाद, ईरान ने मुस्लिम देशों की बैठक (ओआईसी) बुलाने का प्रस्ताव रखा है, ताकि इस क्षेत्रीय संकट का हल निकाला जा सके।

इजरायल ने हिज्बुल्लाह के खिलाफ लगातार हवाई हमले किए हैं, जिससे लेबनान की राजधानी बेरूत में व्यापक विनाश हुआ है। इजरायली सेना का कहना है कि उन्होंने हिज्बुल्लाह के केंद्रीय ठिकाने पर हमला कर नसरल्लाह को खत्म कर दिया है, हालाँकि हिज्बुल्लाह ने अभी तक इस बारे में कोई बयान नहीं दिया है। इजरायल की इन कार्रवाइयों ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कई देशों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। लेबनान ने ईरानी विमानों के प्रवेश पर प्रतिबंध लगा दिया है, जिसके बाद ईरान से आ रहे एक विमान को वापस लौटना पड़ा।

इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस संघर्ष को ‘आवश्यक’ बताते हुए कहा कि हिज्बुल्लाह और उसके समर्थकों से निपटना जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इजरायल अपनी सुरक्षा से कोई समझौता नहीं करेगा और हिज्बुल्लाह के खिलाफ यह अभियान जारी रहेगा। वहीं, इजरायल ने नसरल्लाह को मारने के बाद हाई अलर्ट जारी किया है।

हिज्बुल्लाह और ईरान के ऐतिहासिक संबंध

ईरान और हिज्बुल्लाह के बीच लंबे समय से गहरे राजनीतिक और सैन्य संबंध हैं। नसरल्लाह की मौत के बाद, ईरान के नेता खामेनेई ने हिज्बुल्लाह को अपने समर्थन का आश्वासन दिया है। उन्होंने कहा कि इजरायल ने गाजा युद्ध से कोई सबक नहीं सीखा और यह मूर्खतापूर्ण रणनीति उसे ही नुकसान पहुँचाएगी। ईरान ने यह भी साफ कर दिया है कि वह लेबनान के साथ मजबूती से खड़ा है और इजरायल की क्रूरता को अंतरराष्ट्रीय मंच पर उजागर करेगा।
ईरान ने इस्लामी सहयोग संगठन (ओआईसी) की आपात बैठक की माँग की है, ताकि मुस्लिम देशों के बीच एकजुटता बढ़ाई जा सके और इजरायल के खिलाफ सामूहिक रुख अपनाया जा सके। ईरान का यह कदम पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच क्षेत्रीय स्थिरता के लिए अहम साबित हो सकता है।
नसरल्लाह की मौत के बाद, हिज्बुल्लाह के भविष्य को लेकर कई सवाल खड़े हो गए हैं। ईरान और हिज्बुल्लाह के सहयोगियों के बीच इस पर विचार किया जा रहा है कि अब अगला कदम क्या होगा। इजरायल के खिलाफ किसी बड़े जवाबी हमले की आशंका बनी हुई है, जिससे पूरे क्षेत्र में और ज्यादा हिंसा फैल सकती है।

नॉर्वे, स्पेन आयरलैंड से इजराइल ने कूटनीतिक रिश्ता तोड़ कर क्या सही किया? और क्या इन तीन देशों ने फिलिस्तीन को मान्यता देकर क्या गलत किया?

सुभाष चन्द्र

21 मई को नॉर्वे स्पेन और आयरलैंड ने फिलिस्तीन को मान्यता देने का फैसला किया जिसके विरोध में इज़रायल ने तीनों देशों से अपने राजदूत वापस बुलाकर कूटनीतिक रिश्ते समाप्त कर दिए। इन देशों को मान्यता देने के फैसले का हमास और OIC ने स्वागत किया, फिलिस्तीन 57 देशों के समूह OIC सदस्य है जो UN का सदस्य नहीं है बल्कि उसके पास 2012 से केवल Non-Member Observer का status है।

लेखक 
चर्चित youtuber 
मेरे विचार से इज़रायल ने अपने राजदूतों को बुला कर सही कदम नहीं उठाया क्योंकि 50 देशों की यूरोपियन यूनियन के एक तिहाई सदस्य फिलिस्तीन को मान्यता दे चुके है और विश्व के 193 में से अब इन तीनो को मिला कर 146 देश मान्यता दे चुके हैं। भारत तो मान्यता देने वाला पहला देश था। अब इतने मान्यता देने वाले देशों में बहुत के साथ इज़रायल के कूटनीतिक रिश्ते होंगे, फिर इन तीन से संबंध तोड़ने का क्या औचित्य है। 

