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गाय देख टपकती है BEEF की लार, आवारा कुत्तों पर आता है प्यार: कौन हैं ये दोगलई दिखाने वाले ‘एनिमल लवर’, प्रधानमंत्री मोदी के बयान से फिर चर्चा में आए

                प्रधानमंत्री मोदी और सड़कों पर आवारा कुत्तों को लेकर विरोध करते लोग (फोटो साभार : Aajtak)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हाल में एक वीडियो वायरल हुई जिसमें वे पशु प्रेम के नाम पर पाखंड करने वाले लोगों पर तंज कसते दिखाई दे रहे हैं। इस वीडियो में वे कहते हैं कि कुछ दिन पहले उनकी मुलाकात एनिमल लवर्स से हुई थी, उन एनिमल लवर्स की विशेषता यह थी कि वह गाय को एनिमल ही नहीं मानते…।

प्रधानमंत्री मोदी ने यह बयान 12 सितंबर 2025 को विज्ञान भवन में दिया था। अब ये वीडियो जगह-जगह चर्चा में है। लोग एक बार फिर ‘एनिमल लवर्स’ पर सवाल उठा रहे हैं, जिन्हें आवारा कुत्तों की चिंता सताती है, लेकिन गाय को वो ‘माता’ तो दूर की बात है, उन्हें पशु भी नहीं मानते।

बीफ में फ्लेवर- कुत्तें के लवर

इस बात को आसान भाषा में समझने के लिए तथाकथित कॉमेडियन वीर दास के 2 ट्वीट देखिए। एक ट्वीट उस समय का है जब कोर्ट ने स्ट्रे डॉग्स को लेकर फैसला दिया था और दूसरा आज से 10 साल पहले का है। पुराने ट्वीट में वो मैगी को बीफ फ्लेवर लॉन्च करने की सलाह दे रहे हैं।

दुखद बात ये है कि वीर दास अकेला ऐसा नाम नहीं है। पिछले दिनों ऐसे कई दोगले एनिमल लवर आपको स्ट्रे डॉग्स के लिए चिंता जताते हुए दिखे होंगे। जो आम दिनों में गाय खाने को अपना अधिकार मानते हैं, उसके लिए बहस करते हैं। उन्हें चिंता इस बात की होती है कि लोग क्यों रेबीज जैसे मुद्दे को उजागर कर रहे हैं, दूसरी तरफ ये खुशी होती है कि डिनर में वह मटन-चिकन खाएँगे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ये मुद्दा इसीलिए उठाया गया ताकि समाज का एक वर्ग ये समझ सके कि ‘एनिमल लवर’ कहलाना तब उपलब्धि है जब हर पशु के प्रति एक प्रकार का स्नेह हो। न कि खुद को पशु प्रेमी बताकर पशुओं के प्रति ही भेदभाव करना।

गाय माता से पीएम मोदी का रिश्ता

प्रधानमंत्री मोदी अक्सर गायों के साथ देखे जाते हैं, उनकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती रही हैं, जहाँ वे गायों को खाना खिलाते और दुलारते दिखते हैं। हिंदू धर्म में गाय को पवित्र माना जाता है और ‘गौ माता‘ के रूप में पूजा जाता है।

मोदी सरकार ने 2014 से गायों की सुरक्षा के लिए कई योजनाएँ भी शुरू की हैं। 2019 में ‘राष्ट्रीय कामधेनु आयोग’ (RKA) की स्थापना की गई थी। यह आयोग मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के तहत काम करता है। इसका मुख्य उद्देश्य गायों और उनकी नस्लों का संरक्षण, सुरक्षा और विकास करना है।

प्रधानमंत्री का यह बयान दिखाता है कि वे पशु प्रेम को लेकर कुछ लोगों के दोहरे रवैये पर कटाक्ष कर रहे थे। एक तरफ लोग कुत्तों के लिए आवाज उठाते हैं, लेकिन दूसरी तरफ वे अन्य जानवरों को उतनी अहमियत नहीं देते।

आवारा कुत्तों पर सुप्रीम कोर्ट का आदेश और विवाद

कुछ समय पहले ही, दिल्ली में आवारा कुत्तों को लेकर एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था। सुप्रीम कोर्ट ने 11 अगस्त 2025 को एक आदेश जारी किया, जिसमें दिल्ली-NCR के सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर स्थायी रूप से शेल्टरों में रखने का निर्देश दिया गया। कोर्ट ने यह आदेश कुत्तों के काटने और रेबीज के बढ़ते मामलों को देखते हुए दिया था, जिसमें बच्चे और बुजुर्ग भी शामिल थे।

इस आदेश का पशु अधिकार कार्यकर्ताओं और कई मशहूर हस्तियों ने कड़ा विरोध किया। उन्होंने इस आदेश को ‘अवैज्ञानिक’ बताया और कहा कि यह पशु जन्म नियंत्रण नियमों के खिलाफ है। इस विरोध को देखते हुए, चीफ जस्टिस ने मामले को तीन-न्यायाधीशों की पीठ के पास भेज दिया।

नई पीठ ने पुराने आदेश में बदलाव किया और निर्देश दिया कि कुत्तों को नसबंदी और टीकाकरण के बाद उसी जगह वापस छोड़ा जाए, जहाँ से उन्हें पकड़ा गया था। इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि सार्वजनिक सड़कों पर कुत्तों को खाना खिलाने की अनुमति नहीं होगी, बल्कि इसके लिए नगर निगमों को विशेष ‘फीडिंग ज़ोन’ बनाने होंगे।

पॉलिसी हिंदू-घृणा से सने ट्विटर ने OpIndia को किया सेंसर: सनातन को बदनाम करने वालों को करता है प्रमोट

माइक्रो ब्लॉगिंग साइट ट्विटर का दोगलापन एक बार फिर से उभर कर सामने आ गया है। दोगलेपन का ताजा शिकार ऑपइंडिया को बनाया गया है। मंगलवार, 2 नवंबर 2021 को ट्विटर ने Elle विवाद पर ऑपइंडिया द्वारा प्रकाशित एक संपादकीय कार्टून को हटा दिया। इसे हटाने के पीछे ट्विटर ने प्राइवेसी पॉलिसी के उल्लंघन का तर्क दिया है।

उक्त कार्टून को पहले ही ट्विटर ने हाइड कर दिया था, लेकिन बाद में ऑपइंडिया को कार्टून को हटाने के लिए मजबूर किया गया। ऑपइंडिया के अकाउंट को भी बंद कर दिया गया है। इस कारण से 14 घंटे से अधिक समय से आधिकारिक हैंडल से कोई ट्वीट नहीं किया जा सका है। हमने इस मुद्दे को ट्विटर के साथ उठाया, लेकिन ट्विटर की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी, इसको लेकर हमारा अनुमान उतना ही है, जितना कि आपका।

आप देखिए न 25 अक्टूबर 2021 को केरल में पहली बार गैर-हलाल रेस्तरां खोलने वाली महिला पर कथित तौर पर इस्लामवादियों द्वारा हमला किया गया था। उसे दूसरी ब्रांच नहीं खोलने के लिए भी धमकाया गया था। हालाँकि, अब केरल पुलिस ने कथित रूप से तुशारा अजीत नाम की उस महिला और उसके पति को ‘फर्जी आरोप लगाने’ के आरोप में गिरफ्तार कर लिया।

इस्लाम में गैर-हलाल खाना ‘हराम’ (अनुमति नहीं) है। हलाल के तहत जानवर को मारने की पूरी प्रक्रिया में केवल मुस्लिम ही शामिल हो सकते हैं और उस दौरान बिस्मिल्लाह का उच्चारण करना आवश्यक है। इस तरह, यह उन लोगों का आर्थिक बहिष्कार है, जो मुस्लिम नहीं हैं, क्योंकि हलाल खाद्य उद्योग में सिर्फ मुस्लिमों ही शामिल हो सकते हैं।

उपरोक्त कार्टून फैशन पत्रिका एली द्वारा अपने इंस्टाग्राम पेज पर साझा किए गए कार्टून की प्रतिक्रिया में था। कई नेटिजन्स ने दिवाली उत्सव के लिए साझा किए गए एली के विज्ञापनों और क्रिएटिव पर सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी अस्वीकृति व्यक्त की थी।