अभी Belgium, Malta and Slovenia भी फिलिस्तीन को मान्यता देने पर विचार कर रहे हैं, इस बीच 11 मई को UN की जनरल असेंबली में प्रस्ताव पारित कर UNSC से कहा गया था कि फिलिस्तीन को सदस्य देश के रूप में UN में शामिल किया जाए। इस प्रस्ताव के विरोध में केवल 9 वोट पड़े जबकि बाकी सभी 184 देशों ने समर्थन किया। विरोध करने वाले 9 देश थे, US, Argentina, the Czech Republic, Hungary, Israel, Micronesia, Nauru, Palau and Papua New Guinea. 

UNSC को इसलिए अनुमोदन किया गया क्योंकि वह ही किसी राष्ट्र को सदस्य का दर्जा देने के लिए सक्षम है। हालांकि UN ने स्वयं अभी तक फिलिस्तीन को सदस्य नहीं बनाया है और 1974 से केवल PLO को Observer का Status दिया था। 

मुझे आशा नहीं है कि फिलिस्तीन को UNSC भी सदस्य बनाएगा क्योंकि वहां अमेरिका का VETO हो सकता है।

फिलिस्तीन 2007 में गाज़ा से अपना कंट्रोल हमास के हाथों गवां चुका था लेकिन आज भी विश्व भर में फिलिस्तीन और हमास को एक ही माना जाता है। आतंकी संगठन होने की वजह से कोई “हमास” का खुलकर समर्थन नहीं कर सकता और उसकी आड़ में फिलिस्तीन को समर्थन दिया जाता है। 

नॉर्वे, स्पेन और आयरलैंड में मुस्लिम विरोधी आंदोलन चरम पर रहते हैं। नॉर्वे में  55 लाख की आबादी में 3.3% मुस्लिम हैं; स्पेन में 4.7 करोड़ में 5.32% हैं और आयरलैंड में 5 करोड़ में 1.62% हैं। मान्यता देने के बाद और बढ़ सकते है। आयरलैंड के करीब ब्रिटेन पहले ही इस्लामोफोबिया से जूझ रहा है। इतना ही नहीं यूरोप के कई देश इस्लामिक ताकतों से परेशान है जिनमे फ्रांस, जर्मनी, बुल्गारिया, स्वीडन, डेनमार्क, थाईलैंड के अलावा नॉर्वे और जर्मनी भी शामिल हैं।

जो वातावरण ईरान, हमास, हूती और हिज़्बुल्लाह के बीच चल रहा है, उसे देख कर लगता है ये युद्ध इस्लाम और ईसाई/यहूदी गठजोड़ के बीच बड़े स्तर का युद्ध होकर रहेगा। सभी इस्लामिक देशों के निशाने पर इज़रायल रहेगा।  

युग परिवर्तन का समय चल रहा है : OIC और पाकिस्तान भारत की मुस्लिम कौम को न भड़काएं

सुभाष चन्द्र

कुछ दिन पहले हुई श्री राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा पर इस्लामिक देशों के संगठन OIC ने बवाल काटने की कोशिश की है और कहा है कि “भारतीय शहर अयोध्या में जिस जगह पर पहले बाबरी मस्जिद ढहाई गई थी, वहीँ राम मंदिर का निर्माण और इसकी प्राण प्रतिष्ठा गंभीर चिंता का विषय है”।

जिस तरह आज मुस्लिम देशों में किसी न किसी कारण उपद्रव हो रहे हैं, क्या उसी तर्ज पर इस्लामिक देशों के संगठन और पाकिस्तान वही स्थिति भारत में कर भारतीय मुसलमानों को बलि का बकरा बनाकर उनकी लाशों पर सियासत कर अपनी तिजोरियां भरने की तैयारियां कर रहे हैं? भारत सरकार के साथ-साथ भारतीय मुसलमानों को भी इस मुद्दे पर गंभीरता से सोंचना होगा।  

इसके साथ ही पाकिस्तान के राजदूत मुनीर आलम ने 27 जनवरी को UNO को पत्र लिख कर राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा पर आपत्ति जताते हुए कहा कि “मंदिर निर्माण से भारत के मुसलमानों के सामाजिक,आर्थिक और राजनीतिक हितों पर चोट पहुंची है जिससे इस क्षेत्र में सौहार्द और शांति भंग हो सकती है और इसलिए UNO को भारत में Islamic Heritage sites की रक्षा के लिए दखल देना चाहिए। यह कोई अकेला मामला नहीं है क्योंकि इसके अलावा ज्ञानवापी मस्जिद और मथुरा की मस्जिद पर भी टूटने का खतरा मंडरा रहा है”।

सरकार को फरवरी 2, 2024 को मुस्लिम पर्सनल बोर्ड में कानून की किताबों को आग लगाए जाने की बात का संज्ञान लेकर सख्ती से पेश आना चाहिए, अन्यथा इनकी भड़काऊ हरकतें रुकने का नाम नहीं लेंगी और देश को दंगों की आग में झोंक कर लाशों पर मालपुए खाने बैठ जायेंगे।  

लेखक 
इसका मुख्य कारण है, भारतीयों का भारत के वास्तविक गौरवशाली इतिहास से अज्ञान होना। जब तक पाठ्य पुस्तकों से भ्रमित इतिहास को दूर नहीं किया जाएगा, जनता को भड़काया जाता रहेगा। 2024 में वापस आने पर मोदी सरकार इस अति गंभीर मुद्दे पर काम करना होगा, गलत इतिहास लिखने वाले इतिहासकारों पर कार्यवाही करनी होगी। उनको मिली समस्त सरकारी सुविधाओं को वापस लेना होगा, और इसका विरोध करने वालों पर कानूनी कार्यवाही करनी होगी। दूसरे, पत्थरबाजों पर blind firing और जिस स्थान से पत्थरों के जमावड़े के सबूत मिलते ही उस जगह पर बुलडोज़र चलवाकर उस स्थान को कुछ समय अपने अधिकार में लेकर नीलम कर पुलिस और अन्य सुरक्षा बल को लगाए जाने का खर्च की भरपाई करने का कानून बनाए।  

इसके अलावा भारत के कट्टरपंथी संगठनों ने आल इंडिया इमाम ऑर्गनाइजेशन के प्रमुख डॉ उमर अहमद इलियासी के खिलाफ उनके प्राण प्रतिष्ठा में शामिल होने के खिलाफ “फतवा” जारी किया है। यानी इमामों के इमाम को भी बताया जा रहा है कि उन्हें इस्लाम की जानकारी नहीं है, कुछ समय पहले इलियासी साहब ने संघ प्रमुख को “राष्ट्रपिता” कह दिया था जिस पर भागवत जी ने उन्हें रोक दिया था कि ऐसा कहना ठीक नहीं है।

इलियासी साहब को मुस्लिमों ने फतवे में कहा कि “एक मुस्लिम को किसी अन्य धर्म के मंदिर में नहीं जाना चाहिए और इन संगठनों को लगा कि इलियासी का अयोध्या जाना इस्लाम के सिद्धांतो के खिलाफ है। यानी हिन्दू-मुस्लिम भाईचारे का नारा एक फ्रॉड है क्योंकि यह फतवा बता रहा है कि इस्लाम में दूसरे धर्मों के लिए कोई सहिष्णुता है ही नहीं। हिंदुओं का फिर मस्जिदों और दरगाहों पर जाना भी बंद करो।

इमाम इलियासी ने फतवे पर प्रतिक्रिया देते हुए साफ़ शब्दों में कहा कि जो लोग मेरे अयोध्या जाने से मुझसे नफरत करते हैं, वो पाकिस्तान चले जाएँ, मैंने प्यार का पैगाम दिया है और न मैं माफ़ी माँगूँगा और न इस्तीफा दूंगा।

OIC और पाकिस्तान और भारतीय मुस्लिम समुदाय को एक बात समझ आनी चाहिए कि हिंदू बहुल देश होते हुए भी हिन्दू समुदाय कानूनी तौर पर मुगलों द्वारा तोड़े गए मंदिरों को वापस लेने के कोशिश कर रहा है जबकि ऐसा इस्लामिक देश में सम्भव नहीं था। 

OIC और पाकिस्तान केवल भारत की केवल एक जबरन बनी हुई मस्जिद पर बने मंदिर की बात क्यों करते हैं जबकि वे कभी चीन में वामपंथी सरकार द्वारा तोड़ी गई 1500 मस्जिदों के लिए नहीं बोलते और कभी हाल के युद्ध में गाजा में ध्वस्त हुई 200 मस्जिदों की बात नहीं करते। OIC ने कभी पाकिस्तान, अफगानिस्तान और अन्य इस्लामिक देशों में तोड़े गए मंदिरों, गुरुद्वारों या बौद्ध प्रतिमाओं के लिए आवाज़ नहीं उठाई।