इनमें से कई ब्रांडों में उदास दिखने वाले मॉडल ऐसे घूर रहे थे, जैसे कि उन्हें उन्हें खाने की बीमारी है और वे अपने जीवन के विकल्पों पर सवाल उठा रहे हैं। इसको देखकर नेटिजन्स अपसेट थे, क्योंकि हिंदू त्योहार रोशनी, खुशी, हँसी और प्रसन्नता का त्योहार है। इस दिन लोग लोग नए कपड़े पहनते हैं, आभूषण, उपहार, मिठाई खरीदते हैं, दीये जलाते हैं, लक्ष्मी और भगवान राम का घर में स्वागत करते हुए रँगोली बनाते हैं। यह उत्सव का समय होता है। ऐसे समय में जब दुनिया चीन में कथित रूप से उत्पन्न कोरोना के कहर से धीरे-धीरे उबरने की कोशिश कर रही है, ऐसा लगता है कि उदास दिखने वाली ये मॉडल जीवंतता को खत्म कर रही हैं।

नीचे आप Elle का वो कार्टून देख सकते हैं जो उसने अपने इंस्टाग्राम पेज पर पोस्ट किया था। यह उन हिंदुओं को चित्रित करता है जो नहीं चाहते हैं कि दीवाली विरोधी कुछ नेटिजन्स की वजह से उनके त्योहार को ‘हिंसक’ प्रस्तुत किया जाए।

                                                                         Elle की इंस्टाग्राम पोस्ट

मुगलों और दीवाली का रोमांटिककरण इसे हल्के ढंग में प्रस्तुत करने का बकवास मात्र है। मुगलों द्वारा हिंदू मंदिरों को नष्ट और लूटे जाने और बर्बर लोगों द्वारा जबरन धर्म परिवर्तन के पर्याप्त ऐतिहासिक विवरण उपलब्ध हैं। यह बताता है कि हमारे त्योहार इसलिए नहीं बचे कि मुगलों ने इसे शानदार बनाया, बल्कि मुगल तो भारत से हिंदुओं और हिंदुत्व को पूरी तरह नष्ट करना चाहते थे।

बावजूद इसके ‘भगवा आतंक’ को चित्रित करने के लिए इन्हें मुफ्त पास मिलता है, लेकिन अगर आप इस्लामवादियों के असली रंग दिखाते हैं तो आप एक इस्लामोफोबिया से ग्रसित माने जाते हैं। एक महिला द्वारा गैर-हलाल रेस्तरां खोलने के लिए कट्टरपंथियों द्वारा हमले का आरोप लगाना ‘फर्जी समाचार’ के रूप में लेबल किया जाता है और इस पर रिपोर्टिंग करना ‘अभद्र भाषा’ है, लेकिन हिंदुओं की निंदा न केवल सामान्य है, बल्कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ दिखने के लिए प्रोत्साहित भी की जाती है।

जब इस बड़ी टेक कंपनी की बात आती है तो कट्टरपंथी इस्लामिस्ट के चरमपंथी बर्ताव के बारे में कहने पर आपको हेट स्पीच के दायरे में डाल दिया जाता है। इसीलिए ऑपइंडिया के संपादकीय कार्टून को ट्विटर पर ‘पॉलिसी वॉयलेशन’ के लिए फ्लैग किया जाता है और हमारा अकाउंट लॉक कर दिया जाता है, क्योंकि एक महिला इस्लामवादियों के हमले की बात कहती है और उम्माह के कारण आईएसआईएस के टॉयलेट टिश्यू को रोल करने वाले उसे झूठा बताते हैं।

न्यूयॉर्क टाइम्स ने भी हिन्दुओं का मजाक उड़ाया था 

                                                              न्यूयॉर्क टाइम्स का नस्ली कार्टून

हालाँकि, यह पहली बार नहीं है जब बिग टेक ने उम्माह के साथ अपनी एकजुटता दिखाने के लिए अपने घुटने टेके हैं। भारत के प्रति NYTimes के नस्लवादी रवैये को भी याद रखने की आवश्यकता है।

2014 में भारत मंगलयान मिशन के तहत पहले प्रयास में मंगल पर पहुँचने वाला दुनिया का पहला देश था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संरक्षण में सितंबर 2014 भारत के अंतरिक्ष अनुसंधान के लिए ऐतिहासिक था। रोस्कोस्मोस (रूस), नासा (यूएसए) और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी (22 यूरोपीय सदस्य राज्यों) के बाद भारत की इसरो चौथी अंतरिक्ष एजेंसी थी, जो मंगलयान (मंगल ग्रह की कक्षा) के साथ मंगल पर पहुँची थी।

इस मिशन की सबसे दिलचस्प बात यह थी कि यह सबसे किफायती मंगलयान था। इसे लगभग 450 करोड़ रुपये की लागत से बनाया गया था। भारत ने इस मामले में चीन को भी पीछे छोड़ दिया था, क्योंकि चीन और जापान अपने मंगल मिशन में असफल रहे थे। लेकिन, NYTimes ने क्या किया? हैरानी की बात है कि इसने एक नस्लवादी संपादकीय कार्टून प्रकाशित किया।

कार्टून में धोती-पगड़ी पहने और बगल में भैंस लिए नंगे पाँव वाला एक आदमी ‘एलीट स्पेस क्लब’ के दरवाजे पर दस्तक देता नजर आ रहा है। तो ठीक है ना F*ck you, NYTimes और तुम्हारे कुलीन क्लब को। भले ही हँगामे के बाद तुमने माफी माँग ली हो।

हैरानी की बात यह है कि किसी ने इसे सेंसर नहीं किया और न ही उसे नस्लवादी कहा। इसी साल जुलाई में तो यह एक कदम आगे बढ़कर यह दुष्प्रचार के लिए हिंदू-विरोधी, मोदी-विरोधी उम्मीदवार को नौकरी के लिए खोजने लगा। अपने विज्ञापन में न्यूयॉर्क टाइम्स का विशिष्ट उद्देश्य उन उम्मीदवारों से अपील था, जो केंद्र सरकार के खिलाफ लिख सकें और एक ऐसे अभियान में योगदान दे सकें, जिसे केवल शासन परिवर्तन ऑपरेशन कहा जा सकता है।

खास बात यह है कि भारतीयों और उसमें भी हिंदुओं के खिलाफ इसके नस्लवाद को वैधता और स्वीकृति मिलती है। लेकिन अगर कोई तथाकथित शांतिपूर्ण समुदाय के बारे में थोड़ा असहज सच कहता है तो उसे ‘नफरत करने वाला’ करार दिया जाता है।

अफसोस की बात है कि यह नस्लवादी, अभिजात्य अंतरराष्ट्रीय प्रकाशन घरानों के लिए कोई अनोखी बात नहीं है। भारत में तथाकथित उदारवादी भी हिंदुओं पर नफरत फैलाने के लिए काल्पनिक परिदृश्यों को अपनाते हैं, क्योंकि यह ‘सुरक्षित’ है और सभी हिंदू नेटिजन्स ऑनलाइन ही अपना गुस्सा जताते हैं। हिंदुओं का यह गुस्सा ही पूरे हिंदू समुदाय को असहिष्णु के रूप में चित्रित करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मीडिया को मसाला देता है।

डिक्शनरी में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है धर्म और धार्मिक विचारों के प्रति उदासीन, अस्वीकृति या बहिष्कार, लेकिन यहाँ भारत में ‘धर्मनिरपेक्षता’ का एक त्वरित उदाहरण है। इसी तरह से एक ‘व्यंग्यवादी कार्टूनिस्ट’ सतीश आचार्य हैं। वह सत्ता से सच कहना तो पसंद करे हैं, लेकिन वह खुद की आलोचना सहन नहीं कर सकते। इसी साल जुलाई में जब भारत वैक्सीनेशन कार्यक्रम को तेज कर रहा था तो उस दौरान आचार्य ने यह बताने की कोशिश की थी कि भारत में वैक्सीन को लेकर हिचकिचाहट ज्यादातर हिंदुओं में है।

अपने कार्टून में आचार्य ने एक व्यक्ति को नर्स से पूछते हुए दिखाया कि टीके का ‘गोत्र’ क्या है, क्योंकि वह इसे अपनी कुंडली से मिलाना चाहता है। यह काफी मनोरंजक है, क्योंकि टीका लगवाने के दौरान किसी भी हिंदू से इस तरह के अनुरोध के बारे में कभी किसी ने नहीं सुना होगा। हालाँकि, एक समुदाय का एक वर्ग ऐसा भी है, जो वैक्सीन लेने में केवल इसके निर्माण के तरीके के कारण हिचकिचाहट दिखा रहा है। हालाँकि, आचार्य ने उन लोगों का मजाक नहीं उड़ाया जो टीकों के लिए हलाल का दर्जा चाहते थे। कोई भी शार्ली हेब्दो नहीं बनना चाहता।

इस्लामोफोबिया के रूप में असली इस्लामी आतंक का मुकाबला करने के लिए ‘हिंदू तालिबान’ और ‘हिंदू आतंक’ की कहानी बनाने का इन पर जबरदस्त दबाव है। आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता यह तभी मान्य है, जब आतंकवादी इस्लामवादी हों। अन्य धर्म के लोगों द्वारा किए गए अपराधों के लिए अपनी धर्मनिरपेक्ष साख को बनाए रखने के लिए पूरे समुदाय को बदनाम किया जाता है।