पाकिस्तान को भारत के मुसलमानों की चिंता छोड़ अपने घर को संभालना चाहिए। अपना मुल्क लेकर भी उस समय के मुसलमानों ने क्या पा लिया जो पूरा मुल्क आज कटोरा हाथ में लिए घूम रहा है। फिर भी यदि पाकिस्तान को भारत के मुसलमानों की चिंता है तो जितने मर्जी यहां से ले जाए, अपने मुल्क में रखने की हिम्मत भी होनी चाहिए। OIC पहले अपने इस्लामिक देशों के झगड़े तो सुलझा ले जहां हर मुल्क अपने तरह का इस्लाम चला रहा है।

आज समय बदल रहा है, आज के मुस्लिम समाज का मुगलों से किसी तरह का कोई लगाव रखने का कोई औचित्य नहीं है। मुस्लिम समाज को सच्चाई से रूबरू होकर अपने को बदलना चाहिए वरना समय उसे बदल देगा।

ऋषि-मुनियों के देश भारत को इस्लामिक देशों के संगठन में क्यों शामिल कराना चाहतीं थीं इंदिरा गाँधी? हिन्दुओं आंखें खोलो और सनातन विरोधियों के विरुद्ध लामबंध हो


G20 शिखर सम्मेलन की सफल अध्यक्षता के बाद वैश्विक स्तर पर पर भारत की एक अलग ही छवि बनकर सामने आई है। दुनियाभर के दिग्गज नेता भारत और पीएम मोदी की तारीफ कर चुके हैं। यही नहीं, भारत को G7 में शामिल करने की चर्चा हो रही है। लेकिन, एक वक्त स्थिति ऐसी भी थी कि भारत इस्लामी देशों के संगठन में शामिल होना चाहता था।

पहले ही मुग़ल आक्रांता भारतीय संस्कृति को बहुत धूमिल कर चुके थे, तो क्या इंदिरा गाँधी भारत को मुस्लिम संगठन बनाकर ऋषि-मुनियों की इस तभोभूमि को भी नष्ट करना चाहती थी? इंदिरा गाँधी के इस प्रयास के लिए इस परिवार की पृष्ठभूमि को गंभीरता से देख समस्त सनातन विरोधियों को अपनी आंखे और दिमाग को खोलनी होंगी। यही कारण है कि कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण नीति पर काम करती रही है। सेकुलरिज्म के पाखंड से हिन्दुओं को पागल बनाया जाता रहा है। इस कटु सच्चाई को समस्त हिन्दू समाज को समझनी होगी। भारत में सेकुलरिज्म सिर्फ तब तक जिन्दा है जब तक हिन्दू है, परिणाम दुनिया में सामने है, जहां-जहां मुस्लिम बहुसंख्यक होता जा रहा है, हिन्दुओं द्वारा निकाली जाने वाली शोभा यात्राओं पर होते हमले। क्या इसी का नाम सेकुलरिज्म है? क्या इसी का नाम गंगा-जमुनी तहजीब है?   

GHIYASUDDIN GHAZI (Name changed to GANGA DHAR to escape British army).he settled near
Nehru is derived from the word "neher" which means canal in Hindi,he titled himself NEHRU means who lived near the neher or river......

His son was
MOTI LAL NEHRU

दरअसल, साल 1969 में इस्लामिक देशों ने ‘ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन (OIC)’ नामक अपना एक संगठन बनाने का फैसला किया था। इसमें शामिल होने के लिए कई देशों में होड़ मची हुई थी। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस होड़ में भारत भी शामिल था। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने औपचारिक तौर पर इस संगठन में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। लेकिन, पाकिस्तान के विरोध के बाद भारत इस्लामिक देशों के संगठन का हिस्सा नहीं बन पाया था।

एक दौर वह था जब भारत इस्लामिक देशों के संगठन में शामिल होना चाहता था। वहीं प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत का एक दौर ऐसा भी आया जब OIC ने खुद भारत को ‘विशिष्ट अतिथि’ के रूप में आमंत्रित किया था। इसके बाद तत्कालीन विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भारत के प्रतिनिधि के रूप में संयुक्त अरब अमीरात (UAE) गई थीं।