                                                                        हलाल वैक्सीन

यहीं पर ट्विटर जैसी बिग टेक कंपनियाँ इस कहानी को आगे प्रमोट करने में मदद करती हैं। अपने त्योहारों के सार्थकता के सवाल पर ऑनलाइन हिंदुओं के एक समूह द्वारा नाराजगी व्यक्त करने पर उन्हें असहिष्णु दंगाई के रूप में दोषी महसूस कराया जाता है, भले ही उन्होंने एक पत्थर भी ना फेंका हो और न ही एक भी ‘काफिर’ का सिर काटा गया हो।

धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों का पाखंड : केंद्र में बहुसंख्यकवाद और हिन्दू पीएम से परेशानी, लेकिन सिख, ईसाई, मुस्लिम बहुल राज्यों में ‘बहुसंख्यकवाद’ पर चुप्पी

                                                                                                    साभार 
देश में जिस तरह गांधी परिवार चुनाव आते ही अपना रूप बदलकर मंदिर, गुरुद्वारा, चर्च और मस्जिद का दौरा शुरू कर देता है, उसी तरह धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी भी अपने फायदे, स्थिति और स्थान के मुताबिक अपनी प्राथमिकताएं बदल लेते हैं। केंद्र स्तर पर ‘बहुसंख्यकवाद’ उन्हें शोषक के रूप में दिखाई देता है और इसका जमकर विरोध करते हैं। उन्हें बहुसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करने वाले एक हिन्दू प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से परेशानी होती है, लेकिन मुस्लिम, सिख, ईसाई बहुल राज्यों में उनका ‘बहुसंख्यकवाद’ का फॉर्मूला लागू नहीं होता है। केंद्र से राज्य में आते ही उनकी धर्मनिरपेक्षता, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद की थ्योरी पूरी तरह से बदल जाती है।

कांग्रेस की वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी को पंजाब के मुख्यमंत्री पद का ऑफर दिया गया तो उन्होंने इनकार करते हुए कहा कि केवल सिख ही मुख्यमंत्री होना चाहिए। कांग्रेस मंथन के दौरान कई हिन्दू दावेदारों के भी नाम सामने आए, लेकिन आखिरकार दलित सिख लीडर चरणजीत सिंह चन्नी को राज्य का नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया। यहां पर किसी धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी ने सवाल नहीं उठाया कि पंजाब में सिर्फ सिख ही मुख्यमंत्री क्यों बनेगा ? क्या अल्पसंख्यक समुदाय के किसी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त नहीं किया जा सकता ? 

दरअसल सेक्युलर बुद्धिजीवी यह धारणा बनाने में सफल रहे है कि पंजाब एक सिख बहुल राज्य है, इसलिए यहां पर सीएम अनिवार्य तौर पर सिख होना चाहिए। हालांकि राज्य की 39 प्रतिशत आबादी (2011 की जनगणना के मुताबिक) हिंदू है। यही नहीं, अनुच्छेद 370 हटने से पहले जम्मू और कश्मीर का मुख्यमंत्री भी अनिवार्य तौर पर मुस्लिम होता था, क्योंकि स्थानीय आबादी में मुस्लिमों का दबदबा है। वहीं नागालैंड और मिजोरम का मुख्यमंत्री ईसाई होना चाहिए क्योंकि दोनों राज्यों में ईसाईयों की आबादी ज्यादा है।

सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने कभी भी अपनी आवाज या कलम जम्मू और कश्मीर के अल्पसंख्यकों के लिए नहीं उठाई, जिनके लिए भेजा गया करोड़ों रुपया साल दर साल बहुसंख्यक मुस्लिम हड़पते रहे। अविभाजित पंजाब के दो राज्यों (पंजाब और हरियाणा) में बंटवारे के बाद राज्य में कोई भी मुख्यमंत्री हिंदू, ईसाई, जैन या बौद्ध नहीं रहा है। 1966 में रामकिशन अविभाजित पंजाब के आखिरी हिंदू मुख्यमंत्री थे। उसके बाद से हर मुख्यमंत्री जट्ट सिख रहा है।

इसी तरह लक्ष्यद्वीप और बिहार के किशनगंज जैसे मुस्लिम बहुल जिले में मुस्लिम उम्मीदवार ही जीतते रहे हैं। क्या इन मुस्लिम बहुल जिलों में धर्मनिरपेक्षता, बहुसंख्यकवाद और अल्पसंख्यकवाद की थ्योरी लागू नहीं होती ? क्या यहां पर किसी अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख और ईसाई की जीत के लिए धर्म और जाति से ऊपर उठकर अपील नहीं की जा सकती है। लेकिन देश के तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने ऐसा करने की कभी कोशिश नहीं की, क्योंकि उनकी धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ जाएगी। इन सेक्युलरों को यहां के अल्पसंख्यक हिन्दू, सिख, ईसाई, जैन और बौद्ध दिखाई नहीं देते हैं। यहां पर इन्हें देश की एकता, अखण्डता और संप्रभुता को खतरा नजर नहीं आता है। 

इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने अल्पसंख्यक हितों की रक्षा के नाम पर विभाजन को बढ़ावा दिया है। जब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी और इन सेक्युलर बुद्धिजीवियों को बोलबाला था, तो विभिन्न समुदायों में अल्पसंख्यक बनने की होड़ मच गई थी। जिन वर्गों और समुदायों ने हजारों साल से इसी धरती पर सदभाव के साथ सह अस्तित्व की मिसाल पेश की वे खुद को अल्पसंख्यक घोषित कराने पर आमादा हो गए। 2014 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार ने जैन समाज को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। वे सभी जैन जो हिन्दू धर्म के अनुसार ही जीवन जीते रहे जिनके रोटी,बेटी के रिश्ते सनातनी लोगों से आज भी बरकरार है वे सभी अब अल्पसंख्यक हो गए। 

विवेकानंद ने पूरी दुनिया में सनातन धर्म का झंडा फहराया, उनके अनुयायी रामकृष्ण मठ भी खुद को ऐसा ही दर्जा मांगता रहता है, खालसा पंथ के लिए सनातन समाज जिसे हिन्दू भी कहते हैं, ने अपने लोगों को सहर्ष भेजा वह आज अलग धर्म बन गया। कर्नाटक का विधानसभा चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस ने वहां की लिंगायत जाति को अल्पसंख्यक घोषित कर दिया। दरअसल अपने कुछ लोगों के लिए रियायतें और सुविधाएं हासिल करने की स्वार्थी सोच इस अल्पसंख्यक दर्जे की चाहत में छिपी है। धर्मनिरपेक्ष संविधान की आड़ लेकर ये बुद्धिजीवी बहुसंख्यक हिन्दुओं की सांस्कृतिक पहचान को ही खत्म करने की साजिश कर रहे हैं।

धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवी अपनी सुविधा के मुताबिक ‘बहुसंख्यकवाद’ का विरोध करते हैं, ताकि हिन्दुओं को विभाजित कर अल्पसंख्यकवाद का इस्तेमाल कर सके। सच्चाई यह है कि ये धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवि देश में अल्पसंख्यकों का शासन स्थापित पर अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा पूरी करना चाहते हैं, क्योंकि ‘बहुसंख्यकवाद’ उनकी महत्वाकांक्षा पूरी करने में सबसे बड़ी बाधा है। ये हिन्दू समाज को विभाजित कर अपनी शक्ति बढ़ाना चाहते हैं। इसलिए ये कभी आदिवासियों को बरगलाकर हिन्दू नहीं होने की आवाज बुलंद कराते हैं, तो कभी जय भीम को बढ़ावा देकर दलित समुदाय को भड़काते हैं।

बीजेपी ने धर्मनिरपेक्ष बुद्धिजीवियों के इस पाखंड को जनता के सामने रखा। 2014 में हिंदुत्व और विकास के प्रतीक बन चुके नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया। इससे बीजेपी को प्रचंड जीत मिली। लेकिन पांच साल तक इन तथाकथित सेक्युलर बुद्धिजीवियों ने मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ी। कभी अल्पसंख्यक असुरक्षा, असहिष्णुता, मॉब लिंचिंग का मुद्दा उठाया, तो कभी अवार्ड वापसी कर माहौल खराब करने की कोशिश की। इसके बावजूद बीजेपी सरकार 2019 में भारी बहुमत से सत्ता में आई और नरेन्द्र मोदी दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने। इन बुद्धिजीवियों को बहुत पीड़ा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्पष्ट और निडर होकर बहुसंख्यक हिंदू हितों की रक्षा करते हैं।