यही नहीं, अब OIC में सबसे अधिक दबदबा रखने वाले सऊदी अरब के साथ प्रधानमंत्री वन-टू-वन मीटिंग कर रहे हैं। G20 के बाद सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिल सलमान बिन अब्दुलअजीज अल साउद और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच द्विपक्षीय वार्ता हुई। इसमें दोनों देशों के बीच ग्रिड कनेक्टिविटी के लिए एमओयू पर हस्ताक्षर हुआ है। इसके तहत समुद्र के नीचे बिजली ट्रांसमिशन लाइन डालकर भारत और सऊदी अरब के बीच पावर ग्रिड बनाया जाएगा।

क्या है OIC

1969 में मुस्लिम देशों ने अपना स्वयं का अंतर्राष्ट्रीय संगठन बनाने का फैसला लिया था। इस संगठन को लेकर कहा गया था कि यह मुस्लिम देशों की आवाज उठाएगा। इसे ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कॉन्फ्रेंस नाम दिया गया था। हालाँकि, बाद में साल 2011 में इसका नाम बदलकर ऑर्गनाइजेशन ऑफ इस्लामिक को-ऑपरेशन यानी इस्लामिक सहयोग संगठन रख दिया गया है। यह संगठन 57 इस्लामिक देशों का संगठन है। इस्लाम के खिलाफ होने वाली किसी भी छोटी सी छोटी गतिविधि के खिलाफ आवाज उठाता है।

क्या हुआ था भारत के साथ

वापस साल 1969 में लौटें तो इस्लामिक देशों के संगठन बनने की पहली बैठक मोरक्को में हुई थी। इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने मोरक्को में भारत के राजदूत गुरबचन सिंह को बातचीत करने का नेतृत्व सौंपा था। पूर्व विदेश सचिव जेएन दीक्षित लिखते हैं कि जैसे ही इंदिरा गाँधी को एहसास हुआ कि इस्लामी देशों की बैठक में बातचीत करने में सिख को भेजना एक गलती है, उन्होंने अपनी गलती सुधारते हुए फकरूद्दीन अली अहमद के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल मोरक्को भेज दिया। लेकिन, यह प्रतिनिधिमंडल मोरक्को नहीं पहुँच पाया।
वास्तव में इंदिरा गाँधी खुद इस्लामिक देशों के संगठन में शामिल होने के लिए खुद को धर्मनिरपेक्ष दिखाना चाहती थीं। इसलिए उन्होंने एक सिख को हटाकर मुस्लिम को भेजने का फैसला किया था। यदि OIC चार्टर की शुरुआती पंक्तियों को देखें तो पता चलता है कि इंदिरा गाँधी के नेतृत्व वाला भारत इस्लामिक देशों के साथ ‘उठने-बैठने’ को कितना अधिक बेताब था। दरअसल, चार्टर की शुरुआत में ही लिखा था, “अल्लाह के नाम पर, सबसे दयालु हम इस्लामी सहयोग संगठन के सदस्य देश हैं। एकता और भाईचारे के इस्लामी मूल्यों के हिसाब से चलने और दुनिया में इस्लाम की भूमिका को पुनर्जीवित करने हेतु प्रयास करने के लिए दृढ़ निश्चय करते हैं।”
अब सवाल यह है कि जब भारत OIC का सदस्य बन इस्लाम का काम करने को बेताब था फिर सदस्य कैसे नहीं बन पाया। दरअसल, तत्कालीन पाकिस्तानी राष्ट्रपति याह्या खान को जब पता चला कि भारत OIC में शामिल होने जा रहा है, तो वह भड़क गए और बीमारी का बहाना बनाकर मोरक्को से जाने की धमकी दे दी। पाकिस्तान की धमकी के बाद इस्लामिक देशों के पास एक ही विकल्प था – या तो भारत या फिर पाकिस्तान।
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फिर क्या था, इस्लामिक देशों ने इस्लाम के मूल्यों को ध्यान में रखते हुए पाकिस्तान को OIC का सदस्य बना दिया। बात यहीं तक खत्म हो जाती तो शायद अच्छा होता। लेकिन, इस्लामिक देशों ने पाकिस्तान से माफी माँगी और फिर हर बात का दोष भारत पर मढ़ दिया। खासतौर से भारतीय राजदूत पर जो कि एक सिख थे। यही नहीं, भारत को चालाक, धोखेबाज कहते हुए प्रतिनिधिमंडल को बैठक में जाने से भी रोक दिया।